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अध्याय अट्ठावन: कृष्ण ने पाँच राजकुमारियों से विवाह किया
10.58श्रीशुक उवाचएकदा पाण्डवान्द्रष्ट प्रतीतान्पुरुषोत्तम: ।
इन्द्रप्रस्थं गत: श्रुईमान्युयुधानादिभिर्वृतः ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एकदा--एक बार; पाण्डवान्--पाण्डु-पुत्रों को; द्रष्टम्--देखने के लिए;प्रतीतानू--दृश्य; पुरुष-उत्तम:--भगवान्; इन्द्रप्रस्थम्--इन्द्रप्रस्थ, पाण्डवों की राजधानी; गत:--गये; श्री-मान्--समस्त ऐश्वर्यके स्वामी; युयुधान-आदिभिर्--युयुधान ( सात्यकि ) तथा अन्यों से; वृत:--घिर कर।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : एक बार परम ऐश्वर्यवान भगवान् पाण्डवों को देखने के लिएइन्द्रप्रस्थ गये जो पुनः जनता के बीच प्रकट हो चुके थे।
भगवान् के साथ युयुधान तथा अन्यसंगी थे।
इृष्ठा तमागतं पार्था मुकुन्दमखिले श्वरम् ।
उत्तस्थुर्युगपद्दीरा: प्राणा मुख्यमिवागतम् ॥
२॥
इष्ठा--देखकर; तमू--उस; आगतम्--आया हुआ; पार्था:--पृथा ( कुन्ती ) के पुत्र; मुकुन्दम्ू--कृष्ण को; अखिल--हर वस्तुके; ईश्वरम्--स्वामी; उत्तस्थु:--उठ खड़े हुए; युगपत्--एकसाथ; वीर: --वीरगण; प्राणा: --इन्द्रियाँ; मुख्यम्--मुख्य, प्राणको; इब--मानो; आगतम्--वापस आ गया।
जब पाण्डवों ने देखा कि भगवान् मुकुन्द आए हैं, तो पृथा के वे वीर पुत्र एकसाथ उसीतरह उठ खड़े हुए जिस तरह इन्द्रियाँ प्राण के वापस आने पर सचेत हो उठती हैं।
परिष्वज्याच्युतं वीरा अड्डसड्रहतैनसः ।
सानुरागस्मितं वक्त्र॑ वीक्ष्य तस्य मु्दं ययु; ॥
३॥
परिष्वज्य--आलिंगन करके; अच्युतम्--कृष्ण को; बीरा: --उन वीरों ने; अड़--उनके शरीर के; सड्ग--स्पर्श से; हत--विनष्ट;एनसः--उनके सारे पापकर्म; स-अनुराग--स्नेहिल; स्मितम्--हँसी के साथ; वक्त्रमू--मुखमंडल को; वीक्ष्य--देखकर;तस्य--उसका; मुदम्ू--हर्ष; ययु:--अनुभव किया।
इन वीरों ने भगवान् अच्युत का आलिंगन किया और उनके शरीर के स्पर्श से उन सबों केपाप दूर हो गये।
उनके स्नेहिल, हँसी से युक्त मुखमण्डल को देख कर वे सब हर्ष से अभिभूत होगये।
युधिष्ठिरस्थ भीमस्य कृत्वा पादाभिवन्दनम् ।
फाल्गुनं परिरभ्याथ यमाभ्यां चाभिवन्दितः ॥
४॥
युधिष्ठटिरस्थ भीमस्य--युधिष्ठिर तथा भीम के; कृत्वा--करके ; पाद--पाँवों का; अभिवन्दनम्--नमस्कार; फाल्गुनम्--अर्जुनको; परिरभ्य--जोर से आलिंगन करके; अथ--तब; यमाभ्याम्--जुड़वा भाइयों, नकुल तथा सहदेव द्वारा; च--तथा;अभिवन्दित:--सादर सत्कार किये जाकर।
युधिष्ठटिर तथा भीम के चरणों पर सादर नमस्कार करने तथा अर्जुन का प्रगाढ़ आलिंगनकरने के बाद उन्होंने नकुल तथा सहदेव जुड़वाँ भाइयों का नमस्कार स्वीकार किया।
'परमासन आसीन कृष्णा कृष्णमनिन्दिता ।
नवोढा ब्रीडिता किश्ञिच्छनैरेत्याभ्यवन्दत ॥
५॥
'परम--उच्च; आसने--आसन पर; आसीनमू--बैठे हुए; कृष्णा--द्रौपदी ने; कृष्णम्--कृष्ण को; अनिन्दिता--दोषरहित;नव--हाल ही की; ऊढा--विवाहिता; ब्रीडिता--लजीली; किश्जितू--कुछ कुछ; शनै: -- धीरे धीरे; एत्थ--पास आकर;अभ्यवन्दत--नमस्कार किया।
पाण्डवों की नवविवाहिता पत्नी, जो कि दोषरहित थी, धीरे धीरे तथा कुछ कुछ लजाते हुएभगवान् कृष्ण के पास आई, जो उस समय उच्च आसन पर बैठे थे और उन्हें नमस्कार किया।
तथैव सात्यकिः पार्थे: पूजितश्चाभिवन्दितः ।
निषसादासनेन्ये च पूजिता: पर्युपासत ॥
६॥
तथा एव--इसी तरह; सात्यकि:--सात्यकि; पार्थ: --पृथा के पुत्रों द्वारा; पूजित:--पूजित; च--तथा; अभिवन्दित:--स्वागतकिया गया; निषसाद--बैठ गया; आसने-- आसन पर; अन्ये--अन्य लोग; च--तथा; पूजिता:--पूजित; पर्युपासत--चारोंओर बैठ गये।
सात्यकि ने भी पाण्डवों से पूजा तथा स्वागत प्राप्त करके सम्मानजनक आसन ग्रहण कियाऔर भगवान् के अन्य संगी भी उचित सम्मान पाकर विविध स्थानों पर बैठ गये।
पृथाम्समागत्य कृताभिवादन-स्तयातिहार्दाद्रहशाभिरम्भितः ।
आपृष्टवांस्तां कुशलं सहस्नुषांपितृष्वसारम्परिपृष्टबान्धवः ॥
७॥
पृथाम्--महारानी कुन्ती तक; समागत्य--जाकर; कृत--करके; अभिवादन:--अपना नमस्कार; तया--उनके द्वारा; अति--अत्यन्त; हार्द--स्नेहपूर्वक; अर्द्र--नम; दशा--जिनकी आँखें; अभिरम्भित:--आलिंगन किया; आपृष्टवान् -- उन्होंने पूछा;तामू--उनसे; कुशलम्--उनकी कुशलता के बारे में; सह--साथ; स्नुषाम्--अपनी पुत्रवधू द्रौपदी के साथ; पितृ-- अपने पितावसुदेव की; स्वसारम्--बहिन; परिपृष्ट--विस्तार से पूछा; बान्धव:--उनके सम्बन्धियों के ( द्वारका में रह रहे ) बारे में ॥
तब भगवान् अपनी बुआ महारानी कुन्ती को देखने गये।
वे उनके समक्ष झुके और उन्होंनेउनका आलिंगन किया, तो अति स्नेह से उनकी आँखें नम हो गईं।
भगवान् कृष्ण ने उनसे तथाउनकी पुत्रवधू द्रौपदी से उनकी कुशलता पूछी और उन्होंने भगवान् से उनके सम्बन्धियों ( द्वारकाके ) के विषय में पूछा।
तमाह प्रेमवैक्लव्यरुद्धकण्ठा श्रुलोचना ।
स्मरन्ती तान्बहून्क्लेशान्क्लेशापायात्मदर्शनम् ॥
८ ॥
तम्ू--उनसे; आह--कहा; प्रेम--प्रेम का; वैक्लव्य--शोक के कारण; रुद्ध--अवरुद्ध; कण्ठा--कण्ठ वाली; अश्रु--आँसुओं से ( पूरित ); लोचना--आँखों वाली; स्मरन्ती--स्मरण करती; तानू--उन; बहूनू-- अनेक; क्लेशान्-- क्लेशों को;क्लेश--क्लेश; अपाय--दूर करने के लिए; आत्म--स्वयं; दर्शनम्--दर्शन देने वाले |
महारानी कुन्ती प्रेम से इतनी अभिभूत हो गयी कि उनका गला रुँध गया और उनकी आँखेंआँसुओं से भर गईं।
उन्होंने उन तमाम कष्टों का स्मरण किया जिसे उन्होंने तथा उनके पुत्रों नेसहा था।
इस तरह उन्होंने भगवान् कृष्ण को सम्बोधित करते हुए कहा जो अपने भक्तों के समक्षउनका कष्ट भगाने के लिए प्रकट होते हैं।
तदैव कुशल नो भूत्सनाथास्ते कृता वयम् ।
ज्ञतीन्न: स्मरता कृष्ण क्षाता मे प्रेषितस्त्वया ॥
९॥
तदा--उस समय; एव--केवल; कुशलम्--कुशल-क्षेम; न:--हमारी; अभूत्--हो गई; स--सहित; नाथा: --रक्षक; ते--तुम्हारे द्वारा; कृता:--निर्मित; वयम्--हम; ज्ञातीन्--तुम्हारे सम्बन्धी; न:--हमको; स्मरता--जिन्होंने स्मरण किया; कृष्ण--हेकृष्ण; भ्राता-- भाई ( अक्वूर ); मे--मेरा; प्रेषित:-- भेजा गया; त्वया--तुम्हारे द्वारा
महारानी कुन्ती ने कहा : हे कृष्ण, हमारी कुशल-मंगल तो तभी आश्वस्त हो गई जबआपने अपने सम्बन्धियों का अर्थात् हमारा स्मरण किया और मेरे भाई ( अक्रूर को ) को हमारेपास भेज कर हमें अपना संरक्षण प्रदान किया।
न तेस्ति स्वपरभ्रान्तिर्विश्वस्य सुहृदात्मन: ।
तथापि स्मरतां शश्वत्क्लेशान्हंसि हृदि स्थित: ॥
१०॥
न--नहीं; ते--तुम्हारे लिए; अस्ति-- है; स्व-- अपना; पर--तथा दूसरों का; भ्रान्तिः-- भ्रम; विश्वस्य--ब्रह्माण्ड का; सुहत्--शुभचिन्तक; आत्मन:--तथा आत्मा के लिए; तथा अपि--तो भी; स्मरताम्--स्मरण करने वाले के; शश्वत्--निरन्तर;क्लेशान्--क्लेशों को; हंसि--नष्ट करते हो; हृदि--हृदय में; स्थित:--स्थित |
आप जो कि ब्रह्माण्ड के शुभचिन्तक मित्र एवं परमात्मा हैं उनके लिए 'अपना' तथा'पराया' का कोई मोह नहीं रहता।
तो भी, सबों के हृदयों में निवास करने वाले आप उनकेकष्टों को समूल नष्ट कर देते हैं, जो निरन्तर आपका स्मरण करते हैं।
युधिष्टिर उवाचकिन आचरितं श्रेयो न वेदाहमधी श्वर ।
योगेश्वराणां दुर्द्शों यन्नो दृष्टः कुमेधसाम् ॥
११॥
युथिष्ठटिर: उवाच--युधिष्ठिर ने कहा; किम्ू--क्या; न:--हमारे द्वारा; आचरितम्--किया गया; श्रेयः--पुण्य-कर्म; न वेद--नहींजानता; अहम्--ैं; अधीश्वर--हे परम नियन्ता; योग--योग के; ईश्वराणाम्-- स्वामियों द्वारा; दुर्दर्शः--विरले ही दिखने वाला;यत्--वह; नः--हमररे द्वारा; दृष्ट:--देखा हुआ; कु-मेधसम्--अज्ञानियों द्वारा
राजा युधिष्ठिर ने कहा : हे परम नियन्ता, मैं नहीं जानता कि हम मूर्खो ने कौन से पुण्य-कर्मकिये हैं कि आपका दर्शन पा रहे हैं जिसे बड़े बड़े विरले योगेश्वर ही कर पाते हैं।
इति बै वार्षिकान्मासात्राज्ञा सो भ्यर्थित: सुखम् ।
जनयन्नयनानन्दमिन्द्रप्रस्थौकसां विभु: ॥
१२॥
इति--इस प्रकार; वै--निस्सन्देह; वार्षिकानू--वर्षा ऋतु के; मासान्ू--महीने; राज्ञा--राजा द्वारा; सः--वह; अभ्यर्थित: --अनुरोध किया गया; सुखम्--सुखपूर्वक; जनयन्--उत्पन्न करते हुए; नयन--आँखों के लिए; आनन्दम्--आनन्द; इन्द्रप्रस्थ-ओकसाम्--इन्द्रप्रस्थ के निवासियों के; विभुः--सर्वशक्तिमान प्रभु
जब राजा ने भगवान् कृष्ण को सबों के साथ रहने का अनुरोध किया, तो वर्षा ऋतु केमहीनों में नगर के निवासियों के नेत्रों को आनन्द प्रदान करते हुए भगवान् सुखपूर्वक इन्द्रप्रस्थ मेंरहते रहे।
एकदा रथमारुहा विजयो वानरध्वजम् ।
गाण्डीवं धनुरादाय तूणौ चाक्षयसायकौ ॥
१३॥
साकं कृष्णेन सन्नद्धो विहर्तु विपिनं महत् ।
बहुव्यालमृगाकीर्ण प्राविशत्परवीरहा ॥
१४॥
एकदा--एक बार; रथम्--रथ में; आरुह्मय --सवार होकर; विजय: --अर्जुन; वानर--बन्दर ( हनुमान ); ध्वजम्--जिसकीध्वजा में; गाण्डीवम्--अपना गाण्डीव; धनु:-- धनुष; आदाय--लेकर; तृणौ--दो तरकस; च--तथा; अक्षय--न चुकने वाले;सायकौ--बाण; साकम्--साथ; कृष्णेन--कृष्ण के; सन्नद्ध:--कवच पहन कर; विहर्तुमु--आखेट करने; विपिनमू--जंगल में; महत्--विशाल; बहु--अनेक; व्याल-मृग--शिकारी पशु; आकीर्णम्--भेरे हुए; प्राविशत्--घुसा; पर--शत्रु; वीर--वीरोंका; हा--मारने वाला
एक बार बलशाली शत्रुओं का हन्ता अर्जुन अपना कवच पहन करहनुमान से चिन्हितध्वजा वाले अपने रथ पर सवार होकर, अपना धनुष तथा दो अक्षय तरकस लेकर, भगवान्कृष्ण के साथ एक विशाल जंगल में शिकार खेलने गया जो हिंस्त्र पशुओं से परिपूर्ण था।
तत्राविध्यच्छरैव्यप्रान्शूकरान्महिषान्रुरून् ।
शरभान्गवयान्खड्गान्हरिणान्शशशल्लकान् ॥
१५॥
तत्र--वहाँ; अविध्यत्ू-बींध दिया; शरैः--बाणों से; व्याप्रान्ू--बाघों को; शूकरान्ू--सुअरों को; महिषान्--जंगली भैसों को;रुरूनू--एक किस्म के हिरनों को; शरभान्--हिरनों को; गवयान्--नील-गायों को; खड़्गान्ू--गैंडों को; हरिणान्ू--श्याममृगों को; शश--खरगोशों; शल्लकान्--तथा साहियों को |
अर्जुन ने अपने बाणों से उस जंगल के बाघों, सुअरों, जंगली भेसों, रुरूओं, शरभों, गबयों,गैडों, श्याम हिरनों, खरगोशों तथा साहियों को बेध डाला।
ताब्निन्युः किड्डूरा राज्ञे मेध्यान्पर्वण्युपागते ।
तृट्परीतः परिश्रान्तो बिभत्सुर्यमुनामगात् ॥
१६॥
तान्--उनको; निन्यु:--ले गये; किड्डूरा:--नौकर; राज्ञे--राजा तक; मेध्यान्ू--यज्ञ में बलि के योग्य; पर्वणि--विशेष अवसर( पर्व ) पर; उपागते--पास आ रहे; तृटू--प्यास से; परीत:ः--हारे; परिश्रान्त:--थके; बिभत्सु:--अर्जुन; यमुनाम्--यमुना नदीके तट पर; अगातू--गया।
नौकरों का एक दल मारे गये उन पशुओं को राजा युथ्िष्टिर के पास ले गया जो किसीविशेष पर्व पर यज्ञ में अर्पित करने के योग्य थे।
तत्पश्चात् प्यासे तथा थके होने से अर्जुन यमुनानदी के तट पर गया।
तत्रोपस्पृश्य विशदं पीत्वा वारि महारथौ ।
कृष्णौ ददृशतु: कन्यां चरन्तीं चारुदर्शनाम् ॥
१७॥
तत्र--वहाँ; उपस्पृश्य--नहाकर; विशदम्--स्वच्छ; पीत्वा-- पीकर; वारि--जल; महा-रथौ--महारथी योद्धा; कृष्णौ--दोनोंकृष्णों ने; ददशतु:--देखा; कन्याम्--कन्या को; चरन्तीम्--विचरण करती; चारू-दर्शनाम्--देखने में सुन्दरदोनों कृष्णों ने वहाँ स्नान करने के बाद नदी का स्वच्छ जल पिया।
तब दोनों महारथियों नेपास ही टहलती एक आकर्षक युवती को देखा।
तामासाद्य वरारोहां सुद्विजां रुचिराननाम् ।
पप्रच्छ प्रेषित: सख्या फाल्गुन: प्रमदोत्तमाम् ॥
१८॥
तामू--उसके; आसाद्य--पास पहुँचकर; वरा--उत्तम; आरोहाम्ू--नितम्ब वाली; सु--सुन्दर; द्विजामू--दाँतों वाली; रूचिर--आकर्षक; आननामू--मुख वाली; पप्रच्छ--पूछा; प्रेषित:-- भेजा गया; सख्या--मित्र श्रीकृष्ण द्वारा; फाल्गुन:--अर्जुन ने;प्रमदा--स्त्री से; उत्तमामू--असाधारण |
अपने मित्र द्वारा भेजे जाने पर अर्जुन उस असाधारण युवती के पास गये।
वह सुन्दर नितम्ब,उत्तम दाँत तथा आकर्षक मुख वाली थी।
उन्होंने उससे इस प्रकार पूछा।
का त्वं कस्यासि सुश्रोणि कुतो वा कि चिकीर्षसि ।
मन्ये त्वां पतिमिच्छन्तीं सर्व कथय शोभने ॥
१९॥
का--कौन; त्वमू--तुम; कस्य--किसकी; असि--हो; सु- श्रोणि--हे सुन्दर कटि वाली; कुतः--कहाँ से; वा--अथवा;किम्--क्या; चिकीर्षसि--करना चाहती हो; मन्ये--मैं सोचता हूँ; त्वामू--तुम; पतिम्ू--पति की; इच्छन्तीम्ू--खोज करती;सर्वम्-प्रत्येक वस्तु; कथय--कहो; शोभने--हे सुन्दरी |
अर्जुन ने कहा : हे सुन्दर कटि वाली, तुम कौन हो ? तुम किसकी पुत्री हो और तुम कहाँसे आई हो ? तुम यहाँ क्या कर रही हो? मैं सोच रहा हूँ कि तुम पति की आकांक्षी हो।
हे सुन्दरी,मुझसे प्रत्येक बात बतला दो।
श्रीकालिन्द्युवाचअहं देवस्य सवितुर्दुहििता पतिमिच्छती ।
विष्णुं वरेण्यं बरदं तप: परममास्थित: ॥
२०॥
श्री-कालिन्दी उबाच-- श्री कालिन्दी ने कहा; अहम्--मैं; देवस्थ--देवता की; सवितु:--सूर्य; दुहिता--पुत्री; पतिमू--पति रूपमें; इच्छती--चाहती हुईं; विष्णुम्-- भगवान् विष्णु को; वरेण्यम्--सर्व श्रेष्ठ रूचि; वर-दम्--वर देने वाले; तप: --तपस्या में;परमम्--कठोर; आस्थित:ः--लगी हुई
श्री कालिन्दी ने कहा : मैं सूर्यदेव की पुत्री हूँ।
मैं परम सुन्दर तथा वरदानी भगवान् विष्णुको अपने पति के रूप में चाहती हूँ और इसीलिए मैं कठोर तपस्या कर रही हूँ।
नान््यं पतिं वृणे वीर तमृते श्रीनिकेतनम् ।
तुष्यतां मे स भगवान्मुकुन्दोइनाथसंश्रय: ॥
२१॥
न--नहीं; अन्यम्ू--दूसरा; पतिम्--पति; वृणे--वरण करूँगी; वीर--हे वीर; तम्ू--उसके; ऋते--अतिरिक्त; श्री--लक्ष्मीका; निकेतनम्-- धाम; तुष्यताम्- प्रसन्न हों; मे--मुझसे; सः--वह; भगवान्-- भगवान् मुकुन्दः -- कृष्ण; अनाथ--स्वामीविहीन का; संश्रय: --आश्रय |
मैं उनको जो लक्ष्मी देवी के धाम हैं, छोड़कर और कोई पति स्वीकार नहीं करूँगी।
वेभगवान् मुकुन्द, जो कि अनाथों के आश्रय हैं, मुझ पर प्रसन्न हों।
कालिन्दीति समाख्याता वसामि यमुनाजले ।
निर्मिते भवने पित्रा यावदच्युतदर्शनम् ॥
२२॥
कालिन्दी--कालिन्दी; इति--इस प्रकार; समाख्याता--नाम वाली; वसामि--रह रही हूँ; यमुना-जले--यमुना के जल में;निर्मिते--निर्मित; भवने-- भवन में; पित्रा--अपने पिता द्वारा; यावत्--जब तक; अच्युत-- भगवान् कृष्ण के; दर्शनम्--दर्शन
मेरा नाम कालिन्दी है और मैं अपने पिता द्वारा यमुना जल के भीतर निर्मित भवन में रहतीहूँ।
मैं भगवान् अच्युत से भेंट होने तक यहीं रुकूँगी।
तथावदद्गुडाकेशो वासुदेवाय सोपि ताम् ।
रथमारोप्य तद्विद्वान्धर्मराजमुपागमत् ॥
२३॥
तथा--इस प्रकार; अवदत्--कहा; गुडाकेश: --अर्जुन ने; वासुदेवाय-- भगवान् कृष्ण से; सः--वह; अपि--तथा; तामू--उसको; रथम्--रथ पर; आरोप्य--चढ़ा कर; तत्--इन सबसे; विद्वान्ू-- अवगत; धर्म-राजम्--युधिष्ठटिर के पास; उपागमत्--गया।
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : अर्जुन ने ये सारी बातें वासुदेव से बतलाईं जो पहले सेइनसे अवगत थे।
तब भगवान् ने कालिन्दी को अपने रथ पर चढ़ा लिया और राजा युथ्चिष्ठिर को मिलने वापस चले गये।
यदैव कृष्ण: सन्दिष्ट: पार्थानां परमाह्ठुतम् ।
'कारयामास नगर विचित्र विश्वकर्मणा ॥
२४॥
यदा एब--जब; कृष्ण:--कृष्ण; सन्दिष्ट:--प्रार्थना करने पर; पार्थानाम्--पृथा के पुत्रों के लिए; परम--अतीव; अद्भुतम्ू--अद्भुत; कारयाम् आस--बनवाया था; नगरम्ू--नगर; विचित्रम्--विविधता से युक्त; विश्वकर्मणा--देवताओं के शिल्पीविश्वकर्मा द्वारा
एक पुरानी घटना बतलाते हुए शुकदेव गोस्वामी ने कहा : पाण्डवों के अनुरोध परभगवान् कृष्ण ने एक अत्यन्त अद्भुत एवं विचित्र नगरी का निर्माण विश्वकर्मा से कराया था।
भगवांस्तत्र निवसन्स्वानां प्रियचिकीर्षया ।
अग्नये खाण्डवं दातुमर्जुनस्यास सारथि: ॥
२५॥
भगवानू्-- भगवान्; तत्र-- वहाँ; निवसन्--रहते हुए; स्वानामू--अपने ( भक्तों ) के लिए; प्रिय-- आनन्द; चिकीर्षया--देने कीइच्छा से; अग्नये--अग्नि को; खाण्डवम्--खाण्डव वन; दातुम्-देने के लिए; अर्जुनस्य--अर्जुन के; आस--बने; सारथि: --रथचालक |
भगवान् अपने भक्तों को प्रसन्न करने के लिए उस नगरी में कुछ समय तक रहते रहे।
एकअवसर पर श्रीकृष्ण ने अग्नि को दान के रूप में खाण्डव वन देना चाहा अतः वे अर्जुन केसारथी बने।
सोग्निस्तुष्टो धनुरदाद्धयान्श्वेतात्रथं नृप ।
अर्जुनायाक्षयौ तूणौ वर्म चाभेद्यमस्त्रभि: ॥
२६॥
सः--उस; अग्नि:--अग्निदेव ने; तुष्ट:--प्रसन्न होकर; धनु:-- धनुष; अदात्--दिया; हयान्--घोड़ों को; श्रेतान्--सफेद;रथम्--रथ; नृप--हे राजा ( परीक्षित ); अर्जुनाय--अर्जुन को; अक्षयौ--न समाप्त होने वाले; तूणौ--दो तरकस; वर्म--कवच; च--तथा; अभेद्यमू--न टूटने वाला; अस्त्रिभि:--हथियार चलाने वालों के द्वारा |
हे राजन, अग्नि ने प्रसन्न होकर अर्जुन को एक धनुष, श्वेत घोड़ों की एक जोड़ी, एक रथ,कभी रिक्त न होने वाले दो तरकस दिये तथा एक कवच दिया जिसे कोई योद्धा हथियारों से भेदनहीं सकता था।
मयश्न मोचितो वह्ठेः सभां सख्य उपाहरत् ।
यस्मिन्दुर्योधनस्यासीजजलस्थलदृशिभ्रम: ॥
२७॥
मय: --मय नामक दानव ने; च--तथा; मोचित: --मुक्त हुआ; वह्ेः--अग्नि से; सभामू--सभाभवन; सख्ये--अपने मित्र,अर्जुन को; उपाहरत्--भेंट किया; यस्मिन्--जिसमें; दुर्योधनस्य--दुर्योधन का; आसीत्-- था; जल--जल; स्थल--तथा भूमिके; हशि--देखने में; भ्रम: -- भ्रम ।
जब मय दानव अपने मित्र अर्जुन द्वारा अग्नि से बचा लिया गया तो उसने उन्हें एकसभाभवन भेंट किया जिसमें आगे चलकर दुर्योधन को जल के स्थान पर ठोस फर्श का भ्रमहोता है।
स तेन समनुज्ञातः सुहद्धिश्चानुमोदितः ।
आययी द्वारकां भूयः सात्यकिप्रमखैर्वृत: ॥
२८॥
सः--वह, कृष्ण; तेन--उसके ( अर्जुन के ) द्वारा; समनुज्ञात:--विदा होकर; सु-हृद्धिः --शुभचिन्तकों द्वारा; च--तथा;अनुमोदित: -- अनुमति दिया गया; आययौ--गया; द्वारकाम्ू--द्वारका; भूयः--फिर; सात्यकि-प्रमुखैः--सात्यकि इत्यादि के;वृतः--साथ।
तब अर्जुन तथा अन्य शुभचिन्तक संबन्धियों एवं मित्रों से विदा लेकर भगवान् कृष्णसात्यकि तथा अपने अन्य परिचरों समेत द्वारका लौट गये।
अथोपयेमे कालिन्दीं सुपुण्यरत्व॑क्ष ऊर्जिते ।
वितन्वन्परमानन्दं स्वानां परममड्भगलः ॥
२९॥
अथ--तब; उपयेमे--विवाह किया; कालिन्दीम्--कालिन्दी से; सु--अत्यन्त; पुण्य--शुभ; ऋतु--ऋतु; ऋक्षे--तथा चान्द्रलग्न; ऊर्जिते--जिस दिन सूर्य तथा अन्य ग्रहों की स्थिति उत्तम थी; वितन्वन्ू--फैलाते हुए; परम--परम; आनन्दम्-- आनन्द;स्वानामू-- अपने भक्तों के लिए; परम--अत्यन्त; मड्ुलः-शुभ।
तब परम ऐश्वर्यशाली भगवान् ने कालिन्दी के साथ उस दिन विवाह कर लिया जिस दिनऋतु, चन्द्र लग्न एवं सूर्य तथा अन्य ग्रहों की स्थिति इत्यादि सभी शुभ थे।
इस तरह उन्होंने अपनेभक्तों को परम आनन्द प्रदान किया।
विन्द्यानुविन्द्यावावन्त्यौ दुर्योधनवशानुगौ ।
स्वयंवरे स्वभगिनीं कृष्णे सक्तां न््यघेधताम् ॥
३०॥
विन्द्य-अनुविन्दयौ--विन्द्य तथा अनुविन्द्य; आवन्त्यौ--अवन्ती के दो राजा; दुर्योधन-वश-अनुगौ--दुर्योधन के अधीन;स्वयम्बरे--स्वयम्वर में; स्व-- अपनी; भगिनीम्--बहन को; कृष्णे--कृष्ण को; सक्तामू--जो आसक्त थी; न्यषेधताम्--रोकदिया।
विन्द्य तथा अनुविन्द्य जो अवन्ती के संयुक्त राजा थे, दुर्योधन के अनुयायी थे।
जब स्वयंवरउत्सव में पति चुनने का अवसर आया तो उन्होंने अपनी बहिन ( मित्रविन्दा ) को कृष्ण का वरणकरने से मना किया यद्यपि वह उनके प्रति अत्यधिक आसक्त थी।
राजाधिदेव्यास्तनयां मित्रविन्दां पितृष्वसु: ।
प्रसह्य हृतवान्कृष्णो राजन्नाज्ञां प्रपश्यताम् ॥
३१॥
राजाधिदेव्या:--राजाधिदेवी महारानी की; तनयामू--पुत्री; मित्रविन्दाम्--मित्रविन्दा को; पितृ--पिता की; स्वसु:--बहन का;प्रसह्या--बलपूर्वक; हृतवान्--हरण कर लिया; कृष्ण: --कृष्ण ने; राजन्--हे राजा ( परीक्षित ); राज्ञामू--राजाओं के;प्रपश्यताम्--देखते हुए।
हे राजन, अपनी बुआ राजाधिदेवी की पुत्री मित्रविन्दा को प्रतिद्वन्दी राजाओं की आँखों केसामने से भगवान् कृष्ण बलपूर्वक उठा ले गये।
नग्नजिन्नाम कौशल्य आसीद्राजातिधार्मिक: ।
तस्य सत्याभवत्कन्या देवी नाग्नजिती नृूप ॥
३२॥
नग्नजित्ू--नग्नजित; नाम--नामक; कौशल्य: --कौशल्य ( अयोध्या ) का राजा; आसीतू-- था; राजा--राजा; अति--अत्यन्त;धार्मिक: --धार्मिक; तस्थ--उसकी; सत्या--सत्या; अभवत्-- थी; कन्या--पुत्री; देवी--सुन्दर; नाग्गजिती--नाग्नजिती नामभी था; नृप--हे राजा
हे राजनू, कौशल्य के अत्यन्त धार्मिक राजा नग्नजित के एक सुन्दर कन्या थी जिसका नामसत्या अथवा नाग्नजिती था।
नतां शेकुर्नूपा वोढुमजित्वा सप्तगोवृषान् ।
तीक्ष्णश्रृड्नान्सुदुर्धर्षान्वीर्यगन््धासहान्खलान् ॥
३३ ॥
न--नहीं; ताम्ू--उसको; शेकु:--समर्थ थे; नृपा:--राजागण; बोढुम्ू--ब्याहने के लिए; अजित्वा--हराये बिना; सप्त--सात;गो-वृषान्--बैलों को; तीक्षण--तेज; श्रृड्ानू--सींग वाले; सु--अत्यन्त; दुर्धर्षानू--वश में न आने वाले; वीर्य--वीरों की;गन्ध--महक; असहान्--सहन न करते हुए; खलानू--दुष्ट |
जो राजा ब्याहने के लिए आते थे उन्हें तब तक विवाह नहीं करने दिया जाता था जब तक वेतेज सींगों वाले सात बैलों को वश में न कर लें।
ये बैल अत्यन्त दुष्ट तथा वश में न आने वाले थेऔर वे वीरों की गंध भी सहन नहीं कर सकते थे।
तां श्रुत्वा वृषजिल्लभ्यां भगवान्सात्वतां पति: ।
जगाम कौशल्यपुरं सैन्येन महता वृतः ॥
३४॥
ताम्--उसके विषय में; श्रुत्वा--सुनकर; वृष--बैल; जित्ू--जीतने वाला; लभ्याम्--प्राप्तनीय; भगवान्-- भगवान्;सात्वताम्ू--वैष्णवों के; पति:--स्वामी; जगाम--गये; कौशल्य-पुरम्ू--कौशल्य राज्य की राजधानी में; सैन्येन--सेना से;महता--विशाल; वृत:--घिर कर।
जब वैष्णवों के स्वामी भगवान् ने उस राजकुमारी के बारे में सुना जो बैलों के विजेता द्वाराजीती जानी थी, तो वे विशाल सेना के साथ कौशल्य की राजधानी गये।
स कोशलपति: प्रीतः प्रत्युत्थानासनादिभि: ।
अर्हणेनापि गुरुणा पूजयन्प्रतिनन्दितः ॥
३५॥
सः--उस; कोशल-पति:--कोशल के स्वामी ने; प्रीत:--प्रसन्न; प्रत्युतधान--खड़े होकर; आसन--आसन; आदिभिः--इ त्यादिप्रदान करके; अर्हणेन--तथा भेंटों से; अपि-- भी; गुरुणा--पर्याप्त; पूजबन्--पूजा करते हुए; प्रतिनन्दित:--उसका भीसत्कार किया।
कोशल का राजा कृष्ण को देखकर हर्षित हुआ।
उसने अपने सिंहासन से उठकर तथाप्रतिष्ठित पद एवं पर्याप्त उपहार देकर भगवान् कृष्ण की पूजा की।
भगवान् कृष्ण ने भी राजाका आदरपूर्वक अभिवादन किया।
वरं विलोक्याभिमतं समागतंनरेन्द्रकन्या चकमे रमापतिम् ।
भूयादयं मे पतिराशिषोनलःकरोतु सत्या यदि मे धृतो व्रत: ॥
३६॥
वरम्--दूल्हे को; विलोक्य--देखकर; अभिमतम्ू--ग्राह्म; समागतम्--आई ; नरेन्द्र--राजा की; कन्या--पुत्री; चकमे--इच्छाकी; रमा--लक्ष्मी के; पतिमू--पति को; भूयात्--बन सके; अयम्--वह; मे--मेरा; पतिः--पति; आशिष:--आशाएँ;अनलः--अग्नि; करोतु--कर दे; सत्या:--सच; यदि--यदि; मे--मेरे द्वारा; धृत:--पालन किया गया; ब्रत:--मेरा व्रत |
जब राजा की पुत्री ने देखा कि वह सर्वाधिक उपयुक्त दूल्हा आया है, तो उसने तुरन्त हीरमापति श्रीकृष्ण को पाने की कामना की।
उसने प्रार्थना की, 'वे मेरे पति बनें।
यदि मैंने व्रतकिये हैं, तो पवित्र अग्नि मेरी आशाओं को पूरा करे।
'यत्पादपड्भगुजरज: शिरसा बिभर्तिश्रीरब्जज: सगिरिश: सहलोकपालै: ।
लीलातनु: स्वकृतसेतुपरीप्सया यःकालेदधत्स भगवान्मम केन तुष्येत् ॥
३७॥
यत्--जिसके; पाद--पैरों की; पड्टूज--कमल सहश; रज:-- धूलि; शिरसा--सिर पर; बिभर्ति-- धारण करती है; श्री:--लक्ष्मी; अब्जन-ज:--कमल से जन्मे, ब्रह्माजी; स--सहित; गिरि-शः--कैलाश पर्वत के स्वामी, शिवजी; सह--सहित;लोक--लोकों के; पालैः--शासकों द्वारा; लीला--उनकी लीला के रूप में; तनु;:--शरीर; स्व--अपने से; कृत--उत्पन्न;सेतु--धर्म-संहिता; परीप्सया--रक्षा करने की इच्छा से; यः--जिसने; काले--कालक्रम में; अदधत्-- धारण किया; सः--वह; भगवानू्-- भगवान्; मम--मुझसे; केन--किस प्रकार से; तुष्येत्--प्रसन्न हो सकेंगे।
'देवी लक्ष्मी, ब्रह्मा, शिव तथा विभिन्न लोकों के शासक उनके चरणकमलों की धूलि कोअपने सिरों पर चढ़ाते हैं और जो अपने द्वारा निर्मित धर्म-संहिता की रक्षा के लिए विभिन्न कालोंमें लीलावतार धारण करते हैं।
भला वे भगवान् मुझ पर कैसे प्रसन्न हो सकेंगे ?
'अर्चितं पुनरित्याह नारायण जगत्पते ।
आत्मानन्देन पूर्णस्य करवाणि किमल्पकः ॥
३८॥
अर्चितम्--पूजे जाने वाले को; पुनः--और भी; इति--इस प्रकार; आह--( राजा नग्नजित ने ) कहा; नारायण--हे नारायण;जगतू--ब्रह्माण्ड के; पते--हे स्वामी; आत्म--अपने भीतर; आनन्देन--आनन्द के साथ; पूर्णस्य--जो पूर्ण है उसका;'करवाणि--कर सकता हूँ; किम्--क्या; अल्पक:--तुच्छ |
सर्वप्रथम राजा नग्नजित ने भगवान् की समुचित पूजा की और तब उन्हें सम्बोधित किया,'हे नारायण, हे ब्रह्माण्ड के स्वामी, आप अपने आध्यात्मिक आनन्द में पूर्ण रहते हैं।
अतः यहतुच्छ व्यक्ति आपके लिए क्या कर सकता है ?'! श्रीशुक उवाचतमाह भगवान्हष्टः कृतासनपरिग्रहः ॥
मेघगम्भीरया वाचा सस्मितं कुरुनन्दन ॥
३९॥
श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; तम्--उससे; आह--कहा; भगवान्-- भगवान् ने; हष्ट:--प्रसन्न; कृत--कियाहुआ; आसन--आसन; परिग्रह:--स्वीकृति; मेघ--बादल की तरह; गम्भीरया--गम्भीर; वाचा--वाणी में; स--सहित;स्मितम्-मन्द हँसी से; कुरू--कुरुओं के; नन्दन--हे प्रिय वंशज।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा: हे कुरुनन्दन, भगवान् प्रसन्न थे और सुविधाजनक आसनस्वीकार करके वे मुसकाये तथा मेघ-गर्जना सदृश धीर-गम्भीर वाणी में राजा से बोले।
श्रीभगवानुवाचनरेन्द्र याच्ञा कविभिर्विगर्हिताराजन्यबन्धोर्निजधर्मवर्तिन: ।
तथापि याचे तव सौहदेच्छयाकन्यां त्वदीयां न हि शुल्कदा वयम् ॥
४०॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; नर-इन्द्र--हे मनुष्यों के शासक; याच्ञा--माँगना; कविभि:--विद्धानों द्वारा;विगर्हिता--निन्दनीय; राजन्य--राजवर्ग के; बन्धो:--सदस्य के लिए; निज--अपने; धर्म--धार्मिक मानदण्ड में; वर्तिनः --स्थित; तथा अपि--तो भी; याचे--मैं माँग रहा हूँ; तब--तुमसे; सौहद--मैत्री की; इच्छया--इच्छा से; कन्याम्--कन्या;त्वदीयाम्--तुम्हारी; न--नहीं; हि--निस्सन्देह; शुल्क-दा:ः--कर देने वाले; वयम्--हम
भगवान् ने कहा : हे मनुष्यों के शासक, विद्वानजन धर्म में रत राजवर्य व्यक्ति से याचनाकरने की निन्दा करते हैं।
तो भी, तुम्हारी मित्रता का इच्छुक मैं तुमसे तुम्हारी कन्या को माँग रहाहूँ यद्यपि हम बदले में कोई भेंट नहीं दे रहे।
श्रीराजोबाचको<न्यस्ते भ्यधिको नाथ कन्यावर इहेप्सित: ।
गुणैकधाम्नो यस्याड्रे श्रीव॑सत्यनपायिनी ॥
४१॥
श्री-राजा उबाच--राजा नग्नजित ने कहा; कः--कौन; अन्य:--दूसरा; ते--तुमसे; अभ्यधिक:-- श्रेष्ठ; नाथ--हे स्वामी;कन्या--मेरी कन्या के लिए; वरः--दूल्हा; इह--इस संसार में; ईप्सित:--इच्छित; गुण--दिव्य गुणों का; एक--एकमात्र;धाम्न:--धाम; यस्य--जिसके; अड्जे--शरीर में; श्री:--लक्ष्मी; बसति--वास करती है; अनपायिनी--कभी न छोड़ने वाली |
राजा ने कहा : हे प्रभु, भला मेरी पुत्री के लिए आपसे बढ़कर और कौन वर हो सकता है ?आप सभी दिव्य गुणों के धाम हैं।
आपके शरीर पर साक्षात् लक्ष्मी निवास करती हैं और वे किसी भी कारण से आपको कभी नहीं छोड़तीं।
किन्त्वस्माभि: कृत: पूर्व समय: सात्वतर्षभ ।
पुंसां वीर्यपरीक्षार्थ कन्यावरपरीप्सया ॥
४२॥
किन्तु--लेकिन; अस्माभि:--हमारे ( परिवार के ) द्वारा; कृतः--बनाया; पूर्वम्ू--पहले की; समय:-- प्रतिज्ञा; सात्वत-ऋषभ--हे सात्वतों के प्रमुख; पुंसामू--मनुष्यों का ( जो यहाँ आये हैं ); वीर्य--पराक्रम; परीक्षा--परीक्षा के; अर्थम्-हेतु;कन्या-मेरी पुत्री के लिए; वर--दूल्हा, पति; परीप्सबा--खोजने की इच्छा से |
किन्तु हे सात्वत-प्रमुख, अपनी पुत्री के लिए उपयुक्त पति सुनिश्चित करने के लिए हमनेउसके संभावित वरों के पराक्रम की परीक्षा करने के लिए पहले से ही एक शर्त निश्चित की हुईहै।
सप्तैते गोवृषा वीर दुर्दान्ता दुरवग्रहा: ।
एतैर्भग्ना: सुबहवो भिन्नगात्रा नृपात्मजा: ॥
४३॥
सप्त--सात; एते--ये; गो-वृषा:--बैल; वीर--हे वीर; दुर्दान्ताः--खूँखार; दुरवग्रहा: --अखंड; एतै:--उनके द्वारा; भग्ना:--पराजित; सु-बहव:--अनेकानेक; भिन्न--टूटे; गात्रा:--अंगों वाले; नृप--राजाओं के; आत्म-जा:--पुत्र |
हे वीर, इन सातों खूँखार बैलों को वश में करना असम्भव है।
इन्होंने (इन बैलों ने ) अनेकराजकुमारों के अंगों को खण्डित करके उन्हें परास्त किया है।
यदिमे निगृहीता: स्युस्त्वयैव यदुनन्दन ।
वरो भवानभिमतो दुहितुर्मे श्रियःपते ॥
४४॥
यतू--यदि; इमे--वे; निगृहीता:--वशी भूत; स्युः--हो जाते हैं; त्वया--तुम्हारे द्वारा; एब--निस्सन्देह; यदु-नन्दन--हे यदुवंशी;वरः--दूल्हा; भवान्ू--आप; अभिमतः --स्वीकृत, अभीष्ट; दुहितुः--पुत्री के लिए; मे--मेरी; श्रियः--लक्ष्मी के; पते--हेपति
हे यदुवंशी, यदि आप इन्हें वश में कर लें तो निश्चित रूप से, हे श्रीपति, आप ही मेरी पुत्रीके उपयुक्त वर होंगे।
एवं समयमाकर्णय्य बद्ध्वा परिकरं प्रभु: ।
आत्मानं सप्तधा कृत्वा न्यगृह्ञाल्लीलयैव तान् ॥
४५॥
एवम्--इस प्रकार; समयम्--शर्त, प्रतिज्ञा; आकर्ण्य--सुनकर; बद्ध्वा--कस कर; परिकरम्-- अपने वस्त्र; प्रभु:--प्रभु;आत्मानम्ू--अपने को; सप्तधा--सात रूप; कृत्वा--करके; न्यगृह्ञत्ू--वश में कर लिया; लीलया--खेल खेल में; एब--केवल; तान्ू--उनको |
इन शर्तों को सुनकर भगवान् ने अपने वस्त्र कसे, अपने आपको सात रूपों में विस्तारितकिया और बड़ी आसानी से बैलों को वश में कर लिया।
बद्ध्वा तान्दामभिः शौरिभभग्नदर्पान्हतौजसः ।
व्यकर्सललीलया बद्धान्बालो दारुमयान्यथा ॥
४६॥
बद्ध्वा--बाँध कर; तानू--उनको; दामभि:--रस्सियों से; शौरि:-- भगवान् कृष्ण ने; भग्न--खण्डित; दर्पानू--घमंड; हत--विनष्ट; ओजसः--पराक्रम; व्यकर्षत्--घसीटा; लीलया--खेल खेल में; बद्धानू--बँधे हुए; बाल:--बालक; दारु--लकड़ीके; मयान्ू--बने; यथा--जिस तरह |
भगवान् शौरि ने उन बैलों को बाँध लिया जिनका घमंड तथा बल अब टूट चुका था औरउन्हें रस्सियों से इस तरह खींचा जिस तरह कोई बालक खेल में लकड़ी के बने बैलों केखिलौनों को खींचता है।
ततः प्रीत: सुतां राजा ददौ कृष्णाय विस्मित: ।
तां प्रत्यगृह्माद्धनवान्विधिवत्सहशी प्रभु: ॥
४७॥
ततः--तब; प्रीतः--प्रसन्न; सुतामू--अपनी पुत्री को; राजा--राजा ने; ददौ--दे दिया; कृष्णाय--कृष्ण को; विस्मित: --चकित; ताम्--उसको ; प्रत्यगृह्मत्ू--स्वीकार किया; भगवानू--परम पुरुष ने; विधि-बत्--वैदिक विधि के अनुसार;सहशीम्--अनुरूप; प्रभु:--भगवान् के |
तब प्रसन्न तथा चकित राजा नग्नजित ने अपनी पुत्री भगवान् कृष्ण को भेंट कर दी।
भगवान् ने इस अनुरूप दुलहन को वैदिक विधि के साथ स्वीकार किया।
राजपल्यश्च दुहितु: कृष्णं लब्ध्वा प्रियं पतिम् ।
लेभिरे परमानन्दं जातश्च परमोत्सव: ॥
४८ ॥
राज--राजा की; पत्य:--पत्नियाँ; च--तथा; दुहितु:--तथा उसकी पुत्री के; कृष्णम्--कृष्ण को; लब्ध्वा--प्राप्त करके ;प्रियम्--प्रिय; पतिम्--पति; लेभिरि-- अनुभव किया; परम--महानतम; आनन्दम्--आनन्द; जात:--उत्पन्न; च--तथा;'परम--महानतम ; उत्सव:--उत्सव |
राजकुमारी को भगवान् कृष्ण के प्रिय पति के रूप में प्राप्त होने पर राजा की पत्नियों कोसर्वाधिक आनन्द प्राप्त हुआ और अतीब उत्सव का भाव जाग उठा।
श्भुभेर्यानका नेदुर्गीतवाद्यद्विजाशिष: ।
नरा नार्य: प्रमुदिता: सुवास:सत्रगलड्डू ता: ॥
४९॥
शब्भु--शंख; भेरी--तुरही; आनका:--तथा ढोल; नेदु:--बज उठे; गीत--गीत; वाह्य--वाद्य-संगीत; द्विज--ब्राह्मणों के;आशिषः:--आशीर्वाद; नराः--मनुष्य; नार्य:--स्त्रियाँ; प्रमुदिता:-- प्रसन्न; सु-वास: --सुन्दर बस्त्रों; स्रकू--तथा मालाओं से;अलट्डू ता:--सुसज्जित
गीत तथा वाद्य संगीत और ब्राह्मणों द्वारा आशीर्वाद देने की ध्वनियों के साथ साथ शंख,तुरही तथा ढोल बजने लगे।
प्रमुदित नर-नारियों ने अपने को सुन्दर बस्त्रों तथा मालाओं सेअलंकृत किया।
दशधेनुसहस्त्राणि पारिबईमदाद्विभु: ।
युवतीनां त्रिसाहस्त्रं निष्कग्रीवसुवाससम् ॥
५०॥
नवनागसहस्त्राणि नागाच्छतगुणात्रथान् ।
रथाच्छतगुणानश्वानश्वाच्छतगुणान्नरान् ॥
५१॥
दश--दस; धेनु--गायों का; सहस्त्राणि--हजार; पारिबर्हम्--दहेज; अदात्--दिया; विभु:--शक्तिशाली ( राजा नग्नजित );युवतीनाम्--युवतियों के; त्रि-साहस्त्रमू--तीन हजार; निष्क--सुनहरे आभूषण; ग्रीव--गर्दन में; सु--उत्तम; वाससम्--वस्त्र;नव--नौ; नाग--हाथियों का; सहस्त्राणि --हजार; नागात्--हाथियों की अपेक्षा; शत-गुणान्ू--सौ गुना अधिक( ९,००,००० ); रथान्--रथ; रथात्--रथों से; शत-गुणान्--सौ गुना अधिक; अश्वान्--धघोड़े; अश्वात्--अश्वों की तुलना में;शत-गुणान्--एक सौ गुना अधिक ( ९ अरब ); नरान्-मनुष्यों को |
शक्तिशाली राजा नग्नजित ने दहेज के रूप में दस हजार गौवें, तीन हजार युवा-दासियाँ जोअपने गलों में सोने के आभूषण पहने थीं तथा सुन्दर वस्त्रों से अलंकृत थीं, नौ हजार हाथी,हाथियों के एक सौ गुना रथ, रथों के एक सौ गुना घोड़े तथा घोड़ों के सौ गुने नौकर दिये।
दम्पती रथमारोप्य महत्या सेनया वृतौ ।
स्नेहप्रक्लिन्नददयो यापपयामास कोशलः ॥
५२॥
दम्-पती--जोड़ी; रथम्--रथ पर; आरोप्य--बैठाकर; महत्या--विशाल; सेनया--सेना से; वृतौ--युक्त; स्नेह--स्नेह से;प्रक्लिन्न--द्रवित; हृदयः--हृदय वाला; यापयाम् आस--विदा किया; कोशल:--कोशल के राजा ने
स्नेह से द्रवीभूत हृदय से, कोशल के राजा ने वर-वधू को उनके रथ पर बैठा दिया और तबएक विशाल सेना के साथ उन्हें विदा कर दिया।
श्रुत्वैतद्रुरु धु भूपा नयन्तं पथि कन्यकाम् ।
भग्नवीर्या: सुदुर्मर्षा यदुभिगोंवृषै: पुरा ॥
५३॥
श्रुत्वा--सुनकर; एतत्--यह; रुरुधु;--रोक दिया; भू-पा:--राजाओं ने; नयन्तम्--ले जा रहे; पथि--रास्ते में; कन््यकाम्--दुलहन को; भग्न--खण्डित; वीर्या:--शक्ति वाले; सु--अत्यन्त; दुर्मर्षा:--असहिष्णु; यदुभि:--यदुओं द्वारा; गो-वृषैः --बैलोंसे; पुरा--पहले।
जब स्वयंवर में आये असहिष्णु प्रतिद्वन्द्ी राजाओं ने सारी घटना के बारे में सुना तो उन्होंनेभगवान् कृष्ण को, अपनी दुलहन घर ले जाते समय मार्ग में रोकना चाहा।
किन्तु जिस तरहइसके पूर्व बैलों ने राजाओं के बल को तोड़ दिया था उसी तरह अब यदु-योद्धाओं ने उनके बलको तोड़ दिया।
तानस्यतः शरक्रातान्बन्धुप्रियकृदर्जुन: ।
गाण्डीवी कालयामास सिंहः क्षुद्रमृगानिव ॥
५४॥
तान्--उनको; अस्यत:ः--फेंकते हुए; शर--बाणों के; ब्रातान्--झुंड के झुंड; बन्धु --उसके मित्र ( श्रीकृष्ण ); प्रिय--प्रसन्नकरने के लिए; कृतू-करते हुए; अर्जुन:--अर्जुन ने; गण्डीवी--गाण्डीव धनुष का स्वामी; कालयाम् आस-- भगा दिया;सिंह:--सिंह; क्षुद्र--तुच्छ; मृगान्--पशुओं को; इब--जिस तरह |
गाण्डीव थधनुर्धारी अर्जुन अपने मित्र कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए सदैव उत्सुक रहते थेअतः उन्होंने उन सारे प्रतिद्वन्द्रियों को भगा दिया जो भगवान् पर बाणों की झड़ी लगाये हुए थे।
उन्होंने यह सब वैसे ही किया जिस तरह एक सिंह क्षुद्र पशुओं को खदेड़ देता है।
पारिबर्हमुपागृह्य द्वारकामेत्य सत्यया ।
रेमे यदूनामृषभो भगवान्देवकीसुतः ॥
५५॥
पारिबरहम्--दहेज; उपागृह्य--लेकर; द्वारकाम्-दद्वारका में; एत्य-- आकर; सत्यया--सत्या के साथ; रेमे--विलास किया;यदूनाम्ू--यदुओं के; ऋषभ: -- प्रमुख; भगवान्-- भगवान्; देवकी-सुत:--देवकी -पुत्र ने
तब यदुओं के प्रधान भगवान् देवकीसुत दहेज तथा सत्या को लेकर द्वारका गये और वहाँसुखपूर्वक रहने लगे।
श्रुतकीर्ते: सुतां भद्रां उपयेमे पितृष्वसु: ।
कैकेयीं भ्रातृभिर्दत्तां कृष्ण: सन्तर्दनादिभि: ॥
५६॥
श्रुतकीर्ते:--श्रुतकीर्ति की; सुताम्--पुत्री; भद्राम्-- भद्गा को; उपयेमे--ब्याहा; पितृ-स्वसु:--अपने पिता की बहन की;कैकेयीम्--कैकेय की राजकुमारी; भ्रातृभिः--उसके भाइयों द्वारा; दत्तामू-दी हुईं; कृष्ण:--कृष्ण; सन्तर्दन-आदिभि:--सन्तर्दन इत्यादि द्वारा
भद्गा कैकेय राज्य की राजकुमारी तथा कृष्ण की बुआ श्रुतकीर्ति की पुत्री थी।
जब सनन््तर्दनइत्यादि उसके भाइयों ने उसे कृष्ण को भेंट किया, तो उन्होंने भद्रा से विवाह कर लिया।
सुतां च मद्राधिपतेर्लक्ष्मणां लक्षणैर्यताम् ।
स्वयंवरे जहारैक: स सुपर्ण: सुधामिव ॥
५७॥
सुताम्--पुत्री को; च--तथा; मद्र-अधिपते: --मद्र देश के शासक की; लक्ष्मणाम्--लक्ष्मणा को; लक्षणै:--सारे सदगुणों से;युताम्ू--युक्त; स्वयमू्-वरे--स्वयंवर उत्सव में; जहार--हर ले गया; एक:--अकेले; सः--वह, कृष्ण; सुपर्ण:--गरुड़;सुधाम्-- अमृत को; इब--जिस तरह।
तब भगवान् ने मद्रराज की कन्या लक्ष्मणा से विवाह किया।
कृष्ण अकेले ही उसकेस्वयंवर समारोह में गये थे और उसे उसी तरह हर ले आये जिस तरह गरुड़ ने एक बार देवताओंका अमृत चुरा ले गया था।
अन्याश्चेवंविधा भार्या: कृष्णस्यासन्सहस्त्रशः ।
भौम॑ हत्वा तन्निरोधादाहताश्चारुदर्शना: ॥
५८ ॥
अन्या:--अन्य; च--तथा; एवमू-विधा: --इन्हीं की तरह; भार्या:--पत्नियाँ; कृष्णस्य--कृष्ण की; आसन्-- हुईं; सहस्नश:--हजारों; भौमम्-- भौम असुर को; हत्वा--मार कर; तत्--उस भौम से; निरोधात्--उनके बन्दीगृह से; आहता:--हरण की गई;चारु--सुन्दर; दर्शना:--जिनकी सूरत ।
भगवान् कृष्ण ने इन्हीं के समान अन्य हजारों पत्नियाँ तब प्राप्त कीं जब उन्होंने भौमासुर कोमारा और उसके द्वारा बन्दी बनाई गई सुन्दरियों को छुड़ाया।
