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अध्याय छियासठ: पौंड्रक, झूठा वासुदेव

10.66श्रीशुक उवाचनन्दब्रजं गते रामे करूषाधिपतिनूप ।

वासुदेवोहमित्यज्ञोदूतं कृष्णाय प्राहिणोत्‌ ॥

१॥

श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; नन्द--महाराज नन्द के; ब्रजम्‌-ग्वालों के ग्राम की ओर; गते--चले जाने पर;रामे--बलराम के; करूष-अधिपति:--करूष के शासक ( पौण्ड्क ) ने; नृप--हे राजा ( परीक्षित ); वासुदेव: --भगवान्‌,वबासुदेव; अहम्‌--मैं; इति--इस प्रकार सोचते हुए; अज्ञ:--मूर्ख; दूतम्‌ू--संदेशवाहक को; कृष्णाय--भगवान्‌ कृष्ण के पास;प्राहिणोतू-- भेजा

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजनू, जब बलराम नन्द के ग्राम ब्रज को देखने गये हुए थेतो करूष के राजा ने मूखर्तापूर्वक यह सोचकर कि 'मैं भगवान्‌ वासुदेव हूँ' भगवान्‌ कृष्ण केपास अपना दूत भेजा।

त्वं वासुदेवो भगवानवतीऋनो जगत्पति: ।

इति प्रस्तोभितो बालैमेन आत्मानमच्युतम्‌ ॥

२॥

त्वमू--तुम; वासुदेव: --वासुदेव; भगवान्‌-- भगवान्‌; अवतीर्ण:--अवतरित; जगत्‌--ब्रह्माण्ड के; पति: --स्वामी; इति--इसप्रकार; प्रस्तोभित:--चापलूसी में आकर, बहकावे में आकर; बालैः--बचकाने मनुष्यों द्वारा; मेने--उसने कल्पना की;आत्मानम्‌--अपने को; अच्युतम्‌--अच्युत भगवान्‌)

पौण्ड्क मूर्ख लोगों की चापलूसी में आ गया जिन्होंने उससे कहा, 'तुम भगवान्‌ वासुदेवहो और ब्रह्माण्ड के स्वामी के रूप में अब पृथ्वी में अवतरित हुए हो।

' इस तरह वह अपनेआपको भगवान्‌ अच्युत मान बैठा।

दूतं च प्राहिणोन्मन्दः कृष्णायाव्यक्तवर्त्मने ।

द्वारकायां यथा बालो नृपो बालकृतोबुध: ॥

३॥

दूतम्‌--दूत को; च--तथा; प्राहिणोत्‌-- भेजा; मन्द: --मन्द बुद्धि; कृष्णाय--कृष्ण के पास; अव्यक्त--अकथ्य; वर्त्मने--जिसका मार्ग; द्वारकायाम्‌ू-द्वारका में; यथा--जिस तरह; बाल:--बालक; नृप:--राजा; बाल--बालकों द्वारा; कृत:--बनाया गया; अबुध: --मूर्ख ।

अतएव उस मन्द बुद्धि पौण्ड्रक ने अव्यक्त भगवान्‌ कृष्ण के पास द्वारका में एक दूत भेजा।

पौण्डुक ऐसे मूर्ख बालक की तरह आचरण कर रहा था जिसे अन्य बालक राजा मान लेते हैं।

दूतस्तु द्वारकामेत्य सभायामास्थितं प्रभुम्‌ ।

कृष्णं कमलपत्राक्षं राजसन्देशमब्रवीत्‌ ॥

४॥

दूतः--सन्देशवाहक ने; तु--तब; द्वारकाम्‌-द्वारका में; एत्य--पहुँच कर; सभायाम्‌--राजसभा में; आस्थितम्‌--उपस्थित;प्रभुमू--सर्वशक्तिमान स्वामी; कृष्णम्‌--कृष्ण से; कमल--कमल की; पत्र--पंखुड़ियों ( सहश ); अक्षम्‌--आँखों वाले;राज--अपने राजा का; सन्देशम्‌--सन्देश; अब्नवीत्‌ू--कहा |

द्वारका पहुँचने पर दूत ने कमल-नेत्र कृष्ण को उनकी राजसभा में उपस्थित पाया।

उसनेराजा का सन्देश उन सर्वशक्तिमान प्रभु को कह सुनाया।

वासुदेवोवतती्नों हमेक एव न चापरः ।

भूतानामनुकम्पार्थ त्वं तु मिथ्याभिधां त्यज ॥

५॥

वासुदेव:--वासुदेव; अवतीर्ण:--इस जगत में अवतरित हुआ; अहम्‌--मैं; एकः एव--एकमात्र; न--नहीं; च--तथा;अपरः--दूसरा कोई; भूतानामू--जीवों पर; अनुकम्पा--दया दिखाने के ; अर्थम्‌-हेतु; त्वमू--तुम; तु--किन्तु; मिथ्या--झूठा;अभिधाम्‌--उपाधि; त्यज--छोड़ दो |

पौण्ड्रक की ओर से दूत ने कहा : मैं ही एकमात्र भगवान्‌ वासुदेव हूँ और दूसरा कोईनहीं है।

मैं ही इस जगत में जीवों पर दया दिखलाने के लिए अवतरित हुआ हूँ।

अतः तुम अपनाझूठा नाम छोड़ दो।

यानि त्वमस्मच्चिह्ननि मौद्याद्विभर्षि सात्वत ।

त्यक्त्वैहि मां त्वं शरणं नो चेद्देहि ममाहवम्‌ ॥

६॥

यानि--जिन; त्वम्‌ू--तुम; अस्मत्‌--हमारे; चिह्नानि--प्रतीकों को; मौढ्यात्‌--मूढ़तावश; बिभर्षि-- धारण करते हो; सात्वत--हे सात्वतों में प्रमुख; त्यक्त्वा--छोड़ कर; एहि--आओ; माम्‌--मेरी; त्वमू--तुम; शरणम्‌--शरण के लिए; न--नहीं; उ--अन्यथा; चेत्‌--यदि; देहि--दो; मम--मुझको; आहवमू--युद्ध

हे सात्वत, तुम मेरे निजी प्रतीकों को छोड़ दो जिन्हें इस समय तुम मूर्खतावश धारण करतेहो और आकर मेरी शरण लो।

यदि तुम ऐसा नहीं करते तो मुझसे युद्ध करो।

श्रीशुक उवाचकत्थनं तदुपाकर्ण्य पौण्ड्रकस्याल्पमेधस: ।

उग्रसेनादय: सभ्या उच्चकैर्जहसुस्तदा ॥

७॥

श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; कत्थनम्‌ू--शेखी बघारने, डींग हाँकने को; तत्‌--उस; उपाकर्णय्य --सुनकर;पौण्ड्रकस्य--पौण्ड्रक की; अल्प--छोटी; मेधस:--बुद्धि वाले; उग्रसेन-आदय: --राजा उग्रसेन इत्यादि; सभ्या:--सभा केसदस्य; उच्चकै:--जोरों से; जहसु:--हँसने लगे; तदा--तब

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब अज्ञानी पौण्ड्रक की इस व्यर्थ की डींग को राजा उग्रसेनतथा सभा के अन्य सदस्यों ने सुना तो वे जोर-जोर से हँसने लगे।

उवाच दूत॑ भगवान्परिहासकथामनु ।

उत्स्रक्ष्ये मूढ चिह्नानि यैस्त्वमेवं विकत्थसे ॥

८॥

उवाच--कहा; दूतम्‌-दूत से; भगवान्‌-- भगवान्‌; परिहास--हँसी-मजाक; कथाम्‌--वाद-विवाद के; अनु--बाद;उत्स्रक्ष्ये--मैं फेंक दूँगा; मूढ--हे मूर्ख; चिह्नानि--प्रतीक; यैः--जिनके बारे में; त्वमू--तुम; एवम्‌--इस तरह से; विकत्थसे--डींग मार रहे हो।

सभा के हँसी-मजाक का आनन्द लेने के बाद भगवान्‌ ने दूत से ( अपने स्वामी को सूचितकरने के लिए ) कहा, रे मूर्ख! मैं निस्सनदेह उन हथियारों को फेंक दूँगा जिनके विषय में तुमइस तरह डींग मार रहे हो।

मुखं तदपिधायाज्ञ कड्डगृश्नवटै्वृत: ।

शयिष्यसे हतस्तत्र भविता शरणं शुनाम्‌ ॥

९॥

मुखम्‌--मुख को; तत्‌--उस; अपिधाय--ढक कर; अज्ञ-रे अज्ञानी; कड्डू--चील्हों; गृक्ष--गीधों; बटै: --वट पक्षियों से;बृतः--घिरा; शयिष्यसे-- तुम सो जाओगे; हतः--मारे हुए; तत्र--तत्पश्चात्‌; भविता--तुम बनोगे; शरणम्‌--आश्रय; शुनाम्‌--कुत्तों के |

'रे मूर्ख! जब तुम मारे जाओगे और तुम्हारा मुख गीधों, चील्हों तथा वट पक्षियों से ढकारहेगा तो तुम कुत्तों का आश्रय-स्थल बनोगे।

'!इति दूतस्तमाक्षेपं स्वामिने सर्वमाहरत्‌ ।

कृष्णोपि रथमास्थाय काशीमुपजगाम ह ॥

१०॥

इति--इस प्रकार कह कर; दूतः--दूत; तम्‌--उन; आक्षेपम्‌--अपमानों को; स्वामिने--अपने स्वामी के प्रति; सर्वम्‌--पूर्णतः;आहरत्‌--ले गया; कृष्ण:--कृष्ण; अपि--तथा; रथम्‌--अपने रथ पर; आस्थाय--सवार होकर; काशीम्‌--वाराणसी;उपजगाम ह--के निकट गये।

जब भगवान्‌ इस तरह बोल चुके तो उनके अपमानपूर्ण उत्तर को उस दूत ने अपने स्वामी केपास जाकर पूरी तरह कह सुनाया।

तब भगवान्‌ कृष्ण अपने रथ पर सवार हुए और काशी केनिकट गये।

पौण्ड्रकोपि तदुद्योगमुपलभ्य महारथः ।

अक्षौहिणीभ्यां संयुक्तो निश्चक्राम पुराददूरतम्‌ ॥

११॥

पौण्डूक:--पौण्ड्क; अपि--तथा; तत्‌--उसका; उद्योगम्‌--तैयारी; उपलभ्य--देखकर; महा-रथ: --बलशाली योद्धा;अक्षौहिणीभ्याम्‌--दो अक्षौहिणियों द्वारा; संयुक्त:--साथ हो लिए; निश्चक्राम--बाहर गया; पुरात्‌ू--नगर से; द्रुतम्‌--तुरन्त |

भगवान्‌ कृष्ण द्वारा युद्ध की तैयारी को देखते हुए बलशाली योद्धा पौण्ड्रक तुरन्त ही दोअक्षौहिणी सेना के साथ नगर के बाहर निकल आया।

तस्य काशीपतिर्मित्रं पार्णिगग्राहोन्वयान्रूप ।

अक्षौहिणीभिस्तिसृभिरपश्यत्पौण्ड्रकं हरि: ॥

१२॥

शद्जार्यसिंगदाशार्ड्श्रीवत्साद्युपलक्षितम्‌ ।

बिश्राणं कौस्तुभमरणिं वनमालाविभूषितम्‌ ॥

१३॥

'कौशेयवाससी पीते वसानं गरुडध्वजम्‌ ।

अमूल्यमौल्याभरणं स्फुरन्मकरकुण्डलम्‌ ॥

१४॥

तस्य--उसका ( पौण्ड्रक का ); काशी-पतिः --काशी का स्वामी; मित्रम्‌--मित्र; पार्णिण-ग्राह: --पीछे से रक्षक के रूप में;अन्वयात्‌--पीछे पीछे गया; नृप--हे राजा ( परीक्षित ); अक्षौहिणीभि:--अक्षौहिणियों समेत; तिसृभि:--तीन; अपश्यत्‌--देखा; पौण्ड्रकम्‌-पौण्ड्रक को; हरिः--कृष्ण ने; शद्ध--शंख; अरि--चक्र; असि--तलवार; गदा-गदा; शार्ई--शार्डधनुष; श्रीवत्स--वक्षस्थल पर बालों का श्रीवत्स चिह्न सहित; आदि--तथा अन्य प्रतीक; उपलक्षितम्‌--अंकित; बिभ्राणम्‌-धारण किये हुए; कौस्तुभ-मणिम्‌--कौस्तुभ मणि; वन-माला--जंगली फूलों की माला से; विभूषितम्‌--सुशोभित; कौशेय--सुन्दर रेशम के; वाससी--वस्त्रों की जोड़ी; पीते--पीत; वसानम्‌--पहने; गरुड-ध्वजम्‌ू--जिसके झंडे में गरुड़ अंकित है;अमूल्य--अनमोल; मौलि--मुकुट; आभरणम्‌--आभूषण; स्फुरत्‌ू--चमकते हुए; मकर--मकर के आकार वाले;कुण्डलम्‌ू-कुण्डलों सहित।

हे राजन, पौण्ड्रक का मित्र काशीराज उसके पीछे पीछे गया और वह तीन अक्षौहिणी सेनासमेत पीछे के रक्षकों की अगुआई कर रहा था।

भगवान्‌ कृष्ण ने देखा कि पौण्ड्रक भगवान्‌ केही प्रतीक यथा शंख, चक्र, तलवार तथा गदा और दिखावटी शाऱ्् धनुष तथा श्रीवत्स चिन्ह भीधारण किये था।

वह नकली कौस्तुभ मणि भी पहने था।

वह जंगली फूलों की माला सेसुशोभित था और ऊपर और नीचे उत्तम पीले रेशमी वस्त्र पहने था।

उसके झंडे में गरुड़ काचिन्ह था और वह मूल्यवान मुकुट तथा चमचमाते मकराकृति वाले कुंडल पहने था।

इष्ठा तमात्मनस्तुल्यं वेषं कृत्रिममास्थितम्‌ ।

यथा नटं रड़्गतं विजहास भूशं हरी: ॥

१५॥

इृष्ठा--देखकर; तमू--उसको; आत्मन:--अपने ही; तुल्यम्‌--तुल्य, समान; वेषम्‌--वेश में; कृत्रिमम्‌ू--कृत्रिम, नकली;आस्थितम्‌--सजाये हुए; यथा--सहृश; नटम्‌ू--अभिनयकर्ता; रड्ग--मंच में; गतम्‌--प्रवेश हुआ; विजहास--हँसे; भूशम्‌--खूब कस कर; हरिः-- भगवान्‌ कृष्ण |

जब भगवान्‌ हरि ने देखा कि राजा ने उन्हीं जैसा अपना वेश बना रखा है, जिस तरह मंच परकोई अभिनेता करता है, तो वे खूब हँसे।

शूलैर्गदाभि: परिधै: शक्त्यृष्टिप्रासतोमरै: ।

असिभ्निः पट्टिशैर्बाणै: प्राहरन्नरयो हरिमू ॥

१६॥

शूलैः--त्रिशूल से; गदाभि:--गदा से; परिधैः--नेचों से; शक्ति--शक्ति; ऋष्टि--एक प्रकार की तलवार; प्रास--लम्बानुकीला अस्त्र; तोमैरः:--तथा भालों से; असिभि:--तलवारों से; पद्टिशैः:--कुल्हाड़ियों से; बाणैः--तथा बाणों से; प्राहरन्‌--आक्रमण किया; अरयः--शत्रुओं ने; हरिम्‌-- भगवान्‌ कृष्ण पर।

भगवान्‌ हरि के शत्रुओं ने उन पर त्रिशूलों, गदाओं, नेचों, शक्तियों, ऋष्टियों, प्रासों, तोमरों,तलवारों, कुल्हाड़ियों तथा बाणों से आक्रमण किया।

कृष्णस्तु तत्पौण्ड्रक्काशिराजयोर्‌बल॑ गजस्यन्दनवाजिपत्तिमत्‌ ।

गदासिचक्रेषुभिरार्दयद्धूशंयथा युगान्ते हुतभुक्पृथक्प्रजा: ॥

१७॥

कृष्ण: --कृष्ण; तु--किन्तु; तत्‌ू--उस; पौण्ड्रक-काशिराजयो: --पौण्ड्रक तथा काशिराज की; बलम्‌--सेना को; गज--हाथी; स्वन्दन--रथ; वाजि--घोड़े; पत्ति-- तथा पैदल; मत्‌--से युक्त; गदा--गदा; असि--तलवार; चक्र -- चक्र; इसुभि:--तथा बाणों से; आर्दयत्‌--रौंदते हुए; भूशम्‌--बुरी तरह से; यथा--जिस प्रकार; युग--ऐतिहासिक युग के; अन्ते--अन्त में;हुत-भुक्‌ू --अग्नि ( प्रलयंकारी ); पृथक्‌--विभिन्न प्रकार के; प्रजा:--जीव

किन्तु भगवान्‌ कृष्ण ने पौण्ड्रक तथा काशिराज की सेना पर भीषण वार किया, जिसमेंहाथी, रथ, घोड़े तथा पैदल सम्मिलित थे।

भगवान्‌ ने अपनी गदा, तलवार, सुदर्शन चक्र तथाबाणों से अपने शत्रुओं को उसी तरह रौंद दिया जिस तरह युगान्त में प्रलयाग्नि विविध प्रकारकेप्राणियों को रौंदती है।

आयोधनं तद्रथवाजिकुञ्जर-द्विपत्खरोष्टररिणावखण्डितैः ।

बभौ चितं मोदवहं मनस्विना-माक्रीडनं भूतपतेरिवोल्बणम्‌ ॥

१८॥

आयोधनम्‌--युद्ध भूमि; तत्‌--उस; रथ--रथों; वाजि--घोड़ों; कुझ़्र--हाथियों; द्विपत्‌--दौ पैर वालों ( मनुष्यों ); खर--गठहों; उद्ढने:--तथा ऊँटों से; अरिणा--अपने चक्र से; अवखण्डितै:ः--खण्ड खण्ड किये; बभौ--चमक रही थी; चितम्‌-फैलेहुए; मोद--हर्ष; वहम्‌--लाते हुए; मनस्विनाम्‌ू--बुद्धिमान को; आक्रीडनम्‌--खेल का मैदान, अखाड़ा; भूत-पतेः -- भूतों केस्वामी, शिवजी के; इब--सहृश; उल्बणम्‌-- भयंकर |

भगवान्‌ के चक्र द्वारा खण्ड-खण्ड किये गये रथों, घोड़ों, हाथियों, मनुष्यों, खच्चरों तथाऊँटों से पटा हुआ युद्ध क्षेत्र उसी तरह चमक रहा था मानो विद्वान को आनन्द प्रदान करने वालाभूतपति का भयावना अखाड़ा हो।

अथाह पौण्ड्कं शौरिर्भों भो पौण्ड्रक यद्धवान्‌ ।

दूतवाक्येन मामाह तान्यस्त्रण्युत्मूजामि ते ॥

१९॥

अथ--तब; आह--कहा; पौण्ड्रकम्‌-पौण्ड्रक से; शौरि: -- भगवान्‌ कृष्ण ने; भो: भो: पौण्ड्रक--अरे पौण्ड्रक; यत्‌--जो;भवान्‌--आपने; दूत--दूत के; वाक्येन--शब्दों से; मामू--मुझसे; आह--कहा; तानि--वे; अस्त्राणि-- हथियार; उत्सृजामि--मैं छोड़ रहा हूँ; ते--तुम्हारे ऊपर |

तब भगवान्‌ कृष्ण ने पौण्ड्रक को सम्बोधित किया : रे पौण्ड्रक! तूने अपने दूत के माध्यमसे जिन हथियारों के लिए कहलवाया था अब मैं उन्हीं को तुझ पर छोड़ रहा हूँ।

त्याजयिष्येभिधान मे यत्त्वयाज्ञ मृषा धृतम्‌ ।

ब्रजामि शरनं तेउद्य यदि नेच्छामि संयुगम्‌ ॥

२०॥

त्याजयिष्ये--( तुमसे ) छुड़वाकर रहूँगा; अभिधानम्‌--उपाधि; मे--मेरा; यत्‌--जो; त्वया--तुम्हारे द्वारा; अज्ञ-रे मूर्ख;मृषा--झूठे ही; धृतम्‌-- धारण किये हुए; ब्रजामि--जाऊँगा; शरणम्‌--शरण में; ते--तुम्हारी; अद्य--आज; यदि--यदि; नइच्छामि--नहीं चाहता हूँ; संयुगम्‌--युद्ध |

रे मूर्ख! अब मैं तुझसे अपना नाम छुड़वाकर रहूँगा जिसे तूने झूठे ही धारण कर रखा है।

मैंतब अवश्य ही तेरी शरण ग्रहण करूँगा यदि मैं तुझसे युद्ध नहीं करना चाहूँगा।

इति क्षिप्त्वा शितैर्बाणैर्विरथीकृत्य पौण्ड्रकम्‌ ।

शिरोवृश्चद्रथाड्रेन बज्रेणेन्द्रो यथा गिरे: ॥

२१॥

इति--इन शब्दों के साथ; क्षिप्त्वा--चिढ़ाते हुए; शितैः--तेज; बाणै:--बाणों से; विरथी--रथविहीन; कृत्य--करके;पौण्ड्कम्‌-पौण्ड्क को; शिर:--उसका सिर; अवृश्चत्‌--काट लिया; रथ-अड्लेन--अपने सुदर्शन चक्र से; वज़ेण--अपने वज्चसे; इन्द्र:--इन्द्र; यथा--जिस तरह; गिरेः--पर्वत का ॥

पौण्ड्रक को इस तरह चिढ़ा कर भगवान्‌ कृष्ण ने अपने तेज बाणों से उसका रथ विनष्ट करदिया।

फिर भगवान्‌ ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका सिर उसी तरह काट लिया जिस तरह इन्द्रअपने वज् से पर्वत की चोटी को काट गिराता है।

तथा काशीपते: कायाच्छिर उत्कृत्य पत्रिभि: ।

न्यपातयत्काशीपुर्या पद्दकोशमिवानिल: ॥

२२॥

तथा--उसी तरह; काशी-पते:--काशिराज के; कायात्‌--शरीर से; शिरः --सिर; उत्कृत्य--काट कर; पत्रिभि:--अपने बाणोंसे; न्‍्यपातयत्‌--उड़ते हुए भेज दिया; काशि-पुर्यामू--काशी नगरी में; पद्य--कमल के; कोशम्‌--फूल के कोश को; इब--सहश; अनिलः-वायु।

भगवान्‌ कृष्ण ने अपने बाणों से काशिराज के सिर को उसके शरीर से उसी तरह काट करउसे काशी नगरी में जा गिराया मानो वायु द्वारा फेंका गया कमल का फूल हो।

एवं मत्सरिणम्हत्वा पौण्डुक॑ं ससखं हरि: ।

द्वारकामाविशत्सिद्धै्गीयमानकथामृत: ॥

२३॥

एवमू--इस प्रकार; मत्सरिणम्‌--ईर्ष्यालु; हत्वा--मार कर; पौण्ड्रकम्‌--पौण्ड्क को; स--सहित; सखम्‌--उसके मित्र;हरिः--भगवान्‌ कृष्ण; द्वारकामू-द्वारका में; आविशत्‌-- प्रवेश किया; सिद्धैः--स्वर्ग के योगियों द्वारा; गीयमान--गायीजाकर; कथा--उनके विषय में कथाएँ; अमृतः--अमृत तुल्य।

इस तरह ईर्ष्यालु पौण्ड्रक तथा उसके सहयोगी का वध करने के बाद भगवान्‌ कृष्ण द्वारकालौट गये।

ज्योंही वे नगर में प्रविष्ट हुए स्वर्ग के सिद्धों ने उनकी अमर अमृतमयी महिमा का गानकिया।

स नित्यं भगवद्धद्यानप्रध्वस्ताखिलबन्धन: ।

बिभ्राणश्व हरे राजन्स्वरूपं तन्मयोभवत्‌ ॥

२४॥

सः--वह ( पौण्ड्रक ); नित्यम्‌--निरन्तर; भगवत्‌-- भगवान्‌ के; ध्यान--ध्यान द्वारा; प्रध्वस्त--पूर्णतया ध्वस्त; अखिल--समस्त; बन्धन:--बन्धन; बिभ्राण: --मानते हुए; च--तथा; हरे: -- भगवान्‌ कृष्ण का; राजन्‌--हे राजा ( परीक्षित );स्वरूपम्‌--साकार रूप; ततू्‌-मय:--उनकी चेतना में लीन; अभवत्‌--हो गया

निरन्तर भगवान्‌ का ध्यान करते रहने से पौण्ड्रक ने अपने सारे भौतिक बन्धनों को ध्वंस करदिया था।

हे राजन, निस्सन्देह भगवान्‌ कृष्ण के स्वरूप का अनुकरण करके अन्ततोगत्वा वहकृष्णभावनाभावित हो गया।

शिरः पतितमालोक्य राजद्वारे सकुण्डलम्‌ ।

किमिदं कस्य वा वक्त्रमिति संशिशिरे जना; ॥

२५॥

शिरः--सिर; पतितम्‌ू--गिरा हुआ; आलोक्य--देखकर; राज-द्वारे--राजमहल के द्वार पर; स-कुण्डलमू--कुण्डल सहित;किमू--क्या; इृदम्‌ू--यह है; कस्य--किसका; वा--अथवा; वक्त्रमू--सिर; इति--इस प्रकार; संशिशिरे--सन्देह व्यक्त किया;जना:ः--लोगों ने

राजमहल के द्वार पर पड़े हुए कुण्डल से विभूषित सिर को देखकर वहाँ पर उपस्थित सारेलोग चकित थे।

उनमें से कुछ ने पूछा, 'यह क्‍या है?' और दूसरों ने कहा, 'यह सिर हैलेकिन, यह है किसका ?

राज्ञ: काशी पतेरज्ञात्वा महिष्य: पुत्रबान्धवा: ।

पौराश्च हा हता राजन्नाथ नाथेति प्रारुदन्‌ ॥

२६॥

राज्ञ:--राजा का; काशी-पते:--काशी के स्वामी; ज्ञात्वा--पहचान कर; महिष्य: --उसकी रानियाँ; पुत्र--उसके पुत्र;बान्धवा:--तथा उसके अन्य सम्बन्धी; पौरा:--नगर के निवासी; च--तथा; हा--हाय; हता: --( हम ) मारे गये; राजन्‌ू--हेराजा ( परीक्षित ); नाथ नाथ--हे नाथ, हे नाथ; इति--इस प्रकार; प्रारूदनू--जोर जोर से विलखने लगे।

हे राजन्‌ू, जब उन लोगों ने पहचाना कि यह उनके राजा--काशीपति का सिर है, तो उसकीरानियाँ, पुत्र तथा अन्य सम्बन्धी एवं नगर के सारे निवासी 'हाय! हम मारे गये! हे नाथ, हेनाथ! ' कह कर रोने लगे।

सुदक्षिणस्तस्य सुतः कृत्वा संस्थाविधि पते: ।

निहत्य पितृहन्तारं यास्याम्यपचितिं पितु: ॥

२७॥

इत्यात्मनाभिसन्धाय सोपाध्यायो महेश्वरम्‌ ।

सुदक्षिणो<र्चयामास परमेण समाधिना ॥

२८॥

सुदक्षिण:--सुदक्षिण नामक; तस्य--उसका ( काशिराज का ); सुत:--पुत्र; कृत्वा--सम्पन्न करके; संस्था-विधिम्‌--दाह-संस्कार; पतेः--अपने पिता का; निहत्य--मार कर; पितृ--पिता का; हन्तारम्‌--मारने वाले को; यास्यामि--ले सकूँगा;अपचितिम्‌--बदला; पितु:--अपने पिता का; इति--इस प्रकार; आत्मना--अपनी बुद्धि से; अभिसन्धाय--निश्चय करके;स--सहित; उपाध्याय: --पुरोहितों; महा-ईश्वरम्‌--शिवजी की; सु-दक्षिण:--अत्यन्त दानी होने से; अर्चयाम्‌ आस--पूजा की;'परमेण-- अत्यधिक; समाधिना-- ध्यान से

जब राजा का पुत्र सुदक्षिण अपने पिता का दाह-संस्कार कर चुका तो उसने अपने मन मेंनिश्चय किया, 'मैं अपने पिता के हत्यारे का वध करके ही उसकी मृत्यु का बदला ले सकताहूँ।

' इस तरह दानी सुदक्षिण अपने पुरोहितों सहित बहुत ही लगन से भगवान्‌ महेश्वर की पूजाकरने लगा।

प्रीतोविमुक्ते भगवांस्तस्मै वरमदाद्विभु: ।

पितृहन्तृवधोपायं स बब्रे वरमीप्सितम्‌ ॥

२९॥

प्रीत:--सन्तुष्ट; अविमुक्ते--अविमुक्त में, काशी जनपद के अन्तर्गत पवित्र स्थल में; भगवान्‌--शिवजी; तस्मै-- उसको; वरम्‌--वर; अदात्‌ू--दिया; विभुः--शक्तिशाली देवता; पितृ--पिता का; हन्तृ--वध करने वाला; वध--हत्या करने के लिए;उपायम्‌--साधन; सः--उसने; वद्रे--चुना; वरम्‌--अपने वर के रूप में; ईप्सितम्‌--इच्छित |

पूजा से सन्तुष्ट होकर शक्तिशाली शिवजी अविमुक्त नामक पवित्र स्थल में प्रकट हुए औरसुदक्षिण को इच्छित वर माँगने को कहा।

राजकुमार ने अपने पिता के वध करने वाले की हत्याकरने के साधन को ही अपने वर के रूप में चुना।

दक्षिणाग्निं परिचर ब्राह्मणै: सममृत्विजम्‌ ।

अभिचारविधानेन स चाग्नि: प्रमथेर्वृत: ॥

३०॥

साधयिष्यति सट्डूल्पमब्रह्मण्ये प्रयोजितः ।

इत्यादिष्टस्तथा चक्रे कृष्णायाभिचरन्त्रती ॥

३१॥

दक्षिण-अग्निमू--दक्षिण अग्नि को; परिचर--तुम्हें सेवा करनी चाहिए; ब्राह्मणैः --ब्राह्मणों के; समम्‌--साथ; ऋत्विजम्‌--आदि पुरोहित को; अभिचार-विधानेन--अभिचार अनुष्ठान द्वारा ( शत्रु को मारने या हानि पहुँचाने के लिए किया गया अनुष्ठान;सः--वह; च--तथा; अग्नि:-- अग्नि; प्रमथै: --प्रमथों द्वारा ( शिवजी की टोली के शक्तिशाली योगी जो विभिन्न रूप धारणकर सकते हैं ); वृतः:--घिरे हुए; साधयिष्यति--सम्पन्न करेगा; सड्डूल्पम्‌--तुम्हारे मनोभाव को; अब्रह्मण्ये--ब्राह्मणों के शत्रु केविरुद्ध; प्रयोजित:--प्रयुक्त; इति--इस तरह; आदिष्ट:--आदेश दिया हुआ; तथा--उसी तरह से; चक्रे --किया; कृष्णाय--कृष्ण के विरुद्ध; अभिचरन्‌--हानि पहुँचाने की इच्छा से; ब्रती--ब्रत करने वाला

शिवजी ने कहा : 'तुम ब्राह्मणों के साथ अभिचार अनुष्ठान के आदेशों का पालन करते हुएआदि पुरोहित दक्षिणाग्नि की सेवा करो।

तब दक्षिणाग्नि अनेक प्रमथों सहित तुम्हारी इच्छा पूरीकरेगा यदि तुम इसे ब्राह्मणों से शत्रुता रखने वाले किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध निर्देशित करसकोगे।

' इस प्रकार आदिष्ट सुदक्षिण ने अनुष्ठान ब्रतों का हढ़ता से पालन किया और कृष्ण केविरुद्ध अभिचार का आह्वान किया।

ततोग्निरुत्थितः कुण्डान्मूर्तिमानतिभीषण: ।

तप्तताग्रशिखाएमश्रुरड्जरोद्गारिलोचन: ॥

३२॥

दंष्ट्रीग्रभुकुटीदण्डकठोरास्यः स्वजिह्या ।

आलिहन्सृक्वणी नग्नो विधुन्व॑स्त्रशिखं ज्वलत्‌ ॥

३३॥

ततः--तब; अग्नि:--अग्नि; उत्थित: --उठा; कुण्डात्‌--यज्ञ वेदी के कुंड से; मूर्ति-मान्‌ू--साक्षात; अति--अत्यधिक;भीषण: -- भयावना; तप्त--पिघले; ताम्र--ताँबे ( जैसा ); शिखा--चोटी; एमश्रु: --दाढ़ी; अड्रार--गर्म अंगारे; उद्गारि--उगलती हुई; लोचन:--आँखें; दंष्ट--दाँत; उग्र-- भयावह; श्रु--भौंहों के; कुटी-गटड्टों के; दण्ड--तथा तोरण से; कठोर--कर्कश; आस्य:--मुख; स्व--अपनी; जिह्या--जीभ से; आलिहनू--चाटते हुए; सृक्वणी-- अपने मुँह के कोनों को; नग्न:--नंग-धडंग; विधुन्वन्‌--हिलाता हुआ; त्रि-शिखम्‌-- अपना त्रिशूल; ज्वलत्‌--लपलपाता

तत्पश्चात्‌ यज्ञकुण्ड से अत्यन्त भयावने नंग-धडंग पुरुष का रूप धारण कर अग्नि बाहरनिकली।

इस अग्नि सरीखे प्राणी की दाढ़ी तथा चोटी पिघले ताँबे जैसी थीं और उसकी आँखों से जलते हुए गर्म अंगारे निकल रहे थे।

उसका मुख दाढ़ों तथा भयावह कुटिल एवं गहरी भौंहोंके साथ अत्यन्त भयावना लग रहा था।

अपने मुख के कोनों को अपनी जीभ से चाटता हुआ यहअसुर अपना ज्वलित त्रिशूल हिला रहा था।

पदभ्यां तालप्रमाणाभ्यां कम्पयन्नवनीतलम्‌ ।

सो<भ्यधावद्वुतो भूतैर्द्वारिकां प्रदृहन्दिशः ॥

३४॥

पदभ्याम्‌ू--अपने पैरों से; ताल--ताड़-वृक्षों की; प्रमाणाभ्यामू--माप वाला; कम्पयन्‌--हिलाता हुआ; अवनी--पृथ्वी के;तलमू--पृष्ठ को; सः--वह; अभ्यधावत्‌--दौड़ा; वृतः--घिर कर; भूतैः -- भूत-प्रेतों के द्वारा; द्वारकाम्‌--द्वारका की ओर;प्रदहन्‌ू--जलाता हुआ; दिश:--दिशाओं को

यह दैत्य ताड़-वृक्ष जैसी लंबी टाँगों से अपने साथ भूतों को लेकर, धरती को हिलाता तथासंसार को सभी दिशाओं में जलाता हुआ द्वारका की ओर भागा।

'तमाभिचारदहनमायान्तं द्वाकौकसः ॥

विलोक्य तत्रसु: सर्वे वनदाहे मृगा यथा ॥

३५॥

तम्‌--उसको; आभिचार--अभिचार अनुष्ठान से उत्पन्न; दहनम्‌--अग्नि को; आयान्तम्‌--निकट आते हुए; द्वारका -ओकस:--द्वारकावासी; विलोक्य--देखकर; तत्रसु:--भयभीत हो उठे; सर्वे--सभी; वन-दाहे--जंगल में आग लगने पर; मृगा: --पशु;यथा--जिस तरह।

अभिचार अनुष्ठान से उत्पन्न अग्नि तुल्य असुर को निकट आते देखकर द्वारका के सारेनिवासी उसी तरह भयभीत हो उठे जिस तरह दावाग्नि ( जंगल की अग्नि ) से पशु भयभीत होउठते हैं।

अक्षै: सभायां क्रीडन्तं भगवन्तं भयातुरा: ।

त्राहि त्राहि त्रिलोकेश वह्लेः प्रदहतः पुरम्‌ ॥

३६॥

अक्षै:--चौसर से; सभायाम्‌--राज-दरबार में; क्रीडन्तम्‌--खेलते हुए; भगवन्तम्‌ू-- भगवान्‌ को; भय-- भय से; आतुरा:--श्षुब्ध; त्राहि त्राहि--रक्षा करो, रक्षा करो; त्रि--तीन; लोक--लोकों के; ईश--हे स्वामी; वह्लेः--अग्नि से; प्रदहत:--जल रहे;पुरमू--नगर को

भय से किंकर्तव्यविमूढ़ लोगों ने उस समय राज-दरबार में चौसर खेल रहे भगवान्‌ के पासरो-रो कर कहा, 'हे तीनों लोकों के स्वामी, नगर को जलाने वाली इस अग्नि से हमारी रक्षाकीजिये! रक्षा कीजिये! ' श्रुत्वा तज्जनवैक्लव्यं हृष्ठा स्वानां च साध्वसम्‌ ।

शरण्य:ः सम्प्रहस्याह मा भैष्टेत्यवितास्म्यहम्‌ ॥

३७॥

श्रुत्वा--सुनकर; तत्‌--यह; जन--जनता की; बैक्लव्यम्‌ू--विकलता; दृष्टा--देखकर; स्वानामू--अपने ही लोगों को; च--तथा; साध्वसम्‌--विश्षुब्ध; शरण्य:--शरण के सर्वोत्तम साधन ने; सम्प्रहस्थ--जोर से हँस कर; आह--कहा; मा भैष्ट--मतडरो; इति--इस प्रकार; अविता अस्मि--संरक्षण प्रदान करूँगा; अहम्‌--मैं

जब कृष्ण ने लोगों की व्याकुलता सुनी और देखा कि उनके अपने लोग भी विश्वुब्ध हैं, तोएकमात्र सर्वश्रेष्ठ शरणदाता हँस पड़े और उनसे कहा, 'डरो मत, मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा।

'सर्वस्यान्तर्बहि:साक्षी कृत्यां माहे ध्वरीं विभुः ।

विज्ञाय तद्ठिषातार्थ पार्श्वस्थं चक्रमादिशत्‌ ॥

३८॥

सर्वस्य--सबों के; अन्त:ः-- भीतर; बहि:--तथा बाहर के; साक्षी --गवाह; कृत्याम्‌--निर्मित प्राणी को; माहा-ई श्ररीम्‌ --शिवजी के; विभु:--सर्वशक्तिमान भगवान्‌; विज्ञाय--पूरी तरह जानते हुए; तत्‌--उसको; विघात--हराने के; अर्थम्‌ू--हेतु;पार्शचन--अपने निकट; स्थम्‌--खड़े; चक्रम्‌-- अपने चक्र को; आदिशत्‌--आदेश दिया।

सबों के अन्त: और बाह्य साक्षी सर्वशक्तिमान भगवान्‌ समझ गये कि यह दैत्य शिवजी द्वारायज्ञ-अग्नि से उत्पन्न किया गया है।

इस असुर को पराजित करने के लिए कृष्ण ने अपनी बगलमें प्रतीक्षा कर रहे अपने सूदर्शन चक्र को रवाना कर दिया।

तत्सूर्यकोटिप्रतिमं सुदर्शनजाज्वल्यमानं प्रलयानलप्रभम्‌ ।

स्वतेजसा खं ककुभोथ रोदसीअक्र मुकुन्दास्त्र अथाग्निमार्दयत्‌ ॥

३९॥

तत्‌--उस; सूर्य--सूर्यों के; कोटि--करोड़ों; प्रतिमम्‌--सहश; सुदर्शनम्‌--सुदर्शन को; जाज्वल्यमानम्‌--अग्नि से प्रज्वलित;प्रलय--ब्रह्माण्ड के संहार की; अनल--अग्नि ( सहश ); प्रभम्‌--तेज; स्व--अपनी; तेजसा--गर्मी से; खम्‌--आकाश;ककुभः-दिशाएँ; अथ--तथा; रोदसी--स्वर्ग तथा पृथ्वी; चक्रमू--चक्र को; मुकुन्द--कृष्ण के; अस्त्रमू--हथियार; अथ--भी; अग्निमू--( सुद॒क्षिण द्वारा उत्पन्न ) अग्नि को; आर्दयत्‌--सताया।

भगवान्‌ मुकुन्द का वह सुदर्शन चक्र करोड़ों सूर्यों की तरह प्रज्वलित हो उठा।

उसका तेज ब्रह्माण्ड की प्रलयाग्नि सदश प्रज्वलित था और अपनी गर्मी से वह आकाश, सारी दिशाओं,स्वर्ग तथा पृथ्वी एवं उस अग्नि-तुल्य असुर को भी पीड़ा देने लगा।

कृत्यानलः प्रतिहतः स रथान्गपाणे-रस्त्रौजसा स नृप भग्नमुखो निवृत्त: ।

वाराणसी परिसमेत्य सुदक्षिणं तंसर्तिग्जनं समदहत्स्वकृतोभिचार:, ॥

४०॥

कृत्या--योग-बल से उत्पन्न; अनल:--अग्नि; प्रतिहत:--हताश; सः--वह; रथ-अड्गभ-पाणे: --सुदर्शन चक्र को धारण करनेवाले कृष्ण के; अस्त्र--हधियार की; ओजसा--शक्ति से; सः--वह; नृप--हे राजा; भग्न-मुख:--पीछे मुड़कर; निवृत्त:--विरत; वारानसीम्‌--वाराणसी में; परिसमेत्य--सभी दिशाओं में पहुँचकर; सुदक्षिणम्‌--सुदक्षिण के; तम्‌--उस; स--सहित;ऋत्विक्‌ू-जनम्‌--उसके पुरोहितों को; समदहत्‌--जला दिया; स्व--अपने आप ( सुदक्षिण ); कृत: --उत्पन्न; अभिचार: --हिंसाकरने के निमित्त।

हे राजन, भगवान्‌ कृष्ण के अस्त्र की शक्ति से विचलित, तंत्र से उत्पन्न वह अग्नि-तुल्यप्राणी अपना मुँह मोड़कर चला गया।

तब हिंसा के लिए उत्पन्न किया गया वह असुर वाराणसीलौट आया जहाँ उसने नगर को घेर लिया और सुदक्षिण तथा उसके पुरोहितों को जलाकर भस्मकर दिया यद्यपि सुदक्षिण ही उसका उत्पन्न करने वाला था।

अक्रं च विष्णोस्तदनुप्रविष्टवारानसीं साइसभालयापणाम्‌ ।

सगोपुरा्लककोष्ठसड्डू लां सकोशहस्त्यश्वरथान्नशालिनीम्‌ ॥

४१॥

अक्रमू--चक्र; च--तथा; विष्णो: -- भगवान्‌ विष्णु का; ततू--वह ( अग्नि से उत्पन्न असुर ); अनुप्रविष्टम्‌-- प्रवेश करके;वाराणसीम्‌--वाराणसी को; स--सहित; अट्ट--अटालिकाएँ; सभा--उसके सभाभवन; आलय--निवास; आपणामू--तथाबाजार; स--सहित; गोपुर--नगरद्वार; अद्डालक--बुर्जियों; कोष्ठ--तथा भण्डारों; सड्डु लाम्‌--पुंजित; स--सहित; कोश--खजाने; हस्ति--हाथियों; अश्व--घोड़ों; रथ--रथों; अन्न--तथा अन्नों के लिए; शालिनीम्‌--महलों ( गोदामों ) सहित

भगवान्‌ विष्णु का चक्र अग्नि तुल्य असुर का पीछा करते हुए वाराणसी के भीतर भी घुसाऔर फिर नगर को भस्म करने लगा, जिसमें नगर के सभाभवन तथा अट्टालिकाओं से युक्तआवासीय महल, सारे बाजार, नगरद्वार, बुर्जियाँ, भण्डार तथा खजाने और हथसाल, घुड़साल,रथसाल तथा अन्नों के गोदाम सम्मिलित थे।

दग्ध्वा वाराणसीं सर्वा विष्णोश्चक्रं सुदर्शनम्‌ ।

भूयः पार्श्रमुपातिष्ठ त्कृष्णस्याक्लिष्टकर्मण: ॥

४२॥

दग्ध्वा--जलाकर; वाराणसीम्‌--वाराणसी को; सर्वाम्‌--पूरी; विष्णो: --विष्णु का; चक्रम्‌--चक्र; सुदर्शनम्‌--सुदर्शन;भूय:--फिर से; पार्श्रमू--बगल में; उपातिष्ठत्‌--गया; कृष्णस्य--कृष्ण के; अक्लिष्ट--बिना किसी कष्ट या थकावट के;कर्मण:--जिसके कर्म |

सम्पूर्ण वाराणसी नगरी को जलाने के बाद भगवान्‌ विष्णु का सुदर्शन चक्र बिना प्रयास केकर्म करने वाले श्रीकृष्ण के पास लौट आया।

य एन श्रावयेन्मर्त्य उत्तम:शलोकविक्रमम्‌ ।

समाहितो वा श्रृणुयात्सर्वपापै: प्रमुच्यते ॥

४३॥

यः--जो; एनम्‌--इसको; श्रावयेत्‌--सुनाता है; मर्त्य:--मरणशील मनुष्य; उत्तम:-शएलोक--उत्तम एलोकों से प्रशंसित भगवान्‌कृष्ण की; विक्रमम्‌--वीरतापूर्ण लीला को; समाहितः--पूरे ध्यान से; वा--अथवा; श्रृणुयात्‌--सुनता है; सर्व--समस्त;पापैः--पापों से; प्रमुच्यते--छूट जाता है

जो भी मर्त्य प्राणी भगवान्‌ उत्तमश्लोक की इस वीरतापूर्ण लीला को सुनाता है या केवलइसे ध्यानपूर्वक सुनता है, वह सारे पापों से मुक्त हो जाएगा।

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