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अध्याय तीन: मायावी ऊर्जा से मुक्ति

11.3श्रीराजोबाच'परस्य विष्णोरीशस्य मायिनामपि मोहिनीम्‌ ।

मायां वेदितुमिच्छामो भगवन्तो ब्रुवन्तु नः ॥

१॥

श्री-राजा उवाच--राजा ने कहा; परस्य--परम; विष्णो: --विष्णु का; ईशस्य-- भगवान्‌; मायिनाम्‌ू--महान्‌ योगशक्ति सेसम्पन्नों के लिए; अपि-- भी; मोहिनीम्‌ू--मोहने वाली; मायाम्‌--माया को; वेदितुम्‌ू--जानना; इच्छाम:--हम चाहते हैं;भगवन्त:-हे प्रभुओ; ब्रुवन्तु--कहें; न:ः--हमसे |

राजा निमि ने कहा : अब हम भगवान्‌ विष्णु की उस माया के विषय में जानना चाहते हैं,जो बड़े बड़े योगियों को भी मोह लेती है।

हे प्रभुओ, कृपा करके हमें इस विषय में बतलायें।

"

नानुतृप्ये जुषन्युष्मद्गब्यो हरिकथामृतम्‌ ।

संसारतापनिस्तप्तो मर्त्यस्तत्तापभेषजम्‌ ॥

२॥

न अनुतृप्ये--मैं फिर भी तृप्त नहीं हूँ; जुषन्‌--व्यस्त रहते हुए; युष्मत्‌--तुम्हारे; वच: --शब्दों में; हरि-कथा-- भगवान्‌ हरि कीकथाओं के; अमृतम्‌--अमृत को; संसार--संसार के; ताप--कष्ट से; निस्तप्त:--सताया; मर्त्य:--मरणशील मनुष्य; ततू-ताप--उस पीड़ा की; भेषजम्‌-- औषधि |

यद्यपि मैं आपके द्वारा कही जा रही भगवान्‌ की महिमा का अमृत-आस्वाद कर रहा हूँ,फिर भी मेरी प्यास शान्त नहीं हुई।

भगवान्‌ तथा उनके भक्तों की ऐसी अमृतमयी कथाएँ संसारके तीन तापों से सताये जा रहे, मुझ जैसे बद्धजीवों के लिए औषधि का काम करने वाली हैं।

"

श्रीअन्तरीक्ष उवाचएभिर्भूतानि भूतात्मा महाभूतैर्महाभुज ।

ससर्जोच्चावचान्याद्य: स्वमात्रात्मप्रसिद्धये ॥

३ ॥

श्री-अन्तरीक्ष: उवाच-- श्री अन्तरीक्ष ने कहा; एभि:--इनके ( भौतिक तत्त्वों के ) द्वारा; भूतानि--प्राणी; भूत-आत्मा--सारीसृष्टि की आत्मा; महा-भूतैः--महत्‌ तत्त्व के तत्त्वों द्वारा; महा-भुज--हे महाबाहु राजा; ससर्ज--उसने उत्पन्न किया; उच्च-अवचानि--ऊँच तथा नीच दोनों; आद्य:--आदि पुरुष; स्व--अपने अंशों के; मात्रा--इन्द्रिय-तृप्ति; आत्म--तथा आत्म-साक्षात्कार; प्रसिद्धये--सुविधा प्रदान करने के लिए।

श्री अन्तरीक्ष ने कहा : हे महाबाहु राजा, भौतिक तत्त्वों को क्रियाशील बनाकर समस्त सृष्टिके आदि आत्मा ने उच्चतर तथा निम्नतर योनियों के जीवों को उत्पन्न किया है, जिससे येबद्धात्माएँ अपनी अपनी इच्छानुसार इन्द्रिय-तृप्ति अथवा चरम मोक्ष का अनुशीलन कर सकें।

परमात्मा उत्पन्न किये गये प्राणियों के भौतिक शरीरों में प्रविष्ट होकर मन तथा इन्द्रियों कोक्रियाशील बनाता है और इस तरह बद्धजीवों को इन्द्रिय-तृप्ति हेतु तीन गुणों तक पहुँचाता है।

"

"text":"एवं सूष्टानि भूतानि प्रविष्ट: पञ्ञधातुभि: ।

एकधा दशधात्मानं विभजन्जुषते गुणान्‌ ॥

४॥

एवम्‌--जैसाकि बतलाया गया, उस प्रकार से; सृष्टानि--उत्पन्न; भूतानि--जीवों को; प्रविष्ट:--प्रवेश करके; पञ्ञ-धातुभि: -- पाँच स्थूल तत्त्वों ( पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश ) द्वारा; एकधा--एक बार ( मन के द्रष्टा रूप में ); दशधा--दस बार ( पाँच ज्ञान-इन्द्रियों तथा पाँच कर्मेन्द्रियों के द्रष्टा के रूप में ); आत्मानम्‌--स्वयं को; विभजन्‌--विभाजित करते हुए; जुषते-- लगाता है; गुणानू-- भौतिक गुणों के साथ

परमात्मा उत्पन्न किये गये प्राणियों के भौतिक शरीरों में प्रविष्ट होकर मन तथा इन्द्रियों को क्रियाशील बनाता है और इस तरह बद्धजीवों को इन्द्रिय-तृप्ति हेतु तीन गुणों तक पहुँचाता है।

"

गुणैर्गुणान्स भुझ्जान आत्पप्रद्योतितैः प्रभु: ।

मन्यमान इदं सृष्टमात्मानमिह सज्जते ॥

५॥

गुणैः--गुणों ( इन्द्रियों ) के द्वारा; गुणान्‌ू--गुणों को ( इन्द्रिय-विषयों को ); सः--वह ( व्यष्टि ); भुझ्नान: -- भोग करते हुए;आत्म--परमात्म द्वारा; प्रद्योतित:--जागृत किया गया; प्रभु:ः--स्वामी; मन्यमानः --सोचते हुए; इृदम्‌--यह; सृष्टम्‌--उत्पन्न( शरीर ); आत्मानम्‌--अपने रूप में; इह--इस; सज्जते--फँस जाता है|

भौतिक देह का स्वामी व्यष्टि जीव परमात्मा द्वारा सक्रिय की गई अपनी भौतिक इन्द्रियोंद्वारा प्रकृति के तीन गुणों द्वारा बनाये गये इन्द्रिय-विषयों का भोग करने का प्रयास करता है।

इस तरह वह उत्पन्न भौतिक शरीर को अजन्मे नित्य आत्मा के रूप में मानने के कारण भगवान्‌की माया में फँस जाता है।

"

कर्माणि कर्मभिः कुर्वन्सनिमित्तानि देहभूत्‌ ।

तत्तत्कर्मफलं गृहन्श्रमतीह सुखेतरम्‌ ॥

६॥

कर्माणि--विविध प्रकार के सकाम कर्मो को; कर्मभि:--कर्मेन्द्रियों द्वारा; कुर्बन्‌ू--करते हुए; स-निमित्तानि-- प्रेरक इच्छाओंसे युक्त; देह-भूत्‌-- भौतिक शरीर का स्वामी; तत्‌ तत्‌--विविध; कर्म-फलम्‌--कर्म के फलों को; गृहन्‌--स्वीकार करते हुए;भ्रमति--घूमता है; इह--इस संसार में; सुख--सुख; इतरम्‌--तथा अन्यथा ।

तीव्र भौतिक इच्छाओं से प्रेरित देहधारी जीव अपनी कर्मेन्द्रियों को सकाम कर्म में लगाताहै।

तब वह इस जगत में घूमते हुए तथाकथित सुख-दुख में अपने भौतिक कर्मों के फलों काअनुभव करता है।

"

इत्थं कर्मगतीर्गच्छन्बह्नभद्रवहा: पुमान्‌ ।

आभूतसम्प्लवात्सर्गप्रलयावश्नुतेउवश: ॥

७॥

इत्थम्‌--इस तरह से; कर्म-गती:--विगत कर्मों द्वारा निर्धारित गन्तव्य; गच्छन्‌--प्राप्त करते हुए; बहु-अभद्र--अत्यन्त अशुभ;वहा:--सम्मिलित करने वाले; पुमान्‌ू--जीव को; आभूत-सम्प्लवात्‌--इस ब्रह्माण्ड के प्रलय होने तक; सर्ग-प्रलयौ--जन्मतथा मृत्यु; अश्नुते--अनुभव करता है; अवश:--असहाय होकर।

इस तरह बद्धजीव को बारम्बार जन्म-मृत्य अनुभव करने के लिए बाध्य किया जाता है।

अपने ही कर्मों के फल से प्रेरित होकर, वह एक अशुभ अवस्था से दूसरी अवस्था में असहायहोकर घूमता रहता है और सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर प्रलय होने तक कष्ट भोगता है।

"

धातूपप्लव आसस्ने व्यक्त द्रव्यगुणात्मकम्‌ ।

अनादिनिधनः कालो ह्ाव्यक्तायापकर्षति ॥

८॥

धातु--भौतिक तत्त्वों के; उपप्लवे--संहार में; आसन्ने--सन्निकट आये हुए; व्यक्तम्‌--व्यक्त जगत; द्रव्य--स्थूल पदार्थ;गुण--तथा सूक्ष्म गुण; आत्मकम्‌--से युक्त; अनादि--जिसका आदि न हो; निधन: --अथवा अन्त; काल:--समय; हि--निस्सन्देह; अव्यक्ताय--अव्यक्त में; अपकर्षति--खींचता है।

जब भौतिक तत्त्वों का संहार सन्निकट होता है, तो काल रूप में भगवान्‌ स्थूल तथा सूक्ष्मगुणों वाले व्यक्त जगत को समेट लेते हैं और सारा ब्रह्माण्ड अव्यक्त रूप में लुप्त हो जाता है।

"

शतवर्षा ह्नावृष्टिभ॑विष्यत्युल्बणा भुवि ।

तत्कालोपचितोष्णार्को लोकांस्त्रीन्प्रतपिष्यति ॥

९॥

शत-वर्षा--एक सौ वर्षो तक चलने वाला; हि--निस्सन्देह; अनावृष्टि:--सूखा, अकाल; भविष्यति--होगा; उल्बणा--भयंकर; भुवि--पृथ्वी पर; तत्‌ू-काल--उस अवधि में; उपचित--संचित; उष्ण--गर्म; अर्क:--सूर्य; लोकान्‌ू--जगतों को;त्रीनू--तीनों; प्रतपिष्यति--बुरी तरह जला देगा।

ज्यों ज्यों विश्व का संहार निकट आता जाता है, पृथ्वी पर एक सौ वर्षो का भयंकर सूखापड़ता है।

सूर्य की गर्मी ( उष्णता ) क्रमशः सौ वर्षों तक बढ़ती जाती है और इसकी प्रज्वलितगर्मी तीनों लोकों को व्यग्र करने लगती है।

"

'पातालतलमारभ्य सड्डूर्षणमुखानल: ।

दहनूर्ध्वशिखो विष्वग्वर्धते वायुनेरितः ॥

१०॥

पाताल-तलम्‌--पाताल लोक से; आरभ्य--आरभम्भ करके; सड्डूर्षण-मुख-- भगवान्‌ के संकर्षण रूप के मुख से; अनलः--अग्नि; दहन्‌ू--जलाते हुए; ऊर्ध्व-शिख:--ऊपर को निकलती लपटें; विष्वक्‌--सारी दिशाएँ; वर्धते--बढ़ती है; वायुना--वायुसे; ईरितः--प्रेरित होकर ।

यह अग्नि, भगवान्‌ संकर्षण के मुख से निकल कर पाताल लोक से शुरू होती हुई, बढ़तीजाती है।

इसकी लपडटें प्रबल वायु से प्रेरित होकर ऊपर उठने लगती हैं और यह चारों दिशाओंकी हर वस्तु को झुलसा देती हैं।

"

संवर्तको मेघगणो वर्षति सम शतं समा: ।

धाराभिईस्तिहस्ताभिलीयते सलिले विराट्‌ ॥

११॥

संवर्तक:--प्रलय के ; मेघ-गण: --बादलों का समूह; वर्षति--वर्षा करता है; स्म--निस्सन्देह; शतम्‌ समा:--एक सौ वर्षोतक; धाराभि:--मूसलाधार; हस्ति-हस्ताभि:--हाथी की सूँड़ की माप वाली ( बूँदें ); लीयते--लीन हो जायेगा; सलिले--जलमें; विराट्‌ू--सम्पूर्ण ब्रह्माण्डसंवर्तक नामक बादलों के समूह एक सौ वर्षो तक मूसलाधार वर्षा करते हैं।

हाथी की सूँड़जितनी लम्बी पानी की बूँदों की बाढ़ से विनाशकारी वर्षा समस्त ब्रह्माण्ड को जल में डुबो देतीहै।

"

ततो विराजसमुत्सृज्य्वैराज: पुरुषो नूप ।

अव्यक्त विशते सूक्ष्म निरिन्धन इवानलः ॥

१२॥

ततः--तब; विराजमू--ब्रह्माण्ड; उत्सृज्य--( अपने शरीर के रूप में ) त्याग कर; वैराज: पुरुष:--विराट रूप वाला व्यक्ति( हिरण्यगर्भ ब्रह्मा ); नृप--हे राजा निमि; अव्यक्तम्‌ू--अव्यक्त प्रकृति ( प्रधान ) में; विशते--प्रवेश करता है; सूक्ष्मम्‌--सूक्ष्म;निरिन्धन:--ईंधन से रहित; इब--सहृश; अनलः--अग्नि।

हे राजनू, तब विराट रूप का आत्मा वैराज ब्रह्मा अपने विराट शरीर को त्याग देता है औरसूक्ष्म अव्यक्त प्रकृति में उसी तरह प्रवेश कर जाता है, जिस तरह ईंधन समाप्त हो जाने पर अग्नि।

"

वायुना हतगन्धा भू: सलिलत्वाय कल्पते ।

सलिलं तद्धृतरसं ज्योतिष्ठायोपकल्पते ॥

१३॥

वायुना--वायु द्वारा; हत--विहीन; गन्धा--गन्ध का; भू:--पृथ्वी तत्त्त; सलिलत्वाय कल्पते--जल बन जाता है; सलिलम्‌--जल को; तत्‌--उससे ( वायु से ); हत-रसम्‌--आस्वाद गुण से रहित; ज्योतिष्ठाय उपकल्पते--अग्नि बन जाता है।

वायु द्वारा गन्ध-गुण से रहित होकर पृथ्वी तत्त्व जल में रूपान्तरित हो जाता है और उसीवायु से जल अपना स्वाद खोकर अग्नि में विलीन हो जाता है।

"

हतरूपं तु तमसा वायौ ज्योति: प्रलीयते ।

हृतस्पर्शोवकाशेन वायुर्नभसि लीयते ।

कालात्मना हतगुणं नभ आत्मनि लीयते ॥

१४॥

हृत-रूपम्‌--रूप के गुण से विहीन; तु--निश्चय ही; तमसा--अंधकार से; वायौ--वायु में; ज्योति:--अग्नि; प्रलीयते--विलीनहो जाती है; हत-स्पर्श:--स्पर्श से रहित; अवकाशेन--अवकाश तत्त्व द्वारा; वायु:--वायु; नभसि-- आकाश में; लीयते--विलीन हो जाता है; काल-आत्मन--काल रूप में परमात्मा द्वारा; हत-गुणम्‌--अपने शब्द गुण से विहीन; नभः--आकाश;आत्मनि--तमोगुणी मिथ्या अहंकार में; लीयते--लीन हो जाता हैअग्नि अंधकार द्वारा अपने रूप से विहीन होकर वायु तत्त्व में मिल जाती है।

जब वायुअन्तराल के प्रभाव से अपना स्पर्श-गुण खो देता है, तो वह आकाश में मिल जाता है।

जबआकाश काल रूप परमात्मा द्वारा अपने शब्द-गुण से विहीन कर दिया जाता है, तो वहतमोगुणी मिथ्या अहंकार में विलीन हो जाता है।

"

इन्द्रियाणि मनो बुद्धि: सह वैकारिकैर्नूप ।

प्रविशन्ति ह्यहड्डारं स्वगुणैरहमात्मनि ॥

१५॥

इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ; मनः--मन; बुद्द्धिः--बुद्धि; सह वैकारिकैः--देवताओं समेत, जो सतोगुण में अहंकार के प्रतिफल हैं;नृप--हे राजा; प्रविशन्ति--प्रवेश करते हैं; हि--निस्सन्देह; अहड्डारम्‌--अहंकार तत्त्व; स्त-गुणैः--अपने गुणों ( सतो, रजोतथा तमो ) के साथ; अहम्‌--अहंकार; आत्मनि--महत तत्त्व में |

हे राजन, भौतिक इन्द्रियाँ तथा बुद्धि रजोगुणी मिथ्या अहंकार में मिल जाते हैं, जहाँ सेउनका उदय हुआ था।

देवताओं के साथ साथ मन सतोगुणी मिथ्या अहंकार में मिल जाता है।

तत्पश्चात्‌, सम्पूर्ण मिथ्या अहंकार अपने सारे गुणों समेत महतू-तत्त्व में लीन हो जाता है।

"

एषा माया भगवत:ः सर्गस्थित्यन्तकारिणी ।

त्रिवर्णा वर्णितास्माभि: कि भूय:ः श्रोतुमिच्छसि ॥

१६॥

एषा--यह; माया-- भौतिक शक्ति; भगवतः-- भगवान्‌ की; सर्ग--सृजन; स्थिति--पालन-पोषण; अन्त--तथा ( इस ब्रह्माण्डके ) प्रलय के; कारिणी--करने वाली; त्रि-वर्णा--तीन गुणों ( सतो, रजो तथा तमो ) वाली; वर्णिता--वर्णन की गई;अस्माभि:--हमारे द्वारा; किमू--क्या; भूय:ः--इसके आगे; श्रोतुमू--सुनने के लिए; इच्छसि--चाहते हो |

मैं अभी भगवान्‌ की मोहिनी-शक्ति माया का वर्णन कर चुका हूँ।

यह तीन गुणों वालीमाया भगवान्‌ द्वारा ब्रह्मण्ड के सृजन, पालन तथा संहार के लिए शक्तिप्रदत्त है।

अब तुम औरक्या सुनने के इच्छुक हो ?" श्रीराजोबवाचयथेतामैश्वरीं मायां दुस्तरामकृतात्मभि: ।

तरन्त्यज्ञः स्थूलधियो महर्ष इदमुच्यताम्‌ ॥

१७॥

श्री-राजा उबाच--राजा निमि ने कहा; यथा--जिस तरह; एताम्‌ू--यह; ऐश्वरीम्‌-- भगवान्‌ की; मायाम्‌--माया को;दुस्तराम्‌ू--दुर्लध्य; अकृत-आत्मभि:--जो आत्मसंयमी नहीं हैं उनके द्वारा; तरन्ति--पार कर जाते हैं; अज्ञ:--आसानी से;स्थूल-धिय:--भौतिकतावादी अनुरक्ति के कारण जिनकी बुद्धि मन्द पड़ चुकी हो ऐसे लोग; मह-ऋषे--हे महर्षि; इदम्‌--यह;उच्यताम्‌--आप कहें |

राजा निमि ने कहा है, अतः हे महर्षि, कृपया यह बतलायें कि किस तरह एक मूर्खभौतिकतावादी भी आसानी से भगवान्‌ की उस माया को पार कर सकता है, जो उन लोगों केलिए सदैव दुर्लघ्य है, जिन्हें अपने ऊपर संयम नहीं होता।

"

श्रीप्रबुद्ध उबाचकर्माण्यारभमाणानां दुःखहत्ये सुखाय च ।

पश्येत्पाकविपर्यासं मिथुनीचारिणां नृणाम्‌ ॥

१८॥

श्री-प्रबुद्ध: उवाच-- श्री प्रबुद्ध ने कहा; कर्माणि--सकाम कर्म; आरभमाणानाम्‌-- प्रयलशील; दुःख-हत्यै--दुख-निवारण केलिए; सुखाय च--तथा सुख पाने के लिए; पश्येतू--देखना चाहिए; पाक--परिणाम का; विपर्यासम्‌ू--विपरीत फल; मिथुनी-चारिणाम्‌--स्त्री तथा पुरुष के रूप में युगल जोड़ा; नृणाम्‌--ऐसे पुरुषों का।

श्री प्रबुद्ध ने कहा है, अतः मानव समाज में नर तथा नारी की भूमिकाएँ स्वीकार करते हुएबद्धजीव संभोगरत होते हैं।

इस तरह वे अपने दुख के निवारणार्थ निरन्तर प्रयलशील रहते हैंऔर अपने आनन्द को असीम बनाना चाहते हैं।

किन्तु यह देखना चाहिए कि उन्हें सदैव इसकाबिल्कुल उल्टा परिणाम मिलता है।

दूसरे शब्दों में, उनका सुख अनिवार्यतहै, अतः समाप्त होजाता है और ज्यों ज्यों वे बूढ़े होते जाते हैं, उनकी भौतिक असुविधाएँ बढ़ती जाती हैं।

"

नित्यार्तिदेन वित्तेन दुर्लभेनात्ममृत्युना ।

गृहापत्याप्तपशुभि: का प्रीति: साधितैश्वलै: ॥

१९॥

नित्य--निरन्तर; आर्ति-देन--पीड़ादायक; वित्तेन--सम्पत्ति से; दुर्लभेन--मुश्किल से कमाई गई; आत्म-मृत्युना--आत्मा केलिए मृत्यु; गृह--अपने घर; अपत्य--सनन्‍्तानों; आप्त--सम्बन्धीजन; पशुभि: --तथा घर के पशुओं सहित; का--क्या;प्रीतिः--सुख; साधितैः--( उस सम्पत्ति से ) प्राप्त किये गये; चलै:ः--चलायमान, अस्थिर।

सम्पत्ति दुख का अविच्छिन्न स्रोत है, इसे अर्जित करना सर्वाधिक कठिन है और एक तरहसे यह आत्मा के लिए मृत्यु स्वरूप है।

भला अपनी सम्पत्ति से किसी को कौन-सा लाभ मिलताहै? इसी तरह कोई अपने तथाकथित घर, सन्‍्तान, सम्बन्धीगण तथा घरेलू पशुओं से स्थायी सुखकैसे प्राप्त कर सकता है, जो उसकी कठिन कमाई से पालित-पोषित होते हैं?" एवं लोक परम्विद्यात्रश्वरं कर्मनिर्मितम्‌ ।

सतुल्यातिशयध्वंसं यथा मण्डलवर्तिनाम्‌ ॥

२०॥

एवम्‌--इस प्रकार; लोकम्‌--संसार; परम्‌--( इस जीवन के बाद ) अगला; विद्यातू--समझ लेने से; नश्वरम्‌--अस्थायी; कर्म-निर्मितम्‌--सकाम कर्म से उत्पन्न; स-तुल्य--बराबर वालों ( की स्पर्धा ) से विशेषित; अतिशय--तथा वरिष्ठ जन; ध्वंसम्‌--तथाविनाश से; यथा--जिस तरह; मण्डल-वर्तिनाम्‌ू--छोटे-छोटे राजाओं की ( स्पर्धाएँ )।

मनुष्य को स्वर्गलोक में भी ऐसा स्थायी सुख नहीं मिल सकता, जिसे वह अनुष्ठानों तथायज्ञों से अगले जीवन में प्राप्त कर सकता है।

यहाँ तक कि भौतिक स्वर्ग में भी जीव अपनेबराबर वालों की होड़ से तथा अपने से बड़ों की ईर्ष्या से विचलित रहता है।

चूँकि पुण्यकर्मों कीसमाप्ति के साथ ही स्वर्ग का निवास समाप्त हो जाता है, अतएव स्वर्ग के देवतागण अपनेस्वर्गिक जीवन के विनाश की आशंका से भयभीत रहते हैं।

इस तरह उनकी दशा उन राजाओंकी सी रहती है, जो सामान्य जनता द्वारा ईर्ष्यावश प्रशंसित होते हैं, किन्तु शत्रु-राजाओं द्वारानिरन्तर सताये जाते हैं, जिससे उन्हें कभी भी वास्तविक सुख नहीं मिल पाता है।

"

तस्मादगुरुं प्रपद्येत जिज्ञासु: श्रेय उत्तमम्‌ ।

शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमा श्रयम्‌ ॥

२१॥

तस्मात्‌ू--अतएव; गुरुम्‌-गुरु की; प्रपद्येत--शरण ग्रहण करे; जिज्ञासु:--उत्सुक होकर; श्रेय: उत्तमम्‌--सर्वोच्च कल्याण केलिए; शाब्दे--वेदों में; परे--ब्रह्म में; च--तथा; निष्णातम्‌--पूर्णतया ज्ञेय; ब्रह्मणि--ब्रह्म के ( इन दोनों पक्षों में )) उपशम-आश्रयम्‌--भौतिक मामलों से विरक्त होने पर स्थित।

अतएव जो व्यक्ति गम्भीरतापूर्वक असली सुख की इच्छा रखता हो, उसे प्रामाणिक गुरु कीखोज करनी चाहिए और दीक्षा द्वारा उसकी शरण ग्रहण करनी चाहिए प्रामाणिक गुरु कीयोग्यता यह होती है कि वह विचार-विमर्श द्वारा शास्त्रों के निष्कर्षों से अवगत हो चुका होता हैऔर इन निष्कर्षों के विषय में अन्यों को आश्वस्त करने में सक्षम होता है।

ऐसे महापुरुष, जिन्होंनेसमस्त भौतिक धारणाओं को त्याग कर भगवान्‌ की शरण ग्रहण कर ली है, उन्हें प्रामाणिक गुरूमानना चाहिए।

"

तत्र भागवतान्धर्मान्शिक्षेद्गुर्वात्मदैवत: ।

अमाययानुव॒ृत्त्या यैस्तुष्येदात्मात्मदो हरि: ॥

२२॥

तत्र--वहाँ ( गुरु की संगति में ); भागवतान्‌ धर्मान्‌--भक्ति के विज्ञान को; शिक्षेत्‌ू--सीखना चाहिए; गुरु-आत्म-दैवत:--वह,जिसके लिए गुरु प्राण है और आराध्य देव है; अमायया--बिना धोखे के; अनुवृत्त्या-- श्रद्धापूर्ण सेवा द्वारा; यैः--जिसके( भक्ति ) द्वारा; तुष्येत्‌--तुष्ट किया जा सकता है; आत्मा--परमात्मा; आत्म-दः--आत्मा प्रदान करने वाला; हरिः-- भगवान्‌हरि

प्रामाणिक गुरु को प्राण एवं आत्मा तथा आराध्य देव मानते हुए शिष्य को चाहिए कि उससेशुद्ध भक्ति की विधि सीखे।

समस्त आत्माओं के आत्मा भगवान्‌ हरि अपने आपको अपने शुद्धभक्तों को सौंपने के लिए उद्यत रहते हैं।

इसलिए शिष्य को अपने गुरु से द्वैतरहित होकर भगवान्‌की श्रद्धापूर्ण तथा उपयुक्त विधि से सेवा करना सीखना चाहिए, जिससे वे तुष्ट होकर श्रद्धालुशिष्य को अपने आपको सौंप सकें।

"

सर्वतो मनसोसड्भमादौ सड्रं च साधुषु ।

दयां मैत्रीं प्रश्रयं च भूतेष्वद्धा यथोचितम्‌ ॥

२३॥

सर्वत:ः--सर्वत्र; मनसः--मन की; असड्रम्‌-विरक्ति; आदौ-प्रारम्भ में; सड्रम्‌ू--संगति; च--तथा; साधुषु--साधुओं की;दयाम्‌--दया; मैत्रीम्‌-मित्रता; प्रश्रयमू-- आदर; च--तथा; भूतेषु--समस्त जीवों के प्रति; अद्धा--इस प्रकार; यथाउचितम्‌--जो उपयुक्त हो

निष्ठावान्‌ शिष्य को चाहिए कि मन को प्रत्येक भौतिक वस्तु से विलग रखना सीखे एवंअपने गुरु तथा अन्य साधु भक्तों की संगति का सकारात्मक रूप से अनुशीलन करे।

उसे अपनेसे निम्न पद वालों के प्रति उदार होना चाहिए, समान पद वालों के साथ मैत्री करनी चाहिए औरजो अपने से उच्चतर आध्यात्मिक पद पर हैं, उनकी विनीत भाव से सेवा करनी चाहिए।

इस तरहउसे समस्त जीवों के साथ समुचित व्यवहार करना सीखना चाहिए।

"

शौच तपस्तितिक्षां च मौनं स्वाध्यायमार्जवम्‌ ।

ब्रह्मचर्यमहिंसां च समत्वं द्वन्द्ठसंज्ञयो: ॥

२४॥

शौचम्‌--स्वच्छता; तप:--तपस्या; तितिक्षाम्‌--सहनशीलता; च--तथा; मौनम्‌--चुप्पी, मौन; स्वाध्यायम्‌--वेदाध्ययन;आर्जवम्‌--सादगी; ब्रह्मचर्यम्‌-ब्रह्मचर्य-ब्रत; अहिंसामू-- अहिंसा; च--तथा; समत्वम्‌--समता; द्वन्द्र-संज्ञयोः--द्वैत के रूप मेंअनुभव की जाने वाली परिस्थितियों में |

गुरु की सेवा करने के लिए शिष्य को स्वच्छता, तपस्या, सहनशीलता, मौन, वेदाध्ययन,सादगी, ब्रह्मचर्य, अहिंसा तथा गर्मी और शीत, सुख और दुख जैसे द्वैतों के समक्ष समत्वसीखना चाहिए।

"

सर्वत्रात्मे श्वरान्वीक्षां कैवल्यमनिकेतताम्‌ ।

विविक्तचीरवसनं सन्‍्तोष॑ं येन केनचित्‌ ॥

२५॥

सर्वत्र--सभी जगह; आत्म--अपनी आत्मा के लिए; ईश्वर--तथा भगवान्‌ के लिए; अन्वीक्षाम्‌--सतत दृष्टि में रखते हुए ध्यान;कैवल्यम्‌--मोक्ष; अनिकेतताम्‌--जिसका कोई स्थायी घर न हो; विविक्त-चीर--ची थड़े; वसनम्‌-- पहने हुए; सन्तोषम्‌--सन्‍्तोष; येन केनचित्‌ू--किसी भी वस्तु से |

मनुष्य को चाहिए कि अपने को नित्य आत्मा के रूप में और भगवान्‌ को हर वस्तु का परमनियन्ता देखते हुए ध्यान करे।

ध्यान में वृद्धि लाने के लिए वह एकान्त स्थान में रहे और अपनेघर तथा घर की सामग्री के प्रति झूठी आसक्ति को त्याग दे।

नश्वर शरीर के अलंकरण को त्यागकर, मनुष्य अपने को चीथड़ों से या वृक्षों की छाल से ढके।

इस तरह, उसे किसी भी भौतिकपरिस्थिति में सन्तुष्ट रहना सीखना चाहिए।

"

श्रद्धां भागवते शास्त्रेडनिन्दामन्यत्र चापि हि ।

मनोवाक्र्मदण्डं च सत्यं शमदमावषि ॥

२६॥

श्रद्धाम्‌-- श्रद्धा; भागवते-- भगवान्‌ से सम्बद्ध; शास्त्रे--शास्त्र में; अनिन्दाम्‌--निन्दा न करना; अन्यत्र--दूसरे लोग; च-- भी;अपि हि--निस्सन्देह; मनः--मन का; वाक्‌ू--वाणी; कर्म--तथा मनुष्य के कर्म; दण्डम्‌--कठोर नियंत्रण; च--तथा;सत्यम्‌ू--सच्चाई; शम--मन पर आत्म-नियंत्रण; दमौ--तथा बाह्य इन्द्रियों का; अपि--भी |

मनुष्य को यह अटूट श्रद्धा होनी चाहिए कि उन शास्त्रों का अनुसरण करने से उसे जीवन मेंपूर्ण सफलता मिलेगी, जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ के यश का वर्णन करते हैं।

इसी के साथ उसेअन्य शास्त्रों की निन्दा करने से अपने को बचाना चाहिए।

उसे अपने मन, वाणी तथा शारीरिककर्मों पर कठोर नियंत्रण रखना चाहिए, सदैव सच बोलना चाहिए और मन तथा इन्द्रियों को पूरीतरह वश में रखना चाहिए।

"

श्रवर्णं कीर्तन ध्यान हरेरद्भुतकर्मण: ।

जन्मकर्मगुणानां च तदर्थेअखिलचेष्टितम्‌ ॥

२७॥

इष्टं दत्तं तपो जप्तं वृत्तं यच्चात्मन: प्रियम्‌ ।

दारान्सुतान्गृहान्प्राणान्यत्परस्मै निवेदनम्‌ ॥

२८ ॥

श्रवणम्‌--सुनना; कीर्तनम्‌--कीर्तन करना; ध्यानमू--तथा ध्यान करना; हरेः-- भगवान्‌ हरि के; अद्भुत-कर्मण:--जिनकेकार्यकलाप अदभुत हैं; जन्म--उसके अवतारों; कर्म--लीलाओं; गुणानामू--गुणों के; च--तथा; तत््‌-अर्थै--उसके निमित्त;अखिल--समस्त; चेष्टितम्‌--प्रयास; इष्टम्‌--जो भी पूजा की जाती है; दत्तम्‌ू--जो भी दान; तप:--तपस्या; जप्तम्‌--जो भीमंत्र जपता है; वृत्तम्‌--पुण्यकर्म; यत्‌--जो; च-- भी; आत्मन:--अपने लिए; प्रियम्‌--प्रिय; दारान्‌ू-- पत्नी; सुतान्‌ू--पुत्रों;गृहान्‌ू--घर; प्राणान्‌-- प्राण; यत्‌-- जो; परस्मै--ब्रह्म को; निवेदनम्‌-- भेंट

मनुष्य को चाहिए कि भगवान्‌ के अद्भुत दिव्य कार्यकलापों के विषय में सुने, उनकागुणगान करे और ध्यान करे।

उसे विशेष रूप से भगवान्‌ के प्राकट्यों, कार्यकलापों, गुणों तथापवित्र नामों में लीन रहना चाहिए।

इस प्रकार प्रेरित होकर उसे अपने नैत्यिक समस्त कार्यभगवान्‌ को अर्पित करते हुए सम्पन्न करने चाहिए।

मनुष्य को चाहिए कि केवल भगवान्‌ कीतुष्टि के लिए ही यज्ञ, दान तथा तप करे।

इसी तरह वह केवल उन्हीं मंत्रों का उच्चारण करे, जोभगवान्‌ की महिमा का गायन करते हों।

उसके सारे धार्मिक कृत्य भगवान्‌ की भेंट के रूप मेंसम्पन्न हों।

उसे जो भी वस्तु अच्छी या भोग्य लगे, उसे वह तुरन्त भगवान्‌ को अर्पित कर दे।

यहाँतक कि वह अपनी पतली, बच्चे, घर तथा अपने प्राण भी भगवान्‌ के चरणकमलों पर अर्पित करदे।

"

एवं कृष्णात्मनाथेषु मनुष्येषु च सौहदम्‌ ।

परिचर्या चोभयत्र महत्सु नूषु साधुषु ॥

२९॥

एवम्‌--इस तरह; कृष्ण-आत्म-नाथेषु--जो लोग कृष्ण को अपनी आत्मा का स्वामी मानते हैं, उन; मनुष्येषु--मनुष्यों के लिए;च--तथा; सौहदम्‌--मैत्री; परिचर्यामू--सेवा; च--तथा; उभयत्र--( चर तथा अचर अथवा भगवान्‌ तथा उनके भक्त ) दोनों केप्रति की गई; महत्सु--( विशेषतया ) भगवद्भक्तों में से; नृषु--मनुष्यों में से; साधुषु--सन्त आचरण वालों में से |

जो अपने चरम स्वार्थ का इच्छुक है, उसे उन व्यक्तियों से मैत्री करनी चाहिए, जिन्होंने कृष्णको अपना जीवन-नाथ मान लिया है।

उसे समस्त जीवों के प्रति सेवाभाव भी उत्पन्न करना चाहिए।

उसे मनुष्य-रूप में पैदा हुए लोगों की और इनमें से विशेष रूप से उनकी सहायता करनीचाहिए, जो धार्मिक आचरण के सिद्धान्त को अपनाते हैं।

धार्मिक व्यक्तियों में से भगवान्‌ केशुद्ध भक्तों की सेवा की जानी चाहिए।

"

परस्परानुकथन पावन भगवद्यशः ।

मिथो रतिर्मिथस्तुष्टिनिवृत्तिरमिथ आत्मन: ॥

३०॥

परस्पर--एक-दूसरे से; अनुकथनम्‌--विचार-विमर्श; पावनम्‌--पवित्रकारी; भगवत्‌-- भगवान्‌ की; यश: --कीर्ति; मिथ: --परस्पर; रति:--प्रेमाकर्षण; मिथ: --परस्पर; तुष्टिः--तुष्टि; निवृत्तिः--भौतिक कष्टों की समाप्ति; मिथ:-- परस्पर; आत्मन: --आत्मा का।

मनुष्य को चाहिए कि भगवद्भक्तों के साथ एकत्र होकर भगवान्‌ की महिमा-गायन केलिए उनकी संगति करना सीखे।

यह विधि अत्यन्त शुद्ध बनाने वाली है।

ज्योंही भक्तमण इसप्रकार प्रेमपूर्ण मैत्री स्थापित कर लेते हैं, त्योंही उन्हें परस्पर सुख तथा तुष्टि का अनुभव होता है।

इस प्रकार एक-दूसरे को प्रोत्साहित करके, वे उस भौतिक इन्द्रिय-तृप्ति को त्यागने में सक्षमहोते हैं, जो समस्त कष्टों का कारण है।

"

स्मरन्तः स्मारयन्तश्न मिथोघौघहरं हरिम्‌ ।

भकत्या सञ्जातया भक्त्या बिश्चत्युत्पुलकां तनुम्‌ ॥

३१॥

स्मरन्तः--स्मरण करते हुए; स्मारयन्त: च--तथा स्मरण दिलाते हुए; मिथ: --परस्पर; अघध-ओघ-हरम्‌-- भक्त से समस्त अशुभवस्तुओं को ले लेने वाला; हरिम्‌ू-- भगवान्‌ को; भक्त्या--भक्ति द्वारा; सज्ञातया--जगाया हुआ; भक्त्या--भक्ति द्वारा;बिभ्रति-- धारण करते हैं; उत्पुलकाम्‌--पुलकायमान; तनुम्‌--शरीर को

भगवद्भक्तगण परस्पर भगवान्‌ की महिमा का निरन्तर बखान करते हैं।

इस प्रकार वेनिरन्तर भगवान्‌ का स्मरण करते हैं और एक-दूसरे को उनके गुणों तथा लीलाओं का स्मरणकराते हैं।

इस तरह से भक्तियोग के नियमों के प्रति अपनी अनुरक्ति से भक्तगण भगवान्‌ कोप्रसन्न करते हैं, जो उनके सारे अशुभों को हर लेते हैं।

समस्त व्यवधानों से शुद्ध होकर भक्तगण शुद्ध भगवत्प्रेम जगा लेते हैं और इस प्रकार इस जगत में रहते हुए भी उनके आध्यात्मीकृत शरीरोंमें दिव्य आनन्द ( भाव ) के लक्षण--यथा रोमांच-- प्रकट होते हैं।

"

क्वचिद्वुदन्त्यच्युतचिन्तया क्वचि-द्धसन्ति नन्दन्ति वदन्त्यलौकिकाः ।

नृत्यन्ति गायन्त्यनुशीलयन्त्यजंभवन्ति तृष्णीं परमेत्य निर्वृता: ॥

३२॥

क्वचित्‌--कभी; रुदन्ति--रोते हैं; अच्युत--अच्युत भगवान्‌ के; चिन्तया--विचार से; क्वचित्‌--क भी; हसन्ति--हँसते हैं;नन्दन्ति--अतीव आनन्द लेते हैं; वदन्ति--बोलते हैं; अलौकिका:--आश्चर्यजनक रीति से अभिनय करते हुए; नृत्यन्ति--नाचतेहैं; गायन्ति--गाते हैं; अनुशीलयन्ति--तथा अनुकरण करते हैं; अजम्‌--अजन्मा; भवन्ति--बन जाते हैं; तृष्णीमू--मौन;परमू--ब्रह्म; एत्य--प्राप्त करके; निर्वुता:--दुख से मुक्त |

भगवत्प्रेम प्राप्त कर लेने पर भक्तगण अच्युत भगवान्‌ के विचार में मग्न होकर कभी जोर सेनिनाद हैं।

कभी हँसते हैं, कभी अगाध आनन्द का अनुभव करते हैं, भगवान्‌ से जोर से बातेंकरते हैं, नाचते या गाते हैं।

ऐसे भक्तगण दिव्य भौतिक बद्धजीव की अवस्था को लाँघकरकभी कभी अजन्मा परमेश्वर की लीलाओं का अनुकरण करते हैं और कभी उनका दर्शन पाकरवे शान्त एवं मौन हो जाते हैं।

"

इति भागवतान्धर्मानिशिक्षन्भक्त्या तदुत्थया ।

नारायणपरो मायामञ्जस्तरति दुस्तराम्‌ ॥

३३॥

इति--इस प्रकार; भागवतान्‌ धर्मान्‌-भक्ति के विज्ञान को; शिक्षन्‌ू-- अध्ययन करते हुए; भक्त्या--भक्ति द्वारा; ततू-उत्थया--इससे उत्पन्न; नारायण-पर:--भगवान्‌ नारायण में समर्पित; मायाम्‌--माया को; अद्भ:--सरलता से; तरति--पार कर जाता है;दुस्तरामू--लाँघ पाना कठिन।

इस तरह भक्ति-विज्ञान को सीख कर तथा भगवद्भक्ति में व्यावहारिक रूप से संलग्न रहकर भक्त भगवत्प्रेम की अवस्था को प्राप्त होता है।

और भगवान्‌ नारायण की पूर्ण भक्ति द्वाराभक्त सरलता से उस माया को पार कर लेता है, जिसे लाँघ पाना अत्यन्त ही कठिन है।

"

श्रीराजोबाचनारायणाभिधानस्य ब्रह्मण: परमात्मन: ।

निष्ठामरहथ नो वक्तुं यूयं हि ब्रह्मवित्तमा: ॥

३४॥

श्री-राजा उवाच--राजा ने कहा; नारायण-अभिधानस्य--नारायण नामक भगवान्‌ का; ब्रह्मण: --परब्रह्म का; परम-आत्मन:--परमात्मा का; निष्ठामू-दिव्य स्थिति; अर्हथ--कृपया; न:ः--हमसे; वक्तुम्‌--कहें; यूयम्‌-- आप सभी; हि--निस्सन्देह; ब्रह्म-वित्‌ू-तमा:--ब्रह्म के परम दक्ष ज्ञाता

राजा निमि ने कहा : अतः कृपा करके मुझे उन भगवान्‌ नारायण के दिव्य पद को बतलायें,जो साक्षात्‌ परब्रह्म तथा हर एक के परमात्मा हैं।

आप मुझसे कहें, क्योंकि आप सभी जन दिव्यज्ञान में परम निष्णात हैं।

"

श्रीपिप्पलायन उवाचस्थित्युद्धवप्रलयहेतुरहेतुरस्ययत्स्वणजागरसुषुप्तिषु सद्वहिश्च ।

देहेन्द्रियासुहृदयानि चरन्ति येनसञ्जीवितानि तदवेहि परं नरेन्द्र ॥

३५॥

श्री-पिप्पलायन: उवाच-- श्री पिप्पलायन ने कहा; स्थिति--सृजन; उद्धव--पालन; प्रलय--तथा संहार; हेतु:--कारण;अहेतु:--बिना कारण के; अस्य--इस भौतिक ब्रह्माण्ड का; यत्‌--जो; स्वप्न--स्वप्न; जागर--जागृति; सुषुप्तिषु--गहरीनिद्रा या अचेतनावस्था में; सत्‌--जो विद्यमान है; बहि: च--तथा इनसे बाहर; देह--जीवों के भौतिक शरीरों की; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; आसु--प्राण-वायु; हृदयानि--तथा मन; चरन्ति--कार्य करते हैं; येन--जिससे; सझ्लीवितानि--जीवन प्रदत्त; तत्‌--वह; अवेहि--जानो; परम्‌--ब्रह्म रूप में; नर-इन्द्र--हे राजा

श्री पिप्पलायन ने कहा : पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ ही इस ब्रह्माण्ड के सृजन, पालन तथासंहार के कारण हैं, फिर भी उनका कोई पूर्व कारण नहीं है।

वे जागृति, स्वप्न तथा सुषुप्ति जैसी विविध अवस्थाओं में व्याप्त रहते हैं और इनसे परे भी विद्यमान हैं।

वे हर जीव के शरीर मेंपरमात्मा रूप में प्रवेश करके शरीर, प्राण-वायु तथा मानसिक क्रियाओं को जागृत करते हैं,जिससे शरीर के सभी सूक्ष्म तथा स्थूल अंग अपने अपने कार्य शुरू कर देते हैं।

हे राजन, यहजान लें कि भगवान्‌ सर्वोपरि हैं।

"

नैतन्मनो विशति वागुत चश्षुरात्माप्राणेन्द्रयणि च यथानलमर्चिष: सवा: ।

शब्दोपि बोधकनिषेधतयात्ममूल-मर्थोक्तमाह यहते न निषेधसिद्ध्धि: ॥

३६॥

न--नहीं; एतत्‌--यह ( परब्रह्म ); मनः--मन; विशति--प्रवेश करता है; वाक्‌ु--वाणी का कार्य; उत--न तो; चक्षु:--दृष्टि;आत्मा--बुद्धि; प्राण--जीवन दायिनी सूक्ष्म वायु; इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ; च--अथवा; यथा--जिस तरह; अनलमू-- अग्नि;अर्चिष:--चिनगारियाँ; स्वा:ः-- अपना; शब्द: --वेद-ध्वनि; अपि-- भी; बोधक--वाणी से बताने में समर्थ; निषेधतया--निषेधकरने के कारण; आत्म--परमात्मा का; मूलम्‌--मुख्य प्रमाण; अर्थ-उक्तम्‌--अ प्रत्यक्ष रूप से व्यक्त किया गया; आह--व्यक्तकरता है; यत्‌ू-ऋते--जिसके ( ब्रह्म के ) बिना; न--नहीं है; निषेध--शास्त्रों के कथन का उल्टा; सिद्द्धिः--चरम प्रयोजन।

न तो मन, न ही वाणी, दृष्टि, बुद्धि, प्राण-वायु या किसी इन्द्रिय के कार्य उस परम सत्य मेंप्रवेश करने में सक्षम हैं, जिस तरह कि छोटी चिनगारियाँ उस मूल अग्नि को प्रभावित नहीं करसकती हैं, जिससे वे उत्पन्न होती हैं।

यहाँ तक कि वेदों की प्रामाणिक भाषा भी परम सत्य काबखान नहीं कर सकती है, क्योंकि स्वयं वेद ही इस सम्भावना से इनकार करते हैं कि सत्य कोशब्दों द्वारा व्यक्त किया जा सकता है।

किन्तु अप्रत्यक्ष निर्देश द्वारा वैदिक ध्वनि परम सत्य का प्रमाण प्रस्तुत करती है, क्योंकि परम सत्य के अस्तित्व के बिना वेदों में प्राप्त विविध निषेधों काकोई चरम अभिप्राय नहीं होता।

"

सत्त्वं रजस्तम इति त्रिवृदेकमादौसूत्रं महानहमिति प्रवदन्ति जीवम्‌ ।

ज्ञानक्रियार्थफलरूपतयोरुशक्तिब्रहौव भाति सदसच्च तयोः परं यतू ॥

३७॥

सत्त्ममू--सतोगुण; रज:--रजोगुण; तम:--तथा तमोगुण; इति--इस प्रकार ज्ञात; त्रि-वृतू--तीनों; एकम्‌--एक; आदौ--प्रारम्भ में, सृष्टि से पूर्व; सूत्रमू--कर्म करने की शक्ति; महान्‌ू--चेतना-शक्ति; अहम्‌--तथा मिथ्या अहंकार; इति--इस प्रकार;प्रवदन्ति--कहलाता है; जीवम्‌--( मिथ्या अहंकार, जो आच्छादित करता है ) जीव को; ज्ञान--ज्ञान के साक्षात्‌ रूप देवतागण;क्रिया--इन्द्रियाँ; अर्थ--इन्द्रिय-विषय; फल--तथा सुख-दुख के रूप में सकाम फल; रूपतया--रूप धारण करके; उरु-शक्ति--अनेक प्रकार की शक्ति से सम्पन्न; ब्रह्म एबव--केवल ब्रह्म; भाति-- प्रकट होता है; सत्‌ असत्‌ च--स्थूल इन्द्रियाँ तथाउनके सूक्ष्म कारण; तयो:--दोनों; परम्‌--परे; यत्‌--जो है |

ब्रह्म जो मूलतः एक है, वह त्रिगुण होकर विख्यात है और प्रकृति के तीन गुणों--सतो, रजोतथा तमो गुणों--के रूप में अपने को प्रकट करता है।

ब्रह्म इससे भी आगे अपनी शक्ति काविस्तार करता है।

इस तरह मिथ्या अहंकार के साथ साथ कार्य करने की शक्ति तथा चेतना-शक्ति प्रकट होती है, जो बद्ध जीव के स्वरूप को ढक लेती है।

इस तरह ब्रह्म की बहुविधशक्तियों के विस्तार से देवतागण ज्ञान के साक्षात्‌ रूप में प्रकट होते हैं और उनके साथ साथभौतिक इन्द्रियाँ, उनके विषय तथा कर्मफल--सुख-दुख--प्रकट होते हैं।

इस तरह भौतिकजगत की अभिव्यक्ति सूक्ष्म कारण के रूप में तथा स्थूल भौतिक पदार्थों में हश्य भौतिक कार्य के रूप में होती है।

ब्रह्म, जो कि समस्त सूक्ष्म तथा स्थूल अभिव्यक्तियों का स्त्रोत है, परम होनेके कारण, उनसे परे भी रहता है।

"

नात्मा जजान न मरिष्यति नेधतेसौन क्षीयते सवनविद्व्यभिचारिणां हि ।

सर्वत्र शश्वदनपाय्युपलब्धिमात्र'प्राणो यथेन्द्रिययलेन विकल्पितं सत्‌ ॥

३८॥

न--कभी नहीं; आत्मा--आत्मा; जजान--उत्पन्न हुआ था; न--कभी नहीं; मरिष्यति--मरेगा; न--कभी नहीं; एधते--बढ़ताहै; असौ--यह; न--नहीं; क्षीयते-- क्षीण होता है; सवन-वित्‌--काल की इन अवस्थाओं का ज्ञाता; व्यभिचारिणाम्‌ू-- जैसाकिअन्य परिवर्तनशील प्राणियों में घटित होते हैं; हि--निस्सन्देह; सर्वत्र--सभी जगह; शश्वत्‌--निरन्तर; अनपायि--कभी अप्रकटन होकर; उपलब्धि-मात्रम्‌--शुद्ध चेतना; प्राण: यथा--जिस तरह शरीर के भीतर प्राण-वायु; इन्द्रिय-बलेन--इन्द्रियों के बलसे; विकल्पितम्‌-विभक्त मानते हुए; सत्‌--होकर

नित्य आत्मा ब्रह्म न तो कभी जन्मा था और न कभी मरेगा।

न ही वह बड़ा होता है न उसकाक्षय होता है।

वह आध्यात्मिक आत्मा वास्तव में भौतिक शरीर की युवावस्था, मध्यावस्था तथाभौतिक शरीर की मृत्यु का ज्ञाता है।

इस प्रकार आत्मा को शुद्ध चेतना माना जा सकता है, जोसभी काल में सर्वत्र विद्यमान रहता है और कभी विनष्ट नहीं होता।

जिस प्रकार प्राण एक होतेहुए भी शरीर के भीतर विभिन्न इन्द्रियों के सम्पर्क में अनेक रूप में प्रकट होता है, उसी तरह वहएक आत्मा भौतिक शरीर के सम्पर्क में विविध भौतिक उपाधियाँ धारण करता प्रतीत होता है।

"

अण्डेषु पेशिषु तरुष्वविनिश्चितेषुप्राणो हि जीवमुपधावति तत्र तत्र ।

सन्ने यदिन्द्रियगणेहमि च प्रसुप्तेकूटस्थ आशयमूृते तदनुस्मृतिर्न: ॥

३९॥

अण्डेषु--अण्डों ( से उत्पन्न योनियों ) में; पेशिषु-- भ्रूणों में; तरुषु--पौधों में; अविनिश्चितेषु-- अनिश्चित उत्पत्ति वाली ( पसीनेसे उत्पन्न ) योनियों में; प्राण:--प्राण-वायु; हि--निश्चय ही; जीवम्‌--आत्मा; उपधावति--पीछा करता है; तत्र तत्र--एक योनिसे दूसरी में; सन्ने--मिल जाते हैं; यत्‌--जब; इन्द्रिय-गणे--सारी इन्द्रियाँ; अहमि--मिथ्या अहंकार; च-- भी; प्रसुप्ते--गहरीनिद्रा में; कूट-स्थ:--अपरिवर्तित; आशयम्‌--दूषित चेतना का सूक्ष्म आवरण, लिंग शरीर; ऋते--रहित; तत्‌ू--उसके;अनुस्मृतिः:--पश्चर्ती स्मरणशक्ति; न:--हमारी |

इस भौतिक जगत में आत्मा कई जीव योनियों में जन्म लेता है।

कुछ योनियाँ अंडों से उत्पन्नहोती हैं, कुछ भ्रूण से, कुछ पौधों और वृक्षों के बीजों से तो कुछ स्वेद से उत्पन्न होती हैं।

किन्तुसमस्त योनियों में प्राण अपरिवर्तित रहता है और वह आत्मा के पीछे पीछे एक शरीर से दूसरे मेंचला जाता है।

इसी प्रकार आत्मा विभिन्न जीवन-स्थितियों के बावजूद निरन्तर वही बना रहताहै।

हमें इसका व्यावहारिक अनुभव है।

जब हम बिना स्वप्न देखे प्रगाढ़ निद्रा में होते हैं, तोभौतिक इन्द्रियाँ निष्क्रिय हो जाती हैं, यहाँ तक कि मन तथा मिथ्या अहंकार भी निष्क्रिय होजाते हैं, किन्तु जब मनुष्य जागता है, तो वह स्मरण करता है कि आत्मारूप वह शान्ति से सो रहाथा, यद्यपि इन्द्रियाँ, मन और मिथ्या अहंकार निष्क्रिय थे।

"

यहांव्जनाभचरणैषणयोरु भक्त्याचेतोमलानि विधमेद्गुणकर्मजानि ।

तस्मिन्विशुद्ध उपलभ्यत आत्मतत्त्वंशाक्षाद्यथामलहृशो: सवितृप्रकाश: ॥

४०॥

यहि--जब; अब्ज-नाभ--जिसकी नाभि कमल जैसी है, ऐसे भगवान्‌ के; चरण--चरण; एषणया--( केवल ) इच्छा करने से;उरु-भक्त्या--शक्तिशाली भक्ति द्वारा; चेत:--हृदय की; मलानि--धूल; विधमेत्‌-- धो डालती है; गुण-कर्म-जानि-- प्रकृतिके गुणों तथा इन गुणों के कार्यो से उत्पन्न; तस्मिन्‌ू--उस; विशुद्धे--पूर्णतया शुद्ध ( हृदय ); उपलभ्यते--अनुभव किया जाताहै; आत्म-तत्त्वमू-- आत्मा का असली स्वभाव; साक्षात्‌- प्रत्यक्ष; यथा--जिस तरह; अमल-हृशो:--शुद्ध आँखों के; सवितृ--सूर्य की; प्रकाश:--अभिव्यक्ति

जब मनुष्य अपने हृदय में भगवान्‌ के चरणकमलों को जीवन के एकमात्र लक्ष्य के रूप मेंस्थिर करके भगवान्‌ की भक्ति में गम्भीरतापूर्वक संलग्न होता है, तो वह अपने हृदय के भीतरस्थित उन असंख्य अशुद्ध इच्छाओं को विनष्ट कर सकता है, जो प्रकृति के तीन गुणों के अन्तर्गतउसके पूर्वकर्मों के फल के कारण संचित होती हैं।

जब इस तरह हृदय शुद्ध हो जाता है, तो वहभगवान्‌ को तथा अपने को दिव्य जीवों के रूप में प्रत्यक्षत: अनुभव कर सकता है।

इस तरह वहप्रत्यक्ष अनुभव द्वारा आध्यात्मिक ज्ञान में निष्णात्‌ हो जाता है, जिस तरह कि सामान्य स्वस्थ दृष्टिद्वारा सूर्य-प्रकाश का प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है।

"

श्रीराजोबाचकर्मयोगं बदत नः पुरुषो येन संस्कृत: ।

विधूयेहाशु कर्माणि नैष्कर्म्य विन्दते परम्‌ ॥

४१॥

श्री-राजा उवाच--राजा ने कहा; कर्म-योगम्‌--ब्रह्म से अपने कर्म को जोड़ने का अभ्यास; वबदत--कृपया बतलायें; न:--हमको; पुरुष:--व्यक्ति; येन--जिससे; संस्कृत:--परिष्कृत होकर; विधूय-- छूट कर; इह--इस जीवन में; आशु--तुरनन्‍्त;कर्माणि-- भौतिकतावादी कर्म; नैष्कर्म्पम्‌--सकाम कर्मफल से मुक्ति; विन्दते-- भोग करता है; परम्‌ू--दिव्य |

राजा निमि ने कहा : हे मुनियो, हमें कर्मयोग की विधि के विषय में बतलायें।

परम पुरुषको अपने व्यावहारिक कर्म समर्पित करने की इस विधि से शुद्ध होकर व्यक्ति अपने को इसजीवन में भी समस्त भौतिक कार्यों से मुक्त कर सकता है और इस तरह दिव्य पद पर शुद्धजीवन का भोग कर सकता है।

"

एवं प्रश्नमृषीन्पूर्वमपृच्छे पितुरन्तिके ।

नाब्रुवन्ब्रह्मण: पुत्रास्तत्र कारणमुच्यताम्‌ ॥

४२॥

एवम्‌--इसी तरह का; प्रश्नम्‌--प्रश्न; ऋषीन्‌ू--ऋषियों से; पूर्वम्‌--इसके पहिले भी; अपृच्छम्‌--मैंने पूछा था; पितु:--अपनेपिता ( इक्ष्वाकु महाराज ) के; अन्तिके--समक्ष; न अब्रुवन्‌--वे नहीं बोले; ब्रह्मण:--ब्रह्मा के; पुत्रा:--पुत्र; तत्र--उसका;'कारणम्‌--कारण; उच्यताम्‌ू--कहिये |

एक बार विगत काल में अपने पिता महाराज इशक्ष्वाकु की उपस्थिति में मैंने ब्रह्म के चारमहर्षि पुत्रों से ऐसा ही प्रश्न पूछा था, किन्तु उन्होंने मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया।

कृपया इसकाकारण बतलायें।

"

श्रीआविहोंत्र उबाचकर्माकर्म विकर्मेति वेदवादो न लौकिकः ।

वेदस्य चेश्वरात्मत्वात्तत्र मुहान्ति सूरयः ॥

४३॥

श्री-आविदहोंत्र: उवाच--आविदोंत्र ने कहा; कर्म --शा्त्रों द्वारा संस्तुत कार्यों की सम्पन्नता; अकर्म--ऐसे कार्यों को कर पाने मेंअसफलता; विकर्म--निषिद्ध कर्मों में लगना; इति--इस प्रकार; बेद-वाद:--वेदों के माध्यम से समझा गया विषय; न--नहीं;लौकिकः--संसारी; वेदस्य--वेदों का; च--तथा; ईश्वर-आत्मत्वात्‌ू-- भगवान्‌ से आने के कारण; तत्र--इस विषय में;मुहान्ति--मोह ग्रस्त हो जाते हैं; सूरय:--बड़े बड़े पंडित ( भी )

श्री आविहोंत्र ने उत्तर दिया : कर्म, अकर्म तथा विकर्म ऐसे विषय हैं, जिन्हें वैदिक साहित्यके प्रामाणिक अध्ययन द्वारा ही भलीभाँति समझा जा सकता है।

इस कठिन विषय को संसारीकल्पना के द्वारा कभी भी नहीं समझा जा सकता।

प्रामाणिक वैदिक साहित्य भगवान्‌ काशब्दावतार है, इस प्रकार वैदिक ज्ञान पूर्ण है।

वैदिक ज्ञान की सत्ता की उपेक्षा करने से बड़े बड़ेपंडित तक कर्म-योग को समझने में भ्रमित हो जाते हैं।

"

परोक्षवादो वेदोयं बालानामनुशासनम्‌ ।

'कर्ममोक्षाय कर्माणि विधत्ते हागदं यथा ॥

४४॥

परोक्ष-वाद:--किसी वस्तु के असली स्वरूप को छिपाने के लिए उसे अन्य रूप में प्रस्तुत करना; वेद:--वेद; अयम्‌--ये;बालानाम्‌ू--बचकाने लोग; अनुशासनम्‌--निर्देशन; कर्म-मोक्षाय-- भौतिक कार्यों से मुक्ति के लिए; कर्माणि-- भौतिक कार्य;विधत्ते--संस्तुति करते हैं; हि--निस्सन्देह; अगदम्‌--औषधि; यथा--जिस तरह।

बचकाने तथा मूर्ख लोग भौतिकतावादी सकाम कर्मों के प्रति आसक्त रहते हैं, यद्यपि जीवनका वास्तविक लक्ष्य ऐसे कर्मों से मुक्त बनना है।

इसलिए वैदिक आदेश सर्वप्रथम सकाम धार्मिक कर्मो की संस्तुति करके मनुष्य को परोक्ष रीति से चरम मोक्ष के मार्ग पर ले जाते हैं,जिस तरह पिता अपने पुत्र को दवा पिलाने के लिए उसे मिठाई देने का वादा करता है।

"

नाचरेहास्तु वेदोक्त स्वयमज्ञो उजितेन्द्रियः ।

विकर्मणा ह्य॒धर्मेण मृत्योर्मृत्युमुपैति सः ॥

४५॥

न आचरेत्‌--नहीं करता है; यः--जो; तु--लेकिन; वेद-उक्तम्‌--वेदों में संस्तुत किया हुआ; स्वयम्‌--खुद; अज्ञ:--अज्ञानी;अजित-इन्द्रियः--जिसने अपनी इन्द्रियों को वश में नहीं किया; विकर्मणा--शास्त्र-कर्म न करने से; हि--निस्सन्देह;अधर्मेण --अधर्म द्वारा; मृत्यो: मृत्युम्‌--मृत्यु के बाद फिर मृत्यु; उपैति--प्राप्त करता है; सः--वह।

यदि कोई अज्ञानी जिसने भौतिक इन्द्रियों को वश में नहीं किया है, वह वैदिक आदेशों मेंअटल नहीं रहता, तो वह निश्चय ही पापमय तथा अधार्मिक कार्यों में लिप्त रहेगा।

इस तरहउसको बारम्बार जन्म-मृत्यु भोगना पड़ेगा।

"

वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसड्ढोउर्पितमी श्वरे ।

नैष्कर्म्य लभते सिद्धि रोचनार्था फलश्रुति: ॥

४६॥

बेद-उक्तम्‌-वेदों में वर्णित नियमित कर्म; एब--निश्चय ही; कुर्वाण:--करते हुए; निह्सड्र:ः--किसी आसक्ति के बिना;अर्पितमू्‌-प्रदत्त; ईश्वे-- भगवान्‌ को; नैष्कर्म्यम्‌-- भौतिक कर्म तथा इसके फलों से मुक्ति के; लभते--प्राप्त करता है;सिद्धिम्‌--सिद्धि; रोचन-अर्था--प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से; फल-श्रुतिः--वैदिक शास्त्रों में दिये गये भौतिक फल के वायदे।

निर्लिप्त होकर वेदों द्वारा निर्दिष्ट नियमित कार्यों को सम्पन्न करने और ऐसे कार्य के फलभगवान्‌ को अर्पित करने से मनुष्य को भौतिक कर्म के बन्धन से मुक्ति रूपी सिद्धि मिल जाती है।

प्रामाणिक शास्त्रों में प्रदत्त भौतिक कर्मफल वैदिक ज्ञान के चरम लक्ष्य नहीं हैं, अपितु कर्तामें रुचि उत्पन्न कराने के निमित्त हैं।

"

य आशु हृदयग्रन्थि निर्जिही ऋषु: परात्मन: ।

विधिनोपचरेद्देवं तन्त्रोक्तेन च केशवम्‌ ॥

४७॥

यः--जो; आशु--शीघ्रता से; हृदय-ग्रन्थिमू--हृदय की गाँठ को ( भौतिक देह से झूठी पहचान ); निर्जिहीर्षु:--काटने काइच्छुक; परात्मन:--दिव्य आत्मा का; विधिना--विधानों से; उपचरेत्‌--उसे पूजा करनी चाहिए; देवम्‌-- भगवान्‌; तन्त्र-उक्तेन--तंत्रों द्वारा वर्णित; च--तथा ( वेदोक्तम के अतिरिक्त ); केशवम्‌--भगवान्‌ केशव को |

जो व्यक्ति आत्मा को जकड़कर रखने वाली मिथ्या अहंकार की गाँठ को तुरन्त काट देनेका इच्छुक होता है, उसे वैदिक ग्रंथों यथा तंत्रों में प्राप्त अनुष्ठानों के द्वारा, भगवान्‌ केशव कीपूजा करनी चाहिए।

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लब्ध्वानुग्रह आचार्योत्तिन सन्दर्शितागम: ।

महापुरुषमभ्यर्चेन्मूत्याभिमतयात्मन: ॥

४८ ॥

लब्ध्वा--प्राप्त करके; अनुग्रह:--कृपा; आचार्यात्‌--गुरु से; तेन--उसके द्वारा; सन्दर्शित--दिखाया जाकर; आगम:--वैष्णवतंत्रों ( द्वारा दी गई पूजा-विधि ); महा-पुरुषम्‌--परम पुरुष को; अभ्यर्चेत्‌ू-शिष्य को चाहिए कि पूजे; मूर्त्ता--विशेष साकाररूप में; अभिमतया--जिसे अच्छा समझा जाय; आत्मन:--अपने से।

शिष्य को वैदिक शास्त्रों के आदेश बतलाने वाले अपने गुरु की कृपा प्राप्त करके, उसेचाहिए कि वह भगवान्‌ के अत्यन्त आकर्षक किसी विशिष्ट साकार रूप में, परमेश्वर की पूजाकरे।

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शुचि: सम्मुखमासीन: प्राणसंयमनादिभि:ः ।

पिण्डं विशोध्य सन्न्यासकृतरक्षोर्चयेद्धरिम्‌ ॥

४९॥

शुचिः--स्वच्छ; सम्मुखम्‌--( अर्चाविग्रह के ) समक्ष; आसीन:--बैठे हुए; प्राण-संयमन-आदिभि:-- प्राणायाम इत्यादिविधियों से; पिण्डम्‌--स्थूल शरीर; विशोध्य--शुद्ध करके ; सन््यास--शरीर के विभिन्न स्थानों पर तिलक लगाकर; कृत-रक्ष:--इस तरह भगवान्‌ द्वारा सुरक्षा का आवाहन करके; अर्चयेत्‌--पूजे; हरिम्‌-- भगवान्‌ हरि को |

अपने को स्वच्छ बनाकर, शरीर को प्राणायाम, भूत-शुद्धि तथा अन्य विधियों से शुद्धकरके एवं सुरक्षा के लिए शरीर में पवित्र तिलक लगाकर, अर्चाविग्रह के समक्ष बैठ जानाचाहिए और भगवान्‌ की पूजा करनी चाहिए।

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अर्चादौ हृदये चापि यथालब्धोपचारकै: ।

द्रव्यक्षित्यात्मलिणगानि निष्पाद्य प्रोक्ष्य्चासनम्‌ ॥

५०॥

पाद्यादीनुपकल्प्याथ सन्निधाप्य समाहित: ।

हृदादिभि: कृतन्यासो मूलमन्त्रेण चार्चयेत्‌ ॥

५१॥

अर्चा-आदौ--अर्चाविग्रह तथा अपनी साज-सामग्री के रूप में; हृदये--हृदय में; च अपि-- भी; यथा-लब्ध--जो भी प्राप्त हो;उपचारकै:--पूजा की सामग्री से; द्रव्य--अर्पित की जाने वाली वस्तुएँ; क्षिति--पृथ्वी; आत्म--अपना मन; लिड्ञानि--तथाअर्चाविग्रह; निष्पाद्य--तैयार करके; प्रोक्ष्य--शुद्द्धि के लिए जल छिड़क कर; च--तथा; आसनम्‌--बैठने का आसन; पाद्य-आदीनू--अर्चाविग्रह का चरण धोने तथा अन्य कार्यों के लिए जल; उपकल्प्य--तैयार होकर; अथ--तब; सन्निधाप्य--अर्चाविग्रह को उचित स्थान पर रख कर; समाहितः--मन को एकाग्र करके; हत्‌ू-आदिभि:--अर्चाविग्रह के हृदय तथा अन्यअंगों में; कृत-न्यास:--पवित्र चिह्न बनाकर; मूल-मन्त्रेण--अर्चा विग्रह की पूजा के लिए उपयुक्त मंत्र से; च--तथा; अर्चयेत्‌--पूजा करे

भक्त को चाहिए कि अर्चाविग्रह की पूजा के लिए, जो भी वस्तुएँ उपलब्ध हों, उन्हें एकत्रकरे, भेंट सामग्री, भूमि, अपना मन तथा अर्चाविग्रह को तैयार करे, अपने बैठने के स्थान कोशुद्ध करने के लिए पानी छिड़के और फिर स्नान के लिए जल तथा अन्य साज-सामग्री तैयारकरे।

इसके बाद भक्त को चाहिए कि अर्चाविग्रह को शरीर से तथा अपने मन से उसके सही स्थान पर रखे, वह अपना ध्यान एकाग्र करे और अर्चाविग्रह के हृदय पर तथा शरीर के अन्यअंगों पर तिलक लगाये।

तब उपयुक्त मंत्र द्वारा पूजा करे।

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साझ़ेपाडुं सपार्षदां तां तां मूर्ति स्वमन्त्रतः ।

पाद्यार््याचमनीयाद्यै: स्नानवासोविभूषणै: ॥

५२॥

गन्धमाल्याक्षतस्त्रग्भिर्धूपदीपोपहारकै: ।

साड्ुम्सम्पूज्य विधिवत्स्तवै: स्तुत्वा नमेद्धरिम्‌ ॥

५३॥

स-अड्गभ--उनके दिव्य शरीर के अंगों सहित; उपाड्भाम्‌--तथा उनके विशिष्ट शारीरिक स्वरूप यथा उनका सुदर्शन चक्र तथाअन्य हथियार; स-पार्षदाम्‌--अपने निजी संगियों सहित; ताम्‌ तामू--उन उन; मूर्तिम्‌--अर्चाविग्रह; स्व-मन्त्रतः--अर्चा विग्रह केही मंत्र द्वारा; पाद्य--चरण धोने के जल से; अर्ध्य--सत्कार के लिए सुगंधित जल; आचमनीय--मुख धोने का जल; आद्यै:--इत्यादि से; स्नान--स्नान करने के लिए जल; वास:ः--उत्तम वस्त्र; विभूषणै:--गहनों से; गन्‍्ध--सुगन्ध से; माल्य--गले काहार; अक्षत--चावल; स्त्रग्भिः--तथा फूलों की मालाओं से; धूप--धूप से; दीप--तथा दीपकों से; उपहारकै: --ऐसी भेंटें; स-अड्भम्‌--सभी तरह से; सम्पूज्य--अच्छी तरह पूज कर; विधिवत्‌--नियत विधानों के अनुसार; स्तवैः स्तुत्वा--स्तुतियों द्वाराअर्चाविग्रह का आदर करके; नमेत्‌--नमस्कार करे; हरिमू-- भगवान्‌ को |

मनुष्य को चाहिए कि अर्चाविग्रह के दिव्य शरीर के प्रत्येक अंग के साथ साथ उनकेआयुधों यथा सुदर्शन चक्र उनके अन्य शारीरिक स्वरूपों तथा उनके निजी संगियों की पूजा करे।

वह भगवान्‌ के इन दिव्य पक्षों में से हर एक की पूजा, उसके मंत्र तथा पाँव धोने के लिए जल,सुगन्धित जल, मुख धोने का जल, स्नान के लिए जल, उत्तम वस्त्र तथा आभूषण, सुगन्धिततेल, मूल्यवान हार, अक्षत, फूल-मालाओं, धूप तथा दीपों से करे।

इस तरह बताये गये विधानोंके अनुसार सभी तरह से पूजा करके मनुष्य को चाहिए कि भगवान्‌ हरि के अर्चाविग्रह काआदर स्तुतियों से करे और झुक कर उन्हें नमस्कार करे।

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आत्मानम्तन्मयभ्ध्यायन्मूर्ति सम्पूजयेद्धरे: ।

शेषामाधाय शिरसा स्वधाम्युद्वास्य सत्कृतम्‌ ॥

५४॥

आत्मानम्‌--स्वयं; ततू-- भगवान्‌ में; मयम्‌--लीन; ध्यायन्‌-- ध्यान करते हुए; मूर्तिमू--साकार रूप; सम्पूजयेत्‌-- पूरी करहपूजे; हरेः-- भगवान्‌ हरि का; शेषाम्‌--पूजा का जूठन; आधाय--लेकर; शिरसा--अपने सिर पर; स्व-धाम्नि--अपने स्थान में;उद्वास्य--रह कर; सत्‌-कृतम्‌--आदरपूर्वक ।

पूजा करने वाले को चाहिए कि अपने आपको भगवान्‌ का नित्य दास मान कर ध्यान मेंपूर्णतया लीन हो जाय और इस तरह यह स्मरण करे कि अर्चाविग्रह उसके हृदय में भी स्थित है,अर्चाविग्रह की भलीभाँति पूजा करे।

तत्पश्चात्‌, उसे अर्चाविग्रह के साज-सामान यथा बची हुई'फूल-माला को अपने सिर पर धारण करे और आदरपूर्वक अर्चाविग्रह को उसके स्थान परवापस रख कर पूजा का समापन करे।

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एवमग्न्यर्कतोयादावतिथौ हृदये च यः ।

यजती श्वरमात्मानमचिरान्मुच्यते हि सः ॥

५५॥

एवम्‌--इस तरह; अग्नि-- अग्नि; अर्क--सूर्य; तोय--जल; आदौ--इत्यादि में; अतिथौ --मेहमान में; हृदये--हृदय में; च--भी; यः--जो; यजति--पूजा करता है; ईश्वरमू--ई श्वर को; आत्मानम्‌--परमात्मा; अचिरातू--बिना विलम्ब किये; मुच्यते--छूट जाता है; हि--निस्सन्देह; सः--वह |

इस प्रकार भगवान्‌ के पूजक को यह पहचान लेना चाहिए कि भगवान्‌ सर्वव्यापक हैं औरउन्हें अग्नि, सूर्य, जल तथा अन्य तत्त्वों में, घर में आये अतिथि के हृदय में तथा अपने ही हृदय मेंउपस्थित जान कर उनकी पूजा करनी चाहिए।

इस प्रकार पूजक को तुरन्त ही मोक्ष प्राप्त होजायेगा।

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