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अध्याय नौ: माता यशोदा भगवान कृष्ण को बांधती हैं
10.9श्रीशुक उबाचएकदा गृहदासीषु यशोदा नन्दगेहिनी ।
कर्मान्तरनियुक्तासुनिर्ममन्थ स्वयं दधि ॥
१॥
यानि यानीह गीतानि तद्बालचरितानि च ।
दधिनिर्मन्थने काले स्मरन्ती तान्यगायत ॥
२॥
श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; एकदा--एक दिन; गृह-दासीषु--जब घर की नौकरानियाँ काम में लगी हुईथीं; यशोदा--माता यशोदा; नन्द-गेहिनी--नन्द महाराज की रानी; कर्म-अन्तर--अन्य कामकाजों में; नियुक्तासु--लगी हुई;निर्ममन्थ--मथने लगी; स्वयम्--स्वयं, खुद; दधि--दही; यानि--जो; यानि--जो; इह--इस सम्बन्ध में; गीतानि--गीत; ततू-बाल-चरितानि--जिसमें अपने बालक के कार्यकलापों का वर्णन था; च--तथा; दधि-निर्मन्थने--दही मथने के; काले--समय; स्मरन्ती--स्मरण करती; तानि---उन्हें; अगायत--गाने लगीं।
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : एक दिन जब माता यशोदा ने देखा कि सारीनौकरानियाँ अन्य घरेलू कामकाजों में व्यस्त हैं, तो वे स्वयं दही मथने लगीं।
दही मथते समय उन्होंने कृष्ण की बाल-क्रीड़ाओं का स्मरण किया और स्वयं उन क्रीड़ाओं के विषय में गीतबनाते हुए उन्हें गुनगुनाकर आनन्द लेने लगीं।
क्षौमं वास: पृथुकटितटे बिश्रती सूत्रनद्धंपुत्रस्नेहस्नुतकुचयुगं जातकम्पं च सुभ्रू: ।
रज्वाकर्ष श्रमभुजचलत्कड्डणौ कुण्डले चस्विन्न॑ वक्त्रं कबरविगलन्मालती निर्ममन्थ ॥
३॥
क्षौमम्--केसरिया तथा पीला मिश्रित; वास:--माता यशोदा की साड़ी; पृथु-कटि-तटे--चौड़ी कमर के चारों ओर; बिभ्रती--हिलती हुई; सूत्र-नद्धम्--पेटी से बँधी; पुत्र-स्नेह-स्नुत--प्रगाढ़ पुत्र-प्रेम के कारण दूध से तर; कुच-युगम्--उसके दोनों स्तन;जात-कम्पम् च--क्योंकि वे सुन्दर ढंग से हिल-डुल रहे थे; सु-भ्रू:--सुन्दर भौंहों वाली; रज्जु-आकर्ष--मथानी की रस्सी कोखींचने से; श्रम--परिश्रम के कारण; भुज--हाथों पर; चलतू-कड्जूणौ--हिलते हुए दोनों कड़े; कुण्डले--कान के दोनोंकुण्डल; च--भी; स्विन्नम्ू--बादल जैसे काले बालों से वर्षा की तरह चूता हुआ पसीना; वक्त्रम्--पूरे मुखमण्डल में; कबर-विगलत्ू-मालती--उसके बालों से मालती के फूल गिर रहे थे; निर्ममन्थ--माता यशोदा दही मथ रही थीं।
केसरिया-पीली साड़ी पहने, अपनी स्थूल कमर में करधनी बाँधे, माता यशोदा मथानी कीरस्सी खींचने में काफी परिश्रम कर रही थीं, उनकी चूड़ियाँ तथा कान के कुण्डल हिल-डुल रहेथे और उनका पूरा शरीर हिल रहा था।
अपने पुत्र के प्रति प्रगाढ़ प्रेम के कारण उनके स्तन दूधसे गीले थे।
उनकी भौहें अत्यन्त सुन्दर थीं और उनका मुखमण्डल पसीने से तर था।
उनके बालोंसे मालती के फल गिर रहे थे।
तां स्तन्यकाम आसाद्य मथ्नन्तीं जननीं हरि: ।
गृहीत्वा दधिमन्थानं न्यषेधत्प्रीतिमावहन् ॥
४॥
तामू--माता यशोदा को; स्तन्य-काम:ः--स्तन-पान के अभिलाषी कृष्ण; आसाद्य--उनके समक्ष प्रकट होकर; मधथ्नन्तीम्--मथती हुई; जननीम्--माता को; हरिः--कृष्ण ने; गृहीत्वा--पकड़ कर; दधि-मन्थानम्--मथानी; न्यषेधत्--मना किया, रोकदिया; प्रीतिम् आवहन्-प्रेम की परिस्थिति उत्पन्न करते हुए।
जब यशोदा दही मथ रही थीं तो उनका स्तन-पान करने की इच्छा से कृष्ण उनके सामनेप्रकट हुए और उनके दिव्य आनन्द को बढ़ाने के लिए उन्होंने मथानी पकड़ ली और दही मथनेसे उन्हें रोकने लगे।
तमड्डमारूढमपाययत्स्तनंस्नेहस्नुतं सस्मितमीक्षती मुखम् ।
अतृप्तमुत्सृज्य जवेन सा यया-वुत्सिच्यमाने पयसि त्वधिश्रिते ॥
५॥
तम्--कृष्ण को; अड्डमू आरूढम्--बड़े ही स्नेह से उन्हें अपनी गोद में बैठाकर; अपाययत्--पिलाया; स्तनम्ू-- अपना स्तन;स्नेह-स्नुतम्ू--अगाध स्नेह के कारण दूध बहता हुआ; स-स्मितम् ईक्षती मुखम्--यशोदा ने हँसते हुए एवं कृष्ण के हँसते मुखको देखते हुए; अतृप्तम्--माता का दूध पीकर भी अतृप्त थे; उत्सृज्य--एक तरफ बैठाकर; जवेन--जल्दी में; सा--मातायशोदा ने; ययौ--वह स्थान छोड़ दिया; उत्सिच्यमाने पयसि--दूध बहते देखकर; तु--लेकिन; अधिभ्रिते--आग पर चढ़ीदुधहंडी में |
तब माता यशोदा ने कृष्ण को सीने से लगाया, उन्हें अपनी गोद में बैठाया और बड़े स्नेह सेभगवान् का मुँह देखने लगीं।
अगाध स्नेह के कारण उनके स्तन से दूध बह रहा था।
किन्तु जबउन्होंने देखा कि आग के ऊपर रखी कड़ाही से दूध उबल कर बाहर गिर रहा है, तो वे बच्चे कोदूध पिलाना छोड़ कर उफनते दूध को बचाने के लिए तुरन्त चली गईं यद्यपि बच्चा अपनी माताके स्तनपान से अभी तृप्त नहीं हुआ था।
सज्जातकोपः स्फुरितारुणाधरंसन्दश्य दद्धि्दीधिमन््थभाजनम् ।
भित्त्वा मृषाश्रु्टघदश्मना रहोजघास हैयड्डबमन्तरं गतः ॥
६॥
सज्ञात-कोप:--इस तरह कृष्ण अत्यन्त क्रुद्ध होकर; स्फुरित-अरुण-अधरम्--सूजे हुए लाल-लाल होंठ; सन्दश्य--काटतेहुए; दद्धिः--अपने दाँतों से; दधि-मन्थ-भाजनम्ू--मटकी को; भित्त्वा--तोड़ते हुए; मृषा-अश्रु:--आँखों में नकली आँसू भरकर; हृषत्-अश्मना--कंकड़ से; रह: --एकान्त स्थान में; जघास--खाने लगे; हैयड्रवम्--ताजा मक्खन; अन्तरम्ू--कमरे केभीतर; गत:--जाकर।
अत्यधिक क्रुद्ध होकर तथा अपने लाल-लाल होंठों को अपने दाँतों से काटते हुए औरआँखों में नकली आँसू भरते हुए कृष्ण ने एक कंकड़ मार कर मटकी तोड़ दी।
इसके बाद वेएक कमरे में घुस गये और एकान्त स्थान में ताजा मक्खन खाने लगे।
उत्तार्य गोपी सुश्रुतं पयः पुनःप्रविश्य संदश्य च दध्यमत्रकम् ।
भग्नं विलोक्य स्वसुतस्य कर्म त-ज्जहास तं चापि न तत्र पश्यती ॥
७॥
उत्तार्य--अँगीठी से उतार कर; गोपी--माता यशोदा; सु- श्रृतम्--अत्यन्त गर्म; पथ: --दूध; पुनः--फिर से; प्रविश्य--मथने केस्थान में घुस कर; संदहश्य--देख कर; च-- भी; दधि-अमत्रकम्--दहेंड़ी; भग्नम्ू--टूटी हुई; विलोक्य--देख कर; स्व-सुतस्य--अपने बालक की; कर्म--करतूत; तत्--वह; जहास--हँसने लगीं; तम् च--कृष्ण को भी; अपि--साथ ही; न--नहीं; तत्र--वहाँ; पश्यती--ढूँढ़ती हुई
गर्म दूध को अँगीठी से उतार कर माता यशोदा मथने के स्थान पर लौटीं और जब देखा किमटकी टूटी पड़ी है और कृष्ण वहाँ नहीं हैं, तो वे जान गईं कि यह कृष्ण की ही करतूत है।
उलूखलाडप्लेरुपरि व्यवस्थितमर्काय काम॑ ददतं शिचि स्थितम् ।
हैयड्रवं चौर्यविश्ितेक्षणंनिरीक्ष्य पश्चात्सुतमागमच्छने: ॥
८ ॥
उलूखल-अड्घ्ने:--उलटी रखी ओखली के; उपरि--ऊपर; व्यवस्थितम्--बैठे हुए कृष्ण; मर्काय--बन्दरों को; कामम्--जी-भरकर; ददतम्--बाँटते हुए; शिचि स्थितम्--छींके में रखी; हैयड्रवम्--मक्खन तथा दूध से बनी अन्य वस्तुएँ; चौर्य-विशद्धित--चुराने के कारण सशंकित; ईक्षणम्--जिसकी आँखें; निरीक्ष्य--इन कार्यो को देखकर; पश्चात्-पीछे से; सुतम्--अपने पुत्र को; आगमत्--आ गई; शनैः--धीरे-धीरे, सावधानी से |
कृष्ण उस समय मसाला पीसने वाली लकड़ी की ओखली को उलटा करके उस पर बैठे हुएथे और मक्खन तथा दही जैसी दूध की बनी वस्तुएँ अपनी इच्छानुसार बन्दरों को बाँट रहे थे।
चोरी करने के कारण वे चिन्तित होकर चारों ओर देख रहे थे कि कहीं उनकी माता आकर उन्हेंडाँटें नहीं।
माता यशोदा ने उन्हें देखा तो वे पीछे से चुपके से उनके पास पहुँचीं।
तामात्तयष्टिं प्रसमीक्ष्य सत्वर-स्ततोवरुह्मापससार भीतवत् ।
गोप्यन्वधावन्न यमाप योगिनांक्षमं प्रवेष्टं तपसेरितं मन: ॥
९॥
तामू--माता यशोदा को; आत्त-यष्टिमू--हाथ में छड़ी लिए; प्रसमी क्ष्य--इस मुद्रा में उन्हें देखकर कृष्ण; सत्वर: --तेजी से;ततः--वहाँ से; अवरुह्म--उतर कर; अपससार-- भगने लगा; भीत-वत्--मानो डरा हुआ हो; गोपी--माता यशोदा;अन्वधावत्--उनका पीछा करने लगीं; न--नहीं; यम्--जिसको; आप--पहुँच पाने में असफल; योगिनाम्ू--बड़े बड़े योगियोंका; क्षमम्--उन तक पहुँचने में समर्थ; प्रवेष्टम्--ब्रह्म तेज या परमात्मा में प्रवेश करने के लिए प्रयत्तशील; तपसा--तपस्या से;ईरितमू--उस कार्य के लिए प्रयलशील; मन:ः--ध्यान से |
जब भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी माता को छड़ी लिए हुए देखा तो वे तेजी से ओखली केऊपर से नीचे उतर आये और इस तरह भागने लगे मानो अत्यधिक भयभीत हों।
जिन्हें योगीजनबड़ी बड़ी तपस्याएँ करके ब्रह्म-तेज में प्रवेश करने की इच्छा से परमात्मा के रूप में ध्यान केद्वारा पकड़ने का प्रयत्त करने पर भी उन तक नहीं पहुँच पाते उन्हीं भगवान् कृष्ण को अपना पुत्र समझ कर पकड़ने के लिए यशोदा उनका पीछा करने लगीं।
अन्वद्ञमाना जननी बृहच्चल-च्छोणीभराक्रान्तगति: सुमध्यमा ।
जवेन विस्त्रंसितकेशबन्धनच्युतप्रसूनानुगति: परामृशत् ॥
१०॥
अन्वजञ्ञमाना--तेजी से कृष्ण का पीछा करती हुई; जननी--माता यशोदा; बृहत्-चलत्-श्रोणी-भर-आक्रान्त-गति:--अपने बड़ेबड़े स्तनों के भार से बोझिल होने से वे थक गईं जिससे उनकी चाल मन्द पड़ गई; सु-मध्यमा--अपनी पतली कमर के कारण;जवेन--तेजी से जाने के कारण; विस्त्रंसित-केश-बन्धन--ढीले हुए केश-सज्जा से; च्युत-प्रसून-अनुगति: --उनके पीछे पीछेफूल गिर रहे थे; परामृशत्--अन्त में कृष्ण को पकड़ ही लिया।
कृष्ण का पीछा करते हुए भारी स्तनों के भार से बोझिल पतली कमर वाली माता यशोदाको अपनी चाल मन्द करनी ही पड़ी।
तेजी से कृष्ण का पीछा करने के कारण उनके बालशिथिल पड़ गये थे और उनमें लगे फूल उनके पीछे पीछे गिर रहे थे।
फिर भी वे अपने पुत्र कृष्णको पकड़ने में सफल हुईं।
कृतागसं तं प्ररुदन््तमक्षिणीकषन्तमझझन्मषिणी स्वपाणिना ।
उद्दीक्षमाणं भयविह्ललेक्षणंहस्ते गृहीत्वा भिषयन्त्यवागुरत् ॥
११॥
कृत-आगसम्-- अपराधी; तम्--कृष्ण को; प्ररुदन््तम्--रोते हुए; अक्षिणी--उनकी आँखें; कषन्तम््--मलते हुए; अज्भतू-मषिणी--जिसकी आँखों में लगा काजल आँसुओं के साथ सारे मुँह में फैल गया; स्व-पाणिना--अपने हाथ से; उद्दीक्षमाणम्--जो माता यशोदा द्वारा इस मुद्रा में देखे गये; भय-विहल-ईक्षणम्ू--अपनी माता के भय से जिसकी आँखें भयभीत दिखाई दीं;हस्ते--हाथ से; गृहीत्वा--पकड़ कर; भिषयन्ती--धमकाती हुईं; अवागुरत्--बहुत धीमे से डाँटा।
माता यशोदा द्वारा पकड़े जाने पर कृष्ण और अधिक डर गये और उन्होंने अपनी गलतीस्वीकार कर ली।
ज्योंही माता यशोदा ने कृष्ण पर दृष्टि डाली तो देखा कि वे रो रहे थे।
उनकेआँसू आँखों के काजल से मिल गये और हाथों से आँखें मलने के कारण उनके पूरे मुखमण्डलमें वह काजल पुत गया।
माता यशोदा ने अपने सलोने पुत्र का हाथ पकड़ते हुए धीरे से डाँटनाशुरू किया।
त्यक्त्वा यष्टिं सुतं भीतं विज्ञायार्भकवत्सला ।
इयेष किल तं बद्धुं दाम्नातद्वीयकोविदा ॥
१२॥
त्यक्त्वा--फेंकते हुए; यष्टिमू--अपने हाथ की छड़ी ( सोटी ) को; सुतम्--पुत्र को; भीतम्--अपने पुत्र के भय पर विचार करतेहुए; विज्ञाय--समझते हुए; अर्भक-वत्सला--कृष्ण की स्नेहमयी माता ने; इयेष--इच्छा की; किल--निश्चय ही; तम्--उसको;बदधुम्--बाँधने के लिए; दाम्ना--रस्सी से; अ-ततू-वीर्य-कोविदा--अत्यन्त शक्तिमान भगवान् को जाने बिना ( कृष्ण के तीक्रप्रेम के कारण )॥
यह जाने बिना कि कृष्ण कौन हैं या वे कितने शक्तिमान हैं, माता यशोदा कृष्ण के अगाधप्रेम में सदैव विहल रहती थीं।
कृष्ण के लिए मातृ-स्नेह के कारण उन्हें इतना तक जानने कीपरवाह नहीं रहती थी कि कृष्ण हैं कौन? अतएव जब उन्होंने देखा कि उनका पुत्र अत्यधिक डरगया है, तो अपने हाथ से छड़ी फेंक कर उन्होंने उसे बाँधना चाहा जिससे और आगे उददण्डता नकर सके।
न चान्तर्न बहिर्यस्य न पूर्व नापि चापरम् ।
पूर्वापरं बहिश्चान्तर्जगतो यो जगच्च य: ॥
१३॥
त॑ मत्वात्मजमव्यक्तं मर्त्यलिड्रमधोक्षजम् ।
गोपिकोलूखले दाम्ना बबन्ध प्राकृतं यथा ॥
१४॥
न--नहीं; च-- भी; अन्त:ः--भीतरी; न--न तो; बहिः--बाह्ाय; यस्य--जिसका; न--न तो; पूर्वम्ू--आदि; न--न; अपि--निस्सन्देह; च-- भी; अपरम्--अन्त; पूर्व-अपरम्-- आदि तथा अन्त; बहि: च अन्तः--बाहरी तथा भीतरी; जगतः--सम्पूर्णविश्व का; यः--जो है; जगत् च य:--तथा जो समग्र सृष्टि में सर्वस्व है; तम्ू--उसको; मत्वा--मान कर; आत्मजम्-- अपनापुत्र; अव्यक्तमू--अव्यक्त; मर्त्य-लिड्रमू-मनुष्य रूप में प्रकट; अधोक्षजम्--इन्द्रिय बोध से परे; गोपिका--यशोदा ने;उलूखले--ओखली में; दाम्ना--रस्सी से; बबन्ध--बाँध दिया; प्राकृतम् यथा--जैसे सामान्य मानवी बालक के साथ कियाजाता है|
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का न आदि है, न अन्त, न बाह्य है न भीतर, न आगा है न पीछा।
दूसरे शब्दों में, वे सर्वव्यापी हैं।
चूँकि वे काल तत्त्व के वशीभूत नहीं हैं अतएव उनके लिएभूत, वर्तमान तथा भविष्य में कोई अन्तर नहीं है।
वे सदा-सर्वदा अपने दिव्य स्वरूप में रहते हैं।
सर्वोपरि तथा परम होने के कारण सभी वस्तुओं के कारण-कार्य होते हुए भी वे कारण-कार्यके अन्तरों से मुक्त रहते हैं।
वही अव्यक्त पुरुष, जो इन्द्रियातीत हैं, अब मानवीय बालक के रूपमें प्रकट हुए थे और माता यशोदा ने उन्हें सामान्यसा अपना ही बालक समझ कर रस्सी के द्वाराओखली से बाँध दिया।
तद्दाम बध्यमानस्य स्वार्भकस्य कृतागसः ।
दव्यडुलोनमभूत्तेन सन्दधेउन्यच्च गोपिका ॥
१५॥
तत् दाम--बाँधने की वह रस्सी; बध्यमानस्य--माता यशोदा द्वारा बाँधा जाने वाला; स्व-अर्भकस्य--अपने पुत्र का; कृत-आगसः--अपराध करने वाले; द्वि-अड्डूल-दो अंगुल; ऊनम्ू--छोटी, कम; अभूत्--हो गई; तेन--उस रस्सी से; सन्दधे--जोड़ दिया; अन्यत् च--दूसरी रस्सी; गोपिका--माता यशोदा ने |
जब माता यशोदा उत्पाती बालक को बाँधने का प्रयास कर रही थीं तो उन्होंने देखा किबाँधने की रस्सी दो अंगुल छोटी पड़ रही थी।
अतः उसमें जोड़ने के लिए वे दूसरी रस्सी ले आईं।
यदासीत्तदपि न्यूनं तेनान्यदपि सन्दधे ।
तदपि दव्यडूुल॑ न्यूनं यद्यदादत्त बन्धनम् ॥
१६॥
यदा--जब; आसीतू--हो गया; तत् अपि--नई रस्सी जोड़ने पर भी; न्यूनमू--तब भी छोटी; तेन--तब दूसरी रस्सी से; अन्यत्अपि--और दूसरी रस्सी भी; सन्दधे--जोड़ी; तत् अपि--वह भी; द्वि-अद्भुलम्-दो अंगुल; न्यूनम्ू--छोटी होती जाती; यत् यत्आदत्त--इस तरह उन्होंने एक के बाद एक जितनी भी रस्सियाँ जोड़ीं; बन्धनम्ू--कृष्ण को बाँधने के लिए।
यह नई रस्सी भी दो अंगुल छोटी पड़ गई और जब इसमें दूसरी रस्सी लाकर जोड़ दी गईतब भी वह दो अंगुल छोटी ही पड़ी।
उन्होंने जितनी भी रस्सियाँ जोड़ीं, वे व्यर्थ गई--वे छोटीकी छोटी पड़ती गईं।
एवं स्वगेहदामानि यशोदा सन्दधत्यपि ।
गोपीनां सुस्मयन्तीनां स्मयन्ती विस्मिताभवत् ॥
१७॥
एवम्--इस प्रकार; स्व-गेह-दामानि-- अपने घर की सारी रस्सियाँ; यशोदा--माता यशोदा; सन्दधति अपि--जोड़ती रहने परभी; गोपीनाम्--जब माता यशोदा की अन्य सारी बुजुर्ग गोपी सखियाँ; सु-स्मयन्तीनामू--इस तमाशे में आनन्द ले रही थीं;स्मयन्ती--माता यशोदा भी मुसका रही थीं; विस्मिता अभवत्--वे सारी की सारी आश्चर्यचकित थीं।
इस तरह माता यशोदा ने घर-भर की सारी रस्सियों को जोड़ डाला किन्तु तब भी वे कृष्णको बाँध न पाईं।
पड़ोस की वृद्धा गोपिकाएँ, जो माता यशोदा की सखियाँ थीं मुसका रही थींऔर इस तमाशे का आनन्द ले रही थीं।
इसी तरह माता यशोदा श्रम करते हुए भी मुसका रहीथीं।
वे सभी आश्चर्यचकित थीं।
स्वमातु: स्विन्नगात्राया विस्त्रस्तकबरस्त्रज: ।
इष्ठा परिश्रमं कृष्ण: कृपयासीत्स्वबन्धने ॥
१८॥
स्व-मातु:--अपनी माता ( यशोदादेवी ) का; स्विन्न-गात्राया:--वृथा श्रम के कारण पसीने से लथपथ शरीर; विस्त्रस्त--गिर रहे;कबर--उनके बालों से; सत्रज:--फूल; दृष्टा--देखकर; परिश्रमम्-- अधिक काम करने से थकी का अनुभव करती हुई अपनीमाता को; कृष्ण:-- भगवान् ने; कृपया--अपने भक्त तथा माता पर अहैतुकी कृपा द्वारा; आसीतू--राजी हो गये; स्व-बन्धने--अपने को बँधाने के लिए
माता यशोदा द्वारा कठिन परिश्रम किये जाने से उनका सारा शरीर पसीने से लथपथ हो गयाऔर उनके केशों में लगी कंघी और गूँथे हुए फूल गिरे जा रहे थे।
जब बालक कृष्ण ने अपनीमाता को इतना थका-हारा देखा तो वे दयाद्द्र हो उठे और अपने को बँधाने के लिए राजी होगये।
एवं सन्दर्शिता हाड़ हरिणा भृत्यवश्यता ।
स्ववशेनापि कृष्णेन यस्येदं सेश्वरं वशे ॥
१९॥
एवम्--इस प्रकार; सन्दर्शिता--प्रदर्शित किया गया; हि--निस्सन्देह; अड्ड--हे महाराज परीक्षित; हरिणा-- भगवान् द्वारा;भृत्य-वश्यता--अपने सेवक या भक्त की अधीनता स्वीकार करने का गुण; स्व-वशेन--जो केवल अपने वश में रहे; अपि--निस्सन्देह; कृष्णेन--कृष्ण द्वारा; यस्थ--जिसके; इृदम्--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड; स-ईश्वरम्ू--शिव तथा ब्रह्मा जैसे शक्तिशालीदेवताओं सहित; वशे--वश में |
हे महाराज परीक्षित, शिवजी, ब्रह्माजी तथा इन्द्र जैसे महान् एवं उच्चस्थ देवताओं समेत यहसम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भगवान् के वश में हैं।
फिर भी भगवान् का एक दिव्य गुण यह है कि वे अपनेभक्तों के वश में हो जाते हैं।
यही बात इस लीला में कृष्ण द्वारा दिखलाई गई है।
नेमं विरिज्ञो न भवो न श्रीरप्यड्रसं भ्रया ।
प्रसादं लेभिरे गोपी यत्तत्प्राप विमुक्तिदातू ॥
२०॥
न--नहीं; इमम्--यह उच्च पद; विरिज्ञ:--ब्रह्मा; न--न तो; भव:ः--शिव; न--न तो; श्री:--लक्ष्मी; अपि--निस्सन्देह; अड्ड-संश्रया-- भगवान् की अर्धांगिनी होकर भी; प्रसादम्--कृपा; लेभिरे--प्राप्त किया; गोपी--माता यशोदा; यत् तत्ू--जो जैसाहै; प्राप--प्राप्त किया; विमुक्ति-दात्ू--इस जगत से मुक्ति दिलाने वाले कृष्ण से
इस भौतिक जगत से मोक्ष दिलाने वाले भगवान् की ऐसी कृपा न तो कभी ब्रह्माजी, नशिवजी, न ही भगवान् की अर्धागिनी लक्ष्मी ही प्राप्त कर सकती हैं, जैसी माता यशोदा ने प्राप्तकी।
नायं सुखापो भगवान्देहिनां गोपिकासुतः ।
ज्ञानिनां चात्मभूतानां यथा भक्तिमतामिह ॥
२१॥
न--नहीं; अयम्--यह; सुख-आप: --सरलता से प्राप्प अथवा सुख का लक्ष्य; भगवान्-- भगवान्; देहिनाम्--देहात्मबुद्धि कोप्राप्त पुरुषों का, विशेषतया कर्मियों का; गोपिका-सुतः--माता यशोदा का पुत्र कृष्ण ( बसुदेव-पुत्र होने से कृष्ण बासुदेव औरयशोदा-पुत्र होने से कृष्ण कहलाते हैं ); ज्ञानिनाम् च--तथा भवबन्धन से मुक्त होने के लिए प्रयलशील ज्ञानियों का; आत्म-भूतानाम्--आत्मनिर्भर योगियों का; यथा--जैसे; भक्ति-मताम्-- भक्तों का; इह--इस जगत में |
माता यशोदा के पुत्र भगवान् कृष्ण स्वतः स्फूर्त प्रेमाभक्ति में लगे भक्तों के लिए सुलभ हैंकिन्तु वे मनोधर्मियों, घोर तपों द्वारा आत्म-साक्षात्कार के लिये प्रयास करने वालों अथवा शरीरको ही आत्मा मानने वालों के लिए सुलभ नहीं होते।
कृष्णस्तु गृहकृत्येषु व्यग्रायां मातरि प्रभु: ।
अद्राक्षीदर्जुनौ पूर्व गुह्मकौ धनदात्मजौ ॥
२२॥
कृष्ण: तु--इस बीच; गृह-कृत्येषु--गृहकार्य में लगी; व्यग्रायाम्--अत्यन्त व्यस्त; मातरि--जब उनकी माता; प्रभु:-- भगवान्;अद्वाक्षीत्-देखा; अर्जुनौ--यमल अर्जुन वृक्ष; पूर्वम्--उसके पूर्व; गुह्मकौ--जो पूर्वजन्म में देवता थे; धनद-आत्मजौ--देवताओं के कोषाध्यक्ष कुवेर के पुत्र |
जब माता यशोदा घरेलू कार्यों में अत्यधिक व्यस्त थीं तभी भगवान् कृष्ण ने दो जुड़वाँ वृक्षदेखे, जिन्हें यमलार्जुन कहा जाता था।
ये पूर्व युग में कुबेर के देव-पुत्र थे।
पुरा नारदशापेन वृक्षतां प्रापितौ मदात् ।
नलकूवरमणिग्रीवाविति ख्यातौ अयान्वितौ ॥
२३॥
पुरा--पूर्वकाल में; नारद-शापेन--नारदमुनि के शाप द्वारा; वृक्षताम्--वृक्षों का रूप; प्रापितौ--प्राप्त किया; मदात्--पागलपन के कारण; नलकूवर--इनमें एक नलकूवर था; मणिग्रीवौ--दूसरा मणिग्रीव था; इति--इस प्रकार; ख्यातौ--विख्यात; थ्रिया अन्वितौ--अत्यन्त ऐ श्वर्यवान् |
पूर्वजन्म में नलकूबर तथा मणिग्रीव नामक ये दोनों पुत्र अत्यन्त ऐश्वर्यवान तथा भाग्यशालीथे।
किन्तु गर्व तथा मिथ्या प्रतिष्ठा के कारण उन्होंने किसी की परवाह नहीं की इसलिए नारदमुनिने उन्हें वृक्ष बन जाने का शाप दे डाला।
