← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची
अध्याय आठ: भगवान कृष्ण अपने मुख के भीतर सार्वभौमिक रूप दिखाते हैं
10.8श्रीशुक उबाचगर्ग: पुरोहितो राजन्यदूनां सुमहातपा: ।
ब्रजं जगाम नन्दस्यवसुदेवप्रचोदित: ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; गर्ग: --गर्गमुनि; पुरोहित:--पुरोहित; राजन्--हे राजा परीक्षित; यदूनाम्--यदुकुल के; सु-महा-तपा:--तपस्या में बढ़े चढ़े; ब्रजम्--त्रजभूमि में; जगाम--गये; नन्दस्य--नन्द महाराज के; वसुदेव-प्रचोदित:--वसुदेव की प्रेरणा से ॥
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे महाराज परीक्षित, तब यदुकुल के पुरोहित एवं तपस्या में बढ़ेचढ़े गर्गमुनि को वसुदेव ने प्रेरित किया कि वे नन््द महाराज के घर जाकर उन्हें मिलें।
त॑ इृष्ठटा परमप्रीतः प्रत्युत्थाय कृताझललि: ।
आनर्चाधोक्षजधिया प्रणिपातपुरःसरम् ॥
२॥
तम्--उन््हें ( गर्गमुनि को ); इृष्ठा--देखकर; परम-प्रीतः--ननन््द महाराज अत्यन्त प्रसन्न हुए; प्रत्युत्थाय--स्वागत करने के लिएखड़े होकर; कृत-अज्जलि: --हाथ जोड़े हुए; आनर्च--पूजा की; अधोक्षज-धिया--यद्यपि गर्गमुनि इन्द्रियों द्वारा दृष्टिगोचर थेकिन्तु नन्द महाराज उनके प्रति अपार सम्मान रखते थे; प्रणिपात-पुरःसरम्--नन्द महाराज ने उनके सामने गिर कर नमस्कारकिया।
जब नन्द महाराज ने गर्गमुनि को अपने घर में उपस्थित देखा तो वे इतने प्रसन्न हुए कि उनके स्वागत में दोनों हाथ जोड़े उठ खड़े हुए।
यद्यपि गर्गपुनि को नन््द महाराज अपनी आँखों से देखरहे थे किन्तु वे उन्हें अधोक्षज मान रहे थे अर्थात् वे भौतिक इन्द्रियों से दिखाई पड़ने वालेसामान्य पुरुष न थे।
सूपविष्ट कृतातिथ्यं गिरा सूनृतया मुनिम् ।
नन्दयित्वाब्रवीढ्रह्मन्पूर्णण्य करवाम किम् ॥
३॥
सु-उपविष्टमू--जब गर्गमुनि ठीक से बैठ गये; कृत-आतिथ्यम्--तथा अतिथि के रूप में उनका स्वागत हो जाने पर; गिरा--शब्दों से; सून्त॒या--अत्यन्त मधुर; मुनिम्ू--गर्गमुनि को; नन्दयित्वा--इस तरह प्रसन्न करके; अब्रवीतू--कहा; ब्रह्मनू--हेब्राह्मण; पूर्णस्य--सभी प्रकार से पूर्ण; करवाम किम्--मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ ( कृपया आज्ञा दें )
जब अतिथि रूप में गर्गमुनि का स्वागत हो चुका और वे ठीक से आसन ग्रहण कर चुके तोनन्द महाराज ने भद्र तथा विनीत शब्दों में निवेदन किया: महोदय, भक्त होने के कारण आपसभी प्रकार से परिपूर्ण हैं।
फिर भी आपकी सेवा करना मेरा कर्तव्य है।
कृपा करके आज्ञा दें किमैं आपके लिए क्या करूँ ?
महद्विचलनं नृणां गृहिणां दीनचेतसाम् ।
नि: श्रेयसाय भगवन्कल्पते नान्यथा क्वचित् ॥
४॥
महत्-विचलनम्--महापुरुषों की गति; नृणाम्--सामान्य पुरुषों के घरों में; गृहिणाम्--विशेषतया गृहस्थों की; दीन-चेतसाम्ू--जो परिवार के भरण में लगे रहने के कारण सरल चित्त हैं; नि: श्रेयसाय--महापुरुष को गृहस्थ के घर जाने काकारण केवल उसे लाभ पहुँचाना है; भगवन्--हे शक्तिशाली भक्त; कल्पते--इस तरह समझना चाहिए; न अन्यथा--औरकिसी प्रयोजन के लिए नहीं; क्वचित्--किसी भी समय ।
हे महानुभाव, हे महान् भक्त, आप जैसे पुरुष अपने स्वार्थ के लिए नहीं अपितु दीनचित्तगृहस्थों के लिए ही स्थान-स्थान पर जाते रहते हैं।
अन्यथा इस तरह जगह-जगह घूमने में उन्हेंकोई रुचि नहीं रहती।
ज्योतिषामयन साक्षाद्यत्तज्ज्ञानमतीन्द्रियम् ।
प्रणीतं भवता येन पुमान्वेद परावरम् ॥
५॥
ज्योतिषाम्ू--ज्योतिष ज्ञान ( मानव समाज में संस्कृति के अन्य पक्षों के साथ साथ ज्योतिष ज्ञान भी आवश्यक है ); अयनम्--नक्षत्रों तथा ग्रहों की गतियाँ; साक्षात्-प्रत्यक्ष; यत् तत् ज्ञाममू--ऐसा ज्ञान; अति-इन्द्रियम्--सामान्य व्यक्ति की दृष्टि से परे;प्रणीतम् भवता--आपके द्वारा रचित ज्ञान का सम्यक ग्रंथ; येन--जिससे; पुमान्ू--कोई भी व्यक्ति; वेद--समझ सकता है;पर-अवरम्--अपने भाग्य का कारण तथा कार्य |
हे सन्त पुरुष, आपने ज्योतिष ज्ञान को संकलित किया है, जिससे कोई भी मनुष्य अदृश्यभूत और वर्तमान बातों को समझ सकता है।
इस ज्ञान के बल पर कोई भी मनुष्य यह समझसकता है कि पिछले जीवन में उसने क्या किया और वर्तमान जीवन पर उसका कैसा प्रभावपड़ेगा।
आप इसे जानते हैं।
त्वं हि ब्रह्मविदां श्रेष्ठ: संस्कारान्कर्तुमहसि ।
बालयोरनयोरनुणां जन्मना ब्राह्मणो गुरु: ॥
६॥
त्वमू--आप; हि--निस्सन्देह; ब्रह्म-विदाम्--ब्रह्म को जानने वाले समस्त ब्राह्मणों में; श्रेष्ठ: -- श्रेष्ठ; संस्कारान्--शुद्द्धि के लिएकिये गये उत्सव ( इन संस्कारों से मनुष्य को दूसरा जन्म मिलता है, संस्कारादभवेद् द्विज: ); कर्तुम् अहँसि--आप कृपा करकेपथधारे हैं, तो सम्पन्न करें; बालयो:--इन दोनों पुत्रों ( कृष्ण तथा बलराम ) का; अनयो:--इन दोनों का; नृणाम्--न केवलउनका अपितु सारे मानव समाज का; जन्मना--जन्म ग्रहण करते ही; ब्राह्मण: --तुरन्त ब्राह्मण बन जाता है; गुरु: --मार्गदर्शक ।
हे प्रभु, आप ब्राह्मणों में श्रेष्ठ हैं विशेषतया, क्योंकि आप ज्योतिष शास्त्र से भलीभाँतिअवगत हैं।
अतएव आप सहज ही हर व्यक्ति के आध्यात्मिक गुरु हैं।
ऐसा होते हुए चूँकि आपकृपा करके मेरे घर आये हैं अतएव आप मेरे दोनों पुत्रों का संस्कार सम्पन्न करें।
श्रीगर्ग उबाचयदूनामहमाचार्य: ख्यातश्न भुवि सर्वदा ।
सुतं मया संस्कृतं ते मन्यते देवकीसुतम् ॥
७॥
श्री-गर्ग: उबाच--गर्गमुनि ने कहा; यदूनामू--यदुकुल का; अहम्--मैं हूँ; आचार्य:--पुरोहित; ख्यात: च--पहले से यह ज्ञातहै; भुवि--सर्वत्र; सर्वदा--सदैव; सुतम्--पुत्र को; मया--मेरे द्वारा; संस्कृतम्--संस्कार सम्पन्न; ते--तुम्हारे; मन्यते--मानाजायेगा; देवकी-सुतम्--देवकी-पुत्र
गर्गमुनि ने कहा : हे नन्द महाराज, मैं यदुकुल का पुरोहित हूँ।
यह सर्वविदित है।
अतः यदिमैं आपके पुत्रों का संस्कार सम्पन्न कराता हूँ तो कंस समझेगा कि वे देवकी के पुत्र हैं।
कंसः पापमतिः सख्यं तव चानकदुन्दुभे: ।
देवक्या अष्टमो गर्भो न स्त्री भवितुमहति ॥
८॥
इति सद्धिन्तयज्छत्वा देवक्या दारिकावच: ।
अपि हन्ता गताशड्ूडस्तहिं तन्नोउनयो भवेत् ॥
९॥
कंसः--राजा कंस; पाप-मतिः--दूषित मन वाला, अत्यन्त पापी; सख्यम्--मित्रता; तब--तुम्हारी; च-- भी; आनक-दुन्दु भेः --वसुदेव की; देवक्या: --देवकी का; अष्टम: गर्भ:--आठवाँ गर्भ; न--नहीं; स्त्री--औरत; भवितुम् अहंति--होना सम्भव है;इति--इस तरह; सश्धिन्तयन्--विचार करते हुए; श्रुत्वा--( यह समाचार ) सुनकर; देवक्या: --देवकी की; दारिका-बच: --पुत्री की वाणी; अपि--यद्यपि थी; हन्ता गत-आशड्भुः--हो सकता है कंस इस बालक को मार डालने का प्रयतल करे; तहि--इसलिए; तत्--वह घटना; न:--हमारे लिए; अनय: भवेत्--बहुत अच्छा न हो
कंस बहुत बड़ा कूटनीतिज्ञ होने के साथ ही अत्यन्त पापी है।
अतः देवकी की पुत्रीयोगमाया से यह सुनने के बाद कि उसके मारने वाला बालक अन्यत्र कहीं जन्म ले चुका है औरयह सुन चुकने पर कि देवकी के आठवें गर्भ से पुत्री उत्पन्न नहीं हो सकती और यह जानते हुएकि वसुदेव से आपकी मित्रता है जब कंस यह सुनेगा कि यदुकुल के पुरोहित मेरे द्वारा संस्कारकराया गया है, तो इन सब बातों से उसे निश्चित रूप से सन्देह हो जायेगा कि कृष्ण देवकी तथावसुदेव का पुत्र है।
तब वह कृष्ण को मार डालने के उपाय करेगा और यह महान् विपत्ति सिद्धहोगी।
श्रीनन्द उवाचअलक्षितोस्मिन्रहसि मामकैरपि गोब्रजे ।
कुरु द्विजातिसंस्कारं स्वस्तिवाचनपूर्वकम् ॥
१०॥
श्री-नन्दः उवाच--नन्द महाराज ने ( गर्गमुनि से ) कहा; अलक्षित:--कंस के जाने बिना; अस्मिन्ू--इस; रहसि--एकान्त स्थानमें; मामकै:--यहाँ तक कि मेरे सम्बन्धियों द्वारा; अपि--इससे भी एकान्त स्थान; गो-ब्रजे--गोशाला में; कुरुू--सम्पन्नकीजिये; द्विजाति-संस्कारम्--ट्विज बनने का संस्कार ( संस्काराद् भवेद् द्विजः ); स्वस्ति-वाचन-पूर्वकम्--संस्कार कराने केलिए वैदिक स्तोत्र के उच्चारण द्वारा
नन्द महाराज ने कहा : हे महामुनि, यदि आप सोचते हैं कि आपके द्वारा संस्कार विधिसम्पन्न कराये जाने से कंस सशंकित होगा तो चुपके से वैदिक मंत्रोच्चार करें और मेरे घर कीइस गोशाला में ही यह द्विज संस्कार पूरा करें जिससे और तो और मेरे सम्बन्धी तक न जान पायेंक्योंकि यह संस्कार अत्यावश्यक है।
श्रीशुक उबाचएवं सम्प्रार्थितो विप्र: स्वचिकीर्षितमेव तत् ।
चकार नामकरण गूढो रहसि बालयो: ॥
११॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस प्रकार; सम्प्रार्थित:--प्रार्थना किये जाने पर; विप्र:--ब्राह्मण,गर्गमुनि, ने; स्व-चिकीर्षितम् एव--जिसे वे पहले से करना चाह रहे थे और जिसके लिए वहाँ गये थे; तत्ू--वह; चकार--सम्पन्न किया; नाम-करणम्--नामकरण उत्सव; गूढ: --गुप्त रूप से; रहसि--एकान्त में; बालयो:--दोनों बालकों ( कृष्ण तथाबलराम ) का
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : जब नन्द महाराज ने गर्गमुनि से विशेष प्रार्थना की कि वेजो कुछ पहले से करना चाहते थे उसे करें, तो उन्होंने एकान्त स्थान में कृष्ण तथा बलराम कानामकरण संस्कार सम्पन्न किया।
श्रीगर्ग उबाचअयं हि रोहिणीपुत्रो रमयन्सुहृददो गुणैः ।
आख्वास्यते राम इति बलाधिक्याद्लं विदु: ।
यदूनामपृथग्भावात्सड्डर्षणमुशन्त्यपि ॥
१२॥
श्री-गर्ग: उवाच-गर्गमुनि ने कहा; अयम्ू--यह; हि--निस्सन्देह; रोहिणी-पुत्र:--रोहिणी का पुत्र; रमयन्--प्रसन्न करते हुए;सुहृद:ः--अपने सारे मित्रों तथा सम्बन्धियों को; गुणैः--दिव्य गुणों से; आख्यास्यते--कहलायेगा; राम:--परम भोक्ता, राम नामसे; इति--इस तरह; बल-आधिक्यात्-- असाधारण बल होने से; बलम् विदु:--बलराम नाम से विख्यात होगा; यदूनाम्--यदुबंश का; अपूृथक्-भावात्--आपसे पृथक् न हो सकने के कारण; सह्डूर्षणम्--संकर्षण नाम से अथवा दो परिवारों कोजोड़ने वाला; उशन्ति--आकर्षित करता है; अपि-- भी |
गर्गमुनि ने कहा : यह रोहिणी-पुत्र अपने दिव्य गुणों से अपने सम्बन्धियों तथा मित्रों कोसभी तरह का सुख प्रदान करेगा।
अतः यह राम कहलायेगा।
और असाधारण शारीरिक बल काप्रदर्शन करने के कारण यह बलराम भी कहलायेगा।
चूँकि यह दो परिवारों--वसुदेव तथा नन््दमहाराज के परिवारों--को जोड़ने वाला है, अतः यह संकर्षण भी कहलायेगा।
आसन्वर्णास्त्रयो हास्य गृह्नतोनुयुगं तनू: ।
शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गत: ॥
१३॥
आसनू--थे; वर्णा: त्रय:ः--तीन रंग; हि--निस्सन्देह; अस्य--तुम्हारे पुत्र कृष्ण के; गृह्तः--स्वीकार करते हुए; अनुयुगम्तनू:--विभिन्न युगों के अनुसार दिव्य शरीर; शुक्ल:--कभी गौर ( श्वेत ); रक्त:--कभी लाल; तथा--और; पीत:--कभीपीला; इदानीम् कृष्णताम् गत:--सम्प्रति उन्होंने श्याम ( काला ) रंग धारण किया है।
आपका यह पुत्र कृष्ण हर युग में अवतार के रूप में प्रकट होता है।
भूतकाल में उसने तीनविभिन्न रंग--गौर, लाल तथा पीला--धारण किये और अब वह श्याम ( काले ) रंग में उत्पन्नहुआ है [अन्य द्वापर युग में वह शुक ( तोता ) के रंग में ( भगवान् रामचन्द्र के रूप में ) उत्पन्नहुआ।
अब ऐसे सारे अवतार कृष्ण में एकत्र हो गये हैं ।
प्रागयं वसुदेवस्य क्वचिज्जातस्तवात्मज: ।
वासुदेव इति श्रीमानभिज्ञा: सम्प्रचक्षते ॥
१४॥
प्राकु--पहले; अयम्--यह बालक; वसुदेवस्य--वसुदेव का; क्वचित्--कभी कभी; जात:--उत्पन्न हुआ था; तब--तुम्हारा;आत्मज:--पुत्र कृष्ण; वासुदेव: --अतएव उसका नाम वासुदेव रखा जा सकता है; इति--इस प्रकार; श्रीमान्ू-- अत्यन्त सुन्दर;अभिज्ञा:--विद्वान; सम्प्रचक्षते--कृष्ण को वासुदेव भी कहते हैं।
अनेक कारणों से आपका यह सुन्दर पुत्र पहले कभी वसुदेव के पुत्र रूप में प्रकट हुआ था।
अतएव जो विद्वान हैं, वे इस बालक को कभी कभी वासुदेव कहते हैं।
बहूनि सन्ति नामानि रूपाणि च सुतस्य ते ।
गुणकर्मानुरूपाणि तान्यहं वेद नो जना: ॥
१५॥
बहूनि--विविध; सन्ति-- हैं; नामानि--नाम; रूपाणि--रूप; च-- भी; सुतस्य--पुत्र के; ते--तुम्हारे; गुण-कर्म-अनु-रूपाणि--उसके गुणों तथा कर्मों के अनुसार; तानि--उनको; अहम्--मैं; वेद--जानता हूँ; नो जना:--सामान्य व्यक्ति नहीं |
तुम्हारे इस पुत्र के अपने दिव्य गुणों एवं कर्मों के अनुसार विविध रूप तथा नाम हैं।
ये सबमुझे ज्ञात हैं किन्तु सामान्य लोग उन्हें नहीं जानते।
एप वः श्रेय आधास्यद्गोपगोकुलनन्दनः ।
अनेन सर्वदुर्गाणि यूयमञ्जस्तरिष्यथ ॥
१६॥
एष:--यह बालक; व:--तुम सबों के लिए; श्रेयः--अत्यन्त शुभ; आधास्यत्--शुभ कार्य करेगा; गोप-गोकुल-नन्दन:--जैसेएक ग्वालबाल ग्वालों के परिवार में गोकुल के पुत्र रूप में पैदा हुआ हो; अनेन--इसके द्वारा; सर्व-दुर्गाणि--सभी प्रकार केकष्ट; यूयम्--तुम सभी; अज्ञ:--सरलता से; तरिष्यथ--पार कर लोगे, लाँघ लोगे।
यह बालक गोकुल के ग्वालों के दिव्य आनन्द को बढ़ाने हेतु तुम्हारे लिए सदैव शुभ कर्मकरेगा।
इसकी ही कृपा से तुम लोग सारी कठिनाइयों को पार कर सकोगे।
पुरानेन ब्रजपते साधवो दस्युपीडिता: ।
अराजके रक्ष्यमाणा जिग्युर्दस्यून्समेधिता: ॥
१७॥
पुरा--पूर्वकाल में; अनेन--इसके ( कृष्ण ) द्वारा; ब्रज-पते--हे ब्रजराज; साधव: --ईमानदार; दस्यु-पीडिता: --चोर-उचक्कोंद्वारा सताये हुए; अराजके--अनियमित सरकार होने पर; रक्ष्यमाणा: --सुरक्षित थे; जिग्यु:--जीत लिया; दस्यून्ू--चोर-उचक्कोंको; समेधिता: --उन्नति की |
हे नन्द महाराज, जैसा कि इतिहास बतलाता है जब अनियमित अशक्त शासन था और इन्द्रको अपदस्थ कर दिया गया था और लोग चोरों द्वारा सताये जा रहे थे उस समय लोगों की रक्षाकरने तथा उनकी समृद्धि के लिए यह बालक प्रकट हुआ और इसने चोर-उचक्ों का दमन करदिया।
य एतस्मिन्महाभागा: प्रीतिं कुर्वन्ति मानवा: ।
नारयोभिभवन्त्येतान्विष्णुपक्षानिवासुरा: ॥
१८॥
ये--जो लोग; एतस्मिनू--इस बालक से; महा-भागा:--अत्यन्त भाग्यशाली; प्रीतिम्ू--स्नेह; कुर्वन्ति--करते हैं; मानवा:--ऐसे व्यक्ति; न--नहीं; अरयः--शत्रुगण; अभिभवन्ति--जीत पाते हैं; एतान्--कृष्ण के प्रति अनुरक्त लोगों को; विष्णु-पक्षानू--विष्णु के पक्ष वाले देवताओं को; इब--सहृश; असुरा:--असुरगण |
देवताओं के पक्ष में सदैव भगवान् विष्णु के रहने से असुरगण देवताओं को हानि नहींपहुँचा सकते।
इसी तरह कोई भी व्यक्ति या समुदाय जो कृष्ण के प्रति अनुरक्त है अत्यन्तभाग्यशाली है।
चूँकि ऐसे लोग कृष्ण से अत्यधिक स्नेह रखते हैं अतएव वे कंस के संगियों यथाअसुरों ( या आन्तरिक शत्रु तथा इन्द्रियों ) द्वारा कभी परास्त नहीं किये जा सकते।
तस्मान्नन्दात्मजोयं ते नारायणसमो गुणैः ।
श्रिया कीर्त्यानुभावेन गोपायस्व समाहित: ॥
१९॥
तस्मात्--इसलिए; नन्द--हे नन््द महाराज; आत्मज:--आपका पुत्र; अयम्--यह; ते--तुम्हारा; नारायण-सम:--नारायण केसहश ( जो दिव्य गुण वाला है ); गुणैः--गुणों से; भ्रिया--ऐश्वर्य से; कीर्त्या--अपने नाम और यश से; अनुभावेन--तथा अपनेप्रभाव से; गोपायस्व--इस बालक का पालन करो; समाहित:--अत्यन्त ध्यानपूर्वक तथा सावधानी से।
अतएव हे नन्द महाराज, निष्कर्ष यह है कि आपका यह पुत्र नारायण के सहृश है।
यह अपनेदिव्य गुण, ऐश्वर्य, नाम, यश तथा प्रभाव से नारायण के ही समान है।
आप इस बालक का बड़ेध्यान से और सावधानी से पालन करें।
श्रीशुक उबाचइत्यात्मानं समादिश्य गर्गे च स्वगृहं गते ।
नन््दः प्रमुदितो मेने आत्मानं पूर्णमाशिषाम् ॥
२०॥
श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; आत्मानम्--परम सत्य परमात्मा को; समादिश्य--पूर्णतयाआदेश देकर; गर्गे--जब गर्गमुनि; च-- भी; स्व-गृहम्--अपने घर; गते--चले गये; नन्द:--नन््द महाराज ने; प्रमुदितः--अत्यन्त प्रसन्न; मेने--विचार किया; आत्मानमू--अपने आपको; पूर्णम् आशिषाम्--परम भाग्यशाली
श्रील शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : जब नन्द महाराज को कृष्ण के विषय में उपदेशदेकर गर्गमुनि अपने घर चले गये तो नन्द महाराज अत्यधिक प्रसन्न हुए और अपने को परमभाग्यशाली समझने लगे।
कालेन ब्रजताल्पेन गोकुले रामकेशवौ ।
जानुभ्यां सह पाणिभ्यां रिड्रमाणौ विजहतु: ॥
२१॥
कालेन--समय के; ब्रजता--बीतने पर; अल्पेन--अल्प अवधि; गोकुले--गोकुल या ब्रजधाम में; राम-केशवौ--बलराम तथाकृष्ण ने; जानुभ्याम्-घुटनों के बल; सह पाणिभ्याम्-हाथों के सहारे; रिड्रमाणौ--रेंगते हुए; विजह॒तु:--खिलवाड़ किया ।
कुछ समय बीतने के बाद राम तथा कृष्ण दोनों भाई अपने घुटनों तथा हाथों के बल ब्रज केआँगन में रेंगने लगे और इस तरह बालपन के खेल का आनंद उठाने लगे।
तावड्प्रियुग्ममनुकृष्य सरीसूपन्तौघोषप्रघोषरूचिरं व्रजकर्दमेषु ।
तन्नादहृष्टमनसावनुसूत्य लोक॑मुग्धप्रभीतवदुषेयतुरन्ति मात्रो: ॥
२२॥
तौ--कृष्ण तथा बलराम दोनों; अद्धूघ्रि-युग्मम् अनुकृष्य--अपने दोनों पाँवों को घसीटते हुए; सरीसूपन्तौ--सरी सूपों की तरहरेंगते; घोष-प्रधोष-रुचिरम्-- अपने घुंघरओं से आवाज करते जो अत्यन्त मधुर थी; ब्रज-कर्दमेषु--त्रजभूमि की धरती पर गोबरतथा गोमूत्र से उत्पन्न कीचड़ में; तत्ू-नाद--उन घुंघरूओं की आवाज से; हृष्ट-मनसौ--अत्यन्त प्रसन्न होकर; अनुसूृत्य--पीछेपीछे चलते हुए; लोकम्--अन्य लोगों को; मुग्ध--मोहित होकर; प्रभीत-वत्--उनसे बारम्बार डरते हुए; उपेयतु:--तुरन्त लौटआये; अन्ति मात्रो:--अपनी माताओं की ओर।
जब कृष्ण तथा बलराम अपने पैरों के बल ब्रजभूमि में गोबर तथा गोमूत्र से उत्पन्न कीचड़वाली जगहों में रेंगते थे तो उनका रेंगना सरी सूपों के रेंगने जैसा लगता था और उनके पैरों के घुंघरुओं की आवाज अत्यन्त मनोहर लगती थी।
वे अन्य लोगों के घुंघरओं की आवाज सेअत्यधिक प्रसन्न होकर उनके पीछे पीछे चल देते मानो अपनी माताओं के पास जा रहे हों।
किन्तुजब वे यह देखते कि वे दूसरे लोग हैं, तो भयभीत होकर अपनी असली माताओं, यशोदा तथारोहिणी, के पास लौट आते।
तन्मातरौ निजसुतौ घृणया स्नुवन्त्यौपड्डाड्रागरुचिरावुपगृह्म दोर्भ्याम् ।
दत्त्वा स्तनं प्रपिबतो: सम मुखं निरीक्ष्यमुग्धस्मिताल्पदशनं ययतु: प्रमोदम् ॥
२३॥
तत्-मातरौ--उनकी माताएँ ( रोहिणी तथा यशोदा ); निज-सुतौ--अपने अपने पुत्रों को; घृणया-- अत्यन्त प्रेमपूर्वक;स्नुवन्त्यौ -- अपने स्तनों का दूध पिलातीं; पड्ढ-अड्गभ-राग-रुचिरौ--जिनके दिव्य शरीर गोबर तथा गोमूत्र के कीचड़ से सने हुएथे; उपगृह्म--रखवाली करते हुए; दोर्भ्याम्ू--अपनी भुजाओं से; दत्त्वा--देकर; स्तनम्--स्तन; प्रपिबतो:--दूध पीते हुए;स्म--निस्सन्देह; मुखम्-- मुँह को; निरीक्ष्य--देखकर; मुग्ध-स्मित-अल्प-दशनम्--मुखों से बाहर निकली दुतुलियों से हँसते;ययतु:--प्राप्त किया; प्रमोदम्--दिव्य आनन्द |
दोनों बालक गोबर तथा गोमूत्र मिले कीचड़ से सने हुए अत्यन्त सुन्दर लग रहे थे और जबवे दोनों अपनी माताओं के पास गये तो यशोदा तथा रोहिणी दोनों ने बड़े प्यार से उन्हें उठालिया, छाती से लगाया और अपने स्तनों से बहता दूध पिलाया।
स्तन-पान करते हुए दोनोंबालक मुसका रहे थे और उनकी दुतुलियाँ दिख रही थीं।
उनके सुन्दर छोटे-छोटे दाँत देखकरउनकी माताओं को परम आनन्द हुआ।
यहाड्रनादर्शनीयकुमारलीला-उन्तर्त्रजे तदबला: प्रगृहीतपुच्छै: ।
वत्सैरितस्तत उभावनुकृष्यमाणौप्रेश्नन्त्य उज्झितगृहा जहृषुहसन्त्य: ॥
२४॥
यहि--जब; अड्डना-दर्शनीय--घर के भीतर की स्त्रियों के द्वारा ही दहश्य; कुमार-लीलौ--कृष्ण तथा बलराम द्वारा प्रदर्शितबाल-लीलाएँ; अन्तः-ब्रजे--ब्रज के भीतर, नन्द के घर में; तत्--उस समय; अबला:--सारी स्त्रियाँ; प्रगृहीत-पुच्छै:--कृष्णतथा बलराम द्वारा गौवों की पूँछ पकड़ने पर; वत्सैः:--बछड़ों द्वारा; इतः ततः--यहाँ वहाँ; उभौ--कृष्ण तथा बलराम दोनों;अनुकृष्यमाणौ--खींच जाने पर; प्रेक्षन्त्य:--ऐसी दृश्य देखती हुई; उज्झित--छोड़ा हुआ; गृहा:--घर के कामकाज; जहृषु: --अत्यन्त हर्षित हुईं; हसन्त्यः--हँसती हुई ॥
ग्वालबालाएँ नन््द महाराज के घर के भीतर राम तथा कृष्ण दोनों बालकों की लीलाएँदेखकर हर्षित होतीं।
बच्चे बछड़ों की पूछों के पिछले भाग पकड़ लेते तो बछड़े उन्हें इधर-उधरघसीटते।
जब स्त्रियाँ ये लीलाएँ देखतीं, तो निश्चय ही अपना कामकाज करना बन्द कर देतींऔर हँसने लगतीं तथा इन घटनाओं का आनन्द लूटतीं।
श्रृड़ुग्यग्निदंष्टरयसिजलद्विजकण्टके भ्य:क्रीडापरावतिचलौ स्वसुतौ निषेद्धुम् ।
गृह्माणि कर्तुमपि यत्र न तज्जनन्यौशेकात आपतुरलं मनसोनवस्थाम् ॥
२५॥
श्रुद्धी--गाय; अग्नि--आग; दंष्टी--बन्दर तथा कुत्ते; असि--तलवार; जल--पानी; द्विज--पक्षी; कण्टके भ्य:--तथा काँटोंके साथ; क्रीडा-परौ अति-चलौ--दोनों बच्चे खेल में व्यस्त तथा अतीव चंचल; स्व-सुतौ--अपने दोनों पुत्रों को; निषेद्धुम्--रोकने के लिए; गृह्माणि--घर के कामकाज; कर्तुम् अपि--करके; यत्र--जब; न--नहीं; तत्-जनन्यौ--उनकी माताएँ(रोहिणी तथा यशोदा ); शेकाते--समर्थ; आपतु:--प्राप्त किया; अलम्--निस्सन्देह; मनस:--मन का; अनवस्थाम्--सन्तुलन।
जब माता यशोदा तथा रोहिणी बच्चों को सींग वाली गायों से, आग से, पंजे तथा दाँत वालेपशुओं यथा बन्दरों, कुत्तों तथा बिल्लियों से एवं काँटों से, जमीन पर रखी तलवारों तथा अन्यहथियारों से होने वाली दुर्घटनाओं से रक्षा करने में अपने को असमर्थ पातीं तो वे सदा चिन्ताग्रस्तहो जातीं जिससे उनके घरेलू कामकाज में बाधा पहुँचती।
उस समय वे भौतिक स्नेह के कष्टनामक दिव्य भाव से सनन््तुलन प्राप्त करतीं क्योंकि यह उनके मनों के भीतर से उठता था।
कालेनाल्पेन राजर्षे राम: कृष्णश्च गोकुले ।
अधृष्टजानुभि: पद्धिर्विचक्रमतुरकझ्सला ॥
२६॥
कालेन अल्पेन-- थोड़े समय में ही; राजर्षे--हे राजा ( महाराज परीक्षित ); राम: कृष्ण: च--राम तथा कृष्ण दोनों; गोकुले--गोकुल गाँव में; अधघृष्ट-जानुभि:ः--घुटने के बल रेंगे बिना ही; पद्धिः--अपने पाँवों के बल; विचक्रमतु:--चलने लगे;अज्जसा--आसानी से।
हे राजा परीक्षित, थोड़े समय में ही राम तथा कृष्ण दोनों अपने पाँवों के बल, रेंगे बिना हीअपने आप गोकुल में सरलता से चलने-फिरने लगे।
ततस्तु भगवान्कृष्णो वयस्यैरत्रेजबालकै: ।
सहरामो ब्रजस्त्रीणां चिक्रीडे जनयन्मुदम् ॥
२७॥
ततः--तत्पश्चात्; तु--लेकिन; भगवान्-- भगवान्; कृष्ण:--कृष्ण; वयस्यै:--अपने साथियों के साथ; ब्रज-बालकै:--ब्रज केछोटे-छोटे बालकों के साथ; सह-राम:--बलराम के साथ; ब्रज-स्त्रीणाम्--व्रज की सारी स्त्रियों के; चिक्रीडे--प्रसन्नतापूर्वकखेलने लगे; जनयन्--उत्पन्न करते हुए; मुदम्--दिव्य आनन्द
तत्पश्चात् भगवान् कृष्ण, बलराम सहित, ग्वालों के अन्य बच्चों के साथ खेलने लगे औरइस तरह ग्वालों की स्त्रियों में दिव्य आनन्द उत्पन्न करने लगे।
कृष्णस्य गोप्यो रुचिरं वीक्ष्य कौमारचापलम् ।
श्रृण्वन्त्या: किल तन्मातुरिति होचु: समागता: ॥
२८॥
कृष्णस्य--कृष्ण का; गोप्य: --सारी गोपियों ने; रुचिर्मू--अत्यन्त आकर्षक; वीक्ष्य--देखकर; कौमार-चापलमू--बाल-लीलाओं की चपलता; श्रृण्वन्त्या:--बारम्बार सुनने के लिए; किल--निस्सन्देह; तत्-मातु:ः--माता की उपस्थिति में; इति--इसप्रकार; ह--निस्सन्देह; ऊचु:;--कहा; समागता:--एकत्र हुईं
कृष्ण की अति आकर्षक बाल-सुलभ चञ्जलता को देखकर पड़ोस की सारी गोपियाँ कृष्णकी क्रीड़ाओं के विषय में बारम्बार सुनने के लिए माता यशोदा के पास पहुँचतीं और उनसे इसप्रकार कहतीं।
वत्सान्मुञ्नन्क्बचिदसमये क्रोशसझ्जातहास:स्तेयं स्वाद्वत््व्थ दधिपय: कल्पितैः स्तेययोगै: ।
मर्कान्भोक्ष्यन्विभजति स चेन्नात्ति भाण्डं भिन्नत्तिद्रव्यालाभे सगृहकुपितो यात्युपक्रोश्य तोकान् ॥
२९॥
वत्सान्ू--बछड़ों को; मुझ्ननू--खाले देने; क्वचित्--क भी; असमये --विषम अवसरों पर; क्रोश-सझ्जात-हास:--इसके बादजब घर का मुखिया अप्रसन्न होता तो कृष्ण हँसने लगता है; स्तेयम्--चोरी करने से प्राप्त; स्वादु--स्वादिष्ट; अत्ति--खाता है;अथ--इस प्रकार; दधि-पयः--दही तथा दूध के बर्तन ( मटकी ); कल्पितैः--ढूँढ़ निकाली गई; स्तेय-योगैः--चोरी करने कीविधि के द्वारा; मर्कानू--बन्दरों को; भोक्ष्यनू--खिलाते हुए; विभजति--बाँट-बाँट कर देता है; सः--वह बन्दर; चेत्--यदि;न--नहीं; अत्ति--खाता है; भाण्डम्--बर्तन; भिन्नत्ति--तोड़ डालता है; द्रव्य-अलाभे--खाने को कुछ न मिलने पर; स-गृह-हस्ताग्राह् रचयति विधिं पीठकोलूखलादै-शिछद्रं हान्तर्निहितवयुनः शिक्यभाण्डेषु तद्ठित् ।
ध्वान्तागारे धृतमणिगणं स्वाड्रमर्थप्रदीपंकाले गोपष्यो यहि गृहकृत्येषु सुव्यग्रचित्ता: ॥
३०॥
हस्त-अग्राह्े--हाथ न पहुँचने पर; रचयति--बनाता है; विधिमू--उपाय; पीठक--पीढ़ा, लकड़ी की चौकी; उलूखल-आद्यैः--तथा ओखली इत्यादि से; छिद्रमू--छेद; हि--निस्सन्देह; अन्तः-निहित--बर्तन के भीतर की वस्तुएँ; बयुन:--ऐसे ज्ञानसे; शिक्य--शिकहरा, छींका से टांग कर; भाण्डेषु--बर्तनों के भीतर; तत्-वित्--उस ज्ञान में दक्ष; ध्वान्त-आगारे-- अँधेरेकमरे में; धृत-मणि-गणम्--मूल्यवान मोतियों से सजाया होने के कारण; स्व-अड्भम्--अपने शरीर को; अर्थ-प्रदीपम्-- अँधेरेमें देखने के लिए आवश्यक प्रकाश में; काले--उसके बाद; गोप्य:--वृद्धा गोपियाँ; यहि--ज्योंही; गृह-कृत्येषु--घर केकामकाज करेने में; सु-व्यग्र-चित्ता:--बुरी तरह लगी रहने से |
’जब दूध तथा दही की मटकी को छत से लटकते छींके में ऊँचा रख दिया जाता है औरकृष्ण तथा बलराम उस छींके तक नहीं पहुँच पाते तो वे पीढ़ों को जुटाकर तथा मसाले पीसनेकी ओखली को उलट कर उस पर चढ़ कर उस तक पहुँच जाते हैं।
बर्तन के भीतर कया है, वेअच्छी तरह जानते हैं अतः उसमें छेद कर देते हैं।
जब सयानी गोपिकाएँ कामकाज में लगी रहतीहैं, तो कभी कभी कृष्ण तथा बलराम अँधेरी कोठरी में चले जाते हैं और अपने शरीर में पहनेहुए मूल्यवान आभूषणों की मणियों की चमक से उस स्थान को प्रकाशित करके चोरी कर लेजाते हैं।
एवं धा्टर्यान्युशति कुरुते मेहनादीनि वास्तौस्तेयोपायर्विरचितकृतिः सुप्रतीको यथास्ते ।
इत्थं स्रीभिः सभयनयनश्रीमुखालोकिनीभि-व्याख्यातार्था प्रहसितमुखी न ह्युपालब्धुमैच्छत् ॥
३१॥
एवम्--इस प्रकार; धाष्टर्यानि--उपद्रव; उशति--स्वच्छ स्थान में; कुरते--क भी कभी करता है; मेहन-आदीनि--टट्टी पेशाबकरना; वास्तौ--घरों में; स्तेय-उपायैः --दूध तथा मक्खन चुराने की विविध युक्तियाँ ढूँढ़कर; विरचित-कृति:--अत्यन्त दक्ष है;सु-प्रतीक:--अब अच्छे, शिष्ट बालक की तरह बैठा हुआ है; यथा आस्ते--यहाँ रहते हुए; इत्थम्--ये बातें; स्त्रीभि:--गोपियोंके द्वारा; स-भय-नयन--अब डरी हुईं आँखों से बैठा; श्री-सुख--ऐसा सुन्दर चेहरा; आलोकिनीभि:--गोपियाँ देखने काआनन्द ले रही थीं; व्याख्यात-अर्था--माता यशोदा से उसकी शिकायत करते हुए; प्रहसित-मुखी--हँसती और आनन्द लूटतीं;न--नहीं; हि--निस्सन्देह; उपालब्धुम्--डराने-धमकाने के लिए; ऐच्छत्--उसकी इच्छा हुई, चाहा।
‘जब कृष्ण नटखटपन करते पकड़े जाते हैं, तो घर के मालिक उससे कहते, '‘ओरे चोर 'और उस पर बनावटी क्रोध प्रकट करते।
तब कृष्ण उत्तर देते, ‘मैं चोर नहीं हूँ।
चोर तुम हो।
'कभी कभी कृष्ण क्रोध में आकर हमारे साफ-सुथरे घरों में मल-मूत्र विसर्जन कर देता है।
किन्तुहे सखी यशोदा, अब वही दक्ष चोर तुम्हारे सामने अच्छे लड़के की तरह बैठा है।
' कभी कभीसभी गोपियाँ कृष्ण को भयातुर आँखों किए बैठे देखती थीं, ताकि माता डांटे फटकारे नहींऔर जब वे कृष्ण का सुन्दर मुखड़ा देखतीं तो उसे डाँटने की बजाय वे उनके मुखड़े को देखतीही रह जातीं और दिव्य आनन्द का अनुभव करतीं।
माता यशोदा इस खिलवाड़ पर मन्द-मन्दमुसकातीं और उनका मन अपने भाग्यशाली दिव्य बालक को डाँटने को करता ही नहीं था।
एकदा क्रीडमानास्ते रामाद्या गोपदारका: ।
कृष्णो मृदं भक्षितवानिति मात्रे न््यवेदयन् ॥
३२॥
एकदा--एक बार; क्रीडमाना:--बड़े होकर भी अपनी उम्र वाले अन्य बालकों के साथ खेलते; ते--वे; राम-आद्या:--बलरामतथा अन्य; गोप-दारकाः--ग्वालों के पड़ोस में पैदा हुए अन्य बालक; कृष्ण: मृदम् भक्षितवान्--हे माता! कृष्ण ने मिट्टी खाईहै; इति--इस प्रकार; मात्रे--माता यशोदा से; न््यवेदयन्--निवेदन किया।
एक दिन जब कृष्ण अपने छोटे साथियों के साथ बलराम तथा अन्य गोप-पुत्रों सहित खेलरहे थे तो उनके सारे साथियों ने एकत्र होकर माता यशोदा से शिकायत की कि ‘‘कृष्ण ने मिट्टीखाई है।
'सा गृहीत्वा करे कृष्णमुपालभ्य हितैषिणी ।
यशोदा भयसम्ध्रान्तप्रेक्षणाक्षमभाषत ॥
३३॥
सा--माता यशोदा; गृहीत्वा--पकड़ कर; करे--हाथ में; कृष्णम्--कृष्ण को; उपालभ्य--डाँटना चाहा; हित-एषिणी--कृष्णका कल्याण चाहने के कारण वे क्षुब्ध थीं कि इस कृष्ण ने मिट्टी कैसे खाई ?; यशोदा--माता यशोदा ने; भय-सम्भ्रान्त-प्रेक्षण-अक्षम्-कृष्ण के मुँह के भीतर सावधानी से देखने लगी, यह देखने के लिए कि कोई खतरनाक वस्तु तो नहीं भर ली;अभाषत--कृष्ण से कहा
कृष्ण के साथियों से यह सुनकर, हितैषिणी माता यशोदा ने कृष्ण के मुख के भीतर देखनेतथा डाँटने के लिए उन्हें अपने हाथों से ऊपर उठा लिया।
वे डरी डरी आँखों से अपने पुत्र से इसप्रकार बोलीं ।
कस्मान्मृदमदान्तात्मन्भवान्भक्षितवात्रह: ।
बदन्ति तावका होते कुमारास्तेग्रजोप्ययम् ॥
३४॥
कस्मात्-क्यों; मृदम्--मिट्टी; अदान्त-आत्मन्--अरे चंचल बालक; भवान्--तुमने; भक्षितवान्--खाई है; रहः--एकान्तस्थान में; वदन्ति--यह शिकायत कर रहे हैं; तावका:ः --तुम्हारे दोस्त; हि--निस्सन्देह; एते--वे सभी; कुमारा:--बालक; ते--तुम्हारे; अग्रज:ः--बड़ा भाई; अपि-- भी ( पुष्टि करता है ); अयम्ू--यह ।
हे कृष्ण, तुम इतने चंचल क्यों हो कि एकान्न्त स्थान में तुमने मिड्ठी खा ली? यह शिकायततुम्हारे बड़े भाई बलराम समेत तुम्हारे संगी-साथियों ने की है।
यह क्योंकर हुआ ?नाहं भक्षितवानम्ब सर्वे मिथ्याभिशंसिन: ।
यदि सत्यगिरस्तरहिं समक्ष पश्य मे मुखम् ॥
३५॥
न--नहीं; अहम्--मैंने; भक्षितवान्ू--मिट्टी खाई है; अम्ब--हे माता; सर्वे--वे सभी; मिथ्य-अभिशंसिन:--सभी झूठे हैं, केवलमेरी शिकायत करते हैं कि आप मुझे डाँटें; यदि--यदि यह यथार्थ है; सत्य-गिर:--कि उन्होंने सच बोला है; तह्हि--तो;समक्षम्-प्रत्यक्ष; पश्य--देखिये; मे--मेरा; मुखम्-- मुँह |
श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया, ‘'हे माता, मैंने मिट्टी कभी नहीं खाई।
मेरी शिकायत करने वाले मेरेसारे मित्र झूठे हैं।
यदि आप सोचती हैं कि वे सच बोल रहे हैं, तो आप मेरे मुँह के भीतर प्रत्यक्षदेख सकती हैं।
यद्येव॑ तरहिं व्यादेहीत्युक्त: स भगवान्हरि: ।
व्यादत्ताव्याहतैश्वर्य: क्रीडामनुजबालक:ः ॥
३६॥
यदि--यदि; एवम्--ऐसा है; तर्हि--तो; व्यादेहि--अपना मुख खोलो ( मैं देखना चाहती हूँ ); इति उक्त:--माता यशोदा द्वाराऐसा आदेश दिये जाने पर; सः--उस; भगवान्-- भगवान्; हरिः--पर मे श्वर ने; व्यादत्त-- अपना मुँह खोल दिया; अव्याहत-ऐश्वर्य:--ऐश्वर्य भक्ति में बिना किसी कमी के ( ऐश्वर्यस्य समग्रस्य ); क्रीडा--लीला या खिलवाड़; मनुज-बालक: --मनुष्य केलड़के की तरह।
माता यशोदा ने कृष्ण को धमकाया : ‘यदि तुमने मिट्टी नहीं खाई है, तो अपना मुँह पूरीतरह खोलो।
इस पर नन्द तथा यशोदा के पुत्र कृष्ण ने मानवी बालक की तरह लीला करने केलिए अपना मुँह खोला।
यद्यपि समस्त ऐश्वर्यों के स्वामी भगवान् कृष्ण ने अपनी माता केवात्सल्य-प्रेम को ठेस नहीं लगाई, फिर भी उनका ऐश्वर्य स्वतः प्रदर्शित हो गया क्योंकि कृष्णका ऐश्वर्य किसी भी स्थिति में विनष्ट नहीं होता अपितु उच्चित समय पर प्रकट होता है।
सा तत्र ददशे विश्व जगत्सथास्नु च खं दिशः ।
सादिद्वीपाब्धिभूगोलं सवाय्वग्नीन्दुतारकम् ॥
३७॥
ज्योतिश्चक्रं जलं तेजो नभस्वान्वियदेव च ।
वैकारिकाणीन्द्रियाणि मनो मात्रा गुणास्त्रय: ॥
३८॥
एतद्विचित्रं सहजीवकाल-स्वभावकर्माशयलिड्डभेदम् ।
सूनोस्तनौ वीक्ष्य विदारितास्येब्र॒ज॑ सहात्मानमवाप शट्डाम् ॥
३९॥
सा--माता यशोदा ने; तत्र--कृष्ण के खुले मुख के भीतर; दहशे--देखा; विश्वम्--सारे ब्रह्मण्ड को; जगत्--चर-प्राणी;स्थास्नु--अचर, जड़ प्राणी; च--तथा; खम्--आकाश; दिश:--दिशाएँ; स-अद्वि--पर्वतों सहित; द्वीप--द्वीप; अब्धि--समुद्र; भू-गोलम्--पृथ्वी की सतह; स-वायु--बहती हवा के समेत; अग्नि--आग; इन्दु--चन्द्रमा; तारकम्--तारे; ज्योति:-चक्रम्-ग्रह नक्षत्र; जलम्ू--जल; तेज:-- प्रकाश; नभस्वान्--अन्तरिक्ष; वियत्-- आकाश; एब-- भी; च--तथा;वैकारिकाणि--अहंकार के रूपांतर से बनी सृष्टि; इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ; मन:--मन; मात्रा:--तन्मात्रा; गुणा: त्रयः--तीनों गुण( सत्त्व, रजस् तथा तमस ); एतत्--ये सारे; विचित्रमू--तरह तरह के; सह--समेत; जीव-काल--सारे जीवों की आयु;स्वभाव--स्वभाव; कर्म-आशय--कर्म तथा भौतिक भोग की इच्छा ( वासना ); लिड्-भेदम्--इच्छानुसार शरीरों के भेद;सूनो: तनौ-- अपने पुत्र के शरीर में; वीक्ष्य-- देखकर; विदारित-आस्ये--खुले मुँह के भीतर; ब्रजम्--त्रज-धाम को; सह-आत्मानम्-- अपने समेत; अवाप--हत प्रभ रह गई; शट्भाम्ू--शंका तथा आश्चर्य से युक्त |
जब कृष्ण ने माता यशोदा के आदेश से अपना पूरा मुँह खोला तो उन्होंने कृष्ण के मुख केभीतर सभी चर-अचर प्राणी, बाह्य आकाश, सभी दिशाएँ, पर्वत, द्वीप, समुद्र, पृथ्वीतल, बहतीहवा, अग्नि, चन्द्रमा तथा तारे देखे।
उन्होंने ग्रह, जल, प्रकाश, वायु, आकाश तथा अहंकार केरूपान्तर द्वारा सृष्टि देखी।
उन्होंने इन्द्रियाँ, मन, तन्मात्राएँ, तीनों गुण ( सतो, रजो तथा तमो ) भीदेखे।
उन्होंने जीवों की आयु, प्राकृतिक स्वभाव तथा कर्मफल देखे।
उन्होंने इच्छाएँ और विभिन्नप्रकार के चर-अचर शरीर देखे।
विराट जगत के इन विविध पक्षों के साथ ही स्वयं को तथावृन्दावन-धाम को देखकर वे अपने पुत्र के स्वभाव से सशंकित तथा भयभीत हो उठीं।
कि स्वप्न एतदुत देवमाया कि वा मदीयो बत बुद्धिमोहः ।
अथो अभमुष्यैव ममार्भकस्ययः कश्चनौत्पत्तिक आत्मयोग: ॥
४०॥
किम्--क्या; स्वप्न: --सपना; एतत्--यह; उत--अथवा; देव-माया--बहिरंगा शक्ति द्वारा मोहमयी अभिव्यक्ति; किम् वा--अथवा; मदीय:--मेरा निजी; बत--निस्सन्देह; बुद्धि-मोह:--बुद्धि का मोह; अथो--अन्यथा; अमुष्य--ऐसे; एब--निस्सन्देह;मम अर्भकस्य--मेंरे बालक का; यः--जो; कश्चन--कोई ; औत्पत्तिक: --प्राकृतिक; आत्म-योग:--निजी योगशक्ति |
[माता यशोदा अपने में ही तर्क करने लगीं : क्या यह सपना है या बहिरंगा शक्ति कीमोहमयी सृष्टि है? कहीं यह मेरी ही बुद्धि से तो प्रकट नहीं हुआ ? अथवा यह मेरे बालक कीकोई योगशक्ति है?
अथो यथावतन्न वितर्कगोचरंचेतोमन:ःकर्मवचोभिरज्धसा ।
यदाश्रयं येन यतः प्रतीयतेसुदुर्विभाव्यं प्रणतास्मि तत्पदम् ॥
४१॥
अथो--इसलिए उसने भगवान् की शरण में जाने का निश्चय किया; यथा-वत्--जितनी पूर्णता से कोई अनुभव कर सकती है;न--नहीं; वितर्क-गोचरम्--समस्त तर्क, इन्द्रिय बोध से परे; चेत:--चेतना से; मन:ः--मन से; कर्म--कर्म से; वचोभि:--अथवा शब्दों से; अज्लआ--सबको मिलकर भी हम उन्हें नहीं समझ सकते; यत्-आश्रयम्--जिसके नियंत्रण में; येन--जिसकेद्वारा; यतः--जिससे; प्रतीयते--अनुभव किया जा सकता है कि हर वस्तु उन्हीं से उद्भूत है; सु-दुर्विभाव्यमू--हमारी चेतना सेपरे; प्रणता अस्मि--शरणागत हूँ; तत्ू-पदम्--उनके चरणों में
अतएव मैं उन भगवान् की शरण ग्रहण करती हूँ और उन्हें नमस्कार करती हूँ जो मनुष्य कीकल्पना, मन, कर्म, विचार तथा तर्क से परे हैं, जो इस विराट जगत के आदि-कारण हैं, जिनसेयह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड पालित है और जिनसे हम इस जगत के अस्तित्व का अनुभव करते हैं।
मैंउन्हें सादर नमस्कार ही कर सकती हूँ क्योंकि वे मेरे चिन्तन, अनुमान तथा ध्यान से परे हैं।
वे मेरेसमस्त भौतिक कर्मों से भी परे हैं।
अहं ममासौ पतिरेष मे सुतोब्रजेश्वरस्याखिलवित्तपा सती ।
गोप्यश्चव गोपा: सहगोधनाश्च मेयन्माययेत्थं कुमति: स मे गति: ॥
४२॥
अहम्-मेरा अस्तित्व ( मैं कुछ हूँ ); मम--मेरा; असौ--नन्द महाराज; पति:ः--पति; एष:--यह ( कृष्ण ); मे सुत:--मेरा पुत्रहै; ब्रज-ई श्वरस्थ-- मेरे पति नन्द महाराज का; अखिल-वित्त-पा--मैं असीम ऐश्वर्य और सम्पत्ति की मालकिन हूँ; सती--उनकीपत्नी होने से; गोप्य: च--तथा सारी गोपियाँ; गोपा: --सारे ग्वाले ( जो मेरे अधीन हैं ); सह-गोधना: च--गौवों तथा बछड़ोंसमेत; मे--मेरा; यत्-मायया--ऐसी सारी वस्तुएँ जिन्हें मैं कहती हूँ आखिर भगवान् की कृपा से प्राप्त हैं; इत्थम्--इस प्रकार;कुमतिः--मैं झूठे ही सोचती हूँ कि मेरी सम्पत्ति हैं; सः मे गति:ः--अतएव बे ही मेरी एकमात्र शरण हैं ( मैं तो निमित्त मात्र हूँ )
यह तो भगवान् की माया का प्रभाव है, जो मैं मिथ्या ही सोचती हूँ कि नन््द महाराज मेरेपति हैं, कृष्ण मेरा पुत्र है और चूँकि मैं नन्द महाराज की महारानी हूँ इसलिए गौवों तथा बछड़ोंकी सम्पत्ति मेरे अधिकार में है और सारे ग्वाले तथा उनकी पत्रियाँ मेरी प्रजा हैं।
वस्तुतः मैं भीभगवान् के नित्य अधीन हूँ।
वे ही मेरे अनन्तिम आश्रय हैं।
इत्थं विदिततत्त्वायां गोपिकायां स ईश्वर: ।
वैष्णवीं व्यतनोन्मायां पुत्रस्नेहमयीं विभु: ॥
४३॥
इत्थम्--इस तरह; विदित-तत्त्वायाम्ू--हर वस्तु के सत्य को दार्शनिक रूप से समझ जाने पर; गोपिकायाम्ू--माता यशोदा केप्रति; सः--उस, भगवान् ने; ईश्वर:--परम नियन्ता; वैष्णवीम्--विष्णु-माया या योगमाया का; व्यतनोत्--विस्तार किया;मायाम्--योगमाया की; पुत्र-स्नेह-मयीम्-- अपने पुत्र-स्नेह के कारण अत्यन्त अनुरक्त; विभु:--पर मे श्वर ने |
माता यशोदा भगवान् की कृपा से असली सत्य को समझ गईं।
लेकिन अन्तरंगा शक्ति,योगमाया के प्रभाव से परम प्रभु ने उन्हें प्रेरित किया कि वे अपने पुत्र के गहन मातृ-प्रेम में लीनहो जाँय।
सद्यो नष्टस्मृतिर्गोपी सारोप्यारोहमात्मजम् ।
प्रवृद्धस्तेहकलिलहृदयासीद्यथा पुरा ॥
४४॥
सद्यः--इन सारे दार्शनिक चिन्तनों के बाद माता यशोदा ने भगवान् की शरण ग्रहण की; नष्ट-स्मृतिः--कृष्ण के मुँह के भीतरविश्व रूप देखने से नष्ट हुई स्मरणशक्ति; गोपी--माता यशोदा; सा--वह; आरोप्य--बैठाकर; आरोहम्--गोद में; आत्मजम्--अपने पुत्र को; प्रवृद्ध--बढ़ा हुआ; स्नेह--स्नेह से; कलिल-- प्रभावित; हृदया--हृदय से; आसीतू--हो गई; यथा पुरा--जैसीपहले थी
कृष्ण ने अपने मुँह के भीतर जिस विराट रूप को दिखलाया था योगमाया के उस भ्रम कोतुरन्त ही भूलकर माता यशोदा ने अपने पुत्र को पूर्ववत् अपनी गोद में ले लिया और अपने दिव्यबालक के प्रति उनके हृदय में और अधिक स्नेह उमड़ आया।
अय्या चोपनिषद्धिश्व साड्ख्ययोगैश्व सात्वतैः ।
उपगीयमानमाहात्म्यं हरिं सामन्यतात्मजम् ॥
४५॥
त्रय्या--तीन वेदों ( साम, यजुर् तथा अथर्व ) के अध्ययन से; च-- भी; उपनिषद्धि: च--तथा उपनिषदों के अध्ययन से;साइ्ख्य-योगैः--तथा सांख्य योग विषयक साहित्य के अध्ययन से; च--तथा; सात्वतैः--बड़े बड़े ऋषियों-मुनियों द्वारा अथवावैष्णव तंत्र पद्धरात्र का अध्ययन करने से; उपगीयमान-माहात्म्यम्--जिनकी महिमा की पूजा ( इन बैदिक ग्रंथों द्वारा ) की जातीहै; हरिमू-- भगवान् को; सा--उसने; अमन्यत--( सामान्य ) मान लिया; आत्मजम्-- अपना पुत्र
भगवान् की महिमा का अध्ययन तीनों वेदों, उपनिषदों, सांख्य योग के ग्रंथों तथा अन्यवैष्णव साहित्य के माध्यम से किया जाता है।
फिर भी माता यशोदा परम पुरुष को अपना सामान्य बालक मानती रहीं।
श्रीराजोबवाचनन्दः किमकरोद्डह्मन्श्रेय एवं महोदयम् ।
यशोदा च महाभागा पपौ यस्या: स्तनं हरि: ॥
४६॥
श्री-राजा उबाच--महाराज परीक्षित ने और आगे पूछा; नन्दः--महराज नन्द ने; किम्ू--क्या; अकरोत्--किया; ब्रह्मनू--हेविद्वान ब्राह्मण; श्रेयः --पुण्यकर्म यथा तपस्या; एवम्--जिस तरह उन्होंने प्रकट किया; महा-उदयम्--जिससे उन्हें सर्वोच्चसिद्धि प्राप्त हुई; यशोदा--माता यशोदा; च-- भी; महा-भागा--अत्यन्त भाग्यशालिनी; पपौ--पिया; यस्या: --जिसका;स्तनमू--स्तन का दूध; हरिः-- भगवान् ने |
माता यशोदा के परम सौभाग्य को सुनकर परीक्षित महाराज ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा :है विद्वान ब्राह्मण, भगवान् द्वारा माता यशोदा का स्तन-पान किया गया।
उन्होंने तथा नन्दमहाराज ने भूतकाल में कौन-से पुण्यकर्म किये जिनसे उन्हें ऐसी प्रेमम॒यी सिद्धि प्राप्त हुई ?
पितरौ नान्वविन्देतां कृष्णोदारार्भकेहितम् ।
गायन्त्यद्यापि कवयो यललोकशमलापहम् ॥
४७॥
पितरौ--कृष्ण के असली पिता तथा माता ने; न--नहीं; अन्वविन्देताम्ू-- आनन्द प्राप्त किया; कृष्ण--कृष्ण का; उदार--वदान्य; अर्भक-ईहितम्--उसके द्वारा सम्पन्न बाल-लीलाएँ; गायन्ति--महिमा का गान करते हैं; अद्य अपि--आज भी;कवयः--बड़े बड़े ऋषि-मुनि; यत्ू--जो; लोक-शमल-अपहम्--जिसके सुनने से सारे जगत का कल्मष दूर हो जाता है।
यद्यपि कृष्ण बसुदेव तथा देवकी से इतने प्रसन्न थे कि वे उनके पुत्र रूप में अवतरित हुएकिन्तु वे दोनों ही कृष्ण की उदार बाल-लीलाओं का आनन्द नहीं उठा पाये।
ये लीलाएँ इतनीमहान् हैं कि इनका उच्चार करने मात्र से संसार का कल्मष दूर हो जाता है।
किन्तु नन््द महाराजतथा यशोदा ने इन लीलाओं का पूर्ण आनन्द प्राप्त किया अतएवं उनकी स्थिति वसुदेव तथादेवकी से सदैव श्रेष्ठतर है।
श्रीशुक उबाचद्रोणो बसूनां प्रवरो धरया भार्यया सह ।
'करिष्यमाण आदेशान्ब्रह्मणस्तमुवाच ह ॥
४८ ॥
श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; द्रोण:--द्रोण नामक; बसूनाम्--आठ वसुओं में; प्रवर:--सर्व श्रेष्ठ; धरया--धरा के; भार्यया--अपनी पतली; सह--साथ; करिष्यमाण:--सम्पन्न करने के लिए; आदेशान्--आदेश; ब्रह्मण: --ब्रह्मा का;तम्--उससे; उवाच--कहा; ह--भूतकाल में
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : भगवान् ब्रह्माजी के आदेश का पालन करने के लिए वसुओं मेंश्रेष्ठ द्रोण ने अपनी पत्नी धरा समेत ब्रह्मा से इस प्रकार कहा।
जातयोनों महादेवे भुवि विश्वेश्वरे हरौ ।
भक्ति: स्यात्परमा लोके ययाज्ञो दुर्गतिं तरेत् ॥
४९॥
जातयो: --जन्म लेकर; नौ--पति-पली दोनों, द्रोण तथा धरा; महादेवे--परम पुरुष, भगवान् में; भुवि--पृथ्वी पर; विश्व-ईश्वर--सभी लोकों के स्वामी में; हरौ--हरि में; भक्ति:-- भक्ति; स्थातू--फैलेगी; परमा--जीवन का चरम लक्ष्य; लोके--संसार में; यया--जिससे; अज्ञः--आसानी से; दुर्गतिम्--दुखमय जीवन से; तरेतू--बच सकता है और उद्धार हो सकता है।
द्रोण तथा धरा ने कहा : कृपा करके हमें अनुमति दें कि हम पृथ्वी पर जन्म लें जिससेपरब्रह्म परम नियन्ता तथा समस्त लोकों के स्वामी भगवान् भी प्रकट हों और भक्ति का प्रसारकरें जो जीवन का चरम लक्ष्य है और जिसे ग्रहण करके इस भौतिक जगत में उत्पन्न होने वालेलोग सरलता से भौतिकतावादी जीवन की दुखमय स्थिति से उबर सकें ।
अस्त्वित्युक्त: स भगवान्त्रजे द्रोणो महायशा: ।
जज्ञे नन्द इति ख्यातो यशोदा सा धराभवत् ॥
५०॥
अस्तु--ब्रह्मा ने स्वीकार किया, ‘हाँ, ठीक है'; इति उक्त:--उनसे ऐसा आदेश पाकर; सः--उसने ( द्रोण ने ); भगवानू--कृष्ण के पिता ( भगवान् का पिता भगवान् होता है ); ब्रजे--ब्रजभूमि वृन्दावन में; द्रोण:--द्रोण, अत्यन्त शक्तिशाली बसु ने;महा-यशा:--परम प्रसिद्ध अध्यात्मवादी; जन्ञे--प्रकट हुआ; नन्दः--नन्द महाराज के रूप में; इति--इस प्रकार; ख्यातः--विख्यात है; यशोदा--माता यशोदा के रूप में; सा--वह; धरा--धरा; अभवत्--प्रकट हुई
जब ब्रह्मा ने कहा, ‘हाँ, ऐसा ही हो ' तो परम भाग्यशाली द्रोण जो भगवान् के समान था,ब्रजपुर वृन्दावन में विख्यात नन्द महाराज के रूप में और उनकी पत्नी धरा माता यशोदा के रूपमें प्रकट हुए।
ततो भक्तिर्भगवति पुत्रीभूते जनार्दने ।
दम्पत्योर्नितरामासीद्गोपगोपीषु भारत ॥
५१॥
ततः--तत्पश्चात्; भक्ति: भगवति--भगवान् की भक्ति, भक्ति सम्प्रदाय; पुत्री-भूते-- भगवान् के रूप में जो माता यशोदा के पुत्ररूप में उत्पन्न हुए; जनार्दने-- भगवान् कृष्ण में; दम्-पत्यो:--पति-पत्नी दोनों का; नितरामू--निरन्तर; आसीत्-- था; गोप-गोपीषु--गोप तथा गोपियाँ, जो वृन्दावन के वासी तथा नन्द महाराज तथा यशोदा के सान्निध्य में थे; भारत--हे महाराजपरीक्षित |
हे भारत श्रेष्ठ महाराज परीक्षित, तत्पश्चात् जब भगवान् कृष्ण नन्द महाराज तथा यशोदा केपुत्र बने तो उन दोनों ने निरन्तर, अचल दिव्य वात्सल्य-प्रेम बनाये रखा तथा उनके सात्निध्य मेंवृन्दावन के अन्य सभी निवासी, गोप तथा गोपियों ने कृष्ण-भक्ति-संस्कृति का विकास किया।
कृष्णो ब्रह्मण आदेशं सत्य कर्तु ब्रजे विभु: ।
सहरामो वसंश्षक्रे तेषां प्रीति स््वलीलया ॥
५२॥
कृष्ण:-- भगवान् कृष्ण ने; ब्रह्मण:--ब्रह्माजी का; आदेशम्--आदेश; सत्यम्--सच; कर्तुम्-बनाने के लिए; ब्रजे--ब्रजभूमिवृन्दावन में; विभु:--परम शक्तिशाली; सह-राम: --बलराम के साथ; वसन्--निवास करते हुए; चक्रे--बढ़ाया; तेषाम्--वृन्दावनवासियों का; प्रीतिमू--आनन्द; स्व-लीलया--अपनी दिव्य लीलाओं से |
इस तरह ब्रह्म के वर को सत्य करने के लिए भगवान् कृष्ण बलराम समेत ब्रजभूमिवृन्दावन में रहे।
उन्होंने विभिन्न बाल-लीलाएँ प्रदर्शित करते हुए ननन््द तथा वृन्दावन के अन्यवासियों के दिव्य आनन्द को वर्धित किया।
