← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 11 की सूची

अध्याय पाँच: नारद ने वासुदेव को अपनी शिक्षाएँ समाप्त कीं

11.5श्रीराजोबाचभगवत्तं हरिं प्रायो न भजन्त्यात्मवित्तमा:।

तेषामशान्तकामानां क निष्ठाविजितात्मनाम्‌ ॥

१॥

श्री-राजा उवाच--राजा निमि ने पूछा; भगवन्तम्‌-- भगवान्‌; हरिम्‌--हरि को; प्राय:-- अधिकांशतया; न--नहीं; भजन्ति--'पूजते हैं; आत्म-वित्तमा:--आत्मा के विज्ञान के विषय में आप सभी पूर्ण हैं; तेषाम्‌ू--उनके; अशान्त--अतृप्त; कामानाम्‌--भौतिक इच्छाओं के; का--क्या; निष्ठा--गन्तव्य; अविजित--वश में न कर सकने वाले; आत्मनाम्‌--अपनी |

राजा निमि ने आगे पूछा : हे योगेन्द्रो, आप सभी लोग आत्म-विज्ञान में परम दक्ष हैं, अतएवमुझे उन लोगों का गन्तव्य बतलाइये, जो प्रायः भगवान्‌ हरि की पूजा नहीं करते, जो अपनीभौतिक इच्छाओं की प्यास नहीं बुझा पाते तथा जो अपनी इन्द्रियों को वश में नहीं कर पाते ।

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श्रीचमस उवाचमुखबाहूरुपादेभ्य: पुरुषस्या श्रमै: सह ।

चत्वारो जकज्षिरे वर्णा गुणैर्विप्रादयः पृथक्‌ ॥

२॥

श्री-चमस: उवाच-- श्री चमस ने कहा; मुख--मुख; बाहु-- भुजाएँ; ऊरु--जाँघें; पादेभ्य:--पाँवों से; पुरुषस्य--परमे श्वर के;आश्रमैः--चारों आश्रम; सह--सहित; चत्वार: --चार; जज्ञिरि-- उत्पन्न हुए थे; वर्णा:--जातियाँ; गुणैः--गुणों से; विप्र-आदय:--ब्राह्मण इत्यादि; पृथक्‌--विविध |

श्री चमस ने कहा : ब्राह्मण से शुरु होने वाले चारों वर्ण प्रकृति के गुणों के विभिन्न संयोगोंसे भगवान्‌ के विराट रूप के मुख, बाहु, जाँघ तथा पाँव से उत्पन्न हुए।

इसी तरह चारआध्यात्मिक आश्रम भी उत्पन्न हुए।

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य एपां पुरुष साक्षादात्मप्रभवमी ध्वरम्‌ ।

न भजन्त्यवजानन्ति स्थानाद्भ्रष्टाः पतन्त्यध: ॥

३॥

यः--जो; एषाम्‌ू--उनके ; पुरुषं--परमे श्वर को; साक्षात्‌-- प्रत्यक्षतः; आत्म-प्रभवम्‌-- अपनी उत्पत्ति के स्त्रोत; ईश्वरमू--परमनियन्ता; न--नहीं; भजन्ति--पूजते हैं; अवजानन्ति--अनादर करते हैं; स्थानातू--अपने पद से; भ्रष्टाः--पतित; पतन्ति--गिरतेहैं; अध:--नीचे |

यदि चारों वर्णों तथा चारों आश्रमों का कोई भी सदस्य उनकी अपनी उत्पत्ति के स्त्रोतभगवान्‌ की पूजा नहीं करता या जान-बूझकर भगवान्‌ का अनादर करता है, तो वे सभी अपनेपद से गिर कर नारकीय दशा को प्राप्त होंगे।

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दूरे हरिकथाः केचिद्ूरे चाच्युतकीर्तना: ।

स्त्रियः शूद्रादयश्चेव तेडनुकम्प्पा भवाहशाम्‌ ॥

४॥

दूरे--बहुत दूर; हन्‌ू-कथा:--भगवान्‌ हरि की बातों से; केचित्‌ू--कई लोग; दूरे--काफी दूर; च--तथा; अच्युत--त्रुटिरहित;कीर्तना:--कीर्ति; स्त्रिय:ः--स्त्रियाँ; शूद्र-आदय:--शूद्र तथा अन्य पतित जातियाँ; च--तथा; एव--निस्सन्देह; ते--वे;अनुकम्प्या:--अनुग्रह के पात्र हैं; भवादशाम्‌--आप जैसे व्यक्तियों के |

ऐसे अनेक लोग हैं, जिन्हें भगवान्‌ हरि विषयक वार्ताओं में भाग लेने का बहुत ही कमअवसर मिल पाता है, जिसके कारण भगवान्‌ की अच्युत कीर्ति का कीर्तन कर पाना उनके लिएकठिन होता है।

स्त्रियाँ, शूद्र तथा अन्य पतित जाति के व्यक्ति, सदा ही आप जैसे महापुरुषों कीकृषा के पात्र हैं।

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विप्रो राजन्यवैश्यौ वा हरे: प्राप्ता: पदान्तिकम्‌ ।

श्रौतेन जन्मनाथापि मुहान्त्याम्नायवादिन: ॥

५॥

विप्र:--ब्राह्मण; राजन्य-वैश्यौ--राजसी वर्ग तथा वैश्य लोग; वा--अथवा; हरेः--हरि के; प्राप्ताः--निकट जाने की अनुमतिदिये जाने पर; पद-अन्तिकम्‌--चरणकमलों के पास; श्रौतेन जन्मना--वैदिक दीक्षा का द्वितीय जन्म प्राप्त कर चुकने पर;अथ--त्पश्चात्‌; अपि--भी; मुहान्ति--मुग्ध हो जाते हैं; आम्नाय-वादिन:--अनेक दर्शनों को स्वीकार करते हुए।

दूसरी ओर ब्राह्मण, राजसी वर्ग के लोग तथा वैश्यजन वैदिक दीक्षा द्वारा द्वितीय जन्म प्राप्तकरके (द्विज ) भगवान्‌ हरि के चरणकमलों के निकट जाने की अनुमति दिये जाने पर भीमोहित हो सकते हैं और विविध भौतिकतावादी दर्शन ग्रहण कर सकते हैं।

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कर्मण्यकोविदा: स्तब्धा मूर्खा: पण्डितमानिन: ।

वदन्ति चाटुकान्मूढा यया माध्व्या गिरोत्सुका: ॥

६॥

कर्मणि--सकाम कर्म के तथ्यों के बारे में; अकोविदा: --अज्ञान; स्तब्धा:--मिथ्या अहंकार से गर्वित; मूर्खा:--मूर्ख; पण्डित-मानिन:--अपने को विद्वान समझते हुए; वदन्ति--बोलते हैं; चाटुकान्‌ू--चाटुकार; मूढा:--मुग्ध, मोहग्रस्त; यया--जिससे;माध्व्या--मधुर; गिरा--शब्द; उत्सुका:--अत्यन्त उत्सुक |

कर्मकला से अनजान, वेदों के मधुर शब्दों से मोहित तथा जागृत ऐसे उद्ध॒त गर्वित मूर्खजनअपने को विद्वान होने का ढोंग रचते हैं और देवताओं की चाटुकारिता करते हैं।

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रजसा घोरसड्डूल्पाः कामुका अहिमन्यव: ।

दाम्भिका मानिन: पापा विहसन्त्यच्युतप्रियान्‌ ॥

७॥

रजसा--रजोगुण की प्रधानता से; घोर-सड्जूल्पा:--उग्र इच्छाओं वाले; कामुका:--विषयी; अहि-मन्यव:--सर्प जैसा क्रोधकरने वाले; दाम्भिका:--बनावटी; मानिन:--अत्यधिक गर्वीले; पापा:--पापी; विहसन्ति--हँसी उड़ाते हैं; अच्युत-प्रियान्‌--अच्युत भगवान्‌ के प्रियजनों का।

रजोगुण के प्रभाव के कारण वेदों के भौतिकतावादी अनुयायी उग्र इच्छाओं के वशीभूतहोकर अत्यधिक कामुक बन जाते हैं।

उनका क्रोध सर्प जैसा होता है।

वे चालबाज, अत्यधिकगर्वीले तथा आचरण में पापपूर्ण होने से भगवान्‌ अच्युत के भक्तों की हँसी उड़ाते हैं।

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वबदन्ति तेउन्योन्यमुपासितस्त्रियोगृहेषु मैथुन्यपरेषु चाशिष: ।

यजन्त्यसूष्टान्नविधानदक्षिणंवृत्त्यै परं घ्नन्ति पशूनतद्विद: ॥

८॥

वदन्ति--बोलते हैं; ते--वे; अन्योन्यम्‌--एक-दूसरे से; उपासित-स्त्रिय: --स्त्री-पूजा में व्यस्त रहने वाले; गृहेषु-- अपने घरों में;मैथुन्य-परेषु--एकमात्र संभोग में लीन रहने वाले; च--तथा; आशिष:ः--आशीर्वाद, वर; यजन्ति--पूजा करते हैं; असृष्ट--बिना सम्पन्न किये; अन्न-विधान-- भोजन-वितरण; दक्षिणम्‌--पुरोहितों को दिया जाने वाला दान, दक्षिणा; वृत्त्यै--अपनीजीविका के लिए; परम्‌ू--एकमात्र; घ्नन्ति--हत्या करते हैं; पशूनू--पशुओं को; अतत्‌-विद:--ऐसे आचरण के परिणामों सेअनभिज्ञ

वैदिक विधानों के भौतिकतावादी अनुयायी भगवान्‌ की पूजा का परित्याग करके अपनीपत्नियों की पूजा करते हैं और इस तरह उनके घर यौन-जीवन के लिए समर्पित हो जाते हैं।

ऐसेभौतिकतावादी गृहस्थ इस प्रकार के मनमाने आचरण के लिए एक-दूसरे को प्रोत्साहित करतेहैं।

वे अनुष्ठानिक यज्ञ को शारीरिक निर्वाह के लिए आवश्यक साधन मान कर अवैध उत्सवमनाते हैं, जिनमें न तो भोजन बाँटा जाता है, न ही ब्राह्मणों तथा अन्य सम्मान्य व्यक्तियों कोदक्षिणा दी जाती है।

विपरित इसके वे अपने कर्मों के कुपरिणामों को समझे बिना, क्रूरतापूर्वकबकरों जैसे पशुओं का वध करते हैं।

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प्रिया विभूत्याभिजनेन विद्ययात्यागेन रूपेण बलेन कर्मणा ।

जातस्मयेनान्धधिय: सहेश्वरान्‌सतोवमन्यन्ति हरिप्रियान्खला: ॥

९॥

भ्िया--अपने ऐश्वर्य ( सम्पत्ति आदि ) द्वारा; विभूत्या--विशिष्ट क्षमताओं द्वारा; अभिजनेन--उच्च कुल से; विद्यया--शिक्षा से;त्यागेन--त्याग से; रूपेण--सौन्दर्य से; बलेन--बल से; कर्मणा--कर्म द्वारा; जात--उत्पन्न; स्मयेन--ऐसे गर्व से; अन्ध--अन्धा हुआ; धियः--बुद्ध्ि वाला; सह-ई श्वरान्‌ू-- भगवान्‌ सहित; सतः--सन्‍्त स्वभाव वाले भक्तगण; अवमन्यन्ति--अनादरकरते हैं; हरि-प्रियान्‌ू-- भगवान्‌ हरि के प्रियजनों को; खला:--दुष्ट व्यक्ति |

दुर्मति व्यक्तियों की बुद्धि उस मिथ्या अहंकार से अन्धी हो जाती है, जो धन-सम्पदा, ऐश्वर्य,उच्च-कुलीनता, शिक्षा, त्याग, शारीरिक सौन्दर्य, शारीरिक शक्ति तथा वैदिक अनुष्ठानों कीसफल सम्पन्नता पर आधारित होता है।

इस मिथ्या अहंकार से मदान्ध होकर ऐसे दुष्ट व्यक्तिभगवान्‌ तथा उनके भक्तों की निन्दा करते हैं।

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सर्वेषु शश्वत्तनुभृत्स्ववस्थितंयथा खमात्मानमभीष्ठटमी श्वरम्‌ ।

वेदोपगीतं च न श्रृण्वतेडबुधामनोरथानां प्रवदन्ति वार्तया ॥

१०॥

सर्वेषु--समस्त; शश्वत्‌--नित्य; तनु-भृत्सु--देहधारी जीवों में; अवस्थितम्‌--स्थित; यथा--जिस तरह; खम्‌-- आकाश;आत्मानम्‌--परमात्मा को; अभीष्टम्‌--अत्यन्त पूज्य; ई श्वरम्‌--परम नियन्ता को; वेद-उपगीतम्‌--वेदों द्वारा प्रशंसित; च--भी;न श्रृण्वते--नहीं सुनते हैं; अबुधा:--अज्ञानीजन; मन:-रथानाम्‌ू--मनमाने आनन्द के; प्रवदन्ति--परस्पर विवाद करते जाते हैं;वार्तवा--कथाएँ।

प्रत्येक देहधारी जीव के हृदय के भीतर शाश्वत स्थित रहते हुए भी भगवान्‌ उनसे पृथक्‌ रहतेहैं, जिस तरह कि सर्वव्यापक आकाश किसी भौतिक वस्तु में घुल-मिल नहीं जाता।

इस प्रकारभगवान्‌ परम पूज्य हैं तथा हर वस्तु के परम नियन्ता हैं।

वेदों में उनकी विस्तार से महिमा गाईजाती है, किन्तु जो लोग बुद्धिविहीन हैं, वे उनके विषय में सुनना नहीं चाहते।

वे अपना समयअपने उन मनोरथों की चर्चा करने में बिताते हैं, जो यौन-जीवन तथा मांसाहार जैसी स्थूलइन्द्रिय-तृष्ति से सम्बन्धित होते हैं।

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लोके व्यवायामिषमद्यसेवानित्या हि जन्तोर्न हि तत्र चोदना ।

व्यवस्थितिस्तेषु विवाहयज्ञसुराग्रहैरासु निवृत्तिरिष्टा ॥

११॥

लोके-- भौतिक जगत में ; व्यवाय--यौन-लिप्तता; आमिष--मांस; मद्य--तथा मदिरा का; सेवा:--सेवन; नित्या:--सदैवप्राप्त; हि--निस्सन्देह; जन्तो:--बद्धजीव में; न--नहीं; हि--निस्सन्देह; तत्र--उस विषय में; चोदना--शास्त्र का आदेश;व्यवस्थिति:--संस्तुत व्यवस्था; तेषु--इनमें; विवाह--पवित्र विवाह द्वारा; यज्ञ-यज्ञ; सुरा-ग्रहः--तथा शराब ग्रहण करने से;आसु--इनकी; निवृत्ति:--समाप्ति; इष्टा--अभीष्ट

इस भौतिक जगत में बद्धजीव यौन, मांसाहार तथा नशे के प्रति सदैव उन्मुख रहता है।

इसीलिए शास्त्र कभी भी ऐसे कार्यों को बढ़ावा नहीं देते।

यद्यपि पवित्र विवाह के द्वारा यौन,यज्ञों द्वारा मांसाहार तथा उत्सवों में सुरा के प्याले ग्रहण करके नशे के लिए शास्त्रों का आदेशहै, किन्तु ऐसे उत्सवों मन्तव्य उनकी ओर से विरक्ति उत्पन्न करना है।

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धनं च धर्मकफलं यतो वैज्ञानं सविज्ञानमनुप्रशान्ति ।

गृहेषु युझ्ञन्ति कलेवरस्यमृत्युं न पश्यन्ति दुरन्तवीर्यम्‌ ॥

१२॥

धनम्‌-- धन; च-- भी; धर्म-एक-फलम्‌--धार्मिकता ही, जिसका एकमात्र उचित फल है; यत:--जिस ( धार्मिक जीवन ) से;वै--निस्सन्देह; ज्ञाममू--ज्ञान; स-विज्ञानमू- प्रत्यक्ष अनुभूति सहित; अनुप्रशान्ति--तथा तदुपरान्त कष्ट से मोक्ष; गृहेषु-- अपनेघरों में; युज्ञन्ति--उपयोग करते हैं; कलेवरस्थ-- अपने भौतिक शरीर का; मृत्युमू--मृत्यु; न पश्यन्ति--नहीं देख सकते;दुरन्‍्त--दुर्लघ्य; वीर्यमू--जिसकी शक्ति

सजञ्जञित धन का एकमात्र उचित फल धार्मिकता है, जिसके आधार पर मनुष्य जीवन कीदार्शनिक जानकारी प्राप्त कर सकता है, जो अन्ततः परब्रह्म की प्रत्यक्ष अनुभूति में और इस तरहसमस्त कष्ट से मोक्ष में परिणत हो जाता है।

किन्तु भौतिकतावादी व्यक्ति अपने धन का सदुपयोगअपनी पारिवारिक स्थिति की उन्नति में ही करते हैं।

वे यह देख नहीं पाते कि दुल॑ध्य मृत्यु शीघ्रही उनके दुर्बल भौतिक शरीर को विनष्ट कर देगी।

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यद्घ्राणभक्षो विहितः सुराया-स्तथा पशोरालभनं न हिंसा ।

एवं व्यवाय: प्रजया न रत्याइमं विशुद्धं न विदु: स्वधर्मम्‌ ॥

१३॥

यतू--चूँकि; प्राण--सूँघ कर; भक्ष:--ग्रहण करना; विहितः--वैध है; सुराया:--मदिरा का; तथा--उसी तरह; पशो:--बलिपशु का; आलभनमू--विहित वध; न--नहीं; हिंसा--अंधाधुंध हिंसा; एबम्‌--इसी प्रकार से; व्यवाय:--यौन; प्रजया--सनन्‍्तानउत्पन्न करने के लिए; न--नहीं; रत्यै--इन्द्रिय-भोग के लिए; इमम्‌--यह ( जैसाकि पिछले श्लोक में कहा गया है );विशुद्धम्‌--अत्यन्त शुद्ध; न विदु:--वे नहीं समझ पाते; स्व-धर्मम्‌--अपने उचित कर्तव्य को |

वैदिक आदेशों के अनुसार, जब यज्ञोत्सवों में सुरा प्रदान की जाती है, तो उसका पीकर नहींअपितु सूँघ कर उपभोग किया जाता है।

इसी प्रकार यज्ञों में पशु-बलि की अनुमति है, किन्तुव्यापक पशु-हत्या के लिए कोई प्रावधान नहीं है।

धार्मिक यौन-जीवन की भी छूट है, किन्तुविवाहोपरान्त सन्‍्तान उत्पन्न करने के लिए, शरीर के विलासात्मक दोहन के लिए नहीं।

किन्तुदुर्भाग्यवश मन्द बुद्धि भौतिकतावादी जन यह नहीं समझ पाते कि जीवन में उनके सारे कर्तव्यनितान्त आध्यात्मिक स्तर पर सम्पन्न होने चाहिए।

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ये त्वनेवंविदोसन्तः स्तब्धा: सदभिमानिनः ।

पशूजुह्मन्ति विश्रब्धा: प्रेत्य खादन्ति ते च तान्‌ू ॥

१४॥

ये--जो; तु--लेकिन; अनेवम्‌-विद: --इन तथ्यों को न जानते हुए; असन्तः--अपवित्र; स्तब्धा:--बनावटी; सतू-अभिमानिन:ः --अपने को साधु मानने वाले; पशून्‌ू--पशुओं को; ब्रुह्मन्ति--क्षति पहुँचाते हैं; विश्रब्धा:--अबोध होने से विश्वासकर लेने वाले; प्रेत्वय--इस शरीर को त्यागने पर; खादन्ति--खाते हैं; ते--वे पशु; च--तथा; तानू--उनको

वे पापी व्यक्ति, जो असली धर्म से अनजान होते हुए भी अपने को पूर्णरूपेण पवित्र समझतेहैं, उन निरीह पशुओं के प्रति बिना पश्चाताप किये हिंसा करते हैं, जो उनके प्रति पूर्णतयाआश्वस्त होते हैं।

ऐसे पापी व्यक्ति अगले जन्मों में उन्हीं पशुओं द्वारा भक्षण किये जाएँगे, जिनकावे इस जगत में वध किये रहते हैं।

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द्विषन्तः परकायेषु स्वात्मानं हरिमी श्वरम्‌ ।

मृतके सानुबन्धेस्मिन्बद्धस्नेहा: पतन्त्यध: ॥

१५॥

द्विषन्त:--द्वेष करते हुए; पर-कायेषु--अन्यों के शरीरों के भीतर ( आत्माएँ ); स्व-आत्मानम्‌--अपने आपको; हरिम्‌ ईश्वरम्‌--भगवान्‌ हरि को; मृतके--लाश में; स-अनुबन्धे -- अपने सम्बन्धियों समेत; अस्मिन्‌--इस; बद्ध-स्नेहा:--स्थिर स्नेह वाले;'पतन्ति--गिरते हैं; अध:--नीचे की ओर

बद्धजीव अपने शवतुल्य भौतिक शरीरों तथा अपने सम्बन्धियों एवं साज-सामान के प्रतिस्नेह से पूरी तरह बँध जाते हैं।

ऐसी गर्वित एवं मूर्खतापूर्ण स्थिति में बद्धजीव अन्य जीवों केसाथ साथ समस्त जीवों के हृदय में वास करने वाले भगवान्‌ हरि से भी द्वेष करने लगते हैं।

इसप्रकार ईर्ष्यावश अन्यों का अपमान करने से बद्धजीव क्रमशः नरक में जा गिरते हैं।

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ये कैवल्यमसम्प्राप्ता ये चातीताश्व मूढताम्‌ ।

तअैवर्गिका हाक्षणेका आत्मानं घातयन्ति ते ॥

१६॥

ये--जो; कैवल्यम्‌--परब्रह्म का ज्ञान; असम्प्राप्ता:-- जिन्होंने नहीं प्राप्त किया है; ये--जो; च-- भी; अतीता:--पार कर चुकेहैं; च-- भी; मूढताम्‌--निपट मूर्खता; त्रै-वर्गिका:--जीवन के तीनों लक्ष्यों के प्रति समर्पित अर्थात्‌ धर्म, अर्थ तथा काम; हि--शनिस्सन्देह; अक्षणिका:--विचार करने के लिए, जिनके पास क्षण-भर भी समय नहीं है; आत्मानम्‌-- अपने को; घातयन्ति--हत्या करते हैं; ते--वे |

जिन्होंने परम सत्य का ज्ञान प्राप्त नहीं किया है, फिर भी, जो निपट अज्ञानता के अंधकार सेपरे हैं, वे सामान्यतया धर्म, अर्थ तथा काम इन तीन पवित्र पुरुषार्थों का अनुसरण करते हैं।

अन्यकिसी उच्च उद्देश्य के बारे में विचार करने के लिए समय न होने से वे अपनी ही आत्मा के हत्यारे( आत्मघाती ) बन जाते हैं।

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एत आत्महनोशान्ता अज्ञाने ज्ञानमानिन: ।

सीदन्त्यकृतकृत्या वै कालध्वस्तमनोरथा: ॥

१७॥

एते--ये; आत्म-हन:--आत्मा के हत्यारे; अशान्ता:--शान्ति से रहित; अज्ञाने--अज्ञान में; ज्ञान-मानिन: --ज्ञानवान्‌ मानते हुए;सीदन्ति--कष्ट उठाते हैं; अकृत--कर न सकने से; कृत्याः--अपना कर्तव्य; वै--निस्सन्देह; काल--समय द्वारा; ध्वस्त--विनष्ट; मनः-रथा:--उनकी रंगीन इच्छाएँ।

इन आत्महन्ताओं को कभी भी शान्ति नहीं मिल पाती, क्योंकि वे यह मानते हैं कि मानवीबुद्धि अन्ततः भौतिक जीवन का विस्तार करने के लिए है।

इस तरह अपने असली आध्यात्मिककर्तव्य की उपेक्षा करते हुए, वे सदैव कष्ट पाते हैं।

वे उच्च आशाओं एवं स्वप्नों से पूरित रहते हैं,किन्तु दुर्भाग्यवश काल के अपरिहार्य प्रवाह के कारण ये सब सदैव ध्वस्त हो जाते हैं।

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हित्वात्ममायारचिता गृहापत्यसुहत्स्त्रिय: ।

तमो विशन्त्यनिच्छन्तो वासुदेवपराड्मुखा: ॥

१८॥

हित्वा--त्याग कर; आत्म-माया--परमात्मा की माया द्वारा; रचिता:--तैयार किये गये; गृह--घर; अपत्य--बच्चे; सुहत्‌--मित्र; स्त्रिः--पत्लियाँ; तम:-- अंधकार में; विशन्ति--प्रवेश करते हैं; अनिच्छन्त:--न चाहते हुए; वसुदेव-पराक्‌ु-मुखा:--भगवान्‌ वासुदेव से मुख फेरने वाले

जिन लोगों ने ईश्वर की माया के जाल में आकर भगवान्‌ वासुदेव से मुख मोड़ लिया है, उन्हेंअन्त में बाध्य होकर अपने तथाकथित घर, बच्चे, मित्र, पत्नियाँ तथा प्रेमीजनों को छोड़ना पड़ताहै, क्योंकि ये सब भगवान्‌ की माया से उत्पन्न हुए थे और ऐसे लोग अपनी इच्छा के विरुद्धब्रह्माण्ड के घोर अंधकार में प्रवेश करते हैं।

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श्री राजोबाच'कस्मिन्काले स भगवान्कि वर्ण: कीहशो नृभिः ।

नाम्ना वा केन विधिना पूज्यते तदिहोच्यताम्‌ ॥

१९॥

श्री-राजा उवाच--राजा ने कहा; कस्मिन्‌ू--किस; काले--काल में; सः--वह; भगवान्‌-- भगवान्‌; किम्‌ वर्ण:--किस रंगका; कीहशः --किस रूप का; नृभिः--मनुष्यों द्वारा; नाम्ना--( किन ) नामों से; वा--तथा; केन--किस; विधिना--विधि से;पूज्यते--पूजा जाता है; ततू--वह; इह--हमारी उपस्थिति में; उच्यताम्‌--कृपा करके कहें।

राजा निमि ने पूछा : भगवान्‌ प्रत्येक युग में किन रंगों तथा रूपों में प्रकट होते हैं और वेकिन नामों तथा किन-किन प्रकार के विधानों द्वारा मानव समाज में पूजे जाते हैं ?" श्रीकरभाजन उवाचकृत॑ त्रेता द्वापरं च कलिरित्येषु केशवः ।

नानावर्णाभिधाकारो नानैव विधिनेज्यते ॥

२०॥

श्री-करभाजन: उवाच-- श्री करभाजन के कहा; कृतम्‌--सत्य; त्रेता--त्रेता; द्वापम्‌--द्वापर;; च--तथा; कलि:--कलि;इति--इस तरह के नाम वाले; एषु--इन युगों में; केशव:-- भगवान्‌ केशव; नाना--विविध; वर्ण--रंग वाले; अभिधा--नाम;आकारः--तथा स्वरूप; नाना--विविध; एव--इसी प्रकार; विधिना--विधियों से; इज्यते--पूजा जाता है|

श्री करभाजन ने उत्तर दिया--कृत, त्रेता, द्वापर तथा कलि इन चारों युगों में से प्रत्येक मेंभगवान्‌ केशव विविध वर्णो, नामों तथा रूपों में प्रकट होते हैं और विविध विधियों से पूजे जातेहैं।

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कृते शुक्लश्चतुर्बाहुर्जटिलो बल्कलाम्बर: ।

कृष्णाजिनोपवीताक्षान्बिभ्रहण्डकमण्डलू ॥

२१॥

कृते--सत्ययुग में; शुक्ल: -- श्वेत; चतुः-बाहु:--चार भुजाओं वाले; जटिल:--जटाओं से युक्त; वल्कल-अम्बर:--वृक्ष कीछाल पहने; कृष्ण-अजिन--काला हिरन; उपवीत--ब्राह्मण का जनेऊ; अक्षान्‌ू--अक्ष के बीजों की बनी जप-माला; बिभ्रत्‌ू--धारण किये; दन्‍्द--डण्डा; कमण्डलू--तथा जल का पात्र, कमण्डलु।

सत्ययुग में भगवान्‌ श्वेत वर्ण और चतुर्भुजी होते हैं, उनके सिर पर जटाएँ रहती है और वेवृक्ष की छाल का वस्त्र पहनते हैं।

वे काले हिरन का चर्म, जनेऊ, जप-माला, डण्डा तथाब्रह्मचारी का कमण्डल धारण किये रहते हैं।

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मनुष्यास्तु तदा शान्ता निर्वैरा: सुहृदः समा: ।

यजन्ति तपसा देवं शमेन च दमेन च ॥

२२॥

मनुष्या:--मनुष्य; तु--तथा; तदा--तब; शान्ता: -- शान्त; निर्वरा: --ईर्ष्यारहित; सुहृदः --सबों का मित्र; समाः--समभाव;यजन्ति-- पूजा करते हैं; तपसा-- ध्यान की तपस्या द्वारा; देवम्‌ू-- भगवान्‌ को; शमेन--मन को वश में करके; च-- भी;दमेन--इन्द्रियों को वश में करके; च--तथा सत्ययुग में लोग शान्त, ईर्ष्यारहित, प्रत्येक प्राणी के प्रति मैत्री-भाव से युक्त तथा समस्तस्थितियों में स्थिर रहते हैं।

वे तपस्या द्वारा तथा आन्तरिक एवं बाह्य इन्द्रिय-संयम द्वारा भगवान्‌की पूजा करते हैं।

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हंस: सुपर्णो वैकुण्ठो धर्मो योगेश्वरोउमल: ।

ईश्वरः पुरुषोव्यक्त: परमात्मेति गीयते ॥

२३॥

हंसः--दिव्य हंस; सु-पर्ण:--सुन्दर पंखों वाला; बैकुण्ठ:--वैकुण्ठ धाम के स्वामी; धर्म:--धर्म धारण करने वाले; योग-ईश्वर:--योग-सिद्धि के स्वामी; अमलः--निर्मल; ईश्वर: --परम नियन्ता; पुरुष:--परम भोक्ता नर; अव्यक्त:--अप्रकट; परम-आत्मा--जीव के हृदय में निवास करने वाला परमात्मा; इति--इस प्रकार; गीयते--उनके नामों का कीर्तन होता है।

सत्ययुग में भगवान्‌ की महिमा का गायन हंस, सुपर्ण, वैकुण्ठ, धर्म, योगेश्वर, अमल, ईश्वर,पुरुष, अव्यक्त तथा परमात्मा-नामों से किया जाता है।

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त्रेतायां रक्तवर्णो उसौ चतुर्बाहुस्त्रमिखल: ।

हिरण्यकेशस्त्रय्यात्मा स्त्रुक्त्र॒वाद्युपलक्षण: ॥

२४॥

त्रेतायाम्‌-्रेतायुग में; रक्त-वर्ण:--लाल रंग का; असौ--वह; चतु:-बाहु:--चतुर्भुज; त्रि-मेखल:--तीन पेटियाँ पहने( वैदिक दीक्षा की तीन अवस्थाओं की द्योतक ); हिरण्य-केश:--सुनहरे बालों वाले; त्रयि-आत्मा--तीन वेदों के ज्ञान केसाकार रूप; सत्रक्‌-स्त्रुव-आदि--चमस, स्त्रुवा इत्यादि; उपलक्षण:--प्रतीकों वालेत्रेतायुग में भगवान्‌ का वर्ण लाल होता है।

उनकी चार भुजाएँ होती हैं, बाल सुनहरे होते हैंऔर वे तिहरी पेटी पहनते हैं, जो तीनों वेदों में दीक्षित होने की सूचक है।

ऋक्‌, साम तथाअजुर्वेदों में निहित यज्ञ द्वारा पूजा के ज्ञान के साक्षात्‌ रूप उन भगवान्‌ के प्रतीक स्त्रुकू, स्त्रुवाइत्यादि यज्ञ के पात्र होते हैं।

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त॑ तदा मनुजा देवं सर्वदेवमयं हरिम्‌ ।

यजन्ति विद्यया त्रय्या धर्मिष्ठा ब्रह्यवादिन: ॥

२५॥

तम्‌--उसको; तदा--तब; मनुजा:--मनुष्य; देवम्‌-- भगवान्‌ को; सर्व-देव-मयम्‌--समस्त देवताओं से युक्त; हरिम्‌-- श्री हरिको; यजन्ति-- पूजा करते हैं; विद्यया-- अनुष्ठानों द्वारा; त्रव्या--तीन मुख्य वेदों के; धर्मिष्ठा:--धर्म में स्थिर; ब्रह्मटवादिन: --परब्रह्म की खोज करने वाले |

त्रेतायुग में मानव समाज के वे लोग, जो धर्मिष्ठ हैं और परम सत्य को प्राप्त करने में सच्चीरुचि रखते हैं, वे समस्त देवताओं से युक्त भगवान्‌ हरि की पूजा करते हैं।

इस युग में तीनों वेदोंमें दिये गये यज्ञ अनुष्ठानों के द्वारा भगवान्‌ की पूजा की जाती है।

"

विष्णुर्यज्ञ: पृश्निगर्भ: सर्वदेव उरुक्रम: ।

वृषाकपिर्जयन्तश्च उरुगाय इतीर्यते ॥

२६॥

विष्णु: --सर्वव्यापी भगवान्‌; यज्ञ:--यज्ञरूपी परम पुरुष; पृश्नि-गर्भ: --पृश्नि तथा प्रजापति सुतपा के पुत्र; सर्व-देव:--समस्तदेवताओं के स्वामी; उरु-क्रम:--अद्भुत कर्म करने वाले; वृषाकपि: -- भगवान्‌

जो स्मरण करने मात्र से सारे कष्टों को दूर करदेते हैं तथा सारी इच्छाओं को पूरा करते हैं; जयन्त:ः--सर्वविजयी; च--तथा; उरू-गाय:--अत्यन्त महिमावान्‌; इति--इन नामोंसे; ईर्यते-हे इस्‌ चल्लेदत्रेतायुग में विष्णु, यज्ञ, पृश्निगर्भ, सर्वदेव, उरुक्रम, वृषाकपि, जयन्त तथा उरुगाय नामों सेभगवान्‌ का गुणगान किया जाता है।

"

द्वापरे भगवाज्श्याम: पीतवासा निजायुध: ।

श्रीवत्सादिभिरड्' श्व॒ लक्षणरुपलक्षितः ॥

२७॥

द्वापरे--द्वापर युग में; भगवान्‌-- भगवान्‌; श्याम: --साँवले रंग का; पीत-वासा:--पीत वस्त्र धारण किये हुए; निज-आयुध:--अपने विशिष्ट हथियारों सहित ( चक्र, गदा, शंख तथा कमल-पुष्प से युक्त ); श्रीवत्स-आदिभि:-- श्रीवत्स तथा अन्यों से;अड्»ै :--शरीर के चिह्न; च--तथा; लक्षणै:--आभूषणों द्वारा; उपलक्षित:--विशेषित |

द्वापर युग में भगवान्‌ श्याम-वर्ण से युक्त और पीताम्बर धारण किये प्रकट होते हैं।

इसअवतार में भगवान्‌ के दिव्य शरीर में श्रीवत्स तथा अन्य विशेष आभूषण अंकित रहते हैं और वेअपने निजी आयुध प्रकट करते हैं।

"

तं॑ तदा पुरुषं मर्त्या महाराजोपलक्षणम्‌ ।

यजन्ति वेदतन्त्राभ्यां परं जिज्ञासवो नृप ॥

२८॥

तम्‌--उस; तदा--उस युग में; पुरुषम्‌--परम भोक्ता को; मर्त्या:--मर्त्य लोग; महा-राज--महान्‌ राजा; उपलक्षणम्‌-- भूमिकाअदा करते; यजन्ति--पूजा करते हैं; वेद-तन्त्राभ्यामू--मूल वेदों तथा कर्मकाण्डी तंत्रों के अनुसार; परम्‌--परम को;जिज्ञासव:--ज्ञानार्जन के इच्छुक; नृप--हे राजा।

हे राजन्‌, द्वापर युग में जो लोग परम भोक्ता भगवान्‌ को जानने के इच्छुक होते हैं, वे वेदोंतथा तंत्रों के आदेशानुसार, उन्हें महान्‌ राजा के रूप में आदर देते हुए पूजा करते हैं।

"

नमस्ते वासुदेवाय नमः सट्डूर्षणाय च ।

प्रद्यम्नायानिरुद्धाय तुभ्यं भगवते नमः ॥

२९॥

नारायणाय ऋषये पुरुषाय महात्मने ।

विश्वेश्वराय विश्वाय सर्वभूतात्मने नम: ॥

३०॥

नमः--नमस्कार; ते--आप; वासुदेवाय--वासुदेव को; नमः--नमस्कार; सट्डूर्षणाय--संकर्षण को; च--तथा; प्रद्युम्नाय --प्रद्युम्म को; अनिरुद्धाय--अनिरुद्ध को; तुभ्यम्‌ू--आप; भगवते-- भगवान्‌ को; नम:ः--नमस्कार; नारायणाय ऋषये--नारायणऋषि को; पुरुषाय--परम भोक्ता पुरुष तथा ब्रह्माण्ड स्त्रष्टा को; महा-आत्मने--परमात्मा को; विश्व-ईश्वराय--ब्रह्माण्ड केस्वामी को; विश्वाय--तथा साक्षात्‌ विश्व-रूप को; सर्व-भूत-आत्मने--समस्त जीवों के परमात्मा को; नम:ः--नमस्कार।

'हे परम स्वामी वासुदेव, आपको तथा आपके संकर्षण, प्रद्युम्म तथा अनिरुद्ध-रूपों कोनमस्कार है।

हे भगवान्‌, आपको नमस्कार है।

हे नारायण ऋषि, हे ब्रह्माण्ड के स्त्रष्टा, पुरुषों मेंसर्वश्रेष्ठ, इस जगत के स्वामी तथा ब्रह्माण्ड के आदि स्वरूप, हे समस्त जीवों के परमात्मा,आपको सादर नमस्कार है।

"

इति द्वापर उर्वीश स्तुवन्ति जगदी श्वरम्‌ ।

नानातन्त्रविधानेन कलावपि तथा श्रूणु ॥

३१॥

इति--इस प्रकार; द्वापरे--द्वापर युग में; उर-ईश--हे राजा; स्तुवन्ति--स्तुति करते हैं; जगत्‌-ई श्ररम्‌--ब्रह्माण्ड के स्वामी की;नाना--विविध; तन्त्र--शास्त्रों के; विधानेन--नियमों द्वारा; कलौ--कलियुग में; अपि-- भी; तथा--उसी तरह; श्रूणु--सुनो हे राजन, इस तरह से द्वापर युग में लोग ब्रह्माण्ड के स्वामी का यशोगान करते थे।

कलियुगमें भी लोग शास्त्रों के विविध नियमों का पालन करते हुए भगवान्‌ की पूजा करते हैं।

अब कृपाकरके आप मुझसे इसके बारे में सुनें।

"

कृष्णवर्ण त्विषाकृष्णं साड्ेपाड्रस्त्रपार्षदम्‌ ।

यज् सड्डीर्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधस: ॥

३२॥

कृष्ण-वर्णम्‌--कृष्ण में आये अक्षरों को दुहराना; त्विषा--कान्ति से; अकृष्णम्‌--काला नहीं ( सुनहला ); स-अड्ग--संगियोंसमेत; उप-अड्ग--सेवकगण; अस्त्र--हथियार; पार्षदम्‌--विश्वासपात्र साथी; यज्जैः--यज्ञ द्वारा; सड्डीर्तन-प्रायैः--मुख्य रूप से

सामूहिक कीर्तन से युक्त; यजन्ति--पूजा करते हैं; हि--निश्चय ही; सु-मेधस: --बुद्धिमान व्यक्तिकलियुग में, बुद्धिमान व्यक्ति ई श्र के उस अवतार की पूजा करने के लिए सामूहिक कीर्तन( संकीर्तन ) करते हैं, जो निरन्तर कृष्ण के नाम का गायन करता है।

यद्यपि उसका वर्ण श्यामल(कृष्ण ) नहीं है किन्तु वह साक्षात्‌ कृष्ण है।

वह अपने संगियों, सेवकों, आयुधों तथाविश्वासपात्र साथियों की संगत में रहता है।

"

ध्येयं सदा परिभवध्नमभीष्टदोहंतीर्थास्पदं शिवविरिद्धिनुतं शरण्यम्‌ ।

भृत्यातिहं प्रणतपाल भवाब्थधिपोतंवन्दे महापुरुष ते चरणारविन्दम्‌ ॥

३३॥

ध्येयम्‌ू-- ध्यान किये जाने के योग्य; सदा--सदैव; परिभव-- भौतिक जगत के अपमान; घ्नम्‌--नष्ट करने वाला; अभीष्ट--आत्मा की असली इच्छा; दोहम्‌ू--ठीक से पुरस्कार करने वाले; तीर्थ--सारे पवित्र स्थानों तथा सन्त-महापुरुषों का;आस्पदम्‌-- धाम; शिव-विरिज्ञि--शिव तथा ब्रह्मा जैसे महान्‌ देवताओं द्वारा; नुतम्‌--झुके हुए; शरण्यम्‌--शरण ग्रहण करनेके लिए सर्वाधिक योग्य; भृत्य--सेवकों के; आर्ति-हम्‌--कष्ट को दूर करने वाले; प्रणत-पाल--उन सबके रक्षक, जो आपकोप्रणाम करते हैं; भव-अब्धि--जन्म-मृत्यु के सागर का; पोतम्‌ू--उपयुक्त नाव ( पार करने के लिए ); वन्दे--मैं वन्दना करता हूँ;महा-पुरुष--हे महाप्रभु; ते--तुम्हारे; चरण-अरविन्दम्‌--चरणकमलों की

हे प्रभु, आप महापुरुष हैं और मैं आपके उन चरणकमलों की पूजा करता हूँ, जो शाश्वतध्यान के एकमात्र लक्ष्य हैं।

वे चरण भौतिक जीवन की चिन्ताओं को नष्ट करते हैं और आत्माकी सर्वोच्च इच्छा--शुद्ध भगवत्प्रेम की प्राप्ति--प्रदान करते हैं।

हे प्रभु, आपके चरणकमलसमस्त तीर्थस्थानों के तथा भक्ति-परम्परा के समस्त सन्‍्त-महापुरुषों के आश्रय हैं और शिवतथा ब्रह्मा जैसे शक्तिशाली देवताओं द्वारा सम्मानित होते हैं।

हे प्रभु, आप इतने दयालु हैं किआप उन सबों की स्वेच्छा से रक्षा करते हैं, जो आदरपूर्वक आपको नमस्कार करते हैं।

इस तरहआप अपने सेवकों के सारे कष्टों को दयापूर्वक दूर कर देते हैं।

निष्कर्ष रूप में, हे प्रभु, आपकेचरणकमल वास्तव में जन्म तथा मृत्यु के सागर को पार करने के लिए उपयुक्त नाव हैं, इसीलिएब्रह्मा तथा शिव भी आपके चरणकमलों में आश्रय की तलाश करते रहते हैं।

'" त्यक्त्वा सुदुस्त्यजसुरेप्सितराज्यलक्ष्मींधर्मिष्ठ आर्यवचसा यदगादरण्यम्‌ ।

मायामृगं दयितयेप्सितमन्वधावद्‌वन्दे महापुरुष ते चरणारविन्दम्‌ ॥

३४॥

त्यक्त्वा--त्याग कर; सु-दुस्त्यज--त्याग पाना अत्यन्त कठिन; सुर-ईप्सित--देवताओं द्वारा वांछित; राज्य-लक्ष्मीम्‌--लक्ष्मीतथा उसका एऐश्वर्य; धर्मिष्ठ: --अत्यन्त धार्मिक; आर्य-वचसा--ब्राह्मण के वचनों के अनुसार; यत्‌--जो; अगात्‌--गया;अरण्यमू--( संन्यास लेकर ) जंगल में; माया-मृगम्‌--बद्धजीव जो सदैव भ्रामक भोग की तलाश करता है; दयवितया--कृपावश; ईप्सितम्‌--वांछित वस्तु; अन्वधावत्‌--पीछे पीछे दौड़ते; वन्दे--नमस्कार करता हूँ; महा-पुरुष--हे महाप्रभु; ते--तुम्हारे; चरण-अरविन्दम्‌--चरणकमलों को |

हे महापुरुष, मैं आपके चरणकमलों की पूजा करता हूँ।

आपने लक्ष्मी देवी तथा उनके सारेऐश्वर्य का परित्याग कर दिया, जिसे त्याग पाना अतीव कठिन है और जिसकी कामना बड़े बड़ेदेवता तक करते हैं।

इस तरह धर्मपथ के अत्यन्त श्रद्धालु अनुयायी होकर आप ब्राह्मण के शापको मान कर जंगल के लिए चल पड़े।

आपने मात्र अपनी दयालुतावश पतित बद्धजीवों कापीछा किया, जो सदैव माया के मिथ्या भोग के पीछे दौड़ते हैं और उसी के साथ अपनी वांछितवस्तु भगवान्‌ श्यामसुन्दर की खोज में लगे भी रहते हैं।

"

एवं युगानुरूपाभ्यां भगवान्युगवर्तिभि: ।

मनुजैरिज्यते राजन्श्रेयसामी श्वरो हरि: ॥

३५॥

एवम्‌--इस प्रकार; युग-अनुरूपाभ्याम्‌-- प्रत्येक युग के अनुरूप ( विशिष्ट नामों तथा रूपों द्वारा )) भगवान्‌-- भगवान्‌; युग-वर्तिभि:--विभिन्न युगों में रहने वालों द्वारा; मनुजैः--मनुष्यों के द्वारा; इज्यते--पूजा जाता है; राजनू--हे राजा; श्रेयसाम्‌--समस्त आध्यात्मिक लाभ का; ईश्वर:--नियंत्रक; हरि: -- भगवान्‌ हरि।

इस प्रकार हे राजन, भगवान्‌ हरि जीवन के समस्त वांछित फलों को देने वाले हैं।

बुद्धिमानमनुष्य भगवान्‌ के उन विशेष रूपों तथा नामों की पूजा करते हैं, जिन्हें भगवान्‌ विभिन्न युगों मेंप्रकट करते हैं।

"

कलिं सभाजयत्त्यार्या गुण ज्ञा: सारभागिन: ।

यत्र सड्डीर्तनेनैव सर्वस्वार्थोडभिलभ्यते ॥

३६॥

कलिम्‌--कलियुग की; सभाजयन्ति-- प्रशंसा करते हैं; आर्या:--प्रगतिशील लोग; गुण-ज्ञ:--( युग की ) असलियत को जाननेवाले; सार-भागिन: --सार ग्रहण करने वाले; यत्र--जिसमें; सड्डीर्तनेन-- भगवान्‌ के नाम का सामूहिक कीर्तन करके; एब--मात्र; सर्व--सभी; स्व-अर्थ:--इच्छित लक्ष्य; अभिलभ्यते--प्राप्त किये जाते हैं।

जो लोग सचमुच ज्ञानी हैं, वे इस कलियुग के असली महत्व को समझ सकते हैं।

ऐसे प्रब॒द्धलोग कलियुग की पूजा करते हैं, क्योंकि इस पतित युग में जीवन की सम्पूर्ण सिद्धि संकीर्तनसम्पन्न करके आसानी से प्राप्त की जा सकती है।

"

न हातः परमो लाभो देहिनां भ्राम्यतामिह ।

यतो विन्देत परमां शान्ति नश्यति संसृति: ॥

३७॥

न--नहीं है; हि--निस्सन्देह; अत:ः--इस ( संकीर्तन विधि ) की अपेक्षा; परम:--महान्‌; लाभ:--प्राप्त करने योग्य वस्तु;देहिनाम्‌ू-देहधारियों के लिए; भ्राम्यताम्‌ू--विचरण करने के बाध्य हुए; इह--इस ब्रह्माण्ड-भर में; यतः --जिससे; विन्देत--प्राप्त करता है; परमाम्‌--परम; शान्तिम्‌ू-- शान्ति; नश्यति--तथा नष्ट करता है; संसृतिः--जन्म-मृत्यु के आवागमन को ।

निस्सन्देह, भौतिक जगत में विचरण करने के लिए बाध्य किये गये देहधारी जीवों के लिएभगवान्‌ के संकीर्तन आन्दोलन से बढ़कर और कोई सम्भावित लाभ नहीं है, जिसके द्वारा वहपरम शान्ति पा सके और अपने को बारम्बार जन्म-मृत्यु के चक्र से छुड़ा सके।

"

कृतादिषु प्रजा राजन्कलाविच्छन्ति सम्भवम्‌ ।

कलौ खलु भविष्यन्ति नारायणपरायणा: ।

क्वचित्क्वचिन्महाराज द्रविडेषु च भूरिश: ॥

३८॥

ताम्रपर्णी नदी यत्र कृतमाला पयस्विनी ।

कावेरी च महापुण्या प्रतीची च महानदी ॥

३९॥

ये पिबन्ति जल॑ तासां मनुजा मनुजेश्वर ।

प्रायो भक्ता भगवति वासुदेवेइमलाशया: ॥

४०॥

कृत-आदिषु--सत्ययुग तथा अन्य पूर्ववर्ती युगों के; प्रजा:--निवासी; राजन्‌--हे राजा; कलौ--कलियुग में; इच्छन्ति--इच्छाकरते हैं; सम्भवम्‌--जन्म; कलौ--कलियुग में; खलु--निश्चय ही; भविष्यन्ति--होंगे; नारायण-परायणा:-- भगवान्‌ नारायणकी सेवा में समर्पित लोग; क्वचित्‌ क्वचित्‌--इधर-उधर; महा-राज--हे महान्‌ राजा; द्रविडेषु--दक्षिण भारत के राज्यों में;च--लेकिन; भूरिश:--विशेष रूप से अधिक मात्रा में; ताम्रपर्णी--ताम्रपर्णी नामक; नदी--नदी; यत्र--जहाँ; कृतमाला--कृतमाला; पयस्विनी--पयस्विनी; कावेरी--कावेरी; च--तथा; महा-पुण्या--अत्यन्त पवित्र; प्रतीची--प्रतीची नामक; च--हा तथा; महा-नदी--महानदी; ये--जो; पिबन्ति--पीते हैं; जलमू--जल; तासाम्‌--उनके; मनुजा:--मनुष्यगण; मनुज-ई श्वरर--हेमनुष्यों के स्वामी ( निमि ); प्राय:--अधिकांशतः; भक्ता:-- भक्तगण; भगवति-- भगवान्‌ के; वासुदेवे--वासुदेव में; अमल-आशया:--विमल हृदय वाले |

हे राजन, सत्ययुग तथा उसके पूर्व के अन्य युगों के निवासी इस कलियुग में जन्म लेने कीतीव्र कामना करते हैं, क्योंकि इस युग में भगवान्‌ नारायण के अनेक भक्त होंगे।

ये भक्तगणविविध लोकों में प्रकट होंगे, किन्तु दक्षिण भारत में विशेष रूप से जन्म लेंगे।

हे मनुष्यों केस्वामी, कलियुग में जो व्यक्ति द्रविड़ देश की पवित्र नदियों, यथा ताम्रपर्णी, कृतमाला,पयस्विनी, अतीव पवित्र कावेरी तथा प्रतीची महानदी का जलपान करेंगे, वे सारे के सारेभगवान्‌ वासुदेव के शुद्ध हृदय वाले भक्त होंगे।

"

देवर्षिभूताप्तनृणां पितृणांन किड्डढरो नायमृणी च राजन ।

सर्वात्मना यः शरणं शरण्यंगतो मुकुन्दं परिहत्य कर्तम्‌ ॥

४१॥

देव--देवताओं के; ऋषि--ऋषियों के; भूत--सामान्य जीवों के; आप्त--मित्रों तथा सम्बन्धियों के; नृणाम्‌--सामान्य लोगोंके; पितृणाम्‌-पूर्वजों के; न--नहीं; किड्जूर:--सेवक; न--न तो; अयम्‌--यह; ऋणी--कर्जदार; च-- भी; राजन्‌--हे राजा;सर्व-आत्मना--अपने पूरे मन से; यः--जो व्यक्ति; शरणम्‌--शरण; शरण्यम्‌--सबों को शरण देने वाला, भगवान्‌; गत:--पास आया हुआ; मुकुन्दम्‌-मुकुन्द को; परिहत्य--त्याग कर; कर्तम्‌-कर्तव्य |

हे राजन, जिस व्यक्ति ने सारे भौतिक कार्यो को त्याग कर उन मुकुन्द के चरणकमलों मेंपूरी तरह शरण ले रखी है, जो सबों को आश्रय देते हैं, ऐसा व्यक्ति देवताओं, ऋषियों, सामान्यजीवों, सम्बन्धियों, मित्रों, मनुष्यों या दिवंगत हो चुके पितरों का ऋणी नहीं रहता।

चूँकि इनसभी श्रेणियों के जीव भगवान्‌ के ही भिन्नांश हैं, अतः जिसने भगवान्‌ की सेवा में अपने को समर्पित कर दिया है, उसे ऐसे व्यक्तियों की अलग से सेवा करने की आवश्यकता नहीं रहजाती।

"

स्वपादमूलम्भजत: प्रियस्यत्यक्तान्यभावस्य हरिः परेश: ।

विकर्म यच्चोत्पतितं कथज्ञिद्‌धुनोति सर्व हृदि सन्निविष्ट: ॥

४२॥

स्व-पाद-मूलम्‌--भक्तों के शरण, कृष्ण के चरणकमल; भजतः--पूजा में लगा हुआ; प्रियस्थ--कृष्ण को अत्यन्त प्रिय;त्यक्त--त्यागा हुआ; अन्य--दूसरों के लिए; भावस्य--स्वभाव वाले का; हरिः-- भगवान्‌; पर-ईश:-- भगवान्‌; विकर्म --पापकर्म; यत्‌ू--जो भी; च--तथा; उत्पतितम्‌--घटित; कथज्ञित्‌--जैसे-तैसे; धुनोति--हटाता है; सर्वम्‌--समस्त; हृदि--हृदयमें; सन्निविष्ट:--प्रविष्ट |

जिस मनुष्य ने अन्य सारे कार्यकलापों को त्याग कर भगवान्‌ हरि के चरणकमलों की पूर्णशरण ग्रहण कर ली है, वह भगवान्‌ को अत्यन्त प्रिय है।

निस्संदेह यदि ऐसा शरणागत जीवसंयोगवश कोई पापकर्म कर भी बैठे है, तो प्रत्येक हृदय के भीतर स्थित भगवान्‌, तुरन्त ही ऐसेपाप के फल को समाप्त कर देते हैं।

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श्रीनारद उबाचधर्मान्भागवतानित्थ॑ श्रुत्वाथ मिथिलेश्वर: ।

जायन्तेयान्मुनीन्प्रीत: सोपाध्यायो हापूजयत्‌ ॥

४३॥

श्री-नारद: उबाच--नारद मुनि ने कहा; धर्मान्‌ भागवतान्‌-- भगवान्‌ की भक्ति का विज्ञान; इत्थम्‌ू--इस प्रकार से; श्रुत्वा--सुनकर; अथ--तब; मिथिला-ई श्वरः -- मिथिला राज्य के स्वामी, राजा निमि ने; जायन्तेयान्‌--जयन्ती के पुत्रों को; मुनीन्‌--मुनियोंको; प्रीत:--प्रसन्न होकर; स-उपाध्याय:--पुरोहितों सहित; हि--निस्सन्देह; अपूजयत्‌--पूजा की।

नारद मुनि ने कहा : इस तरह भक्तियोग की बातें सुनकर मिथिला के राजा निमि अत्यन्तसन्तुष्ट हुए और अपने यज्ञ-पुरोहितों सहित जयन्ती के मेधावी पुत्रों का सत्कार किया।

"

ततोःच्तर्दधिरे सिद्धा: सर्वलोकस्य पश्यत: ।

राजा धर्मानुपातिष्ठन्नवाप परमां गतिम्‌ ॥

४४॥

ततः--तब; अन्तर्दधिरे--अन्तर्धान हो गये; सिद्धाः:--कवि इत्यादि मुनिगण; सर्व-लोकस्य--वहाँ पर उपस्थित सबों के;'पश्यत:ः--देखते देखते; राजा--राजा; धर्मानू--आध्यात्मिक जीवन के इन नियमों को; उपातिष्ठन्‌-- श्रद्धापूर्वक पालन करतेहुए; अवाप--प्राप्त किया; परमाम्‌--परम; गतिम्‌--लक्ष्य |

तब वे सिद्ध मुनिगण वहाँ पर उपस्थित सबों की आँखों के सामने से अदृश्य हो गये।

राजानिमि ने उनसे सीखे गये आध्यात्मिक जीवन के नियमों का श्रद्धापूर्वक अभ्यास किया और इसतरह जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त किया।

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त्वमप्येतान्महाभाग धर्मान्भागवतान्श्रुतान्‌ ।

आस्थित: श्रद्धया युक्तो निःसझ़े यास्यसे परम्‌ ॥

४५॥

त्वमू--तुम ( वसुदेव ); अपि-- भी; एतान्‌ू--इन; महा-भाग--हे परम भाग्यशाली; धर्मानू--नियमों को; भागवतान्‌-- भक्तिके; श्रुतान्‌ू--सुने हुए; आस्थित:--को प्राप्त; श्रद्धया-- श्रद्धापूर्वक ; युक्त:--समन्वित; निःसड्भ:-- भौतिक संगति से मुक्त;यास्यसे--जाओगे; परमू--परम को |

हे परम भाग्यशाली वसुदेव, आपने भक्ति के जिन नियमों को सुना है, उनका श्रद्धापूर्वकव्यवहार करें और इस तरह भौतिक संगति से छूट कर, आप परम पुरुष को प्राप्त होंगे।

"

युवयो: खलु दम्पत्योर्यशसा पूरितं जगत्‌ ।

पुत्रतामगमद्यद्वां भगवानी श्वरो हरि: ॥

४६॥

युवयो:--तुम दोनों के; खलु--निस्सन्देह; दम्‌-पत्यो:--पति-पत्नी के; यशसा--यश से; पूरितम्‌--पूर्ण हो गयी है; जगत्‌--पृथ्वी; पुत्रताम्‌ू-पुत्र का स्थान; अगमत्‌--धारण की हुईं; यत्‌--क्योंकि; वामू--तुम्हारा; भगवान्‌-- भगवान्‌; ईं धर: --परमेश्वर; हरिः-- हरिनिस्सन्देह, सारा संसार आप तथा आपकी पत्नी के यश से भरा-पुरा हो चुका है, क्योंकिभगवान्‌ हरि ने आपके पुत्र का स्थान अपनाया है।

"

दर्शनालिड्रनालापै: शयनासनभोजनै: ।

आत्मा वां पावितः कृष्णे पुत्रस्नेहं प्रकुर्बती: ॥

४७॥

दर्शन--देखने से; आलिड्रन--आलिंगन करने से; आलापै:--तथा बातें करने से; शयन--सोने में; आसन--बैठने; भोजनै:--तथा भोजन करने से; आत्मा--हदय; वाम्‌--तुम दोनों के; पावित:--शुद्ध हो चुके हैं; कृष्णे-- भगवान्‌ कृष्ण के लिए; पुत्र-स्नेहम्‌-पुत्र के प्रति स्नेह; प्रकुर्बती:--प्रकट करने वाले।

हे बसुदेव, आप तथा आपकी उत्तम पत्नी देवकी ने कृष्ण को अपने पुत्र रूप में स्वीकारकरके उनके प्रति महान्‌ दिव्य प्रेम दर्शाया है।

निस्सन्देह आप दोनों भगवान्‌ का सदैव दर्शन तथाआलिंगन करते रहे हैं, उनसे बातें करते रहे हैं, उनके साथ विश्राम करते तथा उठते-बैठते तथाउनके साथ अपना भोजन करते रहे हैं।

भगवान्‌ के साथ ऐसे स्नेहपूर्ण तथा घनिष्ठ संग से आपदोनों ने अपने हृदयों को पूरी तरह शुद्ध बना लिया है।

दूसरे शब्दों में, आप दोनों पहले से पूर्णहो।

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वैरेण यं नृपतय: शिशुपालपौण्ड्र-शाल्वादयो गतिविलासविलोकनादञै: ।

ध्यायन्त आकृतधिय: शयनासनादौतत्साम्यमापुरनुरक्तधियां पुन: किम्‌ ॥

४८ ॥

वैरेण--ईर्ष्या से; यम्‌ू--जिस ( कृष्ण ) को; नू-पतय:ः--राजागण; शिशुपाल-पौण्ड्-शाल्व-आदय:--शिशुपाल, पौण्ड्क,शाल्व इत्यादि की तरह; गति--उनकी गतिविधियों; विलास--क्रीड़ा; विलोकन--चितवन; आइद्यि: --इत्यादि से; ध्यायन्तः--ध्यान करते हुए; आकृत--स्थिर; धिय:--जिनके मन; शयन--सोते; आसन-आदौ--बैठते इत्यादि में; तत्‌-साम्यम्‌--उन्‍्हींजैसा पद ( वैकुण्ठ में स्थान ); आपु:--प्राप्त किया; अनुरक्त-धियाम्‌--जिनके मन अनुकूल ढंग से अनुरक्त हैं; पुन: किम्‌--तुलना में और क्या कहा जाय।

शिशुपाल, पौण्ड्क तथा शाल्व जैसे विरोधी राजा, भगवान्‌ कृष्ण के विषय में निरन्तरसोचते रहते थे।

सोते, बैठते या अन्य कार्य करते हुए भी वे भगवान्‌ के चलने-फिरने, उनकी क्रीड़ाओं, भक्तों पर उनकी प्रेमपूर्ण चितवन तथा उनके द्वारा प्रदर्शित अन्य आकर्षक स्वरूपों केविषय में ईर्ष्याभाव से ध्यान करते रहते थे।

इस तरह कृष्ण में सदैव लीन रह कर, उन्होंने भगवान्‌के धाम में मुक्ति प्राप्त की।

तो फिर उन लोगों को दिये जाने वाले बरों के विषय में क्या कहाजाय, जो अनुकूल प्रेमभाव से निरन्तर भगवान्‌ कृष्ण पर ही अपने मन को एकाग्र रखते हैं ?" मापत्यबुद्धिमकृ था: कृष्णे सर्वात्मनी श्वरे ।

मायामनुष्यभावेन गूढै श्वर्ये परेउव्यये ॥

४९॥

मा--मत; अपत्य-बुद्धिमू--आपका पुत्र होने का विचार; अकृथा: --लादो; कृष्णे--कृष्ण पर; सर्ब-आत्मनि--सबों केपरमात्मा; ईश्वर--ई श्र; माया-- अपनी मायाशक्ति द्वारा; मनुष्य-भावेन--सामान्य पुरुष की भाँति प्रकट होकर; गूढ-ऐश्वर्ये --अपने ऐश्वर्य को छिपाते हुए; परे--परम; अव्यये--अच्युत |

कृष्ण को सामान्य बालक मत समझिये, क्‍योंकि वे भगवान्‌, अव्यय तथा सबों के आत्माहैं।

भगवान्‌ ने अपने अचिन्त्य ऐश्वर्य को छिपा रखा है, इसीलिए वे बाहर से सामान्य मनुष्य जैसेप्रतीत होते हैं।

"

भूभारासुरराजन्यहन्तवे गुप्तये सताम्‌ ।

अवतीर्णस्य निर्व॒त्य यशो लोके वितन्यते ॥

५०॥

भू-भार--पृथ्वी के भारस्वरूप; असुर--असुर; राजन्य--राज-परिवार के सदस्य; हन्तवे--मारने के उद्देश्य से; गुप्तये--रक्षा केलिए; सताम्‌ू--सन्त-भक्तों की; अवितीर्णस्य--अवतार लेने वाले के; निर्वृत्यै--तथा मुक्ति प्रदान करने के लिए भी; यशः--यश; लोके--संसार-भर में; वितन्यते--फैल गया है भगवान्‌

पृथ्वी के भारस्वरूप आसुरी राजाओं का वध करने तथा सन्त-भक्तों की रक्षा करनेके लिए अवतरित हुए हैं।

किन्तु असुर तथा भक्त दोनों ही को भगवत्कृपा से मुक्ति प्रदान कीजाती है।

इस तरह उनका दिव्य यश ब्रह्माण्ड-भर में फैल गया है।

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श्रीशुक उबाचएतच्छुत्वा महाभागो वसुदेवोतिविस्मितः ।

देवकी च महाभागा जहतुर्मोहमात्मन: ॥

५१॥

श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एतत्‌--यह; श्रुत्वा--सुनकर; महा-भाग:--परम भाग्यशाली; वसुदेव: --राजा वसुदेव; अति-विस्मित:--अत्यन्त चकित; देवकी--माता देवकी; च--तथा; महा-भागा--परम भाग्यशालिनी; जहतु:--दोनों ने त्याग दिया; मोहम्‌ू-- भ्रम; आत्मन:--अपना

श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा: यह कथा सुनकर परम भाग्यशाली वसुदेव पूर्णतयाआश्चर्यचकित हो गए।

इस प्रकार उन्होंने तथा उनकी परम भाग्यशालिनी पत्नी देवकी ने उस भ्रमतथा चिन्ता को त्याग दिया, जो उनके हृदयों में घर कर चुके थे।

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इतिहासमिमं पुण्यं धारयेद्य:ः समाहित: ।

स विधूयेह शमलं ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥

५२॥

इतिहासम्‌ू--ऐतिहासिक विवरण; इमम्‌--इसको; पुण्यम्‌--पतवित्र; धारयेत्‌-- ध्यान करता है; यः--जो; समाहित: --स्थिरचित्त से; सः--वह; विधूय--धोते हुए; इह--इसी जीवन में; श़मलम्‌--कल्मष को; ब्रह्म-भूयाय--परम सिद्द्धि; कल्पते--प्राप्तकरता है।

जो स्थिर चित्त होकर इस पवित्र ऐतिहासिक कथा का ध्यान करता है, वह इसी जीवन मेंअपने सारे कल्मष धोकर सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करेगा।

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