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अध्याय सत्तर: भगवान कृष्ण की दैनिक गतिविधियाँ
10.70श्रीशुक उबाचअथोषस्युपवृत्तायां कुक्कुटान्कूजतोशपन् ।
गृहीतकण्ठ्य्य:पतिभिर्माधव्यो विरहातुरा: ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; अथ--तब; उषसि--भोर में ; उपवृत्तायामू--निकट आ रहे; कुक्कुटान्ू--मुर्गोको; कूजतः--बाँग देते; अशपन्--शाप दिया; गृहीत--पकड़ा हुआ; कण्ठद्य:--गले से; पतिभि:--अपने पतियों ( अनेक रूपोंमें कृष्ण ) द्वारा; माधव्य:-- भगवान् कृष्ण की पत्नियाँ; विरह--वियोग के कारण; आतुरा:--श्षुब्ध |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जैसे जैसे प्रभात निकट आने लगा वैसे वैसे भगवान् माधव कीसारी पत्नियाँ जो पति द्वारा गले में आलिंगित थीं, बाँग देते मुर्गों को कोसने लगीं।
ये स्त्रियाँविक्षुब्ध थीं क्योंकि अब वे उनसे विलग हो जायेंगी।
वयांस्यरोरुवन्कृष्णं बोधयन्तीव वन्दिन: ।
गायत्स्वलिष्वनिद्राणि मन्दारवनवायुभि: ॥
२॥
वयांसि--पक्षियों को; अरोरुवन्--जोर से शब्द करती हुई; कृष्णम्-- भगवान् कृष्ण को; बोधयन्ति--जगाती हुई; इब--मानो;वन्दिन:--भाट; गायत्सु--गाने लगे; अलिषु-- भौरे; अनिद्राणि--निद्रा से जगाये गये; मन्दार--पारिजात वृक्ष के; वन--उद्यानसे; वायुभि:--मन्द वायु द्वारा।
पारिजात उद्यान से आने वाली सुगंधित वायु से उत्पन्न भौंरों की गुनगुनाहट ने पक्षियों कोनींद से जगा दिया।
और जब ये पक्षी जोर जोर से चहचहाने लगे, तो उन्होंने भगवान् कृष्ण कोजगा दिया मानो दरबारी कवि उनके यश का गायन कर रहे हों।
मुहूर्त तं तु वैदर्भी नामृष्यदतिशोभनम् ।
परिरम्भणविएलेषात्प्रियबाहन्तरं गता ॥
३॥
मुहूर्तम्--दिन का समय, घड़ी को; तम्--उस; तु--लेकिन; वैदर्भी--महारानी रुक्मिणी ने; न अमृष्यत्--पसन्द नहीं किया;अति--अत्यन्त; शोभनम्--शुभ; परिरम्भण--उनके आलिंगन की; विश्लेषात्--हानि से; प्रिय--अपने प्रियतम की; बाहु--भुजाओं के; अन्तरम्--बीच में; गता--स्थित |
अपने प्रियतम की बाहों में लेटी हुई महारानी वैदर्भी को यह परम शुभ बेला नहीं भाती थीक्योंकि इसका अर्थ यह था कि वे उनके आलिंगन से विहीन हो जायेंगी।
ब्राह्मे मुहूर्त उत्थाय वार्युपस्पृश्य माधव: ।
दध्यौ प्रसन्नकरण आत्मानं तमस: परम् ॥
४॥
एक॑ स्वयंज्योतिरनन्यमव्ययंस्वसंस्थया नित्यनिरस्तकल्मषम् ।
ब्रह्माख्यमस्योद्धवनाशहेतुभिःस्वशक्तिभिल॑क्षितभावनिर्वृतिम् ॥
५॥
ब्राह्मे मुहूर्ते--सूर्योदय से पूर्व, भोर में जो आध्यात्मिक कार्यो के लिए दिन का सर्वाधिक उत्तम समय है; उत्थाय--उठकर;वारि--जल; उपस्पृश्य--छूकर; माधव:-- भगवान् कृष्ण ने; दध्यौ-- ध्यान किया; प्रसन्न--विमल; करण:--मन; आत्मानम्--अपने ऊपर; तमसः:--अज्ञान; परमू--परे; एकम्--एकमात्र; स्वयम्-ज्योति:-- आत्म-प्रकाशित; अनन्यम्ू-- अनन्य;अव्ययम्--अव्यय; स्व-संस्थया--अपने स्वभाव से; नित्य--नित्य; निरस्त--भगाते हुए; कल्मषम्--दूषण को; ब्रह्म-आख्यम्--ब्रह्म या परम सत्य नाम से विख्यात; अस्य--इस ( ब्रह्माण्ड ) का; उद्धव--सृष्टि; नाश--तथा संहार; हेतुभि:--कारणों से; स्व--निजी; शक्तिभि: --शक्तियों से; लक्षित--प्रकट; भाव--अस्तित्व; निर्वृतिमू--हर्ष
भगवान् माथव ब्राह्म मुहूर्त में उठा करते और जल का स्पर्श किया करते थे।
तब स्वच्छ मनसे वे एकाकी, आत्म-प्रकाशित, अनन्य तथा अच्युत परम सत्य ब्रह्म-रूप स्वयं का ध्यान करते,जो स्वभाव से ही सारे कल्मष को दूर करने वाला है और जो अपनी उन निजी शक्तियों के द्वारा,जो इस ब्रह्माण्ड का सृजन और संहार करती हैं, अपना ही शुद्ध तथा आनन्दमय स्वरूप प्रकटकरता है।
अथाप्लुतोम्भस्यमले यथाविधिक्रियाकलापं परिधाय वाससी ।
चकार सन्ध्योपगमादि सत्तमोहुतानलो ब्रह्म जजाप वाग्यत:ः ॥
६॥
अथ--तब; आप्लुत:--स्नान करके; अम्भसि--जल में; अमले--स्वच्छ; यथा-विधि--वैदिक नियमों के अनुसार; क्रिया--अनुष्ठान के; कलापम्--समस्त अनुक्रम; परिधाय--पहन कर; वाससी--अधो तथा ऊपरी वस्त्र; चकार--किया; सन्ध्या-उपगम--प्रातःकालीन पूजा; आदि--इत्यादि; सत्-तम:--साधु-पुरुष; हुत--आहु॒ति देकर; अनलः--पवित्र अग्नि को; ब्रह्म --वेदों का मंत्र ( गायत्री )) जजाप--मौन रहकर उच्चारण किया; वाक्ू--वाणी; यतः--नियंत्रित करते हुए
तब पुरुषों में अत्यन्त साधु सदृश भगवान् कृष्ण पवित्र जल में स्नान करते, अपने अधो वस्त्रतथा ऊपरी वस्त्र पहनते और प्रातःकालीन पूजा इत्यादि सारे नियमित क्रिया-कलाप सम्पन्न'करते।
फिर पवित्र अग्नि में आहुति देकर वे मन ही मन गायत्री मंत्र का जाप करते।
उपस्थायार्कमुद्चन्तं तर्पयित्वात्मन: कला: ।
देवानृषीन्पितृन्वृद्धान्विप्रानभ्यर्च्य चात्मवान् ॥
७॥
धेनूनां रुक्मश्रुड़ीनां साध्वीनां मौक्तिकस्त्रजाम् ।
'पयस्विनीनां गृष्टीनां सवत्सानां सुवाससाम् ॥
८ ॥
ददौ रूप्यखुराग्राणां क्षौमाजिनतिलै: सह ।
अलह्ड तेभ्यो विप्रेभ्यो बद्धं बद्दं दिने दिने ॥
९॥
उपस्थाय--पूजा करके; अर्कम्--सूर्य को; उद्यन्तम्ू--उदय होते; तर्पयित्वा--तर्पण करके ; आत्मन: --अपने; कला: --अंशोंको; देवान्ू--देवताओं को; ऋषीनू--ऋषियों को; पितृन्--तथा पितरों को; वृद्धान्ू--अपने गुरुजनों को; विप्रान्ू--तथाब्राह्मणों को; अभ्यर्च्यच--पूज कर; च--तथा; आत्म-वान्--अपनी ही; धेनूनाम्ू--गौवों के; रुक्म--सोने ( से मढ़ी );श्रृद्दीनामू--सींगों वाली; साध्वीनाम्-- अच्छे स्वभाव वाली; मौक्तिक--मोतियों की; स्त्रजामू--मालाओं से; पयस्विनीनाम्--दूध देने वाली; गृष्टीनामू--एक बार ब्याई; स-वत्सानाम्--अपने बछड़ों समेत; सु-वाससाम्--अच्छी तरह से वस्त्र पहने; ददौ--दिया; रूप्य--चाँदी ( से मढ़ी ); खुर--खुरों वाली; अग्राणाम्-- अगले; क्षौम--मलमल; अजिन--मृगचर्म; तिलैः--तथा तिल;सह--े साथ साथ; अलहड्डू ते भ्य:--आभूषण दिये गये; विप्रेभ्य:--ब्राह्मणों को; बद्दम् बद्ठमू--( एक सौ सात ) १३,०८४ केसमूह ( पूर्ण संख्या १४,००,००० ); दिने दिने-- प्रतिदिन
प्रतिदिन भगवान् उदय होते सूर्य की पूजा करते और अपने अंशरूप देवताओं, ऋषियों तथापितरों का तर्पण करते।
तत्पश्चात् आत्म-समृद्ध भगवान् अपने गुरुजनों तथा ब्राह्मणों कीध्यानपूर्वक पूजा करते।
वे सुवस्त्राभूषित ब्राह्मणों को, पालतू तथा शान्त गौवों का झुंड दान मेंदेते, जिनके सींग सोने से मढ़े होते और गले में मोतियों की मालाएँ रहती थीं।
ये गौवें सुन्दरवस्त्रों से भी विभूषित रहतीं और उनके खुरों के अगले हिस्से चाँदी से मढ़े होते।
ये प्रचुर दूध देनेवाली तथा एक बार ( ब्याँती ) वाली होतीं और इनके साथ इनके बछड़े होते।
भगवान् प्रतिदिन १३,०८४ गौवों के अनेक झुंड विद्वान ब्राह्मणों को देते और साथ में मलमल, मृगचर्म तथा तिलभी दान देते।
गोविप्रदेवतावृद्धगुरून्भूतानि सर्वशः ।
नमस्कृत्यात्मसम्भूतीर्मड्रलानि समस्पृश्त् ॥
१०॥
गो--गौवों; विप्र--ब्राह्मणों; देवता--देवताओं ; वृद्ध--वरेषुजन; गुरूनू--तथा गुरुओं को; भूतानि--जीवों को; सर्वशः --समस्त; नमस्कृत्य--नमस्कार करके; आत्म--अपने; सम्भूती:--अंशों को; मड्रलानि--शुभ वस्तुएँ ( यथा भूरी गाय );समस्पृशत्--स्पर्श किया।
भगवान् कृष्ण गौवों, ब्राह्मणों तथा देवताओं, अपने वरेषुजनों तथा गुरुओं और समस्तजीवों को--जो उन परम पुरुष के ही अंशरूप हैं--नमस्कार करते।
तब वे शुभ वस्तुओं कास्पर्श करते।
आत्मानं भूषयामास नरलोकविभूषणम् ।
वासोभिर्भूषणै: स्वीयैर्दिव्यस्त्रगनुलेपनै: ॥
११॥
आत्मानम्--स्वयं को; भूषयाम् आस--सजाते; नर-लोक--मानव समाज के; विभूषणम्-- आभूषण; वासोभि:--वस्त्रों से;भूषणै:--तथा रलों से; स्वीयैः -- अपने ही; दिव्य--दैवी; स्रकू--फूल की मालाओं से; अनुलेपनै:--तथा लेपों से |
वे मानव समाज के आभूषण स्वरूप अपने शरीर को अपने विशेष बस्त्रों तथा रत्नों से औरदेवी फूल-मालाओं एवं लेपों से सजाते।
अवेश्ष्याज्यं तथादर्श गोवृषद्विजदेवता: ।
कामांश्व सर्ववर्णानां पौरान्तःपुरचारिणाम् ।
प्रदाप्य प्रकृतीः काम: प्रतोष्य प्रत्यनन्दत ॥
१२॥
अवेक्ष्य--देखकर; आज्यम्--घी की ओर; तथा--और भी; आदर्शम्--शीशे की ओर; गो--गौवें; वृष--साँड़ों; द्विज--ब्राह्मणों; देवता:--देवतागण; कामान्--इच्छित वस्तुओं; च--तथा; सर्व--सभी; वर्णानाम्--जातियों के लोगों को; पौर--नगर में; अन्तः-पुर--महल के भीतर; चारिणाम्--रहने वाले; प्रदाप्प--देने का प्रबन्ध करके ; प्रकृती: --मंत्रीगण; कामै: --अपनी इच्छाओं के पूर्ण होने से; प्रतोष्य--पूरी तरह तुष्ट करके; प्रत्यनन्दत--सत्कार किया।
तब वे घी, दर्पण, गौवों तथा साँड़ों, ब्राह्मणों और देवताओं की ओर देखते और आश्वस्त होते कि महल के भीतर तथा पूरे नगर में रहने वाले सभी जातियों के लोग इन उपहारों से सन्तुष्टतो हैं।
तत्पश्चात् अपने मंत्रियों की इच्छाओं को पूरा करके उनका अभिवादन और सत्कार करते।
संविभज्याग्रतो विप्रान्स्त्रक्ताम्बूलानुलेपनै: ।
सुहृदः प्रकृतीर्दारानुपायुड्र, ततः स्वयम् ॥
१३॥
संविभज्य--बाँट कर; अग्रत:ः--पहले; विप्रानू--ब्राह्मणों को; सत्रकू--मालाएँ; ताम्बूल--पान; अनुलेपनै: --तथा चन्दन-लेपसे; सुहृदः --अपने मित्रों; प्रकृती:--अपने मंत्रियों; दारानू-- अपनी पत्रियों; उपायुड्र --काम में लाते; ततः--तब; स्वयम्--स्वयम्।
सर्वप्रथम ब्राह्मणों को पुष्प-मालाएँ, पान तथा चन्दन-लेप बाँटकर इन्हीं उपहारों को अपनेमित्रों, मंत्रियों तथा पत्नियों को देते और अन्त में स्वयं इनका उपभोग करते।
तावत्सूत उपानीय स्यन्दनं परमाद्भुतम् ।
सुग्रीवाद्यैहयैर्युक्ते प्रणम्यावस्थितोग्रतः ॥
१४॥
तावतू--तब तक; सूतः--सारथी; उपानीय--लाकर; स्यन्दनम्--रथ को; परम--अत्यन्त; अद्भुतम्-- अद्भुत; सुग्रीव-आह्यैः--सुग्रीव नाम के तथा अन्य; हयै:--घोड़ों से; युक्तम्--जुता हुआ; प्रणम्य--प्रणाम करके; अवस्थित:--खड़ा हुआ;अग्रतः--उनके सामने।
तब तक भगवान् का सारथी उनके अत्यन्त अद्भुत रथ को ले आता जिसमें सुग्रीव तथाउनके अन्य घोड़े जुते होते।
तत्पश्चात् उनका सारथी उन्हें नमस्कार करता और उनके समक्ष आखड़ा होता।
गृहीत्वा पाणिना पाणी सारथेस्तमथारुहत् ।
सात्यक्युद्धवसंयुक्तः पूर्वाद्रिमिव भास्कर: ॥
१५॥
गृहीत्वा--पकड़ कर; पाणिना--अपने हाथ से; पाणी--हाथ; सारथे: --अपने सारथी के; तम्--उसको; अथ--तब;आरुहत्--चढ़ गये; सात्यकि-उद्धव--सात्यकि तथा उद्धव से; संयुक्त:--संग में; पूर्व--पूर्व की ओर का; अद्विम्--पर्वत;इब--मानो; भास्कर: --सूर्य |
अपने सारथी के हाथों को पकड़ कर भगवान् कृष्ण सात्यकि तथा उद्धव के साथ साथ रथपर इस तरह चढ़ते मानो सूर्य पूर्व के पर्वत ( उदयाचल ) पर उदय हो रहा हो।
ईक्षितोन्तःपुरस्त्रीणां सब्रीडप्रेमवीक्षितैः ।
कृच्छाद्विसृष्टो निरगाज्जातहासो हरन्मन: ॥
१६॥
ईक्षित:--देखे गये; अन्त:-पुर--महल की; स्त्रीणाम्--स्त्रियों के; स-ब्रीड-- लजीली; प्रेम--तथा प्रेमपूर्ण; वीक्षितै:--चितवनोंसे; कृच्छात्--कठिनाई से; विसृष्ट:--छूट कर; निरगात्--छुटकारा पाकर; जात-- प्रकट; हास:--हँसी; हरन्--चुराते; मन:--उनके मनों को।
महल की स्त्रियाँ भगवान् कृष्ण को लजीली प्रेममणमयी चितवनों से देखतीं और इस तरह वेमुश्किल से उनसे छूट पाते।
तत्पश्चात् वे अपने हँसीयुक्त मुख से उनके मन को चुराते हुए चलपड़ते।
सुधर्माख्यां सभां सर्वैर्वृष्णिभि: परिवारित: ।
प्राविशद्यन्निविष्टानां न सन्त्यड्र षडूर्मय: ॥
१७॥
सुधर्मा-आख्याम्--सुधर्मा नामक; सभामू--राजसभो-भवतन में; सर्वै:--सभी; वृष्णिभि: --वृष्णियों द्वारा; परिवारित: --सम्मिलित हुए; प्राविशत्--प्रविष्ट हुए; यत्--जो; निविस्तानामू--प्रविष्ट हुओं के लिए; न सन्ति--नहीं हैं; अड्र--हे राजा( परीक्षित ); षघट्ू--छ:; ऊर्मय: --तरंगें |
हे राजन, भगवान् समस्त वृष्णियों के साथ साथ उस सुधर्मा सभाभवन में प्रवेश करते, जोउसमें प्रवेश करने वालों को भौतिक जीवन की छह तरंगों से रक्षा करता है।
तत्रोपविस्तः परमासने विभु-बभौ स्वभासा ककुभोवभासयन् ।
बृतो नृसिंहैर्यदुभिय्यदूत्तमोयथोडुराजो दिवि तारकागणै: ॥
१८॥
तत्र--वहाँ; उपविष्ट: --बैठे; परम-आसने--उच्च सिंहासन पर; विभु:--सर्वशक्तिमान प्रभु; बभौ--चमकते; स्व--अपने;भासा--तेज से; ककुभ:--आकाश के कोने; अवभासयनू-प्रकाशित करते हुए; बृतः--घिरे हुए; त्र्--मनुष्य के रूप;सिंहैः--सिंहों द्वारा; यदुभि:--यदुओं द्वारा; यदु-उत्तम:--यदुओं में सर्व श्रेष्ठ यथा--जिस तरह; उडु-राज:--चन्द्रमा; दिवि--आकाश में; तारका-गणैः--तारों से (घिरा हुआ )
जब उस सभाभवतन में सर्वशक्तिमान भगवान् अपने श्रेष्ठ सिंहासन पर विराजमान होते तो वेअपने अद्वितीय तेज से आकाश की दिशाओं को प्रकाशित करते हुए शोभायमान होते।
पुरुषों मेंसिंह रूप यदुओं से घिर कर वे यदुश्रेष्ठ वैसे ही प्रतीत होते जैसे कि अनेक तारों के बीच चन्द्रमा।
तत्रोपमन्त्रिणो राजन्नानाहास्यरसैर्विभुम् ।
उपतस्थुर्नटाचार्या नर्तक्यस्ताण्डवै: पृथक् ॥
१९॥
तत्र--वहाँ; उपमन्त्रिण: --विदूषक; राजनू--हे राजन्; नाना--विविध; हास्य--हास्य; रसैः--रसों के द्वारा; विभुम्ू-- भगवान्को; उपतस्थु: --उन्होंने सेवा की; नट-आचार्या:--दक्ष मनोविनोद करने वाले; नर्तक्य:--नर्तकियाँ; ताण्दवै:--कलापूर्ण नृत्यसे; पृथक्ू--अलग से
हे राजन, वहाँ पर विदूषक विविध हास्य रसों का प्रदर्शन करके भगवान् का मनोरंजनकरते, दक्ष नर्तक उनके लिए अभिनय करते और नर्तकियाँ ओजपूर्ण नृत्य प्रस्तुत करतीं ।
मृदड्रवीणामुरजवेणुतालदरस्वनै: ।
ननृतुर्जगुस्तुष्टवुश्न सूतमागधवन्दिन: ॥
२०॥
मृदड्--मृदंग; वीणा--वीणा; मुरज--तथा मुरज का, एक प्रकार का अन्य ढोल; वेणु--बाँसुरी; ताल--मंजीरें; दर--तथाशंख के; स्वनैः-- ध्वनि सहित; ननृतु:--नृत्य किया; जगुः--गाया; तुष्ट॒बु:-- प्रशंसा की; च--तथा; सूत--भाट; मागध--तथाचारण; वन्दिन:--तथा वंदीजन
ये अभिनयकर्ता मृदंग, वीणा, मुरज, वंशी, मंजीरा तथा शंख की ध्वनि के साथ नाचते औरगाते, जबकि पेशेवर कवि, मागध तथा वन्दीजन भगवान् के यश का गायन करते।
तत्राहुर्ब्राह्मणा: केचिदासीना ब्रह्मवादिन: ।
पूर्वेषां पुण्ययशसां राज्ञां चाकथयन्कथा: ॥
२१॥
तत्र--वहाँ; आहु: --बोले; ब्राह्मणा:--ब्राह्मणणण; केचित्--कुछ; आसीना:--बैठे हुए; ब्रह्म--वेदों के; वादिन:--ज्ञाता;पूर्वषाम्-- भूतकाल के; पुण्य--पवित्र; यशसाम्--जिनका यश्ञ; राज्ञामू--राजाओं का; च--तथा; आकथयनू--सुनाते;कथा:--कथाएँ।
कुछ ब्राह्मण उस सभाभवन में बैठ कर बैदिक मंत्रों का सस्वर पाठ करते और कुछपूर्वकालीन पवित्र कीर्ति वाले राजाओं की कथाएँ कह कर सुनाते।
तत्रैकः पुरुषो राजन्नागतोपूर्वदर्शन: ।
विज्ञापितो भगवते प्रतीहारैः प्रवेशित: ॥
२२॥
तत्र--वहाँ; एक:--एक; पुरुष: --व्यक्ति; राजनू--हे राजा ( परीक्षित ); आगत:--आया; अपूर्व--जिसके पहले कभी नहीं;दर्शन:--जिसका प्राकटय; विज्ञापित:--आने की सूचना दी; भगवते-- भगवान् से; प्रतीहारैः--द्वारपालों के द्वारा; प्रवेशित:--भीतर जाने दिया गया।
हे राजनू, एक बार एक व्यक्ति उस सभा में आया जो इसके पूर्व वहाँ कभी नहीं देखा गयाथा।
द्वारपालों ने उसके आने की जानकारी भगवान् को दी और तब वे उसे भीतर लेकर आये।
स नमस्कृत्य कृष्णाय परेशाय कृताझलिः ।
राज्ञामावेदयहुःखं जरासन्धनिरोधजम् ॥
२३॥
सः--उसने; नमस्कृत्य--नमस्कार करके; कृष्णाय--भगवान् कृष्ण को; पर-ईशाय--परमेश्वर; कृत-अज्जलि:--हाथ जोड़कर; राज्ञामू--राजाओं के; आवेदयत्--निवेदन किया; दुःखम्--कष्ट; जरासन्ध--जरासन्ध द्वारा; निरोध-जम्--बन्दी बनायेजाने के कारण।
उस व्यक्ति ने भगवान् कृष्ण को नमस्कार किया और हाथ जोड़ कर उनको बतलाया किजरासन्ध द्वारा बन्दी बनाये जाने के कारण किस तरह अनेक राजा कष्ट भोग रहे हैं।
ये च दिग्विजये तस्य सन्नतिं न ययुर्नुपा: ।
प्रसह्य रुद्धास्तेनासन्नयुते द्वे गिरित्रजे ॥
२४॥
ये--जो; च--तथा; दिक्ू-विजये--सभी दिशाओं में विजय के समय; तस्य--उसकी ( जरासन्ध की ); सन्नतिम्-पूर्णअधीनता; न ययु:--स्वीकार नहीं किया; नृपा: --राजा; प्रसह्य--बलपूर्वक; रुद्धा:--बन्दी बनाये गये; तेन--उसके द्वारा;आसनू--थे; अयुते--दस हजार; द्वे--दो; गिरि-ब्रजे--गिरित्रज नामक किले में |
जिन बीस हजार राजाओं ने जरासन्ध की दिग्विजय के समय पूर्ण अधीनता स्वीकार नहींकी थी, वे उसके द्वारा बलपूर्वक गिरिब्रज नामक किले में बन्दी बना लिये गये थे।
राजान ऊचु:कृष्ण कृष्णाप्रमेयात्मन्प्रपन्नभयभज्जन ।
वबयं त्वां शरणं यामो भवभीता: पृथग्धिय: ॥
२५॥
राजान:--राजाओं ने; ऊचु:--कहा; कृष्ण कृष्ण--हे कृष्ण, हे कृष्ण; अप्रमेय-आत्मन्--हे अमाप्य आत्मा; प्रपन्न--शरणागतलोगों के; भय--डर के; भद्न--हे नष्ट करने वाले; वयम्--हम; त्वाम्--तुम्हारी; शरणम्--शरण में; याम:--आये हैं;भव--संसार से; भीता:--डरे हुए; पृथक्ू--अलग; धिय:--जिनकी मनोवृत्ति।
दूत के द्वारा दिये गये वृत्तान्त के अनुसार राजाओं ने कहा : हे कृष्ण, हे कृष्ण, हेअप्रमेय आत्मा, हे शरणागतों के भय के विनाशक, हम पृथक् पृथक् मत रखने के बावजूदसंसार से भयभीत होकर आपके पास शरण लेने आये हैं।
लोको विकर्मनिरतः कुशले प्रमत्तःकर्मण्ययं त्वदुदिते भवदर्चने स्वे ।
यस्तावदस्य बलवानिह जीविताशांसद्यश्छिनत्त्यनिमिषाय नमोउस्तु तस्मै ॥
२६॥
लोकः--सारा संसार; विकर्म--पापकर्मों में; निरतः--सदैव लिप्त; कुशले--उनके लाभ के लिए; प्रमत्त:--मोह ग्रस्त;कर्मणि--कार्यो में; अयम्--यह ( जगत ); त्वत्--तुम्हारे द्वारा; उदिते--कहे गये; भवत्--आपका; अर्चने--पूजा में; स्वे--अपनी ( लाभप्रद कार्य ); यः--जो; तावत्--तब तक; अस्य--इस ( जगत का ); बल-वान्--शक्तिशाली; इह--इस जीवन में;जीवित--दीर्घायु के लिए; आशाम्--आशा; सद्य:--सहसा; छिनत्ति--काट देता है; अनिमिषाय--पलक झपकने तक केसमय को; नमः--नमस्कार; अस्तु--हो; तस्मै--उसको ।
इस जगत में लोग सदैव पापकर्मों में लगे रहते हैं और इस तरह वे अपने असली कर्तव्य केविषय में, जो आपके आदेशानुसार आपकी पूजा करना है, विशभ्रमित रहते हैं।
इस कार्य सेसचमुच ही उन्हें सौभाग्य प्राप्त हो सकता है।
हम सर्वशक्तिमान भगवान् को नमस्कार करते हैं,जो काल रूप में प्रकट होते हैं और इस जगत में दीर्घायु की प्रबल आशा को सहसा छिन्न करदेते हैं।
लोके भवाझ्जगदिन: कलयावतीर्ण:सद्रक्षणाय खलनिग्रहणाय चान्य: ।
कश्चित्त्तदीयमतियाति निदेशमीशकि वा जन: स्वकृतमृच्छति तन्न विद्या: ॥
२७॥
लोके--इस जगत में; भवान्ू--आप; जगत्--ब्रह्माण्ड का; इन:-- प्रधान; कलया--अपने अंश बलदेव के साथ अथवा अपनीकालशक्ति के साथ; अवतीर्ण:--अवतरित होकर; सत्--सन्त पुरुषों की; रक्षणाय--रक्षा करने हेतु; खल--दुष्ट का;निग्रहणाय--दमन करने के लिए; च--तथा; अन्य:--दूसरा; कश्चित्--कोई; त्वदीयम्--तुम्हारे; अतियाति-- उल्लंघन करताहै; निदेशम्--नियम का; ईश-हे प्रभु; किम् वा--अथवा; जनः--कोई व्यक्ति; स्व--अपने से; कृतम्ू--बनाया गया;ऋच्छति--पा लेता है; तत्--उसे; न विद्यः--हम नहीं जानते ।
आप विश्व के अधिष्ठाता प्रभु हैं और आप इस जगत में सन््तों की रक्षा करने तथा दुष्टों कादमन करने के लिए अपनी निजी शक्ति के साथ अवतरित हुए हैं।
हे प्रभु, हम यह समझ नहींपाते कि कोई आपके नियम का उल्लंघन करने पर भी अपने कर्म के फलों को कैसे भोगसकता है?
स्वप्नायितं नृपसुखं परतन्त्रमीशशश्वद्धयेन मृतकेन धुरं वहामः ।
हित्वा तदात्मनि सुखं त्वदनीहलभ्यंक्लिश्यामहेउतिकृपणास्तव माययेह ॥
२८॥
स्वप्नायितम्--स्वप्न की तरह; नृप--राजाओं के; सुखम्--सुख को; पर-तन्त्रमू--बद्ध; ईश-हे प्रभु; शश्वत्--नित्य;भयेन-- भय से; मृतकेन--इस शव से; धुरम्ू--बोझ को; वहाम:--ढो रहे हैं; हित्वा--छोड़ कर; तत्--उस; आत्मनि--आत्माके भीतर; सुखम्--सुख को; त्वत्ू--आपके लिए किया गया; अनीह--निःस्वार्थ कार्य से; लभ्यम्--प्राप्त होने वाले;क्लिश्यामहे--कष्ट भोगते हैं; अति--अत्यधिक; कृपणा:--अभागे; तब--आपकी; मायया--माया से; इह--इस संसार में |
हे प्रभु, इस शवतुल्य शरीर से, जो कि सदैव भय से ओतप्रोत रहता है, हम राजा लोग सुखके बोझ को स्वप्न की तरह वहन करते हैं।
इस तरह हमने असली आत्म-सुख को त्याग दिया है,जो आपकी निस्वार्थ सेवा करने से प्राप्त होता है।
इतने अधिक अभागे होने से हम आपकी मायाके पाश के अन्तर्गत कष्ट भोग रहे हैं।
तन्नो भवान्प्रणशशोकहराडूप्रियुग्मोबद्धान्वियुद्द्थ मगधाह्यकर्मपाशात् ।
यो भूभुजोयुतमतड़जवीर्यमेकोबिभ्रद्ररोध भवने मृगराडिवावी: ॥
२९॥
तत्--इसलिए; नः--हमको; भवान्--आप; प्रणत--शरणागतों के; शोक--शोक; हर--हरने वाले; अद्भपघ्रि--पाँवों की;युग्म:--जोड़ी; बद्धान्ू--बद्ध; वियुद्क्ष्व--कृपया छुड़ा दें; मगध-आह्य--मगध नामक ( जरासन्ध ); कर्म--सकाम कर्म की;पाशात्--जंजीरों से; यः--जो; भू-भुज:--राजा का; अयुत--दस हजार; मतम्--उन्मत्त; गज--हाथियों के; वीर्यम्--पराक्रम;एक: --अकेले; बिश्रत्ू--वश में करके; रुरोध--बन्दी बना लिया; भवने--अपने घर में; मृग-राट्--पशुओं का राजा, सिंह;इब--जिस तरह; अवी:--भेड़ों को
इसलिए आप हम बन्दियों को कर्म के बन्धनों से, जो कि मगध के राजा के रूप में प्रकट हुए हैं, मुक्त कीजिये, क्योंकि आपके चरण उन लोगों के शोक को हरने वाले हैं, जो उनकीशरण में जाते हैं।
दस हजार उन्मत्त हाथियों के पराक्रम को वश में करके अकेले उसने हम सबोंको अपने घर में उसी तरह बन्दी कर रखा है, जिस तरह कोई सिंह भेड़ों को पकड़ लेता है।
यो बै त्वया द्विनवकृत्व उदात्तचक्रभग्नो मृथधे खलु भवन्तमनन्तवीर्यम् ।
जित्वा नुलोकनिरतं सकूदूढदर्पोयुष्मत्प्रजा रुजति नोउजित तद्विधेहि ॥
३०॥
यः--जो; वै--निस्सन्देह; त्ववा--तुम्हारे द्वारा; द्वि--दो बार; नव--नौ; कृत्व:--गुणित; उदात्त--ऊपर उठा हुआ; चक्र --हेचक्रधारी; भग्न: -- कुचला हुआ; मृधे--युद्ध में; खलु--निश्चय ही; भवन्तम्--आप; अनन्त--असीम; वीर्यम्--शक्ति;जित्वा--जीतकर; त्रू-लोक--मानवीय मामलों में; निरतम्--लीन; सकृत्ू--केवल एक बार; ऊढ--बढ़ा हुआ; दर्प:--गर्व;युष्मत्--तुम्हारी; प्रजा:--जनता; रुजति--सताती है; नः--हमको; अजित--हे अजित; तत्--उसे; विधेहि--कृपा करके ठीककर दें।
हे चक्रधारी, आपकी शक्ति अथाह है और इस तरह आपने जरासन्ध को युद्ध में सत्रह बारकुचला है।
किन्तु मानवीय कामकाज में लीन होने से आपने उसे आप को पराजित करने काएक बार अवसर दिया है।
अब वह गर्व से इस कदर फूला हुआ है कि आपकी जनता रूप हमसबों को, सताने का दुस्साहस कर रहा है।
हे अजित, आप इस स्थिति को सुधारें।
दूत उबाचइति मागधसंरुद्धा भवदर्शनकड्क्षिण: ।
प्रपन्ना: पादमूलं ते दीनानां शं विधीयताम् ॥
३१॥
दूतः उबाच--सन्देशवाहक ने कहा; इति--इस प्रकार; मागध--जरासश्य द्वारा; संरुद्धा:--बन्दी बनाये गये; भवत्-- आपके;दर्शन--दर्शन के लिए; का्ड्क्षिण:--उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करते हुए; प्रपन्ना:--शरणागत; पाद--चरणों के; मूलमू--तले;ते--तुम्हारे; दीनानामू--दीनों के; शम्--लाभ; विधीयताम्--कृपया प्रदान करें।
दूत ने आगे कहा : यह जरासन्ध के द्वारा बन्दी बनाये गये राजाओं का सन्देश है।
वे सभीआपके दर्शनों के लिए लालायित हैं, क्योंकि उन्होंने अपने को आपके चरणों में समर्पित करदिया है।
कृपा करके इन बेचारों को सौभाग्य प्रदान करें।
श्रीशुक उबाचराजदूते ब्रुव॒त्येवं देवर्षि: परमद्युतिः ।
बिश्रत्पिड्रजटाभारं प्रादुरासीद्यथा रवि: ॥
३२॥
श्री-शुक: उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; राज--राजाओं के; दूते--दूत के; ब्रुवति--बोल चुकने पर; एवम्--इस प्रकार;देव--देवताओं के; ऋषि:--ऋषि ( नारदमुनि ); परम--परम; द्युतिः--तेज; बिभ्रत्ू--धारण किये; पिड़--पीला सा; जटा--बालों के समूह के; भारम्-भार; प्रादुरासीत्--प्रकट हुए; यथा--जिस तरह; रवि:--सूर्य
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब राजाओं का दूत इस तरह बोल चुका, तो देवर्षि नारदसहसा प्रकट हुए।
सिर पर सुनहरे रंग की जटा धारण किये परम तेजस्वी ऋषि प्रकाशमान सूर्यकी तरह लग रहे थे।
त॑ दृष्ठा भगवान्कृष्ण: सर्वलोके श्ररेश्वरः ।
वबन्द उत्थित: शीर्ष्णा ससभ्य: सानुगो मुदा ॥
३३॥
तम्--उसको; दृष्टा--देखकर; भगवनू-- भगवान्; कृष्ण: -- कृष्ण ने; सर्व--समस्त; लोक--लोकों के; ईश्वर--नियन्ताओं केभी; ईश्वरः--नियन्ता; ववन्द-- नमस्कार किया; उत्थित:--उठकर; शीर्ष्णा--अपने सिर के बल; स--सहित; सभ्य:--सभा केसदस्यों; स--सहित; अनुग: --अनुयायियों; मुदा--हर्ष के साथ ।
भगवान् कृष्ण जो ब्रह्म तथा शिव जैसे लोके श्वरों के भी पूज्य स्वामी हैं फिर भी ज्योंहीउन्होंने नारदमुनि को आते देखा, तो वे अपने मंत्रियों तथा सचिवों समेत महर्षि का स्वागत करनेतथा अपना सिर झुकाकर उन्हें सादर नमस्कार करने के लिए सहर्ष खड़े हो गये।
सभाजयित्वा विधिवत्कृतासनपरिग्रहम् ।
बभाषे सुनृतैर्वाक्यै: श्रद्धया तर्पयन्मुनिम् ॥
३४॥
सभाजयित्वा--पूजा करके; विधि-वत्--शास्त्रों के आदेशानुसार; कृत--जिसने किया था उसको ( नारद को ); आसन--आसन का; परिग्रहम्--स्वीकार किया जाना; बभाषे--( श्रीकृष्ण ) बोले; सु-नृतैः--सत्य तथा मधुर; वाक्यै: --शब्दों से;श्रद्धया-- श्रद्धापूर्वक; तर्पयन्--तुष्ट करते हुए; मुनिम्ू--मुनि को |
जब नारद, उन्हें निवेदित किया गया आसन ग्रहण कर चुके, तो भगवान् ने शास्त्रीय विधियोंसे मुनि का स्वागत किया और सम्मानपूर्वक तुष्ट करते हुए उनसे निम्नलिखित सत्यनिष्ठ तथामधुर शब्द कहे।
अपि स्विदद्य लोकानां त्रयाणामकुतोभयम् ।
ननु भूयान्भगवतो लोकान्पर्यटतो गुण: ॥
३५॥
अपि स्वित्ू--निश्चय ही; अद्य--आज; लोकानाम्--लोकों के; त्रयाणामू--तीनों; अकुतः-भयम्-- भय से पूर्ण मुक्ति; ननु--निस्सन्देह; भूयानू--महान्; भगवतः--शक्तिशाली पुरुष का; लोकान्--समस्त लोकों में; पर्यटतः--विचरण करने वाले;गुण:-गुण |
भगवान् कृष्ण ने कहा : यह निश्चित है कि आज तीनों लोकों ने समस्त भय से मुक्तिप्राप्त कर ली है, क्योंकि यह आप जैसे सारे लोकों में स्वच्छन््द विचरण करने वाले महापुरुष काप्रताप है।
न हि तेविदितं किझ्ञिल्लोकेष्वी श्वरकर्तृषु ।
अथ पृच्छामहे युष्मान्पाण्डवानां चिकीर्षितम् ॥
३६॥
न--नहीं; हि--निस्सन्देह; ते--तुमको; अविदितम्--अज्ञात; किश्ञितू--कुछ भी; लोकेषु--लोकों में; ईश्वर --पर मे श्वर;कर्तृषु--बनाने वाले; अथ--इस तरह; पृच्छामहे --हम जिज्ञासा करें; युष्मान्ू--आपसे; पाण्डवानाम्-पाण्डु-पुत्रों के;चिकीर्षितम्--मनोभावों के विषय में |
ईश्वर की सृष्टि के भीतर ऐसी कोई वस्तु नहीं, जो आपको ज्ञात न हो।
अतएवं कृपा करकेहमें बतलायें कि पाण्डव क्या करना चाहते हैं ?
श्रीनारद उवाचइृष्टा माया ते बहुशो दुरत्ययामाया विभो विश्वसृजश्च मायिन: ।
भूतेषु भूम॑ श्वरत: स्वशक्तिभि-वह्विरिव च्छन्नरुचो न मेद्भधुतम् ॥
३७॥
श्री-नारदः उबाच-- श्री नारद ने कहा; दृष्टा--देखी गयी; मया--मेरे द्वारा; ते--तुम्हारी; बहुश:-- अनेक बार; दुरत्यया--दुल॑ध्य; माया--मोहिनी शक्ति; विभो--हे सर्वशक्तिमान; विश्व--ब्रह्मण्ड के; सृज:--स्त्रष्टा ( ब्रह्म ) का; च--तथा;मायिन:--मोहने वाले ( आप ) का; भूतेषु--जीवों में; भूमन्--हे सर्वव्यापक; चरत:--विचरण करने वाले ( आपका ); स्व--अपनी; शक्तिभि:--शक्तियों से; वह्नेः--अग्नि की; इब--तरह; छन्न--ढका हुआ; रुच:-- प्रकाश; न--नहीं; मे--मेरे लिए;अद्भुतमू--अद्भुत |
श्री नारद ने कहा: हे सर्वशक्तिमान, मैं आपकी माया की दुर्लघ्य शक्ति को, जिससेब्रह्माण्ड के सत्रष्टा ब्रह्म तक को आप मोहित कर लेते हैं, कई बार देख चुका हूँ।
हे भूमन्, इसमेंमुझे तनिक भी आश्चर्य नहीं लगता कि आप जीवों के बीच विचरण करते हुए अपने को अपनीही शक्तियों से छिपा लेते हैं, जिस तरह अग्नि अपने ही प्रकाश को धुएँ से ढक लेती है।
तवेहितं कोईहति साधु वेदितुस्वमाययेदं सृजतो नियच्छत: ।
यद्विद्यमानात्मतयावभासतेतस्मै नमस्ते स्वविलक्षणात्मने ॥
३८॥
तव--तुम्हारा; ईहितम्-- उद्देश्य; कः--कौन; अ्हति--समर्थ है; साधु--उचित रीति से; वेदितुमू--समझ पाने के लिए; स्व--अपनी; मायया--भौतिक शक्ति से; इृदम्--इस ( ब्रह्माण्ड ) को; सृजत:--बनाता है; नियच्छत:--तथा विलीन कर देता है;यत्--जो; विद्यमान--उपस्थित होना; आत्मतया--आप परमात्मा के सम्बन्ध द्वारा; अवभासते--प्रतीत होता है; तस्मै--उसे;नमः--नमस्कार; ते--तुमको; स्व--अपनी ही प्रकृति द्वारा; विलक्षण-आत्मने--अचिन्त्य |
भला आपके उद्देश्य को सही सही कौन समझ सकता है? अपनी भौतिक शक्ति से आप इससृष्टि का विस्तार करते हैं और फिर इसे अपने में लीन कर लेते हैं, जिससे प्रतीत होता है किइसका वास्तविक अस्तित्व है।
आपको नमस्कार है, जिनकी दिव्य स्थिति अचिन्त्य है।
जीवस्य यः संसरतो विमोक्षणंन जानतो<नर्थवहाच्छरीरत: ।
लीलावतारै: स्वयशः प्रदीपकंप्राज्वालयत्त्वा तमहं प्रपद्यो ॥
३९॥
जीवस्य--बद्धजीव के लिए; यः--जो ( भगवान् ); संसरत:--जन्म-मृत्यु के चक्र में जकड़ा ( बद्धजीव ); विमोक्षणम्--मुक्ति;न जानतः--न जानते हुए; अनर्थ--अवांछित वस्तुएँ; वहात्--जो लाता है; शरीरतः--भौतिक शरीर से; लीला--लीलाओं केलिए; अवतारैः--इस जगत में अवतार लेकर; स्व--अपना; यशः--यश ; प्रदीपकम्--दीपक; प्राज्वालयत्--जलवाया; त्वा--तुम; तमू--उस भगवान् की; अहम्--मैं; प्रपद्े--शरण में जाता हूँ।
जन्म तथा मृत्यु के चक्र में फँसा जीव यह नहीं जानता कि भौतिक शरीर से, जिससे उसे इतना कष्ट मिलता है, किस प्रकार छुटकारा पाया जाये।
किन्तु हे परमेश्वर, आप विविध स्वरूपोंमें इस जगत में अवतरित होते हैं और अपनी लीलाएँ करके अपने यश की प्रज्वलित मशाल सेजीव के मार्ग को आलोकित कर देते हैं।
इसलिए मैं आपकी शरण में जाता हूँ।
अथाप्याश्रावये ब्रह्न नरलोकविडम्बनम् ।
राज्ञः पैतृष्वस्त्रेयस्य भक्तस्य च चिकीर्षितम् ॥
४०॥
अथ अपि--फिर भी; आश्रावये--मैं बतलाऊँगा; ब्रह्म--हे परम सत्य; नर-लोक--मानव समाज के; विडम्बनम्--( आपसे )जो अनुकरण करते हैं; राज्अ:--राजा ( युधिष्ठिर ) का; पैतू--आपके पिता की; स्वस्त्रेयय्य--बहन के पुत्र के; भक्तस्य--आपकेभक्त; च--तथा; चिकीर्षितम्--मनोभाव |
तो भी, मनुष्य का अभिनय कर रहे हे परम सत्य, मैं आपको बतलाऊँगा कि आपके बुआके पुत्र युधिष्ठिर महाराज क्या करना चाहते हैं।
यक्ष्यति त्वां मखेन्द्रेण राजसूयेन पाण्डव: ।
पारमेष्ठग्यकामो नृपतिस्तद्धवाननुमोदताम् ॥
४१॥
यक्ष्यति--यज्ञ करेगा; त्वामू--तुमको; मख--यज्ञ का; इन्द्रेण--सबसे बड़े; राजसूयेन--राजसूय के द्वारा; पाण्डवः--पाण्डु केपुत्र; पारमेछ्य--एकछत्र सत्ता; काम:--इच्छा करते हुए; नू-पति:--राजा; तत्--उस; भवानू--आप; अनुमोदताम्--कृपयाअनुमोदन कीजिये।
राजा युधिष्ठिर एकछत्र सत्ता की इच्छा से राजसूय नामक महानतम यज्ञ द्वारा आपकी पूजाकरना चाहते हैं।
कृपा करके उनके इस प्रयास के लिए आशीर्वाद प्रदान करें।
तस्मिन्देव क्रतुवरे भवन्तं वै सुरादय: ।
दिदक्षव: समेष्यन्ति राजानश्च यशस्विन: ॥
४२॥
तस्मिनू--उसमें; देव--हे प्रभु; क्रतु--यज्ञों के; वरे-- श्रेष्ठ; भवन््तम्ू-- आप; बै--निस्सन्देह; सुर--देवता; आदय:--तथा अन्यमहापुरुष; दिहृक्षव: --देखने के इच्छुक; समेष्यन्ति--सभी आयेंगे; राजान:--सारे राजा; च-- भी; यशस्विन:--यशस्वी |
हे प्रभु, आपको देखने के इच्छुक सारे श्रेष्ठ देवता तथा यशस्वी राजा उस श्रेष्ठ यज्ञ मेंआयेंगे।
श्रवणात्कीर्तनाद्धयानात्पूयन्तेडन्तेवसायिन: ।
तव ब्रह्ममयस्येश किमुतेक्षाभिमशिन: ॥
४३॥
श्रवणात्--सुनने से; कीर्तनातू--कीर्तन करने से; ध्यानातू--तथा ध्यान करने से; पूयन्ते--पवित्र हो जाते हैं; अन्ते-वसायिन:--जाति से निकाले अन्त्यज; तब--आपके विषय में; ब्रह्म-मयस्य--परम सत्य की पूर्ण अभिव्यक्ति; ईश-हे प्रभु; किम् उत--तोफिर क्या कहा जाय; ईक्षा--देखने वाले; अभिमर्शिन:ः --तथा स्पर्श करने वाले
हे प्रभु, आपके यश का श्रवण तथा कीर्तन करने से तथा ब्रह्मरूप आपका ध्यान करने सेजाति से निकाले गये ( अन्त्यज ) लोग भी शुद्ध हो जाते हैं।
तो फिर उनके विषय में क्या कहाजाय जो आपको देखते हैं और आपका स्पर्श करते हैं ?
यस्यामलं दिवि यश: प्रथितं रसायांभूमौ च ते भुवनमड़ल दिग्वितानम् ।
मन्दाकिनीति दिवि भोगवतीति चाधोगड़ेति चेह चरणाम्बु पुनाति विश्वम् ॥
४४॥
यस्य--जिसका; अमलम्--विशुद्ध; दिवि--स्वर्ग में; यश:--यश; प्रथितम्--विस्तीर्ण; रसायाम्--रसातल में; भूमौ--पृथ्वीपर; च--तथा; ते--तुम्हारा; भुवन--सारे लोकों के लिए; मड्रल--हे सौभाग्यदाता; दिक्ू--दिशाओं में; वितानम्--चँदोवा,प्रसार; मन्दाकिनी इति--मन्दाकिनी नाम से; दिवि--स्वर्ग में; भोगबती इति-- भोगवती नामक; च--तथा; अध: --नीचे; गड्ढाइति--गंगा नाम से; च--तथा; इह--यहाँ, पृथ्वी पर; चरण---आपके चरणों से; अम्बु--जल; पुनाति--पवित्र करती है;विश्वम्--सारे ब्रह्माण्ड को |
हे प्रभु, आप सभी मंगलों के प्रतीक हैं।
आपका दिव्य नाम तथा यश ब्रह्माण्ड के उच्चतर,मध्य तथा अधो लोक सहित समस्त लोकों के ऊपर छत्र के समान फैला हुआ है।
आपकेचरणकमलों को प्रक्षालित करने वाला दिव्य जल उच्चतर लोकों में मन्दाकिनी नदी के नाम से,अधो लोक में भोगवती के नाम से और इस पृथ्वी लोक में गंगा के नाम से विख्यात है।
यहपवित्र दिव्य जल सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रवाहित होता है और जहाँ भी जाता है, उसे पवित्र कर देताहै।
श्रीशुक उबाचतत्र तेष्वात्मपक्षेष्वगृणत्सु विजिगीषया ।
वाच: पेशै: स्मयन्भृत्यमुद्धवं प्राह केशव: ॥
४५॥
श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; तत्र--वहाँ; तेषु--उन ( यादवों ); आत्म--अपना; पक्षेषु--पक्षधरों में;अगृणत्सु--न मानने वाले; विजिगीषया--जीतने की इच्छा से ( जरासन्ध ); वाच:--वाणी के; पेशै:--मधुर प्रयोग से;स्मयन्--हँसते हुए; भृत्यमू--दास; उद्धवम्-- श्री उद्धव से; प्राह--कहा; केशव:--कृष्ण ने
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब जरासन्ध को हराने की इच्छा से भगवान् के पक्षधर यादवोंने इस प्रस्ताव का विरोध किया, तो भगवान् केशव अपने अनुचर उद्धव की ओर मुड़े और हँसतेहुए उत्तम शब्दों में उनसे बोले।
श्रीभगवानुवाचत्वं हि नः परम चश्लु: सुहन्मन्त्रार्थतत्त्तवित् ।
अशात्र ब्रूह्मनुष्ठेयं श्रद्धध्प: करवाम तत् ॥
४६॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; त्वमू--तुम; हि--निस्सन्देह; न:ः--हमारे; परममू--परम; चक्षु;:--आँख; सुहत्--शुभचिन्तक मित्र; मन्त्र--सलाह का; अर्थ--मूल्य; तत्त्व-वित्ू--ठीक से जानने वाले; अथ--इस प्रकार; अत्र--इस सम्बन्ध में;बूहि--कहें; अनुष्ठेयम्ू--करणीय; अ्रददध्म:--हमें विश्वास है; करवाम--करेंगे; तत्--वही |
भगवान् ने कहा : निस्सन्देह तुम हमारे उत्तम नेत्र तथा घनिष्ठ मित्र हो, क्योंकि विविध प्रकारकी सलाहों के आपेक्षिक मूल्य को पूर्णतः जानते हो।
इसलिए तुम हमसे कहो कि इस स्थिति मेंहमें क्या करना चाहिए।
हमें तुम्हारे निर्णय पर विश्वास है और तुम जैसा कहोगे हम वैसा हीकरेंगे।
इत्युपामन्त्रितो भर्त्रा सर्वज्ञेनापि मुग्धवत् ।
निदेशं शिरसाधाय उद्धव: प्रत्यभाषत ॥
४७॥
इति--इस प्रकार; उपामन्त्रितः--अनुरो ध किये जाने पर; भर्त्रा--अपने स्वामी द्वारा; सर्व-ज्ञेन--सर्वज्ञ; अपि--यद्यपि; मुग्ध--मोहग्रस्त; बत्--मानो; निदेशम्--आज्ञा को; शिरस--सिर पर; आधाय-- धारण करके; उद्धवः--उद्धव ने; प्रत्यमभाषत--उत्तरदिया।
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : इस तरह अपने स्वामी द्वारा अनुरोध किये जाने पर, जोकि सर्वज्ञ होते हुए भी मोहित होने का अभिनय कर रहे थे, उद्धव ने उनके इस आदेश कोशिरोधार्य किया और इस प्रकार उत्तर दिया।
