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अध्याय बयासी: कृष्ण और बलराम वृन्दावन के निवासियों से मिलते हैं
10.82श्रीशुक उबाचअथैकदा द्वारवत्यां वसतो रामकृष्णयो: ।
सूर्योपराग: सुमहानासीत्कल्पक्षये यथा ॥
१॥
श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; अथ--तब; एकदा--एक बार; द्वारवत्याम्-द्वारका में; बसतो:--रहते हुए;राम-कृष्णयो:--बलराम तथा कृष्ण के; सूर्य--सूर्य का; उपराग: --ग्रहण; सु-महान्-- अत्यन्त विशाल; आसीतू--था;कल्प--ब्रह्मा के एक दिन के; क्षये--अन्त होने पर; यथा--जिस तरह ।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : एक बार जब बलराम तथा कृष्ण द्वारका में रह रहे थे, तो ऐसाविराट सूर्य-ग्रहण पड़ा मानो, भगवान् ब्रह्म के दिन का अन्त हो गया हो।
त॑ ज्ञात्वा मनुजा राजन्पुरस्तादेव सर्वतः ।
समन्तपज्ञकं क्षेत्रं ययु: श्रेयोविधित्सया ॥
२॥
तम्--उसको; ज्ञात्वा--जान कर; मनुजा:--लोग; राजन्--हे राजा ( परीक्षित ); पुरस्तात्ू--पहले से; एब--भी; सर्वतः--सभीजगहों से; समन्त-पञ्ञकम्--समन्तपंचक नामक ( जो कुरुक्षेत्र जनपद के अन्तर्गत है ); क्षेत्रमू--स्थान में; ययु:--गये; श्रेय:--लाभ; विधित्सया--उत्पन्न करने की इच्छा से
हे राजन, पहले से इस ग्रहण के विषय में जानते हुए अनेक लोग पुण्य अर्जित करने कीमंशा से समन्तपञ्ञक नामक पवित्र स्थान में गये।
निःक्षत्रियां महीं कुर्वन् राम: शस्त्रभूतां वर: ।
नृपाणां रुधिरौधेण यत्र चक्रे महाह्ददान् ।
ईजे च भगवान् रामो यत्रास्पृष्टोडपि कर्मणा ॥
३॥
लोकं॑ सड्ग्राहयन्नीशो यथान्योघापनुत्तये ।
महत्यां तीर्थयात्रायां तत्रागन् भारतीः प्रजा: ॥
४॥
वृष्णयश्च तथाक्रूरवसुदेवाहुकादय: ।
ययुर्भारत तक््षेत्रं स्वमघं क्षपयिष्णव: ॥
५॥
गठप्रद्युम्नसाम्बाद्या: सुचन्द्रशुकसारणै: ॥
आस्तेनिरुद्धो रक्षायां कृतवर्मा च यूथप: ॥
६॥
निःक्षत्रियामू--राजाओं से विहीन; महीम्--पृथ्वी को; कुर्वन्--करके; राम:--परशुराम ने; शस्त्र--हथियारों को; भूताम्--धारण करने वालों के; वर:--सबसे श्रेष्ठ; नृषाणाम्--राजाओं के; रुधिर--खून की; ओघेण--बाढ़ से; यत्र--जहाँ; चक्रे --बनाया; महा--विशाल; हृदान्ू--सरोवर, झीलें; ईजे--पूजा किया; च--तथा; भगवानू-- भगवान्; राम: -- परशुराम ने; यत्र--जहाँ; अस्पृष्ट:--अछूता; अपि--यद्यपि; कर्मणा--कर्म तथा उसके फल से; लोकम्--संसार को; सड्ग्राहयन्--उपदेश देतेहुए; ईशः-- भगवान्; यथा--मानो; अन्य:--दूसरा व्यक्ति; अघध--पाप; अपनुत्तये--दूर करने के लिए; महत्याम्ू--विशाल;तीर्थ-यात्रायाम्--पतवित्र तीर्थयात्रा के अवसर पर; तत्र--वहाँ; आगन्-- आये; भारती: -- भारतवर्ष के; प्रजा:--लोग;वृष्णय:--वृष्णि-जाति के सदस्य; च--तथा; तथा-- भी; अक्रूर-वसुदेव-आहुक-आदय:--अक्रूर, वसुदेव, आहुक ( उग्रसेन )तथा अन्य; ययु:--गये; भारत--हे भरतवंशी ( परीक्षित ); तत्--उस; क्षेत्रम्ू--पवित्र स्थान में; स्वमू-- अपने अपने; अघम्--पापों को; क्षपयिष्णव:--उखाड़ फेंकने के इच्छुक; गद-प्रद्युम्न-साम्ब-आद्या: --गद, प्रद्युम्न, साम्ब इत्यादि; सुचन्द्र-शुक-सारणै:--सुचन्द्र, शुक तथा सारण के साथ; आस्ते--रहे; अनिरुद्ध:--अनिरुद्ध; रक्षायामू--रक्षा करने के लिए; कृतवर्मा--कृतवर्मा; च--तथा; यूथ-पः--सेना-नायक |
पृथ्वी को राजाओं से विहीन करने के बाद योद्धाओं में सर्वोपरि भगवान् परशुराम नेसमन्तपञ्ञक में राजाओं के रक्त से विशाल सरोवरों की उत्पत्ति की।
यद्यपि परशुराम परकर्मफलों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा था, फिर भी सामान्य जनता को शिक्षा देने के लिए उन्होंनेवहाँ पर यज्ञ किया।
इस तरह अपने को पापों से मुक्त करने के लिए उन्होंने सामान्य व्यक्ति जैसाआचरण किया।
अब इस समन्तपञ्ञक में तीर्थयात्रा के लिए भारतवर्ष के सभी भागों से बहुतबड़ी संख्या में लोग आये थे।
हे भरतवंशी, इस तीर्थस्थल में आये हुए लोगों मेंअनेकवृष्णिजन--यथा गद, प्रद्युम्म तथा साम्ब--अपने-अपने पापों से छुटकारा पाने के लिएआये थे।
अक्ूर, वसुदेव, आहुक तथा अन्य राजा भी वहाँ गये थे।
द्वारका की रक्षा करने केलिए सुचन्द्र शुक तथा सारण के साथ अनिरुद्ध एवं उन्हीं के साथ उनकी सशस्त्र सेनाओं केनायक कृतवर्मा भी रह गये थे।
ते रथेर्देवधिष्ण्याभेईयै श्व तरलप्लवै: ।
गजैर्नदद्धिरभ्राभेनृभिर्विद्याधरद्युभि: ॥
७॥
व्यरोचन्त महातेजा: पथि काञ्लनमालिनः ।
दिव्यस्त्रग्वस्त्रसन्नाहा: कलत्रे: खेचरा इव ॥
८॥
ते--वे; रथैः--रथों ( पर सवार सैनिकों ) सहित; देव--देवताओं के; धिष्ण्य--विमानों; आभैः--के अनुरूप; हयै:--घोड़ों केसाथ; च--तथा; तरल--लहरों ( के समान ); प्लवै:ः--जिसकी गति; गजैः --हाथियों के साथ; नदद्धि:--चिग्घाड़ करते;अशभ्र--बादल; आभै:--के सहृश; नृभि:--तथा पैदल सिपाहियों के सहित; विद्याधर--विद्याधर देवताओं ( जैसे ); द्युभि: --तेज से; व्यरोचन्त--( यादव राजकुमार ) तेजवान प्रतीत हो रहे थे; महा--अत्यन्त; तेजा:--शक्तिशाली; पथि--मार्ग पर;काझ्नन--सोने की; मालिन:--मालाएँ पहने; दिव्य--दैवी; सत्रकू--फूलों की माला; वस्त्र--वस्त्र; सन्नाहा:--तथा कवच;कलन्रैः--अपनी पत्नियों के साथ; खे-चरा:--आकाश में विचरण करने वाले देवताओं के; इब--समान।
बलशाली यदुगण बड़ी शान से मार्ग से होकर गुजरे।
उनके साथ साथ उनके सैनिक थे, जोस्वर्ग के विमानों से होड़ लेने वाले रथों पर, ताल-ताल पर पग रख कर चल रहे घोड़ों पर तथाबादलों जैसे विशाल एवं चिग्घाड़ते हाथियों पर सवार थे।
उनके साथ दैवी विद्याधरों के हीसमान तेजवान अनेक पैदल सिपाही भी थे।
सोने के हारों तथा फूल की मालाओं से सज्जित एवंकवच धारण किये हुये यदुगण देवी वेशभूषा में इस तरह शोभा दे रहे थे कि जब वे अपनीपत्लियों के साथ मार्ग पर आगे बढ़ रहे थे, तो ऐसा लग रहा था, मानो आकाश-मार्ग से होकरदेवतागण उड़ रहे हों।
तत्र स्नात्वा महाभागा उपोष्य सुसमाहिताः ॥
ब्राह्मणेभ्यो ददुर्धनूर्वास:स्त्रगुक्ममालिनी: ॥
९॥
तत्र--वहाँ; स्नात्वा--स्नान करके; महा-भागा:--परम पुण्यात्मा ( यादवगण ); उपोष्य--उपवास करके; सु-समाहिता:--बड़ेही ध्यानपूर्वक; ब्राह्मणेभ्य:--ब्राह्मणों को; ददुः--दान दिया; धेनू:--गौवें; वास:--वस्त्र; स्रकू--फूल-मालाओं ; रुक्म--सोनेकी; मालिनी:--तथा मालाओं से युक्त
समन्तपशञ्जक में सन्त स्वभाव वाले उन यादवों ने स्नान किया और फिर अत्यन्त सावधानी केसाथ उपवास रखा।
तत्पश्चात् उन्होंने ब्राह्मणों को बस्त्रों, फूल-मालाओं तथा सोने के हारों सेसज्जित गौवें दान में दीं।
रामहदेषु विधिवत्पुनराप्लुत्य वृष्णय: ।
ददः स्वन्नं द्विजाछये भ्य: कृष्णे नो भक्तिरस्त्विति ॥
१०॥
राम--परशुराम के; हृदेषु--सरोवरों में; विधि-वत्--शास्त्रीय आदेशों के अनुसार; पुनः--फिर; आप्लुत्य--स्नान करके;वृष्णय: --वृष्णिजनों ने; ददु:--दान दिया; सु--सुन्दर; अन्नम्ू-- भोजन; द्विज--ब्राह्मणों को; अछये भ्य: --सर्वोत्तम; कृष्णे --कृष्ण के प्रति; नः--हमारी; भक्ति:--भक्ति; अस्तु--हो; इति--इस प्रकार |
तत्पश्चात् वृष्णिवंशियों ने शास्त्रीय आदेशों के अनुसार एक बार फिर परशुराम के सरोवरों मेंस्नान किया और उत्तम कोटि के ब्राह्मणों को अच्छा भोजन कराया।
उन्होंने उस समय यहीप्रार्थना की, 'हमें भगवान् कृष्ण की भक्ति प्राप्त हो।
स्वयं च तदनुज्ञाता वृष्णय: कृष्णदेवता: ।
भुक्त्वोपविविशु: काम स्निग्धच्छायाडप्रिपाड्घ्रिषु ॥
११॥
स्वयम्--अपने से; च--तथा; तत्--उनके ( कृष्ण ) द्वारा; अनुज्ञाता:--अनुमति दिये गये; वृष्णय:--वृष्णियों ने; कृष्ण--भगवान् कृष्ण; देवता:--एकमात्र देव; भुक्त्वा--खाकर; उपविविशु:--बैठ गये; कामम्--इच्छानुसार; स्निग्ध--शीतल;छाया--छाया वाले; अद्प्रिप--वृक्षों के; अड्धप्रिषु--पैरों पर, नीचे।
फिर अपने एकमात्र आराध्यदेव भगवान् कृष्ण की अनुमति से वृष्णियों ने कलेवा कियाऔर फुरसत में होने पर शीतल छाया प्रदान करने वाले वृक्षों के नीचे बैठ गये।
तत्रागतांस्ते दहशुः सुहृत्सम्बन्धिनो नृपान् ।
मत्स्योशीनरकौशल्यविदर्भकुरुसूज्ञयान् ।
काम्बोजकैकयान्मद्रान्कुन्तीनानर्तकेरलान्ू ॥
१२॥
अन््यांश्षैवात्मपक्षीयान्परांश्व शतशो नृप ।
नन्दादीन्सुहदो गोपान्गोपी श्रोत्कण्ठिताश्चिरम् ॥
१३॥
तत्र--वहाँ; आगतानू-- आये हुए; ते--उन्होंने ( यादवों ने ); दहशुः--देखा; सुहृत्--मित्रों; सम्बन्धिन:--तथा सम्बन्धीजनों;नृपान्ू--राजाओं को; मत्स्य-उशीनर-कौशल्य-विदर्भ-कुरु-सूझ्ञयानू--मत्स्यों, उशीनरों, कौशलों, विदर्भों, कुरूओं तथासृज्ञयों को; काम्बोज-कैकयान्--काम्बोजों तथा कैकयों को; मद्रान्--मद्रों को; कुन्तीन्--कुन्तियों को; आनर्त-केरलानू--आनर्तों तथा केरलों को; अन्यान्--अन्यों को; च एव--भी; आत्म-पक्षीयान्--अपनी टोली वालों; परान्--विपक्षियों को;च--तथा; शतशः--सैकड़ों; नृप--हे राजा ( परीक्षित ); नन्द-आदीन्--नन्द महाराज इत्यादि; सुहृदः--उनके प्रिय मित्र;गोपान्-ग्वालों को; गोपी: --गोपियों को; च--तथा; उत्कण्ठिता:--चिन्तित; चिरम्--दीर्घकाल से ।
यादवों ने देखा कि वहाँ पर आये अनेक राजा उनके पुराने मित्र तथा सम्बन्धी--मत्स्य,उशीनर, कौशल्य, विदर्भ, कुरु, सूक्षय, काम्बोज, कैकय, मद्र, कुन्ती तथा आनर्त एवं केरलदेशों के राजा थे।
उन्होंने अन्य सैकड़ों राजाओं को भी देखा, जो स्वपक्षी तथा विपक्षी दोनों हीथे।
इसके अतिरिक्त हे राजा परीक्षित, उन्होंने अपने प्रिय मित्रों, नन्द महाराज तथा ग्वालों और गोपियों को देखा, जो दीर्घकाल से चिन्तित होने के कारण दुखी थे।
अन्योन्यसन्दर्शनहर्षर॑हसाप्रोत्फुल्लहद्क्त्रसरोरुहअियः ।
आए्लिष्य गाढं नयनेः सत्रवजलाहृष्यत्त्वचो रुद्धगिरो ययुर्मुदम् ॥
१४॥
अन्योन्य--एक-दूसरे के ; सन्दर्शन--देखने से; हर्ष--हर्ष के; रंहसा--आवेग से; प्रोत्फुल्ल--विकसित, प्रफुल्लित; हत्--अपने हृदयों; वक्त्र--तथा मुखों के; सरोरूह--कमलों के; भ्रिय:--सौन्दर्य वाले; आश्लिष्य--आलिंगन करके; गाढम्--खूबतेजी से; नयनैः--आँखों से; सत्रवत्--गिराते हुए; जला:--जल ( अश्रु ); हृष्यत्--रोमांचित; त्वच:--चमड़ी; रुद्ध--रँ धी हुई;गिर:--वाणी; ययु:--अनुभव किया; मुदम्--हर्ष, प्रसन्नता |
जब एक-दूसरे को देखने की अत्याधिक हर्ष से उनके हृदय तथा मुखकमल नवीन सौन्दर्यसे खिल उठे, तो पुरुषों ने एक-दूसरे का उल्लासपूर्वक आलिंगन किया।
अपने नेत्रों से अश्रुगिराते हुए, रोमांचित शरीर वाले तथा रुँधी वाणी से उन्होंने उक्तट आनन्द का अनुभव किया।
स्त्रियश्व॒ संवीक्ष्य मिथोउडतिसौहद-स्मितामलापाडुदशोभिरेभिरे ।
स्तनैः स्तनान्कुड्डू मपड्डरूषितान्निहत्य दोभि: प्रणयाश्रुलोचना: ॥
१५॥
स्त्रियः--स्त्रियाँ; च--तथा; संवीक्ष्य--देखकर; मिथ:--परस्पर; अति--अत्यन्त; सौहद--मित्रवत् स्नेह के साथ; स्मित--मुसकाते हुए; अमल--निर्मल; अपाड्ू--तिरछी नजर, चितवन; हशः--आँखों वाली; अभिरेभिरि--आलिंगन किया; स्तनै:--स्तनों से; स्तनान्--स्तनों को; कुड्डु म--केसर के; पड्ढू--लेप से; रूषितान्ू--लेपित; निहत्य--दबाकर; दोर्भि: --अपनीबाहुओं से; प्रणय--प्रेम के; अश्रु--आँसुओं से पूर्ण; लोचना:--आँखें |
स्त्रियों ने प्रेममयी मैत्री की शुद्ध मुसकानों से एक-दूसरे को निहारा।
और जब उन्होंनेआलिंगन किया, तो केसर के लेप से लेपित उनके स्तन एक-दूसरे के जोर से दब गये औरउनके नेत्रों में स्नेह के आँसू भर आये।
ततोभिवाद्य ते वृद्धान्यविष्ठटेरभिवादिता: ।
स्वागतं कुशल पृष्ठा चक्र: कृष्णकथा मिथ: ॥
१६॥
ततः--तब; अभिवाद्य--नमस्कार करके; ते--वे; वृद्धान्ू--अपने वरिष्ठजनों को; यविष्ठै:--अपने से छोटे सम्बन्धियों के द्वारा;अभिवादिता:--अभिवादन की गईं; सु-आगतम्--सुखपूर्वक आगमन; कुशलमू्--तथा कुशल-कश्षेम; पृष्ठा--पूछ कर;चक्रु:--किया; कृष्ण--कृष्ण के बारे में
तब उन सबों ने अपने वरिष्ठजनों को नमस्कार किया और अपने से छोटे सम्बन्धियों से आदरप्राप्त किया।
एक-दूसरे से यात्रा की सुख-सुविधा एवं कुशल-क्षेम पूछने के बाद, वे कृष्ण केविषय में बातें करने लगीं।
पृथा भ्रातृन्स्वसूर्वी क्ष्य तत्पुत्रान्पितरावषि ।
भ्रातृपलीर्मुकुन्दं च जहौ सड्डूथया शुच्: ॥
१७॥
पृथा--कुन्ती; भ्रातून्ू-- अपने भाइयों को; स्वसृ:--तथा बहनों को; वीक्ष्य--देखकर; तत्--उनके; पुत्रान्--पुत्रों को;पितरौ--अपने माता-पिता को; अपि--भी; भ्रातृ--अपने भाइयों की; पत्नी:--पत्रियों; मुकुन्दम्--भगवान् कृष्ण को; च--भी; जहौ-्याग दिया; सद्भूथया--बातें करते हुए; शुचः--अपना शोक |
महारानी कुन्ती अपने भाइयों तथा बहनों और उनके बच्चों से मिलीं।
वे अपने माता-पिता,अपने भाइयों की पत्नियों ( भाभियों ) तथा भगवान् मुकुन्द से भी मिलीं।
उनसे बातें करती हुईं वेअपना शोक भूल गईं।
कुन्त्युवाचआर्य भ्रातरहं मनन््ये आत्मानमकृताशिषम् ।
यद्वा आपत्सु मद्वार्ता नानुस्मरथ सत्तमा: ॥
१८॥
कुन्ती उवाच--महारानी कुन्ती ने कहा; आर्य--हे आदरणीय; भ्रात:-- भाई; अहम्--मैं; मन्ये--सोचती हूँ; आत्मानमू--अपनेको; अकृत--प्राप्त करने में असफल; आशिषमू--इच्छाएँ; यत्--चूँकि; बै--निस्सन्देह; आपत्सु--संकट के समय; मत्--मुझको; वार्तामू--जो घटित हुआ; न अनुस्मरथ--तुम लोग स्मरण नहीं करते; सत्-तमा:--सर्वाधिक साधु स्वभाव वाले |
महारानी कुन्ती ने कहा: हे मेरे सम्माननीय भाई, मैं अनुभव करती हूँ कि मेरी इच्छाएँविफल रही हैं, क्योंकि यद्यपि आप सभी अत्यन्त साधु स्वभाव वाले हो, किन्तु मेरी विपदाओं केदिनों में आपने मुझे भुला दिया।
सुहृदो ज्ञातय: पुत्रा भ्रातरः पितरावषि ।
नानुस्मरन्ति स्वजनं यस्य दैवमदक्षिणम् ॥
१९॥
सुहृदः--मित्रगण; ज्ञातय:--तथा सम्बन्धी; पुत्रा:--पुत्र; भ्रातर:-- भाई; पितरौ--माता-पिता; अपि-- भी; न अनुस्मरन्ति--स्मरण नहीं करते; स्व-जनम्--प्रियजन; यस्य--जिसका; दैवम्--विधाता; अदक्षिणम्-- प्रतिकूल |
जिस पर विधाता अनुकूल नहीं रहता, उसके मित्र तथा परिवार वाले, यहाँ तक कि बच्चे,भाई तथा माता-पिता भी अपने प्रियजन को भूल जाते हैं।
श्रीवसुदेव उबाचअम्ब मास्मानसूयेथा दैवक़रीडनकान्नरान् ।
ईशस्य हि वशे लोक: कुरुते कार्यतेईथ वा ॥
२०॥
श्री-वसुदेव:ः उवाच-- श्री वसुदेव ने कहा; अम्ब--हे बहन; मा--मत; अस्मान्ू--हमसे; असूयेथा: --क्रुद्ध होओ; दैव-- भाग्यके; क्रीडनकान्--खिलौनों; नरान्--मनुष्यों को; ईशस्य-- भगवान् के; हि--निस्सन्देह; वशे-- अधीन; लोक:--व्यक्ति;कुरुते--अपने मन से करता है; कार्यते--औरों के द्वारा कराया जाता है; अथ वा--या फिर।
श्री वसुदेव ने कहा : हे बहन, तुम हम पर नाराज न होओ।
हम सामान्य व्यक्ति भाग्य केखिलौने हैं।
निस्सन्देह, मनुष्य चाहे अपने आप कार्य करे या अन्यों द्वारा करने को बाध्य कियाजाय, वह सदैव भगवान् के नियंत्रण में रहता है।
कंसप्रतापिता: सर्वे वयं याता दिशं दिशम् ।
एतहाँव पुनः स्थान दैवेनासादिता: स्वसः ॥
२१॥
कंस--कंस द्वारा; प्रतापिता:--खूब सताये गये; सर्वे--सभी; वयम्--हम; याता:-- भाग गये; दिशम् दिशम्--विभिन्नदिशाओं में; एतहिं एब-- अभी अभी; पुनः--फिर; स्थानम्ू--अपने अपने स्थानों को; दैवेन--विधाता द्वारा; आसादिता: --लाये गये; स्वसः--हे बहन।
हे बहन, कंस द्वारा सताये हुए हम विभिन्न दिशाओं में भाग गये थे, किन्तु विधाता की कृपासे अन्ततोगत्वा हम अब अपने अपने घरों में लौट सके हैं।
श्रीशुक उबाचबसुदेवोग्रसेनाञैर्यदुभिस्तेडर्चिता नृपा: ।
आसन्नच्युतसन्दर्शपरमानन्दनिर्वृता: ॥
२२॥
श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; बसुदेव-उग्रसेन-आह्यै:--वसुदेव, उग्रसेन इत्यादि; यदुभि:--यादवों द्वारा;ते--वे; अर्चिता: --सम्मानित; नृपा:--राजागण; आसन्--हो गये; अच्युत--भगवान् कृष्ण के; सन्दर्श--दर्शन से; परम--परम; आनन्द--आननद में; निर्वृताः:--शान्त
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : वसुदेव, उग्रसेन तथा अन्य यदुओं ने उन विविध राजाओं कासम्मान किया, जो भगवान् अच्युत को देखकर अत्यधिक आनन्द विभोर और संतुष्ट हो गये।
भीष्मो द्रोणोम्बिकापुत्रो गान्धारी ससुता तथा ।
सदाराः पाण्डवा: कुन्ती सञ्जयो विदुरः कृप: ॥
२३॥
कुन्तीभोजो विराटश्व भीष्मको नग्नजिन्महान् ।
पुरुजिद्द्रूपदः शल्यो धृष्ठकेतु: स काशिराट्ू ॥
२४॥
दमघोषो विशालाक्षो मैथिलो मद्रकेकयौ ।
युधामन्यु: सुशर्मा च ससुता बाहिकादय: ॥
२५॥
राजानो ये च राजेन्द्र युथ्िष्ठिरमनुत्रता: ।
श्रीनिकेतं वपु: शौरे: सस्त्रीकं वीक्ष्य विस्मिता: ॥
२६॥
भीष्म: द्रोण: अम्बिका-पुत्र:--भीष्म, द्रोण तथा अम्बिका के पुत्र ( धृतराष्ट्र ); गान्धारी--गान्धारी; स--सहित; सुता:--उसकेपुत्र; तथा-- भी; स-दारा:-- पत्नियों सहित; पाण्डवा:--पाण्डु-पुत्र; कुन्ती--कुन्ती; सञ्जयः विदुरः कृप:--संजय, विदुर तथाकृप; कुन्तीभोज: विराट: च--कुन्तीभोज तथा विराट; भीष्यक: -- भीष्मक ; नग्नजित्--नग्नजित; महान्--महान्; पुरुजित्ब्रुपदः शल्य:--पुरुजित, द्रुपद तथा शल्य; धृष्टकेतु:-- धृष्टकेतु; सः--वह; काशि-राट्ू--काशी का राजा; दमघोष:ःविशालाक्ष:--दमघोष तथा विशालाक्ष; मैथिल:--मिथिलाराज; मद्र-केकयौ--मद्र तथा केकय के राजा; युधामन्यु: सुशर्माच--युधामन्यु तथा सुशर्मा; स-सुता:--अपने पुत्रों समेत; बाहिक-आदय:--बाहिक तथा अन्य; राजान:--राजागण; ये--जो;च--तथा; राज-इन्द्र--हे राजाओं में श्रेष्ठ ( परीक्षित ); युथिष्ठटिरम्--युधिष्ठिर को; अनुब्नता:--अनुसरण करते हुए; श्री--ऐश्वर्यतथा सौन्दर्य के; निकेतम्-- धाम; वपु:--शरीर; शौरे:-- भगवान् कृष्ण का; स-स्तृईकम्--पत्ियों सहित; वीक्ष्य--देखकर;विस्मिता:--चकित।
हे राजाओं में श्रेष्ठ परिक्षित, भीष्म, द्रोण, धृतराष्ट्र, गान्धारी तथा उनके पुत्र, पाण्डव तथा उनकी पत्नियाँ, कुन्ती, सज्ञय, विदुर, कृपाचार्य, कुन्तीभोज, विराट, भीष्मक, महान् नग्नजित,पुरुजित, द्वपद, शल्य, धृष्टकेतु, काशिराज, दमघोष, विशालाक्ष, मैथिल, मद्र, केकय,युधामन्यु, सुशर्मा, बाहिक तथा उसके संगी और उन सबों के पुत्र एवं महाराज युधथ्रिष्ठटिर केअधीन अन्य अनेक राजा--ये सारे के सारे अपने समक्ष समस्त ऐश्वर्य तथा सौन्दर्य के धामअपनी पत्नियों के साथ खड़े भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य रूप को देखकर चकित हो गये।
अथ ते रामकृष्णाभ्यां सम्यक्प्राप्ससमरईणा: ।
प्रशशंसुर्मुदा युक्ता वृष्णीन्कृष्णपरिग्रहानू ॥
२७॥
अथ--तब; ते--वे, उन्होंने; राम-कृष्णाभ्याम्--बलराम तथा कृष्ण द्वारा; सम्यक् --भलीभाँति; प्राप्त--पाकर के;समहणा:--उचित सम्मान; प्रशशंसु: --प्रशंसा की; मुदा--हर्ष से; युक्ता: --पूर्ण; वृष्णीन्--वृष्णियों को; कृष्ण--कृष्ण के;परिग्रहान्--निजी संगियों को |
जब बलराम तथा कृष्ण उदारतापूर्वक उनका आदर कर चुके, तो ये राजा अतीव प्रसन्नताएवं उत्साह के साथ श्रीकृष्ण के निजी संगियों की प्रशंसा करने लगे, जो वृष्णि-कुल के सदस्यथे।
अहो भोजपते यूयं जन्मभाजो नृणामिह ।
यत्पश्यथासकृत्कृष्णं दुर्दर्शभपि योगिनाम् ॥
२८॥
अहो--ओह; भोज-पते--हे भोजों के स्वामी, उग्रसेन; यूयम्--तुम; जन्म-भाज:--सफल जीवन पाकर; नृणाम्--मनुष्यों केबीच; इह--इस संसार में; यत्--क्योंकि; पश्यथ--देखते हो; असकृत्--बारम्बार; कृष्णम्--कृष्ण को; दुर्दर्शभ्--विरले हीदेखे जाने वाले; अपि-- भी; योगिनाम्--योगियों द्वारा |
राजाओं ने कहा : हे भोजराज, आप ही एकमात्र ऐसे हैं, जिन्होंने मनुष्यों में सचमुच उच्चजन्म प्राप्त किया है, क्योंकि आप भगवान् श्रीकृष्ण को निरन्तर देखते हैं, जो बड़े से बड़े योगियों को भी विरले ही दिखते हैं।
यद्विश्रुति: श्रुतिनुतेदमलं पुनातिपादावनेजनपयश्च वचश्च शास्त्रम् ।
भू: कालभर्जितभगापि यदड्प्रिपद्य-स्पर्शोत्थशक्तिरभिवर्षति नोखिलार्थान् ॥
२९॥
तदर्शनस्पर्शनानुपथप्रजल्प-शय्यासनाशनसयौनसपिण्डबन्ध: ।
येषां गृहे निरयवर्त्सनि वर्ततां वःस्वर्गापवर्गविरमः स्वयमास विष्णु: ॥
३०॥
यत्--जिसका; विश्रुति:--यश; श्रुति--वेदों द्वारा; नुता--गुँजाया; इृदम्--इस ( ब्रह्माण्ड ) को; अलम्--पूरी तरह; पुनाति--पवित्र बनाता है; पाद--जिसके चरणों का; अवनेजन--प्रक्षालन; पय:--जल; च--तथा; वच: --शब्द; च--तथा; शास्त्रम्ू--शास्त्रों को; भू:ः--पृथ्वी; काल--समय द्वारा; भर्जित--विनष्ट; भगा--जिसका सौभाग्य; अपि-- भी; यत्--जिसके ; अड््प्रि--पैरों के; पद्मय--कमल-सहश; स्पर्श--छूने से; उत्थ--जागृत; शक्ति:--जिसकी शक्ति; अभिवर्षति--प्रचुर वर्षा करती है; न:--हम पर; अखिल--समस्त; अर्थान्--वांछित वस्तुएँ; तत्ू--उसके; दर्शन--देखने; स्पर्शन--छूने; अनुपध--साथ-साथ चलने;प्रजल्प--बातचीत करने; शय्या--विश्राम करने के लिए लेट जाना; आसन--बैठना; अशन-- भोजन करना; स-यौन--वैवाहिक सम्बन्धों में; स-पिण्ड--तथा रक्त के सम्बन्ध में; बन्ध:--सम्बन्ध; येषाम्ू--जिनके; गृहे--गृहस्थ-जीवन में; निरय--नरक के; वर्त्मनि--मार्ग पर; वर्ततामू--चलने वाले; व:--तुम्हारे; स्वर्ग--स्वर्ग ( प्राप्त करने की इच्छा के ); अपवर्ग--तथामोक्ष; विरम:--विराम ( का कारण ); स्वयम्--स्वयं; आस--उपस्थित था; विष्णु:-- भगवान् विष्णु।
वेदों द्वारा प्रसारित उनका यश, उनके चरणों को प्रक्षलित करने वाला जल और शाम्त्रों केरूप में उनके द्वारा कहे गये शब्द--ये सभी इस ब्रह्माण्ड को पूरी तरह शुद्ध करने वाले हैं।
यद्यपि काल के द्वारा पृथ्वी का सौभाग्य नष्ट-भ्रष्ट हो चुका था, किन्तु उनके चरणकमलों केस्पर्श से उसे पुन: जीवनदान मिला है, अतः पृथ्वी हमारी समस्त इच्छाओं की पूर्ति की वर्षा हमपर कर रही है।
जो विष्णु स्वर्ग तथा मोक्ष के लक्ष्यों को भुलवा देते हैं, वे आपके साथ वैवाहिकऔर रक्त सम्बन्ध स्थापित कर चुके हैं, अन्यथा आप लोग गृहस्थ-जीवन के नारकीय पथ परविचरण करते हैं।
निस्सन्देह ऐसे सम्बन्ध होने से आप लोग उन्हें देखते हैं, उनका स्पर्श करते हैं,उनके साथ चलते हैं, उनसे बातें करते हैं, उनके साथ लेट कर आराम करते हैं, उठते-बैठते हैंऔर भोजन करते हैं।
श्रीशुक उबाचनन्दस्तत्र यदून्प्राप्तानज्ञात्वा कृष्णपुरोगमान् ।
तत्रागमद्गृतो गोपैरनःस्थार्थेर्दिहक्षया ॥
३१॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; नन्दः--ननन््द महाराज; तत्र--वहाँ; यदून्ू--यदुओं को; प्राप्तानू--आये हुए;ज्ञात्वा--पाकर; कृष्ण--कृष्ण; पुरः-गमान्ू--आगे करके; तत्र--वहाँ; अगमत्--गये; वृत:--साथ साथ; गोपैः --ग्वालों केद्वारा; अनः:--अपनी अपनी बैलगाड़ियों पर; स्थ--रखी; अर्थे:--सामग्री से; दिहक्षया--जानने की इच्छा से।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब नन्द महाराज को ज्ञात हुआ कि कृष्ण के नेतृत्व में यदुगणआ चुके हैं, तो वे तुरन्त उनसे भेंट करने गये।
सारे ग्वाले अपनी अपनी बैलगाड़ियों में विविधवस्तुएँ लाद कर उनके साथ हो लिए।
त॑ दृष्ठा वृष्णयो हृष्टास्तन्व: प्राणमिवोत्थिता: ।
'परिषस्वजिरे गाढं चिरदर्शनकातरा: ॥
३२॥
तम्--उसको, नन्द को; इृश्ठा--देखकर; वृष्णय: --वृष्णिजन; हृष्टा:--प्रसन्न; तन््व:--सजीव शरीर; प्राणम्--प्राण; इब--मानो; उत्थिता:--उठ कर; परिषश्चजिरि--उनका आलिंगन किया; गाढम्--हढ़ता से; चिर--दीर्घकाल के बाद; दर्शन--देखनेसे; कातरा:ः --क्षुब्ध
ननन््द को देखकर सारे वृष्णि प्रसन्न हो उठे और इस तरह खड़े हो गये, मानो मृत शरीरों मेंफिर से प्राण संचार हो गया हो।
दीर्घकाल से न देखने के कारण अधिक कष्ट का अनुभव करतेहुए, उन्होंने नन्द प्रगाढ़ आलिंगन किया।
बसुदेव: परिष्वज्य सम्प्रीतः प्रेमविहलः ।
स्मरन्कंसकृतान्क्लेशान्पुत्रन्यासं च गोकुले ॥
३३॥
वसुदेव:--वसुदेव; परिष्वज्य--( ननन््द महाराज का ) आलिंगन करके; सम्प्रीत:--अत्यधिक प्रसन्न; प्रेम--प्रेम के कारण;विह॒लः--अपने आप में न रहना; स्मरन्--स्मरण करते हुए; कंस-कृतान्--कंस द्वारा उत्पन्न; क्लेशान्ू--कष्टों को; पुत्र--अपनेपुत्रों की; न््यासम्-विदाईं; च--तथा; गोकुले--गोकुल में ॥
वसुदेव ने बड़े ही हर्ष से नन्द महाराज का आलिंगन किया।
प्रेमविहल होकर वसुदेव ने कंसद्वारा पहुँचाए गये कष्टों का स्मरण किया, जिसके कारण उन्हें अपने पुत्रों को उनकी रक्षा केलिए गोकुल में छोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ा।
कृष्णरामौ परिष्वज्य पितरावभिवाद्य च ।
न किझ्जनोचतु:ः प्रेम्णा साश्रुकण्ठौ कुरूद्वह ॥
३४॥
कृष्ण-रामौ--कृष्ण तथा बलराम; परिष्वज्य--आलिंगन करके; पितरौ--अपने माता-पिता को; अभिवाद्य-- अभिवादनकरके; च--तथा; न किलज्लन--कुछ नहीं; ऊचतु:--कहा; प्रेम्णा--प्रेमवश; स-अश्रु--आँसुओं से पूर्ण; कण्ठौ--जिनकेकण्ठ हैं; कुरू-उद्वह-हे कुरुओं में सर्वाधिक वीर
हे कुरुओं के वीर, कृष्ण तथा बलराम ने अपने पोषक माता-पिता का आलिंगन किया औरउनको नमन किया, लेकिन प्रेमाश्रुओं से उनके गले इतने रुंध गये थे कि वे दोनों कुछ भी नहींकह पाये।
तावात्मासनमारोप्य बाहुभ्यां परिरभ्य च ।
यशोदा च महाभागा सुतौ विजहतु: शुच्द: ॥
३५॥
तौ--वे दोनों; आत्म-आसनम्--अपनी गोदों में; आरोप्य--उठाकर; बाहुभ्याम्-- अपनी बाहुओं से; परिरभ्य--आलिंगनकरके; च--तथा; यशोदा--माता यशोदा; च--भी; महा-भागा--सनन््त स्वभाव वाली; सुतौ--अपने पुत्रों को; विजहतु:--त्याग दिया; शुच:--अपना शोक |
अपने दोनों पुत्रों को अपनी गोद में उठाकर और अपनी बाहुओं में भर कर, नन्द तथा सन्तस्वभाव वाली माता यशोदा अपना शोक भूल गये।
रोहिणी देवकी चाथ परिष्वज्य ब्रजेश्वरीम् ।
स्मरन्त्यौ तत्कृतां मैत्रीं बाष्पकण्ठ्यौ समूचतु: ॥
३६॥
रोहिणी--रोहिणी; देवकी--देवकी; च--और; अथ--तब; परिष्वज्य--आलिंगन करके; ब्रज-ई श्री म्--त्रज की रानी( यशोदा ) को; स्मरन्त्यौ--स्मरण करते हुए; तत्--अपने; कृतम्--किये हुए; मैतृईम्--दोस्ती; बाष्प--आँसू; कण्ठ्यौ--कण्ठों में; समूचतु: --उन्होंने उससे कहा।
तत्पश्चात् रोहिणी तथा देवकी दोनों ने व्रज की रानी का आलिंगन किया और उन्होंने उनकेप्रति, जो सच्ची मित्रता प्रदर्शित की थी, उसका स्मरण करते हुए अश्रु से रुंधे गले से इस प्रकारकहा।
का विस्मरेत वां मैत्रीमनिवृत्तां ब्रजे श्वरि ।
अवाप्याप्येन्द्रमैश्वर्य यस्या नेह प्रतिक्रिया ॥
३७॥
का--कौन-सी स्त्री; विस्मरेत-- भूल सकती है; वाम्--तुम दोनों ( यशोदा तथा नन्द ) को; मैत्रीम्--मित्रता; अनिवृत्तामू--निरन्तर; ब्रज-ईश्वरि--हे ब्रज की रानी; अवाप्य--प्राप्त करके; अपि--भी; ऐन्द्रमू--इन्द्र का; ऐश्वर्यम्--ऐ श्वर्य; यस्या: --जिसके लिए; न--नहीं; इह--इस जगत में; प्रति-क्रिया--उऋण होना या बदला चुकाना।
रोहिणी तथा देवकी ने कहा : हे ब्रज की रानी, भला ऐसी कौन स्त्री होगी, जो आप तथानन्द द्वारा हम लोगों के प्रति प्रदर्शित सतत मित्रता को भूल सके ? इस संसार में आपका बदलाचुकाने का कोई उपाय नहीं है, यहाँ तक कि इन्द्र की सम्पदा से भी नहीं।
एतावदृष्टपितरौ युवयोः स्म पित्रो:सम्प्रीणनाभ्युद्यपोषणपालनानि ।
प्राप्योषतुर्भवति पक्ष्म ह यद्वदक्ष्णो-न्यस्तावकुत्र च भयौ न सतां पर: स्व: ॥
३८॥
एतौ--ये दोनों; अदृष्ट--न देखकर; पितरौ--उनके माता-पिता; युवयो:--तुम दोनों के; स्म--निस्सन्देह; पित्रो: --माता-पिताके; सम्प्रीणगन--दुलारना; अभ्युदय--पालन; पोषण---पोषण; पालनानि--तथा सुरक्षा; प्राप्प--प्राप्त करके; ऊषतु:--वे रहतेथे; भवति--हे उत्तम नारी; पक्ष्म--पलकें; ह--निस्सन्देह; यद्वत्ू--जिस तरह; अक्ष्णो: --आँखों की; न्यस्तौ--गिरवी रखना;अकुत्र--कही नहीं; च--तथा; भयौ--जिसका डर; न--नहीं; सताम्--साधु-पुरुषों के लिए; पर:--अन्य; स्व:--निजी |
इसके पूर्व कि इन दोनों बालकों ने अपने असली माता-पिता को देखा, आप दोनों ने उनकेसंरक्षक का कार्य किया और उन्हें सभी तरह से स्नेहपूर्ण देखभाल, प्रशिक्षण, पोषण तथा सुरक्षाप्रदान की।
हे उत्तम नारी, वे कभी भी डरे नहीं, क्योंकि आप उनकी वैसे ही रक्षा करती रहीं,जिस तरह पलकें आँखों की रक्षा करती हैं।
निस्सन्देह, आप-जैसी सन्त स्वभाव वाली नारियाँकभी भी अपनों और परायों में कोई भेदभाव नहीं बरततीं।
श्रीशुक उबाचगोप्यश्च कृष्णमुपलभ्य चिरादभीष्टंयप्प्रेक्षणे हशिषु पक्ष्मकृतं शपन्ति ।
इृश्भिईदीकृतमलं परिरभ्य सर्वा-स्तद्धावमापुरपि नित्ययुजां दुरापम् ॥
३९॥
श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; गोप्य:--तरुण गोपियाँ; च--तथा; कृष्णम्ू--कृष्ण को; उपलभ्य--निहार कर;चिरातू--बहुत दिनों से; अभीष्टम्-- अपनी इच्छित वस्तु को; यत्--जिसको; प्रेक्षणे--देखते हुए; दशिषु--उनकी आँखों पर;पक्ष्म--पलकों के; कृतम्--बनाने वाले को; शपन्ति--कोसती हैं; हग्भि:--उनकी आँखों से; हृदी-कृतम्-- अपने हृदयों मेंबसाये हुए; अलमू--जी-भरकर; परिरभ्य--आलिंगन करके; सर्वा:--वे सभी; तत्--उसकी; भावम्--प्रेम-तल्लीनता;आपु:-प्राप्त की; अपि--यद्यपि; नित्य--निरन्तर; युजाम्--योगविद्या में लगे रहने वालों के लिए; दुरापम्--प्राप्त करनाकठिन, दुष्प्राप्य
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : अपने प्रिय कृष्ण पर टकटकी लगाये हुई तरुण गोपियाँ अपनीपलकों के सृजनकर्ता को कोसा करती थीं ( क्योंकि वे उनका दर्शन करने में कुछ पलों के लिएबाधक होती थीं )।
अब दीर्घकालीन विछोह के बाद कृष्ण को पुनः देखकर उन्हें अपनी आँखोंके द्वारा ले जाकर, उन्होंने अपने हृदय में बिठा लिया और वहीं उनका जी-भरकर आलिंगन किया।
इस तरह वे उनके आनन्दमय ध्यान में पूरी तरह निमग्न हो गईं, यद्यपि योगविद्या कानिरन्तर अभ्यास करने वाले को ऐसी तललीनता प्राप्त कर पाना कठिन होता है।
भगवांस्तास्तथाभूता विविक्त उपसड्भतः ।
आएिलिष्यानामयं पृष्ठा प्रहसन्निदमब्रवीत् ॥
४० ॥
भगवान्-- भगवान् ने; ता:--उनको; तथा-भूताः--ऐसी दशा में होते हुए; विविक्ते--एकान्त स्थान में; उपसड्डत:ः--जाकर;आश्िलिष्य--आलिंगन करके; अनामयम्--स्वास्थ्य के ( कुशलता ) विषय में; पृष्ठा--पूछ कर; प्रहसन्--हँसते हुए; इदम्--यह; अब्रवीत्--कहा |
जब गोपियाँ भावमग्न खड़ी थीं, तो भगवान् एकान्त स्थान में उनके पास पहुँचे।
हर एक काआलिंगन करने तथा उनकी कुशल-क्षेम पूछने के बाद वे हँसने लगे और इस प्रकार बोले।
अपि स्मरथ नः सख्य: स्वानामर्थचिकीर्षया ।
गतांश्विरायिताउ्तत्रुपक्षक्षपणचेतस: ॥
४१॥
अपि--क्या; स्मरथ--तुम स्मरण करती हो; नः--हमको; सख्य:--सखियाँ; स्वानाम्--अपने प्रियजनों के; अर्थ--हेतु;चिकीर्षया--करने की इच्छा से; गतान्-गये हुए; चिरायितान्--दीर्घकाल तक रहते हुए; शत्रु--हमारे शत्रुओं के; पक्ष--टोली; क्षपण--विनष्ट करने की; चेतस:--मनोभाव वाले
भगवान् कृष्ण ने कहा : हे सखियो, क्या अब भी तुम लोग मेरी याद करती हो? मैंअपने सम्बन्धियों के लिए ही हमारे शत्रुओं का विनाश करने के लिए इतने लम्बे समय तक दूररहता रहा।
अप्यवध्यायथास्मान्स्विदकृतज्ञाविशड्डूया ।
नूनं भूतानि भगवान्युनक्ति वियुनक्ति च ॥
४२॥
अपि--भी; अवध्यायथ--घृणा करती हो; अस्मान्-हमें; स्वित्ू--शायद; अकृत-ज्ञ-कृतघ्न के रूप में; आविशद्जया--सन्देह से; नूनम्--निस्सन्देह; भूतानि--सारे जीव; भगवानू-- भगवान्; युनक्ति--मिलाता है; वियुनक्ति--विलग करता है; च--तथा।
शायद तुम सोचती हो कि मैं कृतघ्न हूँ और इसलिए मुझे घृणा से देखती हो ? अन्ततोगत्वा,सारे जीवों को पास लाने वाला और फिर उन्हें विलग करने वाला, तो भगवान् ही है।
वायुर्यथा घनानीकं तृणं तूलं रजांसि च ।
संयोज्याक्षिपते भूयस्तथा भूतानि भूतकृत् ॥
४३॥
वायु:--वायु; यथा--जिस तरह; घन--बादलों के; अनीकम्--समूहों को; तृणम्--तिनकों को; तूलम्--रुई को; रजांसि--धूल को; च--तथा; संयोज्य--पास लाकर; आक्षिपते--दूर-दूर फेंक देती है; भूय:--एक बार फिर; तथा--उसी प्रकार;भूतानि--जीवों को; भूत--जीवों के; कृत्ू--बनाने वाले।
जिस तरह वायु बादलों के समूहों, घास की पत्तियों, रुई के फाहों तथा धूल के कणों कोपुन: बिखेर देने के लिए ही पास पास लाती है, उसी तरह स्त्रष्टा अपने द्वारा सृजित जीवों के साथव्यवहार करता है।
मयि भक्तिहिं भूतानाममृतत्वाय कल्पते ।
दिछ्या यदासीन्मत्स्नेहो भवतीनां मदापन: ॥
४४॥
मयि--मुझमें; भक्ति:-- भक्ति; हि--निस्सन्देह; भूतानाम्ू--जीवों के लिए; अमृतत्वाय--अमरता के लिए; कल्पते--ले जाताहै; दिछ्या--सौभाग्य से; यत्--जो; आसीतू--बनाया; मत्--मेरे लिए; स्नेहः --स्नेह; भवतीनामू--आप लोगों के लिए; मत्--मुझको; आपन:--प्राप्त करने का कारणस्वरूप।
कोई भी जीव मेरी भक्ति करके शाश्वत जीवन प्राप्त करने के लिए सुयोग्य बन जाता है।
किन्तु तुम लोगों ने अपने सौभाग्य से मेरे प्रति ऐसी विशेष प्रेमम॒य प्रवृत्ति विकसित कर ली है,जिसके द्वारा तुम सबों ने मुझे पा लिया है।
अहं हि सर्वभूतानामादिरन्तोन्तरं बहि: ।
भौतिकानां यथा खं वार्भूववायुज्योतिरड्रना: ॥
४५॥
अहमू--ैं; हि--निस्सन्देह; सर्व--समस्त; भूतानाम्--जीवों का; आदि: --प्रारम्भ; अन्तः--अन्त; अन्तरम्ू-- भीतर; बहि: --बाहर; भौतिकानाम्--समस्त भौतिक वस्तुओं का; यथा--जिस तरह; खम्--आकाश; वा:--जल; भू: --पृथ्वी; वायु: --वायु; ज्योति:--तथा अग्नि; अड्डना:-हे स्त्रियो |
हे स्त्रियो, मैं सारे जीवों का आदि तथा अन्त हूँ और मैं उनके भीतर तथा बाहर उसी तरहविद्यमान हूँ, जिस तरह आकाश, जल, पृथ्वी, वायु तथा अग्नि समस्त भौतिक वस्तुओं के आदिएवं अन्त हैं और उनके भीतर-बाहर विद्यमान रहते हैं।
एवं होतानि भूतानि भूतेष्वात्मात्मना ततः ।
उभयं मय्यथ परे पश्यताभातमक्षरे ॥
४६॥
एवम्--इस प्रकार; हि--निस्सन्देह; एतानि--ये; भूतानि--सारे जीव; भूतेषु--सृष्टि के तत्त्वों के भीतर; आत्मा--आत्मा;आत्मना--अपने असली स्वरूप में; तत:--व्याप्त; उभयम्--दोनों; मयि--मेरे भीतर; अथ--अर्थात्; परे--परम सत्य केभीतर; पश्यत--तुम्हें देखना चाहिए; आभातम्--प्रकट; अक्षरे-विथिन् थे इम्पेरिशब्ले
इस तरह समस्त उत्पन्न की गई वस्तुएँ सृष्टि के मूलभूत तत्त्वों के भीतर निवास करती हैं औरअपने असली स्वरूप में बनी रहती हैं, किन्तु आत्मा सारी सृष्टि में व्याप्त रहता है।
तुम्हें इन दोनोंही को--भौतिक सृष्टि तथा आत्मा को--मुझ अक्षर ब्रह्म के भीतर प्रकट देखना चाहिए।
श्रीशुक उबाचअध्यात्मशिक्षया गोप्य एवं कृष्णेन शिक्षिता: ।
तदनुस्मरणध्वस्तजीवकोशास्तमध्यगन् ॥
४७॥
श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; अध्यात्म--आत्मा विषयक; शिक्षया--शिक्षा से; गोप्य:--गोपियाँ; एवम्--इसप्रकार; कृष्णेन--कृष्ण द्वारा; शिक्षिता:--पढ़ाई गई; तत्ू--उनका; अनुस्मरण--निरन्तर ध्यान से; ध्वस्त--विनष्ट; जीव-'कोशा:ः--आत्मा का सूक्ष्म आवरण ( मिथ्या अहंकार ); तम्--उसको; अध्यगन्--समझ सकी |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : कृष्ण द्वारा आध्यात्मिक विषयों में शिक्षा दिये जाने पर गोपियाँमिथ्या अहंकार के समस्त कलुषों से मुक्त हो गईं क्योंकि वे उनका निरन्तर ध्यान करती थीं।
वेउनमें अपनी गहन निमग्नता के कारण उन्हें पूरी तरह समझ सकीं।
आहुश्न ते नलिननाभ पदारविन्दंयोगेश्वरैईदि विचिन्त्यमगाधबोधे: ।
संसारकूपपतितोत्तरणावलम्बंगेहं जुषामपि मनस्युदियात्सदा न: ॥
४८॥
आहु:--गोपियों ने कहा; च--तथा; ते--तुम्हारा; नलिन-नभ--कमल के फूल जैसी नाभि वाले, हे भगवान्; पद-अरविन्दम्--चरणकमलों को; योग-ई श्ररै:-- बड़े-बड़े योगियों द्वारा; हदि--हृदय के भीतर; विचिन्त्यम्-- ध्यान करने योग्य; अगाध-बोधे:--जो प्रकाण्ड दार्शनिक थे; संसार-कूप--इस संसाररूपी अँधेरे कुएँ में; पतित--गिरे हुओं के; उत्तरण--उद्धारकों के;अवलम्बम्--एकमात्र आश्रय को; गेहम्--पारिवारिक मामले; जुषाम्--लगे हुओं के; अपि--यद्यपि; मनसि--मनों में;उदियात्--उदित हो; सदा--सदैव; नः--हमारे |
गोपियाँ इस प्रकार बोलीं : हे कमलनाभ प्रभु, आपके चरणकमल उन लोगों के लिएएकमात्र शरण हैं, जो भौतिक संसाररूपी गहरे कुएँ में गिर गये हैं।
आपके चरणों की पूजा तथाध्यान बड़े बड़े योगी तथा प्रकाण्ड दार्शनिक करते हैं।
हमारी यही इच्छा है कि ये चरणकमलहमारे हृदयों के भीतर उदित हों, यद्यपि हम सभी गृहस्थकार्यो में व्यस्त रहने वाली सामान्य प्राणीमात्र हैं।
