← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची
अध्याय बहत्तरवाँ: राक्षस जरासंध का वध
10.72श्रीशुक उवाचएकदा तु सभामध्य आस्थितो मुनिभिर्वृतः ।
ब्राह्मणै: क्षत्रियैवेश्यैर्श्रातृभिश्च युधिष्ठिर: ॥
१॥
आचार्य: कुलवृद्धैश्व ज्ञातिसम्बन्धिबान्धवै: ।
श्रुण्वतामेव चैतेषामाभाष्येदमुवाच ह ॥
२॥
श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एकदा--एक बार; तु--तथा; सभा--राजसभा के; मध्ये--बीच में;आस्थित:--आसीन; मुनिभि:ः--मुनियों द्वारा; वृत:--घिरे हुए; ब्राह्मणै: क्षत्रिय: वैश्यै:--ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा वैश्यों से;भ्रातृभि:-- भाइयों से; च--तथा; युधिष्ठिर: --युधिष्ठिर; आचार्य :--अपने गुरुओं से; कुल--परिवार के; वृद्धैः--बड़े-बूढ़ों से;च--भी; ज्ञाति--सगे; सम्बन्धि--सम्बन्धियों; बान्धवैः--तथा मित्रों से; श्रृण्वताम्--सुनते ही; एब--निस्सन्देह; च--तथा;एतेषाम्--सारे के सारे; आभाष्य--( कृष्ण को ) सम्बोधित करके; इृदम्--यह; उबाच ह--कहा।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : एक दिन जब राजा युध्रिष्ठिर राजसभा में प्रख्यात मुनियों,ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा वैश्यों तथा अपने भाइयों, गुरुओं, परिवार के बड़े-बूढ़ों, सगे-सम्बन्धियोंससुराल वालों तथा मित्रों से घिर कर बैठे हुए थे, तो उन्होंने भगवान् कृष्ण को सम्बोधित किया,जबकि दूसरे सभी व्यक्ति सुन रहे थे।
श्रीयुथिष्ठिर उबाचक्रतुराजेन गोविन्द राजसूयेन पावनी: ।
यक्ष्ये विभूतीर्भवतस्तत्सम्पादय न: प्रभो ॥
३॥
श्री-युधिष्टिर: उबाच-- श्री युधिष्ठिर ने कहा; क्रतु--मुख्य अग्नि यज्ञों के; राजेन--राजा; गोविन्द--हे कृष्ण; राजसूयेन--राजसूय से; पावनी:--पवित्र करने वाला; यक्ष्ये--मैं पूजा करना चाहता हूँ; विभूतीः--ऐश्वर्यशाली अंशों द्वारा; भवत:ः--आपकी; तत्--उस; सम्पादय--कृपया करने की अनुमति दें; नः--हमें; प्रभो--हे स्वामी |
श्री युथिष्ठिर ने कहा : हे गोविन्द, मैं आपके शुभ ऐश्वर्यशाली अंशों की पूजा वैदिक उत्सवोंके राजा, राजसूय यज्ञ द्वारा करना चाहता हूँ।
हे प्रभु, हमारे इस प्रयास को सफल बनायें।
त्वत्पादुके अविरतं परि ये चरन्तिध्यायन्त्यभद्रनशने शुच्चययो गृणन्ति ।
विन्दन्ति ते कमलनाभ भवापवर्ग-माशासते यदि त आशिष ईश नान्ये ॥
४॥
त्वतू--तुम्हारे; पादुके --खड़ाऊँ को; अविरतम्--निरन्तर; परि--पूर्णतया; ये--जो; चरन्ति--सेवा करते हैं; ध्यायन्ति-- ध्यानकरते हैं; अभद्र--अशुभ वस्तुओं के; नशने--विनाश करने वाली; शुच्ययः--पवित्र; गृणन्ति--तथा शब्दों द्वारा वर्णन करते हैं;विन्दन्ति-- प्राप्त करते हैं; ते--वे; कमल--कमल ( सहश ); नाभ--हे कमलनाभ; भव-- भौतिक जीवन का; अपवर्गम्--मोक्ष; आशासते--इच्छा लगाये रहते हैं; यदि--यदि; ते--वे; आशिष: --इच्छित वस्तुएँ प्राप्त करते हैं; ईश--हे प्रभु; न--नहीं;अन्ये--अन्य पुरुष |
हे कमलनाभ, वे पवित्र व्यक्ति जो निरन्तर आपकी उन पादुकाओं की सेवा करते हैं, ध्यानकरते हैं और उनका यशोगान करते हैं, जो समस्त अशुभ वस्तुओं को विनष्ट करने वाली हैं, उन्हेंनिश्चित रूप से इस भौतिक संसार से मुक्ति प्राप्त हो जाती है।
यदि वे इस जगत में किसी वस्तुकी आकांक्षा करते हैं, तो वे उसे प्राप्त करते हैं, किन्तु हे प्रभु, अन्य लोग, जो आपकी शरणग्रहण नहीं करते, कभी भी तुष्ट नहीं होते।
तद्देवदेव भवतश्चरणारविन्द-सेवानुभावमिह पश्यतु लोक एष: ।
ये त्वां भजन्ति न भजन्त्युत वोभयेषांनिष्ठां प्रदर्शय विभो कुरुसूझ्यानाम् ॥
५॥
तत्--इसलिए; देव-देव--हे स्वामियों के स्वामी; भवत:--आपके; चरण-अरविन्द--चरणकमलों की; सेवा--सेवा की;अनुभावम्--शक्ति; इहह--इस संसार में; पश्यतु--वे देख सकें; लोक:--जनता; एष:--यह; ये--जो; त्वाम्ू--तुमको;भजन्ति--पूजते हैं; न भजन्ति--पूजा नहीं करते; उत वा--अथवा अन्य कुछ; उभयेषाम्--दोनों की; निष्ठामू--पद को;प्रदर्शम--दिखलाइये; विभो--हे सर्वशक्तिमान; कुरू-सूझ्यानाम्ू--कुरुओं तथा सृज्ञयों के अतएव हे देव-देव
इस संसार के लोग देख लें कि आपके चरणकमलों में की गई भक्तिकी शक्ति कितनी है।
हे सर्वशक्तिमान, आप उन्हें उन कुरुओं तथा सृक्षयों की शक्ति दिखला दें,जो आपकी पूजा करते हैं और उनकी भी स्थिति दिखला दें, जो पूजा नहीं करते।
न ब्रह्मण: स्वपरभेदमतिस्तव स्यात्सर्वात्मन: समहशः स्वसुखानुभूते: ।
संसेवतां सुरतरोरिव ते प्रसाद:सेवानुरूपमुदयो न विपर्ययोउत्र ॥
६॥
न--नहीं; ब्रह्मण:--ब्रह्म का; स्व-- अपना; पर--तथा पराया; भेद-- भेदभाव, भेद; मतिः--प्रवृत्ति; तब--तुम्हारी; स्थात्ू--शायद हो; सर्व--सारी वस्तुओं के; आत्मन:--आत्मा के; सम--समान; हृश:ः--जिसका दर्शन; स्व-- अपने भीतर; सुख--सुख का; अनुभूतेः--अनुभूति की; संसेवताम्--उचित रीति से पूजा करने वालों के लिए; सुर-तरोः--कल्पवृक्ष के; इब--मानो; ते--तुम्हारी; प्रसाद: --कृपा; सेवा--सेवा के साथ; अनुरूपम्--अनुरूप; उदय: --इच्छित फल; न--नहीं ; विपर्यय: --'उलटा; अत्र--इसमें |
आपके मन के भीतर 'यह मेरा है और वह दूसरे का है' इस प्रकार का भेदभाव नहीं होसकता, क्योंकि आप परम सत्य हैं, समस्त जीवों के आत्मा, सदैव समभाव रखने वाले औरअपने अन्तर में दिव्य आनन्द का भोग करने वाले हैं।
आप कल्पवृक्ष की तरह अपने उचित रूपसे हर पूजने वाले को आशीर्वाद देते हैं और उनके द्वारा की गई सेवा के अनुपात में उन्हें इच्छित'फल देते हैं।
इसमें कोई भी दोष नहीं है।
श्रीभगवानुवाचसम्यग्व्यवसितं राजन्भवता शत्रुकर्शन ।
कल्याणी येन ते कीर्तिलोकाननुभविष्यति ॥
७॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; सम्यक्--पूरी तरह से; व्यवसितम्--संकल्प किया हुआ; राजन्--हे राजन्; भवता--आपके द्वारा; शत्रु--शत्रुओं को; कर्शन--हे सताने वाले; कल्याणी--शुभ; येन-- जिससे; ते--तुम्हारी; कीर्ति:-- ख्याति;लोकानू--सारे लोकों को; अनुभविष्यति--देखेगी ॥
भगवान् ने कहा: हे राजन्, तुम्हारा निर्णय सही है, अतएव हे शत्रुकर्शन, तुम्हारीकल्याणकारी ख्याति सभी लोकों में फैलेगी।
ऋषीणां पितृदेवानां सुहृदामपि नः प्रभो ।
सर्वेषामपि भूतानामीप्सित: क्रतुराडयम् ॥
८॥
ऋषीणाम्--ऋषियों के लिए; पितृ--मृत पूर्वज; देवानाम्ू--तथा देवताओं के लिए; सुहृदाम्--मित्रों के लिए; अपि-- भी;नः--हमारा; प्रभो:--हे प्रभु; सर्वेषामू--सबों के लिए; अपि--भी; भूतानाम्--जीवों के लिए; ईप्सित:--वांछनीय, अभीष्ट;क्रतु--प्रमुख वैदिक यज्ञों के; राट्--राजा; अयम्--इस
हे प्रभु, निस्सन्देह महर्षियों, पितरों तथा देवताओं के लिए, हमारे शुभचिन्तक मित्रों के लिएऔर दरअसल सारे जीवों के लिए इस वैदिक यज्ञों के राजा का सम्पन्न होना वांछनीय है।
विजित्य नृपतीन्सर्वान्कृत्वा च जगतीं वशे ।
सम्भृत्य सर्वसम्भारानाहरस्व महाक्रतुम् ॥
९॥
विजित्य--जीत कर; नृ-पतीन्--राजाओं को; सर्वानू--समस्त; कृत्वा--करके; च--तथा; जगतीम्--पृथ्वी को; वशे--अपनेवश में; सम्भृत्य--एकत्र करके; सर्व--सारी; सम्भारान्ू--सामग्री; आहरस्व--सम्पन्न करो; महा--महान्; क्रतुम्--यज्ञ को ।
सबसे पहले सारे राजाओं को जीतो, पृथ्वी को अपने अधीन करो और आवश्यक साज-सामग्री एकत्र करो, तब इस महान् यज्ञ को सम्पन्न करो।
एते ते भ्रातरो राजेल्लोकपालांशसम्भवा: ।
जितोअस्म्यात्मवता तेडहं दुर्जयो योउकृतात्मभि: ॥
१०॥
एते--ये; ते--तुम्हारे; भ्रातरः-- भाई; राजन्--हे राजन्; लोक--लोकों पर; पाल--शासन करने वाले देवताओं से; अंश--अंशरूप; सम्भवा:--उत्पन्न; जित:--जीता हुआ; अस्मि--हूँ; आत्म-वता--आत्मसंयमी; ते--तुम्हारे द्वारा; अहम्--मैं;दुर्जय:--न जीता जा सकने वाला; यः--जो; अकृत-आत्मभि:--जो आत्मसंयमी नहीं है, उनके द्वारा।
हे राजन, तुम्हारे इन भाइयों ने विभिन्न लोकपालों के अंशों के रूप में जन्म लिया है।
औरतुम तो इतने आत्मसंयमी हो कि तुमने मुझे भी जीत लिया है, जबकि मैं उन लोगों के लिए दुर्जयहूँ, जिनकी इन्द्रियाँ उनके वश में नहीं हैं।
न कश्,िन्मत्परं लोके तेजसा यशसा श्रिया ।
विभूतिभिर्वाभिभवेद्देवोषपि किमु पार्थिव: ॥
११॥
न--नहीं; कश्चित्ू--कोई व्यक्ति; मत्--मेरे प्रति; परमू--समर्पित; लोके--इस जगत में; तेजसा--अपनी शक्ति से; यशसा--यश से; अिया--सौन्दर्य से; विभूतिभि:--ऐश्वर्य से; वा--अथवा; अभिभवेत्--जीत सकता है; देव:--देवता; अपि--भी;किम् उ--क्या कहा जाय; पार्थिव: --पृथ्वी का शासक |
इस जगत में मेरे भक्त को देवता भी अपने बल, सौन्दर्य, यश या सम्पत्ति से नहीं हरा सकते,पृथ्वी के शासक की तो बात ही कया ?
श्रीशुक उवाचनिशम्य भगवदगीतं प्रीतः फुल्लमुखाम्बुज: ।
भ्रातृन्दिग्विजयेयुड्डः विष्णुतेजोपबृंहितान्ू ॥
१२॥
श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुक ने कहा; निशम्य--सुनकर; भगवत्-- भगवान् के; गीतम्--गीत; प्रीत:--प्रसन्न; फुल्ल--खिलाहुआ; मुख--उसका मुँह; अम्बुज:--कमल जैसा; भ्रातृन्ू--उसके भाइयों को; दिकु--सारी दिशाओं की; विजये--विजय में;अयुद्ध --व्यस्त; विष्णु-- भगवान् विष्णु के; तेज:--तेज से; उपबूंहितान्ू--प्रबलित, पुष्ट ।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : भगवान् द्वारा इन शब्दों रूपी गायन को सुनकर युध्चिष्टिर हर्षितहो उठे और उनका मुख कमल सहद्ृश खिल गया।
इस तरह उन्होंने अपने भाइयों को, जो भगवान्विष्णु की शक्ति से समन्वित थे, सभी दिशाओं पर विजय के लिए भेज दिया।
पसहदेवं दक्षिणस्थामादिशत्सह सृझ्ञयैः ।
दिशि प्रतीच्यां नकुलमुदीच्यां सव्यसाचिनम् ।
्राच्यां वृकोदर मत्स्यै: केकयै: सह मद्रकै: ॥
१३॥
सहदेवम्--सहदेव को; दक्षिणस्याम्-दक्षिण की ओर; आदिशत्--आज्ञा दी; सह--साथ; सूझ्ञयै:--सूझय जाति के योद्धाओंके; दिशि--दिशा की ओर; प्रतीच्यामू--पश्चिमी; नकुलम्ू--नकुल को; उदीच्याम्--उत्तर की ओर; सव्यसाचिनम्--अर्जुनको; प्राच्यामू--पूर्व की ओर; वृकोदरम्-- भीम को; मत्स्यैः--मत्स्यों; केकयैः--केकयों के; सह--साथ; मद्रकैः--तथामद्रकों के साथ
उन्होंने सहदेव को सूक्षयों के साथ दक्षिण, नकुल को मत्स्यों के साथ पश्चिम, अर्जुन कोकेकयों के साथ उत्तर तथा भीम को मद्रकों के साथ पूर्व दिशा में भेज दिया।
ते विजित्य नृपान्बीरा आजहर्दिग्भ्य ओजसा ।
अजातजत्रवे भूरि द्रविणं नृप यक्ष्यते ॥
१४॥
ते--वे; विजित्य--हराकर; नृपान्ू--राजाओं को; वीरा:--वीर; आजहु: --ले आये; दिग्भ्य:--विभिन्न दिशाओं से; ओजसा--अपनी शक्ति से; अजात-शत्रवे--युधिष्ठिर महाराज के लिए; भूरि--प्रचुर; द्रविणम्-- धन; नृप--हे राजा ( परीक्षित );यक्ष्यते--यज्ञ करने का इच्छुक
हे राजनू, अपने बल से अनेक राजाओं को हराकर ये वीर भाई यज्ञ करने के इच्छुकयुथ्चिष्ठिर महाराज के लिए प्रचुर धन लेते आये।
श्र॒ुत्वाजितं जरासन्ध॑ नृपतेर्ध्यायतो हरि: ।
आहोपायं तमेवाद्य उद्धवो यमुवाच ह ॥
१५॥
श्रुत्वा--सुनकर; अजितम्--बिना जीता हुआ; जरासन्धम्--जरासन्ध को; नृपतेः--राजा के; ध्यायत:ः--मनन करते समय;हरिः-- भगवान् हरि ने; आह--बतलाया; उपायम्--उपाय; तमू--उसको; एव--निस्सन्देह; आद्यः--आदि पुरुष; उद्धव:--उद्धव ने; यमू--जिसको; उबाच ह--कहा था।
जब राजा युधिष्टिर ने सुना कि जरासन्ध पराजित नहीं किया जा सका तो वे सोच-विचार मेंपड़ गये और तब आदि भगवान् हरि ने उन्हें वह उपाय बताया, जिसे उद्धव ने जरासन्ध को हरानेके लिए कह सुनाया था।
भीमसेनो४र्जुनः कृष्णो ब्रह्मलिन्गधरास्त्रयः ।
जम्मुर्गिरित्रजं तात बृहद्रथसुतो यतः ॥
१६॥
भीमसेन: अर्जुन: कृष्ण:--भीमसेन, अर्जुन तथा कृष्ण; ब्रह्म--ब्राह्मणों के; लिड्र---वेश; धरा:-- धारण करके; त्रयः --तीनों;जग्मु:ः--गये; गिरिब्रजम्--गिरित्रज के किले वाले नगर में; तात--हे प्रिय ( परीक्षित ); बृहद्रथ-सुत:--बूृहद्रथ का पुत्र( जरासन्ध ); यत:--जिधर |
इस तरह भीमसेन, अर्जुन तथा कृष्ण ने ब्राह्मणों का वेश बनाया और हे राजा, वे गिरिब्रजगये जहाँ बृहद्रथ का पुत्र था।
ते गत्वातिथ्यवेलायां गृहेषु गृहमेधिनम् ।
ब्रह्मण्यं समयाचेरत्राजन्या ब्रह्मलिड्रिन: ॥
१७॥
ते--वे; गत्वा--जाकर; आतिथ्य--अतिथियों के स्वागतार्थ; वेलायामू--निश्चित समय पर; गृहेषु--उसके आवास स्थान में;गृह-मेधिनम्-धार्मिक गृहस्थों से; ब्रह्मण्यम्--ब्राह्मणों के प्रति आदर से पूर्ण; समयाचेरन्ू--याचना की; राजन्या:--राजागण;ब्रह्म-लिड्रिन:--ब्राह्मणों के चिह्नों से युक्त होकर।
ब्राह्मणों का वेश धारण करके ये राजवंशी योद्धा जरासन्ध के घर, अतिथियों का स्वागतकरने के लिए निश्चित समय पर, पहुँचे।
उन्होंने उस कर्तव्यनिष्ठ गृहस्थ के समक्ष याचना की,क्योंकि वह ब्राह्मण वर्ग का विशेष रूप से आदर करता था।
राजन्विद्धबतिथीन्प्राप्तानर्थिनो दूरमागतान् ।
तन्नः प्रयच्छ भद्गं ते यद्वयं कामयामहे ॥
१८॥
राजनू--हे राजन; विद्धि--कृपया जानो; अतिथीन्--अतिथियों को; प्राप्तानू--आया हुआ; अर्थिन:--पाने के इच्छुक; दूरम्--दूर से; आगतानू--आये हुए; तत्--वह; नः--हमको; प्रयच्छ--दो; भद्रमू--शुभ, मंगल; ते--तुम से; यत्--जो भी; वयम्--हम; कामयामहे--इच्छा कर रहे हैं।
कृष्ण, अर्जुन तथा भीम ने कहा हे राजा, आप हमें दीन अतिथि जानें, जो आपके पासबहुत दूर से आये हैं।
हम आपका कल्याण चाहते हैं।
हम जो भी चाहें, कृपया उसे हमें दें।
किं दुर्मर्ष तितिक्षूणां किमकार्यमसाधुभि: ।
कि न देयं वदान्यानां कः पर: समदर्शिनाम् ॥
१९॥
किमू--क्या; दुर्मर्षम्--असहा; तितिक्षूणामू--सहनशील के लिए; किम्ू--क्या; अकार्यम्--करना असम्भव; असाधुभि:--असाधु के लिए; किम्--क्या; न देयम्--दे पाना असम्भव; वदान्यानाम्ू--उदार के लिए; क:--कौन; पर: --पृथक्; सम--समान; दर्शिनाम्--दृष्टि वालों को
सहनशील व्यक्ति क्या नहीं सह सकता? दुष्ट क्या नहीं करेगा? उदार व्यक्ति दान में क्यानहीं दे देगा? और समदृष्टि वाले के लिए बाहरी कौन है?
योउनित्येन शरीरेण सतां गेय॑ यशो श्लुवम् ।
नाचिनोति स्वयं कल्प: स वाच्य: शोच्य एव सः ॥
२०॥
यः--जो; अनित्येन--क्षणिक; शरीरेण -- भौतिक शरीर से; सताम्--सन्तों द्वारा; गेयम्--गायन के लिए; यश: --यश;श्रुवम्--स्थायी; न आचिनोति--अर्जित नहीं करता; स्वयमू--स्वयं; कल्प: --सक्षम; सः--वह; वाच्य:--निन्दनीय; शोच्य: --शोचनीय; एव--निस्सन्देह; सः--वह |
वह निस्सन्देह निन्दनीय तथा दयनीय है, जो अपने क्षणिक शरीर से महान सन््तों द्वारा गाईगई चिर ख्याति को प्राप्त करने में असफल रहता है, यद्यपि वह ऐसा करने में सक्षम होता है।
हरिश्वन्द्रो रन्तिदेव उज्छवृत्ति: शिबिर्बलि: ।
व्याध: कपोतो बहवो ह्ाश्रुवेण श्रुवं गता: ॥
२१॥
हरिश्वन्द्रः रन्तिदेव:--हरिश्वन्द्र तथा रन्तिदेव; उब्छ-वृत्तिः--फसल के गिरे दानों को बीन कर जीविका चलाने वाला, मुद्गल;शिबि: बलि:--शिबि तथा बलि; व्याध:--शिकारी; कपोत:ः--कबूतर; बहव:-- अनेक; हि--निस्सन्देह; अश्वुवेण-- क्षणिकद्वारा; ध्रुवम्--स्थायी तक; गता:--गये हुए
हरिश्वन्द्र, रन्तिदेव, उज्छवृत्ति मुदूगल, शिवरि, बलि, पौराणिक शिकारी तथा कबूतर एवंअन्य अनेकों ने क्षणभंगुर के द्वारा अविनाशी को प्राप्त किया है।
श्रीशुक उवाचस्वरैराकृतिभिस्तांस्तु प्रकोष्ठैर््याहतैरपि ।
राजन्यबन्धून्विज्ञाय दृष्टपूर्वानचिन्तयत् ॥
२२॥
श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; स्वरः--उनके स्वरों से; आकृतिभि:--शारीरिक डीलडौल से; तान्--उनको;तु--फिर भी; प्रकोष्ठे:--उनकी कलाइयों को ( देख ) कर; ज्या--धनुष की डोरियों से; हतैः--चिन्हित; अपि-- भी; राजन्य--राजसी; बन्धूनू--पारिवारिक सदस्यों के रूप में; विज्ञाय--पहचान कर; दृष्ट--देखा हुआ; पूर्वान्--इससे पहले से;अचिन्तयत्--उसने विचार किया।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : उनकी आवाज, उनके शारीरिक डीलडौल तथा उनकी कलाइयोंपर धनुष की डोरियों से बने चिन्हों से जरासन्ध यह जान गया कि उसके अतिथि राजन्य हैं।
वहसोचने लगा कि इसके पूर्व मैंने उन्हें कहीं न कहीं देखा है।
राजन्यबन्धवो होते ब्रह्मलिड्ञानि बिभ्रति ।
ददानि भिक्षितं तेभ्य आत्मानमपि दुस्त्यजम् ॥
२३॥
राजन्य-बन्धव:-क्षत्रियों के सम्बन्धी; हि--निस्सन्देह; एते--ये; ब्रह्म --त्राह्मणों के; लिड्ानि--चिह्न; बिभ्रति-- धारण करनेवाले हैं; ददानि--मुझे देना चाहिए; भिक्षितम्--माँगा हुआ; तेभ्य:--उनको; आत्मानम्-- अपना शरीर; अपि-- भी;दुस्त्यजम्--जिसे छोड़ पाना असम्भव है।
जरासन्ध ने सोचा : ये निश्चित रूप से क्षत्रिय कुल के सदस्य हैं, जिन्होंने ब्राह्मणों कावेश बना रखा है, फिर भी मुझे इनको दान देना चाहिए भले ही वे मुझसे छोड़ने में दुष्कर मेराशरीर ही क्यों न माँग लें।
बलेनु श्रूयते कीर्तिवितता दिक््वकल्मषा ।
ऐश्वर्याद्भ्रंशितस्यापि विप्रव्याजेन विष्णुना ॥
२४॥
प्रियं जिहीर्षतेन्द्रस्थ विष्णवे द्विजरूपिणे ।
जानन्नपि महीम्प्रादाद्वार्यमाणोपि दैत्यराट् ॥
२५॥
बले:--बलि की; नु--नहीं; श्रूयते--सुनी जाती है; कीर्ति:--कीर्ति, ख्याति; वितता--विस्तीर्ण; दिक्षु--सभी दिशाओं में;अकल्मषा--निष्कलंक; ऐश्वर्यात्-उसके प्रबल पद से; भ्रंशितस्थ--गिराये गये; अपि-- भी; विप्र--ब्राह्मण के; व्याजेन--वेशमें; विष्णुना--विष्णु द्वारा; श्रीयम्--ऐश्वर्य; जिहीर्षता--लेने की इच्छा से; इन्द्रस्य--इन्द्र का; विष्णवे--विष्णु के; द्विज-रूपिणे--ब्राह्मण के रूप में प्रकट होकर; जानन्--जानते हुए; अपि--यद्यपि; महीम्--सारी पृथ्वी; प्रादात्ू--दे दिया;वार्यमाण:--मना किये जाने पर; अपि-- भी; दैत्य--असुरों के; राट्--राजा ने |
निस्सन्देह, बलि महाराज की निष्कलंक ख्याति विश्व-भर में सुनाई पड़ती है।
भगवान्विष्णु, बलि से इन्द्र का ऐश्वर्य वापस लेने की इच्छा से, उसके समक्ष ब्राह्मण के वेश में प्रकटहुए और उसके शक्तिशाली पद से उसे नीचे गिरा दिया।
यद्यपि दैत्यााज बलि इस छल सेपरिचित थे और अपने गुरु द्वारा मना भी किये गये थे, तो भी उन्होंने विष्णु को दान में सारीपृथ्वी दे दी।
जीवता ब्राह्मणार्थाय को न्वर्थ: क्षत्रबन्धुना ।
देहेन पतमानेन नेहता विपुलं यश: ॥
२६॥
जीवता--जीवित रहने वाला; ब्राह्मण-अर्थाय--ब्राह्मणों के लाभार्थ; क:ः--कौन; नु--तनिक भी; अर्थ:--लाभ; क्षत्र-बन्धुना--पतित क्षत्रिय से; देहेन--शरीर से; पतमानेन--पतित होने ही वाले; न ईहता--प्रयास न करते हुए; विपुलम्--विस्तृत;यशः--यश के लिए
उस अयोग्य क्षत्रिय से क्या लाभ जो जीवित तो रहता है, किन्तु अपने नश्वर शरीर से ब्राह्मणोंके लाभार्थ कार्य करते हुए स्थायी यश प्राप्त करने में असफल रहता है ?
इत्युदारमतिः प्राह कृष्णार्जुनवृकोदरान् ।
है विप्रा व्रियतां कामो द॒दाम्यात्मशिरोडपि व: ॥
२७॥
इति--इस प्रकार; उदार--उदार; मति:--मानसिकता वालों ने; प्राह-- कहा; कृष्ण-अर्जुन-वृकोदरान्--कृष्ण, अर्जुन तथाभीम; हे विप्रा:--हे विद्वान ब्राह्मणो; व्रियतामू--आप चुनाव कर लें; काम: --जो चाहें; ददामि--मैं दूँगा; आत्म-- अपना;शिरः--सिर; अपि-- भी; वः--तुम सबों को |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार संकल्प करके उदार जरासन्ध ने कृष्ण, अर्जुनतथा भीम से कहा : 'हे विद्वान ब्राह्मणों, तुम जो भी चाहो चुन सकते हो।
मैं तुम्हें दूँगा, चाहेवह मेरा सिर ही क्यों न हो।
श्रीभगवानुवाचयुद्ध नो देहि राजेन्द्र द्वन्द्रशो यदि मन्यसे ।
युद्धार्थिनो बयं प्राप्ता राजन्या नान्यकाड्श्षिण: ॥
२८॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ( कृष्ण ) ने कहा; युद्धम्--युद्ध; नः--हमको; देहि--दीजिये; राज-इन्द्र--हे महान् राजा;द्न्द्रशः--एक-एक से भिड़न्त; यदि--यदि; मन्यसे--उचित समझते हो; युद्ध--युद्ध के लिए; अर्थिन: --इच्छुक; वयम्--हमतीनों; प्राप्ताः--यहाँ आये हुए हैं; राजन्या:--राजसी वर्ग के सदस्य; न--नहीं; अन्य--और कुछ; काड्क्षिण: --इच्छुक |
भगवान् ने कहा : हे राजेन्द्र यदि आप उचित समझते हों, तो हमें एक द्वन्द्द के रूप में युद्धदीजिये।
हम राजकुमार हैं और युद्ध की भिक्षा माँगने आये हैं।
हमें आपसे कोई अन्य भिक्षा नहींचाहिए।
असौ वृकोदरः पार्थस्तस्य भ्रातार्जुनो हायम् ।
अनयोर्मातुलेयं मां कृष्णं जानीहि ते रिपुम् ॥
२९॥
असौ--यह; वृकोदर:ः -- भीम; पार्थ:--पृथा का पुत्र; तस्य--उसका; भ्राता--भाई; अर्जुन: --अर्जुन; हि--निस्सन्देह; अयम्--यह; अनयो:--दोनों में से; मातुलेयम्ू--मामा के लड़के; माम्--मुझको; कृष्णम्--कृष्ण; जानीहि--जानो; ते-- तुम्हारा;रिपुम्-शत्रु |
वह रहा पृथा-पुत्र भीम और यह उसका भाई अर्जुन है।
मुझे इनका ममेरा भाई और अपनाशत्रु कृष्ण जानो।
एवमावेदितो राजा जहासोच्चै: सम मागधः ।
आह चर्मर्षितो मन्दा युद्ध तहिं ददामि व: ॥
३०॥
एवम्--इस प्रकार; आवेदित:--आमंत्रित; राज--राजा; जहास--हँसा; उच्चै:--जोर से; स्म--निस्सन्देह; मागध:--जरासन्धने; आह--कहा; च--तथा; अमर्षित: -- असहिष्णु; मन्दा:--ेरे मूर्खो ; युद्धम्--युद्ध; तहिं---तब; ददामि--मैं दूँगा; वः--तुमको ।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार ललकारे जाने पर, मगधराज जोर से हँसा औरउपेक्षापूर्वक बोला, 'बहुत अच्छा।
ओरे मूर्खो! मैं तुमसे द्वन्द्द युद्ध करूँगा।
न त्वया भीरुणा योत्स्ये युधि विक्लवतेजसा ।
मथुरां स्वपुरीं त्यक्त्वा समुद्रं शरणं गतः ॥
३१॥
न--नहीं; त्वया--तुम्हारे साथ; भीरुणा--कायर; योत्स्ये--मैं लड़ूँगा; युधि--युद्ध में; विक््लब--क्षीण किया गया; तेजसा--तेज से; मथुराम्ू--मथुरा; स्व--निजी; पुरीम्--नगरी को; त्यक्त्वा--छोड़कर; समुद्रम्--समुद्र में; शरणम्--शरण के लिए;गतः--गया हुआ'
लेकिन हे कृष्ण, मैं तुमसे युद्ध नहीं करूँगा, क्योंकि तुम कायर हो।
तुम्हारे बल ने युद्ध के बीच में ही तुम्हारा साथ छोड़ दिया था और तुम अपनी ही राजधानी मथुरा से समुद्र में शरणलेने के लिए भाग गये थे।
अयं तु वयसातुल्यो नातिसत्त्वो न मे समः ।
अर्जुनो न भवेद्योद्धा भीमस्तुल्यबलो मम ॥
३२॥
अयम्--यह; तु--दूसरी ओर; वयसा--उप्र में; अतुल्य:--समान नहीं; न--नहीं; अति--अत्यधिक; सत्त्व:--बल से युक्त;न--नहीं; मे--मेरे; सम: --समान; अर्जुन:--अर्जुन; न भवेत्--नहीं होना चाहिए; योद्धा--स्पर्धा करने वाला, लड़ाकू;भीम:ः--भीम; तुल्य--समान; बल: --बल में; मम--मेरे'
जहाँ तक इस अर्जुन की बात है, वह न तो आयु में मेरे समान है न ही अत्यधिक बलशालीहै।
चूँकि वह मेरी जोड़ का नहीं है, अतः उसे योद्धा नहीं बनना चाहिए।
किन्तु भीम मेरे हीसमान बलशाली है।
'इत्युक्त्वा भीमसेनाय प्रादाय महतीं गदाम् ।
द्वितीयां स्वयमादाय निर्जगाम पुराद्ठहि: ॥
३३॥
इति--ऐसा; उक्त्वा--कहकर; भीमसेनाय-- भीमसेन के लिए; प्रादाय--देकर; महतीम्--विशाल; गदाम्ू--गदा; द्वितीयाम्--दूसरी; स्वयम्--खुद; आदाय--लेकर; निर्जगाम--निकल गया; पुरात्ू--नगर से; बहि:--बाहर।
यह कहकर जरासन्ध ने भीमसेन को एक बड़ी गदा दी, दूसरी गदा स्वयं ली और शहर केबाहर चला गया।
ततः समेखले वबीरौ संयुक्तावितरेतरम् ।
जघ्नतुर्वज़कल्पाभ्यां गदाभ्यां रणदुर्मदौ ॥
३४॥
ततः--तब; समेखले--समतल अखाड़े में; वीरौ--दोनों वीर; संयुक्तौ--लगे हुए; इतर-इतरम्--एक दूसरे से; जघ्नतु:--प्रहारकिया; वज्-कल्पाभ्यामू--बिजली की भाँति; गदाभ्याम्--अपनी गदाओं से; रण--युद्ध में; दुर्मदौ--उन्मत्त |
इस तरह दोनों वीर नगर के बाहर समतल अखाड़े में एक दूसरे से युद्ध करने लगे।
युद्ध केक्रोध से पगलाये हुए वे एक दूसरे पर वज़ जैसी गदाओं से प्रहार करने लगे।
मण्डलानि विचित्राणि सव्यं दक्षिणमेव च ।
चरतो: शुशुभे युद्धं नटयोरिव र्डिणो: ॥
३५॥
मण्डलानि--घेरे; विचित्राणि--दक्ष; सव्यम्ू--बाईं ओर; दक्षिणम्--दाहिनी ओर; एवं च-- भी; चरतो: --गति करने वालों के;शुशुभे-- भव्य लग रहे थे; युद्धम्--युद्ध; नटयो:--अभिनेताओं के; इब--सहश; रड्डिणो:--मंच पर।
जब वे दक्षता से दाएँ तथा बाएँ चक्कर काट रहे थे, जिस तरह कि मंच पर अभिनेता नाचतेहैं, तब यह युद्ध भव्य दृश्य उपस्थित कर रहा था।
ततश्चवटचटाशब्दो वज्जनिष्पेससन्निभ: ।
'गदयोः श्षिप्तयो राजन्दन्तयोरिव दन्तिनो: ॥
३६॥
ततः--तब; चट-चटा-शब्द:--चटचटाने की ध्वनि; वज़--बिजली के; निष्पेष--गिरने, टूटने; सन्निभ:--के समान;गदयो:--उनकी गदाओं के; क्षिप्तयो:--घुमाने से; राजन्--हे राजन् ( परीक्षित ); दन््तयो:--दाँतों के; इब--मानो; दन्तिनो: --हाथियों के ॥
हे राजनू, जब जरासन्ध तथा भीमसेन की गदाएँ जोर-जोर से एक दूसरे से टकरातीं, तोउनसे जो ध्वनि निकलती थी, वह दो लड़ते हुए हाथियों के दाँतों की टक्कर के समान या तूफानके समय चमकने वाली बिजली के गिरने के धमाके जैसी थी।
ते वै गदे भुजजवेन निपात्यमानेअन्योन्यतो$ंसकटिपादकरोरुजत्रुम् ।
चूर्णीबभूवतुरुपेत्य यथार्कशाखेसंयुध्यतोद्विरदयोरिव दीप्तमन्व्यो: ॥
३७॥
ते--वे; वै--निस्सन्देह; गदे--दोनों गदाएँ; भुज--उनके हाथों की; जबेन--वेग से; निपात्यमाने--बलपूर्वक घुमाई जाने से;अन्योन्यतः--एक-दूसरे के विरुद्ध; अंस--कन्धे; कटि--कमर; पाद--पाँव; कर--हाथ; ऊरू--जाँचें; जत्रुमू--तथा कन्धेकी हड्डियाँ, हँसली; चूर्णी--चूर्ण की हुईं; बभूवतु:--बन गई; उपेत्य--स्पर्श करके; यथा--जिस तरह; अर्क-शाखे--अर्क(मदार ) की दो टहनियाँ; संयुध्यतो:--तेजी से लड़ते हुए; द्विदयो:--हाथियों की जोड़ी के; इब--सहश; दीप्त--बढ़ा हुआ;मन्व्यो:--जिनका क्रोध |
वे एक-दूसरे पर इतने बल और वेग से अपनी गदाएँ चलाने लगे कि जब ये उनके कंधों,कमर, पाँवों, हाथों, जाँघों तथा हँसलियों पर चोट करतीं, तो वे गदाएँ उसी तरह चूर्ण हो जातीं,जिस तरह कि एक दूसरे पर क्रुद्ध होकर आक्रमण कर रहे दो हाथियों से मदार की टहनियाँ पिस जाती हैं।
इत्थं तयो: प्रहतयोर्गदयोनुवीरौक्रुद्धौ स्वमुष्टिभिरयःस्परशैरपिष्टाम् ।
शब्दस्तयो: प्रहरतोरिभयोरिवासीन्निर्घातवज्परुषस्तलताडनोत्थ: ॥
३८॥
इत्थम्--इस तरह से; तयो: --उन दोनों की; प्रहतयो:--नष्ट हुई; गदयो:--गदाएँ; त्र्--मनुष्यों में; बीरौ--दो महान् वीर;क्रुद्धी--क्रुद्ध; स्व--अपनी; मुप्टिभि:--घूँसों से; अयः--लोहे जैसे; स्परशै:ः--स्पर्श से; अपिष्टामू-- चूर-चूर किया; शब्द: --ध्वनि; तयो:--उन दोनों के; प्रहरतो:--प्रहार करते; इभयो:--दो हाथियों के; इब--सह॒श; आसीतू--बन गये; निर्घात--कड़कड़ाहट; वज्ञ--वज़ के समान; परुष:--कठोर; तल--हथेलियों के; ताडन--मारने से; उत्थ:--उठी हुई |
जब उनकी गदाएँ विनष्ट हो गईं, तो पुरुषों में महान् वे वीर क्रोधपूर्वक अपने लोहे जैसेकठोर घूँसों से एक-दूसरे पर आघात करने लगे।
जब वे एक-दूसरे पर घूंसे मार रहे थे, तो उससेनिकलने वाली ध्वनि हाथियों के परस्पर लड़ने-भिड़ने या बिजली की कठोर कड़कड़ाहट जैसीलग रही थी।
तयोरेवं प्रहरतो: समशिक्षाबलौजसो: ।
निर्विशेषमभूद्युद्धमक्षीणजवयोनूप ॥
३९॥
तयो:--दोनों के; एवम्--इस प्रकार; प्रहरतो: --प्रहार करते हुए; सम--समान; शिक्षा--प्रशिक्षण; बल--बल; ओजसो:--तथा उत्साह; निर्विशेषम्--अनिश्चित; अभूत्-- था; युद्धम्-युद्ध; अक्षीण--कम न होने वाला; जबयो:--जिनकी थकान;नृप--हे राजा।
इस प्रकार उन दोनों के लड़ते हुए समान प्रशिक्षण, बल तथा उत्साह वाले प्रतिद्वन्द्रियों कीयह प्रतियोगिता समाप्त नहीं हो रही थी।
इस तरह हे राजन, वे बिना किसी ढील के लड़े जा रहे थे।
शत्रोर्जन्ममृती विद्वाज्जीवितं च जराकृतम् ।
पार्थमाप्याययन्स्वेन तेजसाचिन्तयद्धरि: ॥
४०॥
शत्रो: --शत्रु का; जन्म--जन्म; मृती--तथा मृत्यु; विद्वानू--जानते हुए; जीवितमू--जीवनदान; च--तथा; जरा--जरा नामकराक्षसी द्वारा; कृतम्--किया गया; पार्थम्-पृथा-पुत्र भीम को; आप्याययन्--शक्ति प्रदान करते हुए; स्वेन--अपनी ही;तेजसा--शक्ति से; अचिन्तयत्--सोचा; हरिः-- भगवान् कृष्ण ने।
भगवान् कृष्ण अपने शत्रु जरासन्ध के जन्म तथा मृत्यु के रहस्य के बारे में जानते थे।
वे यहभी जानते थे कि किस प्रकार जरा नामक राक्षसी ने उसे जीवनदान दिया।
यह सब विचार करकेकृष्ण ने भीम को अपनी विशेष शक्ति प्रदान कर दी।
सश्धिन्त्यारीवधोपायं भीमस्यामोघदर्शन: ।
दर्शयामास विटपं पाटयत्निव संज्ञया ॥
४१॥
सजञ्ञिन्य--विचार करके; अरि--शत्रु के; वध--मारने के लिए; उपायम्--साधनों के विषय में; भीमस्य-- भीम के; अमोघ-दर्शन:--जिनका दर्शन अमोघ है, ऐसे भगवान्; दर्शयाम् आस--दिखलाया; विटपम्--वृक्ष की एक शाखा; पाटयनू--बीच सेचीरते हुए; इब--सहश; संज्ञया--संकेत के रूप में |
शत्रु को किस तरह मारा जाय इसका निश्चय करके उन अमोघ-दर्शन भगवान् ने एक वृक्षकी टहनी को बीच से चीर कर भीम को संकेत किया।
तद्विज्ञाय महासत्त्वो भीम: प्रहरतां वर: ।
गृहीत्वा पादयो: शत्रुं पातयामास भूतले ॥
४२॥
तत्--उसे; विज्ञाय--समझ कर; महा--महान्; सत्त्व: --शक्ति वाले; भीम: --भीम ने; प्रहरताम्--योद्धाओं में; वर: -- श्रेष्ठठम;गृहीत्वा--पकड़ कर; पादयो:--पाँवों से; शत्रुम्--शत्रु को; पातयाम् अस--पटक दिया; भू-तले--भूमि पर
इस संकेत को समझ कर, योद्धाओं में सर्वश्रेष्ठ उस बलशाली भीम ने अपने प्रतिद्वन्द्दी के पैरपकड़ कर उसे भूमि पर पटक दिया।
एकम्पादं पदाक्रम्य दोर्भ्यामन्यं प्रगृह्मा सः ।
गुदतः पाटयामास शाखमिव महागज: ॥
४३॥
एकम्--एक; पादम्--पैर; पदा--अपने पैर से; आक्रम्य--ऊपर खड़े होकर; दोर्भ्याम्--अपने दोनों हाथों से; अन्यम्--दूसरा;प्रगृह्वा--पकड़ कर; सः--उसने; गुदत:--गुदा से लेकर; पाटयाम् आस--चीर डाला; शाखाम्--वृक्ष की शाखा को; इब--सहश; महा--विशाल; गजः--हाथी |
भीम ने अपने पाँव से जरासन्ध के एक पाँव को दबा लिया और दूसरे पाँव को अपने हाथोंसे पकड़ लिया।
फिर जिस तरह कोई विशाल हाथी किसी वृक्ष से एक शाखा तोड़ ले, उसी तरहभीम ने जरासन्ध को गुदा से लेकर ऊपर तक चीर डाला।
एकपादोरुवृषणकटिपृष्ठस्तनांसके ।
एकबाहृश्षिभ्रूकर्ण शकले दहशुः प्रजा: ॥
४४॥
एक-एक; पाद--पाँव से; ऊरु-- जाँघ; वृषण-- अण्डकोश; कति--कमर; पृष्ठ--पीठ; स्तन--छाती; अंसके--तथा कंधा;एक-एक; बाहु-- भुजा से; अक्षि-- आँख; भ्रू--भौंह; कर्णे--तथा कान; शकले--दो खंडों में; दहशु:--देखा; प्रजा: --प्रजा ने
तब राजा की प्रजा ने उसे दो अलग-अलग खण्डों में पड़ा हुआ देखा।
प्रत्येक खण्ड मेंएक-एक पाँव, जाँघ, अण्डकोश, कमर, कंधा, बाँह, आँख, भौंह, कान तथा आधी पीठ एवंछाती थे।
हाहाकारो महानासीन्निहते मगधेश्वरे ।
'पूजयामासतुर्भीमं परिरभ्य जयाच्यतौ ॥
४५॥
हाहा-कारः--शोक की चीख; महान्--अत्यधिक; आसीतू--उठी; निहते--मारे जाने पर; मगध-ई श्वर--मगध के राजा के;पूजयाम् आसतु:--दोनों ने सम्मान किया; भीमम्-- भीम को; परिरभ्य--आलिंगन करके; जय--अर्जुन; अच्युतौ--तथा कृष्णने
मगधराज की मृत्यु होते ही हाहाकार होने लगा, जबकि अर्जुन तथा कृष्ण ने भीम काआलिंगन करके उसे बधाई दी।
सहदेवं तत्तनयं भगवान्भूतभावन: ।
अभ्यषिज्जञदमेयात्मा मगधानां पतिं प्रभु: ।
मोचयामास राजन्यान्संरुद्धा मागधेन ये ॥
४६॥
सहदेवम्--सहदेव नामक; तत्--उसके ( जरासन्ध का ); तनयम्--पुत्र को; भगवान्ू--भगवान्; भूत--सारे जीवों के;भावन:--पालनकर्ता; अभ्यषिज्ञत्-- अभिषेक कर दिया; अमेय-आत्मा--अपरिमेय; मगधानाम्--मगधवासियों के; पतिम्--स्वामी के रूप में; प्रभुः--प्रभु ने; मोचयाम् आस--छोड़ दिया; राजन्यान्ू--राजाओं को; संरुद्धा:--बन्दी बनाये गये;मागधेन--जरासन्ध द्वारा; ये--जो |
समस्त जीवों के पालनकर्ता तथा हितकारी अपरिमेय भगवान् ने जरासन्ध के पुत्र सहदेव काअभिषेक मगधवासियों के नवीन राजा के रूप में कर दिया।
तब भगवान् ने उन समस्त राजाओंको मुक्त किया, जिन्हें जरासन्ध ने बन्दी बना रखा था।
