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अध्याय इकसठवाँ: भगवान बलराम ने रुक्मी का वध किया
10.61श्रीशुक उबाचएकेकशस्ताः कृष्णस्थ पुत्रान्दशदशाबआः।
अजीजनन्ननवमान्पितु: सर्वात्मसम्पदा ॥
१॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एक-एकश: --एक एक करके; ता: --वे; कृष्णस्य--कृष्ण के; पुत्रान्--पुत्रों को; दश-दश--हर एक के दस दस; अबला: --पत्नियों ने; अजीजनन्--जन्म दिया; अनवमानू---उत्तम; पितु:--उनकेपिता का; सर्व--सारा; आत्म--निजी; सम्पदा--ऐश्वर्य |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : भगवान् कृष्ण की हर पत्नी से दस दस पुत्र हुए जो अपने पितासे कम नहीं थे और जिनके पास अपने पिता का सारा निजी ऐश्वर्य था।
गृहादनपगं वीक्ष्य राजपुत्र्योच्युतं स्थितम् ।
प्रेष्ठ न््यमंसत स्व स्वं न तत्तत्त्वविदः स्त्रियः ॥
२॥
गृहात्--अपने महलों से; अनपगम्--कभी बाहर न जाते; वीक्ष्य--देखकर; राज-पुत्रयः--राजाओं की पुत्रियाँ; अच्युतम्--भगवान् कृष्ण को; स्थितम्ू-रहते हुए; प्रेष्ठम-- अत्यन्त प्रिय; न््यमंसत--उन्होंने विचार किया; स्वम् स्वम्--अपने अपने; न--नहीं; तत्--उसके विषय में; तत्त्त--सचाई; विद:ः--जानने वाली; स्त्रियः-स्त्रियाँ |
चूँकि इनमें से हर राजकुमारी यह देखती थीं कि भगवान् अच्युत कभी उसके महल से बाहरनहीं जाते अतएवं हर एक अपने को भगवान् की प्रिया समझती थी।
ये स्त्रियाँ उनके विषय मेंपूरी सच्चाई नहीं समझ पाई।
चार्वव्जकोशवदनायतबाहुनेत्र-सप्रेमहासरसवीक्षितवल्गुजल्पै: ।
सम्मोहिता भगवतो न मनो विजेतुंस्वैर्विभ्रमि: समशकन्वनिता विभूम्न: ॥
३॥
चारू--सुन्दर; अब्न--कमल के; कोश--कोश के समान; वदन--मुख से; आयत--विस्तृत; बाहु--अपनी बाहुओं से;नेत्र--तथा आँखों से; स-प्रेम--प्रेमपूर्ण; हास--हास्य के; रस--रस में; वीक्षित--चितवनों से; वल्गु--आकर्षक; जल्पै:--तथा अपनी बातों से; सम्मोहिता:--पूर्णतया मोहित; भगवत: -- भगवान् के; न--नहीं; मन: --मन के; विजेतुम्--जीतने केलिए; स्वै:-- अपने; विशभ्रमैः --प्रलोभनों से; समशकन्--समर्थ थीं; वनिता:--स्त्रियाँ; विभूम्न:--परम पूर्ण का
भगवान् की पत्नियाँ उनके कमल जैसे सुन्दर मुख, उनकी लम्बी बाँहों तथा बड़ी बड़ीआँखों, हास्य से पूर्ण उनकी प्रेममयी चितवनों तथा अपने साथ उनकी मनोहर बातों से पूरी तरहमोहित थीं।
किन्तु ये स्त्रियाँ अपने समस्त आकर्षण के होते हुए भी सर्वशक्तिमान भगवान् के मनको नहीं जीत पाईं।
स्मायावलोकलवदर्शितभावहारि-भ्रूमण्डलप्रहितसौरतमन्त्रशौण्डै: ।
पल्यस्तु शोडशसहस्त्रमनड्रबाणै-यस्येन्द्रियं विमथितुम्करणैर्न शेकुः ॥
४॥
स्माय--छिपी हँसी से; अवलोक--चितवन का; लव--रंच-भर भी; दर्शित-- प्रदर्शित किया; भाव-- भावों से; हारि--मोहक;भ्रू-भौंहों के; मण्डल--गोलाकृति से; प्रहित--भेजती थीं; सौरत--काम कला; मन्त्र--संदेशों का; शौण्डै:--निर्भीकता कीअभिव्यक्तियों से; पत्य:--पत्ियाँ; तु--लेकिन; षघोडश--सोलह; सहस्त्रमू--हजार; अनड्ग--कामदेव के; बाणैः--बाणों से;यस्य--जिसकी; इन्द्रियम्ू--इन्द्रियाँ; विमथितुम्--उद्वेलित करने के लिए; करणैः--तथा ( अन्य ) साधनों से; न शेकुः--असमर्थ थीं।
इन सोलह हजार रानियों की टेढ़ी भौंहें उनके गुप्त मनोभावों को लजीली हास्ययुक्त तिरछीचितवनों से व्यक्त करती थीं।
इस तरह उनकी भौंहें निडर होकर माधुर्य सन्देश भेजती थीं।
तो भीकामदेव के इन बाणों तथा अन्य साधनों से वे सब भगवान् कृष्ण की इन्द्रियों को उद्वेलित नहींबना सकीं।
इत्थं रमापतिमवाप्य पतिं स्त्रियस्ताब्रह्मादयोपि न विदु: पदवीं यदीयाम् ।
भेजुर्मुदाविरतमेधितयानुराग-हासावलोकनवसड्रमलालसाद्यम् ॥
५॥
इत्थम्--इस प्रकार से; रमा-पतिम्--लक्ष्मी के पति को; अवाप्य--प्राप्त करके; पतिम्--पति रूप में; स्त्रियः--स्त्रियाँ; ता:--वे; ब्रह्य-आदय:--ब्रह्मा तथा अन्य देवता; अपि-- भी; न विदु:--नहीं जानते; पदवीम्--प्राप्त करने के साधन; यदीयाम्--जिनको; भेजु:--भाग लिया; मुदा--हर्षपूर्वक; अविरतम्--निरन्तर; एधितया--वर्धित; अनुराग--प्रेमाकर्षण; हास--हँसी;अवलोक--चितवन; नव--नया; सड़्म--घनिष्ठ साथ की; लालस--उत्सुकता; आद्यम्ू--इत्यादि |
इस तरह इन स्त्रियों ने लक्ष्मीपति को अपने पति रूप में प्राप्त किया यद्यपि ब्रह्मा जैसे बड़ेबड़े देवता भी उन तक पहुँचने की विधि नहीं जानते।
प्रेम में निरन्तर वृद्धि के साथ वे उनके प्रतिअनुराग का अनुभव करतीं, उनसे हास्ययुक्त चितवनों का आदान-प्रदान करतीं, नित नवीनघनिष्ठता के साथ उनसे समागम की लालसा करती हुईं अन्यान्य अनेक विधियों से रमण करतीं।
प्रत्युदूगरमासनवराहणपादशौच-ताम्बूलविश्रमणवीजनगन्धमाल्यै: ॥
केशप्रसारशयनस्नपनोपहार्य :दासीशता अपि विभोर्विदधु: सम दास्यम् ॥
६॥
प्रत्युदूगम--पास जाकर; आसन--आसन प्रदान करके; वर--उच्च कोटि का; अ्हण--पूजा; पाद--उसके पाँव; शौच--मार्जन; ताम्बूल--पान ( की भेंट ); विश्रमण--( उनके पाँव दबाकर ) विश्राम करने में सहायता करते हुए; वीजन--पंखाझलना; गन्ध--सुगंधित वस्तुएँ ( भेंट करके ); माल्यैः--तथा फूल की मालाओं से; केश--उनके बाल; प्रसार--सँवार कर;शयन--बिछौने की व्यवस्था; स्नपन--स्नान कराकर; उपहार्यैं: --तथा भेंटें प्रदान करके; दासी--नौकरानियाँ; शता: --सैकड़ों; अपि--यद्यपि; विभो:--सर्वशक्तिमान प्रभु की; विदधु:-स्म--सम्पन्न किया; दास्यम्ू--सेवा |
यद्यपि भगवान् की रानियों में से हर एक के पास सैकड़ों दासियाँ थीं, फिर भी वेविनयपूर्वक उनके पास जाकर, उन्हें आसन देकर, उत्तम सामग्री से उनकी पूजा करके, उनकेचरणों का प्रक्षालन करके तथा दबाकर, उन्हें खाने के लिए पान देकर, उन्हें पंखा झलकर,सुगन्धित चन्दन का लेप करके, फूल की मालाओं से सजाकर, उनके केश सँवार कर, उनकाबिस्तर ठीक करके, उन्हें नहलाकर तथा उन्हें नाना प्रकार की भेंटें देकर स्वयं उनकी सेवा करतीथीं।
तासां या दशपुत्राणां कृष्णस्त्रीणां पुरोदिता: ।
अष्टौ महिष्यस्तत्पुत्रान्प्रद्युम्नादीन््गूणामि ते ॥
७॥
तासाम्--उनमें से; या:--जो; दश--दस; पुत्राणाम्--पुत्रों के; कृष्ण-स्त्रीणाम्--कृष्ण की स्त्रियों के; पुरा--पहले; उदिता: --उल्लिखित; अष्टौ--आठ; महिष्य:--पटरानियाँ; तत्--उनके; पुत्रान्ू--पुत्रों को; प्रद्यम्म-आदीनू--प्रद्युम्म आदि; गृणामि--मैंकहूँगा; ते--तुम्हारे लिए
भगवान् कृष्ण की पत्नियों में से हर एक के दस दस पुत्र थे।
उन पत्नियों में से आठपटरानियाँ थीं, इसका उल्लेख मैं पहले कर चुका हूँ।
अब मैं तुम्हें उन आठों रानियों के पुत्रों केनाम बतलाऊँगा जिनमें प्रद्मुम्न मुख्य थे।
चारुदेष्ण: सुदेष्णश्च चारुदेहश्न वीर्यवान् ।
सुचारुश्चारुगुप्तश्च भद्रचारुस्तथापर: ॥
८ ॥
चारुचन्द्रो विचारुश्च चारुश्च दशमो हरे: ।
प्रद्युम्मप्रमुखा जाता रुक्मिण्यां नावमा: पितु: ॥
९॥
चारुदेष्ण: सुदेष्ण: च--चारुदेष्ण तथा सुदेष्ण; चारुदेह:--चारुदेह; च--तथा; वीर्य-वान्ू--शक्तिशाली; सुचारु: चारुगुप्तःच--सुचारु तथा चारुगुप्त; भद्गचारु:-- भद्गचारु; तथा-- भी; अपर: --दूसरा; चारुचन्द्र: विचार: च--चारुचन्द्र तथा विचारु;चार:--चारु; च-- भी; दशमः--दसवाँ; हरेः-- भगवान् हरि द्वारा; प्रद्युम्न-प्रमुखा:-- प्रद्युम्न इत्यादि; जात:--उत्पन्न;रुक्मिण्याम्--रुक्मिणी के; न--नहीं; अवमा:--निकृष्ट, कम; पितु:--अपने पिता से
महारानी रुक्मिणी का प्रथम पुत्र प्रद्युम्न था।
उन्हीं के पुत्रों में चारुदेष्ण, सुदेष्ण, बलशालीचारुदेह, सुचारु, चारुगुप्त, भद्गरचारु, चारुचन्द्र, विचारु तथा दसवाँ पुत्र चारु थे।
भगवान् हरिके इन पुत्रों में से कोई भी अपने पिता से कम नहीं था।
भानुः सुभानुः स्वर्भानु: प्रभानुर्भानुमांस्तथा ।
चन्द्रभानुर्बृहद्धानुरतिभानुस्तथाष्टम: ॥
१०॥
श्रीभानु: प्रतिभानुश्न सत्यभामात्मजा दश ।
साम्बः सुमित्र: पुरुजिच्छतजिच्च सहस्त्रजित् ॥
११॥
विययश्नित्रकेतुश्च वसुमान्द्रविड: क्रतु: ।
जाम्बवत्या: सुता होते साम्बाद्या: पितृसम्मता: ॥
१२॥
भानुः सुभानुः स्वर्भानु:-- भानु, सुभानु तथा स्वर्भानु; प्रभान: भानुमान्--प्रभानु तथा भानुमान; तथा-- भी; चन्द्रभानुःबृहद्धानु:--चन्द्रभानु तथा बृहदभानु; अतिभानु:--अतिभानु; तथा-- भी; अष्टम:--आठवाँ; श्रीभानु:-- श्रीभानु; प्रतिभानु: --प्रतिभानु; च--तथा; सत्यभामा--सत्यभामा के; आत्मजा:--पुत्र; दश--दस; साम्ब: सुमित्र: पुरुजित् शतजित् च सहस्त्रजितू--साम्ब, सुमित्र, पुरुजित, शतजित तथा सहस्त्रजित; विजय: चित्रकेतु: च--विजय तथा चित्रकेतु; बसुमान् द्रविड: क्रतुः--वसुमान, द्रविड़ तथा क्रतु; जाम्बवत्या:--जाम्बवती के ; सुता:--पुत्र; हि--निस्सन्देह; एते--ये; साम्ब-आद्या: --साम्ब आदि;पितृ--उनके पिता के; सम्मता:--प्यारे |
सत्यभामा से दस पुत्र थे-भानु, सुभानु, स्वर्भानु, प्रभानु, भानुमान, चन्द्रभानु, बृहद्भानु,अतिभानु ( आठवाँ ), श्रीभानु तथा प्रतिभानु।
जाम्बवती के पुत्रों के नाम थे--साम्ब, सुमित्र,पुरुजित, सतजित, सहस्त्रजित, विजय, चित्रकेतु, वसुमान्, द्रविड़ तथा क्रतु।
साम्ब आदि ये दसोंअपने पिता के अत्यन्त लाड़ले थे।
वीरनन्द्रो श्रसेनश्व चित्रगुर्वेगवान्वृष: ।
आम: शह्डू वसु: श्रीमान्कुन्तिर्नाग्नजिते: सुता: ॥
१३॥
बीरः चन्द्र: अश्वसेन: च--वीर, चन्द्र तथा अश्वसेन; चित्रगु: वेगवान् वृष: -चित्रगु, वेगवान् तथा वृष; आम: शह्डलु : वसु:--आम, शंकु तथा बसु; श्री-मान्--ऐश्वर्यशाली; कुन्तिः--कुन्ति; नाग्नजिते:--नाग्नजिती के; सुता:--पुत्र |
नाग्नजिती के पुत्र थे वीर, चन्द्र, अश्वसेन, चित्रगु, वेगवानू, वृष, आम, शंकु, वसु तथाऐश्वर्यशाली कुन्ति।
श्रुतः कविर्वृषो वीर: सुबाहुर्भद्र एकल: ।
शान्तिर्दर्श: पूर्णमास: कालिन्द्या: सोमकोवर: ॥
१४॥
श्रुतः कवि: वृष: वीर: -- श्रुत, कवि, वृष तथा वीर; सुबाहु:--सुबाहु; भद्ग: -- भद्र; एकल: --इनमें से एक; शान्ति: दर्शःपूर्णमास:--शान्ति, दर्श तथा पूर्णमास; कालिन्द्या:--कालिन्दी के; सोमक:--सोमक; अवर:--सबसे छोटाश्रुत, कवि, वृष, वीर, सुबाहु, भद्गर, शान्ति, दर्श तथा पूर्णमास कालिन्दी के पुत्र थे।
उनकासबसे छोटा पुत्र सोमक था।
प्रघोषो गात्रवान्सिंहो बल: प्रबल ऊर्धग: ।
मादर्याः पुत्रा महाशक्ति: सह ओजोपराजित: ॥
१५॥
प्रघोष: गात्रवान् सिंह:--प्रघोष, गात्रवान तथा सिंह; बल: प्रबल: ऊर्धग:--बल, प्रबल तथा ऊर्धग; माद्र्या: --माद्रा के;पुत्रा:--पुत्र; महाशक्ति: सह: ओज: अपराजित:--महाशक्ति, सह, ओज तथा अपराजित।
माद्रा के पुत्र थे प्रघोष, गात्रवान, सिंह, बल, प्रबल, ऊर्धग, महाशक्ति, सह, ओज तथाअपराजित।
वृको हर्षोउनिलो गृश्नो वर्धनोन्नाद एबच ।
महांसः पावनो वह्िर्मित्रविन्दात्मजा: क्षुधि: ॥
१६॥
वृकः हर्ष: अनिल: गृश्च:--वृक, हर्ष, अनिल तथा गृश्ष; वर्धन-उन्नाद:ः --वर्धन तथा उन्नाद; एव च-- भी; महांसः पावन: वहिः--महांस, पावन तथा वह्नि; मित्रविन्दा--मित्रविन्दा के; आत्मजा: --पुत्र; क्षुधि: --क्षुधि |
मित्रविन्दा के पुत्रों के नाम थे वृक, हर्ष, अनिल, गृश्न, वर्धन, उन्नाद, महांस, पावन, वह्नितथा क्षुधि।
सड्ग्रामजिद्ठहत्सेन: शूर: प्रहरणोरिजित् ।
जयः सुभद्रो भद्राया वाम आयुश्च सत्यकः ॥
१७॥
सड़्य्रामजित् बृहत्सेन:--संग्रामजित तथा बृहत्सेन; शूरः प्रहरण: अरिजित्--शूर, प्रहरण तथा अरिजित; जय: सुभद्र:--जय तथासुभद्र; भद्राया: -- भद्रा ( शैब्या ) के; वाम: आयुश् च सत्यक:--वाम, आयुर् तथा सत्यक |
भद्गा के पुत्र थे संग्रामजित, बृहत्सेन, शूर, प्रहरण, अरिजित, जय, सुभद्र, वाम, आयुर् तथासत्यक।
दीप्तिमांस्ताप्रतप्ताद्या रोहिण्यास्तनया हरे: ।
प्रद्यम्नाच्चानिरुद्धो भूद्रुक्मवत्यां महाबल: ।
पुत्रयां तु रुक्मिणो राजन्नाम्ना भोजकटे पुरे ॥
१८॥
दीप्तिमान् ताम्रतप्त-आद्या: --दीप्तिमान, ताम्रतप्त तथा अन्य; रोहिण्या:--रोहिणी ( शेष १६ १०० रानियों में से प्रमुख );तनया: --पुत्र; हरेः-- भगवान् कृष्ण के; प्रद्युम्नातू--प्रद्युम्न से; च--तथा; अनिरुद्ध:--अनिरुद्ध; अभूत्--उत्पन्न हुआ;रुक््मवत्याम्-रुक््मवती से; महा-बलः--अत्यन्त बलवान; पुत्रयाम्-पुत्री से; तु--निस्सन्देह; रुक्मिण:--रुक्मी की; राजनू--हे राजा ( परीक्षित ); नाम्ना--नामक; भोजकटे पुरे-- भोजकट( रुक्मी के राज्य में ) नगर में |
दीप्तिमान, ताम्रतप्त इत्यादि भगवान् कृष्ण द्वारा रोहिणी से उत्पन्न किये गये पुत्र थे।
भगवान् कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न ने रुक्मी की पुत्री रुक्मवती के गर्भ से शक्तिशाली अनिरुद्ध को जन्मदिया।
हे राजन, यह सब तब हुआ जब वे भोजकटक नगर में रह रहे थे।
एतेषां पुत्रपौत्रा श्र बभूवु: कोटिशो नृूप ।
मातरः कृष्णजातीनां सहस्त्राणि च घोडश ॥
१९॥
एतेषाम्--इनके; पुत्र--पुत्र; पौत्रा:--तथा पौत्र; च--तथा; बभूवु:--उत्पन्न हुए; कोटिश:--करोड़ों; नूप--हे राजा; मातर:ः --माताओं से; कृष्ण-जातीनाम्-- भगवान् कृष्ण के वंशजों के; सहस्त्राणि--हजारों; च--तथा; षोडश--सोलह।
हे राजन, कृष्ण के पुत्रों के पुत्रों तथा पौत्रों की संख्या करोड़ों में थी।
सोलह हजार माताओंने इस वंश को आगे बढ़ाया।
श्रीराजोवाचकथ॑ रुक्म्यरीपुत्राय प्रादाहुहितरं युधि ।
कृष्णेन परिभूतस्तं हन्तुं रन्श्न॑ प्रतीक्षते ।
एतदाख्याहि मे विद्वन्द्रिषोर्वैवाहिकं मिथ: ॥
२०॥
श्री-राजा उवाच--राजा ने कहा; कथम्--कैसे; रुक्मी--रुक्मी ने; अरि--अपने शत्रु के ; पुत्रनाय--पुत्र को; प्रादात्--दिया;दुहितरम्--अपनी पुत्री को; युधि--युद्ध में; कृष्णेन--कृष्ण द्वारा; परिभूतः--पराजित; तम्--उसको ( कृष्ण को ); हन्तुमू--मारने के लिए; रन्ध्रमू--सुअवसर की; प्रतीक्षते--प्रतीक्षा कर रहा था; एतत्--यह; आख्याहि--कृपया बतलाइये; मे--मुझको;विद्वनू-हे विद्वान; द्विषो:--दो शत्रुओं के; वैवाहिकम्--विवाह का प्रबंध; मिथ:--दोनों के बीच |
राजा परीक्षित ने कहा : रुक््मी ने कैसे अपने शत्रु के पुत्र को अपनी पुत्री प्रदान की ? रुक्मीतो युद्ध में भगवान् कृष्ण द्वारा पराजित किया गया था और उन्हें मार डालने की ताक में था।
हेविद्वान, कृपा करके मुझे बतलाइये कि ये दोनों शत्रु-पक्ष किस तरह विवाह के माध्यम से जुड़सके।
अनागतमतीतं च वर्तमानमतीन्द्रियम् ।
विप्रकृष्टे व्यवहितं सम्यक्पश्यन्ति योगिन: ॥
२१॥
अनागतम्--अभी घटित नहीं हुआ; अतीतम्-- भूतकाल; च-- भी; वर्तमानम्ू--वर्तमान; अतीन्द्रियमू--इन्द्रियों की सीमा से परे;विप्रकृष्टम्--सुदूर; व्यवहितम्-- अवरुद्ध; सम्यक्-- भली भाँति; पश्यन्ति-- देखते हैं; योगिन:--योगीजन
जो अभी घटित नहीं हुआ तथा भूतकाल या वर्तमान की बातें जो इन्द्रियों के परेसुदूर याभौतिक अवरोधों से अवरुद्ध हैं, उन्हें योगीजन भलीभाँति देख सकते हैं।
श्रीशुक उबाचवबृतः स्वयंवरे साक्षादनण्गोण्गयुतस्तया ।
राज्ञः समेतान्निर्जित्य जहारैकरथो युधि ॥
२२॥
श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; वृतः--चुना हुआ; स्वयं-वरे--उसके स्वयंवर उत्सव में; साक्षात्--प्रकट;अनडु:--कामदेव; अड़-यतः--अवतार; तया--उसके द्वारा; राज्ञ:--राजाओं को; समेतान्ू--एकत्र; निर्जित्य--हराकर;जहार--ले गया; एक-रथ: --केवल एक रथ का स्वामी; युधि--युद्ध में |
श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : अपने स्वयंवर उत्सव में रुक्मावती ने स्वयं ही प्रद्युम्म कोचुना, जो कि साक्षात् कामदेव थे।
तब एक ही रथ पर अकेले लड़ते हुए प्रद्युम्न ने एकत्र राजाओंको युद्ध में पपाजित किया और वे उसे हर ले गये।
यद्यप्यनुस्मरन्वैरं रुक्मी कृष्णावमानितः ।
व्यतरद्धागिनेयाय सुतां कुर्वनस्वसु: प्रियम् ॥
२३॥
यदि अपि--यद्यपि; अनुस्मरन्ू--सदैव स्मरण करते हुए; वैरम्-- अपनी शत्रुता; रुक्मी--रुक्मी; कृष्ण--कृष्ण द्वारा;अवमानित:--अपमानित; व्यतरत्--स्वीकृति दे दी; भागिनेयाय--अपनी बहन के बेटे को; सुताम्--अपनी पुत्री; कुर्वनू--करते हुए; स्वसुः--अपनी बहन का; प्रियम्-प्रसन्न करना |
यद्यपि रुक्मी कृष्ण के प्रति अपनी शत्रुता को सदैव स्मरण रखे रहा क्योंकि उन्होंने उसकाअपमानित किया था किन्तु अपनी बहन को प्रसन्न करने के लिए उसने अपनी पुत्री का विवाहअपने भाझे के साथ होने की स्वीकृति प्रदान कर दी।
रुक्मिण्यास्तनयां राजन्कृतवर्मसुतो बली ।
उपयेमे विशालाक्षीं कन्यां चारुमतीं किल ॥
२४॥
रुक्मिण्या:--रुक्मिणी की; तनयाम्--पुत्री को; राजन्--हे राजन; कृतवर्म-सुतः--कृतवर्मा के पुत्र ने; बली--बली नामक;उपयेमे--विवाह लिया; विशाल--बड़े बड़े; अक्षीम्--नेत्रों वाली; कन्याम्ू--युवती को; चारुमतीम्ू--चारुमती नामक;किल--निस्सन्देह |
हे राजन, कृतवर्मा के पुत्र बली ने रुक्मिणी की विशाल नेत्रों वाली तरुण कन्या चारुमतीसे विवाह कर लिया।
दौहित्रायानिरुद्धाय पौत्रीं रुक्म्याददाद्धरेः ।
रोचनां बद्धवैरोपि स्वसु: प्रियचिकीर्षया ।
जानन्नधर्म तद्यौनं स्नेहपाशानुबन्धन: ॥
२५॥
दौहित्राय--अपनी पुत्री के पुत्र; अनिरुद्धाय--अनिरुद्ध के लिए; पौत्रीम्-- अपनी पौत्री को; रुक्मी--रुक्मी ने; आददातू--देदिया; हरेः-- भगवान् कृष्ण के; रोचनामू--रोचना नामक; बद्ध--बँधा हुआ; वैर:--शत्रुता में; अपि--यद्यपि; स्वसु:--अपनीबहन; प्रिय-चिकीर्षया--प्रसन्न करने की इच्छा से; जानन्--जानते हुए; अधर्मम्--अधर्म को; तत्ू--वह; यौनमू--विवाह;स्नेह--स्नेह की; पाश--रस्सियों से; अनुबन्धन: --जिसका बन्धन।
रुक्मी ने अपनी पौत्री रोचना को अपनी कन्या के पुत्र अनिरुद्ध को दे दिया यद्यपि भगवान्हरि से उसकी घोर शत्रुता थी।
इस विवाह को अधार्मिक मानते हुए भी रुकक््मी स्नेह-बन्धन सेबँधकर अपनी बहन को प्रसन्न करने का इच्छुक था।
तस्मिन्नभ्युदये राजन्रुक्मिणी रामकेशवौ ।
पुरं भोजकर्ट जग्मु: साम्बप्रद्यम्ककादय: ॥
२६॥
तस्मिनू--उस; अभ्युदये--हर्ष की घड़ी में; राजनू--हे राजन्; रुक्मिणी--रुक्मिणी; राम-केशवौ--बलराम तथा कृष्ण;पुरम--नगरी में; भोजकटम्ू--भोजकट; जग्मु;--गये; साम्ब-प्रद्युम्कक-आदय:--साम्ब, प्रद्यम्म तथा अन्य
हे राजा, उस विवाह के उल्लासपूर्ण अवसर पर महारानी रुक्मिणी, बलराम, कृष्ण तथाकृष्ण के अनेक पुत्र, जिनमें साम्ब तथा प्रद्यम्न मुख्य थे, भोजकट नगर गये।
तस्मिन्रिवृत्त उद्बाहे कालिड्डप्रमुखा नूपा: ।
हप्तास्ते रुक्मिणं प्रोचुर्बलमशक्षेविनिर्जय ॥
२७॥
अनक्षज्ञो हायं राजन्नपि तद्व्यसनं महत् ।
इत्युक्तो बलमाहूय तेनाक्षेरूक्म्यदीव्यत ॥
२८ ॥
तस्मिन्ू--उसके ; निवृत्ते--समाप्त हो जाने पर; उद्बाहे --विवाहोत्सव में; कालिड्र-प्रमुखा:--कालिंगराज इत्यादि; नृपा:--राजा;हप्ता:--घमंडी; ते--वे; रुक्मिणम्--रुक्मी से; प्रोचु:--बोले; बलम्ू--बलराम को; अक्षे:--चौसर से; विनिर्जय--जीत लो;अनक्ष-ज्ञ:--चौसर खेलने में पटु नहीं; हि--निस्सन्देह; अयमू--वह; राजन्--हे राजा; अपि--यद्यपि; तत्--उससे; व्यसनम्--उसके व्यसन को; महत्--महान्; इति--इस प्रकार; उक्त:--कहा गया; बलमू--बलराम को; आहूय--बुलाकर; तेन--उससे;अक्षैः--चौसर से; रुक्मी --रुक्मी; अदीव्यत--खेलने लगा।
विवाह हो चुकने के बाद कालिंगराज इत्यादि दम्भी राजाओं की टोली ने रुक्मी से कहा,'तुम्हें चाहिए कि बलराम को चौसर में हरा दो।
हे राजन, वे चौसर में पटु नहीं हैं फिर भी उन्हेंइसका व्यसन है।
' इस तरह सलाह दिये जाने पर रुक््मी ने बलराम को ललकारा और उनकेसाथ चौसर की बाजी खेलने लगा।
शतं सहस्त्रमयुतं रामस्तत्राददे पणम् ।
तं तु रुक्म्यजयत्तत्र कालिडु: प्राहसट्ठलम् ।
दन्तान्सन्दर्शयच्रुच्चैर्नामृष्यत्तद्धलायुध: ॥
२९॥
शतम्--एक सौ; सहस्त्रमू--एक हजार; अयतम्--दस हजार; राम: --बलराम; तत्र-- उस ( खेल ) में; आददे--स्वीकार किया;'पणम्--दाँव को; तमू--उस; तु--लेकिन; रुक्मी--रुक्मी; अजयत्--जीत गया; तत्र--तत्पश्चात; कालिड्र:--कालिंग काराजा; प्राहइसत्--जोर से हँस पड़ा; बलमू--बलराम पर; दन्तान्--अपने दाँत; सन्दर्शयन्--दिखाते हुए, निपोरते हुए; उच्चै:--खुलकर; न अमृष्यत्-- क्षमा नहीं किया; तत्ू--यह; हल-आयुध: --हल धारण करने वाले, बलराम ने।
उस स्पर्धा में सर्वप्रथम बलराम ने एक सौ सिक्कों की बाजी स्वीकार की, फिर एक हजारकी और तब दस हजार की।
रुक््मी ने इस पहली पारी को जीत लिया तो कालिंगराज अपने सारेदाँत निपोर कर बलराम पर ठहाका मारकर हँसा।
बलराम इसे सहन नहीं कर पाये।
ततो लक्षं रुक्म्यगृह्लादग्लहं तत्राजयद्वल: ।
जितवानहमित्याह रुक्मी कैतवमाथितः ॥
३०॥
ततः--तब; लक्षम्--एक लाख; रुक्मी--रुक्मी ने; अगृह्वात्--स्वीकार किया; ग्लहम्--बाजी; तत्र--उसमें; अजयत्--जीता;बलः--बलराम; जितवानू--जीत गया हूँ; अहम्--मैं; इति--इस प्रकार; आह--कहा; रुक्मी--रुक्मी ने; कैतवम्--छलावेमें; आअ्रित:--आश्रित |
इसके बाद रुक्मी ने एक लाख सिक्कों की बाजी लगाई जिसे बलराम ने जीत लिया।
किन्तुरुक््मी ने यह घोषित करते हुए धोका देना चाहा कि ' मैं विजेता हूँ।
'मन्युना क्षुभितः श्रीमान्समुद्र इव पर्वणि ।
जात्यारुणाक्षोतिरुषा न्यर्बुदं ग्लगमाददे ॥
३१॥
मन्युना--क्रोध से; क्षुभित:--श्षुब्ध; श्री-मान्--सौन्दर्य से युक्त या सुन्दरी लक्ष्मी से युक्त; समुद्र: --समुद्र; इब--सहश;पर्वणि--पूर्णमासी के दिन; जात्या--प्रकृति द्वारा; अरुण--लाल-लाल; अक्ष:--नेत्रों वाली; अति--अत्यधिक; रुषा--क्रोधसे; न्यर्बुदमू-- १० करोड़; ग्लहम्ू--दाँव या बाजी; आददे--लगाई
रूपवान बलराम ने जिनके लाल लाल नेत्र क्रोध से और अधिक लाल हो रहे थे, पूर्णमासीके दिन उफनते समुद्र की भाँति क्रुद्ध होकर दस करोड़ मुहरों की बाजी लगाई।
तं चापि जितवात्रामो धर्मेण छलमाश्रित: ।
रुक्मी जितं मयात्रेमे वदन्तु प्राशिनिका इति ॥
३२॥
तम्--उसको; च अपि-- भी; जितवान्--जीत लिया; राम:--बलराम ने; धर्मेण--न्यायपूर्वक; छलम्--छल का; आश्रित: --आश्रय लेकर; रुक्मी--रुक्मी; जितम्--जीत गया; मया-- मुझसे; अत्र--इस बार; इमे--ये; वदन्तु--कह दें; प्राश्निका: --गवाह; इति--इस प्रकार।
इस बाजी को भी बलराम ने स्पष्टतः जीत लिया किन्तु रुक्मी ने फिर से छल करके यहघोषित किया, 'मैं जीता हूँ।
यहाँ उपस्थित ये गवाह कहें जो कुछ उन्होंने देखा है।
'तदाब्रवीन्नभोवाणी बलेनैव जितो ग्लह: ।
धर्मतो वचनेनेव रुक्मी वदति वै मृषा ॥
३३॥
तदा--तब; अब्रवीत्--कहा; नभ:--आकाश में; वाणी--शब्द; बलेन--बलराम द्वारा; एब--निस्सन्देह; जित:--जीती गई;ग्लहः--बाजी; धर्मत:--न्यायपूर्वक; वचनेन--शब्दों से; एबव--निश्चय ही; रुक्मी--रुक्मी; वदति--कहता है; वै--निस्सन्देह;मृषा--झूठ
तभी आकाशवाणी हुई 'इस बाजी को बलराम ने न्यायपूर्वक जीता है।
रुक्मी निश्चित रूपसे झूठ बोल रहा है।
'तामनाहत्य बैदर्भो दुष्टराजन्यचोदितः ।
स्डूर्षणं परिहसन्ब॒भाषे कालचोदितः ॥
३४॥
तामू--उस ( वाणी ) को; अनाहत्य--अनादर करके; बैदर्भ:--विदर्भ का राजकुमार, रुक््मी; दुष्ट--दुष्ट; राजन्य--राजाओंद्वारा; चोदित:--प्रेरित, उभाड़ा गया; सड्डर्षणम्--बलराम की; परिहसन्--हँसी उड़ाते हुए; बभाषे--बोला; काल--समय केबल से; चोदितः--प्रेरितदुष्ट राजाओं द्वारा उभाड़े जाने से रुक्मी ने इस दैवी वाणी की उपेक्षा कर दी।
वस्तुतः साक्षात्भाग्य रुक््मी को प्रेरित कर रहा था अत: उसने बलराम की इस तरह हँसी उड़ाई।
नैवाक्षकोविदा यूयं गोपाला वनगोचरा: ।
अक्षै्दीव्यन्ति राजानो बाणैश्व न भवाह॒शा: ॥
३५॥
न--नहीं; एव--निस्सन्देह; अक्ष--चौसर खेलने में; कोविदा:--दक्ष; यूयम्ू--तुम; गोपाला:--ग्वाले; वबन--जंगल में;गोचरा:--गाय चराते हुए; अक्षैः--चौसर से; दीव्यन्ति--खेलते हैं; राजान:--राजा लोग; बाणैः --बाणों से; च--तथा; न--नहीं; भवाह॒शा:--आप जैसे ।
रुक््मी ने कहा : तुम ग्वाले तो जंगलों में घूमते रहते हो चौसर के बारे में कुछ भी नहींजानते।
चौसर खेलना और बाण चलाना तो एकमात्र राजाओं के लिए हैं, तुम जैसों के लिएनहीं।
रुक्मिणैवमधिक्षिप्तो राजभिश्चोपहासितः ।
क्रुद्धः परिधमुद्यम्य जघ्ने त॑ नृम्णसंसदि ॥
३६॥
रुक्मिणा--रुक्मी द्वारा; एवम्--इस प्रकार; अधिक्षिप्त:--अपमानित; राजभि: --राजाओं द्वारा; च--तथा; उपहासित: --मजाक उड़ाया गया; क्रुद्ध:--क्रुदध; परिघम्--अपनी गदा को; उद्यम्य--उठाकर; जघ्ने--मार डाला; तम्--उसको; नृम्ण-संसदि--उस शुभ सभा में।
इस प्रकार रुक््मी द्वारा अपमानित करने तथा राजाओं द्वारा उपहास किये जाने पर बलराम का क्रोध भड़क उठा।
उन्होंने शुभ विवाह की सभा में ही अपनी गदा उठाई और रुक््मी को मारडाला।
कलिडूराजं तरसा गृहीत्वा दशमे पदे ।
दनन््तानपातयत्क्रुद्धो योहसद्विवृतैद्धिजे: ॥
३७॥
कलिड्ु-राजम्--कलिंग के राजन् को; तरसा--तेजी से; गृहीत्वा--पकड़ कर; दशमे--उसके दसवें; पदे--पग ( भागते हुए )पर; दन्तान्ू--उसके दाँतों को; अपातयत्--तोड़ डाला; क्रुद्ध:-क्रुद्ध; चः--जो; अहसत्--हँसा था; विवृतैः--खुले हुए;द्विजैः -दाँतों से
कलिंग के राजन् ने, जो बलराम पर हँसा था और जिसने अपने दाँत निपोरे थे, भागने काप्रयास किया किन्तु क्रुद्ध बलराम ने तेजी से उसे दसवें कदम में ही पकड़ लिया और उसके सारेदाँत तोड़ डाले।
अन्ये निर्भिन्नबाहूरुशिरसो रुधिरोक्षिता: ।
राजानो दुद्रवर्भीता बलेन पड्लार्दिता: ॥
३८॥
अन्ये--अन्य; निर्भिन्न--टूटे; बाहु-- भुजाएँ; ऊरु-- जाँघें; शिरस:--तथा सिरों वाले; रुधिर--रक्त से; उक्षिता: --सने;राजान:--राजागण; दुद्गुवु:ः-- भागे; भीता: -- डरे हुए; बलेन--बलराम द्वारा; परिघ--अपनी गदा से; अर्दिता:--चोट खाकर।
बलराम की गदा से चोट खाकर अन्य राजा भय के मारे भाग खड़े हुए।
उनकी बाहें, जाँघेंतथा सिर टूटे थे और उनके शरीर रक्त से लथपथ थे।
निहते रुक्मिणि एयाले नाब्रवीत्साध्वसाधु वा ।
रक्मिणीबलयो राजन्स्नेहभड़भयाद्धरि: ॥
३९॥
निहते--मारे जाने पर; रुक्मिणि--रुक्मी के; श्याले--उसके साले; न अब्रवीत्ू--नहीं कहा; साधु--अच्छा; असाधु--बुरा;वा--अथवा; रुक्मिणी-बलयो: --रुक्मिणी तथा बलराम के; राजन्--हे राजा; स्नेह--स्नेह; भड्--दूटने के; भयात्-- भय से;हरिः-- भगवान् कृष्ण ने |
हे राजनू, जब भगवान् कृष्ण का साला मार डाला गया तो उन्होंने न तो इसे सराहा न हीविरोध प्रकट किया।
क्योंकि उन्हें भय था कि रुक्मिणी या बलराम से स्नेह-बन्धन बिगड़ सकतेहैं।
ततोनिरुद्धं सह सूर्यया वरंरथं समारोप्य ययु: कुशस्थलीम् ।
रामादयो भोजकटाहशाा:सिद्धाखिलार्था मधुसूदना श्रया: ॥
४०॥
ततः--तब; अनिरुद्धम्--अनिरुद्ध को; सह--साथ; सूर्यया--उसकी पत्नी के; वरम्--दूल्हा; रथम्--रथ पर; समारोप्य--बैठाकर; ययु:--वे चले गये; कुशस्थलीम्--कुशस्थली ( द्वारका ); राम-आदय:ः--बलराम इत्यादि; भोजकटात्ू-- भोजकटसे; दशाहा:--दशाईवंशी; सिद्ध--पूर्ण;।
अखिल--समस्त; अर्था:--कार्य; मधुसूदन-- भगवान् कृष्ण के; आश्रया: --शरणागत।
तब बलराम इत्यादि दशाहों ने अनिरुद्ध तथा उसकी पत्नी को एक सुन्दर रथ में बैठा लियाऔर भोजकट से द्वारका के लिए प्रस्थान कर गये।
भगवान् मधुसूदन की शरण ग्रहण करने सेउनके सारे कार्य पूर्ण हो गये।
