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अध्याय तिहत्तरवाँ: भगवान कृष्ण मुक्त राजाओं को आशीर्वाद देते हैं

10.73श्रीशुक उबाच अयुते द्वे शतान्यष्टी निरुद्धा युधि निर्जिता: ।

ते निर्गता गिरिद्रोण्यां मलिना मलवासस: ॥

१॥

क्षुक्षामा: शुष्कवदना: संरोधपरिकर्शिता: ।

दहशुस्ते घनश्यामं पीतकौशेयवाससम्‌ ॥

२॥

श्रीवत्साडुं चतुर्बाहुं पद्मगर्भारुणे क्षणम्‌ ।

चारुप्रसन्नवदनं स्फुरन्मकरकुण्डलम्‌ ॥

३॥

पद्दाहस्तं गदाशड्डु रथाड्रैरुपलक्षितम्‌ ।

किरीटहारकटककटिसूत्राडुदाश्चितम्‌ ॥

४॥

भ्राजद्दरमणिग्रीवं निवीतं वनमालया ।

पिबन्त इव चन्षुर्भ्या लिहन्त इव जिह्या ॥

५॥

जिप्रन्त इव नासाभ्यां रम्भन्त इव बाहुभि: ।

प्रणेमुहतपाप्मानो मूर्थभि: पादयोहरे: ॥

६॥

श्री-शुक: उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; अयुते--दस हजार; द्वे--दो; शतानि--सौ; अष्टौ--आठ; निरुद्धा:--बन्दीबनाये गये; युधि--युद्ध में; निर्जिता:--पराजित; ते--वे; निर्गता:--बाहर आये ; गिरिद्रोण्यामू--जरासन्ध की राजधानीगिरिद्रोणी के किले से; मलिना:--गन्दे; मल--मलिन; वासस: --जिनके वस्त्र; क्षुत्‌ू-- भूख से; क्षामा:--दुर्बल; शुष्क --सूखे;बदना:--मुख; संरोध--बन्धन से; परिकर्शिता: -- अत्यधिक क्षीण; ददशु:--देखा; ते--उन्होंने; घन--बादल की तरह;श्यामम्‌--गहरा नीला; पीत--पीला; कौशेय--रेशम का; वाससम्‌--वस्त्र वाले; श्रीवत्स-- श्रीवत्स नामक चिह्न द्वारा;अड्डम्‌ू--चिन्हित; चतु:--चार; बाहुमू-- भुजाओं वाले; पद्म--कमल के; गर्भ--कोश जैसा; अरुण--गुलाबी; ईक्षणम्‌--आँखें; चारु--मनोहर; प्रसन्न--तथा प्रसन्न; वदनम्‌ू--मुख; स्फुरतू--चमकते; मकर--मगर की आकृति के; कुण्डलमू--कुण्डलों को; पदा--कमल; हस्तम्‌-हाथ में; गदा--गदा; शद्भु--शंख; रथ-अच्डभैः--तथा चक्र से; उपलक्षितम्‌-पहचानेगये; किरीट--मुकुट; हार--रलजटित गले की माला; कटक--सोने के कड़े; कटि-सूत्र--करधनी; अड्भद--तथा बाजूबन्द;अज्धितम्‌--सुसज्जित; भ्राजत्‌--चमकीले; वर--सुन्दर; मणि--कौस्तुभ-मणि; ग्रीवम्‌-गर्दन में; निवीतम्‌--लटकते; वन--जंगली फूलों की; मालया--माला से; पिबन्त: --पीते हुए; इब--मानो; चश्षु्भ्याम्‌--अपनी आँखों से; लिहन्तः--चाटते हुए;इब--मानो; जिहया-- अपनी जीभों से; जिप्रन्त:ः--सूँघते हुए; इब--मानो; नासाभ्याम्‌-- अपने नथुनों से; रम्भन्त:--आलिंगनकरते हुए; इब--मानो; बाहुभि: --अपनी भुजाओं से; प्रणेमु;--झुक कर प्रणाम किया; हत--नष्ट; पाप्मान: --पाप समूह;मूर्थभि: --अपने सिरों से; पादयो:--चरणों पर; हरेः--भगवान्‌ कृष्ण के

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जरासन्ध ने २०,८०० राजाओं को युद्ध में पराजित करके उन्हेंबन्दीखाने में डाल दिया था।

जब ये राजा गिरिद्रोणी किले से बाहर आये, तो वे मलिन लग रहेथे और मैले वस्त्र पहने हुए थे।

वे भूख के मारे दुबले हो गए थे, उनके चेहरे सूख गये थे औरदीर्घकाल तक बन्‍्दी रहने से अत्यधिक कमजोर हो गये थे।

तब राजाओं ने भगवान्‌ को अपने समक्ष देखा।

उनका रंग बादल के समान गहरा नीला थाऔर वे पीले रेशम का वस्त्र पहने थे।

वे अपने वक्षस्थल पर श्रीवत्स चिन्ह, अपने चार विशालभुजाओं, कमल के कोश जैसी गुलाबी रंग की आँखों, अपने सुन्दर हँसमुख चेहरे, अपनेचमकते मकर कुण्डलों तथा हाथों में कमल, गदा, शंख तथा चक्र धारण करने से पहचाने जातेथे।

उनके शरीर में मुकुट, रलजटित गले की माला, सुनहरी करधनी, सुनहले कड़े तथाबाजूबन्द सुशोभित थे और वे अपने गले में चमकीली, मूल्यवान कौस्तुभ मणि तथा जंगली'फूलों की माला पहने थे।

सारे राजा मानो अपनी आँखों से उनके सौन्दर्य का पान कर रहे थे,अपनी जीभों से उन्हें चाट रहे थे, अपने नथुनों से उनकी सुगन्धि का आस्वादन कर रहे थे औरअपनी भुजाओं से उनका आलिंगन कर रहे थे।

अब उनके विगत पापों का उन्मूलन हो चुका था।

राजाओं ने भगवान्‌ हरि के चरणों पर अपने अपने शीश रख कर उन्हें प्रणाम किया।

कृष्णसन्दर्शनाह्लाद ध्वस्तसंरोधनक्लमा: ।

प्रशशंसुईषीकेशं गीर्मि: प्राज्ललयो नृपा: ॥

७॥

कृष्ण-सन्दर्शन-- भगवान्‌ कृष्ण के दर्शन से; आह्वाद-प्रसन्नता; ध्वस्त--उन्मूलित; संरोधन--बन्दी होने के; क्लमा:-- थकान;प्रशशंसु:-- प्रशंसा की; हषीका-ईशम्‌--इन्द्रियों के परम स्वामी को; गीर्भि:--अपने शब्दों में; प्राज्ललय:--हाथ जोड़े; नृपा: --राजागण

भगवान्‌ कृष्ण को देखने के आनन्द से उनके बन्दी होने की थकावट दूर हो जाने पर सारेराजा हाथ जोड़ कर खड़े हो गये और उन्होंने हषीकेश की प्रशंसा की।

राजान ऊचु:नमस्ते देवदेवेश प्रपन्नार्तिहराव्यय ।

प्रपन्नान्पाहि न: कृष्ण निर्विण्णान्घोरसंसृते: ॥

८ ॥

राजान: ऊचुः--राजाओं ने कहा; नमः--नमस्कार; ते--आपको; देव--देवताओं के; देव--स्वामियों के; ईश--हे परमेश्वर;प्रपन्न--शरणागतों के; आर्ति--क्लेश के; हर--हे हरने वाले; अव्यय--हे अव्यय; प्रपन्नान्‌ू--शरणागत; पाहि--बचाइये;नः--हमको; कृष्ण--हे कृष्ण; निर्विण्णानू--निराशों को; घोर-- भीषण; संसूते: --संसार से |

राजाओं ने कहा : हे शासनकर्ता देवताओं के स्वामी, हे शरणागत भक्तों के क्लेश को नष्टकरने वाले, हम आपको नमस्कार करते हैं।

चूँकि हमने आपकी शरण ग्रहण की है, अतः हेअव्यय कृष्ण, हमें इस विकट भौतिक जीवन से बचाइये, जिसने हमें इतना निराश बना दिया है।

नैन॑ नाथानुसूयामो मागधं मधुसूदन ।

अनुग्रहो यद्धवतो राज्ञां राज्यच्युतिर्विभो ॥

९॥

न--नहीं; एनमू--यह; नाथ--हे स्वामी; अनुसूयाम:--दोष निकालते हैं; मागधम्‌--मगध के राजा को; मधुसूदन--हे कृष्ण;अनुग्रह:--कृपा; यत्‌-- चूँकि; भवत:-- आपका; राज्ञामू--राजाओं के; राज्य--राज्य से; च्युतिः--पतन; विभो--हेसर्वशक्तिमान।

हे प्रभु मधुसूदन, हम इस मगधराज को दोष नहीं देते क्योंकि वास्तव में यह तो आपकीकृपा है कि हे विभु, सारे राजा अपने राज-पद से नीचे गिरते हैं।

राज्यैश्वर्यमदोन्नद्धो न श्रेयो विन्दते नृपः ।

त्वन्मायामोहितोनित्या मन्यते सम्पदोड्चला: ॥

१०॥

राज्य--राज्य; ऐश्वर्य--तथा ऐश्वर्य से; मद--नशे से; उन्नद्ध:--वश में न आकर; न--नहीं; श्रेयः:--असली लाभ; विन्दते--प्राप्त करते हैं; नृप:--राजा; त्वत्‌--आपकी; माया--मायाशक्ति से; मोहित:--मोहित; अनित्या: -- क्षणिक; मन्यते--सोचताहै; सम्पदः--सम्पत्ति; अचला: --स्थायी |

अपने ऐश्वर्य तथा शासनशक्ति के मद से चूर राजा आत्मसंयम खो देता है और अपनाअसली कल्याण प्राप्त नहीं कर सकता।

इस तरह आपकी मायाशक्ति से मोहग्रस्त होकर वहअपनी क्षणिक सम्पदा को स्थायी मान बैठता है।

मृगतृष्णां यथा बाला मन्यन्त उदकाशयम्‌ ।

एवं वैकारिकीं मायामयुक्ता वस्तु चक्षते ॥

११॥

मृग-तृष्णाम्‌--मृगतृष्णा; यथा--जिस तरह; बाला: --बच्चों जैसी बुद्धि वाले व्यक्ति; मन्यन्ते--विचार करते हैं; उदक--जलके; आशयम्‌--आगार को; एवम्‌--उसी तरह; वैकारिकीम्‌--विकारों के अधीन; मायाम्‌--माया को; अयुक्ता:--विवेकहीन;वस्तु--चीज जैसा; चक्षते--दिखता है

जिस तरह बालबुद्धि वाले लोग मरूस्थल में मृगतृष्णा को जलाशय मान लेते हैं, उसी तरहजो अविवेकी हैं, वे माया के विकारों को वास्तविक मान लेते हैं।

वबयं पुरा श्रीमदनष्टदृष्टयोजिगीषयास्या इतरेतरस्पृध: ।

घ्नन्तः प्रजा: सवा अतिनिर्ध॒णा: प्रभोमृत्युं पुरस्त्वाविगणय्य दुर्मदा: ॥

१२॥

त एव कृष्णाद्य गभीररंहसादुरन्तेवी्येण विचालिता: थ्रिय: ।

कालेन तन्वा भवतोनुकम्पयाविनष्टदर्पा श्ररणौ स्मराम ते ॥

१३॥

वयमू्‌--हम; पुरा--इसके पूर्व; श्री--ऐश्वर्य के; मद--नशे से; नष्ट--विनष्ट; दृष्टय:ः--जिसकी दृष्टि; जिगीषया--जीतने कीइच्छा से; अस्या:--इस ( पृथ्वी ); इतर-इतर--एक-दूसरे से; स्पृध:--लड़ते-झगड़ते; घ्नन्त:-- आक्रमण करते; प्रजा:--नागरिक; स्वा:--अपना, निजी; अति--अत्यधिक; निर्घणा: --क्रूर; प्रभो--हे प्रभु; मृत्युम्‌ू--मृत्यु को; पुर:--समक्ष; त्वा--आपको; अविगणय्य--परवाह न करके; दुर्मदा:--उद्धत; ते--वे ( हमीं ); एब--निस्सन्देह; कृष्ण --हे कृष्ण; अद्य--अब;गभीर--रहस्यमय; रंहसा--गतिशीलता; दुरन्त--दुर्दम; वीर्येण--बल से; विचालिता:--चले जाने के लिए बाध्य हुए;भ्रियः--हमारे ऐश्वर्य से; कालेन--समय से; तन्वा--आपका साकार रूप; भवतः--आपकी; अनुकम्पया--कृपा से; विनष्ट--विनष्ट; दर्पा:--जिनके गर्व; चरणौ--दो पाँवों को; स्मराम--स्मरण करें; ते--तुम्हारे |

इसके पूर्व धन के मद से अन्धे होकर हमने इस पृथ्वी को जीतना चाहा था और इस तरह हमअपनी ही प्रजा को क्रूरतापूर्वक यातना देते हुए विजय पाने के लिए एक-दूसरे से लड़ते रहे।

हेप्रभु, हमने दम्भ में आकर अपने समक्ष मृत्यु रूप में उपस्थित आपका अनादर किया।

किन्तु हेकृष्ण, अब आपका वह शक्तिशाली स्वरूप जो काल कहलाता है और रहस्यमय ढंग से तथादुर्दम रूप में गतिशील है उसने हमसे हमारे ऐश्वर्य छीन लिये हैं।

चूँकि अब आपने दया करकेहमारे गर्व को नष्ट कर दिया है, अतएवं हमारी आपसे याचना है कि हम केवल आपकेचरणकमलों का स्मरण करते रहें।

अथो न राज्यम्मृगतृष्णिरूपितंदेहेन शश्वत्पतता रुजां भुवा ।

उपासितव्यं स्पृहयामहे विभोक्रियाफल प्रेत्य च कर्णरोचनम्‌ ॥

१४॥

अथ उ--इसके आगे; न--नहीं; राज्यम्‌--राज्य; मृग-तृष्णि--मृगतृष्णा की तरह; रूपितम्‌ू--प्रकट होने वाला; देहेन-- भौतिकशरीर से; शश्वत्‌--निरन्तर; पतता--मर्त्य; रुजाम्‌--रोगों के; भुवा--जन्मस्थान; उपासितव्यम्‌--सेवा किये जाने के लिए;स्पृहयामहे-- हम लालायित रहते हैं; विभो--हे सर्वशक्तिमान; क्रिया--पुण्यकार्य का; फलमू--फल; प्रेत्य--अगले जन्म मेंजाकर; च--तथा; कर्ण--कानों के लिए; रोचनम्‌--लोभ

अब हम कभी भी मृगतृष्णा तुल्य ऐसे राज्य के लिए लालायित नहीं होंगे जो इस मर्त्य शरीरद्वारा सेवित हो वह शरीर जो रोग तथा कष्ट का कारण हो और प्रत्येक क्षण क्षीण होने वाला हो।

हे विभु, न ही हम अगले जन्म में पुण्यकर्म के दिव्य फल भोगने की लालसा रखेंगे, क्योंकि ऐसे'फलों का वायदा कानों के लिए रिक्त बहलावे के समान है।

त॑ नः समादिशोपायं येन ते चरणाब्जयो: ।

स्मृतिर्यथा न विरमेदपि संसरतामिह ॥

१५॥

तम्‌--उसको; न:--हमको; समादिश--कृपया आदेश दें; उपायम्‌--उपाय; येन--जिससे; ते--तुम्हारे; चरण--चरणों के;अब्जयो:--कमल सहश; स्मृतिः--याद; यथा--जिस तरह; न विरमेत्‌--रुके नहीं; अपि-- भी; संसरताम्‌ू--जन्म-मृत्यु के चक्रमें घूम रहे हैं, जो, उनके लिए; इह--इस संसार में

कृपया हमें बतलाएँ कि हम किस तरह आपके चरणकमलों का निरन्तर स्मरण कर सकें,यद्यपि हम इस संसार में जन्म-मृत्यु के चक्र में घूम रहे हैं।

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ।

प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः ॥

१६॥

कृष्णाय--कृष्ण के प्रति; वासुदेवाय--वसुदेव के पुत्र के प्रति; हरये-- भगवान्‌ हरि के प्रति; परम-आत्मने--परमात्मा;'प्रणत--शरणागत; क्लेश--कष्ट के; नाशाय--नष्ट करने वाले के प्रति; गोविन्दाय--गोविन्द के प्रति; नमः नमः --बारम्बारनमस्कार।

हम वसुदेव के पुत्र भगवान्‌ कृष्ण अर्थात्‌ हरि को बारम्बार नमस्कार करते हैं।

वह परमात्मागोविन्द उन सबों के कष्टों को दूर कर देता है, जो उनकी शरण में जाते हैं।

श्रीशुक उबाचसंस्तूयमानो भगवात्राजभिर्मुक्तबन्धने: ।

तानाह करुणस्तात शरण्य: एलक्ष्णया गिरा ॥

१७॥

श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; संस्तूयमाण:--अत्यन्त प्रशंसा किये जा रहे; भगवान्‌-- भगवान्‌ ने; राजभि: --राजाओं द्वारा; मुक्त--मुक्त किये गये; बन्धनै:--बन्धन से; तानू--उनसे; आह--कहा; करुण: --दयालु; तात--हे प्रिय ( राजापरीक्षित ); शरण्य: --शरण देने वाले; शलक्ष्णया--मधुर; गिरा--वाणी से

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस तरह बन्धन से मुक्त हुए राजाओं ने भगवान्‌ की खूब प्रशंसाकी।

तब हे परीक्षित, दयालु शरणदाता ने मधुर वाणी में उनसे कहा।

श्रीभगवानुवाचअद्य प्रभृति वो भूषा मय्यात्मन्यखिले श्वरे ।

सुद्दढा जायते भक्तिबाढ्माशंसितं तथा ॥

१८॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; अद्य प्रभूति--आज से; व: --तुम्हारा; भू-पा:--हे राजाओ; मयि--मुझमें; आत्मनि--आत्मा में; अखिल--समस्त; ई श्वरे--नियन्ता में; सु--अत्यन्त; दृढा--स्थिर; जायते--उत्पन्न होगी; भक्ति: -- भक्ति; बाढम्‌--निश्चित रूप से; आशंसितम्‌--अभीष्ट; तथा--उसी तरह।

भगवान्‌ ने कहा : हे राजाओ, आज से तुम लोगों को मुझ परमात्मा तथा ईश्वर में ढ़ भक्ति प्राप्त होगी।

मैं विश्वास दिलाता हूँ कि तुम जैसे चाहोगे वैसे ही यह भक्ति चलती रहेगी।

दिष्टदय्या व्यवसितं भूपा भवन्त ऋतभाषिण: ।

श्रीयैश्वर्यमदोन्नाहं पश्य उन्मादकं नृणाम्‌ ॥

१९॥

दिछ्या--भाग्यवान; व्यवसितम्‌--संकल्प; भूपा: --हे राजाओ; भवन्त:--आप लोग; ऋत--सच सच; भाषिण:--बोलनेवाले; श्री--सम्पत्ति; ऐश्वर्य--तथा शक्ति के; मद--नशे में; उन्नाहमू--संयम का अभाव; पश्ये--देखता हूँ; उन्‍्मादकम्‌--मतवाला बनाते हुए; नृणाम्‌--मनुष्यों के लिए।

हे राजाओ, सौभाग्यवश तुम लोगों ने सही निर्णय किया है और जो कुछ कहा है, वह सचहै।

मैं देख रहा हूँ कि मनुष्यों में आत्मसंयम के अभाव से जो कि ऐश्वर्य तथा शक्ति के मद केकारण उत्पन्न होता है, मादकता ही आती है।

हैहयो नहुषो वेणो रावणो नरकोपरे ।

श्रीमदादभ्रंशिताः स्थानाहेवदैत्यनरेश्वरा: ॥

२०॥

हैहयः नहुष: वेण:--हैहय ( कार्तवीर्य ), नहुष तथा वेण; रावण: नरक:--रावण तथा नरक; अपरे--तथा अन्य; श्री--ऐश्वर्य केकारण; मदात्‌--अपने नशे के कारण; भ्रंशिता:--नीचे गिराये गये; स्थानात्‌ू--अपने पदों से; देव--देवताओं के; दैत्य--असुरों के; नर--मनुष्यों के; ईश्वराः:--शासकगण।

हैहय, नहुष, वेण, रावण, नरक तथा देवताओं, पुरुषों और असुरों के अन्य अनेक शासकअपने अपने ऊँचे पदों से इसीलिए नीचे गिरे, क्योंकि वे भौतिक ऐश्वर्य से मदोन्मत्त हो उठे थे।

भवन्त एतद्विज्ञाय देहाद्ुत्पाद्यमन्तवत्‌ ॥

मां यजन्तोध्वरैर्युक्ता: प्रजा धर्मेण रक्ष्यथ ॥

२१॥

भवन्त:--आप लोग; एतत्‌--यह; विज्ञाय--जान कर; देह-आदि-- भौतिक शरीर तथा अन्य बातें; उत्पाद्यमू--जन्म के अधीन;अन्त-वत्‌--अन्त होने वाला; मामू--मुझको; यजन्तः -- पूजा करते हुए; अध्वरैः:--वैदिक यज्ञों के द्वारा; युक्ता:--विमल बुद्धिसे युक्त; प्रजा:--अपनी प्रजा की; धर्मेण-- धार्मिक सिद्धान्तों के अनुसार; रक्ष्यथ--रक्षा करनी चाहिए

यह समझते हुए कि यह भौतिक शरीर तथा इससे सम्बद्ध हर वस्तु का आदि तथा अन्त है,वैदिक यज्ञों के द्वारा मेरी पूजा करो और धर्म के सिद्धान्तों के अनुसार विमल बुद्धि से अपनीप्रजा की रक्षा करो।

सन्तन्वन्तः प्रजातन्तून्सुखं दुःखं भवाभवौ ।

प्राप्तं प्राप्त च सेवन्तो मच्चित्ता विचरिष्यथ ॥

२२॥

सन्तन्वन्तः--उत्पन्न करते हुए; प्रजा--सन्तान के; तन्तूनू--रेशे ( पीढ़ियाँ ); सुखम्‌--सुख; दुःखम्‌--दुख; भव--जन्म;अभवौ--तथा मृत्यु; प्राप्तम्‌ प्राप्तम्‌--ज्यों ज्यों सामना पड़े; च--तथा; सेवन्त:--स्वीकार करते हुए; मत्‌-चित्ता: --मुझ परअपने मन को स्थिर करके; विचरिष्यथ--इधर-उधर विचरण करना चाहिए

सन्‍तान की पीढ़ियों की पीढ़ियाँ उत्पन्न करते तथा सुख-दुख, जन्म एवं मृत्यु का सामनाकरते तुम लोग जीवन बिताते समय सदैव अपने मनों को मुझ पर स्थिर रखना।

उदासीनाश्च देहादावात्मारामा धृतब्रता: ।

मय्यावेश्य मनः सम्यड्मामन्ते ब्रह्म यास्यथ ॥

२३॥

उदासीना: --अन्यमनस्क; च--तथा; देह-आदौ--शरीर इत्यादि के प्रति; आत्म-आरामा:--आत्मतुष्ट; धृत--हढ़ता से पकड़ेहुए; ब्रता:--अपने ब्रतों को; मयि--मुझ में; आवेश्य--एकाग्र करके; मन:--मन को; सम्यक्‌--पूर्णरूपेण; मामू--मुझको;अन्ते--अन्त में; ब्रह्य-- परम सत्य; यास्यथ--प्राप्त करोगे |

शरीर तथा उससे सम्बद्ध हर वस्तु से विरक्त हो जाओ।

आत्मतुष्ट रह कर अपने मन कोमुझमें एकाग्र करते हुए अपने ब्रतों का हढ़ता से पालन करो।

इस तरह तुम लोग अन्त में मुझपरम सत्य को प्राप्त कर सकोगे।

श्रीशुक उबाचइत्यादिश्य नृपान्कृष्णो भगवान्भुवने श्वर: ।

तेषां न्ययुड्डः पुरुषान्स्त्रियो मज्जनकर्मणि ॥

२४॥

श्री-शुक: उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; आदिश्य--आदेश देकर; नृपान्‌--राजाओं को; कृष्ण: --कृष्ण; भगवान्‌-- भगवान्‌; भुवन--सारे लोकों के; ईश्वर: --स्वामी; तेषाम्‌--उनके; न्ययुद्ध --लगाया; पुरुषानू--सेवकों ;स्त्रियः--तथा स्त्रियों को; मजन--धोने के; कर्मणि--काम में।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार राजाओं को आदेश देकर समस्त लोकों के परमस्वामी भगवान्‌ कृष्ण ने समस्त सेवकों तथा सेविकाओं को उन्हें स्नान कराने तथा सँवारने केकाम में लगा दिया।

सपर्या कारयामास सहदेवेन भारत ।

नरदेवोचितैर्वस्त्रैभूषणै: सत्रग्विलेपनै: ॥

२५॥

सपर्यामू--सेवा; कारयाम्‌ आस--करवाई; सहदेवेन--जरासन्ध के पुत्र सहदेव से; भारत--हे भरतवंशी; नर-देव--राजागण;उचितैः--अनुकूल; वस्त्रैः--वस्त्रों से; भूषणैः:--गहनों से; स्रकु--फूल-मालाओं से; विलेपनै:--तथा चन्दन-लेप से ।

हे भारत, तब भगवान्‌ ने राजा सहदेव से वस्त्र, आभूषण, मालाएँ तथा चन्दन-लेप आदिराजोचित भेंटें दिलाकर उन राजाओं का सम्मान कराया।

भोजयित्वा वरान्नेन सुस्नातान्समलड्डू तान्‌ ।

भोगैश्व विविधैर्युक्तांस्ताम्बूलाबनपोचितै: ॥

२६॥

भोजयित्वा-- भोजन कराकर; वर--उत्तम; अन्नेन-- भोजन से; सु--उचित ढंग से; स्नातानू--नहलाये; समलहड्डू तानू--सुसज्जित; भोगैः--भोग की सामग्रियों से; च--तथा; विविधै:--विविध; युक्तान्‌-- प्रदत्त; ताम्बूल--पान; आद्यि:--इत्यादि;नृप--राजाओं के लिए; उचितैः--उचित |

जब वे सब भलीभाँति नहा चुके और सज-धज गये तो भगवान्‌ कृष्ण ने उनके लिए उत्तमभोजन की व्यवस्था कराईं।

उन्होंने उन सबों को राजोचित वस्तुएँ यथा पान इत्यादि वस्तुएँ भीभेंट कीं।

ते पूजिता मुकुन्देन राजानो मृष्ठकुण्डला: ।

विरेजुर्मोचिता: क्लेशात्प्रावृडन्ते यथा ग्रहा: ॥

२७॥

ते--वे; पूजिता: --सम्मानित; मुकुन्देन--कृष्ण द्वारा; राजान:--राजागण; मृष्ट--चमकते; कुण्डला:--कुण्डलों वाले;विरेजु:--भव्य लगते थे; मोचिता:--छुड़ाये गये; क्लेशात्‌--कष्ट से; प्रावृट्‌ू--वर्षा ऋतु के; अन्ते--अन्त में; यथा--जिसतरह; ग्रहाः--लोक ( यथा चन्द्रमा )

भगवान्‌ मुकुन्द द्वारा सम्मानित किये गये एवं कष्ट से मुक्त हुए राजागण अपने कानों केचमकते कुण्डलों सहित वैसे ही शोभायमान हुए जिस तरह वर्षा ऋतु की समाप्ति पर आकाश मेंचन्द्रमा तथा अन्य ग्रह खूब चमकने लगते हैं।

रथान्सदश्चानारोप्य मणिकाञझ्जनभूषितान्‌ ।

प्रीणय्य सुनृतैर्वाक्यै: स्वदेशान्प्रत्ययापयत्‌ ॥

२८॥

रथान्‌--रथों पर; सत्‌ू--उत्तम; अश्वान्‌ू--घोड़ों सहित; आरोप्य--चढ़ाकर; मणि--रतल; काझ्लन--तथा सोना; भूषितान्‌ू--सुसज्जित; प्रीणय्य--तुष्ट करके ; सुनृतैः--मधुर; वाक्यै: --शब्दों से; स्व--अपने अपने; देशान्‌--राज्यों को; प्रत्ययापयत्‌--वापस भेज दिया।

तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ ने उन राजाओं को सुन्दर घोड़ों से खींचे जाने वाले तथा रत्नों एवं स्वर्ण सेसुसज्जित रथों पर चढ़वाकर और मधुर शब्दों से प्रसन्न करके उन्हें उनके राज्यों में वापस भिजवादिया।

त एवं मोचिता: कृच्छात्कृष्णेन सुमहात्मना ।

ययुस्तमेव ध्यायन्तः कृतानि च जगत्पते: ॥

२९॥

ते--वे; एवम्‌--इस प्रकार; मोचिता:--मुक्त हुए; कृच्छात्‌--मुश्किल से; कृष्णेन--कृष्ण द्वारा; सु-महा-आत्मना--महापुरुष;ययु:--चले गये; तम्‌--उनको; एब--एकमात्र; ध्यायन्त:-- ध्यान करते; कृतानि--कार्यो को; च--तथा; जगत्‌-पते: --ब्रह्माण्ड के स्वामी के |

इस तरह पुरुषों में महानतम कृष्ण द्वारा सारे कष्टों से मुक्त किये गये राजागण विदा हुए औरजब वे जा रहे थे, तो वे एकमात्र उन ब्रह्माण्ड के स्वामी तथा उनके अदभुत कृत्यों के विषय मेंही सोच रहे थे।

जगदुः प्रकृतिभ्यस्ते महापुरुषचेष्टितम्‌ ।

यथान्वशासद्धगवांस्तथा अक्रुरतन्द्रिताः ॥

३०॥

जगदुः--बतलाया; प्रकृतिभ्य:--अपने मंत्रियों तथा अन्य संगियों से; ते--उन ( राजाओं ने ); महा-पुरुष--परम पुरुष के;चेष्टितम्‌--कार्यकलापों को; यथा--जिस तरह; अन्वशासत्‌--आदेश दिया; भगवान्‌--भगवान्‌ ने; तथा--उसी तरह; चक्र: --उन्होंने किया; अतन्द्रिता:--बिना किसी ढिलाई के

राजाओं ने जाकर अपने मंत्रियों तथा अन्य संगियों से वे सारी बातें बतलाईं जो भगवान्‌ नेकी थीं और तब उन्होंने जो जो आदेश दिये थे, उनका कर्मठता के साथ पालन किया।

जरासन्धं घातयित्वा भीमसेनेन केशवः ।

पार्थाभ्यां संयुतः प्रायात्सहदेवेन पूजित: ॥

३१॥

जरासन्धम्‌--जरासन्ध को; घातयित्वा--वध करवाकर; भीमसेनेन--भीमसेन द्वारा; केशव: --कृष्ण; पार्थाभ्यमू--पृथा केदोनों पुत्रों ( भीम तथा अर्जुन ) के; संयुत:--साथ साथ; प्रायात्‌ू-विदा हुए; सहदेवेन--सहदेव द्वारा; पूजित:--पूजा कियेजाकर।

भीमसेन द्वारा जरासन्ध का वध करवाकर, भगवान्‌ कृष्ण ने राजा सहदेव की पूजा स्वीकारकी और तब पृथा के दोनों पुत्रों के साथ विदा हुए।

गत्वा ते खाण्डवप्रस्थं शद्झान्दध्मुर्जितारयः ।

हर्षयन्तः स्वसुहृदो दुईदां चासुखावहा: ॥

३२॥

गत्वा--जाकर; ते--उन्होंने; खाण्डव-प्रस्थम्‌--इन्द्रप्रस्थ में; शट्जन्‌-- अपने अपने शंख; दशध्मु:--बजाये; जित--जीत कर;अरयः--शत्रु को; हर्षयन्त:--हर्षित करते; स्व--अपने; सुहृदः --शुभचिन्तकों; दुईदाम्‌--तथा शत्रुओं को; च--तथा;असुख--अप्रसन्नता; आवहा:--लाते हुए

जब वे इन्द्रप्रस्थ आ गये तो विजयी वबीरों ने अपने शंख बजाये, जिससे उनके शुभचिन्तकमित्रों को तो हर्ष हुआ, किन्तु उनके शत्रुओं को संताप पहुँचा।

तच्छत्वा प्रीतमनस इन्द्रप्रस्थनिवासिनः ।

मेनिरे मागधं शान्तं राजा चाप्तमनोरथ: ॥

३३॥

तत्‌--वह; श्रुत्वा--सुन कर; प्रीत--प्रसन्न; मनस:--मन में; इन्द्रप्रस्थ-निवासिन:--इन्द्रप्रस्थ के वासी; मेनिरि--समझ गये;मागधम्‌--जरासन्ध को; शान्तम्‌-- अन्त कर दिया; राजा--राजा ( युधिष्ठिर )।

च--तथा; आप्त--प्राप्त किया; मन:-रथ:ः --इच्छाएँउस ध्वनि को सुन कर इन्द्रप्रस्थ के निवासी अत्यन्त प्रसन्न हुए, क्योंकि वे समझ गये किमगध के राजा का अब अन्त कर दिया गया है।

राजा युधिष्ठिर ने अनुभव किया कि अब उनकेमनोरथ पूरे हो गये।

अभिवन्द्याथ राजानं भीमार्जुनजनार्दना: ।

सर्वमाश्रावयां चक्रुरात्मना यदनुष्ठितम्‌ ॥

३४॥

अभिवन्द्य--नमस्कार करके; अथ--तब; राजानम्‌--राजा को; भीम-अर्जुन-जनार्दना:-- भीम, अर्जुन तथा कृष्ण; सर्वम्‌ू--सारी बातें; आश्रावयाम्‌ चक्कु:--बतलाई; आत्मना--स्वयमेव; यत्‌--जो; अनुष्ठटितम्‌--सम्पन्न हुईं |

भीम, अर्जुन तथा जनार्दन ने राजा को प्रणाम किया और जो कुछ उन्होंने किया था, वहसब उनसे कह सुनाया।

निशम्य धर्मराजस्तत्केशवेनानुकम्पितम्‌ ।

आनन्दाश्रुकलां मुझन्प्रेमणा नोवाच किज्न ॥

३५॥

निशम्य--सुन कर; धर्म-राज:--धर्म के राजा, युधिष्टिर ने; तत्‌ू--वह; केशवेन--कृष्ण द्वारा; अनुकम्पितम्‌-- अनुकम्पा, कृपा;आनन्द--आनन्द के; अश्रु-कलाम्‌--अश्रु; मुझ्नन्‌--गिराते हुए; प्रेम्णा--प्रेमवश; न उबाच--नहीं कहा; किज्लन--कुछ भी

भगवान्‌ कृष्ण ने उन पर जो महती कृपा की थी उसका विवरण सुन कर धर्मराज नेभावातिरेक के अश्रु बहाये।

उन्हें इतने प्रेम का अनुभव हुआ कि वे कुछ भी नहीं कह पाये।

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