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अध्याय तीस: यदु वंश का विनाश
11.30श्रीराजोबाचततो महाभागवत उद्धवे निर्गते वनम् ।द्वारवत्यां किमकरोद्धगवान्भूतभावन: ॥ १॥
श्री-राजा उबाच--राजा ने कहा; तत:ः--तब; महा-भागवते--महान् भक्त; उद्धवे--उद्धव के; निर्गते--चले जाने पर; वनम्--वन में; द्वारवत्यामू-द्वारका में; किमू--क्या; अकरोत्--किया; भगवान्-- भगवान् ने; भूत--सारे जीवों के; भावन:--रक्षक
राजा परीक्षित ने कहा : जब महान् भक्त उद्धव जंगल चले गये तो समस्त जीवों के रक्षकभगवान् ने द्वारका नगरी में क्या किया ?"
ब्रह्मशापोपसंसूष्टे स्वकुले यादवर्षभ: ।प्रेयसीं सर्वनेत्राणां तनुं स कथमत्यजत् ॥
२॥
ब्रह्म-शाप--ब्राह्मणों के शाप से; उपसंसूृष्टे--विनष्ट किये जाने पर; स्व-कुले--अपने ही परिवार में; यादव-ऋषभ:--यदुओं केप्रमुख; प्रेयसीम्-- अत्यन्त प्रिय; सर्व-नेत्राणाम्--सारे नेत्रों को; तनुम्--शरीर; सः--उन्होंने; कथम्--कैसे; अत्यजत्-त्यागा ।
ब्राह्मणों के शाप से अपने ही वंश के नष्ट हो जाने के बाद, यदुओं में श्रेष्ठ भगवान् ने किसतरह अपना शरीर छोड़ा जो सारे नेत्रों की परमप्रिय वस्तु था ?"
प्रत्याक्रष्टं नयनमबला यत्र लग्नं न शेकुकर्णाविष्टं न सरति ततो यत्सतामात्मलग्नम् ।
यच्छीववाचां जनयति रतिं कि नु मानं कवीनांइष्ठा जिष्णोर्युधि रथगतं यच्च तत्साम्यमीयु: ॥
३॥
प्रत्याक्रष्टमू--दूर हटाने में; नयनम्-- अपनी आँखें; अबला:--स्त्रियाँ; यत्र--जिसमें; लग्नम्--लिप्त; न शेकु:--सक्षम नहीं थीं;कर्ण--कान; आविष्टमू--घुस कर; न सरति--छोड़ती नहीं; तत:ः--तत्पश्चात्; यत्--जो; सताम्--ऋषियों-मुनियों का;आत्म--हृदयों में; लग्नम्--लगा हुआ; यत्--जिसका; श्री:--सौन्दर्य; वाचाम्ू--शब्दों का; जनयति--उत्पन्न करता है;रतिमू--विशेष आनन्ददायक आकर्षण; किम् नु--क्या कहा जाय; मानमू्-- ख्याति; कवीनामू--कवियों की; हृष्ठा--देख कर;जिष्णो: --अर्जुन के; युधि--युद्धक्षेत्र में; रथ-गतम्--रथ पर; यत्--जो; च--तथा; तत्-साम्यम्--उनके समान पद; ईयु:--उन्होंने प्राप्त किया ।
एक बार उनके दिव्य रूप पर अपनी आँखें गड़ा देने पर, स्त्रियाँ उन्हें हटा पाने में असमर्थहोती थीं और यदि वह रूप एक बार मुनियों के कानों में प्रवेश कर जाता और उनके हृदयों मेंगड़ जाता, तो फिर वह हटाये नहीं हटता था ।
ख्याति पाने के विषय में क्या कहा जाय, जिनमहान् कवियों ने भगवान् के रूप के सौन्दर्य का वर्णन किया उनके शब्द दिव्य मोहक आकर्षणमें फँस कर रह गये ।
और उस रूप को अर्जुन के रथ पर देख कर कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि के सारेयोद्धाओं ने भगवान् जैसे आध्यात्मिक शरीर प्राप्त कर मोक्ष-लाभ उठाया ।
" श्री ऋषिरुवाचदिवि भुव्यन्तरिक्षे च महोत्पातान्समुत्थितान् ।
इृष्ठासीनान्सुधर्मायां कृष्ण: प्राह यदूनिदम् ॥
४॥
श्री-ऋषि: उवाच--ऋषि ( शुकदेव गोस्वामी ) ने कहा; दिवि--आकाश में; भुवि--पृथ्वी पर; अन्तरिक्षे--बाह्य अवकाश में;च--तथा; महा-उत्पातान्ू--महान् उत्पातों को; समुत्थितान्-- प्रकट हो चुके; इृष्ला--देख कर; आसीनान्--आसन जमाये हुए;सु-धर्मायाम्--सुधर्मा नामक राजसभा में; कृष्ण:--कृष्ण ने; प्राह--कहा; यदूनू--यदुओं से; इृदम्--यह |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : आकाश, पृथ्वी तथा बाह्य अवकाश में अनेक उत्पात-चिन्हदेख कर भगवान् कृष्ण ने सुधर्मा नामक सभाभवन में एकत्र यदुओं से इस प्रकार कहा ।
" श्रीभगवानुवाचएते घोरा महोत्पाता द्वार्वत्यां यमकेतव: ।
मुहूर्तमपि न स्थेयमत्र नो यदुपुड़वा: ॥
५॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; एते--ये; घोरा: --भयावने; महा--महान्; उत्पाता:--अपशकुन; द्वार्वत्यामू-द्वारका में;यम--मृत्यु के राजा के; केतव:ः--झंडे; मुहूर्तम्--एक क्षण; अपि--भी; न स्थेयम्--रूकना चाहिए; अत्र--यहाँ; न:ः--हमें;यदु-पुड़वा:--हे यदुओं में श्रेष्ठ |
भगवान् ने कहा : अरे यदुवंश के नायको, जरा इन सारे भयावने अपशकुनों पर ध्यान दोजो द्वारका में मृत्यु के झंडों की तरह प्रकट हुए हैं ।
अब हमें यहाँ पर क्षण-भर भी रुकना नहींचाहिए ।
" स्त्रियो बालाश् वृद्धाश्व शट्ढोद्धारं ब्रजन्त्वित: ।
वबयं प्रभासं यास्यामो यत्र प्रत्यक्सरस्वती ॥
६॥
स्त्रियः--स्त्रियाँ; बाला:--बालक; च--तथा; वृद्धा:--बूढ़े लोग; च--तथा; शद्'ु-उद्धारम्--शंखोद्धार ( जो द्वारका तथाप्रभास के बीचोबीच है ) नामक पवित्र स्थान तक; ब्रजन्तु--जाना चाहिए; इत:ः--यहाँ से; वयम्--हम; प्रभासम्--प्रभास तक;यास्याम: --जायेंगे; यत्र--जहाँ; प्रत्यक्--पश्चिमवाहिनी; सरस्वती--सरस्वती नदी ।
स्त्रियों, बालकों तथा बूढ़े लोगों को यह नगर छोड़ कर शंखोद्धार जाना चाहिए ।
हम सभीप्रभास क्षेत्र चलेंगे जहाँ सरस्वती नदी पश्चिम वाहिनी है ।
" तत्राभिषिच्य शुच्चय उपोष्य सुसमाहिता: ।
देवता: पूजयिष्याम: स्नपनालेपनाईणै: ॥
७॥
तत्र--वहाँ; अभिषिच्य--स्नान करके ; शुच्चय:ः--पवित्र हुए; उपोष्य--उपवास रख कर; सु-समाहिता: --अपने मनों को स्थिरकरके; देवता:--देवतागण; पूजयिष्याम:--हम पूजन करेंगे; स्नपन--स्नान करके; आलेपन--चंदन लगाकर; अर्हणै:ः --तथाविविध भेंटों से |
वहाँ हम शुद्धि के लिए स्नान करें, उपवास रखें और अपने मनों को ध्यान में स्थिर करें ।
तत्पश्चात् देवताओं की मूर्तियों को स्नान कराकर हम उनका पूजन करें, चन्दन का लेप करें औरउन्हें विविध भेंटें अर्पित करें ।
" ब्राह्मणांस्तु महाभागान्कृतस्वस्त्ययना वयम् ।
गोभूहिरण्यवासोभिर्गजा श्वरथवेश्मभि: ॥
८॥
ब्राह्मणान्ू--ब्राह्मणों को; तु--तथा; महा-भागान्--अत्यन्त भाग्यशाली; कृत--सम्पन्न करने के बाद; स्वस्ति-अयना:--सौभाग्य के लिए उत्सव; वयम्--हम; गो--गौवों; भू-- भूमि; हिरण्य--स्वर्ण; वासोभि: --तथावस्त्रों से; गज--हाथियों;अश्व--घोड़ों; रथ--रथों; वेश्मभि: -- तथा घरों से |
अत्यन्त भाग्यशाली ब्राह्मणों की सहायता से स्वस्तिवाचन कराने के बाद हम उन बाह्ाणोंको गौवें, भूमि, सोना, वस्त्र, हाथी, घोड़े, रथ तथा घर भेंट करके उनकी पूजा करें ।
" विधिरेष ह्रिष्टघ्नो मड्रलायनमुत्तमम् ।
देवद्विजगवां पूजा भूतेषु परमो भव: ॥
९॥
विधि: --संस्तुत विधि; एष: --यह; हि--निस्सन्देह; अरिष्ट--अशुभ अड़चनों को; घ्न:--नष्ट करने वाला; मड्ल-अयनम्--सौभाग्य लाने वाला; उत्तमम्--सर्वश्रेष्ठ; देब--देवताओं ; द्विज--ब्राह्मणों; गवाम्--तथागौवों में ; पूजा--पूजा; भूतेषु--जीवोंमें से; परम:--सर्वोत्तम; भव: --पुनर्जन्म |
अपने आसन्न संकट का सामना करने के लिए निस्सन्देह यह उपयुक्त विधि है और इससेनिश्चित ही सर्वोच्च सौभाग्य प्राप्त होगा ।
देवताओं, ब्राह्मणों तथा गौवों की ऐसी पूजा सारे जीवोंको सर्वोच्च जन्म दिलाने वाली हो सकती है ।
" इति सर्वे समाकर्ण्य यदुवृद्धा मधुद्विष: ।
तथेति नौभिरुत्तीर्य प्रभासं प्रययू रथे: ॥
१०॥
इति--इस प्रकार; सर्वे--सभी लोग; समाकर्ण्य --सुन कर; यदु-वृद्धा:--यदुकुल के गुरुजन; मधु-द्विष:--मधु राक्षस के शत्रुभगवान् कृष्ण से; तथा--ऐसा ही हो; इति--इस प्रकार; नौभि:--नावों द्वारा; उत्तीर्य--पार करके; प्रभासम्--प्रभास तक;प्रययु:--गये; रथैः--रथों से |
मधु के शत्रु भगवान् कृष्ण से ये शब्द सुन कर, यदुवंश के गुरुजनों ने अपनी सहमति'तथास्तु ' कह कर व्यक्त कर दी ।
नावों से समुद्र को पार करने के बाद वे रथों से प्रभास कीओर बढ़े ।
" तस्मिन्भगवतादिष्टं यदुदेवेन यादवा: ।
चक्रु: परमया भकत्या सर्वश्रेयोपबृंहितम् ॥
११॥
तस्मिन्ू--वहाँ; भगवता-- भगवान् द्वारा; आदिष्टम्--आदेश दिये गये; यदु-देवेन--यदुओं के स्वामी द्वारा; यादवा:--यादवलोगों ने; चक्कु:--सम्पन्न किया; परमया--दिव्य; भक्त्या--भक्ति से; सर्व--समस्त; श्रेय:--शुभ अनुष्ठानों से; उपबूंहितम्--युक्त
वहाँ पर यादवों ने अत्यन्त भक्ति के साथ अपने स्वामी भगवान् कृष्ण के आदेशानुसारधार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न किये ।
उन्होंने अन्य विविध शुभ अनुष्ठान भी सम्पन्न किये ।
" ततस्तस्मिन्महापानं पपुर्मरेयक मधु ।
दिष्टविभ्रेशितधियो यद्दरवैर्ध्रश्यते मति: ॥
१२॥
ततः--तब; तस्मिन्ू--वहाँ; महा--प्रच्चुर मात्रा में; पानम्--पेय; पपु:--पिया; मैरेयकम्--मैरेय नामक; मधु--मधुर स्वादवाली; दिष्ट-- भाग्यवश; विभ्रंशित--नष्ट हुईं; धियः--उनकी बुद्द्ि; यत्--जिस पेय से; द्रवै:--द्रव पदार्थों से; भ्रश्यते-- भ्रष्टहो जाता है; मति:ः--मन ।
तब दैव द्वारा बुद्धि भ्रष्ट किये गये वे सब खुले मन से मधुर मैरेय पेय के पीने में लग गये जोमन को पूरी तरह मदोन्मत्त कर देता है ।
" महापानाभिमत्तानां वीराणां हृप्तचेतसाम् ।
कृष्णमायाविमूढानां सद्डर्ष: सुमहानभूत् ॥
१३॥
महा-पान--अत्यधिक पीने से; अभिमत्तानामू--मदोन्मत्त हुए; वीराणाम्--वीरों के; हृप्त--उद्धत; चेतसामू--मन; कृष्ण-माया--कृष्ण की माया से; विमूढानाम्--मोह ग्रस्त हुए; सद्डूर्ष:--झगड़ा; सु-महान्ू--बहुत बड़ा; अभूत्ू--हुआ ।
यदुवंश के बीरगण अत्यधिक पान के कारण उन्मत्त हो उठे और उद्धत हो गये ।
" जब वे भगवान् कृष्ण की निजी शक्ति से इस तरह विमोहित थे, तो उनके बीच भयानक झगड़ा उठखड़ा हुआ ।
युयुधु: क्रोधसंरब्धा वेलायामाततायिन: ।
धनुर्भिरसिभिर्भल्लैर्गदाभिस्तोमरष्टिभि: ॥
१४॥
युयुधु:--लड़ने लगे; क्रोध--क्रोध से; संरब्धा: --बुरी तरह उत्तेजित; वेलायाम्--समुद्र-तट पर; आततायिन:--हथियार लिए;धनुर्भि: -- धनुषों से; असिभि:--तलवारों से; भल्लै:ः--भालों से; गदाभि:--गदाओं से; तोमर--बछों से; ऋष्टिभि:--ऋष्टियोंसे
क्रुद्ध होकर उन्होंने अपने अपने धनुष-बाण, तलवारें, भाले, गदाएँ, बछे, तोमर ले लियेऔर समुद्र के किनारे एक-दूसरे पर आक्रमण करने लगे ।
" पतत्पताकै रथकुञ्जरादिभिःखरोष्ट्रगोभिर्महिषैनरैरपि ।
मिथ: समेत्या श्वतरेः सुदुर्मदान्यहन्शरैर्दद्धिरिव द्विपा वने ॥
१५॥
पततू-पताकैः --उड़ती पताकाओं से; रथ--रथों पर; कुझ़्र--हाथी; आदिभि:--तथा अन्य वाहनों से; खर--गधों; उद्टू--ऊँटों;गोभि:--तथा बैलों पर; महिषै:-- भेसों पर; नरैः--मनुष्यों पर; अपि-- भी; मिथ: -- परस्पर; समेत्य--मिल कर; अश्वतरैः --खच्चरों पर; सु-दुर्मदा:--अत्यधिक क्रुद्ध; न्यहन्ू-- आक्रमण किया; शरैः--तीरों से; दद्धिः--अपने दाँतों से; इब--मानो;द्विपा:--हाथी; वने--जंगल में |
हाथियों पर तथा फहराती ध्वजाओं वाले रथों पर तथा गधों, ऊँटों, बैलों, भेसों, खच्चरों एवंमनुष्यों पर भी सवार होकर अत्यन्त क्रुद्ध योद्धागण एक-दूसरे के पास आये और उन्होंने एक-दूसरे पर बाणों से वेगपूर्वक उसी तरह आक्रमण किया जिस तरह जंगल में हाथी अपने दाँतों सेएक-दूसरे पर आक्रमण करते हैं ।
" प्रद्युम्नसाम्बौ युधि रूढमत्सरा-वक्रूरभोजावनिरुद्धसात्यकी ।
सुभद्रसड्ग्रामजितौ सुदारुणौगदौ सुमित्रासुरथौ समीयतुः ॥
१६॥
प्रद्युम्न-साम्बौ--प्रद्युम्न तथा साम्ब; युधि--युद्ध में; रूढ--उकसायी हुई; मत्सरौ--उनकी शत्रुता; अक्रूर-भोजौ--अक्रूर तथाभोज; अनिरुद्ध-सात्यकी-- अनिरुद्ध तथा सात्यकि; सुभद्र-सड्ग्रामजितौ--सुभद्र तथा संग्रामजित; सु-दारुणौ-- भयंकर;गदौ--दोनों गद ( एक श्रीकृष्ण का भाई और दूसरा उनका पुत्र ); सुमित्रा-सुरथौ--सुमित्र तथा सुरथ; समीयतु:--एक-दूसरे सेमिले ।
आपसी शत्रुता भड़कने से प्रद्युम्न साम्ब से घनघोर लड़ाई करने लगा, अक्रूर कुन्तिभोज से,अनिरुद्ध सात्यकि से, सुभद्र संग्रामजित से, सुमित्र सुरथ से तथा दोनों गद एक-दूसरे से लड़नेलगे ।
" अन्ये च ये वै निशठोल्मुकादय:सहस्त्रजिच्छतजिद्धानुमुख्या: ।
अन्योन्यमासाद्य मदान्धकारिताजल्नुर्मुकुन्देन विमोहिता भूशम् ॥
१७॥
अन्ये--अन्य; च--तथा; ये--जो; बै--निस्सन्देह; निशठ-उल्मक-आदय:--निशठ, उल्मुक इत्यादि; सहस्त्रजित्ू-शतजित्ू-भानु-मुख्य:--सहस्त्रजित, शतजित तथा भानु इत्यादि; अन्योन्यम्--एक-दूसरे से; आसाद्य--मिल कर; मद--नशे से; अन्ध-कारिता:ः--अच्धे हुए; जघ्नु:--मार डाला; मुकुन्देन--मुकुन्द द्वारा; विमोहिता:--विमोहित; भूशम्--पूरी तरह से
अन्य लोग भी, यथा निशठ, उल्मुक, सहस्त्रजित, शतजित तथा भानु एक-दूसरे से गुँथ गयेऔर उन्होंने नशे से अंधे हुए एवं भगवान् मुकुन्द द्वारा पूर्णतया विमोहित हुए एक-दूसरे को मारडाला ।
" दाशाहईवृष्ण्यन्धथक भोजसात्वतामध्वर्बुदा माथुरशूरसेना: ।
विसर्जना: कुकुराः कुन्तयश्चमिथस्तु जघ्नु: सुविसृज्य सौहदम् ॥
१८॥
दाशाई-वृष्णि-अन्धक-भोज-सात्वता:--दाशाई, वृष्टि, अन्धक, भोज तथा सात्वतगण; मधु-अर्बुदा:--मथधु तथा अर्बुद; माथुर-शूरसेना:--मथुरा तथा शूरसेन के निवासी; विसर्जना:--विसर्जनगण; कुकुरा:--कुकुरगण; कुन्तयः --कुन्तिगण; च-- भी;मिथ:--परस्पर; तु--तथा; जध्नु:--मार डाला; सु-विसृज्य--पूरी तरह त्याग कर; सौहदम्--अपनी मित्रता
विविध यदुवंशियों--दाशाहों, वृष्णियों तथा अंधकों, भोजों, सात्वतों, मधुओं तथा अर्जुदों,माथुरों, शूरसेनों, विसर्जनों, कुकुरों तथा कुन्तियों ने अपनी अपनी सहज मित्रता त्याग कर एक-दूसरे को मार-काट डाला ।
" पुत्रा अयुध्यन्पितृभिर्ँ्नातृभिश्चस्वस्त्रीयदौहित्रपितृव्यमातुलै: ।
मित्राणि मित्रै: सुहृदः सुहद्धि-ज्ञतीस्त्वहन््ञातय एवं मूढा: ॥
१९॥
पुत्रा:--पुत्र; अयुध्यनू--लड़े; पितृभि: -- अपने पिताओं से; भ्रातृभि: -- भाइयों से; च--तथा; स्वस्त्रीय--बहनों के लड़कों से;दौहित्र--पुत्रियों के पुत्र; पितृव्य--चाचाओं; मातुलैः--तथा मामाओं से; मित्राणि--मित्र; मित्रै: --मित्रों से; सुहृदः--शुद्धचिन्तक; सुहद्धिः--शुभचिन्तकों से; ज्ञातीन्ू--निकट सम्बन्धी; तु--तथा; अहनू--मार डाला; ज्ञातय: --निकट सम्बन्धी;एव--निस्सन्देह; मूढा:--विमोहित
इस तरह मोहग्रस्त हुए पुत्र अपने पिताओं से, भाई भाइयों से, भाँजे अपने मामाओं से,भतीजे अपने चाचों से और नाती अपने पितामहों से लड़ने लगे ।
मित्र अपने मित्रों से तथाशुभचिन्तक अपने शुभचिन्तकों से भिड़ गये ।
इस तरह घनिष्ठ मित्रों तथा सम्बन्धियों ने एक-दूसरे को मार डाला ।
" शरेषु हीयमाएषु भज्यमानेसु धन्वसु ।
शस्त्रेषु क्षीयमानेषु मुष्टिभिर्जहरेरका: ॥
२०॥
शरेषु--बाणों; हीयमानेषु--समाप्त हुए; भज्यमानेषु--नष्ट- भ्रष्ट हुए; धन्वसु-- धनुष; शस्त्रेषु--प्र्षेप्यास्त्र; क्षीयमानेषु--समाप्तहुए; मुष्टिभि:ः--अपनी मुट्टियों से; जहः--पकड़ लिया; एरका:--बेंत के तने
जब उनके सारे धनुष टूट गये और उनके बाण तथा अन्य प्रक्षेपास्त्र समाप्त हो गये तो उन्होंनेअपने खाली हाथों में बेंत के लम्बे लम्बे डंठल ले लिये ।
" ता वज्ञकल्पा ह्ाभवन्परिघा मुष्टिना भूता: ।
जल्नुद्विंषस्तै: कृष्णेन वार्यमाणास्तु तं च ते ॥
२१॥
ताः--वे डंठल; बज़-कल्पा:--वज़ की तरह कठोर; हि--निस्सन्देह; अभवनू--हो गये; परिघा:--लोहे का डंडा; मुप्टिना--अपनी मूट्टियों में; भूता:--पकड़े; जष्नु:--आक्रमण किया; द्विष:--उनके शत्रु; तैः--इनसे; कृष्णेन--भगवान् कृष्ण द्वारा;वार्यमाणा:--रोके जाने पर; तु--यद्यपि; तम्--उसको; च-- भी; ते--वे
ज्योंही उन लोगों ने इन बेंत के डंठलों को अपनी मुट्टियों में धारण किया, वे बज्ञ की तरहकठोर लोहे के डंडों में बदल गये ।
योद्धा इन हथियारों से एक-दूसरे पर बारम्बार आक्रमणकरने लगे और जब कृष्ण ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, तो उन्होंने उन पर भी आक्रमण करदिया ।
" प्रत्यनीक॑ मन्यमाना बलभद्रं च मोहिता: ।
हन्तुं कृतधियो राजन्नापन्ना आततायिन: ॥
२२॥
प्रत्यनीकम्--शत्रु; मन्यमाना: --सोचते हुए; बलभद्रमू--बलराम को; च--भी; मोहिता:--मोहित; हन्तुमू--मारने के लिए;कृत-धिय:ः--संकल्प करके; राजनू्--हे राजा परीक्षित; आपन्ना:--वे उन पर टूट पड़े; आततायिन:--हथियार भाँजते |
हे राजा, उन सबों ने विमोहित अवस्था में बलराम को भी अपना शत्रु समझ लिया ।
वे हाथोंमें हथियार लिए उन्हें मार डालने के इरादे से उनकी ओर दौ ।
" अथ तावपि सड्क्रुद्धावुद्यम्य कुरुनन्दन ।
एरकामुष्टिपरिघौ चरन्तौ जघ्नतुर्युधि ॥
२३॥
अथ--तब; तौ--दोनों ( कृष्ण तथा बलराम ); अपि--भी; सड्क्रुद्धौ--अत्यधिक क्रोध में; उद्यम्य--लड़ाई में हिस्सा लेते हुए;कुरू-नन्दन--हे कुरुओं के प्रिय पुत्र; एरका-मुपष्टि-- अपनी मुट्टियों में बेंत; परिघौ--मुद्गर की तरह इस्तेमाल करते; चरन्तौ--इधर-उधर घूमते हुए; जघ्नतु:--मारने लगे; युधि--युद्ध क्षेत्र में ।
हे कुरु-पुत्र, तब कृष्ण तथा बलराम अत्यधिक कुपित हो उठे ।
बेंत के डंठलों को उठाते हुएवे युद्धभूमि के भीतर इधर-उधर घूमने लगे और इन मुद्गरों से उन्हें मारने लगे ।
" ब्रह्मशापोपसूष्टानां कृष्णमायावृतात्मनाम् ।
स्पर्धाक्रो धः क्षयं निन्ये वैणवोउग्निर्यथा वनम् ॥
२४॥
ब्रह्य-शाप--ब्राह्मणों के शाप से; उपसृष्टानामू--पराजितों के; कृष्ण-माया-- भगवान् कृष्ण की मायाशक्ति से; आवृत--आच्छन्न; आत्मनामू--उनके जिनके मन; स्पर्धा--स्पर्धा से उत्पन्न; क्रोध: --क्रोध; क्षयम्--विनाश को; निन्ये--प्राप्त किया;वैणव:ः--बाँस के वृक्षों की; अग्नि:--आग; यथा--जिस तरह; वनम्-- जंगल को ।
ब्राह्मणों के शाप से पराजित तथा भगवान् कृष्ण की माया से विमोहित, वे योद्धा भीषणक्रोध से, अब निज संहार को प्राप्त हुए, जिस तरह बाँस के कुंज में लगी आग सारे जंगल कोनष्ट कर देती है ।
" एवं नष्टेषु सर्वेषु कुलेषु स्वेषु केशव: ।
अवतारितो भुवो भार इति मेनेडवशेषित: ॥
२५॥
एवम्--इस प्रकार से; नष्टेषु--नष्ट हुए; सर्वेषु--समस्त; कुलेषु--कुल के; स्वेषु--अपने; केशव: --कृष्ण ने; अवतारित: --कम किया; भुवः--पृथ्वी का; भार: --बोझ; इति--इस प्रकार; मेने--सोचा; अवशेषित: --शेष |
जब उनके कुल के सारे सदस्य इस प्रकार विनष्ट हो गये, तो कृष्ण ने अपने आप सोचा किचलो धरती का बोझ तो हटा ।
" रामः समुद्रवेलायां योगमास्थाय पौरुषम् ।
तत्याज लोक मानुष्यं संयोज्यात्मानमात्मनि ॥
२६॥
राम:--बलराम; समुद्र--समुद्र के; वेलायाम्ू--तट पर; योगम्--ध्यान; आस्थाय--अपनाकर; पौरुषम्-- भगवान् पर;तत्याज--त्याग दिया; लोकमू--संसार को; मानुष्यम्--मनुष्य का; संयोज्य--लीन होकर; आत्मानम्--अपने को; आत्मनि--अपने में
तब बलरामजी समुद्र के तट पर बैठ गये और उन्होंने भगवान् के ध्यान में अपने को स्थिरकर लिया ।
अपने को अपने में ही लीन करते हुए उन्होंने यह मर्त्य संसार छोड़ दिया ।
" रामनिर्याणमालोक्य भगवान्देवकीसुतः ।
निषसाद धरोपस्थे तुष्णीमासाद्य पिप्पलम् ॥
२७॥
राम-निर्याणमू--बलराम का गमन; आलोक्य--देख कर; भगवान्--भगवान्; देवकी-सुत:--देवकी -पुत्र; निषसाद--बैठगये; धरा-उपस्थे--पृथ्वी की गोद में; तुष्णीमू--मौन होकर; आसाद्य--पाकर; पिप्पलमू--पीपल का वृक्ष |
बलराम के प्रस्थान को देख कर देवकी-पुत्र भगवान् कृष्ण पास के पीपल के वृक्ष के नीचेपृथ्वी पर चुपचाप बैठ गये ।
" बिशभ्रच्चतुर्भुजं रूप॑ भ्रायिष्णु प्रभया स्वया ।
दिशो वितिमिरा: कुर्वन्विधूम इब पावक: ॥
२८॥
श्रीवत्साडूं घनश्यामं तप्तहाटकवर्चसम् ।
कौशेयाम्बरयुग्मेन परिवीतं सुमड्गरलम् ॥
२९॥
सुन्दरस्मितवक्त्राब्ज॑ नीलकुन्तलमण्डितम् ।
पुण्डरीकाभिरामाक्षं स्फुरन्मकरकुण्डलम् ॥
३०॥
कटिसूत्रब्रह्मसूत्रकिरीटकटकाडुदै: ।
हारनूपुरमुद्राभि: कौस्तुभेन विराजितम् ॥
३१॥
वनमालापरीताड़ुं मूर्तिमद्धिर्निजायुथै: ।
कृत्वोरौ दक्षिणे पादमासीनं पड्डजारुणम् ॥
३२॥
बिभ्रत्ू-- धारण किये; चतु:ः-भुजम्--चारों भुजाओं से; रूपमू--अपना रूप; भ्राजिष्णु--चमकीला; प्रभया--तेज से; स्वया--अपने; दिश:--सारी दिशाएँ; वितिमिरा: --अंधकार से रहित; कुर्वन्--करते हुए; विधूम: --धूम्र से रहित; इब--सहश;पावक:--अग्नि; श्रीवत्स-अड्भम्-- श्रीवत्स चिह्न समेत; घन-श्यामम्--बादलों की तरह श्याम; तप्त--पिघले; हाटक--सोनेके समान; वर्चसम्--उनका चमचमाता तेज; कौशेय--रेशमी; अम्बर--वस्त्र की; युग्मेन--जोड़ी से; परिवीतम्--पहने हुए;सु-मड्गनलम्--सर्वमंगलकारी; सुन्दर--सुन्दर; स्मित--हँसी से; वकत्र--उनका मुखमंडल; अब्जमू--कमल के समान; नील--नीला; कुन्तल--घुंघराले बालों से; मण्डितम्--( उनके सिर ) अलंकृत; पुण्डकीक--कमल; अभिराम--सुहावने; अक्षम्--नेत्र;स्फुरत्ू-हिलते हुए; मकर--मछली के आकार की; कुण्डलम्--उनके कान की बालियाँ; कति-सूत्र--करधनी से; ब्रह्म-सूत्र--जनेऊ; किरीट--मुकुट; कटक--कंगन; अड्डदैः--तथा बाजूबंद से; हार--गले का हार; नूपुर--पायल; मुद्राभि:--तथा राजसी प्रतीकों से; कौस्तुभेन--कौस्तुभ मणि से; विराजितम्--सुशोभित; वन-माला--फूल की माला से; परीत--घिरे;अड्भम्--उनके अंग; मूर्ति-मद्द्धिः--साक्षात्; निज--अपने; आयुधै: --तथा हथियारों से; कृत्वा--रख कर; उरौ--जाँघ पर;दक्षिणे--दाहिनी; पादम्--पाँव; आसीनमू--बैठे हुए; पड्डुज--कमल की तरह; अरुणमू--लाल-लाल
भगवान् अपना अत्यन्त तेजोमय चतुर्भुजी रूप प्रकट कर रहे थे जिसकी प्रभा धूम्रविहीनअग्नि की तरह सारी दिशाओं के अंधकार को दूर करने वाली थी ।
उनका वर्ण गहरे नीले बादलके रंग का था और उनका ऐश्वर्य पिघले सोने के रंग जैसा था तथा उनका सर्वमंगल स्वरूपश्रीवत्स का चिन्ह धारण किये था ।
उनके कमल जैसे मुखमंडल पर सुन्दर हँसी थी, उनके सिरपर श्याम रंग के बालों का गुच्छा सुशोभित था, उनकी कमल जैसी आँखें अत्यन्त आकर्षक थींऔर उनके मकराकृति जैसे कुंडल चमक रहे थे ।
वे रेशमी वस्त्र की जोड़ी, अलंकृत पेटी,जनेऊ, कंगन तथा बाजूबन्द पहने थे ।
वे मुकुट, कौस्तुभ मणि, गले का हार, पायल तथा अन्यराजसी चिन्ह धारण किये थे ।
उनके शरीर में फूलों की मालाएँ पड़ी थीं और उनके आयुध अपनेसाकार रूप में थे ।
वे बैठे हुए थे और उनका बायाँ पैर, जिसका तलवा लाल कमल जैसा था,उनकी दाहिनी जाँघ पर रखा था ।
" मुषलावशेषायःखण्डकृतेषुरलुब्धको जरा ।
मृगास्याकारं तच्चरणं विव्याध मृगशड्डया ॥
३३॥
मुषल--लोहे की गदा से; अवशेष--बचा हुआ; अय: --लोहे का; खण्ड--टुकड़े से; कृत--बनाया गया; इषु:--तीर;लुब्धक:--शिकारी; जरा--जरा नामक; मृग--मृग का; आस्य-- मुँह का; आकारम्--आकार वाला; तत्--उसका;चरणम्--पैर; विव्याध--बेध डाला; मृग-शड्डूया--मृग समझ कर ।
तभी जरा नामक शिकारी जो उस स्थान पर आया था, भगवान् के पाँव को मृग का मुखसमझ बैठा ।
यह सोच कर कि उसे उसका शिकार मिल गया है, जरा ने उस पाँव को अपने उसतीर से बेध डाला जिसे उसने साम्ब की गदा के बचे हुए लोहे के टुकड़े से बनाया था ।
" चतुर्भुजं त॑ पुरुषं दृष्ठा स कृतकिल्बिष: ।
भीतः पपात शिरसा पादयोरसुरद्विष: ॥
३४॥
चतु:-भुजम्--चार भुजाओं वाले; तम्ू--उस; पुरुषम्--पुरुष को; हृष्टा--देख कर; सः--वह; कृत-किल्बिष: --अपराधकरके; भीतः--डरा हुआ; पपात--गिर पड़ा; शिरसा--सिर के बल; पादयो:--चरणों पर; असुर-द्विष:--असुरों के शत्रु,भगवान् के |
तत्पश्चात् उस चतुर्भुज पुरुष को देख कर, शिकारी अपने द्वारा किये गये अपराध से भयभीतहो उठा और वह असुरों के शत्रु के चरणों पर अपना सिर रख कर जमीन पर गिर पड़ा ।
" अजानता कृतमिदं पापेन मधुसूदन ।
क्षन्तुमहसि पापस्य उत्तम:शलोक मेडनघ ॥
३५॥
अजानता--अनजाने में; कृतम्--किया गया; इृदम्--यह; पापेन--पापी पुरुष से; मधुसूदन--हे मधुसूदन; क्षन्तुम् अहसि--क्षमा कर दें; पापस्य--पापी व्यक्ति का; उत्तम:-शलोक--हे यशस्वी प्रभु; मे--मेरा; अनघ--हे पापरहित |
जरा ने कहा : हे मधुसूदन, मैं अत्यन्त पापी व्यक्ति हूँ ।
मैंने अनजाने में ही यह कृत्य ( पाप )किया है ।
हे शुद्धतम प्रभु, हे उत्तमशलोक, कृपा करके इस पापी को क्षमा कर दें ।
" यस्यानुस्मरणं नृणामज्ञानध्वान्तनाशनम् ।
बदन्ति तस्य ते विष्णो मयासाधु कृत॑ प्रभो ॥
३६॥
यस्य--जिसका; अनुस्मरणम्--निरन््तर स्मृति; नृणाम्--सारे मनुष्यों के; अज्ञान--अज्ञान का; ध्वान्त--अंधकार; नाशनम्--नाश करने वाले; वदन्ति--कहते हैं; तस्थ--उनकी ओर; ते--तुम्हारा; विष्णो--हे भगवान् विष्णु; मया--मेरे द्वारा; असाधु--गलती से; कृतम्--किया हुआ; प्रभो-हे प्रभु |
हे भगवान् विष्णु, विद्वान लोग कहते हैं कि आपका निरन्तर स्मरण करने से किसी के भीअज्ञान का अंधकार नष्ट हो जाता है ।
हे प्रभु, मैंने आपका अनिष्ट किया है ।
" तन्माशु जहि बैकुण्ठ पाप्मानं मृगलुब्धकम् ।
यथा पुनरहं त्वेव॑ न कुर्या सदतिक्रमम् ॥
३७॥
तत्--इसलिए; मा--मुझे; आशु--तुरन््त; जहि--मार डालो; बैकुण्ठ--हे वैकुण्ठ-पति; पाप्मानम्--पापी; मृग-लुब्धकम्--बहेलिये को; यथा--जिस तरह; पुनः--फिर; अहम्--मैं; तु--निस्संदेह; एवम्--इस प्रकार; न कुर्यामू--न कर सकूँ; सत्--सत्पुरुषों के विरुद्ध; अतिक्रमम्--अतिक्रमण |
अतएव हे वैकुण्ठपति, आप इस पापी पशु-शिकारी को तुरन्त मार डालें जिससे वहसत्पुरुषों के साथ पुनः ऐसा अपराध न कर सके ।
" यस्यात्मयोगरचितं न विदुर्विरिज्ञोरुद्रादयोस्यथ तनया: पतयो गिरां ये ।
त्वन्मायया पिहितदृष्टय एतदझ्जःकि तस्य ते ववमसद्गतयो गृणीम: ॥
३८॥
यस्य--जिसका; आत्म-योग--निजी योगशक्ति से; रचितम्--उत्पन्न; न विद:--नहीं समझते; विरिज्ञ: --ब्रह्मा; रुद्र-आदय: --शिव तथा अन्य; अस्य--उसके; तनया:--पुत्र; पतय: -- स्वामी; गिराम्ू--वेद के शब्दों के; ये--जो; त्वत्ू-मायया--आपकीमाया द्वारा; पिहित--ढके, आवृत; दृष्टय:--जिसकी दृष्टि; एतत्--इसका; अज्ञ:--सीधे; किम्--क्या; तस्थ--उसका; ते--तुम्हारा; वयम्--हम; असत्--अशुद्ध; गतबः--जिसका जन्म; गृणीम:--कहेगा ।
नतो ब्रह्मा, न ही रुद्र आदि उनके पुत्र, न ही वैदिक मंत्रों के स्वामी कोई महर्षि ही, आपकीयोगशक्ति के कार्य को समझ सकते हैं ।
चूँकि आपकी योगशक्ति ने उनकी दृष्टि को ढक रखाहै, इसलिए आपकी योगशक्ति जिस तरह कार्य करती है उसके बारे में वे अनजान बने रहते हैं ।
इसलिए निम्न कुल में जन्मा व्यक्ति मैं किस तरह इसके विषय में कुछ कह सकता हूँ?" श्रीभगवानुवाचमा भेजेरे त्वमुत्तिष्ठ काम एब कृतो हि मे ।
याहि त्वं मदनुज्ञातः स्वर्ग सुकृतिनां पदम् ॥
३९॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; मा भैः--मत डरो; जरे--हे जरा; त्वमू--तुम; उत्तिष्ठ--उठो; काम:--इच्छा; एब:--यह; कृतः--किया गया; हि--निस्सन्देह; मे--मेरा; याहि-- जाओ; त्वमू--तुम; मत्-अनुज्ञात:--मेरी अनुमति से; स्वर्गम्--स्वर्गलोक को; सु-कृतिनाम्-पतवित्रों का; पदमू-- धाम |
भगवान् ने कहा : हे जरा, तुम मत डरो ।
उठो ।
जो कुछ हुआ है वास्तव में वह मेरी अपनीइच्छा है ।
मेरी अनुमति से तुम अब पवित्र लोगों के धाम, स्वर्गलोक, जाओ ।
" इत्यादिष्टो भगवता कृष्णेनेच्छाशरीरिणा ।
त्रि: परिक्रम्य तं नत्वा विमानेन दिवँ ययौ ॥
४०॥
इति--इस प्रकार; आदिष्ट: --आदेश दिया गया; भगवता-- भगवान् द्वारा; कृष्णेन--कृष्ण द्वारा; इच्छा-शरीरिणा--जिसकादिव्य शरीर केवल उनकी इच्छा से प्रकट होता है; त्रिः--तीन बार; परिक्रम्य--परिक्रमा करके; तमू--उनको; नत्वा--शीशझुकाकर; विमानेन--स्वर्ग के वायुयान द्वारा; दिवम्--आकाश में; ययौ--चला गया ।
अपनी इच्छा से अपना दिव्य शरीर धारण करने वाले भगवान् कृष्ण का आदेश पाकर उसशिकारी ने भगवान् की तीन बार परिक्रमा की और उन्हें शीश झुकाया ।
तत्पश्चात् उस शिकारी नेउस विमान से प्रस्थान किया जो उसे स्वर्ग ले जाने के लिए उसी समय प्रकट हुआ था ।
" दारुकः कृष्णपदवीमन्विच्छन्नधिगम्य ताम् ।
वायुं तुलसिकामोदमाप्रायाभिमुखं ययौ ॥
४१॥
दारुक:--कृष्ण का सारथी दारूक; कृष्ण--कृष्ण का; पदवीम् अन्विच्छन्--ढूँढते हुए; अधिगम्य--पहुँच कर; ताम्--उसे;वायुम्--वायु; तुलसिका-आमोदम्--तुलसी के फूलों की गंध से सुगन्धित; आध्राय--सूँघ कर; अभिमुखम्--उनकी ओर;ययौ--चला गया ।
उसी समय दारुक अपने स्वामी कृष्ण को ढूँढ रहा था ।
ज्योंही वह उस स्थान के पास पहुँचाजहाँ भगवान् बैठे थे, उसने मन्द वायु में तुलसी के फूलों की गन्ध का अनुभव किया और उसीदिशा में बढ़ता गया ।
" तं तत्र तिग्मग्युभिरायु धर्वृतंह्श्वत्थमूले कृतकेतनं पतिम् ।
स्नेहप्लुतात्मा निपषात पादयोरथादवप्लुत्य सबाष्पलोचन: ॥
४२॥
तम्--उनको; तत्र--वहाँ; तिग्म--तेजस्वी; द्युभिः--तेज से; आयुधैः--उनके हथियारों से; वृतम्--घिरा; हि--निस्सन्देह;अश्वत्थ--बरगद के वृक्ष के; मूले--नीचे; कृत-केतनम्--विश्राम करते; पतिम्--अपने स्वामी को; स्नेह--स्नेह से; प्लुत--अभिभूत; आत्मा--उसका हृदय; निपपात--वह गिर पड़ा; पादयो:--उनके चरणों पर; रथात्--रथ से; अवपष्लुत्य--नीचे उतरतेहुए; स-बाष्प--आँसुओं से पूरित; लोचन:--आँखें ।
भगवान् कृष्ण को बरगद के वृक्ष के मूल पर आराम करते और उनके चमचमाते हथियारोंसे घिरा हुआ देख कर, दारुक अपने हृदय में सँजोये स्नेह को सँभाल न सका ।
वह ज्योंही रथ सेनीचे उतरा उसकी आँखों में आँसू भर आये और वह भगवान् के चरणों पर गिर पड़ा ।
" अपश्यतस्त्वच्चरणाम्बुजं प्रभोदृष्टि: प्रणष्टा तमसि प्रविष्टा ।
दिशो न जाने न लभे च शान्तियथा निशायामुडुपे प्रणष्टे ॥
४३॥
अपश्यतः--न देख रहा, मेरा; त्वत्--तुम्हारे; चरण-अम्बुजम्--चरणकमल; प्रभो--हे स्वामी; दृष्टि:--आँख की ज्योति;प्रणष्टा--विनष्ट हो चुकी है; तमसि--अंधकार में; प्रविष्टा--प्रवेश किया हुआ; दिश:--दिशाएँ; न जाने--नहीं जानता हूँ; नलभे--नहीं प्राप्त कर सकता हूँ; च--तथा; शान्तिमू--शान्ति; यथा--जिस तरह; निशायाम्--रात में; उड़ुपे--चन्द्रमा के;प्रणष्टे--नवीन हो जाने पर
दारुक ने कहा : जिस तरह चन्द्रविहीन रात में लोग अंधकार में धँस जाते हैं और अपनारास्ता नहीं ढूँढ पाते हे प्रभु, अब मुझे आपके चरणकमल नहीं दिखते, मैं अपनी दृष्टि खो चुकाहूँ और अंधकार में अंधे की तरह घूम रहा हूँ ।
न तो मैं अपनी दिशा बता सकता हूँ न कहीं कोईशान्ति पा सकता हूँ ।
" इति ब्रुवति सूते वै रथो गरूडलाउछन: ।
खमुत्पपात राजेन्द्र साश्रध्वज उदीक्षतः ॥
४४॥
इति--इस प्रकार; ब्रुवति--बोलते-बोलते; सूते--सारथी के; बै--निस्सन्देह; रथ:--रथ; गरुड-लाउ्छन:--गरुड़ पताका सेअंकित; खम्--आकाश में; उत्पपात--उठा; राज-इन्द्र--हे राजाओं के राजा ( परीक्षित ); स-अश्व--घोड़ों समेत; ध्वज:--तथाझंडा; उदीक्षतः--ऊपर देखते देखते
शुकदेव गोस्वामी ने कहा हे राजाओं में प्रधान, अभी वह सारथी बातें कर ही रहा था किउसकी आँखों के सामने भगवान् का रथ अपने घोड़ों तथा गरुड़ से अंकित झंडे समेत ऊपर उठ गया ।
" 'तमन्वगच्छन्दिव्यानि विष्णुप्रहरणानि च ।
तेनातिविस्मितात्मानं सूतमाह जनार्दन: ॥
४५॥
तम्--उस रथ को; अन्वगच्छन्--उसका पीछा किया; दिव्यानि--दैवी; विष्णु-- भगवान् विष्णु का; प्रहरणानि--हथियार;च--तथा; तेन--उस घटना से; अति-विस्मित--अचम्भित; आत्मानम्--उसका मन; सूतम्--सारथी से; आह--कहा;जनार्दन:--भगवान् श्रीकृष्ण
विष्णु के सारे दैवी हथियार ऊपर उठ गये और रथ का पीछा करने लगे ।
तब जनार्दन अपनेउस सारथी से जो यह सब देख कर अत्यधिक चकित था, बोले ।
" गच्छ द्वारवतीं सूत ज्ञातीनां निधनं मिथ: ।
स्डूर्षणस्य निर्याणं बन्धुभ्यो ब्रूहि मदशाम् ॥
४६॥
गच्छ--जाओ; द्वारवतीम्--द्वारका को; सूत--हे सारथी; ज्ञातीनामू--उनके सगे-सम्बन्धियों का; निधनम्ू--संहार; मिथ: --पारस्परिक; स्डूर्षणस्थ--बलराम का; निर्याणम्--निधन; बन्धुभ्य: --हमारे परिवार वालों से; ब्रूहि--कहना; मत्-दशाम्--मेरीदशा
हे सारथी, तुम द्वारका जाओ और हमारे परिवार वालों से कहो कि किस तरह उनकेप्रियजनों ने एक-दूसरे का विनाश कर दिया है ।
उनसे संकर्षण के तिरोधान तथा मेरी वर्तमानदशा के विषय में भी बतलाना ।
" द्वारकायां च न स्थेयं भवद्धिश्व स्वबन्धुभिः ।
मया त्यक्तां यदुपुरीं समुद्र: प्लावयिष्यति ॥
४७॥
द्वारकायामू--द्वारका में; च--तथा; न स्थेयम्--नहीं रहना चाहिए; भवद्धि:--तुम; च--तथा; स्व-बन्धुभि:-- अपने सम्बन्धियोंसहित; मया--मेरे द्वारा; त्यक्तामू--छोड़ी हुईं; यदु-पुरीमू--यदुओं की राजधानी; समुद्र: --समुद्र; प्लावयिष्यति--डूबो देगा ।
तुम्हें तथा तुम्हारे सम्बन्धियों को यदुओं की राजधानी द्वारका में नहीं रहना चाहिए क्योंकिएक बार जब मैं उस नगरी को छोड़ चुका हूँ, तो यह समुद्र से आप्लावित हो जायेगी ।
'" स्वं स्वं परिग्रह सर्वे आदाय पितरौ च न: ।
अर्जुनेनाविता: सर्व इन्द्रप्रस्थं गमिष्यथ ॥
४८॥
स्वम् स्वम्--अपने अपने; परिग्रहम्--परिवार; सर्वे--सभी; आदाय--लेकर; पितरौ--माता-पिता; च--तथा; न:ः--हमारा;अर्जुनेन--अर्जुन द्वारा; अविता: --सुरक्षित; सर्वे--सभी; इन्द्रप्रस्थम्--इन्द्रप्रस्थ को; गमिष्यथ--तुम चले जाना
तुम सबों को अपने अपने परिवार तथा साथ में मेरे माता-पिता को लेकर अर्जुन के संरक्षणमें इन्द्रप्रस्थ चले जाना चाहिए ।
" त्वं तु मद्धर्ममास्थाय ज्ञाननिष्ठ उपेक्षकः ।
मन्मायारचितामेतां विज्ञयोपशमं व्रज ॥
४९॥
त्वमू--तुम; तु--किन्तु; मत्-धर्मम्--मेरी भक्ति में; आस्थाय--हढ़ रह कर; ज्ञान-निष्ठ: --ज्ञान में स्थिर; उपेक्षक: --उदासीन;मत्ू-माया--मेरी माया से; रचिताम्--उत्पन्न; एताम्--यह; विज्ञाय--समझते हुए; उपशमम्-क्षोभ से मुक्ति; ब्रज--प्राप्तकरो
हे दारुक, तुम आध्यात्मिक ज्ञान में स्थिर रहते हुए और भौतिक विचारों से अनासक्त रहतेहुए, मेरी भक्ति में हढ़ता से स्थित रहना ।
तुम इन लीलाओं को मेरी मायाशक्ति का प्रदर्शनसमझते हुए शान्त रहते जाना ।
" इत्युक्तस्तं परिक्रम्य नमस्कृत्य पुनः पुनः ।
तत्पादौ शीष्ण्युपाधाय दुर्मना: प्रययौ पुरीम् ॥
५० ॥
इति--इस प्रकार; उक्त:--कहा गया; तम्--उससे; परिक्रम्य--परिक्रमा करके; नमः-कृत्य--नमस्कार करके; पुनः पुनः --बारम्बार; तत्-पादौ--उनके चरणकमलों पर; शीर्ण्गि --उसके सिर पर; उपाधाय--रख कर; दुर्मना:--मन में दुखी; प्रययौ--चला गया; पुरीम्ू--नगरी को इस तरह आदेश पाकर
दारूक ने भगवान् की परिक्रमा की और उन्हें बारम्बार नमस्कारकिया ।
उसने भगवान् के चरणकमल अपने सिर पर रखे और तब उदास मन से वह नगर कोलौट गया ।
"
