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अध्याय एक: यदु वंश पर अभिशाप
11.1श्रीशुक उबाचकृत्वा दैत्यवधं कृष्ण: सरामो यदुभिर्वृतः ।
भुवोवतारयद्धारं जविष्ठं जनयन्कलिम् ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुक ने कहा; कृत्वा--सम्पन्न करने के बाद; दैत्य--असुरों का; वधम्--वध; कृष्ण: -- भगवान् कृष्णने; स-राम:--बलराम समेत; यदुभि:--यदुओं द्वारा; वृत:--घिरे हुए; भुवः--पृथ्वी के; अवतारयत्ू--कम कर दिया; भारम्--भार को; जविष्ठम्-हिंसा कराने वाले; जनयन्--उत्पन्न करते हुए; कलिम्--कलह की स्थिति।
श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : भगवान् श्रीकृष्ण ने बलराम से मिलकर तथा यदुवंशियो सेघिरे रह कर अनेक असुरों का वध किया।
तत्पश्चात्, पृथ्वी का और भार हटाने के लिए भगवान्ने कुरुक्षेत्र के उस महान् युद्ध की योजना की, जो कुरुओं तथा पाण्डवों के बीच सहसा हिंसाके रूप में भड़क उठा।
"
ये कोपिता: सुबहु पाण्डुसुता: सपत्नैर्दुर्यृूतहेलनकचग्रहणादिभिस्तान् ।
कृत्वा निमित्तमितरेतरतः समेतान्हत्वा नृपान्निरहरत्क्षितिभारमीश: ॥
२॥
ये--वे जो; कोपिता:--क्रुद्ध थे; सु-बहु--बारम्बार; पाण्डु-सुता:--पाण्डु के पुत्र; सपत्नैः--अपने शत्रुओं द्वारा; दुः-द्यूत--'कपटपूर्ण जुआ खेलने से; हेलन--अपमान; कच-ग्रहण--( द्रौपदी के ) केश का खींचा जाना; आदिभि:--इत्यादि के द्वारा;तान्ू--उन ( पाण्डवों ) को; कृत्वा--बनाकर; निमित्तम्--कारण; इतर-इतरत:--एक दूसरे के आमने-सामने; समेतान्ू--एकत्रहुए; हत्वा--मार करके ; नूपान्ू--राजाओं को; निरहरत्--सदैव के लिए हटा दिया; क्षिति--पृथ्वी के; भारम्-- भार को;ईशः--पर से श्वर ने |
चूँकि पाण्डुपुत्र अपने शत्रुओं के अनेकानेक अपराधों से यथा कपटपूर्ण जुआ खेलने,बचनों द्वारा अपमान, द्रौपदी के केशकर्षण तथा अन्य अनेक क्रूर अत्याचारों से क्रुद्ध थे,इसलिए परमेश्वर ने उन पाण्डवों को अपनी इच्छा पूरी करने के लिए कारण-रूप में उपयोगकिया।
भगवान् कृष्ण ने कुरुक्षेत्र युद्ध के बहाने पृथ्वी पर भार बन रहे सारे राजाओं को अपनीअपनी सेनाओं समेत युद्धभूमि में दोनों ओर से एकत्र कराने की व्यवस्था की और जब भगवान्ने उन्हें युद्ध के माध्यम से मार डाला, तो पृथ्वी का भार हलका हो गया।
"
भूभारराजपृतना यदुभिर्निरस्यगुप्तैः स्वबाहुभिरचिन्तयदप्रमेय: ।
मन्येउवनेर्ननु गतोप्यगतं हि भारंयद्यादवं कुलमहो अविषह्ामास्ते ॥
३॥
भू-भार--पृथ्वी के भार स्वरूप; राज--राजाओं की; पृतना:--सेनाएँ; यदुभि:--यदुओं द्वारा; निरस्थ--हटाकर; गुप्तैः:--रक्षित; स्व-बहुभि:--अपनी भुजाओं द्वारा; अचिन्तयत्--उन्होंने विचार किया; अप्रमेय:--अगाध भगवान्; मन्ये--मैं सोचताहूँ; अवनेः--पृथ्वी के; ननु--कोई कह सकता है; गतः--चले जाने पर; अपि--लेकिन; अगतम्--न गया हुआ; हि--निस्सन्देह; भारम्-- भार; यत्-- क्योंकि; यादवम्--यदु के; कुलम्--कुल को; अहो--ओह; अविषह्ामम्--- असहा; आस्ते--पा
भगवान् ने अपने बाहुओं द्वारा संरक्षित यदुवंश का प्रयोग उन राजाओं का सफाया करने केलिए किया, जो अपनी सेनाओं सहित इस पृथ्वी के लिए भार बने हुए थे।
तत्पश्चात् अगाधभगवान् ने मन ही मन सोचा, भले ही कोई यह कहे कि अब पृथ्वी का भार समाप्त हो गया है,किन्तु मेरे मत से यह अब भी दूर नहीं हुआ, क्योंकि अब भी यादव-वंश बचा हुआ है, जिसकीशक्ति पृथ्वी के लिए असहनीय है।
"
नैवान्यतः परिभवोस्य भवेत्कथश्निन्मत्संश्रयस्य विभवोन्नहनस्य नित्यम् ।
अन्तः कलिं यदुकुलस्य विधाय वेणुस्तम्बस्य वह्निमिव शान्तिमुपैमि धाम ॥
४॥
न--नहीं; एव--निश्चय ही; अन्यत:--अन्य कारण से; परिभव:--हार; अस्य--इस ( वंश ) की; भवेत्--हो सकती है;कथश्चित्--किसी भी तरह से; मत्ू-संश्रयस्थ--मेंरे शरणागत की; विभव--अपनी शक्ति के; उन्नहनस्य--असीम; नित्यम्ू--सदैव; अन्तः-- भीतर; कलिमू--कलह; यदु-कुलस्य--यदुवंश का; विधाय--प्रोत्साहित करके; वेणु-स्तम्बस्य--बाँस केकुंज की; वहिमू-- आग; इब--मानो; शान्तिमू--शान्ति; उपैमि-- प्राप्त करूँगा; धाम--अपना निजी नित्य वासस्थान।
भगवान् कृष्ण ने सोचा, 'इस यदुवंश के सदस्य सदैव मेरे पूरी तरह से शरणागत रहे हैं औरइनका ऐश्वर्य असीम है, अतः कोई भी बाहरी ताकत इस वंश को पराजित नहीं कर पाई।
किन्तुयदि मैं इस वंश के भीतर कलह को प्रोत्साहित करूँ, तो वह कलह बाँस के कुंज में घर्षण से उत्पन्न अग्नि की तरह कार्य करेगा।
तब मैं अपना असली मन्तव्य प्राप्त करके अपने नित्य धामको लौट सकूँगा।
"
एवं व्यवसितो राजन्सत्यसड्डूल्प ईश्वर: ।
शापतव्याजेन विप्राणां सझझह् स्वकुलं विभु: ॥
५॥
एवम्--इस प्रकार; व्यवसित:--निश्चय करते हुए; राजन्--हे राजा; सत्य-सड्डूल्प:--जिसकी इच्छा सदैव सच सिद्ध है;ईश्वरः--भगवान् ने; शाप-व्याजेन--शाप के बहाने; विप्राणाम्ू--ब्राह्मणों के; सझ्ह्े--समेट लिया; स्व-कुलम्--अपने वंशको; विभुः--सर्वशक्तिमान |
हे राजा परीक्षित, जब परम शक्तिशाली भगवान् ने, जिनकी इच्छा सदैव पूरी होकर रहती है,इस प्रकार अपने मन में निश्चय कर लिया, तो उन्होंने ब्राह्मणों की सभा द्वारा दिये गये शाप केबहाने अपने परिवार को समेट लिया।
"
स्वमूर्त्या लोकलावण्यनिर्मुक्त्या लोचनं नृणाम् ।
गीर्भिस्ता: स्मरतां चित्तं पदैस्तानीक्षतां क्रिया: ॥
६॥
आच्छिद्य कीर्ति सुश्लोकां वितत्य हाञ़्सा नु कौ ।
तमोनया तरिष्यन्तीत्यगात्स्वं पदमी श्वर: ॥
७॥
स्व-मूर्त्या--अपने ही स्वरूप से; लोक--सारे जगतों के; लावण्य--सौन्दर्य; निर्मुक्त्या--खींच लेने वाले; लोचनमू--नेत्रों को;नृणाम्-मनुष्यों के; गीर्मिः --उसके शब्दों से; ता: स्मरताम्--उनका स्मरण करने वालों के; चित्तम्ू--मन को; पदैः--अपनेचरणों से; तान् ईक्षताम्--उन्हें देखने वालों के; क्रिया:--शारीरिक कार्य ( चलना, फिरना इत्यादि ) ); आच्छिद्य--आकर्षितकरके; कीर्तिमू--उसकी कीर्ति को; सु-श्लोकाम्--सर्व श्रेष्ठ श्लोकों द्वारा प्रशंसित; वितत्य--प्रसार करके; हि--निश्चय ही;अज्जसा--सरलतापूर्वक; नु--निस्सन्देह; कौ--पृथ्वी पर; तम:ः--अज्ञान; अनया--उस ( कीर्ति ) द्वारा; तरिष्यन्ति--लोग पारकर जाते हैं; इति--इस प्रकार सोचकर; अगातू-- प्राप्त किया; स्वम् पदम्-- अपना इच्छित स्थान; ईश्वरः -- भगवान् ने
भगवान् कृष्ण समस्त सौन्दर्य के आगार हैं।
सारी सुन्दर वस्तुएँ उन्हीं से निकलती हैं औरउनका स्वरूप इतना आकर्षक है कि वह अन्य सारी वस्तुओं से आँखों को हटा देता है, अतः जोउनकी तुलना में सौन्दर्यविहीन प्रतीत होती हैं।
जब भगवान् कृष्ण इस पृथ्वी पर थे, तो वे सबोंके नेत्रों को आकर्षित कर लेते थे।
जब कृष्ण बोलते थे, तो उनके शब्द उन सबों के मन कोआकृष्ट कर लेते थे, जो उनका स्मरण करते थे।
लोग कृष्ण के चरणचापों को देखकर आकृष्टहो जाते थे और अपने शारीरिक कार्यों को वे उनके अनुयायी बनकर उन्हें ही अर्पित करने कीइच्छा करने लगते थे।
इस तरह कृष्ण ने आसानी से अपनी कीर्ति का विस्तार कर लिया था,जिसका गायन अत्यन्त वदान्य एवं अनिवार्य वैदिक श्लोकों के रूप में विश्व-भर में किया जाताहै।
भगवान् कृष्ण मानते थे कि इस कीर्ति का श्रवण तथा कीर्तन करने से ही भविष्य में जन्मलेने वाले बद्धजीव अज्ञान के अंधकार को पार कर सकेंगे।
इस व्यवस्था से तुष्ट होकर वे अपनेइच्छित गन्तव्य के लिए विदा हो गये।
"
श्रीराजोबाचब्रह्मण्यानां वदान्यानां नित्यं वृद्धोपसेविनाम् ।
विप्रशाप: कथमभूद्गष्णीनां कृष्णचेतसाम् ॥
८ ॥
श्री-राजा उवाच--राजा ने कहा; ब्रह्मण्यानाम्ू--ब्राह्मणों के प्रति आदर-भाव रखने वालों का; वदान्यानाम्ू--दान देने वालोंका; नित्यम्ू--सदैव; वृद्ध-उपसेविनाम्--वृद्धजनों की सेवा करने वालों का; विप्र-शाप:--ब्राह्मणों का शाप; कथम्--कैसे;अभूत्--घटित हुआ; वृष्णीनाम्--वृष्णियों का; कृष्ण-चेतसाम्-कृष्ण के विचार में मग्न मन वालों का।
राजा परीक्षित ने पूछा : ब्राह्मणों ने उन वृष्णियों को कैसे शाप दिया, जो ब्राह्मणों के प्रतिसदैव आदर-भाव रखते थे, दानी थे और वृद्ध तथा सम्मानित पुरुषों की सेवा करते थे तथाजिनके मन सदैव कृष्ण के विचारों में पूरी तरह लीन रहते थे ?" यन्निमित्त: स वै शापो याहशो द्विजसत्तम ।
कथमेकात्मनां भेद एतत्सर्व वदस्व मे ॥
९॥
यतू-निमित्त:--जिस कारण से उत्पन्न; सः--वह; बै--निस्सन्देह; शाप: --शाप; याहश: --किस तरह का; द्विज-सत्-तम--हेद्विजश्रेष्ठ; कथम्--कैसे; एक-आत्मनामू--एक आत्मा ( श्रीकृष्ण ) में हिस्सा बँटाने वालों का; भेदः--मतभेद; एतत्--यह;सर्वम्--समस्त; वदस्व--कृपया बतायें; मे--मुझको |
राजा परीक्षित पूछते रहे : इस शाप का क्या उद्देश्य था ? हे द्विजश्रेष्ठ यह किस तरह का था?और यदुओं में, जो एक ही जीवनलक्ष्य भागी थे, ऐसा मतभेद क्योंकर उत्पन्न हुआ ? कृपया, मुझेये सारी बातें बतलायें।
"
श्रीबादरायणिरुवाचबिभ्रद्वपु: सकलसुन्दरसन्निवेशंकर्माचरन्भुवि सुमड्रलमाप्तकाम: ।
आस्थाय धाम रममाण उदारकीऋतिःसंहर्तुमैच्छत कुल स्थितकृत्यशेष: ॥
१०॥
श्री-बादरायणि: उबाच--बादरायण-पुत्र शुकदेव गोस्वामी ने कहा; बिभ्रतू-- धारण करते हुए; बपु:--दैवी शरीर; सकल--समस्त; सुन्दर--सुन्दर वस्तुओं का; सन्निवेशम्-मि श्रण; कर्म--कार्यकलाप; आचरनू--करते हुए; भुवि--पृथ्वी पर; सु-मड्डलम्--अत्यन्त शुभ; आप्त-काम:--समस्त इच्छाएँ तुष्ट होने से; आस्थाय--निवास करके; धाम--अपने धाम ( द्वारका ) में;रममाण:--रमण करते हुए; उदार-कीर्ति:--अत्यन्त उदार कीर्ति वाले; संहर्तुमू-विनष्ट करने के लिए; ऐच्छत--इच्छा की;कुलम्--अपने वंश का; स्थित--वहाँ रहते हुए; कृत्य--अपने कार्य का; शेष: --कुछ भाग
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : समस्त सुन्दर वस्तुओं के सं मिश्रणरूप अपने शरीर को धारणकरने वाले भगवान् ने पृथ्वी पर रहते हुए अत्यन्त शुभ कार्यो को कर्तव्यपरायणता के साथसम्पन्न किया, यद्यपि वे बिना किसी प्रयास के अपनी सारी इच्छाएँ पहले ही पूरी कर चुके थे।
अपने धाम में रहते हुए तथा जीवन का आनन्द उठाते हुए अब भगवान् ने, जिनका महिमा-गायनस्वयं उदार है, अपने वंश का संहार करना चाहा, क्योंकि अब भी उन्हें कुछ थोड़ा-सा कर्मकरना शेष था।
"
कर्मानि पुण्यनिवहानि सुमड्रलानिगायजगत्कलिमलापहराणि कृत्वा ।
कालात्मना निवसता यदुदेवगेहेपिण्डारक॑ समगमन्मुनयो निसृष्टा: ॥
११॥
विश्वामित्रोडसितः कण्वो दुर्वासा भूगुरड्डिरा: ।
'कश्यपो वामदेवोडत्रिर्वसिष्ठो नारदादय: ॥
१२॥
कर्माणि--सकाम कर्मो को; पुण्य--पुण्य; निवहानि--प्रदान करने वाले; सु-मड्गलानि--अत्यन्त मंगलकारी; गायत्--( जिसके विषय में ) कीर्तन करते हुए; जगत्--सारे संसार के लिए; कलि--वर्तमान पतित युग; मल--अशुद्धियाँ;अपहराणि--हरण करने वाले; कृत्वा--सम्पन्न करके; काल-आत्मना--जो कालस्वरूप है, उसके द्वारा; निवसता--निवासकरते हुए; यदु-देव--यदुओं के स्वामी ( बसुदेव ) के; गेहे--घर में; पिण्डारकम्--पिण्डारक नामक तीर्थस्थान में; समगमन्--वे गये; मुनयः--मुनिगण; निसूष्टा:--विदा कर दिये जाने पर; विश्वामित्र: असित: कण्व:--विश्वामित्र, असित तथा कण्व;दुर्वासा: भृगु: अड्भिरा:--दुर्वासा, भूगु तथा अंगिरा; कश्यप: वामदेव: अत्रि:--कश्यप, वामदेव तथा अत्रि; वसिष्ठ: नारद-आदयः:--वसिष्ठ, नारद इत्यादि ।
एक बार विश्वामित्र, असित, कण्व, दुर्वासा, भूगु, अंगिरा, कश्यप, वामदेव, अत्रि तथावसिष्ठ मुनियों ने नारद तथा अन्यों के साथ मिलकर प्रचुर पुण्य प्रदान करने वाला, परम सुखलाने वाला तथा मात्र उच्चारण करने से समस्त जगत के कलियुग के पापों को दूर करने वालाएक सकाम अनुष्ठान किया।
इन मुनियों ने इस अनुष्ठान को कृष्ण के पिता एवं यदुओं के अग्रणीबसुदेव के घर में सम्पन्न किया।
जब उस समय वसुदेव के घर में कालरूप में निवास कर रहेकृष्ण उत्सव की समाप्ति होने पर मुनियों को आदरपूर्वक विदा कर चुके, तो वे मुनि पिण्डारकनामक पवित्र तीर्थस्थान चले गये।
"
क्रीडन्तस्तानुपब्रज्य कुमारा यदुनन्दना: ।
उपसडूह्य पप्रच्छुतिनीता विनीतवत् ॥
१३॥
ते वेषयित्वा स्त्रीवेषै: साम्बं जाम्बवतीसुतम् ।
एषा पृच्छति वो विप्रा अन्तर्वल्यसितेक्षणा ॥
१४॥
प्रष्टं विलज्जती साक्षात्प्रब्रूतामोघदर्शना: ।
प्रसोष्यन्ती पुत्रकामा कि स्वित्सजञ्लनयिष्यति ॥
१५॥
क्रीडन्तः--खेलते हुए; तान्--उन ( मुनियों ) को; उपब्रज्य--पास जाकर; कुमारा:--छोटे बालकों ने; यदु-नन्दना: --यदुबंशके पुत्र; उपसडूह्य --मुनियों के चरणों को पकड़ कर; पप्रच्छु:--पूछा; अविनीता:--विनीत नहीं, उहंड; विनीत-बत्--विनीतकी तरह बनते हुए; ते--वे; वेषयित्वा--वेश बनाकर; स्त्री-वेषै: --स्त्री के वस्त्र तथा आभूषण पहन कर; साम्बम् जाम्बवती-सुतम्--जाम्बवती के पुत्र साम्ब को; एषा--यह स्त्री; पृच्छति--पूछ रही है; वः--तुमसे; विप्रा:--हे विद्वान ब्राह्मणो;अन्तर्वत्नी--गर्भवती; असित-ईक्षना--श्याम नेत्रों वाली; प्रष्टम--पूछने के लिए; विलज्जती--शरमाई हुई; साक्षात्-प्रत्यक्षअपने आप; प्रब्रृत--कृपया बोलें; अमोघ-दर्शना:--आप, जिनकी दृष्टि कभी मोहित नहीं होती; प्रसोष्यन्ती --तुरन्त ही जन्म देनेवाली; पुत्र-कामा--तथा पुत्र-लाभ की इच्छुक; किम् स्वित्ू--किसको ( पुत्र या पुत्री ); सज्लनयिष्यति--जन्म देगी ।
उस तीर्थस्थान में यदुवंश के तरुण बालक जाम्बवती के पुत्र, साम्ब को स्त्री के वेश में लेआये थे।
उन बालकों ने खिलवाड़ करते हुए वहाँ पर एकत्र महामुनियों के पास पहुँच कर उनकेचरण पकड़ लिए और बनावटी विनयशीलता से उहंडतापूर्वक उनसे पूछा, 'हे विद्वान ब्राह्मणो,यह श्याम नेत्रों वाली गर्भिणी स्त्री आप लोगों से कुछ पूछना चाहती है।
वह अपने विषय में पूछनेमें अत्यधिक लजा रही है।
वह शीघ्र ही बच्चे को जन्म देने वाली है और पुत्र प्राप्त करने के लिएअत्यन्त इच्छुक है।
चूँकि आप सभी अच्युत दृष्टि वाले महामुनि हैं, अतः कृपा करके हमें बतायेंकि इसकी सन््तान बालिका होगी या बालक ।
"
एवं प्रलब्धा मुनयस्तानूचु: कुपिता नृप ।
जनयिष्यति वो मन्दा मुषलं कुलनाशनम् ॥
१६॥
एवम्--इस प्रकार; प्रलब्धा:-- धोखा दिये गये; मुन्ययः --मुनिगण; तान्ू--उन बालकों से; ऊचु:--बोले; कुपिता:--क्रुद्ध;नृप--हे राजा परीक्षित; जनयिष्यति--वह जन्म देगी; व:--तुम्हारे लिए; मन्दा:--रे मूर्खो; मुषलम्--मूसल को; कुल-नाशनम्--वंश का नाश करने वाले।
हे राजन, धोखे से इस तरह उपहास का पात्र बनाये गये मुनि क्रुद्ध हो गये और उन्होंनेबालकों से कहा, 'मूर्खो! वह तुम्होीरे लिए लोहे का एक मूसल जनेगी, जो तुम्हारे समस्त कुलका विनाश करेगा।
"
तच्छृत्वा तेउतिसन्त्रस्ता विमुच्य सहसोदरम् ।
साम्बस्य दहशुस्तस्मिन्मुषलं खल्वयस्मयम् ॥
१७॥
तत्--वह; श्रुत्वा--सुनकर; ते--वे; अति-सन्त्रस्ता:--अत्यन्त भयभीत; विमुच्य--उघाड़ कर, खोल कर; सहसा--झटपट;उदरम्-पेट को; साम्बस्य--साम्ब के; दहशुः--उन्होंने देखा; तस्मिन्ू--उसके भीतर; मुषलम्--मूसल; खलु--निस्सन्देह;अयः-मयम्--लोहे का बना हुआ।
मुनियों का शाप सुनकर भयभीत बालकों ने झटपट साम्ब के पेट से कपड़े हटवाये औरसचमुच उन्होंने देखा कि उसके भीतर एक लोहे का मूसल था।
"
कि कृतं मन्दभाग्यर्न: कि वदिष्यन्ति नो जना: ।
इति विह्लिता गेहानादाय मुषलं ययु: ॥
१८॥
किमू--क्या; कृतम्ू--किया गया; मन्द-भाग्यै: -- अभागों द्वारा; न: --हमारे द्वारा; किमू--क्या; वदिष्यन्ति--कहेंगे; न:--हमसे; जना:--परिवार वाले; इति--इस प्रकार कहते हुए; विह्लिता:--विहल; गेहान्ू--अपने घरों को; आदाय--लेकर;मुषलम्--मूसल को; ययु:--चले गये।
यदुवंश के तरुण लोगों ने कहा : 'ओह! यह हमने क्या कर डाला ? हम कितने अभागे हैं!हमारे परिवार वाले हमसे क्या कहेंगे ?' ऐसा कहते हुए तथा अतीव विश्लुब्ध होकर, वे अपनेसाथ उस मूसल को लेकर अपने घरों को लौट गये।
"
तच्चोपनीय सदसि परिम्लानमुखभ्रिय: ।
राज्ञ आवेदयां चक्रुः सर्वयादवसन्निधौ ॥
१९॥
तत्--वह मूसल; च--तथा; उपनीय--लाकर; सदसि--सभा में; परिम्लान--पूरी तरह कुम्हलाया; मुख--उनके मुखों की;श्रीय:--सुन्दरता; राज्ञे--राजा से; आवेदयाम् चक्रु:--सूचित किया; सर्व-यादब--सभी यादवों की; सन्निधौ--उपस्थिति में |
वे यदु-बालक, जिनके मुख की कान्ति पूरी तरह फीकी पड़ चुकी थी, उस मूसल को राज-सभा में ले आये और समस्त यादवों की उपस्थिति में उन्होंने राजा उग्रसेन से, जो कुछ घटना घटीथी, कह सुनाई।
"
श्र॒ुत्वामोघं विप्रशापं हृष्ठा च मुषलं नृप ।
विस्मिता भयसन्त्रस्ता बभूवुर्दारकौकस: ॥
२०॥
श्रुत्वा--सुनकर; अमोघम्--्यर्थ न जाने वाला; विप्र-शापम्--ब्राह्मणों के शाप को; हृष्टा--देखकर; च--तथा; मुषलम्--मूसल को; नृप--हे राजा; विस्मिता:--चकित; भय-- भय से; सन्त्रस्ता:--किंकर्त व्यविमूढ़; बभूबुः--हो गये; द्वारका-ओकसः-द्वारका के निवासी |
हे राजा परीक्षित, जब द्वारकावासियों ने ब्राह्मणों के अमोघ शाप को सुना और मूसल कोदेखा, तो वे भय से विस्मित तथा किकंर्तव्यविमूढ़ हो गये।
"
तच्चूर्णयित्वा मुषलं यदुराज: स आहुक:ः ।
समुद्रसलिले प्रास्यल्लोहं चास्यावशेषितम् ॥
२१॥
तत्--उसको; चूर्णयित्वा--चूरे-चूरे कराकर; मुषलम्--मूसल को; यदु-राज:--यदुओं के राजा ने; सः--उस; आहुक:--आहुक ( उग्रसेन ) ने; समुद्र--समुद्र के; सलिले--जल में; प्रास्यत्--फेंक दिया; लोहम्--लोहे के; च--तथा; अस्य--मूसलके; अवशेषितम्--अवशिष्ट, बचे हुए।
मूसल को चूरे-चूरे में तुड़वा कर यदुओं के राजा आहुक ( उग्रसेन ) ने स्वयं उन खण्डों कोतथा शेष बचे लोहे के टुकड़े को समुद्र के जल में फेंक दिया।
"
कश्रिन्मत्स्योग्रसील्लोहं चूर्णानि तरलैस्तत: ।
उहामानानि वेलायां लग्नान्यासन्किलैरका: ॥
२२॥
कश्चित्--किसी; मत्स्य:--मछली ने; अग्रसीत्ू--निगल गई; लोहम्--लोहे को; चूर्णानि--चूरा; तरलैः--लहरों से; ततः--उसस्थान से; उहामानानि--ले जाया जाकर; वेलायाम्--तट पर; लग्नानि--चिपके हुए; आसन्--हो गये; किलु--निस्सन्देह;एरका:--नरकट ( विशेष प्रकार कि तूक्ष्ण धार वाली घास)
किसी मछली ने वह लोहे का टुकड़ा निगल लिया और लोहे के शेष खण्ड लहरों द्वाराकिनारे पर लग गये, जहाँ पर वे ऊँचे तीक्ष्ण नरकटों के रूप में उग आये।
"
मत्स्यो गृहीतो मत्स्यघ्नेर्जालेनान्यै: सहार्णवे ।
तस्योदरगतं लोहं स शल्ये लुब्धकोकरोत् ॥
२३॥
मत्स्य:--मछली; गृहीत:--पकड़ी जाकर; मत्स्य-घ्नै:--मछुआरों द्वारा; जालेन--जाल से; अन्यै: सह--अन्य मछलियों केसाथ; अर्णवे--समुद्र के भीतर; तस्थ--मछली के; उदर-गतम्--पेट में गये हुए; लोहम्ू--लोहे के खण्ड को; सः--उस(जरा ) ने; शल्ये--अपने तीर में; लुब्धक:--शिकारी ने; अकरोत्--लगा लिया।
यह मछली अन्य मछलियों के साथ समुद्र में मछुवारे के जाल में पकड़ ली गई।
इस मछलीके पेट में स्थित लोहे के टुकड़े को जरा नामक शिकारी ले गया, जिसने उसे अपने तीर की नोकमें लगा लिया।
"
भगवान्न्ञातसर्वार्थ ईश्वरोडपि तदन्यथा ।
कर्तु नैच्छद्विप्रशापं कालरूप्यन्बमोदत ॥
२४॥
भगवान्-- भगवान् ने; ज्ञात--जानते हुए; सर्व-अर्थ:--हर बात का अर्थ; ईश्वरः--पर्याप्त समर्थ; अपि--यद्यपि; ततू-अन्यथा-- अन्यथा; कर्तुमू--करने के लिए; न ऐच्छत्--नहीं चाहा; विप्र-शापम्--ब्राह्मण के शाप को; काल-रूपी--काल केरूप में प्रकट; अन्वमोदत--प्रसन्नतापूर्वक स्वीकृति दे दी।
इन सारी घटनाओं की महत्ता को पूर्णतया जानते हुए ब्राह्मणों के शाप को पलट सकने मेंसमर्थ होते हुए भी भगवान् ने ऐसा करना नहीं चाहा।
प्रत्युत, काल के रूप में उन्होंने खुशी खुशीइन घटनाओं को स्वीकृति दे दी।
"
