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अध्याय अट्ठासी: भगवान शिव की वृकासुर से रक्षा
10.88श्रीराजोबवाचदेवासुरमनुष्येसु ये भजन्त्यशिवं शिवम् ।
प्रायस्ते धनिनो भोजा न तु लक्ष्म्या: पतिं हरिमू ॥
१॥
श्री-राजा उवाच--राजा ( परीक्षित ) ने कहा; देव--देवताओं; असुर--असुरों; मनुष्येषु--तथा मनुष्यों में से; ये--जो;भजन्ति--पूजा करते हैं; अशिवम्--विरागी; शिवम्ू--शिव को; प्रायः--सामान्यतया; ते--वे; धनिन:ः-- धनी; भोजा:--इन्द्रिय-तृप्ति के भोक्ता; न--नहीं; तु--फिर भी; लक्ष्म्या:--लक्ष्मी के; पतिमू--पति; हरिम्-- भगवान् हरि को |
राजा परीक्षित ने कहा : जो देवता, असुर तथा मनुष्य परम वैरागी शिव की पूजा करते हैं, वेसामान्यतया धन सम्पदा तथा इन्द्रिय-तृप्ति का आनन्द लूटते हैं, जबकि लक्ष्मीपति भगवान् हरिकी पूजा करने वाले, ऐसा नहीं कर पाते।
एतद्ठेदितुमिच्छाम: सन्देहो त्र महान्हि नः ।
विरुद्धशीलयो: प्रभ्वोर्विरुद्धा भजतां गति; ॥
२॥
एतत्--यह; वेदितुम्--जानने के लिए; इच्छाम:--इच्छुक हैं; सन्देह:--सन्देह; अन्र--इस मामले में; महान्ू--महान्; हि--निस्सन्देह; नः--हम पर से; विरुद्ध--उल्टा; शीलयो:--जिनके चरित्र; प्रभ्वो:--दोनों प्रभुओं के; विरुद्धा--विपरीत;भजताम्--पूजा करने वालों का; गति:--गन्तव्य
हम इस विषय को ठीक से समझना चाहते हैं, क्योंकि यह हमें अत्यधिक परेशान किये हुएहै।
दरअसल इन विपरीत चरित्रों वाले दोनों प्रभुओं की पूजा करने वालों को, जो फल मिलतेहैं, वे अपेक्षा के विपरीत होते हैं।
श्रीशुक उबाचशिव: शक्तियुत: शश्वत्तरिलिड्रो गुणसंवृतः ।
वैकारिकस्तैजसश्न तामसश्ैत्यहं त्रिधा ॥
३॥
श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुक ने कहा; शिव: --शिव; शक्ति--अपनी भौतिक शक्ति, प्रकृति से; यत:ः--युक्त; शश्वत्--सदैव;त्रि--तीन; लिड्ढ:--प्रकट स्वरूप वाले; गुण--गुणों से; संवृत:--अनुरोध किये गये; वैकारिक:--सतोगुणी अहंकार;तैजसः--रजोगुणी अहंकार; च--तथा; तामसः--तमोगुणी अहंकार; च--तथा; इति--इस प्रकार; अहम्--अहंकार का तत्त्व;त्रिधा--तीन गुना
श्रीशुकदेव ने कहा : शिवजी सदैव अपनी निजी शक्ति, प्रकृति के साथ, संयुक्त रहते हैं।
प्रकृति के तीन गुणों के अनुरोध पर अपने को तीन रूपों में प्रकट करते हुए वे सतो, रजो तथातमोगुणी अहंकार के त्रितत्त्व को धारण करने वाले हैं।
ततो विकारा अभवन्धोडशामीषु कञ्जन ।
उपधावन्विभूतीनां सर्वासामश्नुते गतिम् ॥
४॥
ततः--उस ( अहंकार ) से; विकारा:--रूपान्तरेण; अभवनू्-- प्रकट हुए; षोडश--सोलह; अमीषु--इनमें से; कञ्नन--कोई ;उपधावन्--पूजा करते हुए; विभूतीनाम्-- भौतिक सम्पत्ति का; सर्वासामू--समस्त; अश्नुते-- भोग करता है; गतिम्--उपलब्धि।
उसी मिथ्या अहंकार से सोलह तत्त्व विकार-रूप में निकले हैं।
जब शिव-भक्त इन तत्त्वों मेंसे किसी भी विकार की पूजा करता है, तो उसे सभी प्रकार का उसी तत्त्व के संगत भोग्य ऐश्वर्यप्राप्त होता है।
हरि निर्गुणः साक्षात्पुरुष: प्रकृते: पर: ।
स सर्वहगुपद्रष्टा तं भजन्निर्गुणो भवेत् ॥
५॥
हरिः-- भगवान् हरि; हि--निस्सन्देह; निर्गुण:--गुणों से अछूता; साक्षात्--परम रूप से; पुरुष: --ई श्वर; प्रकृतेः-- प्रकृति के ;'परः--दिव्य; सः--वह; सर्व--हर वस्तु; हक्--देखते हुए; उपद्रष्टा--साक्षी; तमू--उसकी; भजन्--पूजा करके; निर्गुण: --भौतिक गुणों से मुक्त; भवेत्ू--बन जाता है।
किन्तु भगवान् हरि का भौतिक गुणों से कोई सरोकार नहीं रहता।
वे सर्वद्रष्टा नित्य साक्षीभगवान् हैं, जो भौतिक प्रकृति के परे हैं।
जो उनकी पूजा करता है, वह भी उन्हीं की तरहभौतिक गुणों से मुक्त हो जाता है।
निवृत्तेष्वश्चमेथेषु राजा युष्मत्पितामह: ।
श्रण्वन्भगवतो धर्मानपृच्छदिदमच्युतम् ॥
६॥
निवृत्तेषु--पूर्ण हुए; अश्व-मेधेषु--अश्वमेध यज्ञ के; राजा--राजा ( युधिष्टिर ); युष्मत्-- तुम्हारे ( परीक्षित के ); पितामहा: --बाबा; श्रृण्वन्--सुनते हुए; भगवतः-- भगवान् ( श्रीकृष्ण ) से; धर्मानू-धार्मिक सिद्धान्तों को; अपूच्छत्--पूछा; इदम्--यह;अच्युतम्-भगवान् कृष्ण से
तुम्हारे बाबा राजा युधिष्ठिर ने अपना अश्वमेध यज्ञ पूरा कर लेने के बाद भगवान् अच्युत सेयही प्रश्न पूछा था, जब वे भगवान् से धर्म की व्याख्या सुन रहे थे।
स आह भगवांस्तस्मै प्रीतः शुश्रूषवे प्रभु: ।
नृणां नि: श्रेयसार्थाय योवतीर्णो यदो: कुले ॥
७॥
सः--उसने; आह--कहा; भगवानू-- भगवान्; तस्मै--उसको; प्रीत:--प्रसन्न; शुश्रूषबे-- सुनने का इच्छुक; प्रभु:--स्वामी;नृणाम्--सारे मनुष्यों के; नि:श्रेयस--चरम लाभ के; अर्थाय--हेतु; यः--जो; अवतीर्ण:--अवतरित; यदो:--राजा यदु के;कुले--वंश में
राजा के स्वामी तथा प्रभु श्रीकृष्ण, जो सारे लोगों को परम लाभ प्रदान करने के उद्देश्य सेयदुकुल में अवतीर्ण हुए थे, इस प्रश्न से प्रसन्न हुए।
भगवान् ने निम्नवत् उत्तर दिया, जिसे राजाने उत्सुकतापूर्वक सुना।
श्रीभगवानुवाचअस्याहमनुगृह्मामि हरिष्ये तद्धनं शनैः ।
ततो<धनं त्यजन्त्यस्य स्वजना दुःखदु:खितम् ॥
८॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; यस्य--जिस पर; अहम्--मैं; अनुगृह्ामि-- अनुग्रह करता हूँ; हरिष्ये--हरण कर लेताहूँ; तत्ू--उसका; धनम्-- धन; शनै:--धीरे धीरे; ततः--तब; अधनम्--निर्धन; त्यजन्ति--छोड़ देते हैं; अस्थ--उसके; स्व-जना:--सम्बन्धी तथा मित्र; दुःख-दुःखितम्--एक के बाद, एक दुख से दुखी |
भगवान् ने कहा : यदि मैं किसी पर विशेष रूप से कृपा करता हूँ, तो मैं धीरे धीरे उसे उसकेधन से वंचित करता जाता हूँ।
तब ऐसे निर्धन व्यक्ति के स्वजन तथा मित्र उसका परित्याग करदेते हैं।
इस प्रकार वह कष्ट पर कष्ट सहता है।
स यदा वितथोद्योगो निर्विण्ण: स्याद्धनेहया ।
मत्परैः कृतमैत्रस्य करिष्ये मदनुग्रहम् ॥
९॥
सः--वह; यदा--जब; वितथ--व्यर्थ; उद्योग: -- प्रयास; निर्विण्ण:--विफल; स्यात्ू--हो जाता है; धन--धन के लिए;ईहया--अपने प्रयास से; मत्--मेरे; पैरः-- भक्तों के साथ; कृत--बनाने वाले के लिए; मैत्रस्थ--मित्रता; करिष्ये--दिखलाऊँगा; मत्--मेरी; अनुग्रहम्--कृपा जब
वह धन कमाने के अपने प्रयासों में विफल होकर मेरे भक्तों को अपना मित्र बनाता है,तो मैं उस पर विशेष अनुग्रह प्रदर्शित करता हूँ।
तद्गह्म परम सूक्ष्मं चिन्मात्रं सदनन्तकम् ।
विज्ञायात्मतया धीरः संसारात्परिमुच्यते ॥
१०॥
ततू--वह; ब्रह्म --निर्विशेष ब्रह्म; परमम्--परम; सूक्ष्मम्--सूक्ष्; चित्--आत्मा; मात्रमू-शुद्ध; सत्--नित्य जगत;अनन्तकम्--अन्तहीन; विज्ञाय-- भलीभाँति जान कर; आत्मतया--अपने ही आत्मा के रूप में; धीर:--धीर; संसारात्--भौतिक जीवन से; परिमुच्यते--छूट जाता है।
इस तरह धीर बना हुआ व्यक्ति ब्रह्म को, जो आत्मा की सर्वाधिक सूक्ष्म तथा पूर्णअभिव्यक्ति से एवं अन्तहीन जगत से परे है, सर्वोच्च सत्य के रूप में पूरी तरह से अनुभव करता है।
इस तरह यह अनुभव करते हुए कि परम सत्य उसके अपने अस्तित्व का आधार है, वहभौतिक जीवन के चक्र से मुक्त हो जाता है।
अतो मां सुदुराराध्यं हित्वान्यान्भजते जन: ।
ततस्त आशुतोषे भ्यो लब्धराज्यश्रियोद्धता: ।
मत्ताः प्रमत्ता वरदान्विस्मयन्त्यवजानते ॥
११॥
अतः--इसलिए; माम्--मुझको; सु--अत्यन्त; दुराराध्यम्-पूजा करने में कठिन; हित्वा--छोड़ कर; अन्यान्--अन्यों को;भजते--पूजता है; जन:ः--सामान्य व्यक्ति; ततः--फलस्वरूप; ते--वे; आशु--शीघ्र ही; तोषेभ्य: --संतुष्ट लोगों से; लब्ध--प्राप्त; राज्य--राजसी; भ्रिया--ऐश्वर्य से; उद्धता:--उद्धत बनाये गये; मत्ता:--मद से चूर; प्रमत्ता:--परवाह न करने वाले;वर--वरों के; दानू--दाता; विस्मयन्ति--अत्यन्त निडर बन कर; अवजानते--अपमान ( तिरस्कार ) करते हैं।
चूँकि मुझे पूजना कठिन है, इसलिए सामान्यतया लोग मुझसे कतराते हैं और बजाय इसकेमें उन अन्य देवों की पूजा करते हैं, जो शीघ्र ही तुष्ट हो जाते हैं।
जब लोग इन देवों से राजसीऐश्वर्य प्राप्त करते हैं, तो वे उद्धत, गर्वोन्मत्त तथा अपने कर्तव्यों की उपेक्षा करने वाले बन जातेहैं।
वे उन देवताओं को भी अपमानित करने का दुस्साहस करते हैं, जिन्होंने उन्हें वर दिये हैं।
श्रीशुक उबाचशापप्रसादयोरीशा ब्रह्मविष्णुशिवादय:ः ।
सद्यः शापप्रसादोड़ शिवो ब्रह्मा न चाच्युत: ॥
१२॥
श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; शाप--शाप देने; प्रसादयो: --दया दिखाने में; ईशा: --समर्थ; ब्रह्म-विष्णु-शिव-आदय: --ब्रह्मा, विष्णु, शिव इत्यादि; सद्यः--शीघ्र; शाप-प्रसाद: --जिनके शाप तथा वरदान; अड्ज--हे प्रिय ( राजापरीक्षित ); शिव: --शिव; ब्रह्मा--ब्रह्मा; न--नहीं; च--तथा; अच्युत:-- भगवान् विष्णु॥
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा अन्य देवता किसी को शाप याआशीर्वाद देने में समर्थ हैं।
शिव तथा ब्रह्मा शाप देने या वर देने में बहुत शीघ्रता करते हैं, किन्तुहे राजन, भगवान् अच्युत ऐसे नहीं हैं।
अन्न चोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
वृकासुराय गिरिशो वर दत्त्वाप सड्डूटम् ॥
१३॥
अत्र--इस सम्बन्ध में; च--तथा; उदाहरन्ति--उदाहरण के रूप में बतलाते हैं; इमम्--यह ( आगे दिया ); इतिहासम्--ऐतिहासिक विवरण; पुरातनम्--प्राचीन; वृक-असुराय--वृक असुर के लिए; गिरि-शः--कैलाश पर्वत के स्वामी शिवजी ने;वरम्--वर; दत्त्वा--देकर; आप--प्राप्त किया; सड्डूटम्-- भयावह स्थिति
इस सम्बन्ध में एक प्राचीन ऐतिहासिक विवरण बतलाया जाता है कि किस तरह वृक असुरको वर माँगने के लिए कहने से कैलाश पर्वत के स्वामी संकट में पड़ गये।
बृको नामासुरः पुत्र: शकुने: पथि नारदम् ।
इृष्टाशुतोषं पप्रच्छ देवेषु त्रिषु दुर्मति: ॥
१४॥
बृकः--वृक; नाम--नामक; असुरः--असुर; पुत्र:--पुत्र; शकुने:--शकुनि का; पथ्चि--मार्ग में; नारदम्--नारद मुनि को;इष्ठा--देख कर; आशु--शीघ्र; तोषम्-प्रसन्न होने वाला; पप्रच्छ--पूछा; देवेषु--देवताओं में से; त्रिषु--तीन; दुर्मति: --दुष्टने
एक बार मार्ग में शकुनि-पुत्र वृक नामक असुर की नारद से भेंट हो गयी।
इस दुष्ट ने उनसेपूछा कि तीन प्रमुख देवों में से, किसे सबसे जल्दी प्रसन्न किया जा सकता है।
स आह देवं गिरिशमुपाधावाशु सिद्धयसि ।
योउल्पाभ्यां गुणदोषाभ्यामाशु तुष्यति कुप्पति ॥
१५॥
सः--उसने ( नारद ने ); आह--कहा; देवमू--देव; गिरिशमू--शिव को; उपाधाव--पूजो; आशु--शीघ्र; सिद्धयसि--सफलहोगे; यः--जो; अल्पाभ्याम्--कुछ; गुण--उत्तम गुणों से; दोषाभ्यामू--तथा दोषों से; आशु--जल्दी; तुष्यति--तुष्ट होता है;कुप्यति-क्रुद्ध होता है
नारद ने उससे कहा : तुम शिव की पूजा करो, तो तुम्हें शीघ्र ही सफलता प्राप्त हो सकेगी।
वे अपनी पूजा करने वालों के रंचमात्र भी उत्तम गुणों को देख कर तुरन्त प्रसन्न हो जाते हैं औरउनकी रंचमात्र भी त्रुटि देख कर तुरन्त कुपित होते हैं।
दशास्यबाणपयोस्तुष्ट: स्तुवतोर्वन्दिनोरिव ।
ऐश्वर्यमतुलं दत्त्ता तत आप सुसड्डूटम् ॥
१६॥
दश-आस्य--दस सिरों वाले रावण से; बाणयो: --तथा बाण से; तुष्ट:ः--संतुष्ट; स्तुबतो: --उनकी स्तुति का गान करने वाले;बन्दिनो: इब--गायकों की तरह; ऐश्वर्यम्-शक्ति; अतुलम्--अद्वितीय; दत्त्वा--देकर; तत:--तब; आप--प्राप्त किया; सु--महान्; सड्डूटम्--विपत्ति।
वे दस-सिर वाले रावण से तथा बाण से तब प्रसन्न हो उठे, जब उनमें से प्रत्येक ने राज्यदरबार के वन्दीजनों की तरह उनके यश का गायन किया।
तब शिवजी ने उन दोनों कोअभूतपूर्व शक्ति प्रदान की, किन्तु इसके फलस्वरूप, उन्हें दोनों के कारण महान् संकट उठानापड़ा।
इत्यादिष्टस्तमसुर उपाधावत्स्वगात्रतः ॥
केदार आत्मक्रव्येण जुह्नानो ग्निमुखं हरम् ॥
१७॥
इति--इस प्रकार; आदिष्ट: --आदेश दिया गया; तमू--उस ( शिव ) की; असुरः --असुर ने; उपाधावत्--पूजा की; स्व--अपने; गात्रत:--शरीर के अंगों से; केदारे--केदारनाथ नामक पवित्र स्थान पर; आत्म--अपने; क्रव्येण--मांस से; जुह्मान:--आहुतियाँ देते हुए; अग्नि--अग्नि रूपी; मुखम्--मुख में; हरम--शिव के ।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार उपदेश पाकर, वह असुर केदारनाथ में शिवजीकी पूजा करने गया, जहाँ वह अपने शरीर से मांस के टुकड़े काट-काट कर पवित्र अग्नि में,जो कि शिवमुख है, आहुतियाँ देने लगा।
देवोपलब्धिमप्राप्य निर्वेदात्सप्तमे उहनि ।
शिरोवृश्चत्सुधितिना तत्तीर्थक्लिन्नमूर्धजम् ॥
१८ ॥
तदा महाकारुणिको स धूर्जटि-यथा वयं चाग्निरिवोत्थितोडनलातू ।
निगृह्य दोर्भ्या भुजयोरन्यवारयत्तत्स्पर्शनाद्धूय उपस्कृताकृति: ॥
१९॥
देव--देवता का; उपलब्धिम्--दर्शन; अप्राप्य--न पाकर; निर्वेदात्--हताशा से; सप्तमे--सातवें; अहनि--दिन; शिर:--सिर;अवृश्चवत्--काटने वाला था; सुधितिना--कुल्हाड़े से; तत्--उस ( केदारनाथ ) का; तीर्थ--तीर्थस्थान ( के जल ) में; क्लिन्न--सिक्त; मूर्थ-जम्--सिर के बाल; तदा--तब; महा--परम; कारुणिक:--दयालु; सः--वह; धूर्जटि:--शिवजी; यथा--जिसतरह; वयम्--हम; च-- भी; अग्नि:--अग्नि देव; इब--की तरह प्रकट होकर; उत्थित:--उठा हुआ; अनलातू--अग्नि से;निगृहय--पकड़ कर; दोर्भ्याम्ू--अपनी बाँहों से; भुजयो:--उसकी ( वृक की ) बाँहें; न््यवारयत्--रोका; तत्--उसका ( शिवका ); स्पर्शनात्--स्पर्श से; भूयः --पुनः ; उपस्कृत--सुनिर्मित; आकृति: --शरीर |
देवता का दर्शन न पाकर वृकासुर हताश हो गया।
अन्त में सातवें दिन केदारनाथ की पवित्रनदी में अपने बाल भिगोकर तथा उन्हें गीला ही रहने देकर, उसने एक कुल्हाड़ा उठाया औरअपना सिर काटने लगा।
लेकिन उसी क्षण परम दयालु शिवजी यज्ञ-अग्नि से प्रकट हुए, जोसाक्षात् अग्नि देव जैसे लग रहे थे।
उन्होंने असुर को आत्महत्या करने से रोकने के लिए उसकी दोनों बाँहें पकड़ लीं, जिस तरह ऐसी परिस्थिति में हम करेंगे।
शिवजी का स्पर्श करने सेवृकासुर, एक बार फिर पूर्ण हो गया।
तमाह चाड्रालमलं वृणीष्व मेयथाभिकामं वितरामि ते वरम् ।
प्रीयेय तोयेन नृणां प्रपद्यता-महो त्वयात्मा भूशमर्चते वृथा ॥
२०॥
तम्ू--उससे; आह--( शिव ने ) कहा; च--तथा; अड्ग--हे प्रिय; अलम् अलमू--बस बस; वृणीष्व--वर माँगो; मे--मुझसे;यथा--जैसा; अभिकामम्-- चाहते हो; वितरामि-- प्रदान करूँगा; ते--तुम्हें; वरम्--तुम्हारा चुना वर; प्रीयेय--प्रसन्न होता हूँ;तोयेन--जल से; नृणाम्--मनुष्यों के; प्रपद्यताम्ू--शरणागत; अहो--ओह; त्वया--तुम्हारे द्वारा; आत्मा--तुम्हारा शरीर;भूशम्--अत्यधिक; अर्द्ते--पीड़ा पहुँचाया गया; वृथा--व्यर्थ |
शिवजी ने उससे कहा : हे मित्र, बस करो, बस करो, तुम जो भी चाहो, मुझसे माँगो।
मैंतुम्हें वही वर दूँगा।
हाय! तुमने वृथा ही अपने शरीर को इतनी पीड़ा पहुँचाई, क्योंकि जो लोगशरण के लिए मेरे पास पहुँचते हैं, उनके द्वारा मात्र जल की भेंट से मैं प्रसन्न हो जाता हूँ।
देवं स बत्रे पापीयान्वरं भूतभयावहम् ।
यस्य यस्य कर शीर्णिण धास्ये स प्रियतामिति ॥
२१॥
देवम्--देव से; सः--उसने; वब्रे--माँगा; पापीयानू--पापी असुर; वरमू--वर; भूत--सारे जीवों को; भय--डर; आवहम्--लाने वाला; यस्य यस्य--जिस जिसके; करम्--हाथ; शीर्ण्णगि--सिर पर; धास्ये--मैं रखूँ; सः--वह; प्रियताम्--मर जाये;इति--इस प्रकार।
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : उस पापी वृक ने भगवान् से जो वर माँगा, वह सारेजीवों को भयाकान्त करने वाला था।
वृक ने कहा, 'मैं जिसके भी सिर पर अपना हाथ रखूँ,उसकी मृत्यु हो जाये।
'तच्छुत्वा भगवाज़ुद्रो दुर्मना इव भारत ।
इति प्रहसंस्तस्मै ददेडहेरमृतं यथा ॥
२२॥
ततू--यह; श्रुत्वा--सुनकर; भगवान् रुद्र:--भगवान् रुद्र ने; दुर्मना:--अप्रसन्न; इब--मानो; भारत--हे भरतवंशी; ३७ इति--स्वीकृति के रूप में ३४ शब्द का उच्चारण करते हुए; प्रहसन्--हँसते हुए; तस्मै--उसे; ददे--दे दिया; अहेः--साँप को;अमृतम्--अमृत; यथा--जिस तरह
यह सुनकर भगवान् रुद्र कुछ विचलित से लगे।
फिर भी हे भारत, उन्होंने अपनी सहमति दिखाने के लिए का उच्चारण किया और व्यंग्य-हँसी के साथ वृक को वर दे दिया कि,मानो विषैले सर्प को दूध दे दिया हो।
स तद्वरपरीक्षार्थ शम्भोमूर्थधिन किलासुर: ।
स्वहस्तं धातुमारेभे सोबिभ्यत्स्वकृताच्छिव: ॥
२३॥
सः--वह; तत्--उसके ( शिव के ); वर--वरदान की; परीक्षा-अर्थम्-परीक्षा लेने के लिए; शम्भो:--शिवजी के; मूर्धि--सिर पर; किल--निस्सन्देह; असुरः --असुर ने; स्व--अपना; हस्तम्--हाथ; धातुम्--रखने के लिए; आरेभे--प्रयत्त किया;सः--उसने; अबिभ्यत्--डर गया; स्व--अपने द्वारा; कृतातू-किये हुए से; शिव:--शिव |
भगवान् शम्भु के वर की परीक्षा करने के लिए असुर ने उन्हीं के सिर पर हाथ रखने काप्रयास किया।
तब शिवजी को अपने किये हुए पर भय लगने लगा।
तेनोपसूष्ट: सन्त्रस्तः पराधावन्सवेषथु: ।
यावद-न्तं दिवो भूमे: कष्ठानामुदगादुदक् ॥
२४॥
तेन--उसके द्वारा; उपसृष्ट:--पीछा किया जाते; सन्त्रस्त:--भयभीत; पराधावन्--दौड़ते हुए; स--सहित; वेपथु:--काँपते हुए;यावत्--जहाँ तक; अन्तमू--छोर; दिवः--आकाश का; भूमेः--पृथ्वी का; काष्ठानामू--तथा दिशाओं का; उदगात्--तेजी सेगया; उदक्--उत्तर दिशा से
जब असुर उनका पीछा करने लगा, तो शिवजी भय से काँपते हुए उत्तर में स्थित अपनेनिवास से तेजी से भागने लगे।
जहाँ तक पृथ्वी, आकाश तथा ब्रह्माण्ड के छोर हैं, वहाँ तक वेदौते रहे।
अजानन्तः प्रतिविधि तूष्णीमासन्सुरेश्वरा: ।
ततो वैकुण्ठमगमद्धास्वरं तमस: परम् ॥
२५॥
यत्र नारायण: साक्षान््यासिनां परमो गति: ।
शान्तानां न्यस्तदण्डानां यतो नावर्तते गत: ॥
२६॥
अजानन्तः--न जानते हुए; प्रति-विधिम्--निराकरण; तृष्णीम्ू--मौन; आसनू--हो गये; सुर--देवताओं के; ई श्वरा:-- स्वामी;ततः--तब; बैकुण्ठम्-ईश्वर के धाम, वैकुण्ठ; अगमत्--गया; भास्वरम्--तेजवान; तमस:--अंधकार; परम्--परे; यत्र--जहाँ; नारायण: --नारायण; साक्षात्-- प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर; न््यासिनाम्--सन्यासियों के; परम:--परमेश्वर; गति:-- लक्ष्य;शान्तानामू--शान्त रहने वालों का; न्यस्त--विरक्त; दण्डानाम्--हिंसा के; यत:--जिससे; न आवर्तते--नहीं लौटता; गत:--जाकर।
बड़े बड़े देवता, यह न जानने से कि वर का निराकरण कैसे किया जाये, केवल मौन रह सकते हैं।
शिवजी समस्त अंधकार के परे वैकुण्ठ के तेजस्वी धाम पहुँचे, जहाँ साक्षात् भगवान्नारायण प्रकट होते हैं।
यह धाम उन विरक्तों का गन्तव्य है, जिन्हें शान्ति प्राप्त हो चुकी है औरजो अन्य प्राणियों के प्रति हिंसा छोड़ चुके हैं।
वहाँ जाकर कोई फिर से नहीं लौटता।
त॑ तथा व्यसन हृष्ठा भगवान्वृजिनार्दन: ।
दूराव्प्रत्युदियाद्धृत्वा बदुको योगमायया ॥
२७॥
मेखलाजिनदण्डाक्षैस्तेजसाग्निरिव ज्वलन् ।
अभिवादयामास च तं कुशपाणिर्विनीतवत् ॥
२८॥
तम्--उस; तथा--इस प्रकार; व्यसनम्--संकट को; हृष्टा--देखकर; भगवान्-- भगवान्; वृजिन--कष्ट को; अर्दन:--नष्टकरने वाले; दूरात्ू--दूर से; प्रत्युदियात्ू--( वृकासुर के ) सामने आ गये; भूत्वा--बन कर; बटुकः--ब्रह्मचारी छात्र; योग-मायया--अपनी अन््तरंगा योगशक्ति से; मेखल--छात्र की पेटी; अजिन--मृगचर्म ; दण्ड--डण्डा; अक्षैः--तथा जप-माला सेयुक्त; तेजसा--अपने तेज से; अग्नि: इब--अग्नि की तरह; ज्वलन्--प्रकाश करते; अभिवादयाम् आस--आदरपूर्वक सत्कारकिया; च--तथा; तम्--उसको; कुश-पाणि:--हाथ में कुशा लिए; विनीत-वत्--विनीत होकरअपने भक्तों के कष्टों को हरने वाले
भगवान् ने दूर से ही देख लिया कि शिवजी संकट मेंहैं।
अतएव अपनी योग-माया शक्ति से उन्होंने ब्रह्मचारी छात्र का रूप धारण कर लिया, जोउपयुक्त मेखला, मृगचर्म, दण्ड तथा जप-माला से युक्त था और वृकासुर के समक्ष आये।
भगवान् की आभा अग्नि के समान चमचमा रही थी।
अपने हाथ में कुशा घास पकड़े हुए,उन्होंने असुर का विनीत भाव से स्वागत किया।
श्रीभगवानुवाचशाकुनेय भवान्व्यक्त श्रान्तः कि दूरमागतः ।
क्षणं विश्रम्यतां पुंस आत्मायं सर्वकामधुक् ॥
२९॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; शाकुनेय--हे शकुनि-पुत्र; भवान्ू--आप; व्यक्तम्--स्पष्टत:; श्रान्त:--थके हुए;किमू--किस कारण; दूरमू--दूर से; आगत:--आये हैं; क्षणम्--क्षण-भर के लिए; विश्रम्यताम्--कृपया आराम करें;पुंसः--पुरुष का; आत्मा--शरीर; अयम्--यह; सर्व--समस्त; काम--इच्छाएँ; धुक्--गाय के दूध के समान देते हुए।
भगवान् ने कहा : हे शकुनि-पुत्र, तुम थके लग रहे हो।
तुम इतनी दूर क्यों आये हो ? कुछक्षण के लिए विश्राम कर लो।
आखिर मनुष्य का शरीर ही सारी इच्छाओं को पूरा करने वालाहै।
यदि न: श्रवणायाल युष्मद्व्यवसितं विभो ।
भण्यतां प्रायशः पुम्भिर्धुतिः स्वार्थान्समीहते ॥
३०॥
यदि--यदि; नः--हमारा; श्रवणाय--सुनने के लिए; अलमू--उपयुक्त; युष्मत्--तुम्हारा; व्यवसितम्--विचार; विभो--हेशक्तिशाली; भण्यतामू--कृपया बतलायें; प्रायश:--सामान्यतया; पुम्भि:--व्यक्तियों से; धृतेः-- धारण किया हुआ; स्व--अपने; अर्थान्ू-- प्रयोजन के लिए; समीहते--सम्पन्न करता है।
है विभो, यदि आप हमें इस योग्य समझते हैं, तो हमें बतलाइये कि आप क्या करना चाहतेहैं।
सामान्यतया मनुष्य अन्यों से सहायता लेकर अपने कार्यो को सिद्ध करता है।
श्रीशुक उबाचएवं भगवता पृष्टो वचसामृतवर्षिणा ।
गतक्लमोउब्रवीत्तस्मै यथापूर्वमनुष्ठितम् ॥
३१॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस प्रकार; भगवता-- भगवान् द्वारा; पृष्ठ: --पूछे जाने पर; बचसा--वाणी से; अमृत--अमृत; वर्षिणा--वर्षा करने वाली; गत--समाप्त; क्लम:-- थकान; अब्रवीत्--कहा; तस्मै-- उनसे; यथा--जिस तरह; पूर्वमू--पहले; अनुष्ठितम्--सम्पन्न किया हुआ।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस तरह मधुर अमृत की वर्षा करने वाली वाणी में भगवान्द्वारा प्रश्न किये जाने पर वृक को लगा कि उसकी थकावट मिट गई है।
उसने भगवान् से अपनेद्वारा की गई हर बात बतला दी।
श्रीभगवानुवाचएवं चेत्तहि तद्बाक्यं न वयं श्रदधीमहि ।
यो दक्षशापात्पैशाच्यं प्राप्त: प्रेतपिशाचराट् ॥
३२॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; एवम्--ऐसा; चेत्--यदि; तहि--तो; तत्--उसके; वाक्यम्--कथनों में; न--नहीं;वयम्--हम; श्रद्धीमहि--विश्वास कर सकते हैं; यः--जो; दक्ष-शापात्--दक्ष प्रजापति के शाप से; पैशाच्यम्--पिशाचों केगुण; प्राप्त:--प्राप्त; प्रेत-पिशाच--प्रेतों तथा पिशाचों का; राट्ू--राजा |
भगवान् ने कहा : यदि ऐसा ही है, तो हम शिव के कहने पर विश्वास नहीं कर सकते।
शिवतो प्रेतों तथा पिशाचों के वही स्वामी हैं, जिन्हें दक्ष ने एक मानव-भक्षी पिशाच बनने का शापदिया था।
यदि वस्तत्र विश्रम्भो दानवेन्द्र जगद्गुरौ ।
तहाड्राशु स्वशिरसि हस्तं न्यस्य प्रतीयताम् ॥
३३ ॥
यदि--यदि; व: --तुम्हारा; तत्र--उसमें; विश्रम्भ:--विश्वास; दानव-इन्द्र--हे असुरों में श्रेष्ठ; जगत्--ब्रह्माण्ड के; गुरौ--गुरुकी तरह; तहिं--तो; अड़--हे मित्र; आशु--अभी यहीं पर; स्व--अपने; शिरसि--सिर पर; हस्तम्--अपना हाथ; न्यस्य--रखकर; प्रतीयताम्--देख लो
हे असुर- श्रेष्ठ, यदि उन पर तुम्हें विश्वास है, क्योंकि वे ब्रह्माण्ड के गुरु हैं, तो अविलम्ब तुमअपना हाथ अपने सिर पर रखो और देख लो कि क्या होता है।
यद्यसत्यं वचः शम्भो: कथझ्ञिद्दानवर्षभ ।
तदैनं जह्सद्वाचं न यद्वक्तानृतं पुन: ॥
३४॥
यदि--यदि; असत्यम्--झूठ; वच:ः--शब्द; शम्भो: --शिव के; कथज्ित्--किसी भी तरह; दानव-ऋषभ--हे दानव-श्रेष्ठ;तदा--तो; एनम्--उसको; जहि--मार डालो; असत्--असत्य; वाचम्--जिसके शब्द; न--नहीं; यत्--जिससे; वक्ता--बोलसके; अनृतम्--झूठ; पुनः--फिर।
हे दानव-श्रेष्ठ, यदि किसी तरह भगवान् शम्भु के शब्द असत्य सिद्ध होते हैं, तो उस झूठेका वध कर दो, जिससे वह दुबारा झूठ न बोल सके।
इत्थं भगवतश्ित्रैंचोभि: स सुपेशलै: ।
भिन्नधीर्विस्मृत: शीर्णिण स्वहस्तं कुमतिर्यधात् ॥
३५॥
इत्थम्--इस प्रकार से; भगवतः-- भगवान् के; चित्रै:--अद्भुत; वचोभि:--शब्दों से; सः--उसने ( वृक ); सु--अत्यन्त;पेशलै:--चतुर; भिन्न--मोहग्रस्त; धीः--उसका मन; विस्मृत: -- भूल कर; शीर्ष्णि--सिर पर; स्व--अपना; हस्तम्ू-हाथ; कु-मतिः--मूर्ख ने; न््यधात्--रख दिया।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार भगवान् के मोहक चतुर शब्दों से मोहित होकरमूर्ख वृक ने बिना समझे कि वह क्या कर रहा है, अपने सिर पर अपना हाथ रख दिया।
अथापतद् भिन्नशिरा: वज्जाहत इव क्षणात् ।
जयशब्दो नमःशब्दः साधुशब्दो भवद्दिवि ॥
३६॥
अथ--तब; अपततू--गिर पड़ा; भिन्न--छिन्न-भिन्न हुआ; शिरा:--उसका सिर; वज़--वज़ से; आहत:--चोट खाया; इब--मानो; क्षणात्-- क्षण-भर में; जय--' जय हो '; शब्द: -- ध्वनि; नम:--' नमस्कार है '; शब्दः--ध्वनि; साधु--' साधु साधु ';शब्द:--ध्वनि; अभवत्-हुई; दिवि--आकाश में |
उसका सिर तत्क्षण विदीर्ण हो गया, मानो वसज् द्वारा प्रहार हुआ हो और वह असुर भूमि परगिर कर मर गया।
आकाश से 'जय हो, 'नमस्कार है' तथा 'साधु साधु' जैसी ध्वनियाँसुनाई पड़ीं।
मुमुचु: पुष्पवर्षाणि हते पापे वृकासुरे ।
देवर्षिपितृगन्धर्वा मोचित: सड्डूटाच्छिव: ॥
३७॥
मुमुचु:--कराई; पुष्प--फूलों की; वर्षाणि--वर्षा; हते--मारे जाने पर; पापे--पापी; वृक-असुरे--वृकासुर के; देव-ऋषि--दैवी ऋषियों; पितृ--पुरखों; गन्धर्वा:--तथा स्वर्ग के गवैयों ने; मोचित:ः--छुटकारा पाये हुए; सड्डूटातू--संकट से; शिव:--शिव
पापी वृकासुर के मारे जाने पर उत्सव मनाने के लिए दैवी ऋषियों, पितरों तथा गन्धर्वों नेफूलों की वर्षा की।
अब शिवजी खतरे से बाहर थे।
ुक्त गिरिशमभ्याह भगवान्पुरुषोत्तम: ।
अहो देव महादेव पापोयं स्वेन पाप्मना ॥
३८ ॥
हतः को नु महत्स्वीश जन्तुर्वे कृतकिल्बिष: ।
क्षेमी स्थात्किमु विश्वेशे कृतागस्को जगदगुरो ॥
३९॥
मुक्तम्-मुक्त हुए; गिरिशम्--शिव को; अभ्याह--सम्बोधित किया; भगवान् पुरुष-उत्तम:-- भगवान् ( नारायण ) ने; अहो--ओह; देव--हे स्वामी; महा-देव--शिव; पाप:--पापी; अयम्--यह व्यक्ति; स्वेन--अपने; पाप्मना--पापों से; हतः--मारागया; कः--क्या; नु--निस्सन्देह; महत्सु--बड़े सन््तों के प्रति; ईश--हे स्वामी; जन्तु:--जीव; बै--निस्सन्देह; कृत--कियागया; किल्बिष: --अपराध; क्षेमी-- भाग्यवान्; स्थात्--हो सकता है; किम् उ--क्या कहा जा सकता है, और भी; विश्व--ब्रह्माण्ड के; ईशे--ईश्वर ( आप ) के विरुद्ध; कृत-आगस्क: ---अपराध करके ; जगत्--ब्रह्माण्ड के; गुरौ--गुरु के |
तब पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने खतरे से बाहर हुए गिरिश को सम्बोधित किया, 'हे महादेव,मेरे प्रभु, देखें न, यह दुष्ट व्यक्ति अपने ही पाप के फलों से किस तरह मारा गया है।
निस्सन्देह,यदि कोई जीव महान् सन््तों का अपमान करता है, तो वह सौभाग्य की आशा कैसे कर सकताहै? ब्रह्माण्ड के स्वामी तथा गुरु के प्रति अपराध करने के विषय में, तो कहा ही क्या जासकता।
य एवमव्याकृतशक्त्युदन्ब॒तःपरस्य साक्षात्परमात्मनो हरे: ।
गिरित्रमोक्ष॑ कथयेच्छुणोति वाविमुच्यते संसूतिभिस्तथारिभि: ॥
४०॥
यः--जो भी; एवम्--इस प्रकार; अव्याकृत--अचिन्त्य; शक्ति--शक्तियों के; उदन््वत:--सागर; परस्य--परम की; साक्षात्--स्वयं प्रकट; परम-आत्मन:--परमात्मा; हरेः-- भगवान् हरि के; गिरित्र--शिव के; मोक्षम्--बचाव को; कथयेत्--सुनाता है;श्रुणोति--सुनता है; वा--अथवा; विमुच्यते--छूट जाता है; संसृतिभि: --बारम्बार जन्म तथा मृत्यु से; तथा-- भी; अरिभि:--शत्रुओं से
भगवान् हरि साक्षात् प्रकट परम सत्य, परमात्मा तथा अचिन्त्य शक्तियों के असीम सागर हैं।
जो कोई भी, उनके द्वारा शिव को बचाने की इस लीला को कहेगा या सुनेगा, वह सारे शत्रुओं तथा जन्म-मृत्यु के आवागमन से मुक्त हो जायेगा।
