← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 11 की सूची

अध्याय बीस: शुद्ध भक्ति सेवा ज्ञान और वैराग्य से बढ़कर है

श्रीउद्धव उवाचविधिश्च प्रतिषेधश्व निगमो ही श्वरस्य ते ।अवेक्षतेरविण्डाक्ष गुणं दोषं च कर्मणाम्‌ ॥

१॥

श्री-उद्धवः उवाच-- श्री उद्धव ने कहा; विधि:-- आदेश; च-- भी; प्रतिषेध:--निषेधात्मक आदेश; च--तथा; निगम:--वैदिकवाड्मय; हि--निस्सन्देह; ईश्वरस्थ-- भगवान्‌ का; ते--तुम्हारा; अवेक्षते--एकाग्र करता है; अरविण्ड-अक्ष--हे कमलनयन;गुणम्‌--उत्तम या पवित्र गुण; दोषम्‌--बुरे या पापपूर्ण गुण; च-- भी; कर्मणाम्‌ू--कर्मो के |

श्री उद्धव ने कहा : हे कमलनयन कृष्ण, आप भगवान्‌ हैं और इस तरह विधियों तथानिषेधों से युक्त वैदिक वाइमय आपका आदेश है। ऐसा वाड्मय कर्म के गुण तथा दोषों परध्यान एकाग्र करता है।

वर्णाश्रमविकल्पं च प्रतिलोमानुलोमजम्‌ ।द्रव्यदेशवय:कालान्स्वर्ग नरकमेव च ॥

२॥

वर्ण-आश्रम--वर्णा श्रम प्रणाली का; विकल्पम्‌--पाप-पुण्य से उत्पन्न नाना प्रकार के उच्च तथा निम्न पद; च--तथा;प्रतिलोम--ऐसे परिवार में जन्म जिसमें पिता माता से निम्न कुल का होता है; अनुलोम-जम्‌--ऐसे परिवार में जन्म जिसमें पिताउच्च कुल का और माता निम्न कुल की हो; द्रव्य-- भौतिक वस्तुएँ या धन; देश--स्थान; वयः--आयु; कालान्‌ू--समय;स्वर्गम्‌--स्वर्ग; नरकम्‌ू--नरक; एव--निस्सन्देह; च--भी |

वैदिक वाड्मय के अनुसार, वर्णाश्रम में उच्च तथा निम्न कोटियाँ परिवार-नियोजन केपवित्र और पापमय गुणों के कारण हैं। इस प्रकार पाप तथा पुण्य किसी स्थिति विशेष में यथाभौतिक अवयव, स्थान, आयु तथा काल में, वैदिक विश्लेषण के सन्दर्भ बिन्दु हैं। निस्सन्देह,वेदों से भौतिक स्वर्ग तथा नरक के अस्तित्व प्रकट होते हैं, जो निश्चित रूप से पाप तथा पुण्यपर आधारित हैं।

गुणदोषभिदादष्टिमन्‍्तरेण वचस्तव ।निःश्रेयसं कथथं नृणां निषेधविधिलक्षणम्‌ ॥

३॥

गुण--पुण्य; दोष--पाप; भिदा--दोनों में भेद; दृष्टिमू--देखे; अन्तरेण--के बिना; बच: --शब्द; तब--तुम्हारा;निःश्रेयसम्‌--जीवन की सिद्धि, मोक्ष; कथम्‌--कैसे सम्भव; नृणाम्‌--मनुष्यों के लिए; निषेध--वर्जन; विधि-- आदेश;लक्षणम्‌--लक्षण से युक्त |

पाप तथा पुण्य के बीच के अन्तर को देखे बिना भला कोई किस तरह आपके उन आदेशोंको जो कि वैदिक वाड्मय के रूप में हैं, समझ सकता है, जो मनुष्य को पुण्य करने का आदेशदेते हैं और पाप करने से मना करते हैं? इतना ही नहीं, अन्ततोगत्वा मोक्ष प्रदान करने वाले ऐसेप्रामाणिक वैदिक वाड्मय के बिना, मनुष्य किस तरह जीवन-सिद्धि प्राप्त कर सकते हैं ? पितृदेवमनुष्याणां वेदश्नश्षुस्तवे श्वर ।श्रेयस्त्वनुपलब्धे $र्थ साध्यसाधनयोरपि ॥

४॥

पितृ--पितरों के; देव--देवताओं के; मनुष्याणाम्‌--मनुष्यों के; वेद:--वैदिक ज्ञान; चक्षु;--आँख है; तब--आपफे उत्पन्न;ईश्वर--हे परमेश्वर; श्रेय:-- श्रेष्ठ; तु--निस्सन्देह; अनुपलब्धे-- प्रत्यक्ष अनुभव न होने पर; अर्थे--मानव-जीवन के लक्ष्य यथाइन्द्रियतृप्ति, मोक्ष, स्वर्ग-प्राप्ति में; साध्य-साधनयो:--कार्य-कारण दोनों में; अपि--निस्सन्देह।

हे प्रभु, प्रत्यक्ष अनुभव से परे वस्तुओं को--यथा आध्यात्मिक मोक्ष या स्वर्ग-प्राप्ति तथाअन्य भौतिक भोग जो हमारी वर्तमान क्षमता से परे हैं--समझने के लिए तथा सामान्यतया सभीवस्तुओं के साध्य-साधन को समझने के लिए, पितरों, देवताओं तथा मनुष्यों को आपके नियमरूप वैदिक वाड्मय की सलाह लेनी चाहिए क्योंकि ये सर्वोच्च प्रमाण तथा ई श्वरी ज्ञान हैं।

गुणदोषभिदाटष्टिनिंगमात्ते न हि स्वतः ।निगमेनापवादश्च भिदाया इति ह भ्रम: ॥

५॥

गुण--पुण्य; दोष--पाप; भिदा--अन्तर; दृष्टि:--देखना; निगमात्‌--वैदिक ज्ञान से; ते--तुम्हारा; न--नहीं; हि--निस्सन्देह;स्वतः--स्वयमेव; निगमेन--वेदों से; अपवाद:--निरस्तीकरण; च-- भी; भिदाया: --ऐसे भेद का; इति--इस प्रकार; ह--स्पष्टत:; भ्रम:-- भ्रम, संशय ।

हे प्रभु, पाप तथा पुण्य में दिखाई पड़ने वाला अन्तर आपके ही बैदिक ज्ञान से उत्पन्न होता हैऔर वह स्वयमेव उत्पन्न नहीं होता। यदि वही वैदिक वाड्मय बाद में पाप तथा पुण्य के ऐसेअन्तर को निरस्त कर दे, तो निश्चित रूप से भ्रम उत्पन्न होगा।

श्रीभगवानुवाचयोगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधित्सया ।ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोन्योस्ति कुत्रचित्‌ ॥

६॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; योगा:--विधियाँ; त्रय:--तीन; मया-- मेरे द्वारा; प्रोक्ताः--कही गई; नृणाम्‌--मनुष्योंके; श्रेयः--सिद्धि; विधित्सया--देने की इच्छा से; ज्ञानमू--दर्शन का मार्ग; कर्म--कर्म का मार्ग; च--भी; भक्ति: -- भक्ति-मार्ग; च-- भी; न--कोई नहीं; उपाय:--उपाय, साधन; अन्य:--अन्य; अस्ति--है; कुत्रचितू-जो भी |

भगवान्‌ ने कहा : हे उद्धव, चूँकि मेरी इच्छा है कि मनुष्य सिद्धि प्राप्त करे, अतएव मैंनेप्रगति के तीन मार्ग प्रस्तुत किये हैं--ज्ञान-मार्ग, कर्म-मार्ग तथा भक्ति-मार्ग। इन तीनों केअतिरिक्त ऊपर उठने का अन्य कोई साधन नहीं है।

निर्विण्णानां ज्ञानयोगो न्यासिनामिह कर्मसु ।तेष्वनिर्विण्णचित्तानां कर्मयोगस्तु कामिनाम्‌ ॥

७॥

निर्विण्णानाम्‌--ऊबे हुए; ज्ञान-योग:--दार्शनिक चिन्तन का मार्ग; न्‍्यासिनाम्‌ू-विरक्तों के लिए; इह--तीनों मार्गों में;कर्मसु--सामान्य कर्म में; तेषु--इन कर्मों में; अनिर्विण्ण--ऊबे नहीं है; चित्तानामू--चेतनायुक्त; कर्म-योग: --कर्म-योग कामार्ग; तु--निस्सन्देह; कामिनामू--जो अब भी भौतिक सुख चाहते हैं, उनके लिए।

तीनों मार्गों में से ज्ञान-योग अर्थात्‌ दार्शनिक चिन्तन का मार्ग उन लोगों के लिए संस्तुतकिया जाता है, जो भौतिक जीवन से ऊब चुके हैं और सामान्य सकाम कर्मों से विरक्त हैं। जोलोग भौतिक जीवन से ऊबे नहीं हैं और जिन्हें अब भी अनेक इच्छाएँ पूरी करनी हैं, उन्हें कर्म-योग के माध्यम से मोक्ष की खोज करनी चाहिए।

यहच्छया मत्कथादौ जातश्रद्धस्तु यः पुमान्‌ ।न निर्विण्णो नातिसक्तो भक्तियोगोस्य सिद्धिद: ॥

८॥

यहच्छया--सौ भाग्यवश किसी तरह से; मत्‌-कथा-आदौ--मेरी महिमा का वर्णन करने वाली कथाओं, गीतों, दर्शन तथानाटकीय प्रदर्शनों में; जात--जागृत किया हुआ; श्रद्धः--श्रद्धा; तु--निस्सनदेह; यः--जो कोई; पुमान्‌ू--पुरुष; न--नहीं;निर्विण्णग:--ऊबा हुआ; न--नहीं; अति-सक्त:--अत्यन्त आसक्त; भक्ति-योग: --प्रेमाभक्ति का मार्ग; अस्य--उसका; सिद्धि-दः--सिद्धि देने वाला

यदि कहीं कोई सौभाग्यवश मेरी महिमा के सुनने तथा कीर्तन करने में श्रद्धा उत्पन्न करलेता है, तो ऐसे व्यक्ति को जो भौतिक जीवन से न तो अत्यधिक ऊबा रहता है न आसक्त रहताहै मेरी प्रेमाभक्ति के मार्ग द्वारा सिद्धि प्राप्त करनी चाहिए।

तावत्कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता ।मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते ॥

९॥

तावत्‌--उस समय तक; कर्माणि--सकाम कर्म; कुर्वीत--सम्पन्न करे; न निर्विद्येत--तृप्त नहीं होता; यावता--जब तक; मत्‌ू-कथा-+मेरे विषय में वार्ताओं का; श्रवण-आदौ--श्रवणम्‌ कीर्तनम्‌ आदि के मामले में; बवा--अथवा; श्रद्धा-- श्रद्धा;यावत्‌--जब तक; न--नहीं; जायते--जागृत होती है|

जब तक मनुष्य सकाम कर्म से तृप्त नहीं हो जाता और श्रवर्णं कीर्तन विष्णो: द्वारा भक्ति केलिए रुचि जागृत नहीं कर लेता, तब तक उसे वैदिक आदेशों के विधानों के अनुसार कर्म करनाहोता है।

स्वधर्मस्थो यजन्यज्जैरनाशी:काम उद्धव ।न याति स्वर्गनरकौ यद्यन्यन्न समाचरेत्‌ ॥

१०॥

स्व-धर्म--अपने नियत कर्तव्यों में; स्थ:--स्थित; यजन्‌--पूजा करते हुए; यज्जै:--नियत यज्ञों से; अनाशी:-काम:--कर्मफलकी इच्छा न रखते हुए; उद्धव--हे उद्धव; न--नहीं; याति--जाता है; स्वर्ग--स्वर्ग; नरकौ--या नरक में; यदि--यदि;अन्यत्‌--अपने नियत कर्तव्य के अतिरिक्त कुछ; न--नहीं; समाचरेत्‌--सम्पन्न करता है

हे उद्धव, जो व्यक्ति वैदिक यज्ञों द्वारा समुचित पूजा करके, किन्तु ऐसी पूजा का फल नचाह कर, अपने नियत कर्तव्य में स्थित रहता है, वह स्वर्गलोक नहीं जाता है; इसी तरह निषिद्धकार्यो को न करने से वह नरक नहीं जाएगा।

अस्मिल्लोके वर्तमान: स्वधर्मस्थोनघ: शुचि: ।ज्ञानं विशुद्धमाष्नोति मद्भधक्ति वा यहच्छया ॥

११॥

अस्मिन्‌ू--इस; लोके--जगत में; वर्तमान:--रहते हुए; स्व-धर्म--अपने नियत कर्तव्य में; स्थ:--स्थित; अनघ:--पापकर्मो सेमुक्त; शुचिः--भौतिक कल्मष से धुला; ज्ञानमू--ज्ञान; विशुद्धमू--दिव्य; आप्नोति--प्राप्त करता है; मत्‌--मेरी; भक्तिम्‌--भक्ति; वा--अथवा; यहृच्छया--अपने भाग्य के अनुसार

जो व्यक्ति अपने नियत कर्म में हृढ़ रहता है, जो पापमय कार्यों से मुक्त होता है और भौतिककल्मष से रहित होता है, वह इसी जीवन में या तो दिव्य ज्ञान प्राप्त करता है या दैववश मेरीभक्ति पाता है।

स्वर्गिणोप्येतमिच्छन्ति लोक॑ निरयिणस्तथा ।साथकं ज्ञानभक्तिभ्यामुभयं तदसाधकम्‌ ॥

१२॥

स्वर्गिण:--स्वर्गलोक के निवासी; अपि-- भी; एतम्‌--यह; इच्छन्ति--चाहते हैं; लोकम्‌ू--पृथ्वीलोक; निरयिण: --नरकवासी;तथा--उसी तरह से; साधकम्‌--उपलब्धि की ओर; ज्ञान-भक्तिभ्याम्‌-दिव्य ज्ञान तथा भगवत्प्रेम का; उभयम्‌--दोनों ( स्वर्गतथा नरक ); तत्‌--उस सिद्धि के लिए; असाधकम्‌--उपयोगी नहीं

स्वर्ग तथा नरक दोनों ही के निवासी पृथ्वीलोक पर मनुष्य का जन्म पाने की आकांक्षारखते हैं क्योंकि मनुष्य-जीवन दिव्य ज्ञान तथा भगवत्प्रेम की प्राप्ति को सुगम बनाता है, जबकिन तो स्वर्गिक, न ही नारकीय शरीर पूर्णतः ऐसा अवसर सुलभ कराते हैं।

न नरः स्वर्गतिं काइक्षेन्नारकीं वा विचक्षण: ।नेम॑ लोक॑ च काडक्षेत देहावेशात्प्रमाद्यति ॥

१३॥

न--नहीं; नर: --मनुष्य; स्व:-गतिम्‌--स्वर्ग जाने की; काड्झ्षेत्‌--इच्छा करे; नारकीम्‌--नरक तक; वा--अथवा;विचक्षण:--विद्वान व्यक्ति; न--नहीं; इममू--यह; लोकम्‌--पृथ्वीलोक; च-- भी; काइ्क्षेत--इच्छा करे; देह-- भौतिक शरीरमें; आवेशात्‌--तल्लीनता से; प्रमाद्यति--मूर्ख बनता है

जो मनुष्य विद्वान हो उसे न तो कभी स्वर्गलोक जाने, न नरक में निवास करने की इच्छा करनी चाहिए। निस्सन्देह, मनुष्य को तो पृथ्वी पर स्थायी निवास की भी कभी कामना नहींकरनी चाहिए क्योंकि भौतिक देह में ऐसी तल्लीनता से मनुष्य अपने वास्तविक आत्म-हित केप्रति मूर्खतावश उपेक्षा बरतने लगता है।

एतद्विद्वान्पुरा मृत्योरभवाय घटेत सः ।अप्रमत्त इदं ज्ञात्वा मर्त्यमप्यर्थसिद्धिदम्‌ ॥

१४॥

एतत्‌--यह; विद्वानू--जानते हुए; पुरा--पहले; मृत्यो:--मृत्यु; अभवाय--जगत को लाँघने के लिए; घटेत--कार्य करे; सः--वह; अप्रमत्त:--आलस्य या मूर्खता से रहित; इदम्‌--यह; ज्ञात्वा--जान कर; मर्त्यमू--मरणशील; अपि--यद्यपि; अर्थ--जीवन-लक्ष्य का; सिद्धि-दम्‌--सिद्धि देने वाला

यह जानते हुए कि यद्यपि भौतिक शरीर मर्त्य है, तो भी यह उसे जीवन-सिद्धि प्रदान करसकता है, विद्वान व्यक्ति को मूर्खतावश मृत्यु आने के पूर्व इस अवसर का लाभ उठाने में उपेक्षानहीं बरतनी चाहिए।

छिद्यमानं यमैरेतै: कृतनीडं वनस्पतिम्‌ ।खगः स्वकेतमुत्सूज्य क्षेमं याति ह्ालम्पट: ॥

१५॥

छिद्यममानम्‌--काटे जाकर; यमै:--क्रूर पुरुषों द्वारा जो साक्षात्‌ मृत्यु सरीखे हैं; एतैः--इन; कृत-नीडम्‌--जिसमें उसने घोंसलाबना रखा है; वनस्पतिम्‌--वृक्ष; खग:--पक्षी; स्व-केतम्‌--उसका घर; उत्सृज्य--त्याग करके; क्षेमम्‌ू--सुख; याति--प्राप्तकरता है; हि--निस्सन्देह; अलम्पट:--आसक्तिरहित।

जब साक्षात्‌ मृत्यु रूपी क्रूर पुरुषों द्वारा वह वृक्ष काट दिया जाता है, जिसमें किसी पक्षी काघोंसला बना था, तो वह पक्षी बिना किसी आसक्ति के उस वृक्ष को त्याग देता है और इस तरहवह अन्य स्थान में सुख का अनुभव करता है।

अहोरात्रैश्छिद्यमानं बुद्ध्वायुर्भयवेषथु: ।मुक्तसडु: परं बुद्ध्वा निरीह उपशाम्यति ॥

१६॥

अहः--िन; रात्रै:--तथा रातों से; छिद्यमानम्‌--काटा जाता हुआ; बुद्ध्वा--जान कर; आयु:--उप्र; भय-- भय से; वेपथु: --कम्पमान; मुक्त-सड्भ:--आसक्तिरहित; परम्‌-परमेश्वर; बुद्ध्वा--समझ कर; निरीह:-- भौतिक इच्छा से रहित; उपशाम्यति--पूर्ण शान्ति प्राप्त करता है।

यह जानते हुए कि मेरी आयु दिन-रात बीतने के साथ क्षीण होती जा रही है, मनुष्य को भयसे काँपना चाहिए। इस तरह सारी भौतिक आसक्ति तथा इच्छा त्याग कर, वह भगवान्‌ कोसमझने लगता है और परम शान्ति प्राप्त करता है।

नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभंप्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम्‌ ।मयानुकूलेन नभस्वतेरित॑पुमान्भवाब्धि न तरेत्स आत्महा ॥

१७॥

न्रू--मानव; देहम्‌--शरीर; आद्यमू--समस्त अनुकूल फलों का उद्गम; सु-लभम्‌--बिना प्रयास के प्राप्त; सु-दुर्लभम्‌--यद्यपिमहान्‌ प्रयल से भी प्राप्त कर पाना असम्भव है; प्लवम्‌--नाव; सु-कल्पम्‌--अपने उद्देश्य के लिए सर्वथा अनुकूल; गुरु--गुरु;कर्ण-धारम्‌--नाव के माँझी के समान; मया--मेंरे द्वारा; अनुकूलेन--अनुकूल; नभस्वता--वायु द्वारा; ईरितम्‌--बहाई जाकर;पुमान्‌ू--पुरुष; भव--संसार के; अब्धिम्--समुद्र; न--नहीं; तरेत्‌ू--पार करता है; सः--वह; आत्म-हा--अपनी ही आत्मा काहनन करने वाला, आत्महंता।

जीवन का समस्त लाभ प्रदान करने वाला मानव शरीर प्रकृति के नियमों द्वारा स्वतः प्राप्तहोता है यद्यपि यह अत्यन्त दुर्लभ है। इस मानव शरीर की तुलना उस सुनिर्मित नाव से की जासकती है, जिसका माँझी गुरु है और भगवान्‌ के आदेश वे अनुकूल हवाएँ हैं, जो उसे आगेबढ़ाती हैं। इन सारे लाभों पर विचार करते हुए जो मनुष्य अपने जीवन का उपयोग संसाररूपीसागर को पार करने में नहीं करता, उसे अपने ही आत्मा का हन्ता माना जाना चाहिए।

यदारम्भेषु निर्विण्णो विरक्त: संयतेन्द्रियः ।अभ्यासेनात्मनो योगी धारयेदचलं मनः ॥

१८॥

यदा--जब; आरम्भेषु-- भौतिक प्रयत्नों में; निर्विणण:--निराश; विरक्त:--विरक्त; संयत--पूरी तरह नियंत्रित; इन्द्रियः--इन्द्रियाँ; अभ्यासेन-- अभ्यास से; आत्मन:--आत्मा का; योगी--योगी; धारयेत्‌--एकाग्र करे; अचलम्‌--स्थिर; मन:--मन

भौतिक सुख के लिए समस्त प्रयासों से ऊब कर तथा निराश होकर, जब योगी इन्द्रियों कोपूरी तरह नियंत्रित करके विरक्ति उत्पन्न कर ले, तब उसे आध्यात्मिक अभ्यास द्वारा अपने मन कोअविचल भाव से आध्यात्मिक पद पर स्थिर करना चाहिए।

धार्यमाणं मनो यर्हि भ्राम्यदश्वनवस्थितम्‌ ।अतन्द्रितोनुरोधेन मार्गेणात्मवशं नयेत्‌ ॥

१९॥

धार्यमाणम्‌--आध्यात्मिक पद पर एकाग्र ( स्थिर ) होकर; मन:--मन; यहिं--जब; भ्राम्यत्‌ू-- भटकता है; आशु--सहसा;अनवस्थितम्‌--आध्यात्मिक पद पर स्थित न होकर; अतन्द्रितः--सावधानीपूर्वक; अनुरोधेन--नियत नियमों के अनुसार;मार्गेण--विधि द्वारा; आत्म--अपने; वशम्‌--नियंत्रण में; नयेत्‌--ले आये।

जब भी आध्यात्मिक पद पर एकाग्र मन सहसा अपने आध्यात्मिक पद से भटके, तो मनुष्यको चाहिए कि वह सावधानी से नियत साधनों के सहारे उसे अपने वश में कर ले।

मनोगतिं न विसृजेज्जितप्राणो जितेन्द्रियः ।सत्त्वसम्पन्नया बुद्धया मन आत्मवशं नयेत्‌ ॥

२०॥

मनः--मन का; गतिमू--लक्ष्य; न--नहीं; विसृजेत्‌ू-- ओझल होने दे; जित-प्राण:--जिसने श्वास को जीत लिया है; जित-इन्द्रियः--जिसने इन्द्रियों को जीत लिया है; सत्त्त--सतोगुण का; सम्पन्नया--सम्पन्नता से युक्त; बुद्धया--बुद्ध्धि से; मन:ः--मन;आत्म-वशम्‌--अपने वश में; नयेत्‌--लाये।

मनुष्य को चाहिए कि मानसिक कार्यों के वास्तविक लक्ष्य को दृष्टि से ओझल न होने दे,प्रत्युत प्राण-वायु तथा इन्द्रियों पप विजय पाकर तथा सतोगुण से प्रबलित बुद्धि का उपयोगकरके, मन को अपने वश्ञ में कर ले।

एष वै परमो योगो मनसः सड्ग्रहः स्मृतः ।हृदयज्ञत्वमन्विच्छन्दम्यस्थेवार्वतो मुहु: ॥

२१॥

एष:--यह; वै--निस्सन्देह; परम: -- परम; योग: --योग-विधि; मनसः --मन का; सड़्ग्रहः--पूर्ण नियंत्रण; स्मृत:--इस प्रकारघोषित; हृदय-ज्ञत्वम्‌ू-घनिष्ठतापूर्वक जानने का गुण; अन्विच्छन्‌--सावधानी से देखते हुए; दम्यस्य--जिसका दमन कियाजाना है; इब--सहश; अर्वतः--घोड़े; मुहुः--सदैव |

एक दक्ष घुड़सवार तेज घोड़े को पालतू बनाने की इच्छा से सर्वप्रथम घोड़े को क्षण-भरउसकी राह चलने देता है, तब लगाम खींच कर धीरे धीरे उसे इच्छित राह पर ले आता है। इसीप्रकार परम योग-विधि वह है, जिससे मनुष्य मन की गतियों तथा इच्छाओं का सावधानी सेअवलोकन करता है और क्रमशः उन्हें पूर्ण वश में कर लेता है।

साड्ख्येन सर्वभावानां प्रतिलोमानुलोमतः ।भवाप्ययावनुध्यायेन्मनो यावत्प्रसीदति ॥

२२॥

साड्ख्येन--वैश्लेषिक अध्ययन द्वारा; सर्व--समस्त; भावानामू-- भौतिक तत्त्वों ( विराट, पार्थिव तथा सूक्ष्म ) का; प्रतिलोम--उल्टे कार्य द्वारा; अनुलोमत:--अग्रसर कार्य द्वारा; भव--सृष्टि; अप्ययौ--संहार; अनुध्यायेत्‌--निरन्तर अवलोकन करे; मनः--मन; यावत्‌--जब तक; प्रसीदति--आध्यात्मिक रूप से तुष्ट नहीं हो जाता।

जब तक मनुष्य का मन आध्यात्मिक तुष्टि प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक उसे समस्त भौतिकवस्तुओं की नश्वर प्रकृति का, चाहे वे विराट विश्व की हों, पृथ्वी की हों या सूक्ष्म हों, वैशलेषिकअध्ययन करते रहना चाहिये। उसे सृजन का अनुलोम विधि से और संहार का प्रतिलोम विधि सेनिरन्तर अवलोकन करना चाहिए।

निर्विण्णस्य विरक्तस्य पुरुषस्योक्तवेदिन: ।मनस्त्यजति दौरात्म्यं चिन्तितस्यानुचिन्तया ॥

२३॥

निर्विण्णस्य-- भौतिक जगत के मोहमय स्वभाव से ऊबे, उद्विग्न; विरक्तस्य--तथा विरक्त; पुरुषस्य--पुरुष का; उक्त-वेदिन:--अपने गुरु के आदेशों से नियंत्रित व्यक्ति; मन:--मन; त्यजति--त्याग देता है; दौरात्म्यम्‌ू-- भौतिक शरीर तथा मन सेझूठी पहचान; चिन्तितस्थ--सोचे हुए का; अनुचिन्तया--निरन्तर विश्लेषण द्वाराजब कोई व्यक्ति इस जगत के नश्वर तथा मोहमय स्वभाव से ऊब उठता है और इस तरहउससे विरक्त हो जाता है, तो उसका मन अपने गुरु के आदेशों से मार्गदर्शन पाकर, इस जगत केस्वभाव के बारे में बारम्बार विचार करता है और अन्त में पदार्थ के साथ अपनी झूठी पहचानको त्याग देता है।यमादिभियोंगपथेरान्वीक्षिक्या च विद्यया ।ममार्चोपासनाभिर्वा नान्यैर्योग्यं स्मरेन्मन: ॥

२४॥

यम-आदिभि:--अनुशासनात्मक नियमों आदि के द्वारा; योग-पथै:ः--योग-प्रणाली की विधियों द्वारा; आन्वीक्षिक्या--तर्कद्वारा; च--भी; विद्यया--आध्यात्मिक ज्ञान द्वारा; मम--मेरी; अर्चा--पूजा; उपाषनाभि:--उपासना द्वारा; वा--अथवा; न--कभी नहीं; अन्यैः--अन्य ( साधनों ) द्वारा; योग्यमू-- ध्यान की वस्तु, भगवान्‌ पर; स्मरेतू--एकाग्र करे; मनः--मन।

मनुष्य को चाहिए कि योग-प्रणाली के विभिन्न यमों तथा संस्कारों द्वारा, तर्क तथाआध्यात्मिक शिक्षा द्वारा अथवा मेरी पूजा और उपासना द्वारा, योग के लक्ष्य भगवान्‌ के स्मरणमें अपने मन को लगाये। इस कार्य के लिए वह अन्य साधनों का प्रयोग न करे।

यदि कुर्यात्प्रमादेन योगी कर्म विगर्हितम्‌ ।योगेनैव दहेदंहो नान्यत्तत्र कदाचन ॥

२५॥

यदि--यदि; कुर्यात्‌--करे; प्रमादेन--उपेक्षा के कारण; योगी--योगी; कर्म--कोई कार्य; विगर्हितम्‌--निन्दनीय; योगेन--योग-विधि द्वारा; एब--एकमात्र; दहेत्‌ू--जला दे; अंह:--वह पाप; न--नहीं; अन्यत्‌--अन्य साधनों से; तत्र--इस मामले में;कदाचन--कभी भी।

यदि क्षणिक असावधानी से कोई योगी अकस्मात्‌ कोई गर्हित ( निन्दित ) कर्म कर बैठताहै, तो उसे चाहिए कि वह योगाभ्यास द्वारा उस पाप को कभी भी किसी अन्य विधि का प्रयोगकिए बिना जला डाले।

स्वे स्वेईधिकारे या निष्ठा स गुण: परिकीर्तितः ।कर्मणां जात्यशुद्धानामनेन नियम: कृतः ।गुणदोषविधानेन सड्जानां त्याजनेच्छया ॥

२६॥

स्वे स्वे--अपने अपने; अधिकारे--पद पर; या--जो; निष्ठा--स्थायी अभ्यास; स:ः--वह; गुण:--पुण्य; परिकीर्तित:--ठीक सेघोषित; कर्मणाम्‌--सकाम कर्मों का; जाति--स्वभाव से; अशुद्धानाम्‌-- अशुद्ध; अनेन--इससे; नियम:--अनुशासनात्मकनियंत्रण; कृतः--स्थापित किया जाता है; गुण--पुण्य का; दोष--पाप का; विधानेन--नियम द्वारा; सड्भानामू--विभिन्न प्रकारकी इन्द्रियतृप्ति की संगति से; त्याजन--विरक्ति की; इच्छया--इच्छा से

यह हढ़तापूर्वक घोषित है कि योगियों का अपने अपने आध्यात्मिक पदों पर निरन्तर बनेरहना असली पुण्य है और जब कोई योगी अपने नियत कर्तव्य की अवहेलना करता है, तो वहपाप होता है। जो पाप तथा पुण्य के इस मानदण्ड को, इन्द्रियतृप्ति के साथ समस्त पुरानी संगतिको सच्चे दिल से त्यागने की इच्छा से अपनाता है, वह भौतिकतावादी कर्मों को वश में करलेता है, जो स्वभाव से अशुद्ध होते हैं।

जातश्रद्धो मत्कथासु निर्विण्ण: सर्वकर्मसु ।वेद दुःखात्मकान्कामान्परित्यागेप्यनी श्वर: ॥

२७॥

ततो भजेत मां प्रीतः श्रद्धालुर्टढनिश्चय: ।जुषमाणश्च तान्कामान्दु:खोदर्काश्च गहयन्‌ ॥

२८ ॥

जात--जागृत; श्रद्धः--श्रद्धा; मत्‌ू-कथासु--मेरे यश के वर्णनों में; निर्विण्ण:--ऊबा हुआ; सर्व--सभी; कर्मसु--कामों में;वेद--जानता है; दुःख--दुख; आत्मकानू--से निर्मित; कामान्‌ू--सभी प्रकार की इन्द्रियतृप्ति; परित्यागे--परित्याग करने में;अपि--यद्यपि; अनी श्वर: --असमर्थ; ततः --ऐसी श्रद्धा के कारण; भजेत--पूजा करे; माम्‌--मेरी; प्रीत:--सुखी रहते हुए;श्रद्धालु;--श्रद्धावान्‌; हढ--पक्का; निश्चयः--संकल्प; जुषमाण: --में संलग्न; च-- भी; तानू--उन; कामान्‌--इन्द्रियतृप्ति;दुःख--दुख; उदर्कान्‌ू-देने वाले; च-- भी; गहयन्‌--के लिए पश्चाताप करते हुए।

मेरे यश की कथाओं में श्रद्धा उत्पन्न करके, सारे भौतिक कार्यो से ऊब कर और यह जानतेहुए भी कि सभी प्रकार की इन्द्रियतृप्ति दुखदायी है, किन्तु इन्द्रिय-भोग त्याग पाने में असमर्थ,मेरे भक्त को चाहिए कि वह सुखी रहे और अत्यन्त श्रद्धा तथा पूर्ण विश्वास के साथ मेरी पूजाकरे। कभी कभी इन्द्रिय-भोग में लगे रहते हुए भी, मेरा भक्त जानता है कि समस्त प्रकार कीइन्द्रियतृप्ति का परिणाम दुख है और वह ऐसे कार्यों के लिए सच्चे दिल से पश्चाताप करता है।

प्रोक्तेन भक्तियोगेन भजतो मासकृन्मुने: ।'कामा हृदय्या नशएयन्ति सर्वे मयि हृदि स्थिते ॥

२९॥

प्रोक्तेन--कही गईं; भक्ति-योगेन--भक्ति द्वारा; भजत:--पूजा करते हुए; मा--मुझको; असकृत्‌--निरन्तर; मुनेः--मुनि की;'कामाः--भौतिक इच्छाएँ; हृदय्या:--हृदय में; नश्यन्ति--नष्ट हो जाती हैं; सर्वे--सभी; मयि--मुझमें; हृदि--जब हृदय;स्थिते--हढ़ता से स्थित है।

जब बुद्धिमान व्यक्ति मेरे द्वारा बताई गई प्रेमाभक्ति के द्वारा निरन्तर मेरी पूजा करने में लगजाता है, तो उसका हृदय हृढ़तापूर्वक मुझ में स्थित हो जाता है। इस तरह उसके हृदय के भीतरकी सारी भौतिक इच्छाएँ नष्ट हो जाती हैं।श़ भिद्यते हृदयग्रन्थिए्छिद्यन्ते सर्वसंशया: ।क्षीयन्ते चास्य कर्माणि मयि दृष्टेडरिखलात्मनि ॥

३०॥

भिद्यते--टूट कर, छेद कर; हदय--हृदय; ग्रन्थि:--गाँठें; छिद्यन्ते--खण्ड खण्ड कर; सर्व--सभी; संशया:--आशंकाएँ;क्षीयन्ते--समाप्त हो जाती हैं; च--तथा; अस्य--उसके; कर्मणि--कर्मों की श्रृंखला; मयि--जब मैं; दृष्टे--दिखता हूँ;अखिल-आत्मनि-- भगवान्‌ के रूप में |

जब मैं उसे भगवान्‌ के रूप में दिखता हूँ, तो उसके हृदय की गाँठ खुल जाती है, सारे संशयछिन्न-भिन्न हो जाते हैं तथा सकाम कर्मो की श्रृंखला समाप्त हो जाती है।

तस्मान्मद्धक्तियुक्तस्थ योगिनो वै मदात्मनः ।नज्ञानं न च वैराग्यं प्रायः श्रेयो भवेदिह ॥

३१॥

तस्मातू--इसलिए; मत्‌-भक्ति-युक्तस्थ--मेरी प्रेमाभक्ति में लगे रहने वाले का; योगिन:--भक्त का; बै--निश्चय ही; मत्‌ू-आत्मन:--जिसका मन मुझ में स्थिर है; न--नहीं; ज्ञाममू--ज्ञान का अनुशीलन; न--न तो; च-- भी; वैराग्यम्‌--वैराग्य काअनुशीलन; प्राय: --सामान्यतया; श्रेयः:--सिद्धि प्राप्त करने के साधन; भवेत्‌--होए; इह--इस जगत में |

इसलिए वह भक्त जो मुझ पर अपना मन स्थिर करके मेरी प्रेमाभक्ति में लगा रहता है, उसकेलिए ज्ञान का अनुशीलन तथा वैराग्य सामान्यतया इस जगत में सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करने केसाधन नहीं हैं।

यत्कर्मभिर्यत्तपसा ज्ञानवैराग्यतश्न यत्‌ ।योगेन दानधर्मेण श्रेयोभिरितररषि ॥

३२॥

सर्व मद्धक्तियोगेन मद्धक्तो लभतेञ्ञसा ।स्वर्गापवर्ग मद्धाम कथजञ्ञिद्यदि वाउ्छति ॥

३३॥

यत्‌ू--जो प्राप्त किया जाता है; कर्मभिः--सकाम कर्म द्वारा; यत्‌ू--जो; तपसा--तपस्या से; ज्ञान--ज्ञान के अनुशीलन से;वैराग्यत:ः--वैराग्य से; च-- भी; यत्‌--जो प्राप्त किया जाता है; योगेन--योग-प्रणाली द्वारा; दान--दान से; धर्मेण-- धार्मिककार्यों से; श्रेयोभि:--जीवन को शुभ बनाने की विधियों से; इतरैः--अन्यों द्वारा; अपि--निस्सन्देह; सर्वम्‌--समस्त; मत्‌-भक्ति-योगेन--मेरी प्रेमाभक्ति द्वारा; मतू-भक्त:--मेरा भक्त; लभते--प्राप्त करता है; अज्लआ--अनायास; स्वर्ग--स्वर्ग जाना;अपवर्गम्‌--सारे कष्ट से मोक्ष; मत्‌-धाम--मेरे धाम में निवास; कथज्जित्‌--किसी न किसी तरह; यदि--यदि; वज्छति--चाहताहै

इन सारी वस्तुओं को जो सकाम कर्म, तपस्या, ज्ञान, वैराग्य, योग, दान, धर्म तथा जीवनको पूर्ण बनाने वाले अन्य सारे साधनों से प्राप्त की जाती हैं, मेरा भक्त मेरे प्रति भक्ति सेअनायास प्राप्त कर लेता है। यदि मेरा भक्त किसी न किसी तरह स्वर्ग जाने, मोक्ष या मेरे धाम मेंनिवास करने की इच्छा करता है, तो वह ऐसे वर सरलता से प्राप्त कर लेता है।

न किश्ञित्साधवो धीरा भक्ता होकान्तिनो मम ।वाउछन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम्‌ ॥

३४॥

न--कभी नहीं; किल्ञित्‌ू--कुछ भी; साधव:--सन्त पुरुष; धीरा:--गहन बुद्धि से; भक्ता:--भक्तगण; हि--निश्चय ही;एकान्तिन:--पूर्णतया विरक्त; मम--मुझको; वाउछन्ति--चाहते हैं; अपि--निस्सन्देह; मया--मेरे द्वारा; दत्तम्‌ू--दिया हुआ;कैवल्यम्‌--मोक्ष; अपुन:-भवम्‌--जन्म तथा मृत्यु से छुटकारा

चूँकि मेरे भक्तमण साधु आचरण के तथा गम्भीर बुद्धि वाले होते हैं, इसलिए वे अपने आपको पूरी तरह मुझमें समर्पित कर देते हैं और मेरे अतिरिक्त कुछ भी नहीं चाहते। यहाँ तक कियदि मैं उन्हें जन्म-मृत्यु से मुक्ति भी प्रदान करता हूँ, तो वे इसे स्वीकार नहीं करते।

नैरपेक्ष्यं परं प्राहुर्नि:श्रेयसमनल्पकम्‌ ।तस्मान्निराशिषो भक्तिर्निरपेक्षस्थ मे भवेत्‌ ॥

३५॥

नैरपेक्ष्यमू-- भक्ति के अतिरिक्त कुछ भी न चाहने वाला; परम्‌--सर्वश्रेष्ठ; प्राहु:--कहा जाता है; नि: श्रेयसम्‌--मोक्ष की सर्वोच्चअवस्था; अनल्पकम्‌-महान्‌; तस्मात्‌ू--इसलिए; निराशिष:--निजी लाभ न चाहने वाले की; भक्ति: --प्रेमा भक्ति;निरपेक्षस्थ--मुझे ही देखने वाले का; मे--मुझ तक; भवेत्‌--उठ सकता है।

कहा जाता है कि पूर्ण विरक्ति स्वतंत्रता की सर्वोच्च अवस्था है। इसलिए जिसकी कोईनिजी इच्छा नहीं होती और जो निजी लाभ के पीछे नहीं भागता, वह मेरी प्रेमाभक्ति प्राप्त कर सकता है।

न मस्येकान्तभक्तानां गुणदोषोद्धवा गुणा: ।साधूनां समचित्तानां बुद्धेः परमुपेयुषाम्‌ ॥

३६॥

न--नहीं; मयि--मुझमें; एक-अन्त--शुद्ध; भक्तानामू- भक्तों का; गुण--अच्छे के रूप में संस्तुत; दोष--अनुपयुक्त के रूपमें वर्जित; उद्धवा:--ऐसी वस्तुओं से उत्पन्न; गुणा:--पाप तथा पुण्य; साधूनामू-- भौतिक लालसाओं से मुक्त लोगों के; सम-चित्तानामू--सभी परिस्थितियों में स्थिर आध्यात्मिक चेतना बनाये रखने वालों के; बुद्धेः--भौतिक बुद्धि से समझा जा सकनेवाला; परम्‌--परे; उपेयुषाम्‌--प्राप्त कर लेने वालों के

इस जगत के अच्छे तथा बुरे से उत्पन्न भौतिक पुण्य तथा पाप मेरे शुद्ध भक्तों के अन्तःकरणमें नहीं रह सकते क्‍योंकि वे भौतिक लालसा से मुक्त होने के कारण सभी परिस्थितियों मेंआध्यात्मिक चेतना स्थिर बनाये रखते हैं। निस्सन्देह, ऐसे भक्तों ने भौतिक बुद्धि से अतीत मुझभगवान्‌ को पा लिया है।

एवमेतान्मया दिष्टाननुतिष्ठन्ति मे पथ: ।क्षेमं विन्दन्ति मत्स्थानं यद्वृह्य परमं विदु: ॥

३७॥

एवम्‌--इस प्रकार; एतान्‌ू--ये; मया--मेरे द्वारा; दिष्टान्‌-- आदेश दिये; अनुतिष्ठन्ति--पालन करते हैं; मे--मुझको; पथ:--प्राप्त करने का साधन; क्षेमम्‌ू--मोह से छुटकारा; विन्दन्ति--प्राप्त करते हैं; मत्‌-स्थानम्‌--मेरा धाम; यत्‌--जो; ब्रह्म परमम्‌--परब्रह्म; विदुः--जानते हैं

जो लोग मेरे द्वारा सिखलाये गये, मुझे प्राप्त करने के इन नियमों का गम्भीरता से पालनकरते हैं, वे मोह से छुटकारा पा लेते हैं और मेरे धाम में पहुँचने पर वे परब्रह्म को भलीभाँतिसमझते हैं।

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