← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची

अध्याय सत्तासी: साक्षात वेदों की प्रार्थनाएँ

10.87श्रीपरीक्षिदुवाचब्रह्मन्ब्रह्मण्यनिर्देश्ये निर्गुणे गुणवृत्तय: ।

कथ॑ चरन्ति श्रुतयः साक्षात्सदसत:ः परे ॥

१॥

श्री-परीक्षित्‌ उबाच-- श्री परीक्षित ने कहा; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण ( शुकदेव ); ब्रह्मणि--परब्रह्म में; अनिर्देश्ये--जिसका शब्दों मेंवर्णन करना कठिन हो; निर्गुणे--गुणरहित; गुण-- प्रकृति के गुण; वृत्तय:--जिसका कार्यक्षेत्र; कथम्‌--कैसे; चरन्ति--कार्यकरते हैं; श्रुतपः--वेद; साक्षात्‌-- प्रत्यक्षत:; सत्‌-- भौतिक वस्तु को; असतः--तथा इसके सूक्ष्म कारण; परे--उसमें, जो दिव्यहै

श्री परीक्षित ने कहा : हे ब्राह्मण, भला वेद उस परम सत्य का प्रत्यक्ष वर्णन कैसे कर सकतेहैं, जिसे शब्दों द्वारा बतलाया नहीं जा सकता? वेद भौतिक प्रकृति के गुणों के वर्णन तक हीसीमित हैं, किन्तु ब्रह्म समस्त भौतिक स्वरूपों तथा उनके कारणों को लाँघ जाने के कारण इनगुणों से रहित है।

श्रीशुक उबाचबुद्धीन्द्रियमन:प्राणान्‍जनानामसूजत्प्रभु: ।

मात्रार्थ च भवार्थ च आत्मनेडकल्पनाय च ॥

२॥

श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; बुर्द्धि--बुद्धि; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; मन: --मन; प्राणान्‌ू--तथा प्राण; जनाणाम्‌--जीवों के; असृजत्‌--उत्पन्न किया; प्रभु:ः-- भगवान्‌ ने; मात्र--इन्द्रिय-तृप्ति के; अर्थम्‌-हेतु; च--तथा; भव--जन्म ( तथाउसके बाद के कार्यों ) के; अर्थम्‌-हेतु; च--तथा; आत्मने--आत्मा ( तथा अगले जीवन में उसके सुख की प्राप्ति ) के लिए;अकल्पनाय-- भौतिक उद्देश्यों के परित्याग के लिए; च--तथा।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : भगवान्‌ ने जीवों की भौतिक बुद्धि, इन्द्रियाँ, मन तथा प्राण कोप्रकट किया, जिससे वे अपनी इच्छाओं को इन्द्रिय-तृप्ति में लगा सकें, सकाम कर्म में संलग्नहोने के लिए बारम्बार जन्म ले सकें, अगले जन्म में ऊपर उठ सकें तथा अन्ततः मोक्ष प्राप्त करसकें।

सैषा ह्युपनिषद्गाह्ी पूर्वेशां पूर्वजैर्थूता ।

रद्धया धारयेहास्तां क्षेमं गच्छेदकिज्लनः ॥

३॥

सा एषा--वही; हि--निस्सन्देह; उपनिषत्‌--उपनिषद्‌; ब्राह्मी --ब्रह्म से सम्बन्धित; पूर्वेषाम--हमारे पूर्वजों ( यथा नारद ) के;पूर्व-जैः --पूर्वजों द्वारा ( यथा सनक ); धृत--ध्यान किया गया; श्रद्धवा-- श्रद्धा के साथ; धारयेत्‌-- ध्यान करता है; यः--जोभी; तामू--उस पर; क्षेममू--चरम सफलता; गच्छेत्‌ू--प्राप्त करेगा; अकिज्ञन: -- भौतिक सम्बन्ध से रहित।

हमारे प्राचीन पूर्वजों से भी पूर्व, जो लोग हो चुके हैं, उन्होंने भी परम सत्य के इसी गुह्य ज्ञानका ही ध्यान किया है।

निस्सन्देह, जो भी श्रद्धापूर्वक इस ज्ञान में एकाग्र होता है, वह भौतिकआसक्ति से छूट जायेगा और जीवन के अन्तिम लक्ष्य को प्राप्त कर सकेगा।

अत्र ते वर्णयिष्यामि गाथां नारायणान्विताम्‌ ।

नारदस्य च संवादमृषे्नारायणस्य च ॥

४॥

अत्र--इस सम्बन्ध में; ते--तुमसे; वर्णयिष्यामि--वर्णन करूँगा; गाथाम्‌--विवरण; नारायण-अन्वितामू-- भगवान्‌ नारायण सेसम्बन्धित; नारदस्य--नारद की; च--तथा; संवादम्‌--वार्ता; ऋषे: नारायणस्य-- श्री नारायण ऋषि की; च--तथा |

इस सम्बन्ध में मैं तुम से भगवान्‌ नारायण विषयक एक गाथा कहूँगा।

यह उस वार्ता केविषय में है, जो श्री नारायण ऋषि तथा नारद मुनि के मध्य हुई थी।

एकदा नारदो लोकान्पर्यटन्भगवत्प्रिय: ।

सनातनमृषिं द्रष्ठ्रं ययौ नारायणा भ्रमम्‌ ॥

५॥

एकदा--एक बार; नारद:--नारद मुनि; लोकान्‌--लोकों में; पर्यटन्‌-- भ्रमण करते हुए; भगवत्‌-- भगवान्‌ के ; प्रियः--प्रिय;सनातनम्‌--आदि; ऋषिम्‌--ऋषि को; द्रष्टू--देखने के लिए; ययौ--गये; नारायण-आश्रमम्‌ू--नारायण ऋषि की कुटियामें

एक बार ब्रह्माण्ड के विविध लोकों का भ्रमण करते हुए, भगवान्‌ के प्रिय भक्त नारद आदिऋषि नारायण से मिलने, उनके आश्रम में गये।

यो वै भारतवर्षेउस्मिन्क्षेमाय स्वस्तये नृणाम्‌ ।

धर्मज्ञाशशमोपेतमाकल्पादास्थितस्तप: ॥

६॥

यः--जो; बै--निस्सन्देह; भारत-वर्षे-- भारत की पवित्र भूमि पर; अस्मिनू--इस; क्षेमाय--इस जीवन में कल्याण के लिए;स्वस्तये--तथा अगले जीवन में कल्याण के लिए; नृणाम्‌--मनुष्यों के; धर्म--धर्म; ज्ञान--आध्यात्मिक ज्ञान; शम--तथाआत्म-संयम से; उपेतम्‌--समृद्ध; आ-कल्पात्‌--कल्प ( ब्रह्मा के दिन ) के प्रारम्भ से; आस्थित:--करते हुए; तप:ः--तपस्या |

तत्रोपविष्टमृषिभि: कलापग्रामवासिभि: ।

परीतं प्रणतोपृच्छदिदमेव कुरूद्वह ॥

७॥

तत्र--वहाँ; उपविष्टम्‌--बैठे हुए; ऋषिभि:--ऋषियों द्वारा; कलाप-ग्राम--कलाप नामक ग्राम में ( जो बदरिकाश्रम के निकटहै ); वासिभि: --वास कर रहे; परीतम्‌--घिरे हुए; प्रणतः--झुक कर; अपृच्छत्‌--पूछा; इृदम्‌ एव--यही ( प्रश्न ); कुरू-उद्दद-हे कुरु श्रेष्ठ |

वहाँ नारद भगवान्‌ नारायण ऋषि के पास पहुँचे, जो कलाप ग्राम के मुनियों के बीच में बैठेहुए थे।

हे कुरुवीर, भगवान्‌ को नमस्कार करने के बाद नारद ने उनसे यही प्रश्न पूछा, जो तुमनेमुझसे पूछा है।

तस्मै हवोचद्धगवानृषीणां श्रुण्वतामिदम्‌ ।

यो ब्रह्मवाद: पूर्वेषां जनलोकनिवासिनाम्‌ ॥

८॥

तस्मै--उससे; हि--निस्सन्देह; अवोचत्‌--बोले; भगवान्‌-- भगवान्‌; ऋषीणाम्‌--मुनियों के; श्रृण्वताम्‌ू--सुन रहे; इदम्‌--यह;यः--जो; ब्रह्म--ब्रह्म के विषय में; वाद:--चर्चा ; पूर्वेषाम्‌--प्राचीन; जन-लोक-निवासिनामू--जनलोक के निवासियों केबीच

ऋषियों के सुनते-सुनते नारायण ऋषि ने नारद को परम ब्रह्म विषयक, वह प्राचीन चर्चासुनाई, जो जनलोक के वासियों के बीच हुई थी।

श्रीभगवानुवाचस्वायम्भुव ब्रह्मसत्रं जनलोकेभवत्पुरा ।

तत्रस्थानां मानसानां मुनीनामूरध्वरितसाम्‌ ॥

९॥

श्री-भगवान्‌ उबाच-- भगवान्‌ ने कहा; स्वायम्भुव--हे स्व-जन्मा ब्रह्मा के पुत्र; ब्रह्म--दिव्य ध्वनि के उच्चारण से सम्पन्न;सत्रमू--यज्ञ; जन-लोके--जनलोक में; अभवत्‌--हुआ; पुरा--भूतकाल में; तत्र--वहाँ; स्थानामू--वहाँ रहने वालों के;मानसानाम्‌--मन से उत्पन्न ( ब्रह्म ) के; मुनीनामू--मुनियों के मध्य; ऊर्ध्व--ऊपर की ओर ( गति करने वाले ); रेतसाम्‌--वीर्यबाले।

भगवान्‌ ने कहा : हे स्वजन्मा ब्रह्मा के पुत्र, एक बार बहुत समय पहले, जनलोक में रहनेवाले दिद्वान मुनियों ने दिव्य ध्वनि का उच्चारण करते हुए एक महान्‌ ब्रह्म यज्ञ सम्पन्न किया।

ये सारे मुनि, जो ब्रह्मा के मानस पुत्र थे, पूर्ण ब्रह्मचारी थे।

श्वेतद्वीपं गतवति त्वयि द्रष्ट तदी ध्वरम्‌ ।

ब्रह्मवाद: सुसंवृत्त: श्रुत॒यो यत्र शेरते ।

तत्र हायमभूत्प्रश्नस्त्वं मां यमनुपृच्छसि ॥

१०॥

श्वेतद्वीपम्‌-- श्वेतद्वीप में; गतवति--जाकर; त्वयि--तुम ( नारद ); द्रष्टमू--देखने के लिए; तत्‌ू--इसका; ईश्वरम्‌--स्वामी( अनिरुद्ध ); ब्रहा--ब्रह्न विषयक; वाद: --गोष्ठी; सु--उत्साहपूर्वक; संवृत्त:--प्रारम्भ हुई; श्रुत॒थः --वेद; यत्र--जिसमें( अनिरुद्ध जोकि क्षीरोदकशायी विष्णु भी कहलाते हैं ); शेरते--शयन करने लगे; तत्र--उसके विषय में; ह--निस्सन्देह;अयम्‌--यह; अभूत्‌--उठा; प्रश्न: --प्रश्न; त्वम्‌--तुम; मामू--मुझसे; यम्‌--जो; अनुपृच्छसि--फिर से पूछ रहे हो |

उस समय तुम श्रवेतद्वीप में भगवान्‌ का दर्शन करने गये हुए थे--जिनके भीतर ब्रह्माण्ड केसंहार काल के समय सारे वेद विश्राम करते हैं।

जनलोक में परब्रह्म के स्वभाव के विषय मेंऋषियों के मध्य जीवन्त वाद-विवाद उठ खड़ा हुआ।

निस्सन्देह, तब यही प्रश्न उठा था, जिसेतुम अब मुझ से पूछ रहे हो।

तुल्यश्रुततपःशीलास्तुल्यस्वीयारिमध्यमा: ।

अपि चक्र: प्रवचनमेक॑ शुश्रूषवोपरे ॥

११॥

तुल्य--समान; श्रुत--वेदों से सुनने में; तपः--तथा तपस्या; शीला:--जिनके चरित्र; तुल्य--समान; स्वीय--मित्रों का;अरि--शत्रु; मध्यमा:--तथा उदासीन या निष्पक्ष; अपि--यद्यपि; चक्कु:--बनाया; प्रवचचनम्‌--वक्ता को; एकम्‌--उनमें से एक;शुश्रूषव:--उत्सुक श्रोतागण; अपरे--अन्य |

यद्यपि वेदाध्ययन तथा तपस्या के मामले में ये ऋषि समान रूप से योग्य थे और मित्रों,शत्रुओं तथा निष्पक्षों को समान दृष्टि से देखते थे, फिर भी उन्होंने अपने में से एक को वक्ताबनाया और शेष जन उत्सुक श्रोता बन गये।

श्रीसनन्दन उवाचस्वसृष्टमिदमापीय शयानं सह शक्तिभि: ।

तदन्ते बोधयां चक्रुस्तल्लिड्लैः श्रुत॒पः परम्‌ ॥

१२॥

यथा शयानं संराजं वन्दिनस्तत्पराक्रमैः ।

प्रत्यूषेभेत्य सुश्लोकैर्बोधयन्त्यनुजीविन: ॥

१३॥

श्री-सनन्दनः-- श्री सनन्दन ( ब्रह्मा का मानस पुत्र, जिसे ऋषियों के प्रश्न का उत्तर देने के लिए चुना गया ) ने; उबाच--कहा;स्व--अपने से; सृष्टम्‌--उत्पन्न; इदम्‌--यह ( ब्रह्माण्ड ); आपीय--समेट कर के; शयानम्‌ू--सोया हुआ; सह--साथ;शक्तिभि:--अपनी शक्तियों के; ततू--उस ( प्रलयकाल ) के; अन्ते--अन्त में; बोधयाम्‌ चक्र: --उसे जगाया; तत्‌--उसके;लिड्वैः--गुणों ( के वर्णन ) से; श्रुतपः --वेद; परम्‌--ब्रह्म; यथा--जिस तरह; शयानम्‌--सोया हुआ; संराजम्‌--राजा को;वन्दिन:--उसके दरबारी कवि; तत्‌--उसके; पराक्रमैः--वीरतापूर्ण कार्यों ( के वर्णन ) से; प्रत्यूषे --प्रातःकाल; अभेत्य--पासपहुँच कर; सुश्लोकै:ः--कवित्वमय; बोधयन्ति--जगाते हैं; अनुजीविन:--उसके सेवक |

श्री सनन्दन ने उत्तर दिया : जब भगवान्‌ ने अपने द्वारा पूर्व-निर्मित ब्रह्माण्ड को समेटलिया, तो वे कुछ काल तक ऐसे लेटे रहे, मानो सोये हुए हैं और उनकी सारी शक्तियाँ उनमें सुप्तपड़ी रहीं।

जब अगली सृष्टि करने का समय आया, तो साक्षात्‌ वेदों ने उनकी महिमाओं कागायन करते हुए उन्हें जगाया, जिस तरह राजा की सेवा में लगे कविगण प्रातःकाल उसके पासजाकर उसके वीरतापूर्ण कार्यों को सुनाकर, उसे जगाते हैं।

श्रीश्रुतथ ऊचु:जय जय जह्मजामजित दोषगृभीतगुणांत्वमसि यदात्मना समवरुबद्धसमस्तभग: ।

अगजगदोकसामखिलशक्त्यवबोधक तेक्वचिदजयात्मना च चरतोउनुचरेन्निगम: ॥

१४॥

श्री-श्रुतथः ऊचु:--वेदों ने कहा; जयजय---आपकी जय हो, जय हो; जहि--परास्त करें; अजाम्‌--माया को; अजित--हेअजित; दोष--दोष उत्पन्न करने के लिए; गृभीत-- धारण किये हुए; गुणाम्‌--पदार्थ के गुण; त्वमू--तुम; असि--हो; यत्‌--क्योंकि; आत्मना--अपनी मूल स्थिति मे; समवरुद्ध--पूर्ण; समस्त--समस्त; भग:--ऐ श्वर्य में; अग--अचर; जगत्‌--तथाचर; ओकसामू-- भौतिक शरीर वालों के; अखिल--समस्त; शक्ति--शक्तियाँ; अवबोधक--हे जागृत करने वाले; ते--तुम; क्वचित्‌ू--कभी कभी; अजया--अपनी भौतिक शक्ति से; आत्मना--तथा अपनी अन्तरंगा आध्यात्मिक शक्ति से; च--भी;चरतः--व्यस्त रखते हुए; अनुचरेत्‌ू--समझ सकता है; निगम:--वेद

श्रुतियों ने कहा : हे अजित, आपकी जय हो, जय हो, अपने स्वभाव से आप समस्त ऐश्वर्यसे परिपूर्ण हैं, अतएवं आप माया की शाश्वत शक्ति को परास्त करें, जो बद्धजीवों के लिएकठिनाइयाँ उत्पन्न करने के लिए तीनों गुणों को अपने वश में कर लेती है।

चर तथा अचरदेहधारियों की समस्त शक्ति को जागृत करने वाले, कभी कभी जब आप अपनी भौतिक तथाआध्यात्मिक शक्तियों के साथ क्रीड़ा करते हैं, तो वेद आपको पहचान लेते हैं।

जाबृहदुपलब्धमेतदवयन्त्यवशेषतयायत उदयास्तमयौ विकृतेमृदि वाविकृतात्‌ ।

अत ऋषयो दधुस्त्वयि मनोवचनाचरितंकथमयथा भवन्ति भुवि दत्तपदानि नृणाम्‌ ॥

१५॥

बृहत्‌--ब्रह्म के रूप में; उपलब्धम्‌-- अनुभूत; एतत्‌--यह ( जगत ); अवयन्ति--बे मानते हैं; अवशेषतया--जगत कीसर्वव्यापी नींव के रूप में; यत:--चूँकि; उदय--उत्पत्ति; अस्तमू-अयौ--तथा विलय; विकृतेः--विकार का; मृदि--मिट्टी का;वबा--मानो; अविकृतात्‌--विकार रहित ( ब्रह्म ); अतः--इसलिए; ऋषय:--ऋषियों ने ( जिन्होंने वैदिक मंत्रों का संगलनकिया ); दधुः--स्थापित किया, रखा; त्वयि--तुम में; मनः--अपने मन; वचन--शब्द; आचरितम्‌ू--तथा कर्म; कथम्‌--कैसे;अयथा--जिस रूप में हैं, उस रूप में नहीं; भवन्ति--हो जाते हैं; भुवि-- भूमि पर; दत्त--रखे हुए; पदानि--पग; नृणाम्‌ू--मनुष्यों के

इस दृश्य जगत की पहचान ब्रह्म से की जाती है, क्योंकि परब्रह्म समस्त जगत की अनन्तिम नींव है।

यद्यपि समस्त उत्पन्न वस्तुएँ उनसे उदभूत होती हैं और अन्त में उसी में लीन होती हैं, तोभी ब्रह्म अपरिवर्तित रहता है, जिस तरह कि मिट्टी जिससे अनेक वस्तुएँ बनाई जाती हैं और वेवस्तुएँ फिर उसी में लीन हो जाती हैं, वह अपरिवर्तित रहती है।

इसीलिए सारे वैदिक ऋषि अपनेविचारों, अपने शब्दों तथा अपने कर्मों को आपको ही अर्पित करते हैं।

भला ऐसा कैसे होसकता है कि जिस पृथ्वी पर मनुष्य रहते हैं, उसे उनके पैर स्पर्श न कर सकें ?

इति तब सूरयस्त्यधिपतेडखखिललोकमल-क्षपणकथामृताब्धिमवगाह्य तपांसि जहु: ।

किमुत पुनः स्वधामविधुताशयकालगुणाःपरम भजन्ति ये पदमजस्त्रसुखानुभवम्‌ ॥

१६॥

इति--इस प्रकार; तव--तुम्हारा; सूरय:--ज्ञानी सन्त; त्रि--तीन ( लोकों के ); अधिपते--हे स्वामी; अखिल--समस्त;लोक--लोकों का; मल--दूषण; क्षपण--उन्मूल करने वाले; कथा--चर्चा के; अमृत--अमृत; अब्धिम्‌--समुद्र में;अवगाह्य--डुबकी लगाकर; तपांसि--अपने कष्टों को; जहुः--त्याग दिया है; किम्‌ उत--क्या कहा जा सकता है; पुन:--औरभी; स्व-- अपनी; धाम--शक्ति से; विधुत--दूर किया हुआ; आशय--मनों के; काल--तथा समय के; गुणा:--( अवांछित )गुण; परम-हे सर्वश्रेष्ठ; भजन्ति--पूजा करते हैं; ये--जो; पदम्‌--आपके असली स्वभाव को; अजस्त्र--निर्बाध; सुख--सुखका; अनुभवम्‌-- अनुभव |

अतएवब हे त्रिलोकपति, बुद्धिमान लोग आपकी कथाओं के अमृतमय सागर में गहरी डुबकीलगाकर समस्त क्लेशों से छुटकारा पा लेते हैं, क्योंकि आपकी कथाएँ ब्रह्माण्ड के सारे दूषणको धो डालती हैं।

तो फिर उन लोगों के बारे में क्या कहा जाय, जिन्होंने आध्यात्मिक शक्ति केद्वारा अपने मनों को बुरी आदतों से और स्वयं को काल से मुक्त कर लिया है और, हे परमपुरुष, आपके असली स्वभाव की, जिसके भीतर निर्बाध आनन्द भरा है, पूजा करने में समर्थहैं?

हतय इव श्रसन्त्यसुभूतो यदि तेडनुविधामहदहमादयोण्डमसूजन्यदनुग्रहत: ।

पुरुषविधोउन्वयोउत्र चरमोउन्नमयादिषु यःसदसत: परं त्वमथ यदेष्ववशेषपृतम्‌ ॥

१७॥

हतय:--धौंकनी; इब--सहृश; श्वसन्ति-- श्वास लेते हैं; असु-भृत:--जीवित; यदि--यदि; ते--तुम्हारे; अनुविधा:--स्वामि-भक्त अनुयायी; महत्‌--सम्पूर्ण भौतिक शक्ति; अहम्‌--मिथ्या अहंकार; आदय:--तथा सृष्टि के अन्य तत्त्व; अण्डम्‌--ब्रह्माण्डको; असृजन्‌--उत्पन्न किया; यत्‌--जिसकी; अनुग्रहतः--कृपा से; पुरुष--जीविका; विध:--विशिष्ट स्वरूपों के अनुसार;अन्वय:--जिनका प्रवेश; अत्र--इनमें से; चरम:--चरम; अन्न-मय-आदिषु--अन्नमय नामक अभिव्यक्तियों में; यः--जो; सत्‌ू-असतः--स्थूल तथा सूक्ष्म पदार्थ से; परमू--पृथक्‌; त्वम्‌ू--तुम; अथ--और भी आगे; यत्‌--जो; एषु--इनमें से; अवशेषम्‌ --निहित; ऋतम्‌--वास्तविकता।

यदि वे आपके श्रद्धालु अनुयायी बन जाते हैं, तभी वे साँस लेते हुए वास्तव में जीवित हैं,अन्यथा उनका साँस लेना धौंकनी जैसा है।

यह तो आपकी एकमात्र कृपा ही है कि महत्‌ तत्त्वतथा मिथ्या अहंकार से प्रारम्भ होने वाले तत्त्वों ने इस ब्रह्माण्ड रूपी अंडे को जन्म दिया।

अन्नमय इत्यादि स्वरूपों में आप ही चरम हैं, जो जीव के साथ भौतिक आवरणों में प्रवेश करकेउसके ही जैसे स्वरूप ग्रहण करते हैं।

स्थूल तथा सूक्ष्म भौतिक स्वरूपों से भिन्न, आप उन सबोंमें निहित वास्तविकता हैं।

उदरमुपासते य ऋषिवर्त्मसु कूर्पहशः'परिसरपद्धतिं हृदयमारुणयो दहरम्‌ ।

तत उदगादनन्त तव धाम शिरः परमंपुनरिह यत्समेत्य न पतन्ति कृतान्तमुखे ॥

१८॥

उदरम्‌--पेट; उपासते--पूजते हैं; ये--जो; ऋषि--ऋषियों की; वर्त्मसु--मानक विधियों के अनुसार; कूर्प--स्थूल; दहृश:--उनकी दृष्टि; परिसर--जिससे सारी प्राणिक शाखाएँ ( नाड़ियाँ ) फूटती हैं; पद्धतिम्‌--शिरोविन्दु; हृदयम्‌--हृदय; आरुणय:--आरुणि ऋषिगण; दहरम्‌--सूक्ष्म; ततः--तब से; उदगात्‌--( आत्मा ) ऊपर उठता है; अनन्त--हे अनन्त; तब--तुम्हारा;धाम--प्रकट होने का स्थान; शिर:--सिर; परमम्‌--सर्वोच्च गन्तव्य; पुन:--फिर; इह--इस जगत में; यत्‌--जो; समेत्य--पहुँच कर; न पतन्ति--नीचे नहीं गिरते हैं; कृत-अन्त--मृत्यु के; मुखे--मुख में |

बड़े बड़े ऋषियों द्वारा निर्दिष्ट विधियों के अनुयायियों में से, जिनकी दृष्टि कुछ कम परिष्कृतहोती है, वे ब्रह्म को उदर क्षेत्र में उपस्थित मानकर पूजा करते हैं, किन्तु आरुणिगण उसे हृदय मेंउपस्थित मानकर पूजा करते हैं, जो सूक्ष्म केन्द्र है जहाँ से सारी प्राणिक शाखाएँ ( नाड़ियाँ )निकलती हैं।

हे अनन्त, ये पूजक अपनी चेतना को वहाँ से ऊपर उठाकर सिर की चोटी तक लेजाते हैं, जहाँ वे आपको प्रत्यक्ष देख सकते हैं।

तत्पश्चात्‌ सिर की चोटी से चरम गन्तव्य की ओरबढ़ते हुए वे उस स्थान पर पहुँच जाते हैं, जहाँ से वे पुनः इस जगत में, जो मृत्यु के मुख स्वरूपहैं, नहीं गिरेंगे।

स्वकृतविचित्रयोनिषु विशन्निव हेतुतयातरतमतश्चकास्स्यथनलवत्स्वकृतानुकृति: ।

अथ वितथास्वमूष्ववितथां तव धाम सम॑विरजधियोनुयन्त्यभिविपण्यव एकरसम्‌ ॥

१९॥

स्व--अपने द्वारा; कृत--बनाया हुआ; विचित्र --विविध; योनिषु--योनियों में; विशन्‌--प्रवेश करते हुए; इब--सहृश;हेतुतवा--कारणस्वरूप; तरतमत:--कोटियों के अनुसार; चकास्सि--हृश्य बनते हो; अनल-वत्‌--आग की तरह; स्व--अपनी; कृत--सृष्टि; अनुकृति:--अनुकरण करते हुए; अथ--इसलिए; वितथासु--नकली; अमूषु--इन ( योनियों ) में से;अवितथम्‌--नकली नहीं; तब--तुम्हारा; धाम--प्राकट्य; समम्‌-- अभिन्न; विरज--निर्मल; धिय:--जिनके मन; अनुयन्ति--समझते हैं; अभिविपण्यव:--सारे भौतिक बन्धों ( पण ) से मुक्त हैं, जो; एक-रसम्‌--अपरिवर्तित |

आपने जीवों की जो विविध योनियाँ उत्पन्न की हैं, उनमें प्रवेश करके, उनकी उच्च तथानिम्न अवस्थाओं के अनुसार आप अपने को प्रकट करते हैं और उन्हें कर्म करने के लिए प्रेरितकरते हैं, जिस प्रकार अग्नि अपने द्वारा जलाई जाने वाली वस्तु के अनुसार अपने को विविधरूपों में प्रकट करती है।

अतएव जो लोग भौतिक आसक्तियों से सर्वथा मुक्त हैं, ऐसे निर्मलबुद्धि वाले लोग आपके अभिन्न तथा अपरिवर्तनशील आत्मा को इन तमाम अस्थायी योनियों मेंस्थायी सत्य के रूप में साक्षात्कार करते हैं।

स्वकृतपुरेष्वमीष्वबहिरन्तरसंवरणंतव पुरुषं वदन्त्यखिलशक्तिधृतोशकृतम्‌ ।

इति नृगतिं विविच्य कवयो निगमावपनंभवत उपासतेड्प्रिमभवम्भुवि विश्वसिता: ॥

२०॥

स्व--अपने द्वारा; कृत--उत्पन्न; पुरेषु--शरीरों में; अमीषु--इन; अबहि:--बाहरी रूप से नहीं; अन्तर--अथवा आन्तरिक रूपसे; संवरणम्‌--जिसका वास्तविक विकास; तव--तुम्हारा; पुरुषम्‌-- जीव; वदन्ति--वेद कहते हैं; अखिल--समस्त; शक्ति--शक्तियों के; धृतः--स्वामी के; अंश--अंशरूप; कृतम्‌-- प्रकट; इति--इस प्रकार; नृ--जीव का; गतिम्‌ू--पद; विविच्य--निश्चित करके; कवयः --विद्वान मुनिजन; निगम--वेदों के; आवपनम्‌--खेत, जिसमें सारी भेंटें बोई जाती हैं; भवतः--आपके;उपासते--पूजा करते हैं; अड्प्रिमू--पैरों की; अभवम्‌--जो संसार का संहार करने वाले हैं; भुवि--पृथ्वी पर; विश्वसिता: --विश्वास रखने वाले।

प्रत्येक जीव अपने कर्म द्वारा सृूजित भौतिक शरीरों में निवास करते हुए, वास्तव में, स्थूलया सूक्ष्म पदार्थ से आच्छादित हुए बिना रहता है।

जैसा कि वेदों में वर्णन हुआ है, ऐसा इसलिएहै, क्योंकि वह समस्त शक्तियों के स्वामी, आपका ही भिन्नांश है।

जीव की ऐसी स्थिति कोनिश्चित करके ही, विद्वान मुनिजन श्रद्धा से पूरित होकर, आपके उन चरणकमलों की पूजा करतेहैं, जो मुक्ति के स्रोत हैं और जिन पर इस संसार की सारी बैदिक भेंटें अर्पित की जाती हैं।

दुरवगमात्मतत्त्वनिगमाय तवात्ततनोश्‌चरितमहामृताब्धिपरिवर्तपरिश्रमणा: ।

न परिलषन्ति केचिदपवर्गमपी श्वर तेचरणसरोजहंसकुलसड्डभविसूष्टगृहा: ॥

२१॥

दुरवगम--समझ पाना कठिन; आत्म--आत्मा का; तत्त्व--सत्य; निगमाय--प्रसार करने हेतु; तब--तुम्हारा; आत्त-- धारणकरने वाले; तनोः:--आपके स्वरूप; चरित--लीलाओं के; महा--विस्तीर्ण; अमृत--अमृत के; अब्धि--सागर में; परिवर्त--गोता लगाकर; परिश्रमणा: -- थकान से उबारे हुए; न परिलषन्ति--इच्छा नहीं करते; केचित्‌--कुछ ही व्यक्ति; अपवर्गम्‌-मोक्षकी; अपि-- भी; ई श्वर--हे प्रभु; ते--तुम्हारे; चरण --चरणों पर; सरोज--कमल रूपी; हंस--हंसों के; कुल--समुदाय;सड़--साथ; विसूष्ट--परित्यक्त; गृहा:--जिनके घर

हे प्रभु, कुछ भाग्यशाली आत्माओं ने आपकी उन लीलाओं के विस्तृत अमृत सागर में गोतालगाकर भौतिक जीवन की थकान से मुक्ति पा ली है, जिन लीलाओं को आप अगाध आत्म-तत्त्व का प्रचार करने के लिए साकार रूप धारण करके सम्पन्न करते हैं।

ये विरली आत्माएँ,मुक्ति की भी परवाह न करके घर-बार के सुख का परित्याग कर देती हैं, क्योंकि उन्हें आपकेचरणकमलों का आनन्द लूटने वाले हंसों के समूह सहृश भक्तों की संगति प्राप्त हो जाती है।

त्वदनुपथं कुलायमिदमात्मसुहत्प्रियवच्‌चरति तथोन्मुखे त्वयि हिते प्रिय आत्मनि च ।

न बत रमन्त्यहो असदुपासनयात्महनोयदनुशया भ्रमन्त्युरुभये कुशरीरभूतः ॥

२२॥

त्वत्‌ू-तुम; अनुपथम्‌--सेवा के लिए उपयोगी; कुलायम्‌--शरीर; इदम्‌ू--यह; आत्म--स्वयं; सुहृत्‌-मित्र; प्रिय--तथा प्रिय;वत्‌--सहृश; चरति--कार्य करता है; तथा--तो भी; उन्मुखे--उन्मुख; त्ववि--तुममें; हिते--सहायक; प्रिये--प्रिय;आत्मनि--आत्मा; च--तथा; न--नहीं; बत--हाय; रमन्ति-- आनन्द लूटते हैं; अहो--ओह; असत्‌--असत्य की;उपासनया--पूजा द्वारा; आत्म--स्वयं को; हनः--मारना; यत्‌--जिस ( असत्य की पूजा ) में; अनुशया:--जिनकी निरन्तरइच्छा है; भ्रमन्ति--घूमते रहते हैं; उरू--अत्यधिक; भये-- भयावह ( जगत ) में; कु--निम्न; शरीर--शरीर; भूतः--धारणकिये।

जब यह मानवीय शरीर आपकी पूजा के निमित्त काम में लाया जाता है, तो यह आत्मा,मित्र तथा प्रेमी की तरह कार्य करता है।

किन्तु दुर्भाग्यवश, यद्यपि आप बद्धजीवों के प्रति सदैवकृपा प्रदर्शित करते हैं और हर तरह से स्नेहपूर्वक सहायता करते हैं और यद्यपि आप उनकेअसली आत्मा हैं, किन्तु सामान्य लोग आप में आनन्द नहीं लेते।

उल्टे वे माया की पूजा करकेआध्यात्मिक आत्महत्या करते हैं।

हाय! असत्य के प्रति भक्ति करके, वे निरन्तर सफलता कीआशा करते हैं, किन्तु वे विविध निम्न शरीर धारण करके इस अत्यन्त भयावह जगत में निरन्तरइधर-उधर भटकते रहते हैं।

निभृतमरुन्मनो क्षदढयोगयुजो हृदि यन्‌मुनय उपासते तदरयोपि ययु: स्मरणात्‌ ।

स्त्रिय उरगेन्द्रभोगभुजदण्डविषक्तधियोवयमपि ते समा: समहशो ड्प्रिसरोजसुधा: ॥

२३॥

निभृत--वशी भूत; मरुत्‌ू-- श्वास लेते हुए; मन:--मन; अक्ष--तथा इन्द्रियों समेत; हढ-योग--स्थिर योग में; युज:--लगा हुआ;हृदि--हृदय में; यत्‌ू--जो; मुनयः--मुनिगण; उपासते--पूजा करते हैं; तत्‌ू--वह; अरयः--शत्रुगण; अपि-- भी; ययु:--प्राप्तकिया; स्मरणात्‌--स्मरण करने से; स्त्रियः--स्त्रियाँ; उरग-इन्द्र--राजसी सर्प के; भोग--शरीर ( सहश ); भुज--बाहें; दण्ड--डंडे जैसी; विषक्त--आसक्त; धिय:--जिनके मन; वयम्‌ू--हम; अपि-- भी; ते-- तुमको; समा: --समान; सम--समान;इहशः--जिनकी दृष्टि; अद्धप्रि--चरणों के; सरोज--कमलवत्‌; सुधा:--अमृत ( का पान करते हुए ) |

भगवान्‌ के शत्रुओं ने भी, निरन्तर मात्र उनका चिन्तन करते रहने से, उसी परम सत्य कोप्राप्त किया, जिसे योगीजन अपने श्वास, अपने मन तथा इन्द्रियों को वश में करके योग-पूजा मेंस्थिर कर लेते हैं।

इसी तरह हम श्रुतियाँ, जो सामान्यतः आपको सर्वव्यापी देखती हैं, आपकेचरणकमलों से वही अमृत प्राप्त कर सकेंगी, जिसका आनन्द आपकी प्रियतमाएँ, आपकीविशाल सर्प सदृश बाहुओं के प्रति अपने प्रेमाकर्षण के कारण लूटती हैं, क्योंकि आप हमें तथाअपनी प्रियतमाओं को एक ही तरह से देखते हैं।

क इह नु वेद बतावरजन्मलयोग्रसरंयत उदगाइहषिर्यमनु देवगणा उभये ।

तहिं न सन्न चासदुभयं न च कालजवःकिमपि न तत्र शास्त्रमवकृष्य शयीत यदा ॥

२४॥

कः--कौन; इह--इस संसार में; नु--निस्सन्देह; वेद--जानता है; बत--ओह; अवर--अर्वाचीन; जन्म--जिसका जन्म;लयः--तथा संहार; अग्र-सरम्‌--पहले आया हुआ; यत:--जिससे; उदगात्‌--उत्पन्न हुआ; ऋषि:--ऋषि, ब्रह्मा; यम्‌ अनु--जिसके ( ब्रह्मा के ) पीछे पीछे; देव-गणा:--देवताओं का समूह; उभये--दोनों ( जो इन्द्रियों को वश में रखते हैं और जोस्वर्गलोक के भी ऊपर वाले क्षेत्रों में रहते हैं ); तहिं--उस समय; न--नहीं; सत्‌--स्थूल पदार्थ; न--नहीं; च-- भी; असत्‌--सूक्ष्म पदार्थ; उभयम्‌--जो दोनों से युक्त है ( अर्थात्‌ भौतिक शरीर ); न च--न तो; काल--समय का; जवः--प्रवाह; किम्‌अपि न--किसी भी तरह से नहीं; तत्र--वहाँ; शास्त्रमू--शास्त्र को; अवकृष्य--निकाल कर के; शयीत--( भगवान्‌ ) सो जाताहै; यदा--जब ।

इस जगत का हर व्यक्ति हाल ही में उत्पन्न हुआ है और शीघ्र ही मर जायेगा।

अतएव यहाँका कोई भी व्यक्ति, उसे कैसे जान सकता है, जो हर वस्तु के पूर्व से विद्यमान है और जिसनेप्रथम विद्वान ऋषि ब्रह्मा को और उसके बाद के छोटे तथा बड़े देवताओं को जन्म दिया है ? जबवह लेट जाता है और हर वस्तु को अपने भीतर समेट लेता है, तो कुछ भी नहीं बचता--न तोस्थूल या सूक्ष्म पदार्थ, न ही इनसे बने शरीर, न ही काल की शक्ति और न शास्त्र।

जनिमसतः सतो मृतिमुतात्मनि ये च भिदांविपणमृतं स्मरन्त्युपदिशन्ति त आरुपितै: ।

त्रिगुणमय: पुमानिति भिदा यदबोधकृतात्वयि न ततः परत्र स भवेदवबोधरसे ॥

२५॥

जनिम्‌--सृष्टि; असत:--( अणुओं से बने ) दृश्य जगत के; सतः--शा श्वत; मृतिम्‌ू--संहार; उत-- भी; आत्मनि--आत्मा में;ये--जो; च--तथा; भिदाम्‌ू--द्वैत; विषणम्‌--सांसारिक व्यापार; ऋतम्‌-- असली; स्मरन्ति--घोषित करते हैं; उपदिशन्ति--शिक्षा देते हैं; ते--वे; आरुपितैः--सत्य पर चढ़ाया गया मोह; त्रि--तीन; गुण--गुणों से; मयः--निर्मित; पुमान्‌--जीव;इति--इस प्रकार; भिदा--द्वैत की धारणा; यत्‌--जो; अबोध--अज्ञान से; कृता--उत्पन्न; त्वयि--तुममें; न--नहीं; ततः--उससे; परत्र--परे; सः--वह ( अज्ञान ); भवेत्‌--रह सकता है; अवबोध--पूर्ण चेतना; रसे--संरचना में ॥

माने हुए विद्वान जो यह घोषित करते हैं कि पदार्थ ही जगत का उद्गम है, कि आत्मा केस्थायी गुणों को नष्ट किया जा सकता है, कि आत्मा तथा पदार्थ के पृथक्‌ पक्षों से मिलकरआत्मा बना है या कि भौतिक व्यापारों से सच्चाई बनी हुईं है--ऐसे विद्वान उन भ्रान्त विचारों परअपनी शिक्षाओं को आधारित करते हैं, जो सत्य को छिपाते हैं।

यह द्वेत धारणा कि जीव प्रकृतिके तीन गुणों से उत्पन्न है, अज्ञानजन्य मात्र है।

ऐसी धारणा का आपमें कोई आधार नहीं है,क्योंकि आप समस्त भ्रम ( मोह ) से परे हैं और पूर्ण चेतना का भोग करने वाले हैं।

सदिव मनस्त्रिवृत्तयि विभात्यसदामनुजात्‌सदभिमृशन्त्यशेषमिदमात्मतयात्मविदः ।

न हि विकृतिं त्यजन्ति कनकस्य तदात्मतयास्वकृतमनुप्रविष्टमिदमात्मतयावसितम्‌ ॥

२६॥

सत्‌--सत्य; इब--मानो; मन:--मन ( तथा इसके प्राकट्य ); त्रि-वृतू-तीन ( प्रकृति के गुण ); त्वयि--तुममें; विभाति--प्रकट होता है; असत्‌--असत्य; आ-मनुजात्‌--मनुष्यों तक; सत्‌--सत्य स्वरूप; अभिमृशन्ति--वे मानते हैं; अशेषम्‌--सम्पूर्ण ;इदम्‌--इस ( जगत ) को; आत्मतया--आत्मा से अभिन्न रूप में; आत्म-विद:--आत्मा को जानने वाले; न--नहीं; हि--निस्सन्देह; विकृतिम्‌ू--विकारों को; त्यजन्ति--परित्याग कर देते हैं; कनकस्य--स्वर्ण का; तत्‌ू-आत्मतया--जितना कि वेइससे अभिन्न हैं; स्व--अपने द्वारा; कृतम्‌-उत्पन्न; अनुप्रविष्टमू--तथा प्रविष्ट हुए; इदम्‌--इस; आत्मतया--अपने से अभिन्न;अवसितमू--सुनिश्चित |

इस जगत में सारी वस्तुएँ--सरलतम घटना से लेकर जटिल मानव-शरीर तक--प्रकृति केतीन गुणों से बनी हैं।

यद्यपि ये घटनाएँ सत्य प्रतीत होती हैं, किन्तु वे आध्यात्मिक सत्य कीमिथ्या प्रतिबिम्ब होती हैं, वे आप पर मन के अध्यारोपण हैं।

फिर भी जो लोग परमात्मा कोजानते हैं, वे सम्पूर्ण भौतिक सृष्टि को सत्य तथा साथ ही साथ आपसे अभिन्न मानते हैं।

जिसतरह स्वर्ण की बनी वस्तुओं को, इसलिए अस्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे असलीसोने की बनी हैं, उसी तरह यह जगत उन भगवान्‌ से अभिन्न है, जिसने इसे बनाया और फिर वेउसमें प्रविष्ट हो गये।

तब परि ये चरन्त्यखिलसत्त्वनिकेततयात उत पदाक्रमन्त्यविगणय्य शिरो निर्‌तेः ।

'परिवयसे पशूनिव गिरा विबुधानपि तांस्‌त्वयि कृतसौहदा: खलु पुनन्ति न ये विमुखा: ॥

२७॥

तव--तुम्हारी; परि ये चरन्ति--जो पूजा करते हैं; अखिल--सबों के; सत्त्व--उत्पन्न जीव; निकेततया--आश्रय के रूप में;ते--वे; उत-- केवल; पदा--अपने पैरों से; आक्रमन्ति--रखते हैं; अविगणय्य-- अवहेलना करके ; शिर:--सिर पर; निर्‌तेः--मृत्यु के; परिवयसे--तुम बाँध देते हो; पशून्‌ इब--पशुओं की तरह; गिरा--आपके ( वेद के ) शब्दों से; विबुधान्‌ू--चतुर;अपि--भी; तान्‌ू-- उनके; त्ववि--जिसको; कृत--बनाने वाले; सौहदा: --मैत्री; खलु--निस्सन्देह; पुनन्ति--पवित्र करते हैं;न--नहीं; ये--जो; विमुखा:--शत्रुतापूर्ण

जो भक्त आपको समस्त जीवों के आश्रय रूप में पूजते हैं, वे मृत्यु की परवाह नहीं करतेऔर उनके सिर पर आप अपना चरण रखते हैं, लेकिन आप वेदों के शब्दों से अभक्तों कोपशुओं की तरह बाँध लेते हैं, भले ही वे प्रकाण्ड विद्वान क्यों न हों।

आपके स्नेहिल भक्तगण हीअपने को तथा अन्यों को शुद्ध कर सकते हैं, आपके प्रति शत्रु-भाव रखने वाले नहीं।

त्वमकरण: स्वराडखिलकारकशक्तिधरस्‌तव बलिमुद्दहन्ति समदन्त्यजयानिमिषा: ।

वर्षभुजोखिलक्षितिपतेरिव विश्वसृजोविदधति यत्र ये त्वधिकृता भवतश्चकिता: ॥

२८ ॥

त्वमू--तुम; अकरण:--भौतिक इन्द्रियों से विहीन; स्व-राट्‌--आत्म तेजोमय; अखिल--समस्त; कारक--एन्द्रिय कार्यो की;शक्ति--शक्तियों के; धर:ः--धारण करने वाले; तब--तुम्हारी; बलिम्‌-- भेंट; उद्दहन्ति--ले जाते हैं; समदन्ति--हिस्सा बँटातेहैं; अजया-- प्रकृति के साथ; अनिमिषा:--देवतागण; वर्ष--राज्य के जनपदों के; भुज:--शासक; अखिल--समस्त;क्षिति--पृथ्वी के; पतेः--स्वामी के; इब--सहृश; विश्व--ब्रह्माण्ड के; सृज:--स्त्रष्टा; विदधति--सम्पन्न करते हैं; यत्र--जिसमें; ये--वे; तु--निस्सन्देह; अधिकृता--नियत; भवत:--आपका; चकिता:-- भयभीत

यद्यपि आपकी भौतिक इन्द्रियाँ नहीं हैं, किन्तु आप हर एक की इन्द्रिय-शक्ति के आत्म-तेजवान धारणकर्ता हैं।

देवता तथा प्रकृति स्वयं आपकी पूजा करते हैं, जबकि अपने पूजा करनेवालों द्वारा अर्पित भेंट का भोग भी करते हैं, जिस तरह किसी राज्य के विविध जनपदों केअधीन शासक अपने स्वामी को, जो कि पृथ्वी का चरम स्वामी होता है, भेंटें प्रदान करते हैं औरसाथ ही स्वयं अपनी प्रजा द्वारा प्रदत्त भेंट का भोग भी करते हैं।

इस तरह आपके भय सेब्रह्माण्ड के स्त्रष्टा अपने अपने नियत कार्यों को श्रद्धापूर्वक सम्पन्न करते हैं।

स्थिरचरजातयः स्युरजयोत्थनिमित्तयुजोविहर उदीक्षया यदि परस्य विमुक्त ततः ।

न हि परमस्य कश्चिदपरो न परश्न भवेद्‌वियत इवापदस्य तव शून्यतुलां दधत: ॥

२९॥

स्थिर--जड़; चर--तथा चेतन; जातय:--योनियाँ; स्यु:--प्रकट हुईं; अजया--भौतिक शक्ति से; उत्थ--जागृत की गई;निमित्त--कारण ( तथा ऐसे कारण से क्रियाशील बनाये गये सूक्ष्म शरीर ); युज:--धारण करके; विहर:--खेल; उदीक्षया--आपकी टुक चितवन से; यदि--यदि; परस्य--उसका, जो पृथक्‌ रहता है; विमुक्त--हे नित्य मुक्त; तत:ः--उससे; न--नहीं;हि--निस्सन्देह; परमस्थ--परम का; कश्चित्‌ू--कोई; अपर: --पराया नहीं; न--न तो; पर: --पराया; च-- भी; भवेत्‌--होसकता है; वियत:--आकाश के लिए; इब--सहश; अपदस्य--अनुभवगम्य गुणों से विहीन; तब--तुम्हारा; शून्य--शून्य;तुलामू--तुलना; दधतः--जो धारण करते हैं।

हे नित्यमुक्त दिव्य भगवान्‌, आपकी भौतिक शक्ति विविध जड़ तथा चेतन जीव योनियों कोउनकी भौतिक इच्छाएँ जगाकर प्रकट कराती है, लेकिन ऐसा तभी होता है, जब आप उस परअल्प दृष्टि डालकर उसके साथ क्रीड़ा करते हैं।

हे भगवान्‌, आप किसी को न तो अपना घनिष्ठ मित्र मानते हैं, न ही पराया, ठीक उसी तरहजिस तरह आकाश का अनुभवगम्य गुणों से कोई सम्बन्ध नहीं होता।

इस मामले में आप शून्यके समान हैं।

अपरिमिता श्रुवास्तनुभूतो यदि सर्वगतास्‌तहिं न शास्यतेति नियमो श्लुव नेतरथा ।

अजनि च यन्मयं तदविमुच्य नियन्तृ भवेत्‌सममनुजानतां यदमतं मतदुष्टतया ॥

३०॥

अपरिमिता:--असंख्य; ध्रुवा:--स्थायी; तनु-भूत:--देहधारी जीव; यदि--यदि; सर्व-गता: --सर्वव्यापी; तहि--तब; न--नहीं;शास्यता--प्रभुसत्ता; इति--इस प्रकार; नियम: --नियम; ध्रुव--हे अपरिवर्तित; न--नहीं; इतरथा--अन्यथा; अजनि--उत्पन्नकिया गया था; च--तथा; यत्‌-मयम्‌--जिसके सार से; तत्‌--उससे; अविमुच्य--अपने को विलग न करते हुए; नियन्तृ--नियन्ता; भवेत्‌--होना चाहिए; समम्‌--सम रूप से उपस्थित; अनुजानताम्‌--जानने वालों का; यत्‌ू--जो; अमतम्‌--गलतसमझा हुआ; मत-रज्ञान; दुष्टतया--अपूर्णता के कारण

यदि ये असंख्य जीव सर्वव्यापी होते और अपरिवर्तनशील शरीरों से युक्त होते, तो हेनिर्विकल्प, आप संभवत: उनके परम शासक न हुए होते।

लेकिन चूँकि वे आपके स्थानिक अंशहैं और उनके स्वरूप परिवर्तनशील हैं, अतएव आप उनका नियंत्रण करते हैं।

निस्सन्देह, जोकिसी वस्तु की उत्पत्ति के लिए अवयव की आपूर्ति करता है, वह अवश्यमेव उसका नियन्ता है,क्योंकि कोई भी उत्पाद अपने अवयव कारण से पृथक्‌ विद्यमान नहीं रहता।

यदि कोई यह सोचेकि उसने भगवान्‌ को, जो अपने प्रत्येक अंश में समरूप से रहते हैं जान लिया है, तो यह मात्रउसका क्रम है, क्योंकि मनुष्य जो भी ज्ञान भौतिक साधनों से अर्जित करता है, वह अपूर्ण होगा।

न घटत उद्धव: प्रकृतिपूरुषयोरजयोर्‌उभययुजा भवनन्‍्त्यसुभूतो जलबुद्द॒दवत्‌ ।

त्वयि त इमे ततो विविधनामगुणै: परमेसरित इवार्णवे मधुनि लिल्युरशेषरसा: ॥

३१॥

न घटते--घटित नहीं होता; उद्धव:--सृजन; प्रकृति--प्रकृति का; पूरुषयो: --तथा उसके भोक्ता आत्मा का; अजयो:--अजन्मा; उभय--दोनों के; युजा--संयोग से; भवन्ति--उत्पन्न होते हैं; असु-भृतः--जीव; जल--जल पर; बुह्दुद--बुलबुला;वत्‌--सहृश; त्वयि--तुममें; ते इमे--ये ( जीव ); ततः--इसलिए; विविध--तरह-तरह के ; नाम--नामों; गुणैः--तथा गुणों से;'परमे--परम में; सरित:ः--नदियाँ; इब--सहश; अर्णवे--समुद्र में; मधुनि--शहद में; लिल्यु:--लीन हो जाती हैं; अशेष--पूरा;रसाः--स्वाद |

न तो प्रकृति, न ही उसका भोग करने के लिए प्रयलशील आत्मा कभी जन्म लेते हैं, फिरभी जब ये दोनों संयोग करते हैं, तो जीवों का जन्म होता है, जिस तरह जहाँ जहाँ जल से वायुमिलती है, वहाँ वहाँ बुलबुले बनते हैं।

जिस तरह नदियाँ समुद्र में मिलती हैं या विभिन्न फूलों कारस शहद में मिल जाता है, उसी तरह ये सारे बद्धजीव अन्ततोगत्वा अपने विविध नामों तथा गुणोंसमेत आप ब्रह्म में पुन: लीन हो जाते हैं।

नृषु तव मयया भ्रमममीष्ववगत्य भूशंत्वयि सुधियोभवे दधति भावमनुप्रभवम्‌ ।

कथमनुवर्ततां भवभयं तव यदश्रुकुटिःसृजति मुहुस्त्रिनेमिरभवच्छरणेषु भयम्‌ ॥

३२॥

नृषु--मनुष्यों के बीच; तब--तुम्हारी; मायया--माया से; भ्रमम्‌--मोह; अमीषु--इनमें; अवगत्य--समझकर; भूशम्‌--अत्यधिक; त्वयि--तुममें; सु-धियः--विद्वान; अभवे--मोक्ष के स्त्रोत में; दधति--करता है; भावम्‌--प्रेमा भक्ति; अनुप्रभवम्‌ --शक्तिमान, उत्कट; कथम्‌--कैसे; अनुवर्तताम्‌-- अनुयायियों के लिए; भव-- भौतिक जीवन का; भयम्‌--डर; तव--तुम्हारा;यत्‌--चूँकि; भ्रु-- भौंहों का; कुटि:--टेढ़ा होना; सृजति--उत्पन्न करती है; मुहुः--बारम्बार; त्रि-नेमि:--तीन आरों वाली( भूत, वर्तमान तथा भविष्यये काल की तीन अवस्थाएँ ); अ--नहीं; भवत्‌--आप से; शरणेषु--शरणागतों के लिए; भयम्‌--डरा

विद्वान आत्माएँजो यह समझते हैं कि आपकी माया, किस तरह सारे मनुष्यों को मोहती है,वे आपकी उत्कट प्रेमाभक्ति करते हैं, क्योंकि आप जन्म तथा मृत्यु से मुक्ति के स्त्रोत हैं।

भलाआपके श्रद्धावान सेवकों को भौतिक जीवन का भय कैसे सता सकता है? दूसरी ओर, आपकीकुटिल भौहें, जो कालचक्र की विहरी-नेमि हैं बारम्बार उन्हें भयभीत बनाती हैं, जो आपकीशरण ग्रहण करने से इनकार करते हैं।

विजितहृषीकवायुभिरदान्तमनस्तुरगंय इह यतन्ति यन्तुमतिलोलमुपायखिद: ।

व्यसनशतान्विता: समवहाय गुरोश्चरणंवणिज इवाज सन्त्यकृतकर्णधरा जलधौ ॥

३३॥

विजित--जीता हुआ; हषीक--इन्द्रियों से; वायुभि:--तथा प्राण से; अदान्त--अवश; मन:ः--मन रूपी; तुर-गम्‌--घोड़े को;ये--जो; इह--इस जगत में; यतन्ति-- प्रयास करते हैं; यन्तुम्‌--नियमित बनाने के लिए; अति--अत्यन्त; लोलमू--चलायमान;उपाय--उपायों से; खिदः--सताया हुआ; व्यसन--उत्पात; शत--सैकड़ों; अन्विता:--से युक्त; समवहाय--त्याग कर;गुरो:--गुरु के; चरणम्‌--चरणों को; वणिज:--व्यापारीगण; इब--सहृश; अज--हे अजन्मा; सन्ति--हैं; अकृत-ग्रहण नकरके; कर्ण-धरा:--नाविक; जल-धौ --समुद्र में |

मन ऐसे उच्छुंखल घोड़े की तरह है, जिसको अपनी इन्द्रियों एवं श्वास को संयमित कर चुकेव्यक्ति भी वश में नहीं कर सकते।

इस संसार में वे लोग, जो अवश मन को वश में करना चाहतेहैं, किन्तु अपने गुरु के चरणों का परित्याग कर देते हैं, उन्हें विविध दुखदायी विधियों केअनुशीलन में सैकड़ों बाधाओं का सामना करना पड़ता है।

हे अजन्मा भगवान्‌, वे समुद्र में नावपर बैठे उन व्यापारियों के समान हैं, जो किसी नाविक को भाड़े पर नहीं लेते।

स्वजनसुतात्मदारधनधामधरासुरधे -स्त्वयि सति कि नृणाम्श्रयत आत्मनि सर्वरसे ।

इति सदजानतां मिथुनतो रतये चरतां सुखयति को न्विह स्वविहते स्वनिरस्तभगे ॥

३४॥

स्वजन--सेवकों; सुत--बच्चों; आत्म--शरीर; दार--पत्नी; धन-- धन; धाम--घर; धरा--पृथ्वी; असु--प्राण; रथैः--तथावाहनों से; त्वयि--जब तुम; सति--बन गये हो; किमू--क्या ( लाभ ); नृणाम्‌--मनुष्यों के लिए; श्रयत:--शरण में आये हुए;आत्मनि--उनकी आत्मा; सर्व-रसे--समस्त आनन्द के स्वरूप; इति--इस प्रकार; सत्‌ू--सत्य; अजानताम्‌--न जानने वालों केलिए; मिथुनतः--संभोग से; रतये--रति के लिए; चरताम्‌--करते हुए; सुखयति--सुख देता है; क:ः--क्या; नु--तनिक भी;इह--इस ( जगत ) में; स्व-- अपने आप; विहते--विनाशशील; स्व-- अपने आप; निरस्त--रहित; भगे--किसी सार से।

जो व्यक्ति आपकी शरण ग्रहण करते हैं, उन्हें आप परमात्मा स्वरूप दिखते हैं, जो समस्तदिव्य-आनन्द स्वरूप है।

ऐसे भक्तों के लिए अपने सेवकों, बच्चों या शरीरों, अपनी पत्नियों,धन या घरों, अपनी भूमि, स्वास्थ्य या वाहनों का क्या उपयोग रह जाता है? और जो आपकेविषय में सच्चाई को समझने में असफल होते हैं तथा यौन-आनन्द के पीछे भागते रहते हैं, उनकेलिए इस सम्पूर्ण जगत में, जो सदैव विनाशशील है और महत्त्व से विहीन है, ऐसा कया है, जोउन्हें असली सुख प्रदान कर सके ?

भुवि पुरुपुण्यतीर्थसदनान्यूषयो विमदा-स्त उत भवत्पदाम्बुजहृदो उघभिदड्ध्रिजला: ।

दधति सकृन्मनस्त्वयि य आत्मनि नित्यसुखे न पुनरुपासते पुरुषसारहरावसथान्‌ ॥

३५ ॥

भुवि--पृथ्वी पर; पुरु--अत्यधिक; पुण्य--पतवित्र; तीर्थ--ती थस्थान; सदनानि--तथा भगवान्‌ के निजी धाम; ऋषय: --ऋषिगण; विमदः--मिथ्या गर्व से रहित; ते--वे; उत--निस्सन्देह; भवत्‌--आपके ; पद--पाँव; अम्बुज--कमलवत्‌; हृदः--जिनके हृदयों में; अथ--पाप; भित्‌--विनाश करने वाले; अड्पघ्रि--जिनके चरणों ( को धोने से ); जला:--जल; दधति--बदल जाता है; सकृत्‌--एक बार भी; मनः--जिनके मन; त्वयि--तुममें; ये--जो; आत्मनि--परमात्मा के प्रति; नित्य--सदैव;सुखे--सुख में; न पुन:--फिर कभी नहीं; उपासते--पूजा करते हैं; पुरुष--मनुष्य के; सार--आवश्यक गुण; हर--हर लेते हैं;आवसथानू--उनके संसारी घर।

ऋषिगण मिथ्या गर्व से रहित होकर पवित्र तीर्थस्थानों तथा जहाँ जहाँ भगवान्‌ ने अपनीलीलाएँ प्रदर्शित की हैं, उनका भ्रमण करते हुए इस पृथ्वी पर निवास करते हैं।

चूँकि ऐसे भक्तआपके चरणकमलों को अपने हृदयों में रखते हैं, अतः उनके पाँवों को धोने वाला जल सारेपापों को नष्ट कर देता है।

जो कोई अपने मन को एक बार भी समस्त जगत के नित्य आनन्दमयआत्मा आपकी ओर मोड़ता है, वह घर पर ऐसे पारिवारिक जीवन के अधीन नहीं रहता, जिससेमनुष्य के अच्छे गुण छीन लिये जाते हैं।

सत इदं उत्थितं सदिति चेन्ननु तर्कहतंव्यभिचरति क्‍्व च क्व च मृषा न तथोभययुक्‌ ।

व्यवहृतये विकल्प इषितो न्धपरम्परयाभ्रमयति भारती त उसरुवृत्तिभिरुक्थजडान्‌ ॥

३६॥

सतः--स्थायी से; इृदम्‌--इस ( ब्रह्माण्ड ); उत्थितम्‌ू--निकले हुए; सत्‌--स्थायी; इति--इस प्रकार; चेत्‌--यदि ( कोई प्रस्तावकरे ); ननु--निश्चय ही; तर्क--तार्किक विरोध से; हतम्‌--निषिद्ध; व्यभिचरति--सामान्य नहीं रहता; क्व च--कुछ बातों में;क्‍्व च--अन्य बातों में; मृषा-- भ्रम; न--नहीं; तथा--उस तरह; उभय--दोनों ( सत्य तथा भ्रम ); युकु--संयोग; व्यवहतये--सामान्य मामलों में; विकल्प:--काल्पनिक स्थिति; इषित:--वांछित; अन्ध--अन्धे व्यक्तियों की; परम्परया--परम्परा से; भ्रमयति--मोहित करती है; भारती--ज्ञान के शब्द; ते--तुम्हारे; उरू--अनेक; वृत्तिभि:--अपने पेशों से; उक्थ--कहे गये;

* यह प्रतिपादित किया जा सकता है कि यह जगत स्थायी रूप से सत्य है, क्योंकि इसकीउत्पत्ति स्थायी सत्य से हुई है, किन्तु इसका तार्किक खण्डन हो सकता है।

निस्सन्देह, कभीकभी कार्य-कारण का ऊपरी अभेद सत्य नहीं सिद्ध हो पाता और कभी तो सत्य वस्तु का फलभ्रामक होता है।

यही नहीं, यह जगत स्थायी रूप से सत्य नहीं हो सकता, क्योंकि यह केवलपरमसत्य के ही स्वभावों में भाग नहीं लेता, अपितु उस सत्य को छिपाने वाले भ्रम में भी लेता है।

वस्तुतः इस दृश्य जगत के दृश्य-रूप उन अज्ञानी पुरुषों की परम्परा द्वारा अपनाई गई काल्पनिकव्यवस्था है, जो अपने भौतिक मामलों को सुगम बनाना चाहते थे।

आपके वेदों के बुद्ध्िमत्तापूर्णशब्द अपने विविध अर्थों तथा अन्तर्निहित व्यवहारों से उन सारे पुरुषों को मोहित कर लेते हैं,जिनके मन यत्ञों के मंत्रोच्चारों को सुनते-सुनते जड़ हो चुके हैं।

न यदिदमग्र आस न भविष्यदतो निधना-दनु मितमन्तरा त्वयि विभाति मृषैकरसे ।

अत उपमीयते द्रविणजातिविकल्पपथे-विंतथमनोविलासमृतमित्यवयन्त्यबुधा: ॥

३७॥

न--नहीं; यत्‌-- क्योंकि; इदम्‌--यह ( ब्रह्माण्ड ); अग्रे--प्रारम्भ में; आस--था; न भविष्यत्‌--न होगा; अतः --अतः;निधनात्‌ अनु--इसके संहार के बाद; मितम्‌--प्राप्त; अन्तरा--इस बीच; त्वयि--तुममें; विभाति-- प्रकट होता है; मृषा--झूठा;एकरसे--जिसका आनन्द का अनुभव अपरिवर्तित रहता है; अत:ः--इस प्रकार; उपमीयते--तुलना से जाना जाता है; द्रविण--भौतिक वस्तु का; जाति--कोटियों में; विकल्प--विकारों के; पथै:--किस्मों से; वितथ--तथ्य से विपरीत; मन:--मन;विलासम्‌--विलास; ऋतम्‌-- असली, सत्य; इति--ऐसा; अवयन्ति--सोचते हैं; अबुध: --बुद्द्धिहीन अज्ञानी

चूँकि यह ब्रह्माण्ड अपनी सृष्टि के पूर्व विद्यमान नहीं था और अपने संहार के बाद विद्यमाननहीं रहेगा, अतः हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि मध्यावधि में यह आपके भीतर दृश्य रूप मेंकल्पित होता है, जिनका आध्यात्मिक आनन्द कभी नहीं बदलता।

हम इस ब्रह्माण्ड की तुलनाविविध भौतिक वस्तुओं के विकारों से करते हैं।

निश्चय ही, जो यह विश्वास करते हैं कि यहछोटी-सी कल्पना सत्य है, वे अल्पज्ञ हैं।

स यदजया त्वजामनुशयीत गुणां श्र जुषन्‌भजति सरूपतां तदनु मृत्युमपेतभग: ।

त्वमुत जहासि तामहिरिव त्वचमात्तभगोमहसि महीयसेष्टगुणितेडपरिमेयभग: ॥

३८ ॥

सः--वह ( जीव ); यत्‌--क्योंकि; अजया-- भौतिक शक्ति के प्रभाव से; तु--लेकिन; अजाम्‌ू--वह भौतिक शक्ति;अनुशयीत--लेट जाती है; गुणान्‌--अपने गुणों को; च--तथा; जुषन्‌-- धारण करके; भजति--ग्रहण करता है; स-रूपताम्‌--( प्रकृति के गुणों के ) सहश रूप; तत्‌-अनु--उसके पीछे; मृत्युम्‌--मृत्यु; अपेत--रहित; भग:--सम्पत्ति का;त्वमू--तुम; उत--दूसरी ओर; जहासि--छोड़ देते हो; तामू--उस ( भौतिक शक्ति ) को; अहिः--सर्प; इब--सहृश; त्वचम्‌--अपनी ( पुरानी ) खाल, केंचुल; आत्त-भग: --समस्त सम्पत्ति से युक्त; महसि--आपकी आध्यात्मिक शक्तियों में; महीयसे--आपकी महिमा गाई जाती है; अष्ट-गुणिते--आठगुनी; अपरिमेय-- असीम; भग: --महानता ।

मोहिनी प्रकृति सूक्ष्म जीव को, उसका आलिंगन करने के लिए आकृष्ट करती है और'फलस्वरूप जीव उसके गुणों से बने रूप धारण करता है।

बाद में वह अपने सारे आध्यात्मिकगुण खो देता है और उसे बारम्बार मृत्यु भोगनी पड़ती है।

किन्तु आप भौतिक शक्ति से अपने कोउसी तरह बचाते रहते हैं, जिस तरह सर्प पुरानी केंचुल त्यागता है।

आप आठ योगसिद्ध्ियों सेमहिमायुक्त स्वामी हैं और असीम ऐश्वर्य का भोग करते हैं।

यदि न समुद्धरन्ति यतयो हदि कामजटादुरधिगमोसतां हृदि गतोस्मृतकण्ठमणि: ।

असुतृपयोगिनामुभयतोप्यसुखं भगव-न्ननपगतान्तकादनधिरूढपदाद्धवत:ः ॥

३९॥

यदि--यदि; न समुद्धरन्ति--उखाड़ नहीं फेंकते; यतय:--संन्यासी लोग; हृदि--अपने हृदयों में; काम--कामेच्छा के; जटा:--चिह्न; दुरधिगम: --साक्षात्कार करना असम्भव; असताम्‌--अशुद्ध के लिए; हृदि--हृदय में; गत:ः--प्रवेश करके; अस्मृत--विस्मृत; कण्ठ--गर्दन पर; मणि:--मणि; असु-- प्राण; तृप--तृप्ति करने वाला; योगिनाम्‌--योगियों के लिए; उभयतः--दोनों ( संसारों ) में; अपि-- भी; असुखम्‌--दुख; भगवन्‌--हे भगवान्‌; अनपगत--नहीं गया हुआ; अन्तकातू--मृत्यु से;अनधिरूढ--अ प्राप्त; पदात्‌--जिसका राज्य; भवत:--आपसे |

सन्यास-आश्रम के जो सदस्य अपने हृदय से भौतिक इच्छा को समूल उखाड़ कर फेंक नहींदेते, वे अशुद्ध बने रहते हैं और इस तरह आप उन्हें अपने को समझने नहीं देते।

यद्यपि आपउनके हृदयों में वर्तमान रहते हैं, किन्तु उनके लिए आप उस मणि की तरह हैं, जिसे मनुष्य गले मेंपहने हुए भी भूल जाता है कि वह गले में है।

हे प्रभु, जो लोग केवल इन्द्रिय-तृप्ति के लिएयोगाभ्यास करते हैं, उन्हें इस जीवन में तथा अगले जीवन में भी उस मृत्यु से, जो उन्हें नहीं छोड़ेगी, दण्ड मिलना चाहिए और आपसे भी, जिनके धाम तक, वे नहीं पहुँच सकते।

त्वदवगमी न वेत्ति भवदुत्थशु भाशुभयो-गुणविगुणान्वयांस्तहिं देहभूतां च गिर: ।

अनुयुगमन्वहं सगुण गीतपरम्परयाश्रवणभूतो यतस्त्वमपवर्गगतिर्मनुजै: ॥

४०॥

त्वत्‌-तुम्हें; अवगमी--जानने वाला; न वेत्ति--परवाह नहीं करता; भवत्‌--आप से; उत्थ--उठ कर; शुभ-अशुभयो: --शुभतथा अशुभ का; गुण-विगुण--अच्छे-बुरे का; अन्वयान्‌ू--लक्षणों को; तह्ि--फलस्वरूप; देह- भूताम्‌--देहधारी जीवों का;च--भी; गिर: --शब्द; अनु-युगम्‌--हर युग में; अनु-अहम्‌-- प्रतिदिन; स-गुण--हे गुणों से युक्त; गीत--गीत की;परम्परया--परम्परा से; श्रवण--सुन कर के; भृतः--ले जाया गया; यत:--इसके कारण; त्वम्‌ू--तुम; अपवर्ग--मोक्ष का;गतिः--चरम लक्ष्य; मनुजैः--मनुष्यों द्वारा, मनु के बंशजों द्वारा |

जब मनुष्य आपका साक्षात्कार कर लेता है, तो वह अपने विगत पवित्र तथा पापमय कर्मोंसे उदित होने वाले अच्छे तथा बुरे भाग्य की परवाह नहीं करता, क्योंकि इस अच्छे तथा बुरे भाग्य को नियंत्रित करने वाले एकमात्र आप हैं।

ऐसा स्वरूपसिद्ध भक्त इसकी भी परवाह नहींकरता कि सामान्य जन उसके विषय में क्या कह रहे हैं।

वह प्रतिदिन अपने कानों को आपकेयशों से भरता रहता है, जो हर युग में मनु के वंशजों की अविच्छिन्न परम्परा से गाये जाते हैं।

इसतरह आप उसका चरम मोक्ष बन जाते हैं।

त्वमपि यदन्तराण्डनिचया ननु सावरणा: ।

ख इव रजांसि वान्ति वयसा सह यच्छुतय-स्त्वयि हि फलन्त्यतन्निससनेन भवन्निधना: ॥

४१॥

झु--स्वर्ग के; पतयः--स्वामी; एव-- भी; ते--तुम्हारा; न ययु:--नहीं पहुँच सकते; अन्तम्‌--अन्त; अनन्ततया--अनन्त होनेसे; त्वमू--तुम; अपि-- भी; यत्‌--जिसको; अन्तर-- भीतर; अण्ड--ब्रह्माण्डों के; निचया: --समूह; ननु--निस्सन्देह; स--सहित; आवरना:--अपने बाहरी खोल; खे--आकाश में; इब--सहृश; रजांसि-- धूल के कण; वान्ति--इधर-उधर उड़ते हैं;वयसा सह--कालचक्र के साथ; यत्‌--क्योंकि; श्रुत॒वः--वेद; त्ववि--तुममें; हि--निस्सन्देह; फलन्ति--फलते हैं; अतत्‌--ब्रह्म से भिन्न है, जो, उसका; निरसनेन--निरस्त करने से; भवत्‌--आप में; निधना: --जिनका अन्तिम निष्कर्ष

चूँकि आप असीम हैं, अतः न तो स्वर्ग के अधिपति, न ही स्वयं आप अपनी महिमा के छोरतक पहुँच सकते हैं।

असंख्य ब्रह्माण्ड अपने अपने खोलों में लिपटे हुए कालचक्र के द्वाराआपके भीतर घूमने के लिए उसी तरह बाध्य हैं, जिस तरह कि आकाश में धूल के कण इधर-उधर उड़ते रहते हैं।

श्रुतियाँ आपको अपने अन्तिम निष्कर्ष के रूप में प्रकट करके सफल बनतीहैं, क्योंकि वे आपसे पृथक्‌ हर वस्तु को अपनी निरसन विधि से विलुप्त कर देती हैं।

श्रीभगवानुवाचइत्येतद्रह्मणः पुत्रा आश्रुत्यात्मानुशासनम्‌ ।

सनन्दनमथानर्चु: सिद्धा ज्ञात्वात्मनो गतिम्‌ ॥

४२॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- श्री भगवान्‌ ( नारायण ऋषि ) ने कहा; इति--इस तरह; एतत्‌--यह; ब्रह्मण:--ब्रह्मा के; पुत्रा:--पुत्रगण; आश्रुत्य--सुन कर; आत्म--आत्मा के विषय में; अनुशासनम्‌--उपदेश; सनन्दनम्‌--सनन्दन ऋषि की; अथ--तब;आनर्चु:--उन्होंने पूजा की; सिद्धा:--पूर्णतया तुष्ट; ज्ञात्वा--जान कर; आत्मन:--अपना; गतिमू--चरम गन्तव्य |

भगवान्‌ श्री नारायण ऋषि ने कहा : परमात्मा के विषय में ये आदेश सुन कर ब्रह्मा के पुत्रोंको अपना चरम गन्तव्य समझ में आ गया।

वे पूरी तरह सन्तुष्ट हो गये और उन्होंने सनन्दन कीपूजा करके उनका सम्मान किया।

इत्यशेषसमाम्नायपुराणोपनिषद्रसः ।

समुदधृतः पूर्वजातैव्योमियानैर्महात्मभि: ॥

४३॥

इति--इस प्रकार; अशेष--समस्त; समाम्नाय--वेदों; पुराण--तथा पुराणों का; उपनिषत्‌--गुहा रहस्य; रसः--रस;समुद्धृत:--निचोड़ा हुआ; पूर्व--विगत भूत में; जातैः--उत्पन्न हुओं से; व्योम--ब्रह्माण्ड के उच्चतर भागों में; यानै: --यात्राकरने वाले; महा-आत्मभि: --सन्त-पुरुषों द्वारा

इस तरह उच्चतर स्वर्गलोकों में विचरण करने वाले प्राचीन सन्‍्तों ने सारे वेदों तथा पुराणोंके इस अमृतमय तथा गुह्ा रस को निचोड़ लिया।

त्वं चैतद्रह्मदायाद श्रद्धयात्मानुशासनम्‌ ।

धारयंश्वर गां काम कामानां भर्जनं नृणाम्‌ ॥

४४॥

त्वमू--तुम; च--तथा; एतत्‌--यह; ब्रह्म--ब्रह्मा के; दायाद--हे उत्तराधिकारी ( नारद ); श्रद्धया-- श्रद्धापूर्वक; आत्म-आनुशासनमू--आत्मा के विषय में उपदेशों पर; धारयन्‌--धध्यान करते हुए; चर--विचरण करते हैं; गाम्‌ू--पृथ्वी पर; कामम्‌--अपनी इच्छानुसार; कामानाम्‌-- भौतिक इच्छाओं को; भर्जनम्‌--जो जलाने वाले हैं; नृणाम्‌--मनुष्यों की।

और चूँकि तुम पृथ्वी पर इच्छानुसार विचरण करते हो, अतः, हे ब्रह्मा-पुत्र, तुम्हेंआत्मविज्ञान विषयक इन उपदेशों पर श्रद्धापूर्वक ध्यान करना चाहिए, क्योंकि ये सारे मनुष्योंकी भौतिक इच्छाओं को भस्म कर देते हैं।

श्रीशुक उबाचएवं स ऋषिणादिदष्टं गृहीत्वा श्रद्धयात्मवान्‌ ।

पूर्ण: श्रुतधरो राजन्नाह वीरब्रतो मुनि: ॥

४५॥

श्री-शुक: उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार से; सः--वह ( नारद ); ऋषिणा--ऋषि ( नारायण ऋषि )द्वारा; आदिष्टम्‌--आदेश दिया गया; गृहीत्वा--स्वीकार करके; श्रद्धया-- श्रद्धापूर्वक; आत्म-वान्‌ू--आत्मवान; पूर्ण: --अपनेकार्यों में सफल; श्रुत--उसने जो कुछ सुना था, उस पर; धर:--ध्यान करते हुए; राजनू--हे राजा ( परीक्षित ); आह--कहा;बीर--वीर क्षत्रिय की तरह; ब्रतः--जिसका ब्रत; मुनिः--मुनि ने

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब श्री नारायण ऋषि ने उन्हें इस तरह आदेश दिया, तोआत्मवान नारद मुनि ने उस आदेश को हृढ़ निष्ठा के साथ स्वीकार कर लिया, क्योंकि उनका ब्रतएक योद्धा जैसा वीत्वपूर्ण होता है।

हे राजनू, अब अपने सारे कार्यो में सफल होकर, उन्होंने जोकुछ सुना था, उस पर विचार किया और भगवान्‌ को इस प्रकार उत्तर दिया।

श्रीनारद उवाचनमस्तस्मै भगवते कृष्णायामलकीरतये ।

यो धत्ते सर्वभूतानामभवायोशती: कला: ॥

४६॥

श्री-नारदः उवाच-- श्री नारद ने कहा; नमः--नमस्कार; तस्मै--उस; भगवते-- भगवान्‌; कृष्णाय--कृष्ण को; अमल--निष्कलुष; कीर्तये--जिसकी कीर्ति; यः--जो; धत्ते--प्रकट करता है; सर्व--सारे; भूतानाम्‌ू--जीवों के; अभवाय--मुक्ति हेतु;उशतीः--सर्व-आकर्षक; कला: -- अंश |

श्री नारद ने कहा : मैं उन निर्मल कीर्ति वाले भगवान्‌ कृष्ण को नमस्कार करता हूँ, जोअपने सर्व-आकर्षक साकार अंशों को इसलिए प्रकट करते हैं, जिससे सारे जीव मुक्ति प्राप्तकर सकें।

इत्याद्यमृषिमानम्य तच्छिष्यांश्व महात्मनः ।

ततोगादाशभ्रमं साक्षात्पितुद्दैघायनस्य मे ॥

४७॥

इति--इस प्रकार बोलते हुए; आद्यमू--आदि; ऋषिम्‌--ऋषि ( नारायण ऋषि ) को; आनम्य--शीश झुकाकर; तत्‌--उसके;शिष्यान्‌--शिष्यों को; च--तथा; महा-आत्मन:--महान्‌ सन्त; ततः--वहाँ ( नैमिषारण्य ) से; अगात्‌ू--चला गया; आश्रमम्‌--कुटिया में; साक्षात्‌- प्रत्यक्ष; पितु:--पिता; द्वैघायनस्य--द्वैषायन वेद॒व्यास की; मे--मेरे |

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : यह कहने के बाद नारद ने ऋषियों में अग्रणी श्रीनारायण ऋषि को तथा उनके सन्त सदृश शिष्यों को भी शीश झुकाया।

तब वे मेरे पिता द्वैपायनव्यास की कुटिया में लौट आये।

सभाजितो भगवता कृतासनपरिग्रह: ।

तस्मै तद्वर्णयामास नारायणमुखाच्छुतम्‌ ॥

४८ ॥

सभाजित:--सम्मानित; भगवता-- भगवान्‌ के स्वांश ( व्यासदेव ) द्वारा; कृत--कर चुकने पर; आसन--आसन की;परिग्रह:--स्वीकृति; तस्मै--उसको; तत्‌--वह; वर्णयाम्‌ आस--कह सुनाया; नारायण-मुखात्‌-- श्री नारायण ऋषि के मुखसे; श्रुतम्‌ू--जो उसने सुना था।

भगवान्‌ के अवतार व्यासदेव ने नारद मुनि का सत्कार किया और उन्हें बैठने के लिएआसन दिया, जिसे उन्होंने स्वीकार किया।

तब नारद ने व्यास से वह कह सुनाया, जो उन्होंने श्रीनारायण ऋषि के मुख से सुना था।

इत्येतद्वर्णितं राजन्यन्न: प्रश्न: कृतस्त्वया ।

यथा ब्रह्मण्यनिर्देश्ये नीऋगुणेपि मनश्वरेत्‌ ॥

४९॥

इति--इस प्रकार; एतत्‌--यह; वर्णितम्‌--सुनाया गया; राजन्‌--हे राजा ( परीक्षित ); यत्‌ू--जो; न:--हम से; प्रश्न:--प्रश्न;कृतः--किया गया; त्वया--तुम्हारे द्वारा; यथा--कैसे; ब्रह्मणि--ब्रह्म में; अनिर्देश्ये--शब्दों में जिसका वर्णन नहीं किया जासकता; निर्गुणे--निर्गुण; अपि-- भी; मन: --मन; चरेत्‌--जाता है

हे राजन, इस प्रकार मैंने तुम्हारे उस प्रश्न का उत्तर दे दिया है, जो इस विषय में तुमने मुझसेपूछा था कि मन उस ब्रह्म तक कैसे पहुँचता है, जो भौतिक शब्दों द्वारा वर्णनीय नहीं है औरभौतिक गुणों से रहित है।

योअस्योत्प्रे'्षक आदिमध्यनिधने योउव्यक्तजीवे श्वरोयः सूृष्टेदमनुप्रविश्य ऋषिणा चक्रे पुरः शास्ति ता: ।

यं सम्पद्य जहात्यजामनुशयी सुप्त:ः कुलायं यथात॑ कैवल्यनिरस्तयोनिमभयं ध्यायेदजस्त्रं हरिमू ॥

५०॥

यः--जो; अस्य--इस ( ब्रह्माण्ड ) का; उत्प्रेश्षक:--निगरानी रखने वाला; आदि--इसके प्रारम्भ में; मध्य--बीच में; निधने--तथा अन्त में; यः:--जो; अव्यक्त--अप्रकट ( प्रकृति ) का; जीव--तथा जीवों का; ई श्वरः-- स्वामी; यः--जो ; सृष्टा--उत्पन्नकरके; इृदम्‌--इस ( ब्रह्माण्ड ) में; अनुप्रविश्य-- प्रवेश करके; ऋषिणा--जीवात्मा के साथ; चक्रे --उत्पन्न किया; पुर:--शरीर; शास्ति--नियमन करता है; ताः--उन्हें; यम्‌--जिसको; सम्पद्य--शरणागत होकर; जहाति--त्याग देता है; अजामू--अजन्मा ( प्रकृति ) का; अनुशयी--आलिंगन करते हुए; सुप्त:--सोया पुरुष; कुलायम्‌--उसका शरीर; यथा--जिस तरह;तम्‌--उस पर; कैवल्य--अपनी शुद्ध आध्यात्मिक स्थिति से; निरस्त--दूर रखा हुआ; योनिमू--जन्म; अभयम्‌--निर्भयता केलिए; ध्यायेत्‌ू-- ध्यान करना चाहिए; अजस्त्रमू--सतत; हरिम्‌-- भगवान्‌ कृष्ण को |

वह ही स्वामी है, जो इस ब्रह्माण्ड की निरन्तर निगरानी करता है, जो इसके प्रकट होने केपूर्व, उसके बीच में तथा उसके बाद विद्यमान रहता है।

वह अव्यक्त भौतिक प्रकृति तथा आत्मादोनों का स्वामी है।

इस सृष्टि को उत्पन्न करके, वह इसके भीतर प्रवेश कर जाता है और प्रत्येकजीव के साथ रहता है।

वहाँ पर वह भौतिक देहों की सृष्टि करता है और फिर उनके नियामक केरूप में रहने लगता है।

उनकी शरण में जाकर मनुष्य माया के आलिंगन से बच सकता है, जिसतरह स्वप्न देख रहा व्यक्ति अपने शरीर को भूल जाता है।

जो व्यक्ति भय से मुक्ति चाहता है, उसेचाहिए कि उस भगवान्‌ हरि का निरन्तर ध्यान धरे, जो सदैव सिद्धावस्था में रहता है और कभीभी भौतिक जन्म नहीं लेता।

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