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अध्याय इक्यासी: भगवान सुदामा ब्राह्मण को आशीर्वाद देते हैं

10.81श्रीशुक उबाचस इत्थं द्विजमुख्येन सह सड्ढडूथयन्हरिः ।

सर्वभूतमनोभिज्ञ: स्मयमान उवाच तम्‌ ॥

१॥

ब्रह्मण्यो ब्राह्मणं कृष्णो' भगवान्प्रहसन्प्रियम्‌ ।

प्रेम्णा निरीक्षणेनैव प्रेक्षनखलु सतां गति: ॥

२॥

श्री-शुक: उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; सः--वह; इत्थम्‌--इस प्रकार; द्विज--ब्राह्मणों में; मुख्येन-- श्रेष्ठ के; सह--साथ; सट्डूथयन्‌--बात करते हुए; हरिः-- भगवान्‌ हरि ने; सर्ब--समस्त; भूत--जीवों के; मन:ः--मनों को; अभिज्ञ:--जाननेवाले; स्मयमान:--हँसते हुए; उवाच--कहा; तम्‌--उस; ब्रह्मण्य:--ब्राह्मण-भक्त; ब्राह्मणम्‌ू--ब्राह्मण को; कृष्ण: --कृष्ण ने;भगवान्‌--भगवान्‌; प्रहसन्‌--हँसते हुए; प्रियम्‌ू--अपने प्रिय मित्र पर; प्रेम्णा--प्रेमपूर्वक; निरीक्षणेन--तिरछी नजर से; एव--निस्सन्देह; प्रेक्षन--देखते हुए; खलु--निस्सन्देह; सताम्‌--साधु-भक्तों के; गति:--लक्ष्य

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : भगवान्‌ हरि अर्थात्‌ कृष्ण सभी जीवों के हृदयों सेभलीभाँति परिचित हैं और वे ब्राह्मणों के प्रति विशेष रूप से अनुरक्त रहते हैं।

समस्त सन्त-पुरुषों के लक्ष्य भगवान्‌ सर्वश्रेष्ठ द्विज से इस तरह बातें करते हुए हँसने लगे और अपने प्रिय मित्रब्राह्मण सुदामा की ओर स्नेहपूर्वक देखते हुए तथा मुसकाते हुए निम्नलिखित शब्द कहे।

अपनी निरपेक्ष भक्ति के कारण अतिरिक्त योग्यता रखते हैं, पक्ष लेते हुए आनन्दित होते हैं।

श्रीभगवानुवाचकिमुपायनमानीतं ब्रह्मन्मे भवता गृहात्‌ ।

अण्वप्युपाहतं भक्ति: प्रेम्णा भुर्येव मे भवेत्‌ ।

भूर्यप्यभक्तोपहतं न मे तोषाय कल्पते ॥

३॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; किम्‌--क्या; उपायनम्‌-- भेंट; आनीतम्‌ू--लाई हुई; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; मे--मेंरे लिए;भवता--आपके द्वारा; गृहात्‌-- अपने घर से; अणु--अति तुच्छ; अपि-- भी; उपाहृतम्‌--दी गई वस्तु; भक्तैः--भक्तों द्वारा;प्रेम्णा--शुद्ध प्रेम से; भूरि--बहुत; एब--निस्सन्देह; मे--मेरे लिए; भवेत्‌--हो जाती है; भूरि--प्रचुर; अपि-- भी; अभक्त--अभक्तों द्वारा; उपहतम्‌-भेंट किया गया; न--नहीं; मे--मेरी; तोषाय--तुष्टि के लिए; कल्पते--कुशल ( दक्ष ) है |

भगवान्‌ ने कहा : हे ब्राह्मण, तुम अपने घर से मेरे लिए कौन-सा उपहार लाये हो ? शुद्धप्रेमवश अपने भक्तों द्वारा प्रस्तुत की गई छोटी से छोटी भेंट को भी मैं बड़ी मानता हूँ, किन्तुअभक्तों द्वारा चढ़ाई गई बड़ी से बड़ी भेंट भी मुझे तुष्ट नहीं कर पाती ।

पत्र॑ पुष्पं फल तोयं यो मे भकत्या प्रयच्छति ।

तदहं भ्क्‍्तयुपहतमएनामि प्रयतात्मन: ॥

४॥

पत्रम्‌ू-पत्ती; पुष्पमू--फूल; फलम्‌ू--फल; तोयमू--जल; यः--जो कोई भी; मे--मुझको; भक्त्या-- भक्तिपूर्वक;प्रयच्छति-- प्रदान करता है; तत्‌ू--वह; अहम्‌--मैं; भक्ति-उपहतम्‌-- भक्ति की भेंट; अश्नामि-- स्वीकार करता हूँ; प्रयत-आत्मन:--शुद्ध चेतना वाले से।

यदि कोई मुझे प्रेम तथा भक्ति के साथ एक पत्ती, फूल, फल या जल अर्पित करता है, तोमैं उसे स्वीकार करता हूँ।

इत्युक्तोउपि द्वियस्तस्मै ब्रीडित: पतये भ्रिय: ।

पृथुकप्रसूतिं राजन्न प्रायच्छदवाड्मुख: ॥

५॥

इति--इस प्रकार; उक्त:--कहा गया; अपि--यद्यपि; द्विज:--ब्राह्मण; तस्मै--उसको; ब्रीडित:--व्यग्र; पतये--पति को;भ्रिय:--लक्ष्मी के; पृुथुक--तंदुल की; प्रसृतिमू--मुट्ठी को; राजन्‌--हे राजा ( परीक्षित ); न प्रायच्छत्‌-- प्रदान नहीं किया;अवाक्‌--नमित; मुख: --सिर किये

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : हे राजन, इस प्रकार सम्बोधित किये जाने पर भी वहब्राह्मण लक्ष्मी के पति को मुट्ठी-भर तंदुल देने में अत्यधिक हिचकिचा रहा था।

बस, वह लज्जाके मारे अपना सिर नीचे किये रहा।

सर्वभूतात्महक्साक्षात्तस्यागमनकारणम्‌ ।

विज्झायाचिन्तयन्नायं श्रीकामो माभजत्पुरा ॥

६॥

पत्या: पतिक्रतायास्तु सखा प्रियच्चिकीर्षया ।

प्राप्तो मामस्य दास्यामि सम्पदोशमर्त्यदुर्लभा: ॥

७॥

सर्व--समस्त; भूत--जीवों के; आत्म--हृदयों के; हक्‌--साक्षी; साक्षात्‌- प्रत्यक्ष; तस्थ--उसके ( सुदामा के ); आगमन--आने का; कारणमू--कारण; विज्ञाय-- भलीभाँति समझ कर; अचिन्तयत्‌--सोचा; न--नहीं; अयम्‌--यह; श्री--ऐश्वर्य का;काम:--इच्छुक; मा--मुझको; अभजत्‌--पूजता रहा; पुरा-- भूतकाल में; पत्या: --अपनी पत्नी के; पति--अपने पति केप्रति; ब्रताया: --अनुरक्त; तु-- लेकिन; सखा--मित्र; प्रिय--संतोष; चिकीर्षया--प्राप्त करने की इच्छा से; प्राप्त: --आयाहुआ; माम्‌--मुझको; अस्य--इसको; दास्यामि--दूँगा; सम्पदः --सम्पदा; अमर्त्य--देवताओं के द्वारा; दुर्लभा:--अलभ्य |

समस्त जीवों के हृदयों में प्रत्यक्ष साक्षी स्वरूप होने के कारण भगवान्‌ कृष्ण भलीभाँतिसमझ गये कि सुदामा उनसे मिलने क्‍यों आया है।

अतः उन्होंने सोचा, 'इसके पूर्व मेरे मित्र नेकभी भी भौतिक ऐश्वर्य की इच्छा से मेरी पूजा नहीं की है, किन्तु अब वही अपनी सती तथापति-परायणा पतली को सन्तुष्ट करने के लिए मेरे पास आया है।

मैं उसे वह सम्पदा प्रदानकरूँगा, जो अमर देवतागण भी कभी प्राप्त नहीं कर सकते।

इत्थं विचिन्त्य वसनाच्चीरबद्धान्द्रिजन्मन: ।

स्वयं जहार किमिदमिति पृथुकतण्डुलान्‌ ॥

८॥

इत्थम्‌--इस तरह; विचिन्त्य--सोच कर; वसनात्‌ू--कपड़े से; चीर--कपड़े के टुकड़े में; बद्धान्‌ू--बँधा हुआ; द्वि-जन्मन:--ब्राह्मण के; स्वयमू--खुद; जहार--छीन लिया; किमू--क्या; इृदम्‌--यह; इति--ऐसा कहते हुए; पृथुक-तण्डुलान्‌--तन्दुलके दानों को

इस प्रकार सोचते हुए भगवान्‌ ने ब्राह्मण के वस्त्र में से कपड़े के पुराने टुकड़े में बँधे तन्दुलके दानों को छीन लिया और कह उठे, 'यह क्‍या है ?

'नन्वेतदुपनीतं मे परमप्रीणनं सखे ।

तर्पयन्त्यड़ मां विश्वमेते पुथुकतण्डुला: ॥

९॥

ननु--क्या; एतत्‌--यह; उपनीतम्‌--लाया गया; मे--मेंरे लिए; परम--परम; प्रीणनम्‌--संतोष प्रदान करते हुए; सखे--हेमित्र; तर्पयन्ति--कृपापात्र बनते हैं; अड्र--हे प्रिय; मामू--मुझको; विश्वम्‌--सारे ब्रह्माण्ड ( स्वरूप में ); एते--ये; पृठुक-तण्डुला:--तन्दुल के दाने |

'हे मित्र, क्या इसे मेरे लिए लाये हो ? इससे मुझे बहुत खुशी हो रही है।

निस्सन्देह तन्दुल केये थोड़े-से दाने न केवल मुझे, अपितु सारे ब्रह्माण्ड को तुष्ट करने वाले हैं।

इति मुष्टिं सकृज्जग्ध्वा द्वितीयां जग्धुमाददे ।

तावच्छीरज॑गृहे हस्तं तत्परा परमेष्ठिन: ॥

१०॥

इति--ऐसा कहकर; मुष्टिम्‌--मुट्ठी- भर; सकृतू--एक बार; जग्ध्वा--खाकर; द्वितीयम्‌--दूसरी; जग्धुमू--खाने के लिए;आददे--लिया; तावत्‌--तब तो; श्री:--लक्ष्मी ( रुक्मिणीदेवी ) ने; जगृहे--पकड़ लिया; हस्तम्‌--हाथ; तत्‌--उस; परा--अनुरक्त; परमे-स्थिन: -- भगवान्‌ ।

यह कहकर भगवान्‌ ने एक मुट्ठी खाई और दूसरी मुट्ठी खाने ही वाले थे कि पति-परायणादेवी रुक्मिणी ने उनका हाथ पकड़ लिया।

एतावतालं विश्वात्मन्सर्वसम्पत्समृद्धये ।

अस्मिनलोकेथ वामुष्मिन्पुंसस्त्वत्तोषकारणम्‌ ॥

११॥

एतावता--इतना; अलमू--पर्याप्त; विश्व--ब्रह्माण्ड के; आत्मन्‌--हे आत्मा; सर्व--समस्त; सम्पत्‌--सम्पदा का; समृद्धये--समृद्धि के लिए; अस्मिनू--इस; लोके--संसार में; अथ वा--या फिर; अमुष्मिन्‌--अगले में; पुंस:--मनुष्य के लिए; त्वत्‌--तुम्हारे; तोष--संतोष; कारणम्‌--कारणस्वरूप |

महारानी रुक्मिणी ने कहा : हे ब्रह्माण्ड के आत्मा, इस जगत में तथा अगले जगत मेंसभी प्रकार की प्रभूत सम्पदा दिलाने के लिए यह पर्याप्त है।

आखिर, किसी की समृद्धिआपकी तुष्टि पर ही तो निर्भर है।

ब्राह्मणस्तां तु रजनीमुषित्वाच्युतमन्दिरे ।

भुकत्वा पीत्वा सुखं मेने आत्मानं स्वर्गत॑ं यथा ॥

१२॥

ब्राह्मण:--ब्राह्मण; तामू--उस; तु--तथा; रजनीम्‌--रात; उषित्वा--रह कर; अच्युत-- भगवान्‌ कृष्ण के; मन्दिरि--महल में;भुक्त्वा--खाकर; पीत्वा--पीकर; सुखम्‌--सुखपूर्वक; मेने--सोचा; आत्मानम्‌--अपने से; स्व:--आध्यात्मिक जगत,वैकुण्ठ-लोक; गतम्‌-- प्राप्त करके; यथा--मानो

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : उस ब्राह्मण ने जी-भरकर खाने-पीने के बाद वह रात्रिभगवान्‌ अच्युत के महल में बिताई।

उसे ऐसा अनुभव हुआ, मानो वह वैकुण्ठ-लोक में आ गयाहो।

श्रोभूते विश्वभावेन स्वसुखेनाभिवन्दित: ।

जगाम स्वालयं तात पथ्यनत्रज्य नन्दितः ॥

१३॥

श्र:-भूते--अगले दिन; विश्व--ब्रह्मण्ड के; भावेन--पालनकर्ता द्वारा; स्व--अपने भीतर; सुखेन--सुख का अनुभव करनेवाले; अभिवन्दित:--आदरित; जगाम--चला गया; स्व--अपने; आलयमू--घर; तात--हे प्रिय ( राजा परीक्षित ); पथि--रास्ते में; अनुब्रज्य--चलते हुए; नन्दितः--हर्षित |

अगले दिन ब्रह्माण्ड के पालनकर्ता आत्माराम भगवान्‌ कृष्ण द्वारा सम्मानित होकर सुदामाघर के लिए चल पड़ा।

हे राजन, वह ब्राह्मण मार्ग पर चलते हुए अत्यधिक हर्षित था।

स चालब्ध्वा धनं कृष्णान्न तु याचितवान्स्वयम्‌ ।

स्वगृहान्त्रीडितोगच्छन्महह्र्शननिर्वृतः ॥

१४॥

सः--वह; च--तथा; अलब्ध्वा--न पाकर; धनम्‌-- धन; कृष्णात्‌--कृष्ण से; न--नहीं; तु--फिर भी; याचितवानू--माँगा;स्वयम्‌ू--अपने से; स्व--अपने; गृहान्‌--घर को; ब्रीडित:--खिन्न; अगच्छत्‌--चला गया; महत्‌-- भगवान्‌ के ; दर्शन--दर्शनसे; निर्वृतः--हर्षित होकर।

यद्यपि सुदामा को बाह्य रूप से भगवान्‌ कृष्ण से कोई धन प्राप्त नहीं हुआ था, फिर भी वहअपनी ओर से कुछ भी माँगने में अत्यधिक सकुचा रहा था।

वह यह अनुभव करते हुए पूर्णसन्तुष्ट होकर लौटा कि उसने भगवान्‌ के दर्शन पा लिये हैं।

अहो ब्रह्मण्यदेवस्थ इृष्ठा ब्रहाण्यता मया ।

यहरिद्रतमो लक्ष्मीमाश्लिष्टो बिभ्रतोरसि ॥

१५॥

अहो--आह; ब्रह्मण्य--ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धावान्‌; देवस्य-- भगवान्‌ का; दृष्ट--देखा हुआ; ब्रह्मण्यता--ब्राह्मण भक्ति;मया--मेरे द्वारा; यत्‌ू--जो भी; दरिद्र-तम:ः--सबसे निर्धन व्यक्ति; लक्ष्मीमू--लक्ष्मी को; आशिलष्ट:--आलिंगन किया;बिभ्रता-- धारण करने वाले के द्वारा; उरसि--अपने वक्षस्थल पर।

सुदामा ने सोचा : भगवान्‌ कृष्ण ब्राह्मण-भक्त के रूप में विख्यात हैं और अब मैंने स्वयंइस भक्ति को देख लिया है।

निस्सन्देह लक्ष्मीजी को अपने वक्षस्थल पर धारण करने वालेउन्होंने सबसे दरिद्र भिखारी का आलिंगन किया है।

क्वाहं दरिद्र: पापीयानक्व कृष्ण: श्रीनिकेतन: ।

ब्रह्मबन्धुरिति स्माहं बाहुभ्यां परिरम्भित: ॥

१६॥

क्व--कौन; अहम्‌--मैं हूँ; दरिद्र: --निर्धन; पापीयानू--पापी; क्व--कौन; कृष्ण: -- भगवान्‌ कृष्ण हैं; श्री-निकेतन:--समस्तऐश्वर्य के दिव्य स्वरूप; ब्रह्म-बन्धु;--ब्राह्मण का मित्र, ब्राह्मण न कहलाने योग्य; इति--इस प्रकार; स्म--निश्चय ही; अहम्‌--मैं; बाहुभ्यामू-- भुजाओं से; परिरम्भित:--आलिंगित |

मैं कौन हूँ? एक पापी, निर्धन ब्राह्मण और कृष्ण कौन हैं? भगवान्‌, छहों ऐश्वर्यों से पूर्ण ।

तो भी उन्होंने अपनी दोनों भुजाओं से मेरा आलिंगन किया है।

निवासित:ः प्रियाजुष्टे पर्यड्रे भ्रातरो यथा ।

महिष्या वीजित: श्रान्तो बालव्यजनहस्तया ॥

१७॥

निवासित:--बैठाया गया; प्रिया-- अपनी प्रियतमा द्वारा; जुष्टे--काम में लाये जाने वाले; पर्यड्लें--पलंग पर; भ्रातर: -- भाइयोंको; यथा--जिस तरह; महिष्या--अपनी रानी द्वारा; वीजित:--पंखा झला; श्रान्तः--थका हुआ; बाल--( चमरी के ) बालका; व्यजन--पंखा; हस्तया--हाथ से |

उन्होंने मेरे साथ अपने भाइयों जैसा वर्ताव किया और अपनी प्रियतमा के पलंग पर बैठाया।

और चूँकि मैं थका हुआ था, इसलिए उनकी रानी ने चामरसे स्वयं मुझ पर पंखा झला।

शुश्रूषया परमया पादसंवाहनादिभि: ।

पूजितो देवदेवेन विप्रदेवेन देववत्‌ ॥

१८॥

शुश्रूषया--सेवा से; परमया--निष्ठावान; पाद--पाँव की; संवाहन--मालिश; आदिभि: --इत्यादि से; पूजित:--पूजित; देव-देवेन--समस्त देवताओं के स्वामी द्वारा; विप्र-देवेन--ब्राह्मणों के स्वामी द्वारा; देव--देवता; वत्‌--सह॒श |

यद्यपि वे समस्त देवताओं के स्वामी हैं और समस्त ब्राह्मणों के पूज्य हैं, फिर भी उन्होंने मेरेपाँवों की मालिश करके तथा अन्य विनीत सुश्रूषाओं द्वारा मेरी इस तरह पूजा की, मानो मैं हीदेवता हूँ।

स्वर्गापवर्गयो: पुंसां रसायां भुवि सम्पदाम्‌ ।

सर्वासामपि सिद्धीनां मूलं तच्चरणार्चनम्‌ ॥

१९॥

स्वर्ग--स्वर्ग; अपवर्गयो:--तथा चरम मोक्ष का; पुंसाम्‌--सारे मनुष्यों के लिए; रसायाम्‌--रसातल में; भुवि--तथा पृथ्वी पर;सम्पदाम्‌--सम्पदा के; सर्वासामू--समस्त; अपि--भी; सिद्धीनाम्‌--सिद्धियों के; मूलम्‌--मूल कारण; तत्‌--उनके ; चरण--चरणों की; अर्चनम्‌ू-पूजा |

मनुष्य स्वर्ग में, मोक्ष में, रसातल में तथा इस पृथ्वी पर जितनी भी सिद्ध्रियाँ प्राप्त कर सकताहै, उसका आधारभूत कारण उनके चरणकमलों की भक्ति है।

अधनोयं धन प्राप्य माद्यत्रुच्चैर्न मां स्मरेत्‌ ।

इति कारुणिको नूनं धन मेभूरि नाददात्‌ ॥

२०॥

अधनः--निर्धन व्यक्ति; अयमू--यह; धनम्‌-- धन; प्राप्प--प्राप्त करके; माद्यन्‌--प्रसन्न होते हुए; उच्चै:--अत्यधिक; न--नहीं; माम्‌--मुझको; स्मरेत्‌--स्मरण करेगा; इति--इस प्रकार सोचते हुए; कारुणिक:--दयालु; नूनम्‌ू--निस्सन्देह; धनम्‌--धन; मे--मुझको; अभूरि--कुछ, रंच; न आददात्‌--नहीं दिया।

यह सोचकर कि यदि यह निर्धन बेचारा सहसा धनी हो जायेगा, तो वह मदमत्त करने वालेसुख में मुझे भूल जायेगा, दयालु भगवान्‌ ने मुझे रंचमात्र भी धन नहीं दिया।

इति तच्चिन्तयन्नन्तः प्राप्तो नियगृहान्तिकम्‌ ।

सूर्यानलेन्दुसड्राशैर्विमानै: सर्वतो वृतम्‌ ॥

२१॥

विचित्रोपवनोद्यानै: कूजद्दिवजकुलाकुलै: ।

प्रोत्फुल्लकमुदाम्भोजकह्लारोत्पलवारिभि: ॥

२२॥

जुष्ट स्वलड्डू तेः पुम्भि: स्त्रीभिश्व हरिणाक्षिभि: ।

किमिदं कस्य वा स्थान कथं तदिदमित्यभूत्‌ ॥

२३॥

इति--इस प्रकार; तत्‌ू--यह; चिन्तयन्‌--सोचते हुए; अन्त:--अन्दर ही अन्दर; प्राप्त:--आ गया; निज--अपने; गृह--घर के;अन्तिकम्‌- पड़ोस में; सूर्य--सूर्य; अनल--अग्नि; इन्दु--तथा चन्द्रमा; सड्जाशैः --होड़ में; विमानैः--दैवी महलों से;सर्वतः--सभी दिशाओं से; वृतम्‌--घिरा हुआ; विचित्र--आश्चर्यपूर्ण; उपवन-- आँगन; उद्यानै:--तथा बगीचों से; कूजत्‌--कू-कू करते; द्विज--पक्षियों के; कुल--झुंडों समेत; आकुलै:--झुंड बनाते; प्रोत्फुल्ल--पूरी तरह खिले; कुमुद--कमलिनियों सेयुक्त; अम्भोज--दिन में खिलने वाले कमलों; कह्ार-- श्रेत कमलों; उत्पल--तथा जल कुमुदिनी; वारिभि:--जलाशयों से;जुष्टम्‌--सुशोभित; सु--सुन्दर; अलड्डू तै:--सजे; पुम्भि:--पुरुषों से; स्त्रीभि:--स्त्रियों से; च--तथा; हरिणा--हिरनी जैसी;अक्षिभिः--आँखों से; किम्‌--क्या; इृदम्‌--यह; कस्य--किसका; वा-- अथवा; स्थानम्‌--स्थान; कथम्‌--कैसे; तत्‌--वह;इदम्‌--यह; इति--इस तरह; अभूत्‌--हो गया है

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार अपने आप सोचते-सोचते सुदामा अन्ततः उसस्थान पर आ पहुँचा, जहाँ उसका घर हुआ करता था।

किन्तु अब वह स्थान सभी ओर से ऊँचेभव्य महलों से घनीभूत था, जो सूर्य, अग्नि तथा चन्द्रमा के सम्मिलित तेज से होड़ ले रहे थे।

वहाँ आलीशान आँगन तथा बगीचे थे, जो कूजन करते हुए पक्षियों के झुंडों से भरे थे औरजलाशयों से सुशोभित थे, जिनमें कुमुद, अम्भोज, कह्लार तथा उत्पल नामक कमल खिले हुएथे।

अगवानी के लिए उत्तम वस्त्र धारण किये पुरुष तथा हिरनियों जैसी आँखों वाली स्त्रियाँ खड़ी थीं।

सुदामा चकित था कि यह सब क्‍या है? यह किसकी संपत्ति है? और यह सब कैसेहुआ?

एवं मीमांसमान तं नरा नार्यो मरप्रभा: ।

प्रत्यगृह्नन्महाभागं गीतवाद्येन भूयसा ॥

२४॥

एवम्‌--इस प्रकार; मीमांसमानम्‌--गम्भीरता से विचार करता हुआ; तमू--उसको; नरा:--पुरुष; नार्य:--तथा स्त्रियाँ; अमर--देवताओं के समान; प्रभा:--तेजमय मुखड़ों वाले; प्रत्यगृह़न्‌ू--सत्कार किया गया; महा- भागम्‌ू--अत्यन्त भाग्यशाली; गीत--गायन; वाह्येन--तथा बाजे से; भूयसा--उच्च

जब वह इस तरह सोच-विचार में डूबा था, तो देवताओं जैसे तेजवान सुन्दर पुरुष तथादासियाँ उँचे स्वर में गीत गाती तथा बाजे के साथ अपने अत्यन्त भाग्यशाली स्वामी का सत्कारकरने आगे आईं।

'पतिमागतमाकर्णयय पत्युद्धर्षातिसम्भ्रमा ।

निश्चक्राम गृहात्तूर्ण रूपिणी श्रीरिवालयात्‌ ॥

२५॥

पतिम्‌--अपने पति को; आगतम्‌--आया हुआ; आकर्ण्य--सुन कर; पत्ती--उसकी पतली; उद्धर्षा--हर्षित; अति--अत्यधिक;सम्भ्रमा--उत्तेजित; निश्चक्राम--बाहर आ गई; गृहात्‌--घर से; तूर्णम्‌ू--तेजी से; रूपिणी --स्वरूप वाली; श्री:--लक्ष्मी के;इब--मानो; आलयातू्‌--अपने धाम से |

जब ब्राह्मण की पतली ने सुना कि उसका पति आया है, तो वह हर्ष के मारे तुरन्त घर सेबाहर निकल आईं।

वह दिव्य धाम से निकलने वाली साक्षात्‌ लक्ष्मी जैसी लग रही थी।

पतिब्रता पतिं हृष्ठरा प्रेमोत्कण्ठा श्रुलोचना ।

मीलिताक्ष्यनमद्दुद््धया मनसा परिषस्वजे ॥

२६॥

'पति-ब्रता--पति-परायणा; पतिम्‌--पति को; हृध्ला--देखकर; प्रेम--प्रेम की; उत्कण्ठ-- उत्सुकता से; अश्रु-- आँसू से भरे;लोचना--आँखों वाली; मीलित--बन्द किये; अक्षी--आँखें; अनमत्‌-- प्रणाम किया; बुद्धया--विचारमग्न; मनसा--हृदय से;'परिषस्वजे-- आलिंगन किया।

जब उस पतिक्रता स्त्री ने अपने पति को देखा, तो उसकी आँखें प्रेम तथा उत्सुकता केआँसुओं से भर आईं।

अपनी आँखें बन्द किये विचारमग्न होकर उसने पतिको प्रणाम किया औरमन ही मन उसका आलिंगन कर लिया।

पत्नीं वीक्ष्य विस्फुरन्तीं देवीं वैमानिकीमिव ।

दासीनां निष्ककण्ठीनां मध्ये भान्‍्तीं स विस्मित: ॥

२७॥

पतीम्‌--अपनी पत्नी को; वीक्ष्य--देखकर; विस्फुरन्तीमू--तेजवान लग रही; देवीम्‌--देवी को; वैमानिकीम्‌--विमान परआरूढ़; इब--सहृश; दासीनाम्‌ू--दासियों के; निष्क--लॉकेट; कण्ठीनाम्‌--जिनके गलों में; मध्ये--बीचोबीच; भान्तीम्‌--चमकती हुई; सः--वह; विस्मित:--चकित |

सुदामा अपनी पतली को देखकर चकित था।

रलजटित लॉकेटों से अलंकृत दासियों केबीच चमक रही वह उसी तरह तेजोमय लग रही थी, जिस तरह कोई देवी अपने दैवी-विमान मेंदीपित हो।

प्रीतः स्वयं तया युक्त: प्रविष्टो निजमन्दिरम्‌ ।

मणिस्तम्भशतोपेतं महेन्द्रभवनं यथा ॥

२८ ॥

प्रीत:--प्रसन्न; स्वयम्‌--खुद; तया--उसके; युक्त:--साथ होकर; प्रविष्ट:-- भीतर जाकर; निज--अपने; मन्दिरम्‌--घर में;मणि--मणियों वाले; स्तम्भ--ख भों; शत--सैकड़ों; उपेतम्‌--से युक्त; महा-इन्द्र--स्वर्ग के राजा महान्‌ इन्द्र का; भवनम्‌--महल; यथा--सहश |

उसने आनन्दपूर्वक अपनी पत्नी को साथ लिए अपने घर में प्रवेश किया, जहाँ सैकड़ोंरतलजटित ख भे थे, जैसे देवराज महेन्द्र के महल में हैं।

परयःफेननिभा: शय्या दान्ता रुक्‍्मपरिच्छदा: ।

पर्यड्डा हेमदण्डानि चामरव्यजनानि च ॥

२९॥

आसनानि च हैमानि मृदूपस्तरणानि च ।

मुक्तादामविलम्बीनि वितानानि द्युमन्ति च ॥

३०॥

स्वच्छस्फटिककुड्येषु महामारकतेषु च ।

रलदीपान्भध्राजमानान्‍ललना रलसंयुताः ॥

३१॥

विलोक्य ब्राह्मणस्तत्र समृद्धीः सर्वसम्पदाम्‌ ।

तर्कयामास निर्व्यग्र: स्वसमृद्धिमहैतुकीम्‌ ॥

३२॥

'पयः--दूध के; फेन--झाग के; निभा:--सहृश; शय्या:--सेज, पलंग; दान्ताः--हाथी-दाँत से बनी; रुक्म--सुनहले;परिच्छदा: --सजावट; पर्यट्टा:--पलंग, आसन; हेम--सोने के; दण्डानि--जिसके पाए; चामर-व्यजनानि--चमरी गाय कीपूँछ के बने पंखे; च--तथा; आसनानि--कुर्सियाँ; च--तथा; हैमानि--सुनहरे; मृदु--मुलायम; उपस्तरणानि--गद्दों; च--तथा; मुक्ता-दाम--मोती की लड़ों से; विलम्बीनि--लटकती; वितानानि--चँदोवों; द्युमन्ति--चमचमाते हुए; च--तथा;स्वच्छ--साफ; स्फटिक--संगमरमर की; कुड्येषु--दीवालों पर; महा-मारकतेषु--बहुमूल्य मरकत-मणियों से; च--भी;रल--रत्नजटित; दीपान्‌--दीपकों; भ्राजमानान्‌ू--चमकते; ललना: --स्त्रियाँ; रत्न--रत्नों से; संयुताः:--सजी; विलोक्य--देखकर; ब्राह्मण: --ब्राह्मण ने; तत्र--वहाँ; समृद्धी: --वृद्द्धि की ओर उन्मुख; सर्व--समस्त; सम्पदाम्‌--ऐश्वर्य का; तर्कयाम्‌आस--अनुमान लगाया; निर्व्यग्र:--अविचलित; स्व--अपनी; समृद्धिम्‌--सम्पन्नता के विषय में; अहैतुकीम्‌--जिसकी आशानहीं की गई थी।

सुदामा के घर में दूध के झाग सहश कोमल तथा सफेद पलंग थे, जिनके पाए हाथी-दाँतके बने थे और सोने से अलंकृत थे।

वहाँ कुछ सोफे भी थे, जिनके पाए सोने के थे।

साथ हीराजसी चामर पंखे, सुनहरे सिंहासन, मुलायम गद्दे तथा मोती की लड़ों से लटकते चमचमातेचँदोवे थे।

चमकते स्फटिक की दीवालों पर बहुमूल्य मरकत-मणि (पन्ने ) जड़े थे औररत्तजटित दीपक प्रकाशमान थे।

उस महल की सारी स्त्रियाँ बहुमूल्य रत्नों से अलंकृत थीं।

जबउस ब्राह्मण ने सभी प्रकार का यह विलासमय ऐश्वर्य देखा, तो उसने शान्त भाव से इसआकस्मिक समृद्ध्धि के विषय में अपने मन में तर्क किया।

नूनं बतैतन्मम दुर्भगस्यशश्वद्दरिद्रस्य समृद्ध्िहेतु: ।

महाविभूतेरवलोकतोन्योनैवोपपद्येत यदूत्तमस्य ॥

३३॥

नूनम्‌ बत--निश्चय ही; एतत्‌--इस; मम--मुझ; दुर्भगस्थ--अभागे का; शश्वत्‌--सदैव; दरिद्रस्थ--निर्धन की; समृर्द्धि--सम्पन्नता के; हेतु:--कारण; महा-विभूतेः--सर्वाधिक ऐ श्वर्यशशाली की; अवलोकत:ः--चितवन के अतिरिक्त; अन्यः--अन्य;न--नहीं; एब--निस्सन्देह; उपपच्येत--पाया जाना चाहिए; यदु-उत्तमस्य--यदुओं में श्रेष्ठ की |

सुदामा ने सोचा : मैं सदैव से निर्धन रहा हूँ।

निश्चय ही मुझ जैसे अभागे व्यक्ति काएकाएक धनी हो जाने का एकमात्र सम्भावित कारण यही हो सकता है कि यदुवंश के परमऐश्वर्यशाली प्रधान भगवान्‌ कृष्ण ने मुझ पर अपनी कृपा-दृष्टि की है।

नन्वब्रुवाणो दिशते समक्षयाचिष्णवे भूर्यपि भूरिभोज: ।

पर्जन्यवत्तत्स्वयमीक्षमाणोदाशाहकाणामृषभः सखा मे ॥

३४॥

ननु--आखिर; अब्लुवान:--न बोलते हुए; दिशते--दिया है; समक्षम्‌--उपस्थिति में; याचिष्णवे--याचना करने की इच्छा करनेवाले को; भूरि--प्रचुर ( धन ); अपि-- भी; भूरि--प्रचुर ( धन ); भोज:--भोक्ता; पर्जन्य-वत्‌--बादल के समान; तत्‌--वह;स्वयम्‌--स्वयं; ईक्षमाण:-- देखते हुए; दाशाहकाणाम्‌--राजा दाशाह के वंशजों में; ऋषभ:--सर्व श्रेष्ठ; सखा--मित्र; मे--मेरा।

आखिर, दाशाहों में सर्वश्रेष्ठ तथा असीम सम्पदा के भोक्ता, मेरे मित्र कृष्ण ने देखा कि मैंचुपके से उनसे माँगना चाहता था।

इस तरह जब मैं उनके समक्ष खड़ा था, तो यद्यपि उन्होंनेइसके विषय में कुछ कहा नहीं, तो भी उन्होंने मुझे प्रचुर सम्पदा प्रदान की है।

उन्होंने दयावानवर्षा वाले बादल जैसा कार्य किया है।

किश्ित्करोत्युर्वपि यत्स्वदत्तंसुहृत्कृतं फल्गवपि भूरिकारी ।

मयोपणीतं पृथुकैकमुष्टिंप्रत्यग्रहीत्प्रीतियुतो महात्मा ॥

३५॥

किझ्ञित्‌--तुच्छ; करोति--करता है; उरू--महान्‌; अपि-- भी; यत्‌--जो; स्व--स्वयं द्वारा; दत्तम्‌ू--दिया हुआ; सुहृत्‌--शुभचिन्तक मित्र द्वारा; कृतम्‌ू--किया गया; फल्गु--न्यून; अपि-- भी; भूरि--अधिक; कारी--करने वाला; मया--मेरे द्वारा; उपनीतम्‌--लाया हुआ; पृथुक--तन्दुल; एक--एक; मुष्टिम्‌--मुट्ठी-भर; प्रत्यग्रहीत्‌-- स्वीकार किया; प्रीति-युतः--प्रसन्नतापूर्वक; महा-आत्मा--परमात्मा ने |

भगवान्‌ अपने बड़े से बड़े वर को तुच्छ मानते हैं, किन्तु अपने शुभचिन्तक भक्त द्वारा कीगई तुच्छ सेवा को बहुत बढ़ा देते हैं।

इस तरह परमात्मा ने मेरे द्वारा लाये गये एक मुट्ठी तंदुल कोसहर्ष स्वीकार कर लिया।

तस्यैव मे सौहदसख्यमैत्री-दास्यं पुनर्जन्मनि जन्मनि स्यात्‌ ।

महानुभावेन गुणालयेनविषज्जतस्तत्पुरुषप्रसड़: ॥

३६॥

तस्य--उसके लिए; एव--निस्सन्देह; मे--मेरा; सौहद--प्रेम, सौहार्द; सख्य--मित्रता; मैत्री--सहानुभूति; दास्यमू--तथा दास्यभाव; पुनः--बारम्बार; जन्मनि जन्मनि--जन्म-जन्मांतर; स्थातू-होए; महा-अनुभावेन--परम दयालु भगवान्‌ से; गुण--दिव्यगुणों के; आलयेन--आगार; विषज्ञत: --अनुरक्त; तत्‌--उसके; पुरुष-- भक्तों की; प्रसड़:ः--बहुमूल्य संगति।

भगवान्‌ समस्त दिव्य गुणों के परम दयामय आगार हैं।

मैं जन्म-जन्मांतर प्रेम, मित्रता तथासहानुभूति के साथ उनकी सेवा करूँ और उनके भक्तों के बहुमूल्य सान्निध्य से ऐसी दृढ़ अनुरक्तिउत्पन्न करूँ।

भक्ताय चित्रा भगवान्हि सम्पदोराज्यं विभूतीर्न समर्थयत्यज: ।

अदीर्घबोधाय विचक्षण: स्वयंपश्यन्निपातं धनिनां मदोद्धवम्‌ ॥

३७॥

भक्ताय--उनके भक्त के लिए; चित्रा:--विचित्र; भगवान्‌-- भगवान्‌; हि--निस्सन्देह; सम्पद:--ऐश्वर्य; राज्यम्‌--राज्य;विभूती:-- भौतिक सम्पत्ति; न समर्थयति--प्रदान नहीं करता; अज:--अजन्मा; अदीर्घ--छोटा; बोधाय--जिसकी समझ;विचक्षण:--चतुर; स्वयम्‌--स्वयं; पश्यन्‌ू--देखते हुए; निपातम्‌--पतन; धनिनाम्‌-- धनी का; मद--गर्व से उत्पन्न नशे का;उद्धवम्‌--उत्थान |

जिस भक्त में आध्यात्मिक अन्तर्ईष्टि ( समझ ) नहीं होती, उसे भगवान्‌ कभी भी इस जगत का विचित्र ऐश्वर्य--राजसी शक्ति तथा भौतिक सम्पत्ति--नहीं सौंपते।

दरअसल अपने अथाहज्ञान से अजन्मा भगवान्‌ भलीभाँति जानते हैं कि किस तरह गर्व का नशा किसी धनी का पतनकर सकता है।

इत्थं व्यवसितो बुद्धया भक्तोतीव जनार्दने ।

विषयान्जायया त्यक्ष्यन्बुभुजे नातिलम्पट: ॥

३८॥

इत्थम्‌--इस प्रकार; व्यवसित:ः--संकल्प को स्थिर करते हुए; बुद्धया--बुद्धि से; भक्त:--अनुरक्त; अतीव--पूर्णतया;जनार्दने--समस्त जीवों के आश्रय भगवान्‌ कृष्ण के प्रति; विषयान्‌ू--इन्द्रिय-तृप्ति की वस्तुएँ; जायया--अपनी पत्नी के साथ;त्यक्ष्यन्‌--त्याग करने की इच्छा से; बुभुजे-- भोग किया; न--नहीं; अतिलम्पट:--धनलोलुप |

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस तरह अपनी आध्यात्मिक बुद्धि के द्वारा अपने संकल्पको हढ़ करते हुए सुदामा समस्त जीवों के आश्रय भगवान्‌ कृष्ण के प्रति पूर्णतया अनुरक्त बनारहा।

उसने धनलिप्ता से रहित होकर अपनी पत्नी के साथ साथ उस इन्द्रिय-सुख का भोग,अन्ततः समस्त इन्द्रिय-तृप्ति का परित्याग करने के विचार ( अनासक्त भाव ) से किया जो उसेप्रदान किया गया था।

तस्य वे देवदेवस्य हरेयज्ञपते: प्रभो: ।

ब्राह्मणा: प्रभवो देव न तेभ्यो विद्यते परम्‌ ॥

३९॥

तस्य--उसका; बै-- भी; देव-देवस्थ--ईश्वरों के ईश्वर; हरेः--कृष्ण का; यज्ञ--वैदिक यज्ञ के; पते:--नियामक का; प्रभो:--'परम स्वामी; ब्राह्मणा:--ब्राह्मणजन; प्रभव: --स्वामी; दैवम्‌-- अर्चाविग्रह; न--नहीं; तेभ्य:--उनकी अपेक्षा; विद्यते--विद्यमान है; परम--महान।

भगवान्‌ हरि समस्त ईश्वरों के ईश्वर, समस्त यज्ञों के स्वामी तथा सृष्टि के परम शासक हैं।

लेकिन वे सन्त ब्राह्मणों को अपना स्वामी मानते हैं, अतः उनसे बढ़कर कोई अन्य देव नहीं रहजाता।

एवं स विप्रो भगवत्सुहृत्तदाइृष्टा स्वभृत्यैरजितं पराजितम्‌ ।

तद्धयानवेगोदग्रथितात्मबन्धन-स्तद्धाम लेभेडचिरतः सतां गतिम्‌ ॥

४०॥

एवम्‌--इस प्रकार; सः--वह; विप्र:--ब्राह्मण; भगवत्‌-- भगवान्‌ का; सुहृत्‌--मित्र; तदा--तब; हृध्ला--देखकर; स्व--निजी;भृत्यैः --दासों द्वारा; अजितम्‌ू--अजेय; पराजितम्‌ू--पराजित, हारा हुआ; तत्‌--उस पर; ध्यान--उसके ध्यान का; वेग--जोरया प्रवाह से; उद्ग्रधित--जुड़ा; आत्म--आत्मा को; बन्धन: --बन्धन; तत्‌--उसका; धाम--निवासस्थान; लेभे--प्राप्त किया;अचिरत:--अल्प समय में; सताम्‌--साधुओं की; गतिम्‌ू--गन्तव्य, लक्ष्य |

इस तरह यह देखते हुए कि अजेय भगवान्‌ किस प्रकार से अपने दासों द्वारा जीत लिये जातेहैं, भगवान्‌ के प्रिय ब्राह्मण मित्र को अनुभव हुआ कि उसके हृदय में भौतिक आसक्ति की जोग्रंथियाँ शेष रह गई थीं, वे भगवान्‌ के निरन्तर ध्यान के बल पर कट गई हैं।

उसने अल्प काल मेंभगवान्‌ कृष्ण का परम धाम प्राप्त किया, जो महान्‌ सन्‍्तों का गन्तव्य है।

एतद्डह्मण्यदेवस्य श्रुत्वा ब्रह्मण्यतां नर: ।

लब्धभावो भगवति कर्मबन्धाद्विमुच्यते ॥

४१॥

एतत्‌--यह; ब्रह्मण्य-देवस्थ--ब्राह्मणों के पक्षपाती भगवान्‌ का; श्रुत्वा--सुन कर; ब्रह्मण्यताम्‌--ब्राह्मणों के प्रति दयाभावको; नरः--मनुष्य; लब्ध--प्राप्त करते हुए; भाव: --प्रेम; भगवति-- भगवान्‌ के प्रति; कर्म--भौतिक कार्य के; बन्धात्‌ू--बन्धन से; विमुच्यते--छूट जाता है।

भगवान्‌ सदैव ही ब्राह्मणों के प्रति विशेष कृपा दर्शाते हैं।

जो भी ब्राह्मणों के प्रति भगवान्‌की दया के इस विवरण को सुनेगा, उसमें भगवत्प्रेम उत्पन्न होगा और इस तरह वह भौतिक कर्मके बन्धन से छूट जायेगा।

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