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अध्याय सड़सठ: भगवान बलराम ने द्विविद्या गोरिल्ला का वध किया

10.67श्रीराजोबवाचभुयोहं श्रोतुमिच्छामि रामस्याद्भधुतकर्मण: ।

अनन्तस्याप्रमेयस्य यदन्यत्कृतवान्प्रभु: ॥

१॥

श्री-राजा--यशस्वी राजा ( परीक्षित ) ने; उवाच--कहा; भूय:ः--आगे; अहम्‌--मैं; श्रोतुम्‌--सुनने के लिए; इच्छामि--इच्छाकरता हूँ; रामस्य--बलराम के; अद्भुत--विस्मयकारी; कर्मण: --कार्यकलाप; अनन्तस्य--अनन्त के; अप्रमेयस्थ--अथाह,अपार; यत्‌--जो; अन्यत्‌--दूसरा; कृतवान्‌ू--किया; प्रभुः--प्रभु ने |

यशस्वी राजा परीक्षित ने कहा : मैं अनन्त तथा अपार भगवान्‌ श्रीबलराम के विषय में औरआगे सुनना चाहता हूँ जिनके कार्यकलाप अतीव विस्मयकारी हैं।

उन्होंने और क्या किया ?

श्रीशुक उबाचनरकस्य सखा कश्चिद्द््‌वविदो नाम वानर: ।

सुग्रीवसचिव: सोथ भ्राता मैन्दस्य वीर्यवान्‌ ॥

२॥

श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; नरकस्य--नरकासुर का; सखा--मित्र; कश्चित्‌--कोई; द्विविदः --द्विविद;नाम--नामक; वानर:--वानर; सुग्रीव--राजा सुग्रीव; सचिव:--जिसका सलाहकार; सः--वह; अथ-- भी; भ्राता-- भाई;मैन्दस्थ--मैन्द का; वीर्य-वानू--शक्तिशाली

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : द्विविद नाम का एक वानर था, जो नरकासुर का मित्र था।

यहशक्तिशाली द्विविद मैन्द का भाई था और राजा सुग्रीव ने उसे आदेश दिया था।

सख्यु: सोपचितिं कुर्वन्वानरो राष्ट्रविप्लवम्‌ ।

पुरग्रामाकरान्धोषानदहद्ठहिमुत्सूजन्‌ ॥

३॥

सख्यु:--अपने मित्र ( नरक, जिसका वध कृष्ण ने किया था ) का; सः--वह; अपचितिमू--उऋण; कुर्वन्‌ू--होने के लिए;वानर:--वानर; राष्ट्र--राज्य का; विप्लवम्‌--उत्पात करते हुए; पुर--नगर; ग्राम--गाँव; आकरान्‌--तथा खानों को; घोषान्‌ू--ग्वालों के समुदायों ( बस्तियों ) को; अदहत्‌--जला डाला; वहिम्‌--आग; उत्सूजन्‌ू--फैलाकर।

अपने मित्र ( नरक ) की मृत्यु का बदला लेने के लिए द्विविद वानर ने नगरों, गाँवों, खानोंतथा ग्वालों की बस्तियों में आग लगाते हुए उन्हें जलाकर पृथ्वी को तहस-नहस कर दिया।

क्वचित्स शैलानुत्पाट्य तैर्देशान्समचूर्णयत्‌ ।

आनर्तान्सुतरामेव यत्रास्ते मित्रहा हरि: ॥

४॥

क्वचित्‌--एक बार; सः--वह, द्विविद; शैलान्‌--पर्वतों को; उत्पाट्य--उखाड़ कर; तैः--उनके साथ; देशान्‌--सारे राज्योंको; समचूर्णयत्‌--विनष्ट कर दिया; आनर्तान्‌ू--आनर्तन प्रदेश ( जिसमें द्वारका स्थित है ) के लोगों को; सुतराम्‌ एब--विशेषरूप से; यत्र--जहाँ; आस्ते--उपस्थित है; मित्र--उसके मित्र का; हा--मारने वाला; हरिः--कृष्ण |

एक बार द्विविद ने अनेक पर्वतों को उखाड़ लिया और उनका प्रयोग सभी निकटवर्ती राज्योंको, विशेषतया आनर्त प्रदेश को विध्वंस करने के लिए किया जहाँ उसके मित्र को मारने वाले,भगवान्‌ हरि रहते थे।

क्वचित्समुद्रमध्यस्थो दोर्भ्यामुत्क्षिप्प तजजलम्‌ ।

देशान्नागायुतप्राणो वेलाकूले न्यमज्जयत्‌ ॥

५॥

क्वचित्‌--एक बार; समुद्र--समुद्र के; मध्य--बीच में; स्थः--स्थित; दोर्भ्यामू--अपनी भुजाओं से; उत्क्षिप्प--मथ कर;तत्‌--उसके; जलम्‌--जल को; देशान्‌--राज्यों को; नाग--हाथी; अयुत--दस हजार; प्राण:--शक्ति वाले; वेला--समुद्रतटीय; कूले--किनारों को; न्यमजजयत्‌--डुबो दिया

दूसरे अवसर पर वह समुद्र में घुस गया और दस हजार हाथियों के बल के बराबर अपनीबाहों से उसके पानी को मथ डाला और इस तरह समुद्रतट के भागों को डुबो दिया।

आश्रमानृषिमुख्यानां कृत्वा भग्नवनस्पतीन्‌ ।

अदूषयच्छकृम्मूत्रैरग्नीन्वैतानिकान्खल:ः ॥

६॥

आश्रमान्‌ू--आश्रमों को; ऋषि--ऋषियों के; मुख्यानाम्‌--प्रमुख; कृत्वा--करके; भग्न--तोड़-फोड़; वनस्पतीन्‌--वृक्षों को;अदूषयत्‌--दूषित कर डाला; शकृत्‌--मल से; मूत्रै:--मूत्र से; अग्नीन्‌ू--अग्नियों को; बैतानिकान्‌ू--यज्ञ की; खलः--दुष्ट ने |

उस दुष्ट वानर ने प्रमुख ऋषियों के आश्रमों के वृक्षों को तहस-नहस कर डाला और अपनेमल-मूत्र से यज्ञ की अग्नियों को दूषित कर दिया।

पुरुषान्योषितो ह्तः क्ष्माभूद्द्रोनीगुहासु सः ।

निश्षिप्य चाप्यधाच्छैलै: पेशष्कारीव कीटकम्‌ ॥

७॥

पुरुषान्‌ू--पुरुषों को; योषितः--तथा स्त्रियों को; दृप्तः--ढीठ या उद्धत; क्ष्मा-भृत्‌-पर्वत की; द्रोणी--घाटी के भीतर;गुहासु--गुफाओं में; सः--उसने; निश्षिप्प--फेंक कर; च--तथा; अप्यधात्‌--बन्द कर दिया; शैलैः--बड़े बड़े शिलाखण्डोंसे; पेशष्कारी--भिड़, बर; इब--सहृश; कीटकम्‌--छोटे कीड़े को |

जिस तरह भिड़-कीट छोटे छोटे कीड़ों को बन्दी बना लेता है, उसी तरह उसने ढिठाई करकेपुरुषों तथा स्त्रियों को पर्वत की घाटी में गुफाओं के भीतर डाल कर इन गुफाओं को बड़े बड़ेशिलाखजण्डों से बन्द कर दिया।

एवं देशान्विप्रकुर्वन्दूषयंश्व॒ कुलस्त्रिय: ।

श्रुत्वा सुललितं गीत॑ गिरिं रैवतक॑ ययौ ॥

८॥

एवम्‌--इस प्रकार; देशान्‌ू--विविध राज्यों को; विप्रकुर्बनू--तंग करते; दूषयन्‌--दूषित करते हुए; च--तथा; कुल--कुलीन;स्त्रियः--स्त्रियों को; श्रुत्वा--सुनकर; सु-ललितम्‌--अत्यन्त मधुर; गीतम्‌--गीत; गिरिम्‌--पर्वत में; रैवतकम्‌--रैवतकनामक; ययौ--गया।

एक बार जब द्विविद निकटवर्ती राज्यों को तंग करने तथा कुलीन स्त्रियों को दूषित करने मेंइस तरह लगा हुआ था, तो उसने रैवतक पर्वत से आती हुई अत्यन्त मधुर गायन की आवाजसुनी।

अतएव वह वहाँ जा पहुँचा।

तत्रापश्यद्यदुपतिं राम॑ पुष्करमालिनम्‌ ।

सुदर्शनीयसर्वाड्रं ललनायूथमध्यगम्‌ ॥

९॥

गायन्तं वारुणीं पीत्वा मदविह्ललोचनम्‌ ।

विध्राजमानं वपुषा प्रभिन्नमिव वारणम्‌ ॥

१०॥

तत्र--वहाँ; अपश्यत्‌--देखा; यदु-पतिम्‌--यदुओं के स्वामी; रामम्‌--बलराम को; पुष्कर--कमल की; मालिनम्‌ू--मालापहने; सु-दर्शनीय--अत्यन्त आकर्षक; सर्व--समस्त; अड्भमू--अंगों को; ललना--युवतियों के; यूथ--समूह के; मध्य-गम्‌--बीच में; गायन्तम्‌--गाते हुए; वारुणीम्‌--वारुणी शराब को; पीत्वा--पीकर; मद--नशा से; विहल--अस्थिर; लोचनम्‌--आँखों को; विश्राजमानम्‌--शोभायमान, चमचमाते; वपुषा--अपने शरीर से; प्रभिन्नमू--कामोन्मत्त; इब--मानो; वारणम्‌--हाथी।

वहाँ उसने यदुओं के स्वामी श्री बलराम को देखा जो कमल-पुष्पों की माला से सुशोभितथे और जिनका हर अंग अत्यन्त आकर्षक लग रहा था।

वे युवतियों के मध्य गा रहे थे औरचूँकि उन्होंने वारुणी मदिरा पी रखी थी अतएवं उनकी आँखें इस तरह घूम रही थीं मानो वे नशेमें हों।

उनका शरीर चमचमा रहा था और वे कामोन्‍्मत्त हाथी की तरह व्यवहार कर रहे थे।

दुष्ट: शाखामृग: शाखामारूढ: कम्पयन्द्रमान्‌ ।

चक्रे किलकिलाशब्दमात्मानं सम्प्रदर्शयन्‌ ॥

११॥

दुष्ट:--दुष्ट; शाखा-मृग:--वानर ( वृक्षों की शाखाओं में रहने वाला पशु ); शाखाम्‌--शाखा पर; आरूढ:--चढ़ कर;कम्पयन्‌--हिलाते हुए; द्रमान्‌--वृक्षों को; चक्रे --किया; किलकिला-शब्दमू--किलकिल की आवाज किलकारियाँ;आत्मानम्‌--अपने आपको; सम्प्रदर्शयन्‌--दिखलाते हुए

वह दुष्ट वानर वृक्ष की शाखा पर चढ़ गया और वृक्षों को हिलाकर तथा किलकारियाँ मारतेहुए अपनी उपस्थिति जताने लगा।

तस्य धाए्टर्य कपेवीक्ष्य तरुण्यो जातिचापला: ।

हास्यप्रिया विजहसुर्बलदेवपरिग्रहा: ॥

१२॥

तस्य--उस; धाए्टर्यम्‌-- धृष्टता, ढिठाई; कपेः--वानर की; वीक्ष्य--देखकर; तरुण्य:--तरुण स्त्रियाँ; जाति--स्वभाव से;चापला:--चंचल, अगम्भीर; हास्य-प्रिया:--हँसोड़; विजहसुः--जोर से हँसीं; बलदेव-परिग्रहा:--बलदेव की प्रेयसियाँ ।

जब बलदेव की प्रेयसियों ने वानर की ढिठाई देखी तो वे हँसने लगीं।

आखिर वे तरुणियाँथीं, जिन्हें हँसी-मजाक भाता था और वे चपल थीं।

ता हेलयामास कपिभ्रूक्षेपैर्सम्मुखादिभि: ।

दर्शयन्स्वगुदं तासां रामस्य च निरीक्षित: ॥

१३॥

ताः--उन ( तरुणियों ) का; हेलयाम्‌ आस--मजाक उड़ाया; कपि:--वानर ने; भ्रू--अपनी भौंहों के; क्षेपै:--गंदे संकेतों से;सम्मुख--उनके सामने खड़े होकर; आदिभि:--इत्यादि से; दर्शयन्‌--दिखलाते हुए; स्व--अपना; गुदम्‌--मलद्वार; तासाम्‌--उनको; रामस्थ--बलराम के; च--तथा; निरीक्षित:--देखते हुए

बलराम के देखते हुए भी द्विविद ने उन तरुणियों को अपनी भौंहों से गंदे इशारे करते हुए,उनके सामने आकर खड़े होकर और उन्हें अपनी गुदा ( मलद्वार ) दिखलाकर अपमानित किया।

त॑ ग्राव्णा प्राहरत्क्ुद्धो बलः प्रहरतां वर: ।

स वज्जयित्वा ग्रावाणं मदिराकलशं कपिः ।

गृहीत्वा हेलयामास धूर्तस्तं कोपयन्हसन्‌ ॥

१४॥

निर्भिद्य कलशं दुष्टो वासांस्यास्फालयद्वलम्‌ ।

कदर्थीकृत्य बलवान्विप्रचक्रे मदोद्धतः ॥

१५॥

तम्‌--उस पर, द्विविद पर; ग्राव्णा--शिला; प्राहरत्‌-फेंका; क्रुद्ध:--क्ुद्ध; बल:--बलराम ने; प्रहरताम्‌--हथियार फेंकनेवालों का; वर: --सर्व श्रेष्ठ; सः--वह, द्विविद; वज्ञयित्वा--बचाकर; ग्रावाणम्‌--शिला को; मदिरा--शराब का; कलशम्‌--पात्र; कपि:--वानर ने; गृहीत्वा--पकड़ कर; हेलयाम्‌ आस--मजाक उड़ाया; धूर्त:--धूर्त; तम्‌ू--उसको, बलराम को;कोपयनू--क्रोध करते; हसन्‌--हँसते; निर्भिद्य--तोड़ कर; कलशम्‌--पात्र को; दुष्ट:--दुष्ट; वासांसि--वस्त्रों को ( तरुणियोंके ); आस्फालयतू्‌--खींच लिया; बलम्‌ू--बलराम को; कदर्थीकृत्य--अनादर करके ; बल-वान्‌--शक्तिशाली; विप्रचक्रे --अपमान किया; मद--मिथ्या अहंकार से; उद्धतः--फूला हुआ।

सर्वश्रेष्ठ योद्धा बलराम ने क्रुद्ध होकर उस पर एक शिला फेंकी किन्तु उस धूर्त वानर नेअपने को उस शिला से बचा कर बलराम के शराब के पात्र को उड़ा ले गया।

दुष्ट द्विविद नेबलराम की हँसी उड़ाते हुए उन्हें और अधिक क्रुद्ध करके उस पात्र को तोड़ डाला और तरुणियोंके वस्त्र खींच कर बलराम को और भी अधिक अपमानित किया।

इस तरह भिथ्या गर्व सेफूलकर कुप्पा हुआ बलशाली वानर श्री बलराम का अपमान करता रहा।

त॑ तस्याविनयं दृष्ठा देशांश्व तदुपद्गुतान्‌ ।

क्रुद्धो मुषलमादत्त हलं चारिजिघांसया ॥

१६॥

तम्‌--उसको; तस्य--उसकी; अविनयम्‌--ढिठाई; हृष्ठा--देखकर; देशान्‌--राज्यों को; च--तथा; तत्‌--उसके द्वारा;उपद्गुतानू--तहस-नहस किये; क्रुद्ध:-क्रुद्ध: मुषलम्‌--अपनी गदा; आदत्त-ग्रहण की; हलम्‌--अपना हल; च--तथा;अरि--शत्रु; जिघांसया--मारने की इच्छा से

भगवान्‌ बलराम ने उस वानर के ढीठ आचरण को देखा और आसपास के राज्यों में उसकेद्वारा उत्पन्न विनाश-लीला ( उपद्रव ) का विचार किया।

इस तरह बलराम ने क्रुद्ध होकर अपनेशत्रु का अन्त करने का निश्चय करके अपनी गदा तथा अपना हल उठा लिया।

द्विविदोपि महावीर्य: शालमुद्यम्य पाणिना ।

अभ्येत्य तरसा तेन बल मूर्धन्यताडयत्‌ ॥

१७॥

द्विविद:ः--द्विविद; अपि-- भी; महा--महान्‌; वीर्य:--बल वाला; शालम्‌--शाल वृक्ष को; उद्यम्य--उठाकर; पाणिना--अपनेहाथ से; अभ्येत्य--पास आकर; तरसा--तेजी से; तेन--उससे; बलम्‌--बलराम को; मूर्थनि--सिर पर; अताडयतू--मारा।

बलशाली द्विविद भी युद्ध करने के लिए आगे बढ़ा।

एक हाथ से शाल का वृक्ष उखाड़ कर वह बलराम की ओर दौड़ा और उनके सिर पर उस वृक्ष के तने से प्रहार किया।

तं तु सड्डर्षणो मूर्धिन पतन्‍्तमचलो यथा ।

प्रतिजग्राह बलवान्सुनन्देनाहनच्च तम्‌ ॥

१८॥

तम्‌--उस ( तने ) को; तु--लेकिन; सह्डूर्षण: --बलराम ने; मूर्ध्नि--सिर पर; पतन्तम्‌ू--गिरते हुए; अचलः--न हिलने वालापर्वत; यथा--जिस तरह; प्रतिजग्राह--पकड़ लिया; बल-वान्‌--बलशाली; सुनन्देन--अपनी गदा सुनन्द से; अहनतू-- प्रहारकिया; च--तथा; तम्‌--उस ( द्विविद ) पर

किन्तु भगवान्‌ संकर्षण पर्वत की तरह अचल बने रहे और अपने सिर के ऊपर गिरते हुएलट्ठे को यों ही दबोच लिया।

तब उन्होंने द्विविद पर अपनी सुनन्द गदा से प्रहार किया।

मूषलाहतमस्तिष्को विरेजे रक्तधारया ।

गिरिर्यथा गैरिकया प्रहारं नानुचिन्तयन्‌ ॥

१९॥

पुनरन्य॑ समुक्क्षिप्य कृत्वा निष्पत्रमोजसा ।

तेनाहनत्सुसड्क्रुद्धस्तं बल: शतधाच्छिनत्‌ ॥

२०॥

ततोन्येन रुषा जघ्ने तं चापि शतधाच्छिनत्‌ ॥

२१॥

मूषल--गदा से; आहत--प्रहार किया; मस्तिष्क:--खोपड़ी; विरेजे--सुशोभित हुई; रक्त--खून की; धारया--धारा से;गिरिः--पर्वत; यथा--जिस तरह; गैरिकया--गेरू से; प्रहारम्‌-- प्रहार; न--नहीं; अनुचिन्तयन्‌ू--गम्भीर मानते हुए; पुन:--फिर; अन्यम्‌--दूसरे ( वृक्ष ) को; समुद्क्षिण्प--उखाड़ कर; कृत्वा--करके; निष्पत्रम्‌ू--पत्तियों से रहित; ओजसा--बलपूर्वक;तेन--उसके द्वारा; अहनत्‌-- प्रहार किया; सु-सड्क्ुद्ध:--पुरजोर क्रोध के साथ; तमू--उसको; बल:--बलराम ने; शतधा--सैकड़ों खंडों में; अच्छिनत्‌--छिन्न-भिन्न कर डाला; तत:ः--तब; अन्येन--दूसरे से; रुषा--क्रोधपूर्वक ; जघ्ने--चूर चूर करदिया; तमू--उसको; च--तथा; अपि--भी; शतधा--सैकड़ों खंडों में; अच्छिनत्‌ू--तोड़ डाला।

खोपड़ी पर भगवान्‌ की गदा से चोट खाकर द्विविद रक्त की धार बहने से उसी तरहसुशोभित हो रहा था जिस तरह कोई पर्वत गेरू से सुन्दर लगने लगता है।

उसने घाव की परवाहन करके दूसरा वृक्ष उखाड़ा, बलपूर्वक उसकी पत्तियाँ विलग कीं और पुनः भगवान्‌ पर प्रहारकिया।

अब बलराम ने क्रुद्ध होकर वृक्ष के सैकड़ों टुकड़े कर डाले।

इस पर द्विविद ने दूसरावृक्ष हाथ में लिया और फिर से बहुत ही रोषपूर्वक भगवान्‌ पर प्रहार किया।

भगवान्‌ ने इस वृक्षके भी सैकड़ों खण्ड कर डाले।

एवं युध्यन्भगवता भग्ने भग्ने पुनः पुनः ।

आकृष्य सर्वतो वृक्षान्रिर्वृक्षमकरोद्दनम्‌ ॥

२२॥

एवम्‌--इस प्रकार; युध्यनू--( द्विविद ने ) युद्ध करते हुए; भगवता-- भगवान्‌ द्वारा; भग्ने भग्ने--बारम्बार तोड़े जाने पर; पुनःपुनः--फिर फिर; आकृष्य--उखाड़ कर; सर्वतः--सभी ओर से; वृक्षान्‌--वृजक्षों को; निर्वृक्षम्‌--वृक्षरहित; अकरोत्‌--करदिया; वनमू--वन को |

इस तरह भगवान्‌ से युद्ध करते द्विविद जिस भी वृक्ष से भगवान्‌ पर प्रहार करता उसकेबारम्बार विनष्ट हो जाने पर वह चारों ओर से तब तक वृक्ष उखाड़ता रहा जब तक कि जंगलवृक्षविहीन नहीं हो गया।

ततो<मुझ्जच्छिलावर्ष बलस्योपर्यमर्षित: ।

तत्सर्व चूर्णयां आस लीलया मुषलायुध: ॥

२३॥

ततः--तब; अमुझत्‌--उसने फेंका; शिला--चट्टान की; वर्षम्‌--वर्षा; बलस्य उपरि--बलराम के ऊपर; अमर्षित:--हताशहोकर; तत्‌--उस; सर्वम्‌--समस्त; चूर्णयाम्‌ आस--पीस डाला; लीलया--आसानी से; मुषल-आयुध:--गदाधारी ने |

तत्पश्चात्‌ क्रुद्ध वानर ने बलराम पर पत्थरों की वर्षा की किन्तु उस गदाधारी ने उन सबों कोचकनाचूर कर डाला।

स बाहू तालसड्डजाशौ मुष्टीकृत्य कपी श्वरः ।

आसाद्य रोहिणीपुत्र ताभ्यां वक्षस्यरूरूजतू ॥

२४॥

सः--वह; बाहू--दोनों भुजाएँ; ताल--ताड़ के वृक्ष; सड्ढाशौ--जितनी बड़ी; मुष्ठी --मुक्का में; कृत्य--करके ; कपि--वानरोंमें; ईश्वरः--सबसे शक्तिशाली; आसाद्य--सामना करके; रोहिणी-पुत्रमू--रोहिणी के पुत्र बलराम को; ताभ्याम्‌--उन;वक्षसि--छाती पर; अरूरुजत्‌--मारा

सर्वाधिक शक्तिशाली वानर द्विविद अब ताड़-वृक्ष जैसे आकार वाली भुजाओं के सिरे परमुक्के बाँध कर बलराम के समक्ष आया और उनके शरीर पर अपने मुक्के मारे।

याददवेन्द्रोडपि तं दोर्भ्या त्यक्त्वा मुषललाड्ले ।

जत्रावश्यर्दयत्क्रुद्ध: सोपतद्गुधिरं वमन्‌ ॥

२५॥

यादव-इन्द्र:--यादवों के प्रभु, बलराम ने; अपि-- भी; तम्‌--उसको; दोर्भ्याम्‌--अपने हाथों से; त्यक्वा--एक ओर फेंक कर;मुषल-लाडूले--गदा तथा हल; जत्रौ--हँसली पर; अभ्यर्दयत्‌--जोर का प्रहार किया; क्रुद्ध:--क्रुद्ध; सः--वह, द्विविद;अपततू--गिर पड़ा; रुधिरम्‌--रक्त; वमन्‌ू--वमन करता हुआ।

तत्पश्चात्‌ क्रुद्ध यादवेन्द्र ने अपनी गदा और हल को एक ओर फेंक दिया और अपने खालीहाथों से द्विविद की हँसली पर जोर का प्रहार किया।

वह वानर रक्त वमन करता हुआ भूमि परगिर पड़ा।

चअकम्पे तेन पतता सटड्डू: सवनस्पति: ।

पर्वतः कुरुशार्दूल वायुना नौरिवाम्भसि ॥

२६॥

चअकम्पे--हिल उठा; तेन--उसके; पतता--गिरने से; स--सहित; टट्ठः--चोटियों; स--सहित; वनस्पति:--वृक्ष; पर्वत: --पर्वत; कुरु-शार्टूल--हे कुरूओं में सिंह ( महाराज परीक्षित ); वायुना--वायु से; नौ: --नाव; इब--मानो; अम्भसि--जल में |

हे कुरु-शार्दूल, जब वह गिरा तो रैवतक पर्वत अपनी चोटियों तथा वृक्षों समेत हिल उठामानो समुद्र में वायु द्वारा हिलाई गई कोई नाव हो।

जयशब्दो नमःशब्द: साधु साध्विति चाम्बरे ।

सुरसिद्धमुनीन्द्राणामासीत्कुसुमवर्षिणाम्‌ ॥

२७॥

जय-शब्द:--जय ( विजय ) की ध्वनि; नम:-शब्द:--नमः ( नमस्कार ) की ध्वनि; साधु साधु इति--बहुत अच्छा, बहुत अच्छाकी पुकार; च--तथा; अम्बरे-- आकाश में; सुर--देवताओं के; सिद्ध--सिद्धों के; मुनि-इन्द्राणामू--तथा मुनियों के;आसीत्‌--थे; कुसुम--फूल; वर्षिणाम्‌--वर्षा करते।

स्वर्ग में देवता, सिद्धणण तथा मुनिगण निनाद करने लगे, 'आपकी जय हो, आपको नमस्कार है, बहुत अच्छा, बहुत अच्छा हुआ! ' और भगवान्‌ पर फूल बरसाने लगे।

एवं निहत्य द्विविदं जगद्व्यतिकरावहम्‌ ।

संस्तूयमानो भगवान्जनै: स्वपुरमाविशत्‌ ॥

२८॥

एवम्‌--इस प्रकार; निहत्य--मार कर; ट्विविदम्‌--ट्विविद को; जगत्‌--संसार के; व्यतिकर--उपद्रव; आवहम्‌--लाने वालेको; संस्तूयमान:--स्तुतियों द्वारा प्रशंसा किये जा रहे; भगवान्‌-- भगवान्‌ ने; जनैः --लोगों द्वारा; स्व--अपने; पुरम्‌--नगर( द्वारका ) में; आविशत्‌-- प्रवेश किया

सारे संसार में उपद्रव मचाने वाले द्विविद को इस तरह मार कर भगवान्‌ अपनी राजधानीलौट आये और लोगों ने रास्ते में उनका यशोगान किया।

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