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अध्याय उनासी: भगवान बलराम तीर्थयात्रा पर जाते हैं
10.79भीमो वायुरभूद्राजन्पूयगन्धस्तु सर्वशः ॥
१॥
श्री-शुक:उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; ततः--तत्पश्चात्; पर्वणि--प्रतिपदा का दिन; उपावृत्ते--आने पर; प्रचण्ड:--भयानक; पांशु-- धूल; वर्षण: --वर्षा; भीम: -- डरावनी; वायु: -- हवा; अभूत्--उठी; राजन्--हे राजन् ( परीक्षित ); पूय--पीब की; गन्ध: --गन्ध; तु--तथा; सर्वशः--सर्वत्र |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजन, तब प्रतिपदा के दिन ( शुक्लपक्ष का पहला दिन )एक प्रचण्ड तथा भयावना झंझावात आया, जिससे चारों ओर धूल बिखर गई और सर्वत्र पीबकी दुर्गन््ध फैल गई।
ततोअमेध्यमयं वर्ष बल्वलेन विनिर्मितम् ।
अभवद्यज्ञशालायां सोन्वदृश्यत शूलधृक् ॥
२॥
ततः--तब; अमेध्य--गर्हित वस्तुएँ; मयम्--से पूर्ण; वर्षम्--वर्षा; बल्वलेन--बल्वल द्वारा; विनिर्मितम्--उत्पन्न किया गया;अभवत््--हुआ; यज्ञ--यज्ञ की; शालायाम्--शाला में; सः--वह, बल्वल; अन्वहृश्यत--इसके बाद प्रकट हुआ; शूल--त्रिशूल; धूकू--लिए हुए।
इसके बाद यज्ञशाला के क्षेत्र में बल्वल द्वारा भेजी गई घृणित वस्तुओं की वर्षा होने लगी।
तत्पश्चात् वह असुर हाथ में त्रिशूल लिए साक्षात् प्रकट हुआ।
त॑ विलोक्य बृहत्कायं भिन्नाज्ननचयोपमम् ।
तप्तताग्रशिखाइम श्रुं दंष्टोग्रश्रुकुटीमुखम् ॥
३॥
सस्मार मूषलं राम: परसैन्यविदारणम् ।
हलं च दैत्यदमनं ते तूर्णमुपतस्थतुः ॥
४॥
तम्--उसको; विलोक्य--देखकर; बृहत्--विशाल; कायम्--शरीर वाले; भिन्न--टूटा; अज़्न--काजल का; चय--ढेर;उपमम्--सहृश; तप्त--जलता हुआ; ताप्र--ताँबे ( जैसे रंग वाला ); शिखा--चोटी; शमश्रुम्--तथा दाढ़ी; दंप्टा--दाँत सहित;उग्र--भयावह; भ्रु--भौंहों के; कुटी--खाँचों से युक्त; मुखम्--मुख वाला; सस्मार--स्मरण किया; मूषलम्--अपनी गदा( मूसल ); राम:--बलराम ने; पर--आमने-सामने; सैन्य--सेनाएँ; विदारणम्--फाड़ने के लिए; हलमू--अपना हल; च--तथा; दैत्य--असुर; दमनमू--दमन करने वाला; ते--वे; तूर्णम्--तुरन्त; उपतस्थतु: --प्रस्तुत किया, उपस्थित हुआ।
विशालकाय असुर काले कज्जल के पिंड जैसा लग रहा था।
उसकी चोटी तथा दाढ़ी पिघलेताँबे जैसी थी और उसके चेहरे में भयावने दाँत थे तथा भौंहें गढ़े में घुसी थीं।
उसे देखकरबलराम ने शत्रु-सेनाओं को खण्ड-खण्ड कर देने वाली अपनी गदा और असुरों को दण्ड देनेवाले अपने हल का स्मरण किया।
इस प्रकार बुलाये जाने पर उनके दोनों हथियार तुरन्त हीउनके समक्ष प्रकट हो गये।
तमाकृष्य हलाग्रेण बल्वलं गगनेचरम् ।
मूषलेनाहनत्क्रुद्धो मूर्धिनि ब्रह्मद्गराहं बल: ॥
५॥
तम्--उसको; आकृष्य--अपनी ओर खींच कर; हल--हल के; अग्रेण-- अगले भाग से; बल्वलम्--बल्वल को; गगने--आकाश में; चरम्--विचरण करने वाले; मूषघलेन-- अपनी गदा से; अहनत्-- प्रहार किया; क्रुद्धः--नाराज; मूर्ध्नि--सिर पर;ब्रह्म--ब्राह्मणों का; द्रहम्--तंग करने वाला; बल:ः--बलराम ने |
ज्योंही बल्वल असुर आकाश से उड़ा, भगवान् बलराम ने अपने हल की नोंक से उसे पकड़लिया और इस ब्राह्मण-उत्पीड़क के सिर पर अत्यन्त क्रुद्ध होकर अपनी गदा से प्रहार किया।
सोपतद्भुवि निर्भिन्नललाटोसृक्समुत्सूजन् ।
मुझन्नार्तस्वरं शैलो यथा वज़हतोरुण: ॥
६॥
सः--वह, बल्वल; अपततू--गिर पड़ा; भुवि--पृथ्वी पर; निर्भिन्न--फट गया; ललाट:--कपाल; असृक्--रक्त; समुत्सूजन्--'फव्वारे की तरह निकलता हुआ; मुझ्न्--छोड़ते हुए; आर्त--पीड़ा के; स्वर्मू--शब्द; शैल:--पर्वत; यथा--जिस तरह;बज्--विद्युत्पात से; हतः--प्रहार किया हुआ; अरुण:--लाल-लाल।
बल्वल पीड़ा से चिल्ला उठा और पृथ्वी पर गिर पड़ा।
उसका सिर फट गया और उसमें सेखून का फव्वारा निकलने लगा।
वह विद्युत्पात से प्रताड़ित लाल ( गेरू ) पर्वत जैसा लग रहाथा।
संस्तुत्य मुनयो राम॑ प्रयुज्यावितथाशिष: ।
अभ्यषिश्ञन्महाभागा वृत्रघ्न॑ विबुधा यथा ॥
७॥
संस्तुत्य--प्रशंसा करके ; मुनयः--मुनिगण; रामम्--बलराम की; प्रयुज्य--प्रदान करके; अवितथ--अच्युत; आशिष: --वर;अभ्यषिश्जन्--जैसे उत्सव में नहलाया हुआ; महा-भागा:--महापुरुष; वृत्र--वृत्रासुर का; घ्नमू--मारने वाला ( इन्द्र );विबुधा:--देवतागण; यथा--जिस प्रकार।
पूज्य ऋषियों ने हार्दिक स्तुतियों से बलराम का सम्मान किया और उन्हें अमोघ वर दिये।
तबउन्होंने उनका अनुष्ठानिक स्नान कराया, जिस तरह देवताओं ने इन्द्र को औपचारिक स्नान करायाथा, जब उसने वृत्र का वध किया था।
वैजयन्तीं ददुर्मालां श्रीधामाम्लानपड्डूजां ।
रामाय वाससी दिव्ये दिव्यान्याभरणानि च ॥
८॥
वैजयन्तीम्ू--वैजयन्ती नामक; ददुः--दिया; मालाम्ू--फूलों की माला; श्री--लक्ष्मी के; धाम--घर; अम्लान--कभी नमुरझाने वाली; पड्लडजामू--कमल-फूलों से बनी; रामाय--बलराम को; वाससी--वस्त्रों की जोड़ी ( ऊपरी तथा निचले );दिव्ये--दिव्य; दिव्यानि--दिव्य; आभरणानि--आभूषण; च--तथा
उन्होंने बलरामजी को कभी न मुरझाने वाली कमल के फूलों से बनी वैजयन्ती नामक मालादी, जिसमें लक्ष्मीजी रहती हैं।
उन्होंने बलराम को दिव्य वस्त्रों की जोड़ी तथा आभूषण भी दिये।
अथ तैरभ्यनुज्ञात: कौशिकीमेत्य ब्राह्मणै: ।
स्नात्वा सरोवरमगाद्यतः सरयूरासत्रवत् ॥
९॥
अथ--तत्पश्चात्; तैः--उनके द्वारा; अभ्यनुज्ञात:--विदा किये गये; कौशिकीम्--कौशिकी नदी में; एत्य-- आकर; ब्राह्मणै:--ब्राह्मणों के साथ; स्नात्वा--नहाकर; सरोवरम्--झील के निकट; अगातू्--गये; यत:ः--जिसमें से; सरयू:--सरयू नदी;आस््रवतू--निकलती है
तत्पश्चात् ऋषियों से विदा होकर भगवान् ब्राह्मणों की टोली के साथ कौशिकी नदी गये,जहाँ उन्होंने स्नान किया।
वहाँ से वे उस सरोवर पर गये, जिससे सरयू नदी निकलती है।
अनुस्त्रोतेन सरयूं प्रयागमुपगम्य सः ।
स्नात्वा सन्तर्प्य देवादीन्जगाम पुलहाश्रमम् ॥
१०॥
अनु--पीछे-पीछे; स्रोतेन-- धारा; सरयूम्--सरयू के किनारे-किनारे; प्रयागम्-- प्रयाग तक; उपगम्य--आकर; सः--वह;स्नात्वा--स्नान करके; सन्तर्प्य--तर्पण करके; देव-आदीन्--देवताओं आदि को; जगाम--गया; पुलह-आश्रमम्--पुलह ऋषिकी कुटिया में |
भगवान् सरयू नदी की धारा का अनुसरण करते हुए प्रयाग आये, जहाँ उन्होंने स्नान कियाऔर देवताओं तथा अन्य जीवों को तर्पण करने का अनुष्ठान सम्पन्न किया।
इसके बाद वे पुलहऋषि के आश्रम गये।
गोमतीं गण्डकीं स्नात्वा विपाशां शोण आप्लुत: ।
गयां गत्वा पितृनिष्ठा गड़ासागरसड्रमे ॥
११॥
उपस्पृश्य महेन्द्रादौ राम॑ हृष्टाभिवाद्य च ।
सप्तगोदावरीं वेणां पम्पां भीमरथीं ततः ॥
१२॥
स्कन्दं दृष्ठा ययौ राम: श्रीशैलं गिरिशालयम् ।
द्रविडेषु महापुण्यं दृष्टाद्रिं वेड्डूटं प्रभु: ॥
१३॥
कामकोष्णीं पुरीं काञ्लीं कावेरीं च सरिद्वराम् ।
श्रीरन्गाख्यं महापुण्यं यत्र सन्निहितो हरि: ॥
१४॥
ऋषकभाद्रिं हरे: क्षेत्रं दक्षिणां मथुरां तथा ।
सामुद्रं सेतुमगमत्महापातकनाशनम् ॥
१५॥
गोमतीम्--गोमती नदी में; गण्डकीम्--गण्डकी नदी में; स्नात्वा--स्नान करके; विपाशाम्--विपाशा नदी में; शोणे--शोणनदी में; आप्लुत:ः--घुस करके; गयाम्--गया; गत्वा--जाकर; पितृन्--अपने पितरों को; इश्ला--पूजा करके; गड्ज--गंगा;सागर--तथा समुद्र के; सड़मे--संगम में; उपस्पृश्य--जल का स्पर्श करके ( नहाकर ); महा-इन्द्र-अद्रौ--महेन्द्र पर्वत पर;रामम्--परशुराम को; हृष्ठा--देखकर; अभिवाद्य--सम्मान करके; च--तथा; सप्त-गोदावरीम्--सात गोदावरियों के मिलनस्थल पर ( जाकर ); वेणाम्--वेणा नदी; पम्पाम्--पम्पा नदी; भीमरथीम््--तथा भीमरथी नदी; तत:ः--तब; स्कन्दम्-- भगवान्स्कन्द ( कार्तिकेय ) को; दृष्टा--देखकर; ययौ--गया; राम:--बलराम; श्री-शैलम्-- श्रीशैल; गिरि-श--शिवजी के;आलयमू--वासस्थान; द्रविडेषु--दक्षिणी प्रान्तों में; महा--अत्यन्त; पुण्यम्--पतवित्र; इृध्ला--देखकर; अद्विम्ू--पर्वत को;वेड्डूटम्--वेंकट नामक ( जो बालाजी का धाम है ); प्रभुः--भगवान्; काम-कोष्णीमू--कामकोष्णी; पुरीम् काञ्लीम्--काझञझ्ञीपुरम् को; कावेरीम्--कावेरी को; च--तथा; सरित्--नदियों के; वराम्--सबसे बड़े; श्री-रड्र-आख्यम्-- श्रीरंग नामक;महा-पुण्यम्--अत्यन्त पवित्र स्थान; यत्र--जहाँ; सन्निहित:ः--प्रकट; हरिः-- भगवान् कृष्ण ( रंगनाथ के रूप में ); ऋषभ-अद्विमू--ऋषभ पर्वत; हरेः-- भगवान् विष्णु के; क्षेत्रमू--स्थान; दक्षिणाम् मथुराम्ू-दक्षिणी मथुरा ( मदुराई, देवी मीनाक्षी काधाम ); तथा-- भी; सामुद्रम्ू--समुद्र पर; सेतुम्--पुल ( सेतुबन्ध ); अगमत्--गया; महा--सबसे बड़े; पातक--पापों का;नाशनमू--नष्ट करने वाला।
भगवान् बलराम ने गोमती, गण्डकी तथा विपाशा नदियों में स्नान किया और शोण में भीडुबकी लगाई।
वे गया गये, जहाँ अपने पितरों की पूजा की।
गंगामुख जाकर उन्होंने शुद्धि केलिए स्नान किया।
महेन्द्र पर्वत पर उन्होंने परशुराम के दर्शन किये और उनकी स्तुति की।
तत्पश्चात् उन्होंने गोदावरी नदी की सातों शाखाओं में स्नान किया।
उन्होंने वेणा, पम्पा तथाभीमरथी नदियों में भी स्नान किया।
फिर बलराम भगवान् स्कन्द से मिले और भगवान् गिरिशके धाम श्रीशैल गये।
दक्षिणी प्रान्तों में, जिन्हें द्रविड़ देश कहा जाता है, भगवान् ने पवित्र वेंकटपर्वत, कामकोष्णी तथा कांची नामक शहर, पवित्र कावेरी नदी तथा अत्यन्त पवित्र श्रीरंग कोदेखा, जहाँ साक्षात् भगवान् कृष्ण प्रकट हुए थे।
वहाँ से वे ऋषभ पर्वत गये, जहाँ पर कृष्ण भीरहते हैं और फिर दक्षिण मथुरा गये।
तत्पश्चात् वे सेतुबन्ध गये, जहाँ बड़े से बड़े पाप नष्ट हो जातेहैं।
तत्रायुतमदाद्धेनूर्ब्राह्मणे भ्यो हलायुधः ।
कृतमालां ताम्रपर्णी मलयं च कुलाचलम् ।
तत्रागस्त्यं समासीनं नमस्कृत्याभिवाद्य च ॥
१६॥
योजितस्तेन चाशीर्मिरनुज्ञातो गतोर्णवम् ।
दक्षिणं तत्र कन्याख्यां दुर्गा देवीं ददर्श सः ॥
१७॥
तत्र--वहाँ ( सेतुबन्ध या रामेश्वरम में ); अयुतम्--दस हजार; अदात्--दान में दी; धेनू: --गौवें; ब्रह्मणे भ्य:--ब्राह्मणों को;हल-आयुध:ः--जिसका हथियार हल है, बलराम ने; कृतमालाम्--कृतमाला नदी; ताप्रपर्णीम्--ताप्रपर्णी नदी; मलयम्--मलय; च--तथा; कुल-अचलमू--प्रमुख पर्वत श्रेणी; तत्र--वहाँ; अगस्त्यम्-- अगस्त्य ऋषि को; समासीनम्--( ध्यान में )बैठे हुए; नमस्कृत्य--नमस्कार करके; अभिवाद्य--महिमा-गायन करके; च--तथा; योजित:--प्रदत्त; तेन--उसके द्वारा; च--तथा; आशीर्मि: --आशीर्वादों से; अनुज्ञात:--जाने की अनुमति पाकर; गत:--चले गये; अर्णवम्--समुद्र; दक्षिणम्--दक्षिणी;तत्र--वहाँ; कन्या-आख्याम्--कन्याकुमारी नामक; दुर्गाम् देवीम्--दुर्गादेवी को; दरदर्श--देखा; सः--उसने |
सेतुबन्ध ( रामेश्वरम ) में भगवान् हलायुध ने ब्राह्मणों को दान में दस हजार गौवें दीं।
फिर वेकृतमाला तथा ताम्रपर्णी नदियों एवं विशाल मलय पर्वत गये।
मलय- श्रेणी में भगवान् बलरामको ध्यानमग्न अगस्त्य ऋषि मिले।
ऋषि को नमस्कार करके भगवान् ने स्तुति की और उनसेआशीर्वाद प्राप्त किया।
अगस्त्य से विदा होकर वे दक्षिणी सागर के तट पर गये, जहाँ उन्होंनेकन्याकुमारी के रूप में दुर्गादेवी को देखा।
ततः फाल्गुनमासाद्य पश्चाप्सरसमुत्तमम् ।
विष्णु: सन्निहितो यत्र स्नात्वास्पर्शद्गवायुतम् ॥
१८॥
ततः--तब; फाल्गुनम्--फाल्गुन; आसाद्य--पहुँच कर; पशञ्ञ-अप्सरसम्--पाँच अप्सराओं की झील; उत्तमम्--उत्तम;विष्णु:-- भगवान् विष्णु; सन्निहित:ः--प्रकट ; यत्र--जहाँ पर; स्नात्वा--स्नान करके; अस्पर्शत्--स्पर्श किया ( दान देते समयअनुष्ठान के रूप में ); गब--गौवों को; अयुतम्ू--दस हजार।
इसके बाद वे फाल्गुन तीर्थ गये और उन्होंने पवित्र पञ्ञाप्सरा सरोवर में स्नान किया, जहाँसाक्षात् भगवान् विष्णु प्रकट हुए थे।
यहाँ पर उन्होंने और दस हजार गौवें दान में दीं।
ततोभिक्रज्य भगवान्केरलांस्तु त्रिगर्तकान् ।
गोकर्णाख्यं शिवक्षेत्रं सान्निध्यं यत्र धूर्जट: ॥
१९॥
आर्या ट्वैपायनीं इृष्ठा शूर्पारकमगाद्ठल: ।
तापीं पयोष्णीं निर्विन्ध्यामुपस्पृश्याथ दण्डकम् ॥
२०॥
प्रविश्य रेवामगमद्यत्र माहिष्मती पुरी ।
मनुतीर्थमुपस्पृश्य प्रभासं पुनरागमत् ॥
२१॥
ततः--तब; अभिक्रज्य--यात्रा करके; भगवान्-- भगवान्; केरलान्--केरल राज्य से होकर; तु--तथा; त्रिगर्तकान्ू-त्रिगर्त सेहोकर; गोकर्ण-आख्यम्--( उत्तरी कर्णाटक में अरब सागर के तट पर ) गोकर्ण नामक; शिव-दश्षेत्रमू--शिवजी के पवित्र स्थल;सान्निध्यम्--प्राकट्य; यत्र--जहाँ; धूर्जटे:--शिवजी की; आर्याम्--सम्मानित देवी ( पार्वती, शिव-पत्ली ); द्वैप--द्वीप में(गोकर्ण के निकट के तट से दूर ); अयनीम्--रहने वाला; इृष्ला--देखकर; शूर्पारकम्--शूर्पारक के पवित्र जिले में; अगात्--गये; बल:--बलराम; तापीम् पयोष्णीम् निर्विन्ध्यामू--तापी, पयोष्णी तथा निर्विन्ध्या नदियों में; उपस्पृश्य--जल छूकर; अथ--उसके बाद; दण्डकम्--दण्डक वन में; प्रविश्य--प्रवेश करके; रेवाम्ू--रेवा नदी तक; अगमत्--गये; यत्र--जहाँ; माहिष्मतीपुरी--माहिष्मती नगरी में; मनु-तीर्थम्--मनुती र्थ को; उपस्पृश्य--जल छूकर; प्रभासम्--प्रभास; पुन:--फिर; आगमतू--आये
तब भगवान् ने केरल तथा त्रिगर्त राज्यों से होकर यात्रा करते हुए भगवान् शिव की पवित्रनगरी गोकर्ण देखी, जहाँ साक्षात् भगवान् धूर्जटि ( शिव ) प्रकट होते हैं।
इसके बाद एक द्वीप मेंनिवास करने वाली देवी पार्वती का दर्शन करके बलरामजी पवित्र शूर्पारक जिले से होकर गुजरेऔर तापी, पयोष्णी तथा निर्विन्ध्या नदियों में स्नान किया।
तत्पश्चात् वे दण्डकारण्य में प्रविष्टहुए और रेवा नदी गये, जिसके किनारे माहिष्मती नगरी स्थित है।
फिर उन्होंने मनुतीर्थ में स्नानकिया और अन्त में प्रभास लौट आये।
श्र॒त्वा द्विजै: कथ्यमानं कुरुपाण्डवसंयुगे ।
सर्वराजन्यनिधन भार मेने हतं भुवः ॥
२२॥
श्रुत्वा--सुनकर; द्विजैः--ब्राह्मणों द्वारा; कथ्यमानम्--सुनाये जा रहे; कुरू-पाण्डब--कुरुओं तथा पाण्डवों के बीच; संयुगे--युद्ध में; सर्व--सभी; राजन्य--राजाओं के; निधनम्--संहार को; भारम्-- भार को; मेने--सोचा; हतमू--हटाया हुआ;भुवः--पृथ्वी के |
भगवान् ने कुछ ब्राह्मणों से सुना कि किस तरह कुरूओं तथा पाण्डवों के बीच युद्ध में भागलेने वाले सारे राजा मारे जा चुके थे।
इससे उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि अब पृथ्वी अपनेभार से मुक्त हो गई है।
स भीमदुर्योधनयोर्गदाभ्यां युध्यतोर्मुधे ।
वारयिष्यन्विनशनं जगाम यदुनन्दनः: ॥
२३॥
सः--उसने, बलरामजी ने; भीम-दुर्यो धनयो:-- भीम तथा दुर्योधन के बीच; गदाभ्याम्--गदाओं से; युध्यतो: -- लड़ते हुए;मृधे--युद्धक्षेत्र में; वारयिष्यन्ू--मना करने की इच्छा करते हुए; विनशनम्--युद्धक्षेत्र तक; जगाम--गये; यदु--यदुओं के;नन्दन:--प्रिय पुत्र ( बलराम )॥
उस समय युद्धक्षेत्र में भीम तथा दुर्योधन के मध्य चल रहे गदा-युद्ध को रोकने की इच्छा सेबलरामजी कुरुक्षेत्र गये।
युधिष्टिरस्तु तं दृष्ठा यमौ कृष्णार्जुनावषि ।
अभिवाद्याभवंस्तुष्णीं कि विवश्षुरिहागत: ॥
२४॥
युधिष्ठटिरः: --राजा युधिष्टिर ने; तु--लेकिन; तम्ू--उसे, बलराम को; हृप्टा--देखकर; यमौ--जुड़वाँ भाई, नकुल तथा सहदेव ने;कृष्ण-अर्जुनौ--कृष्ण तथा अर्जुन ने; अपि--भी; अभिवाद्य--नमस्कार करके; अभवनू-- थे; तुष्णीम्ू--मौन; किम्--क्या;विवक्षु:--कहना चाहते हुए; इह--यहाँ; आगत:--आया है
जब युधथ्ष्टिर, कृष्ण, अर्जुन तथा जुड़वाँ भाई नकुल तथा सहदेव ने बलराम को देखा, तोउन सबों ने उन्हें नमस्कार किया, किन्तु यह सोचते हुए कि 'ये हमें क्या बतलाने आये हैं' वेसब मौन रहे।
गदापाणी उभौ हृष्ठा संरब्धौ विजयैषिणौ ।
मण्डलानि विचित्राणि चरन्ताविदमब्रवीत् ॥
२५॥
गदा-गदाएँ; पाणी--हाथ में लिए; उभौ--दोनों को, दुर्योधन तथा भीम को; हृष्टा--देखकर; संरब्धौ--क्रुद्ध;: विजयब--जीत;एपिणौ--के लिए प्रयलशील; मण्डलानि--चक्र, गोले; विचित्राणि--कलात्मक; चरन्तौ--घूमते हुए; इृदम्--यह;अब्रवीत्ू-कहा।
बलराम ने देखा कि दुर्योधन तथा भीम अपने अपने हाथों में गदा लिए कलात्मक ढंग सेचक्कर लगाते क्रोध से भरे हुए एक-दूसरे पर विजय पाने के लिए प्रयलशील हैं।
भगवान् ने उन्हेंइस प्रकार सम्बोधित किया।
युवां तुल्यबलौ वीरौ हे राजन्हे वृकोदर ।
एकं प्राणाधिकं मन्ये उतैकं शिक्षयाधिकम् ॥
२६॥
युवाम्--तुम दोनों; तुल्य--समान; बलौ--बल या पौरुष में; वीरौ--योद्धा; हे राजन्ू--हे राजन् ( दुर्योधन ); हे वृकोदर--हेभीम; एकम्--एक; प्राण--जीवनी-शक्ति में; अधिकम्ू--अधिक; मन्ये--मानता हूँ; उत--दूसरी ओर; एकम्--एक;शिक्षया--प्रशिक्षण में; अधिकम्--बढ़कर।
बलरामजी ने कहा : हे राजा दुर्योधन, हे भीम, सुनो तो, तुम दोनों योद्धा युद्ध-बल मेंसमान हो।
मैं जानता हूँ कि तुम दोनों में से एक में शारीरिक बल अधिक है, जबकि दूसरा कलामें अधिक प्रशिक्षित है।
तस्मादेकतरस्येह युवयो: समवीर्ययो: ।
न लक्ष्यते जयोन्यो वा विरमत्वफलो रण: ॥
२७॥
तस्मात्ू--इसलिए; एकतरस्थ--दोनों में से किसी एक का; इह--यहाँ; युवयो: --तुम दोनों का; सम--तुल्य; वीर्ययो: --पौरुषवाले; न लक्ष्यते--दिखाई नहीं पड़ता; जय:--विजय; अन्य:--विपरीत ( हार ); वा--अथवा; विरमतु--रुक जाना चाहिए;अफलः-यर्थ; रण:--युद्ध
चूँकि तुम दोनों युद्ध-बल में बिल्कुल एक-जैसे हो अतः मेरी समझ में नहीं आ रहा है किइस द्वन्द्व में तुम में से कोई कैसे जीतेगा या हारेगा।
अतएवं कृपा करके इस व्यर्थ के युद्ध कोबन्द कर दो।
न तद्वाक्यं जगृहतुर्बद्धवैरो नृपार्थवत् ।
अनुस्मरन्तावन्योन्यं दुरुक्त दुष्कृतानिच ॥
२८॥
न--नहीं; तत्--उसके ; वाक्यम्--शब्दों को; जगृहतु:--दोनों ने स्वीकार किया; बद्ध--स्थिर; वैरौ--शत्रुता; नृप--हे राजा( परीक्षित ); अर्थ-बत्--विवेकशील; अनुस्मरन्तौ--स्मरण रखते हुए; अन्योन्यम्--एक-दूसरे को; दुरुक्तम्ू--कदु वचन;दुष्कृतानि--दुष्कर्म; च--भी
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : हे राजन्, तर्कपूर्ण होने पर भी बलरामजी के अनुरोधको उन दोनों ने स्वीकार नहीं किया, क्योंकि उनकी पारस्परिक शत्रुता कट्टर थी।
वे दोनों हीएक-दूसरे पर किये गये अपमानों तथा आघातों को निरन्तर स्मरण करते आ रहे थे।
दिष्टे तदनुमन्वानो रामो द्वारवर्ती ययौ ।
उग्रसेनादिभि: प्रीतैज्ञातिभि: समुपागतः ॥
२९॥
दिष्टमू-- भाग्य को; तत्ू--उस; अनुमन्वान: --निश्चित करते हुए; राम:--बलरामजी; द्वारवतीम्ू--द्वारका; ययौ-- चले गये;उग्रसेन-आदिभि: --उग्रसेन इत्यादि द्वारा; प्रीते:--प्रफुल्लित; ज्ञातिभि:--अपने पारिवारिक जनों द्वारा; समुपागतः --सत्कारकिया गया।
इस निष्कर्ष पर पहुँचते हुए कि युद्ध विधाता द्वारा आयोजित होता है, बलरामजी द्वारकालौट गये।
वहाँ उग्रसेन ने तथा उनके अन्य सम्बन्धियों ने उनका स्वागत किया, जो सभी उन्हेंदेखकर प्रफुल्लित थे।
तं पुनर्नैंमिषं प्राप्तमृषयोयाजयन्मुदा ।
क्रत्वड़ं क्रतुभि: सर्वर्निवृत्ताखिलविग्रहम् ॥
३०॥
तम्--उसको, बलराम को; पुन:ः--फिर; नैमिषम्--नैमिषारण्य; प्राप्तम्--पहुँचे हुए; ऋषय:--ऋषिगण; अयाजयन्--वैदिकयज्ञ में व्यस्त; मुदा--प्रसन्नतापूर्वक; क्रतु--समस्त यज्ञों के; अड्रमू--अंगस्वरूप; क्रतुभिः--अनुष्ठानों से; सर्वै:--सभी प्रकारके; निवृत्त--परित्यक्त किया गया; अखिल--समस्त; विग्रहम्-युद्ध
बाद में बलरामजी नैमिषारण्य लौट आये, जहाँ ऋषियों ने समस्त यज्ञों के साक्षात् रूप उन्हेंप्रसन्नतापूर्वक विविध प्रकार के वैदिक यज्ञों को सम्पन्न करने में लगा दिया।
अब बलरामजीसमस्त युद्धों से निवृत्ति प्राप्त कर चुके थे।
तेभ्यो विशुद्धं विज्ञानं भगवान्व्यतरद्विभु: ।
येनैवात्मन्यदो विश्वमात्मानं विश्वगं विदु: ॥
३१॥
तेभ्य:--उन्हें; विशुद्धमू--एकदम शुद्ध; विज्ञानमू--दैवी ज्ञान; भगवानू-- भगवान् ने; व्यतरत्--प्रदान किया; विभु:--सर्वशक्तिमान; येन--जिससे; एव--निस्सन्देह; आत्मनि--अपने भीतर; अद:--यह; विश्वम्--ब्रह्माण्ड; आत्मानम्--अपने को;विश्व-गमू्--ब्रह्माण्ड में व्याप्त; विदु:--वे अनुभव कर सके
सर्वशक्तिमान भगवान् बलराम ने ऋषियों को शुद्ध आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान किया, जिससेवे सभी बलरामजी के भीतर सारे ब्रह्माण्ड को देख सकें और यह भी देख सकें कि वे हर वस्तुमें समाये हुए हैं।
स्वपत्यावभूथस्नातो ज्ञातिबन्धुसुहृद्दृतः ।
रेजे स्वज्योत्स्नयेवेन्दु: सुवासा: सुप्ठवलड्डू तः ॥
३२॥
स्व--अपनी; पत्या--पत्ती सहित; अवभूथ--यज्ञ-दीक्षा के अन्त का सूचक अवभृथ अनुष्ठान; स्नात:--स्नान किये हुए;ज्ञाति--अपने निकट सम्बन्धियों द्वारा; बन्धु--अन्य सम्बन्धीजन; सुहत्--तथा मित्रगण; वृत:--घिरे हुए; रेजे-- भव्य लग रहेथे; स्व-ज्योत्स्नया--अपनी ही किरणों समेत; इब--सहृश; इन्दु:--चन्द्रमा; सु--सुन्दर; वासा: -- वस्त्र पहने; सुष्ठ--सुन्दर;अलड्डू त:--सजे हुए
अपनी पत्नी के साथ अवशभ्ृथ स्नान करने के बाद सुन्दर वस्त्रों से सज्नित और अलंकारों सेविभूषित तथा अपने निकट सम्बन्धियों, अन्य परिवार वालों एवं मित्रों से घिरे बलरामजी ऐसेभव्य लग रहे थे, मानो तेजयुक्त अपनी किरणों से घिरा हुआ चन्द्रमा हो।
ईहृग्विधान्यसड्ख्यानि बलस्य बलशालिन: ।
अनन्तस्याप्रमेयस्य मायामर्त्यस्य सन्ति हि ॥
३३॥
ईहक्-विधानि--इस प्रकार के; असड्ख्यानि--अनगिनत; बलस्य--बलराम के; बल-शालिन: --बलशाली; अनन्तस्य--अनन्त; अप्रमेयस्थ--अप्रमेय, असीम; माया-- अपनी माया-शक्ति द्वारा; मर्त्यस्य--मर्त्यों के; सन्ति--हैं; हि--निस्सन्देह।
उन अनन्त तथा अप्रमेय बलशाली भगवान् बलराम द्वारा असंख्य अन्य लीलाएँ सम्पन्न कीगईं, जो अपनी योगमाया से मनुष्य के रूप में दिखते हैं।
योअनुस्मरेत रामस्य कर्माण्यद्भधुतकर्मण: ।
सायं प्रातरनन्तस्य विष्णो: स दयितो भवेत् ॥
३४॥
यः--जो भी; अनुस्मरेत--नियमित रूप से; रामस्य--बलराम के; कर्माणि--कार्यकलाप; अद्भुत--आश्चर्यजनक; कर्मण:--जिनके सारे कर्म; सायम्ू--सायंकाल; प्रात:ः--प्रात:ः:काल; अनन्तस्थ-- अनन्त के; विष्णो: --विष्णु का; सः--वह; दबित:--प्रिय; भवेत्ू--बन जाता है |
अनन्त भगवान् बलराम के सारे कार्यकलाप चकित कर देने वाले हैं।
जो कोई भी प्रातःतथा सायं उनका निरन्तर स्मरण करता है, वह भगवान् श्री विष्णु का अत्यन्त प्रिय बन जाता है।
