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अध्याय उनहत्तर: नारद मुनि ने द्वारका में भगवान कृष्ण के महलों का दौरा किया
10.69श्रीशुक उवाचनरक निहतं श्रुत्वा तथोद्वाहं च योषिताम् ।
कृष्णेनैकेन बद्वीनां तहिहक्षु; सम नारद: ॥
१॥
चित्र बतैतदेकेन वपुषा युगपत्पृथक् ।
गृहेषु दव्यष्टसाहस्त्रं स्त्रिय एक उदावहत् ॥
२॥
इत्युत्सुको द्वारवतीं देवर्षिद्रष्ठमागमत् ।
पुष्पितोपवनारामद्विजालिकुलनादिताम् ॥
३॥
उत्फुल्लेन्दीवराम्भोजकह्ारकुमुदोत्पलै: ।
छुरितेषु सरःसूच्चै: कूजितां हंससारसै: ॥
४॥
प्रासादलक्षै्नवभिर्जुष्टां स्फाटिकराजतै: ।
महामरकतप्रख्यै: स्वर्णरत्नपरिच्छदै: ॥
५॥
विभक्तरथ्यापथचत्वरापणै:शालासभाभी रुचिरां सुरालयैः ।
संसिक्तमार्गाड्डनवीथिदेहलींपतत्पताकध्वजवारितातपाम् ॥
६॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; नरकम्--नरकासुर को; निहतम्--मारा गया; श्रुत्वा--सुनकर; तथा-- भी;उद्बाहम--विवाह; च--तथा; योषिताम्--स्त्रियों के साथ; कृष्णेन--कृष्ण द्वारा; एकेन--एक; बह्लीनामू--अनेकों के साथ;तत्--वह; दिदक्षुः--देखना चाहते हुए; स्म--निस्सन्देह; नारद:--नारद; चित्रमू-- अद्भुत; बत--हाय; एतत्--यह; एकेन--एकाकी; वपुषा--शरीर से; युगपत्--एकसाथ; पृथक्--भिन्न; गृहेषु--धरों में; द्वि--दो बार; अष्ट--आठ; साहस्त्रमू--हजार;स्त्रियः:--स्त्रियाँ; एक:-- अकेला; उदावहत्--विवाह कर लिया; इति--इस प्रकार; उत्सुक:--उत्सुक; द्वारवतीम्-८द्वारका में;देव--देवताओं के; ऋषि:--मुनि, नारद; द्रष्टम्--देखने के लिए; आगमत्--आये; पुष्पित--फूल खिला हुआ; उपवन--बागोंमें; आराम--तथा विहार उद्यानों; द्विज--पक्षियों; अलि--तथा भौंरों के; कुल--झुंडों के साथ; नादिताम्-- ध्वनित; उत्फुल्ल--खिला हुआ; इन्दीवर--नीले कमल; अम्भोज--दिन में खिलने वाले कमल; कह्ार--सफेद कमल; कुमुद--चाँदनी रात मेंखिलने वाला कमल; उत्पलै:--जल की कुमुदिनियों से; छुरितेषु--पूरित; सरःसु--झीलों में; उच्चै:--जोर जोर; कूजिताम्--आवाज से पूरित; हंस--हंस; सारसैः--तथा सारसों से; प्रासाद--महलों; लक्षैः:--लाखों; नवभि:--नौ; जुष्टामू-- अलंकृत;स्फाटिक--स्फटिक के; राजतैः--तथा चाँदी से बने; महा-मरकत--महान् मरकत मणियों से; प्रख्यै:--जगमगाते; स्वर्ण --सोने; रत्न--तथा रत्नों के; परिच्छदैः--सजावटों से; विभक्त--क्रम से विभाजित; रथ्या--मुख्य गलियों; पथ--सड़कों;चत्वर--चौराहों; आपणैः--तथा बाजार-स्थलों से; शाला-सभाभि:--घरों के समूह सहित; रुचिरामू--मनोहर; सुर--देवताओंके; आलयै:--मन्दिरों से; संसिक्त--जल से सींची; मार्ग--सड़कें; अड्रन-- आँगन; वीधि--व्यापारिक मार्ग; देहलीम्--तथाउपवबन; पतत्--उड़ते हुए; पताक--झंडों से युक्त; ध्वज--झंडे के डंडों से ( ध्वज दण्ड ); वारित--दूर किये हुए; आतपाम्--सूर्य की गर्मी से
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब नारदमुनि ने सुना कि भगवान् कृष्ण ने नरकासुर का वधकर दिया है और अकेले अनेक स्त्रियों के साथ विवाह कर लिया है, तो नारदमुनि के मन में भगवान् को इस स्थिति में देखने की इच्छा हुईं।
उन्होंने सोचा, 'यह अत्यन्त आश्चर्यजनक है किएक ही शरीर में भगवान् ने एकसाथ सोलह हजार स्त्रियों से विवाह कर लिया और वह भीअलग अलग महलों में ।
' इस तरह देवर्षि उत्सुकतापूर्वक द्वारका गये।
यह नगर बगीचों तथा उद्यानों से युक्त था जिसके आसपास पक्षियों तथा भौंरों की ध्वनिगुंजरित थी।
इसके सरोवर खिले हुए इन्दीवर, अम्भोज, कहर, कुमुद तथा उत्पल से भरे हुए थेऔर हंसों तथा सारसों की बोलियों से गुंजायमान थे।
द्वारका को नौ लाख राजमहलों के होने कागर्व था।
ये सारे महल स्फटिक तथा चाँदी के बने थे और विशाल मरकत मणियों सेजाज्वल्यमान थे।
इन महलों के भीतर साज-सामान पर सोने तथा रत्नों की सजावट थी।
यातायात के लिए व्यवस्थित गलियाँ, सड़कें, चौराहे तथा बाजार थे और इस मनोहर नगर मेंअनेक सभाभवन तथा देवमन्दिर शोभा को बढ़ाने वाले थे।
सड़कें, आँगन, व्यापारिक मार्ग तथाघरों के आँगन जल से सींचे हुए थे और लट्टों से लहरा रहे झंडों से सूर्य की गर्मी से छाया पा रहेथे।
तस्यामन्तःपुरं श्रीमदर्चितं सर्वधिष्ण्यपैः ।
हरेः स्वकौशल यत्र त्वष्टा कार्त्स्येन दशितम् ॥
७॥
तत्र घोडशभिः सद्यसहस्त्रै: समलड्डू तम् ।
विवेशैकतोमं शौरे: पतीनां भवन महत् ॥
८॥
तस्याम्--उस ( द्वारका ) में; अन्त:-पुरम्ू--रनिवास; श्री-मत्--ऐश्वर्यवान; अर्चितम्--पूजित; सर्व--सभी; धिष्ण्य--विभिन्नलोकों के; पैः--पालकों द्वारा; हरेः-- भगवान् हरि का; स्व--निजी; कौशलम्--कौशल; यत्र--जहाँ; त्वष्टा--त्वष्टा ( स्वर्ग केशिल्पी विश्वकर्मा ); कार्त्स्येन--पूर्णतया; दर्शितम्--दिखलाया गया; तत्र--वहाँ; षोडशभि:--सोलह; सद्य-- घरों द्वारा;सहस्त्र:--हजार; समलड्डू तम्--सुंदर बनाया हुआ; विवेश--( नारद ) प्रविष्ट हुए; एकतमम्--उनमें से एक; शौरे:-- भगवान्कृष्ण की; पत्लीनाम्ू--पत्नियों के; भवनमू--महल; महत्--विशाल |
द्वारका नगर में एक सुन्दर अन्तःपुर था, जो लोकपालों द्वारा पूजित था।
यह प्रदेश, जहाँविश्वकर्मा ने अपनी सारी दैवी निपुणता दिखलाई थी भगवान् हरि का रिहायशी क्षेत्र था अतःइसे भगवान् कृष्ण की रानियों के सोलह हजार महलों से खूब सजाया गया था।
नारदमुनि इन्हींविशाल महलों में से एक में प्रविष्ट हुए ।
विष्टब्धं विद्रुमस्तम्भेवैंदूर्यफलकोत्तमै: ।
इन्द्रनीलमयै: कुड्यैर्जगत्या चाहतत्विषा ॥
९॥
वितानेर्निर्मितैस्त्वष्टा मुक्तादामविलम्बिभि: ।
दान्तैरासनपर्यड्डै मण्युत्तमपरिष्कृते: ॥
१०॥
दासीभिर्निष्ककण्ठीभि: सुवासोभिरलड्डू तम् ।
पुम्भि: सकञ्जुकोष्णीष सुवस्त्रमणिकुण्डलैः ॥
११॥
रलप्रदीपनिकरद्युतिभिर्निरस्त-ध्वान्तं विचित्रवलभीषु शिखण्डिनोड़ ।
नृत्यन्ति यत्र विहितागुरु धूपमक्षै -निर्यान्तमीक्ष्य घनबुद्धय उन्नदन््त: ॥
१२॥
विष्टब्धम्--टिका; विद्रुम--मूँगे के; स्तम्भेः --ख भों द्वारा; बैदूर्य--वैदूर्य मणियों के; फलक--सजावटी आवरणों से युक्त;उत्तमैः--उत्कृष्ट; इन्द्रनील-मयैः--नीलम से सज्जित; कुड्यैः--दीवालों से; जगत्या--फर्श से; च--तथा; अहत--निरन्तर;त्विषा--तेज से; वितानैः--चँदोवों से; निर्मितैः--निर्मित; त्वष्टा--विश्वकर्मा द्वारा; मुक्ता-दाम--मोतियों की लड़ियों से;विलम्बिभि: --लटककनों से; दान्तै:--हाथी दाँत के; आसन--आसमनों से; पर्यड्ठै :--तथा पलंँगों से; मणि--मणियों; उत्तम--अतीव सुन्दर; परिष्कृतैः--अलंकृत; दासीभि:--दासियों से; निष्क--गले का पेंडल, लॉकेट; कण्ठीभि:--जिनके कण्ठों में;सु-वासोभि: --सुन्दर वस्त्र पहने; अलड्डू तम्ू--अलंकृत; पुम्भि:--मनुष्यों द्वारा; स-कञ्लुक--कवच पहने; उष्णीष--साफा;सु-वस्त्र--सुन्दर कपड़े; मणि--मणिजटित; कुण्डलैः--तथा कुण्डलों से; रत्त--रत्नजटित; प्रदीप--दीपकों के; निकर--समूह; द्युतिभि:-- प्रकाश से; निरस्त-- भगाया हुआ; ध्वान्तम्--अँधेरा; विचित्र--विविध प्रकार के; वलभीषु--छज्जों पर;शिखण्डिन:--मोर; अड्ग--हे प्रिय ( राजा परीक्षित ); नृत्यन्ति--नाचते हैं; यत्र--जहाँ; विहित--रखे गये; अगुरु--अगुरु;धूपम्--धूप; अक्षै:--झरोखों से; निर्यान्तम्--बाहर जाती हुई; ईक्ष्य--देखकर; घन--बादल; बुद्धयः--समझते हुए;उन्नदन््त:ः--जोर से चिल्लाते कूकते
महल को साधने वाले मूँगे के ख भों में वैदूर्य मणि जड़े थे।
दीवालों पर नीलम जड़े थे और'फर्श स्थायी-चमक से चमक रहे थे।
उस महल में त्वष्टा ने चँदोवे बनाये थे जिनसे मोती की लड़ेंलटक रही थीं।
आसन तथा पलंग हाथी के दाँत तथा बहुमूल्य रत्नों से बने हुए थे।
उनकी सेवामें अनेक सुवस्त्राभूषित दासियाँ थीं जो अपने गलों में लॉकेट पहने थीं।
साथ ही कवचधारीरक्षक थे, जो साफा, सुन्दर वर्दी तथा रत्तजटित कुण्डल पहने थे।
अनेक रत्लतजटित दीपों काप्रकाश महल के अंधकार को दूर करने वाला था।
हे राजनू, महल के छज्जों पर जोर जोर सेकुहक रहे मोर नाच रहे थे, जो जालीदार खिड़कियों के छेदों से निकल रहे सुगन्धित अगुरु कोदेखकर भ्रम से बादल समझ रहे थे।
तस्मिन्समानगुणरूपवयःसुवेष-दासीसहस्त्रयुतयानुसवं गृहिण्या ।
विप्रो ददर्श चमरव्यजनेन रुक्म-दण्डेन सात्वतपतिं परिवीजयन्त्या ॥
१३॥
तस्मिन्ू--उसमें; समान--बराबर; गुण--निजी गुण; रूप--सौन्दर्य; बयः--तारुण्य तथा सुन्दर वेश भूषा; सु-वेष--तथा सुंदरवस्त्र; दासी--दासियों द्वारा; सहस्त्र--एक हजार; युतया--युक्त; अनुसवम्--प्रतिक्षण; गृहिण्या-- अपनी पत्नी समेत; विप्र: --विद्वान ब्राह्मण ( नारद ) ने; ददर्श--देखा; चमर--चमरी की पूँछ के; व्यजनेन--पंखे से; रुक्म--सोने के; दण्डेन--मूठ वाली;सात्वत-पतिम्--सात्वतों के स्वामी, श्रीकृष्ण; परिवीजयन्त्या--पंखा झलते हुए
उस महल में विद्वान ब्राह्मण ने सात्वत पति श्रीकृष्ण को उनकी पत्नी के साथ देखा जो सोनेकी मूठ वाली चामर से पंखा झल रही थीं।
वे इस तरह से स्वयं उनकी सेवा कर रही थीं यद्यपिउनकी सेवा में निरन्तर एक हजार दासियाँ लगी थीं जो अपने निजी चरित्र, सौन्दर्य, तारुण्य तथासुन्दर वेशभूषा में उन्हीं के समान थीं।
तं सन्निरीक्ष्य भगवान्सहसोत्थित श्री -पर्यड्भूत: सकलधर्मभूतां वरिष्ठ: ।
आनम्य पादयुगलं शिरसा किरीट-जुष्टेन साज्ललिरवीविशदासने स्वे ॥
१४॥
तम्--उसको ( नारद को ); सन्निरीक्ष्य--देखकर; भगवान्-- भगवान्; सहसा--तुरन्त; उत्थित--उठ गये; श्री--लक्ष्मी, रानीरुक्मिणी के; पर्यड्डूत:--पलंग से; सकल--सारे; धर्म--धर्म के; भृताम्ू-- धारण करने वाले; वरिष्ठ:-- श्रेष्ठ आनम्य--झुककर; पाद-युगलम्--दोनों पैरों को; शिरसा--अपने सिर से; किरीट--मुकुट से; जुष्टेन--युक्त; स-अज्ञलि:--हाथजोड़कर; अवीविशत्--बैठाया; आसने-- आसन पर; स्वे--अपने, निजी भगवान् धर्म के सबसे बड़े धारक हैं।
अतएवं जब उन्होंने नारद को देखा तो वे तुरन्त श्रीदेवी के पलंग पर से उठ खड़े हुए, नारद के चरणों पर मुकुट युक्त सिर को नवाया और अपनेहाथ जोड़कर मुनि को अपने आसन पर बिठाया।
तस्यावनिज्य चरणौ तदप: स्वमूर्ध्नाबिभ्रज्जगद्गुरुतमोपि सतां पतिर्हि ।
ब्रह्मण्यदेव इति यदगुणनाम युक्ततस्यैव यच्चरणशौचमशेषतीर्थम् ॥
१५॥
तस्य--उसके; अवनिज्य-- धोकर; चरणौ--पाँव; तत्--वह; अप:ः--जल; स्व--अपने; मूर्ध्न--सिर पर; बिभ्रत्-लेते हुए;जगत्--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के; गुरु-तम:--परम गुरु; अपि--यद्यपि; सताम्--सनन््त भक्तों के; पति:--स्वामी; हि--निस्सन्देह;ब्रह्मण्य--ब्राह्मणों का पक्ष लेने वाले; देव:--प्रभु; इति--इस प्रकार कहे गये; यत्--चूँकि; गुण--गुण; नाम--नाम;युक्तम--उपयुक्त; तस्थ--उसका; एव--निस्सन्देह; यत्ू--जिसके; चरण--चरणों का; शौचम्-- धोना, प्रक्षालन; अशेष--पूर्ण; तीर्थम्--पवित्र स्थान
भगवान् ने नारद के चरण पखारे और उस जल को अपने सिर पर धारण किया।
यद्यपिभगवान् कृष्ण ब्रह्माण्ड के परम गुरु हैं तथा अपने भक्तों के स्वामी हैं किन्तु इस तरह से आचरणकरना उनके लिए उपयुक्त था क्योंकि उनका नाम ब्रह्मण्यदेव है अर्थात् 'ब्राह्मणों का पक्ष लेनेवाले भगवान्।
इस तरह श्रीकृष्ण ने नारदमुनि के चरण पखार कर उनका सम्मान किया यद्यपिभगवान् के ही चरणों को धोने वाला जल गंगा बन जाता है, जोकि परम तीर्थ हैं।
सम्पूज्य देवऋषिवर्यमृषि: पुराणोनारायणो नरसखो विधिनोदितेन ।
वाण्याभिभाष्य मितयामृतमिष्टया तंप्राह प्रभो भगवते करवाम हे किम् ॥
१६॥
सम्पूज्य--अच्छी तरह पूजा करके; देव--देवताओं में; ऋषि--ऋषि; वर्यम्--सर्वोच्च; ऋषि: --ऋषि; पुराण: -- आदि;नारायण: -- भगवान् नारायण; नर-सख: --नर के मित्र; विधिना--शाम्त्र द्वारा; उदितेन--आदिष्ट; वाण्या--वाणी से;अभिभाष्य--कह कर; मितया--नपी-तुली; अमृत--अमृत से; मिष्टया--मधुर; तम्--उसे, नारद को; प्राह--सम्बोधित किया;प्रभो--हे स्वामी; भगवते-- भगवान् के लिए; करवाम--हम कर सकते हैं; हे--ओ; किम्ू--क्या।
वैदिक आदेशों के अनुसार देवर्षि की समुचित पूजा करने के बाद, नर के मित्र आदि ऋषिनारायण, भगवान् कृष्ण, ने नारद से बातें कीं और भगवान् की नपी-तुली वाणी अमृत की तरहमधुर थी।
अन्त में भगवान् ने नारद से पूछा, 'हे प्रभु एवं स्वामी, हम आपके लिए क्या करसकते हैं ?' श्रीनारद उवाचनैवाद्भुतं त्वयि विभोडईखिललोकनाथेमैत्री जनेषु सकलेषु दम: खलानाम् ।
नि: श्रेयसाय हि जगत्स्थितिरक्षणा भ्यांस्वैरावतार उरुगाय विदाम सुप्ठ ॥
१७॥
श्री-नारदः उबाच-- श्री नारद ने कहा; न--नहीं; एब--तनिक भी; अद्भुतम्--आश्चर्यजनक; त्वयि--आपके लिए; विभो--हेसर्वशक्तिमान; अखिल--समस्त; लोक--लोकों के; नाथे--शासक के लिए; मैत्री--मित्रता; जनेषु--लोगों में; सकलेषु--समस्त; दम:--दमन; खलानामू--ईर्ष्यालुओं के; नि: श्रेयसाय--सर्वोच्च लाभ के लिए; हि--निस्सन्देह; जगत्--ब्रह्माण्ड के;स्थिति--पालन; रक्षणाभ्याम्--तथा सुरक्षा द्वारा; स्वैर--स्वेच्छा से; अवतार:--अवतार; उरू-गाय--हे विश्ववन्द्य; विदाम--हमजानते हैं; सुष्ठ-- भलीभाँति |
श्री नारद ने कहा : हे सर्वशक्तिमान, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि समस्त जगतोंके शासक आप सारे लोगों से मित्रता प्रदर्शित करते हुए भी दुष्टों का दमन करते हैं।
जैसा किहम सभी लोग भलीभाँति जानते हैं आप इस ब्रह्माण्ड में इसके पालन तथा रक्षण के द्वारा परमलाभ प्रदान करने के लिए स्वेच्छा से अवतरित होते हैं।
इृष्टे तवाड्घ्रियुगलं जनतापवर्गब्रह्मादिभिईदि विचिन्त्यमगाधबोधे: ।
संसारकूपपतितोत्तरणावलम्बं ध्यायंश्वराम्यनुगृहाण यथा स्मृति: स्थात् ॥
१८॥
इृष्टमू--देखे हुए; तब--तुम्हारे; अड््घ्रि--पैरों की; युगलम्--जोड़ी; जनता--अपने भक्तों के लिए; अपवर्गम्--मोक्ष काउद्गम; ब्रह्म-आदिभि:--ब्रह्म जैसे व्यक्तियों के द्वारा; हदि--हृदय में; विचिन्त्यमू--सोचते हुए; अगाध---अथाह; बोध: --बुद्धि से; संसार-- भौतिक जीवन रूपी; कूप--कुएँ में; पतित--गिरे हुओं के; उत्तरण--उद्घवार के लिए; अवलम्बम्ू--शरण;ध्यायन्--निरन्तर सोचते हुए; चरामि--विचरण करता हूँ; अनुगृहाण -- आशीर्वाद दें; यथा--जिससे; स्मृति: --स्मरणशक्ति;स्थातू-हो।
अब मैंने आपके उन चरणों के दर्शन किये हैं, जो आपके भक्तों को मोक्ष प्रदान करते हैंतथा जिन्हें ब्रह्मा तथा अन्य अथाह बुद्धि वाले महापुरुष भी केवल अपने हृदयों में ध्यान करसकते हैं किन्तु जो भवकूष में गिर चुके हैं, वे उद्धार हेतु जिनकी शरण ग्रहण करते हैं।
आपमुझ पर कृपालु हों जिससे विचरण करते हुए मैं निरन्तर आपका स्मरण कर सकूँ।
कृपा करकेमुझे शक्ति दें कि मैं आपका स्मरण कर सकूँ।
ततोन्यदाविशद्गेहं कृष्णपत्या: स नारद: ।
योगेश्वरे श्वरस्थाड़ योगमायाविवित्सया ॥
१९॥
ततः--तब; अन्यत्--दूसरे; आविशत्ू-- प्रवेश किया; गेहम्-- आवास में; कृष्ण-पत्या:--कृष्ण की पत्नी के; सः--वह;नारदः--नारदमुनि; योग-ईश्वर--योगे श्वरों के; ईश्वरस्थ--ई श्वर के; अड्भ--हे राजा; योग-माया--मोह की आध्यात्मिक शक्ति;विवित्सबा--जानने की इच्छा से।
हे राजन, तब नारद ने भगवान् कृष्ण की दूसरी पत्नी के महल में प्रवेश किया।
वे योगेश्वरोंके ईश्वर की आध्यात्मिक शक्ति देखने के लिए उत्सुक थे।
दीव्यन्तमश्षैस्तत्रापि प्रियया चोद्धवेन च ।
पूजित: परया भक्त्या प्रत्युत्थानासनादिभि: ॥
२०॥
पृष्ठश्नाविदुषेवासौ कदायातो भवानिति ।
क्रियते किं नु पूर्णानामपूर्णरस्मदादिभि: ॥
२१॥
अथापि बूहि नो ब्रह्मन्जन्मैतच्छोभनं कुरु ।
स तु विस्मित उत्थाय तूष्णीमन्यदगादगृहम् ॥
२२॥
दीव्यन्तम्-खेलते हुए; अक्षै:--चौसर से; तत्र--वहाँ; अपि--निस्सन्देह; प्रियया--अपनी प्रिया के साथ; च--तथा;उद्धवेन--उद्धव के साथ; च-- भी; पूजित:--पूजित; परया--दिव्य; भक्त्या--भक्ति द्वारा; प्रत्युत्थान-- अपने आसन से खड़े होकर; आसन--आसन प्रदान करके; आदिभि:--इत्यादि से; पृष्ठ: --पूछा; च--तथा; अविदुषा--अज्ञानी द्वारा; इब--मानो;असौ--वह, नारद; कदा--कब; आयात: --आये हुए; भवान्ू--आप; इति--इस प्रकार; क्रियते--करने की इच्छा से;किम्--क्या; नु--निस्सन्देह; पूर्णानाम्--जो पूर्ण हैं उनके द्वारा; अपूर्ण:--जो पूर्ण नहीं हैं उनके द्वारा; अस्मत्-आदिभि:--हमजैसों के द्वारा; अथ अपि--तो भी; ब्रूहि--कृपा करके कहें; नः--हमसे; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; जन्म--हमारा जन्म; एतत्--यह;शोभनमू--शुभ; कुरु--कीजिये; सः--वह, नारद; तु--लेकिन; विस्मित: -- चकित; उत्थाय--उठकर; तूष्णीम्--चुपचाप;अन्यत्--अन्यत्र; अगातू--चले गये; गृहम्--महल में
वहाँ उन्होंने भगवान् को अपनी प्रिया तथा अपने मित्र उद्धव के साथ चौसर खेलते देखा।
भगवान् कृष्ण ने खड़े होकर और उन्हें आसन देकर नारदजी की पूजा की और तब उनसे इसतरह पूछा मानो वे कुछ जानते ही न हों, 'आप कब आये? हम जैसे अपूर्ण व्यक्ति आप जैसेपूर्ण व्यक्तियों के लिए क्या कर सकते हैं? हे ब्राह्मण, जैसा भी हो, कृपा करके मेरे जीवन कोशुभ बना दें।
' ऐसा कहे जाने पर नारद चकित हो गए।
वे चुपचाप खड़े रहे और अन्य महल मेंचले गये।
तत्राप्यचष्ट गोविन्दं लालयन्तं सुतान्शिशून् ।
ततोउन्यस्मिन्गूहेउपश्यन्मज्जनाय कृतोद्यममम् ॥
२३॥
तत्र--वहाँ; अपि-- और; अचष्ट--देखा; गोविन्दम्-- भगवान् कृष्ण को; लालयन्तम्ू--दुलारते हुए; सुतान्--बच्चों को;शिशून्--छोटे; तत:ः--तब; अन्यस्मिनू--दूसरे; गृहे--महल में; अपश्यत्--देखा ( कृष्ण को ); मजजनाय--स्नान करने केलिए; कृत-उद्यमम्--तैयारी करते हुए |
इस बार नारदजी ने देखा कि भगवान् कृष्ण अपने छोटे छोटे बच्चों को वत्सल पिता कीतरह दुलार रहे थे।
वहाँ से वे अन्य महल में गये और उन्होंने देखा कि भगवान् कृष्ण स्नान करनेके लिए तैयारी कर रहे हैं।
जुहन्तं च वितानाग्नीन्यजन्तं पदञ्नभिर्मखै: ।
भोजयमन्तं द्विजान्क्वापि भुज्जानमवशेषितम् ॥
२४॥
जुहन्तमू-- आहुति डालते; च--तथा; वितान-अग्नीन्--यज्ञ अग्नि में; यजन्तम्-पूजा करते हुए; पञ्ञभि: -- पाँच; मखैः--अनिवार्य अनुष्ठानों ( यज्ञ ) द्वारा; भोजयन्तम्--खिलाते हुए; ट्विजानू-- ब्राह्मणों को; कब अपि--कहीं; भुज्ञानम्-खाते हुए;अवशेषितम्--उच्छिष्ट |
एक स्थान पर भगवान् यज्ञ-अग्नियों में आहुतियाँ डाल रहे थे, दूसरे में पाँच महायज्ञों द्वारापूजा कर रहे थे, अन्यत्र वे ब्राह्मणों को भोजन करा रहे थे तो कहीं पर ब्राह्मणों के द्वारा छोड़े गएभोजन को खा रहे थे।
क्वापि सन्ध्यामुपासीनं जपन्तं ब्रह्म वाग्यतम् ।
एकत्र चासिचर्माभ्यां चरन्तमसिवर्त्मसु ॥
२५॥
व अपि--कहीं; सन्ध्याम्--संध्याकालीन अनुष्ठान; उपासीनम्--पूजा करते; जपन्तम्--मौन होकर जप करते; ब्रह्म--वैदिकमंत्र ( गायत्री ); वाकु-यतम्--अपनी वाणी को संयत करते; एकत्र--एक स्थान में; च--तथा; असि--तलवार; चर्माभ्याम्ू--तथा ढाल को; चरन्तम्--चलाते; असि-वर्त्मसु--तलवार चलाने के अभ्यास हेतु नियत दालानों में |
कहीं पर भगवान् मौन रहकर तथा मन ही मन गायत्री मंत्र का जप करते हुए संध्याकालीनपूजा के लिए अनुष्ठान कर रहे थे तो कुछ स्थानों पर जो तलवार के अभ्यास के लिए नियत थे,वे तलवार-ढाल चला रहे थे।
अश्वेर्गजै रथे: क्वापि विचरन्तं गदाग्रजम् ।
क्वचिच्छयान पर्यड्ले स्तूयमानं च वन्दिभि: ॥
२६॥
अश्वे:ः--घोड़ों पर; गजैः--हाथियों पर; रथैः--रथों पर; क्व अपि--कहीं; विचरन्तम्--सवारी करते; गद-अग्रजमू--गद केबड़े भाई, कृष्ण को; क्वचित्--कहीं; शयानम्--लेटे हुए; पर्यद्ले-- पलंग में; स्तूयमानम्-- प्रशंसा किये जाते; च--तथा;वन्दिभिः--वन्दीजनों ( भाटों ) द्वारा
एक स्थान पर भगवान् गदाग्रज घोड़ों, हाथियों तथा रथों पर सवारी कर रहे थे और दूसरेस्थान पर वे अपने पलंग पर लेटे थे तथा भाट उनकी महिमा का गायन कर रहे थे।
मन्त्रयन्तं च करिमश्चिन्मन्त्रिभिश्रोद्धवादिभि: ।
जलक्रीडारतं क्वापि वारमुख्याबलावृतम् ॥
२७॥
मन्त्रयन्तम्--विचार-विमर्श करते; च--तथा; कस्मिश्वित्--कहीं; मन्त्रि-भि:--मंत्रियों के साथ; च--तथा; उद्धव-आदिभि:--उद्धव तथा अन्य; जल--जल में; क्रीडा--खिलवाड़ में; रतम्--व्यस्त; कब अपि--कहीं; वार-मुख्या--राजसी नृत्यांगनाओंद्वारा; अबला--तथा अन्य स्त्रियों के; वृतम्ू--साथ में |
कहीं वे उद्धव तथा अन्य राजमंत्रियों से सलाह-मशविरा कर रहे थे तो कहीं पर वे अनेकनृत्यांगगाओं तथा अन्य तरुणियों से घिरकर जल-क्रीड़ा कर रहे थे।
कुत्रचिदिदवजमुख्ये भ्यो ददतं गा: स्वलड्डू ता: ।
इतिहासपुराणानि श्रृण्वन्तं मडुलानि च ॥
२८॥
कुत्रचित्-कहीं; द्विज--ब्राह्मणों को; मुख्येभ्य: --सर्व श्रेष्ठ; ददतम्--देते हुए; गा:--गौवें; सु--अच्छी तरह; अलड्डू ता: --आशभूषित; इतिहास--प्राचीन इतिहास; पुराणानि--तथा पुराणों को; श्रृण्वन्तम्--सुनते हुए; मड्लानि--शुभ; च--तथा |
कहीं वे उत्तम ब्राह्मणों को भलीभाँति अलंकृत गौवें दान दे रहे थे और कहीं वे महाकाव्यके इतिहासों तथा पुराणों का शुभ वृत्तान्त सुन रहे थे।
हसन्तं हासकथया कदाचित्प्रियया गृहे ।
क्वापि धर्म सेवमानमर्थकामौ च कुत्रचित् ॥
२९॥
हसन्तम्-हँसते हुए; हास-कथया--हँसी-मजाक के वार्तालाप से; कदाचित्ू--किसी समय; प्रियया--अपनी पत्नी से; गृहे--महल में; क्व अपि--कहीं; धर्मम्--धर्म का; सेवमानम्-- अभ्यास करते हुए; अर्थ--आर्थिक विकास; कामौ--इन्द्रिय-तृप्ति;च--तथा; कुत्रचित्--कहीं |
कहीं पर भगवान् कृष्ण किसी एक पत्नी के साथ हास-परिहास करते देखे गये।
कहीं औरवे अपनी पत्नी समेत धार्मिक-अनुष्ठान के कृत्यों में व्यस्त पाये गये।
कहीं कृष्ण आर्थिक विकासके मामलों में तो कहीं शास्त्रों के नियमानुसार गृहस्थ जीवन का भोग करते पाये गये।
ध्यायन्तमेकमासीन पुरुष प्रकृते: परम् ।
शुश्रूषन्तं गुरून्क्वापि कामैभोंगि: सपर्यया ॥
३०॥
ध्यायन्तम्-ध्यान करते हुए; एकम्--एकाकी; आसीनम्--बैठे हुए; पुरुषम्-- भगवान् को; प्रकृते:-- भौतिक प्रकृति का;परमू--दिव्य; शुश्रूषन्तम्--क्षुद्र सेवा करते हुए; गुरूनू--अपने से बड़ों की; कब अपि--कहीं; कामै:--इच्छित; भोगै: -- भोग्यवस्तुओं से; सपर्यया--तथा पूजा से |
कहीं वे अकेले बैठे हुए भौतिक प्रकृति से परे भगवान् का ध्यान कर रहे थे और कहीं पर वेअपने से बड़ों को इच्छित वस्तुएँ देकर तथा उनकी आदरपूर्वक पूजा करके उनकी दासोचितसेवा कर रहे थे।
कुर्वन्तं विग्रह॑ कैश्वित्सन्धि चान्यत्र केशवम् ।
कुत्रापि सह रामेण चिन्तयन्तं सतां शिवम् ॥
३१॥
कुर्वन्तम्--करते हुए; विग्रहम्--युद्ध; कैश्वित्--किसी व्यक्ति से; सन्धिमू--मेल-जोल; च--तथा; अन्यत्र--और कहीं;केशवम्--भगवान् कृष्ण को; कुत्र अपि--कहीं; सह--साथ; रामेण--बलराम के; चिन्तयन्तम्--सोचते हुए; सतामू--साधुओं के; शिवम्--कल्याण हेतु।
एक स्थान पर वे अपने कुछ सलाहकारों के साथ विचार-विमर्श करके युद्धों की योजनाबना रहे थे और अन्य स्थान पर वे शान्ति स्थापित कर रहे थे।
कहीं पर केशव तथा बलराममिलकर पवित्र लोगों के कल्याण के विषय में चिन्तन कर रहे थे।
पुत्राणां दुहितृणां च काले विध्युपयापनम् ।
दारैवरैस्तत्सहशै: कल्पयन्तं विभूतिभि: ॥
३२॥
पुत्राणाम्ू--पुत्रों के; दुहितृणाम्-पुत्रियों के; च--तथा; काले--उपयुक्त समय पर; विधि--धर्म के अनुसार; उपयापनम्--उन्हेंविवाहित करके; दारैः--पत्नियों के साथ; वरैः--तथा पतियों के साथ; तत्--उनके; सदृशैः--अनुरूप; कल्पयन्तम्--व्यवस्थाकरते हुए; विभूतिभि:--ऐश्वर्य की दृष्टि से |
नारद ने देखा कि भगवान् कृष्ण अपने पुत्रों तथा पुत्रियों का उच्चित समय पर उपयुक्तपत्नियों तथा पतियों के साथ विवाह करा रहे हैं और ये विवाहोत्सव बड़ी धूमधाम से सम्पन्न हो रहे हैं।
प्रस्थापनोपनयनैरपत्यानां महोत्सवान् ।
वीक्ष्य योगेश्वरेशस्यथ येषां लोका विसिस्मिरि ॥
३३॥
प्रस्थापन--विदा करके; उपनयनै:--अगवानी करके; अपत्यानाम्--अपनी सन््तानों के; महा--महान्; उत्सवान्ू--उछाह;वीक्ष्य--देखकर; योग-ईश्वर--योग के स्वामियों के; ईशस्य--परम प्रभु को; येषामू--जिसके ; लोका:--लोग; विसिस्मिरे --विस्मित थे
नारद ने देखा कि किस तरह समस्त योगेश्वरों के स्वामी श्रीकृष्ण ने अपनी पुत्रियों तथादामादों की विदाई की तथा पुनः महोत्सवों के अवसरों पर उनका घर में स्वागत करने कीव्यवस्था की।
सारे नागरिक इन उत्सवों को देखकर विस्मित थे।
यजन्तं सकलान्देवान्क्वापि क्रतुभिरूर्जितैः ।
पूर्तयन्तं क्वचिद्धर्म कूर्पाराममठादिभि: ॥
३४॥
यजन्तमू--पूजा करते; सकलानू--समस्त; देवान्--देवताओं की; क्व अपि--कहीं; क्रतुभि:--यज्ञों से; ऊर्जितैः --पूरी तरहविकसित; पूर्तवन्तम्--लोकसेवा पूरी करते हुए; क्वचित्--कहीं; धर्मम्--धार्मिक बन्धन; कूर्प--कुओं से; आराम--जनउद्यान; मठ--मठ; आदिभि:--इत्यादि से
कहीं पर वे विस्तृत यज्ञों द्वारा देवताओं को पूज रहे थे और कहीं वे जनकल्याण कार्य यथाकुएँ, जन उद्यान तथा मठ बनवाकर अपना धार्मिक कर्तव्य पूरा कर रहे थे।
चरन्तं मृगयां क्वापि हयमारुहय सैन्धवम् ।
घ्नन्तं तत्र पशून्मेध्यान्परीतं यदुपुड़वैः ॥
३५॥
चरन्तमू--विचरण करते; मृगयाम्--शिकार करने के लिए; क्व अपि--कहीं; हयम्--घोड़े पर; आरुह्म --सवार होकर;सैन्धवम्--सिन्धु देश के; घ्नन्तम्--वध करते हुए; तत्र--वहाँ; पशून्ू--पशुओं को; मेध्यान्--यज्ञ में बलि के योग्य; परीतम्--घिरकर; यदु-पुड्वैः--अत्यन्त वीर यदुओं से |
अन्य स्थान पर वे आखेट पर गये थे।
वे अपने सिन्धी घोड़े पर सवार होकर तथा अत्यन्तवीर यदुओं के संग यज्ञ में बलि के निमित्त पशुओं का वध कर रहे थे।
अव्यक्तलिगां प्रकृतिष्वन्त:पुरगृहादिषु ।
क्वचिच्चरन्तं योगेशं तत्तद्भावबुभुत्सया ॥
३६॥
अव्यक्त- गुप्त; लिड्रमू--उनकी पहचान; प्रकृतिषु--अपने मंत्रियों में; अन्त:ः-पुर--रनिवास के; गृह-आदिषु--आवासों आदिमें; क्वचित्--कहीं; चरन्तम्--विचरण करते; योग-ईशम्--योगेश्वर को; तत्-तत्--उनमें से हर एक का; भाव--मनोभाव;बुभुत्सया--जानने की इच्छा से |
कहीं योगेश्वर कृष्ण वेश बदलकर मंत्रियों तथा अन्य नागरिकों के घरों में यह जानने केलिए कि उनमें से हर कोई क्या सोच रहा है, इधर उधर घूम रहे थे।
अथोवाच हषीकेशं नारद: प्रहसन्निव ।
योगमायोदयं वीक्ष्य मानुषीमीयुषो गतिम् ॥
३७॥
अथ--तत्पश्चात; उवाच--कहा; हषीकेशम्-- भगवान् कृष्ण से; नारदः--नारद ने; प्रहसन्--हँसते हुए; इब-- थोड़ा थोड़ा;योग-माया--उनकी आध्यात्मिक मोहक शक्ति का; उदयम्--प्राकट्य; वीक्ष्य--देखकर; मानुषीम्--मनुष्य की; ईयुष:-- धारणकरने वाले; गतिमू--चाल-ढाल का।
इस प्रकार भगवान् की योगमाया का यह दृश्य देखकर नारद मुसकाये और तब उन्होंनेभगवान् हषीकेश को सम्बोधित किया जो मनुष्य का आचरण कर रहे थे।
विदाम योगमायास्ते दुर्दर्शा अपि मायिनाम् ।
योगेश्वरात्मन्निर्भाता भवत्पादनिषेवया ॥
३८॥
विदाम--हम जानते हैं; योग-माया:--योगशक्तियाँ; ते--तुम्हारी; दुर्दर्शाः:--देख पाना असम्भव; अपि--होते हुए भी;मायिनाम्-महान् योगियों के लिए; योग-ई श्रर--हे योगेश्वर; आत्मन्--हे परमात्मा; निर्भाता:--अनुभूति हुई; भवत्--आपके;पाद--चरणों की; निषेवया--सेवा से |
नारद ने कहा : हे परमात्मा, हे योगेश्वर, अब हम आपकी योगशक्तियों को समझ सकेहैं, जिन्हें बड़े बड़े योगी भी मुश्किल से समझ पाते हैं।
एकमात्र आपके चरणों की सेवा करने सेमैं आपकी शक्तियों का अनुभव कर सका हूँ।
अनुजानीहि मां देव लोकांस्ते यशसाप्लुतान् ।
पर्यटामि तवोद्गायनलीला भुवनपावनी: ॥
३९॥
अनुजानीहि--मुझे जाने की आज्ञा दें, विदा करें; मामू--मुझको; देव--हे प्रभु; लोकान्ू--लोकों को; ते--तुम्हारे; यशसा--यश से; आप्लुतान्ू--आप्लावित परिपूर्ण; पर्यटामि--विचरण करूँगा; तव--तुम्हारी; उद्गायन्--जोर जोर से गाते हुए;लीला:ः--लीलाएँ; भुवन--सारे लोकों को; पावनी:--पवित्र करने वाली |
हे प्रभु, मुझे जाने की आज्ञा दें।
मैं उन लोकों में, जो आपके यश से आप्लावित हैं, ब्रह्माण्डको पवित्र करने वाली आपकी लीलाओं का जोर जोर से गायन करते हुए विचरण करूँगा।
श्रीभगवानुवाचब्रह्मन्धन्नस्य वक्ताहं कर्ता तदनुमोदिता ।
तच्छिक्षयनलोकमिममास्थित: पुत्र मा खिदः ॥
४०॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; धर्मस्य-- धर्म का; वक्ता--उपदेशक; अहम्--मैं; कर्ता--करनेवाला; तत्--उसका; अनुमोदिता--स्वीकृति देने वाला; तत्ू--वह; शिक्षयन्--शिक्षा देते हुए; लोकम्--संसार को; इमम्--इस; आस्थित:--स्थित; पुत्र--हे पुत्र; मा खिदः --श्लुब्ध न होना
भगवान् ने कहा : हे ब्राह्मण, मैं धर्म का उपदेशक, उसका कर्ता तथा अनुमोदनकर्ता हूँ।
हेपुत्र, मैं जगत को शिक्षा देने के लिए धर्म का पालन करता हूँ, अतएव तुम विक्षुब्ध मत होना।
श्रीशुक उवाचइत्याचरन्तं सद्धर्मान्पावनान्गृहमेधिनाम् ।
तमेव सर्वगेहेषु सन्तमेकं दरदर्श ह ॥
४१॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; आचरन्तम्-करते हुए; सत्--आध्यात्मिक; धर्मानू--धर्म केनियमों को; पावनान्--पवित्र करने वाले; गृह-मेधिनामू--गृहस्थियों के लिए; तम्--उसको; एब--निस्सन्देह; सर्व--सभी;गेहेषु--महलों में; सन््तम्--उपस्थित; एकम्--एक रूप में; ददर्श ह--देखा।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार नारद ने हर महल में भगवान् को एक ही स्वरूप में,गृहकार्यों में व्यस्त रहने वालों को शुद्ध करने वाले दिव्य धार्मिक नियमों को सम्पन्न करते देखा।
कृष्णस्यानन्तवीर्यस्थ योगमायामहोदयम् ।
मुहुर्दष्ठा ऋषिरभूद्विस्मितो जातकौतुकः ॥
४२॥
कृष्णस्य--कृष्ण के; अनन्त--असीम; वीर्यस्थ--पराक्रम को; योग-माया--ठगने वाली शक्ति की; महा--विस्तृत; उदयम्--अभिव्यक्ति; मुहुः--बारम्बार; दृष्टा--देख लेने के बाद; ऋषि: --ऋषि, नारद; अभूत्--हो गये; विस्मित:--चकित;जातकौतुक:--आश्चर्यपूरित |
असीम शक्ति वाले भगवान् कृष्ण के विस्तृत योग प्रदर्शन को बारम्बार देख लेने के बादऋषि चकित एवं आश्चर्य से पूरित हो गये।
इत्यर्थकामधर्मेषु कृष्णेन श्रद्धितात्मना ।
सम्यक्सभाजित:ः प्रीतस्तमेवानुस्मरन्ययौ ॥
४३॥
इति--इस प्रकार; अर्थ--आर्थिक विकास के लिए उपयोगी वस्तुओं से; काम--इन्द्रिय-तृप्ति के; धर्मेषु--तथा धर्म के;कृष्णेन--कृष्ण द्वारा; श्रद्धित-- श्रद्धावान; आत्मना--हृदय वाला; सम्यक्-- भलीभाँति; सभाजित:--सम्मानित; प्रीत:--प्रसन्न; तमू--उसको; एब--निस्सन्देह; अनुस्मरन्--सदैव स्मरण करते; ययौ--चले गए
भगवान् कृष्ण ने नारद का अत्यधिक सम्मान किया और उन्हें श्रद्धापूर्वक आर्थिक समृद्धि,इन्द्रिय-तृष्ति तथा धार्मिक कर्तव्यों से सम्बन्धित उपहार भेंट किये।
इस तरह ऋषि पूरी तरह तुष्ट होकर अनवतर भगवान् का स्मरण करते हुए वहाँ से चले गये।
एवं मनुष्यपदवीमनुवर्तमानोनारायणोखिलभवाय गृहीतशक्ति: ।
रेमेण्ग घोडशसहस्त्रवराड़नानांसब्रीडसौहदनिरीक्षणहासजुष्ट: ॥
४४॥
एवम्--इस प्रकार; मनुष्य--मनुष्य के; पदवीम्--पथ को; अनुवर्तमान:--अनुसरण करते हुए; नारायण: -- भगवान् नारायण;अखिल-हर एक के; भवाय--कल्याण हेतु; गृहीत-- प्रकट करके; शक्ति:--शक्तियाँ; रेमे--रमण किया; अड़--हे प्रिय( परीक्षित ); षोडश--सोलह; सहस्त्र--हजार; वर--अति उत्तम; अड्रनानाम्ू--स्त्रियों के; स-ब्रीड--लजीली; सौहद--तथास्नेहमयी; निरीक्षण--चितवनों; हास--तथा हँसी से; जुष्ट:-तुष्ट |
इस तरह भगवान् नारायण ने सभी जीवों के लाभ हेतु अपनी दैवी शक्तियों को प्रकट करकेसामान्य मनुष्यों की चाल-ढाल का अनुकरण किया।
हे राजन, इस प्रकार उन्होंने अपनी उनसोलह हजार वरिष्ठ प्रेयसियों के साथ रमण किया जो अपनी लजीली स्नेहमयी चितवनों तथामुसकान से भगवान् की सेवा करती थीं।
यानीह विश्वविलयोद्धववृत्तिहेतु:कर्माण्यनन्यविषयाणि हरीश्वकार ।
यस्त्वड़ गायति श्रुणोत्यनुमोदते वाभक्तिर्भवेद्धगवति हापवर्गमार्गे ॥
४५॥
यानि--जो; इह--इस संसार में; विश्व--ब्रह्माण्ड के; विलय--संहार; उद्धव--सृजन; वृत्ति--तथा पालन के; हेतु:--कारण,स्वरूप; कर्माणि--कर्म; अनन्य--अन्य किसी के नहीं; विषयाणि--कार्यक्रम; हरि: -- भगवान् कृष्ण ने; चकार--सम्पन्नकिया; यः--जो भी; तु--निस्सन्देह; अड्भ--मेरे प्रिय राजा; गायति--उच्चारण करता है; श्रुणोति--सुनता है; अनुमोदते--अनुमोदन करता है; वा--अथवा; भक्ति:--भक्ति; भवेत्--उत्पन्न होती है; भगवति--भगवान् के प्रति; हि--निस्सन्देह;अपवर्ग-मोक्ष के; मार्गे--मार्ग में |
भगवान् हरि ही ब्रह्माण्ड की सृष्टि, पालन तथा संहार के चरम कारण हैं।
हे राजनू, जो भी उनके द्वारा इस संसार में सम्पन्न अद्वितीय कार्यो के विषय में कीर्तन करता है, सुनता है या केवलप्रशंसा करता है, जिनका अनुकरण करना असम्भव है, वह अवश्य ही मोक्ष के प्रदाता भगवान्के प्रति भक्ति उत्पन्न कर लेगा।
