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अध्याय सत्तावन: सत्राजित की हत्या, रत्न लौटाया गया
10.57श्रीबादरायणिरुवाचविज्ञातार्थोपि गोविन्दो दग्धानाकर्ण्य पाण्डवान् ।
कुन्तीं च कुल्यकरणे सहरामो ययौ कुरून् ॥
१॥
श्री-बादरायणि: उवाच--बादरायण के पुत्र श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; विज्ञात--अवगत; अर्थ:--तथ्यों से; अपि--यद्यपि;गोविन्द: -- भगवान् कृष्ण; दग्धान्ू--जल कर भस्म हुए; आकर्णर्य--सुनकर; पाण्डवान्--पाण्डु-पुत्रों को; कुन्तीमू--उनकीमाता कुन्ती को; च--तथा; कुल्य--कुलरीति; करणे--पूरा करने के लिए; सह-राम:--बलराम के साथ; ययौ--गये;कुरूनू--कुरुओं के राज्य में |
श्री बादरायणि ने कहा : यद्यपि जो कुछ घटित हुआ था भगवान् गोविन्द उससे पूर्णतयाअवगत थे, फिर भी जब उन्होंने यह समाचार सुना कि पाण्डव तथा महारानी कुन्ती जल करमृत्यु को प्राप्त हुए हैं, तो वे कुलरीति पूरा करने के उद्देश्य से बलराम के साथ कुरुओं के राज्यमें गये।
भीष्म कृपं स विदुरं गान्धारीं द्रोणमेव च ।
तुल्यदुःखौ च सड्भम्य हा कष्टमिति होचतु: ॥
२॥
भीष्मम्-- भीष्म; कृपमू-- आचार्य कृप; स-विदुरम्--तथा विदुर से भी; गान्धारीम्-- धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी से; द्रोणम्--आचार्य द्रोण से; एव च--तथा; तुल्य--समान रूप से; दुःखौ--शोकपूर्ण; च--तथा; सड्भम्य--मिल कर; हा--हाय;कष्टमू--कितना कष्टकारक; इति--इस प्रकार; ह ऊचतु:--वे बोले।
दोनों ही विभु भीष्म, कृप, विदुर, गान्धारी तथा द्रोण से मिले।
उन्हीं के समान दुख प्रकटकरते हुए वे बिलख उठे, 'हाय! यह कितना कष्ट प्रद है! 'लब्ध्वैतदन्तरं राजन्शतधन्वानमूचतु: ।
अक्रूरकृतवर्माणौ मनि: कस्मान्न गृह्मते ॥
३॥
लब्ध्वा--पाकर; एतत्--इस; अन्तरम्--अवसर को; राजनू्--हे राजा ( परीक्षित ); शतधन्वानम्--शतधन्वा से; ऊचतु: --कहा; अक्ूर-कृतवर्माणौ--अक्रूर तथा कृतवर्मा ने; मनि:--मणि; कस्मात्--क्यों; न गृह्मतवे--न ले लिया जाय
इस अवसर का लाभ उठा कर हे राजन, अक्रूर तथा कृतवर्मा शतधन्वा के पास गये औरउससे कहा, 'क्यों न स्यथमंतक मणि को हथिया लिया जाय ?
'योउस्मभ्यं सम्प्रतिश्रुत्य कन्यारत्न॑ विगह्मय नः ।
कृष्णायादान्न सत्राजित्कस्मादभ्रातरमन्वियात् ॥
४॥
यः--जिसने; अस्मभ्यम्ू--हममें से प्रत्येक को; सम्प्रतिश्रुत्य--वादा करके; कनन््या--उसकी पुत्री; रत्मम्--रत्न जैसी; विगर्ई--अवमानना करके; न:--हमको; कृष्णाय--कृष्ण को; अदात्--दिया; न--नहीं; सत्राजित्--सत्राजित ने; कस्मात्-क्यों;भ्रातरमू--उसके भाई को; अन्वियात्ू--अनुगमन करना चाहिए।
'सत्राजित ने वादा करके हमारी तिरस्कारपूर्वक अवहेलना करते हुए अपनी रल जैसी पुत्रीहमें न देकर कृष्ण को दे दी।
तो फिर सत्राजित अपने भाई के ही मार्ग का अनुगमन क्यों नकरे कैएवं भिन्नमतिस्ताभ्यां सत्राजितमसत्तम: ।
शयानमवधील्लोभात्स पाप: क्षीण जीवित: ॥
५॥
एवम्--इस प्रकार; भिन्न-- प्रभावित; मतिः --मन वाला; ताभ्याम्--उन दोनों के द्वारा; सत्राजितम्--सत्राजित को; असतू-तमः--अत्यन्त दुष्ट; शयानम्--सोते हुए; अवधीत्--मार डाला; लोभात्--लालच में आकर; सः--उसने; पाप: --पापी;क्षीण--घटी हुई; जीवित:--आयु वाला
इस तरह उसका मन उनकी सलाह से प्रभावित हो गया और दुष्ट शतधन्वा ने लोभ में आकरसत्राजित को सोते हुए मार डाला।
इस तरह पापी शतधन्वा ने अपनी आयु क्षीण कर ली।
स्त्रीणां विक्रोशमानानां क्रन्दन्तीनामनाथवत् ।
हत्वा पशून्सौनिकवन्मणिमादाय जग्मिवान् ॥
६॥
स्त्रीणाम्--स्त्रियों के; विक्रोशमानानामू--चीखती; क्रन्दन्तीनामू--तथा चिल्लाती; अनाथ--जिनके कोई रक्षक न हो, ऐसेव्यक्ति; बत्--सहश; हत्वा--मार कर; पशून्ू--पशुओं को; सौनिक--कसाई; वत्--सहृश; मणिम्--मणि को; आदाय--लेकर; जग्मिवान्--चला गया।
जब सत्राजित के महल की स्त्रियाँ चीख रही थीं और असहाय की तरह रो रही थीं तबशतथन्वा ने वह मणि ले लिया और वहाँ से चलता बना जैसे कुछ पशुओं का वध करने के बादकोई कसाई करता है।
सत्यभामा च पितरं हतं वीक्ष्य शुचार्पिता ।
व्यलपत्तात तातेति हा हतास्मीति मुहाती ॥
७॥
सत्यभामा--रानी सत्यभामा; च--तथा; पितरम्--अपने पिता को; हतम्--मारा हुआ; वीक्ष्य--देख कर; शुचा-अर्पिता --शोकमग्न; व्यलपत्--विलाप करती; तत तात--हे पिता, हे पिता; इति--इस प्रकार; हा--हाय; हता--मारी गई; अस्मि--हूँ;इति--इस प्रकार; मुहाती--मूर्च्छित हुई ॥
जब सत्यभामा ने अपने मृत पिता को देखा तो वे शोक में डूब गईं।
'मेरे पिता, मेरे पिता!हाय, मैं मारी गयी ' विलाप करती हुई वे मूर्छित होकर गिर गई।
तैलद्रोण्यां मृतं प्रास्य जगाम गजसाह्ययम् ।
कृष्णाय विदितार्थाय तप्ताचख्यौ पितुर्वधम् ॥
८ ॥
तैल--तेल के; द्रोण्यामू--विशाल पात्र में; मृतम्ू--शव को; प्रास्य--रख कर; जगाम--गई; गज-साहयम्--कुरु-राजधानीहस्तिनापुर; कृष्णाय--कृष्ण को; विदित-अर्थाय--जो पहले से ही अवगत थे; तप्ता--शोकयुक्त; आचख्यौ--उसने कहसुनाया; पितुः--अपने पिता का; वधम्--वध
रानी सत्यभामा अपने पिता के शव को तेल के एक विशाल कुंड में रख कर हस्तिनापुर गईंजहाँ उन्होंने अपने पिता की हत्या के बारे में बहुत ही शोकातुर होकर कृष्ण को बतलाया जोपहले से इस स्थिति को जान रहे थे।
तदाकरणण्यें श्वरौ राजन्ननुसृत्य नूलोकताम् ।
अहो नः परम कष्टमित्यस्त्राक्षो विलेपतु: ॥
९॥
तत्--उसे; आकर्ण्य --सुनकर; ईश्वरौ--दोनों प्रभु; राजन्ू--हे राजन् ( परीक्षित ); अनुसृत्य-- अनुकरण करते हुए; नू-लोकताम्--मानव समाज की रीति; अहो--हाय; न:ः--हमारे लिए; परमम्--महानतम; कष्टम्--दुख; इति--इस प्रकार;अस्त्र--आँसू-भरे; अक्षौ--दोनों नेत्रों में; विलेपतु:--दोनों ने विलाप किया।
हे राजन, जब कृष्ण तथा बलराम ने यह समाचार सुना तो वे आह भर उठे, 'हाय! यह तोहमारे लिए सबसे बड़ी दुर्घटना ( विपत्ति ) है!' इस तरह मानव समाज की रीतियों का अनुकरणकरते हुए वे शोक करने लगे और उनकी आँखें आँसुओं से डबडबा आईं।
आगत्य भगवांस्तस्मात्सभार्य: साग्रज: पुरम् ।
शतधन्वानमारेभे हन्तुं हर्तु मणि तत: ॥
१०॥
आगत्य--लौट कर; भगवान्-- भगवान्; तस्मात्--उस स्थान से; स-भार्य:--अपनी पत्नी सहित; स-अग्रज:--तथा अपने बड़ेभाई के साथ; पुरम्--अपनी राजधानी में; शतधन्वानम्--शतधन्वा को; आरेभे--तैयारी की; हन्तुम्ू--मारने के लिए; हर्तुम्--छीन लेने के लिए; मणिम्ू--मणि को; ततः--उससे
भगवान् अपनी पत्नी तथा बड़े भाई के साथ अपनी राजधानी लौट आये।
द्वारका आकरउन्होंने शतधन्वा को मारने और उससे मणि छीन लेने की तैयारी की।
सोपि कृतोद्यम॑ ज्ञात्वा भीतः प्राणपरीप्सया ।
साहाय्ये कृतवर्माणमयाचत स चाब्रवीत् ॥
११॥
सः--वह ( शतधन्वा ); अपि-- भी; कृत-उद्यमम्--अपने को तैयार किये हुए; ज्ञात्वा--जान कर; भीतः--डरा हुआ; प्राण--अपना प्राण; परीप्सया--बचाने की इच्छा से; साहाय्ये--सहायता के लिए; कृतवर्माणम्--कृतवर्मा से; अयाचत--याचना की;सः--उसने; च--तथा; अब्नवीत्--कहा |
यह जान कर कि भगवान् कृष्ण उसे मार डालने की तैयारी कर रहे हैं, शतधन्वा भयभीत होउठा।
वह अपने प्राण बचाने के लिए कृतवर्मा के पास गया और उससे सहायता माँगी किन्तुकृतवर्मा ने इस प्रकार उत्तर दिया।
नाहमीस्वरयो: कुर्या हेलनं रामकृष्णयो: ।
को नु क्षेमाय कल्पेत तयोर्वृजिनमाचरन् ॥
१२॥
कंसः सहानुगोपीतो यदूदवेषात्त्याजित: अ्रिया ।
जरासन्धः सप्तदशसंयुगाद्विरथो गतः ॥
१३॥
न--नहीं; अहम्--ैं; ईश्वरयो: --दोनों प्रभुओं के प्रति; कुर्यामू--कर सकता हूँ; हेलनम्--अपराध; राम-कृष्णयो: --बलरामतथा कृष्ण के प्रति; कः--कौन; नु--निस्सन्देह; क्षेमाय--सौभाग्य; कल्पेत-- प्राप्त कर सकता है; तयो: --उन दोनों को;वृजिनम्--कष्ट; आचरन्--पहुँचाते हुए; कंसः--कंस; सह--सहित; अनुग: -- उसके अनुयायी; अपीत:--मृत; यत्--जिसकेविरुद्ध; द्वेषात्-द्वेष से; त्याजित:--त्यक्त; अिया--अपने ऐश्वर्य से; जरासन्ध:--जरासन्ध; सप्तद्श--सत्रह; संयुगात्--युद्धोंसे; विरथः--रथविहीन; गत:--हो गया
कृतवर्मा ने कहा : मैं भगवान् कृष्ण तथा बलराम के विरुद्ध अपराध करने का दुस्साहसनहीं कर सकता।
भला उन्हें कष्ट देने वाला अपने सौभाग्य की आशा कैसे कर सकता है? कंसतथा उसके सारे अनुयायियों ने उनसे शत्रुतावश अपनी सम्पत्ति तथा अपने प्राण गँवाये और उनसेसत्रह बार युद्ध करने के बाद जरासन्ध के पास एक भी रथ नहीं बचा।
प्रत्याख्यात: स चाक्रूरं पार्णिगग्राहमयाचत ।
सोप्याह को विरुध्येत विद्वानी श्वरयोर्बलम् ॥
१४॥
प्रत्याख्यात:--मना किया गया; सः--वह, शतधन्वा; च--तथा; अक्रूरम्--अक्रूर से; पार्णिण-ग्राहमू--सहायता के लिए;अयाचत--विनती की; सः--वह, अक्रूर; अपि-- भी; आह--बोला; कः--कौन; विरुध्येत--उनका विरोध कर सकता है;विद्वान्ू--जानते हुए; ईश्वरयो: --दोनों विभुओं के; बलम्--बल को |
अपनी याचना अस्वीकृत हो जाने पर शतधन्वा अक्रूर के पास गया और अपनी रक्षा के लिएउनसे अनुनय-विनय की।
किन्तु अक्रूर ने भी उसी तरह उससे कहा : भला ऐसा कौन है, जो उन दोनों के बल को जानते हुए उन दोनों विभुओं का विरोध करेगा ?
य इदं लीलया विश्व सृजत्यवति हन्ति च ।
चेष्टां विश्वस्ृजो यस्य न विदुर्मोहिताजया ॥
१५॥
यः--जो; इदम्ू--इस; लीलया--खेल-खेल में ; विश्वम्--ब्रह्माण्ड को; सृजति--उत्पन्न करता है; अवति--पालन करता है;हन्ति--नष्ट करता है; च--तथा; चेष्टाम्ू--प्रयोजन; विश्व-सृज: --ब्रह्माण्ड के ( गौण ) स्त्रष्टा ( ब्रह्म आदि ); यस्य--जिसका;न विदुः--नहीं जानते; मोहिता:--मोहग्रस्त; अजया-- अपनी मोहनी शक्ति द्वारा।
यह तो परमेश्वर ही हैं, जो अपनी लीला के रूप में इस ब्रह्माण्ड का सृजन, पालन तथा संहारकरते हैं।
यहाँ तक कि विश्व स्त्रष्टागण भी उनके प्रयोजन को नहीं समझ पाते क्योंकि वे उनकीमाया द्वारा मोहग्रस्त रहते हैं।
यः सप्तहायनः शैलमुत्पाट्यैकेन पाणिना ।
दधार लीलया बाल उच्छिलीन्ध्रमिवार्भक: ॥
१६॥
यः--जो; सप्त--सात; हायन: -- वर्षीय; शैलम्--पर्वत को; उत्पाट्य--उखाड़ कर; एकेन--केवल एक; पाणिना--हाथ से;दधार--धारण किया; लीलया--खेल-खेल में; बाल:--निरा बालक ; उच्छिलीन्ध्रम्ू--कुकुरमुत्ता; इब--सहृश; अर्भक:--एकबालक।
सात वर्षीय एक बालक के रूप में कृष्ण ने समूचा पर्वत उखाड़ लिया और आसानी से इसेऊपर उठाये रखा जिस तरह एक बालक कुकुरमुत्ता उठा लेता है।
नमस्तस्मै भगवते कृष्णायाद्धुतकर्मणे ।
अनन्तायादिभूताय कूटस्थायात्मने नम: ॥
१७॥
नमः--नमस्कार; तस्मै--उस; भगवते-- भगवान् को; कृष्णाय--कृष्ण को; अद्भुत--चकित करने वाले; कर्मणे--जिसकेकार्य; अनन्ताय--असीम; आदि-भूताय--समस्त जगत के उद्गम को; कूट-स्थाय--जगत के अचल केन्द्र को; आत्मने--परमात्मा को; नमः--नमस्कार।
'मैं उन भगवान् कृष्ण को नमस्कार करता हूँ जिनका हर कार्य चकित करने वाला है।
वेपरमात्मा हैं, असीम स्त्रोत तथा समस्त जगत के स्थिर केन्द्र हैं।
'प्रत्याख्यातः स तेनापि शतधन्वा महामणिम् ।
तस्मिन्न्यस्याश्रमारुहम शतयोजनगं ययौ ॥
१८॥
प्रत्याख्यात: --अस्वीकार; सः--वह; तेन--उस ( अक्रूर ) के द्वारा; अपि-- भी; शतधन्वा--शतधन्वा; महा-मणिम्--बहुमूल्यमणि को; तस्मिन्ू--उसके पास; न्यस्य--छोड़ कर; अश्वम्--घोड़े पर; आरुह्म--सवार होकर; शत--एक सौ; योजन--योजन(८ मील-१ योजन ); गम्--जा सकने वाले; ययौ--रवाना हो गया
जब अक़्ूर ने भी उसकी याचना अस्वीकार कर दी तो शतधन्वा ने उस अमूल्य मणि कोअक्रूर के संरक्षण में रख दिया और एक घोड़े पर चढ़ कर भाग गया जो एक सौ योजन ( आठसौ मील ) यात्रा कर सकता था।
गरुडध्वजमारुह्य रथं रामजनार्दनौ ।
अन्वयातां महावेगैरश्वे राजन्गुरुद्रहम्ू ॥
१९॥
गरुड-ध्वजमू्--झंडे में गरुड़ चिह्न वाले; आरुह्म--सवार होकर; रथम्--रथ में; राम--बलराम; जनार्दनौ--तथा कृष्ण ने;अन्वयाताम्--पीछा किया; महा-वेगै:--अत्यन्त तेज; अश्वै:--घोड़ों से; राजन्--हे राजा ( परीक्षित ); गुरु--अपने श्रेष्ठ की( सत्राजित की जो उनके श्वसुर थे ); द्रहम्--हिंसा करने वाला।
हे राजन, कृष्ण तथा बलराम, कृष्ण के रथ पर सवार हुए जिस पर गरुड़चिन्हित ध्वजा'फहरा रहा था और जिसमें अत्यन्त तेज घोड़े जुते थे।
वे अपने श्रेष्ठ ( श्वसुर ) के हत्यारे का पीछाकरने लगे।
मिथिलायामुपवने विसृज्य पतितं हयम् ।
पद्भ्यामधावत्सन्त्रस्त: कृष्णोप्यन्वद्रवद्गुषा ॥
२०॥
मिथिलायाम्--मिथिला में; उपवने--एक उपवन में; विसृज्य--छोड़ कर; पतितम्--गिरे हुए; हयम्--घोड़े को; पद्भ्याम्--पैदल; अधावत्--दौड़ने लगा; सन्त्रस्त:-- भयभीत; कृष्ण: --कृष्ण; अपि-- भी; अन्वद्रवत्-पीछे दौड़े; रुषा--क्रुद्ध होकर।
मिथिला के बाहर एक बगीचे में वह घोड़ा जिस पर शतधन्वा सवार था गिर गया।
भयभीतहोकर उसने घोड़ा वहीं छोड़ दिया और पैदल ही भागने लगा।
कृष्ण क्रुद्ध होकर उसका पीछाकर रहे थे।
पदातेर्भगवांस्तस्थ पदातिस्तिग्मनेमिना ।
चक्रेण शिर उत्कृत्य वाससोर्व्यचिनोन्मणिम् ॥
२१॥
पदातेः--पैदल का; भगवान्-- भगवान्; तस्थ-- उस; पदाति:--पैदल ही; तिग्म--तेज; नेमिना-- धार वाले; चक्रेण-- अपनेचक्र से; शिर:--सिर; उत्कृत्य--काट कर; वाससो: --शतधन्वा के व्त्रों के भीतर; व्यचिनोत्--ढूँढ़ा; मणिम्--मणि को
चूँकि शतधन्वा पैदल ही भागा था इसलिए भगवान् ने भी पैदल ही जाते हुए अपने तेज धारवाले चक्र से उसका सिर काट लिया।
तब भगवान् ने स्यमन््तक मणि के लिए शतथन्वा के सभीवस्त्रों को छान मारा।
अलब्धमणिरागत्य कृष्ण आहाग्रजान्तिकम् ।
बृथा हतः शतधनुर्मणिस्तत्र न विद्येत ॥
२२॥
अलब्ध--न पाकर; मणि:--मणि; आगत्य--पास आकर; कृष्ण:--कृष्ण ने; आह--कहा; अग्र-ज--अपने बड़े भाई के;अन्तिकमू--निकट; वृथा--व्यर्थ ही; हतः--मारा गया; शतधनु:--शतधन्वा; मणि:--मणि; तत्र--उसके पास; न विद्यते--नहीं है।
मणि न पाकर भगवान् कृष्ण अपने बड़े भाई के पास गये और कहने लगे, 'हमने व्यर्थ हीशतधन्वा को मार डाला।
उसके पास वह मणि नहीं है।
'तत आह बलो नूनं स मणि: शतधन्वना ।
कस्मिश्वित्पुरुषे न्यस्तस्तमन्वेष पुरं ब्रज ॥
२३॥
ततः--तब; आह--कहा; बल:--बलराम ने; नूनम्--निश्चय ही; सः--वह; मणि:--मणि; शतधन्वना--शतधन्वा द्वारा;कस्मिश्वितू-किसी विशेष; पुरुषे--व्यक्ति के पास; न्यस्त:--छोड़ी गई है; तम्--उसको; अन्वेष--ढूँढ़ो; पुरम्--पुरी में;ब्रज--जाओ।
इस पर बलराम ने उत्तर दिया, 'निस्सन्देह, शतधन्वा ने मणि को किसी के संरक्षण में रख छोड़ा होगा।
तुम नगरी में लौट जाओ और उस व्यक्ति को ढूँढ़ो।
'अहं वैदेहमिच्छामि द्रष्ठु प्रियतमं मम ।
इत्युक्त्वा मिथिलां राजन्विवेश यदनन्दनः ॥
२४॥
अहमू--ैं; वैदेहम्--विदेह के राजा को; इच्छामि--चाहता हूँ; द्रष्टमू-- देखना; प्रिय-तमम्-- अत्यन्त प्रिय; मम--मेरा; इति--इस प्रकार; उक्त्वा--कह कर; मिधिलामू--मिथिला ( विदेह राज्य की राजधानी ); राजन्--हे राजा ( परीक्षित ); विवेश--प्रवेश किया; यदु-नन्दन:--यदुवंशी बलराम ने |
'मैं विदेह के राजा से भेंट करना चाहता हूँ क्योंकि वे मेरे अत्यन्त प्रिय हैं।
' हे राजन, यहकह कर, प्रिय यदुवंशी बलराम ने मिथिला नगरी में प्रवेश किया।
त॑ दृष्ठा सहसोत्थाय मैथिलः प्रीतमानसः ।
अ्हयां आस विधिवदर्हणीयं समर्ईहणै: ॥
२५॥
तमू--उसको, बलराम को; दृष्टा--देख कर; सहसा--तुरन््त; उत्थाय--उठ कर; मैथिल:--मिथिला के राजा ने; प्रीत-मानस:--स्नेह का अनुभव करते हुए; अर्हयाम् आस--उनका आदर किया; विधि-वत्--शास्त्रीय आदेशों के अनुसार; अहंणीयम्--पूज्य;समर्हणै:--पूजा-सामग्री से
जब मिथिला के राजा ने बलराम को समीप आते देखा तो वह तुरन्त अपने आसन से उठखड़ा हुआ।
राजा ने बड़े प्रेम से विशद पूजा करके परम आरशरध्य प्रभु का सम्मान शास्त्रीयआदेशों के अनुसार किया।
उवास तस्यां कतिचिन्मिथिलायां समा विभु: ।
मानितः प्रीतियुक्तेन जनकेन महात्मना ।
ततोशिक्षद्गदां काले धार्तराष्ट्र: सुयोधन: ॥
२६॥
उवास--रहे; तस्यामू--उस; कतिचित्--कई; मिथिलायाम्--मिथिला में; समा: --वर्ष; विभु:--सर्वशक्तिमान श्री बलराम;मानितः--सम्मानित; प्रीति-युक्तेन--वत्सल; जनकेन--राजा जनक ( विदेह ) द्वारा; महा-आत्मना--महात्मा; ततः--तब;अशिक्षत्--सीखा; गदाम्--गदा; काले--समय में; धार्तराष्ट्र: -- धृतराष्ट्र के पुत्र; सुयोधन:--दुर्योधन ने |
सर्वशक्तिमान भगवान् बलराम अपने प्रिय भक्त जनक महाराज से सम्मानित होकर मिथिलामें कई वर्षों तक रुके रहे।
इसी समय धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन ने बलराम से गदा युद्ध करने कीकला सीखी।
केशवो द्वारकामेत्य निधनं शतधन्वन: ।
अप्राप्ति च मणे: प्राह प्रियाया: प्रियकृद्धिभु: ॥
२७॥
केशव: --कृष्ण; द्वारकाम्-द्वारका में; एत्य-- आकर; निधनम्--मृत्यु; शतधन्वन:--शतधन्वा की; अप्राप्तिमू--न मिलने से;च--तथा; मणे:--मणि; प्राह--कहा; प्रियाया:--अपनी प्रियतमा ( सत्यभामा ) के ; प्रिय--आनन्दित; कृत्--करते हुए;विभु:--सर्वशक्तिमान प्रभु |
भगवान् केशव द्वारका आये और उन्होंने शतधन्वा की मृत्यु तथा स्यमन््तक मणि को खोजपाने में अपनी असफलता का विवरण दिया।
वे इस तरह बोले जिससे उनकी प्रियतमा सत्यभामाप्रसन्न हो सकें।
ततः स कारयामास क्रिया बन्धो्हतस्य वे ।
साकं सुहद्धिर्भगवान्या या: स्युः साम्परायिकी: ॥
२८॥
ततः--तब; सः--उसने, कृष्ण ने; कारयाम् आस--सम्पन्न कराया; क्रिया--अनुष्ठान कर्म; बन्धो: --अपने सम्बन्धी( सत्राजित ) का; हतस्थ--मारे गये; वै--निस्सन्देह; साकमू--साथ साथ; सुहृद्धिः--शुभचिन्तकों के; भगवान्-- भगवान्; याःया:--जो जो; स्युः--होना चाहिए; साम्परायिकी: --इस संसार से कूच करने के समय ।
तब भगवान् कृष्ण ने अपने मृत सम्बन्धी सत्राजित के लिए विविध अन्तिम संस्कार सम्पन्नकराये।
भगवान् परिवार के शुभचिन्तकों के साथ शवसयात्रा में सम्मिलित हुए।
अक्रूरः कृतवर्मा च श्रुत्वा शतधनोर्वधम् ।
व्यूषतुर्भयवित्रस्तौ द्वारकाया: प्रयोजकौ ॥
२९॥
अक्रूरः कृतवर्मा च--अक्रूर तथा कृतवर्मा; श्रुत्वा--सुनकर; शतधनो: --शतधन्वा का; वधम्--वध; व्यूषतु:--बाहर चले गये;भय-वित्रस्तौ-- भय से त्रस्त; द्वारकाया:--द्वारका से; प्रयोजकौ--उकसाने वाले।
जब अक्रूर तथा कृतवर्मा ने, जिन्होंने शुरू में श़तधन्वा को अपराध करने के लिए उकसाया था, यह सुना कि वह मारा गया है, तो वे भय के कारण द्वारका से भाग गये और उन्होंने अन्यत्रजाकर शरण ली।
अक्रूरे प्रोषितेउरिष्टान्यासन्वै द्वारौकसाम् ।
शारीरा मानसास्तापा मुहुर्देविकभौतिका: ॥
३०॥
अक्रे--अक्रूर के; प्रोषिते--प्रवास में रहते हुए; अरिष्टानि--अपशकुन; आसनू--उत्पन्न हुए; बै--निस्सन्देह; द्वारका-ओकसामू--द्वारकावासियों के लिए; शारीरा:--शारीरिक; मानस:--तथा मानसिक; तापा:ः--कष्ट; मुहुः--बारम्बार; दैविक--उच्चतर शक्तियों द्वारा उत्पन्न; भौतिकाः--अन्य प्राणियों द्वारा उत्पन्न
अक्रूर की अनुपस्थिति में द्वारका में तमाम अपशकुन होने लगे और वहाँ के निवासीशारीरिक तथा मानसिक कष्टों के अतिरिक्त दैविक तथा भौतिक उत्पातों से भी त्रस्त रहने लगे।
इत्यज्रोपदिशन्त्येके विस्मृत्य प्रागुदाहतम् ।
मुनिवासनिवासे किं घटेतारिष्टदर्शनम् ॥
३१॥
इति--इस प्रकार; अड्र--हे प्रिय ( राजा परीक्षित ); उपदिशन्ति--प्रस्ताव कर रहे थे; एके--कुछ; विस्मृत्य-- भूल कर;प्राकु--पूर्वकाल में; उदाहतम्--कहा गया; मुनि--मुनियों के; वास--आवास में; निवासे--में रहते हुए; किम्--कैसे;घटेत--घटित हो सकती हैं; अरिष्ट--विपत्तियाँ; दर्शनम्--प्राकट्य |
कुछ लोगों ने प्रस्तावित तो किया
कि ये विपत्तियाँ अक्रूर की अनुपस्थिति के कारण हैं :किन्तु वे भगवान् की उन महिमाओं को भूल गए थे, जिनका वर्णन बे प्राय: स्वयं किया करतेथे।
निस्सन्देह उस स्थान में विपत्तियाँ कैसे आ सकती हैं, जहाँ समस्त मुनियों के आश्रय रूपभगवान् निवास करते हों ?
देवेउवर्षति काशीशः श्रफल्कायागताय वै ।
स्वसुतां गाण्दिनीं प्रादात्ततोवर्षत्स्म काशिषु ॥
३२॥
देवे--जब देवता, इन्द्र; अवर्षति--वर्षा नहीं करता था; काशी-ईश: --वाराणसी का राजा; श्रफल्काय-- श्रफल्क ( अक्रूर केपिता ) को; आगताय--आये हुए; बै--निश्चय ही; स्व--अपनी; सुताम्-- पुत्री; गान्दिनीम--गान्दिनी को; प्रादात्ू--दे दिया;ततः--तब; अवर्षत्--वर्षा हुई; स्म--निस्सन्देह; काशिषु--काशी राज्य में |
बड़े बूढ़ों ने कहा : पूर्वकाल में जब इन्द्र ने काशी ( बनारस ) पर वर्षा करनी बन्द करदी तो उस शहर के राजा ने अपनी पुत्री गान्दिनी श्रफल्क को दे दी जो उस समय उससे मिलनेआया था।
तब तुरन्त ही काशी राज्य में वर्षा हुई।
तत्सुतस्तत्प्रभावोसावक्रूरो यत्र यत्र ह ।
देवोभिवर्षते तत्र नोपतापा न मारीका: ॥
३३॥
तत्--उसका ( श्रफल्क का ); सुतः--पुत्र; तत्-प्रभाव: --उसकी शक्ति से सम्पन्न; असौ--वह; अक्रूर:--अक्रूर; यत्र यत्र--जहाँ जहाँ; ह--निस्सन्देह; देव:--इन्द्र; अभिवर्षते--वर्षा करेगा; तत्र--वहाँ; न--नहीं; उपतापा:--कष्टप्रद उत्पात; न--नहीं;मारिका:ः--असामयिक मृत्युएँ।
जहाँ भी इन्द्र के ही समान शक्तिशाली उसका बेटा अक्रूर ठहरता है, वहीं वह पर्याप्त वर्षाकरेगा।
निस्सन्देह, वह स्थान समस्त कष्टों तथा असामयिक मृत्युओं से रहित हो जायेगा।
इति वृद्धवच: श्रुत्वा नेतावदिह कारणम् ।
इति मत्वा समानाय्य प्राहाक्रूरं जनार्दन: ॥
३४॥
इति--इस प्रकार; वृद्ध--वृद्धजनों के; बच:--शब्द; श्रुत्वा--सुनकर; न--नहीं; एतावत्--एकमात्र यह; इह--विचाराधीनबात का; कारणम्--कारण; इति--इस प्रकार; मत्वा--मान कर; समानाय्य--उसे वापस लाकर; प्राह--कहा; अक्रूरम्--अक्ूर से; जनार्दन: -- भगवान् कृष्ण ने
वृद्धजनों से ये वचन सुनकर भगवान् जनार्दन ने यह जानते हुए कि अपशकुनों का एकमात्रकारण अक्रूर की अनुपस्थिति नहीं थी, उन्हें द्वारका वापस बुलवाया और उनसे बोले।
'पूजयित्वाभिभाष्यैनं कथयित्वा प्रिया: कथा: ।
विज्ञाताखिलचित्त ज्ञ: स्मयमान उवाच ह ॥
३५॥
ननु दानपते न्यस्तस्त्वय्यास्ते शतधन्वना ।
स्यमन्तको मणि: श्रीमान् विदितः पूर्वमेव नः ॥
३६॥
पूजयित्वा--आदर करके; अभिभाष्य--सत्कार करके; एनम्--उसको ( अक्ूर को ); कथयित्वा--विचार-विमर्श करके;प्रियाः--मधुर; कथा:--कथाएँ; विज्ञात--पूर्णतया अवगत; अखिल--सारी बातों का; चित्त--( अक्रूर का ) हृदय; ज्ञ:--जानने वाले; स्मयमान: --हँसते हुए; उवाच ह--कहा; ननु--निश्चय ही; दान--दान के; पते--हे स्वामी; न्यस्त:--रखा गया;त्वयि--तुम्हारे संरक्षण में; आस्ते--है; शतधन्वना--शतथन्वा द्वारा; स्थमन्तक: मणि:--स्यमंतक मणि; श्री-मान्ू--ऐश्वर्यवान्;विदितः--ज्ञात; पूर्वमू--पहले ही; एब--निस्सन्देह; नः--हमारे द्वारा |
भगवान् कृष्ण ने अक्रूर का स्वागत-सत्कार किया, उनका गोपनीय तौर पर अभिवादनकिया और उनसे मधुर शब्द कहे।
तब हर बात जानने वाले होने के कारण भगवान्, जो किअक्रूर के हृदय से भलीभाँति अवगत थे, हँसे और उनको सम्बोधित किया, 'हे दानपति, अवश्यही वह ऐश्वर्यशाली स्यमन्तक मणि शतथन्वा तुम्हारे संरक्षण में छोड़ गया था और अब भी तुम्हारेपास है।
असल में, हम इसे लगातार जानते रहे हैं।
'सत्राजितोनपत्यत्वादगृह्ीयुर्दुहितु: सुता: ।
दायं निनीयाप: पिण्डान्विमुच्यर्ण च शेषितम् ॥
३७॥
सत्राजित:--सत्राजित के; अनपत्यत्वात्-पुत्ररहित होने से; गृह्लीयु:--लेना चाहिए; दुहितु:--उसकी पुत्री के; सुता:--पुत्रों को;दायमू्--उत्तराधिकार; निनीय--अर्पित करके; आप:--जल; पिण्डान्ू--तथा पिंडदान; विमुच्य--ऋण चुका कर; ऋणम्--ऋण, कर्जा; च--तथा; शेषितम्--शेष |
'चूँकि सत्राजित के कोई पुत्र नहीं है, अतः उसकी पुत्री के पुत्र उसके उत्तराधिकारी होंगे।
उन्हें ही श्राद्ध के निमित्त तर्पण तथा पिण्डदान करना चाहिए, अपने नाना का ऋण चुकताकरना चाहिए और शेष धन अपने लिए रखना चाहिए।
तथापि दुर्धरस्त्वन्यैस्त्वय्यास्तां सुत्रते मणि: ।
किन्तु मामग्रज: सम्यड्न प्रत्येति मणिं प्रति ॥
३८॥
दर्शयस्व महाभाग बन्धूनां शान्तिमावह ।
अव्युच्छिन्ना मखास्तेउद्य वर्तन्ते रुक्मवेदयः ॥
३९॥
तथा अपि--तो भी; दुर्धर:--धारण करना असम्भव; तु--लेकिन; अन्यै:--दूसरों के द्वारा; त्वयि--तुम्हारे पास; आस्ताम्--रहना चाहिए; सुब्रते--हे विश्वसनीय व्रतधारी; मणि:--मणि; किन्तु--केवल; मम्--मुझ पर; अग्र-ज:--मेरे बड़े भाई;सम्यक्--पूरी तरह; न प्रत्येति--विश्वास करते हैं; मणिम् प्रति--मणि के सम्बन्ध में; दर्शयस्व-- इसे दिखला दो; महा-भाग--हे परम भाग्यशाली; बन्धूनाम्--मेरे सम्बन्धियों को; शान्तिमू--शान्ति; आवह--लाओ; अव्युच्छिन्ना:--अविच्छिन्न; मखा:--यज्ञ; ते-- तुम्हारे; अद्य--अब; वर्तन्ते--चल रहे हैं; रुक्म--सोने की; वेदय:--वेदियों वाले |
'तो भी, हे विश्वासपात्र अक्रूर, यह मणि तुम्हारे संरक्षण में रहना चाहिए क्योंकि अन्य कोईइसे सुरक्षित नहीं रख सकता।
बस एक बार यह मणि दिखला दो क्योंकि मैंने इसके विषय मेंअपने अग्रज से जो कुछ कहा है वे उस पर पूरी तरह विश्वास नहीं करते।
इस तरह हे परमभाग्यशाली, तुम मेरे सम्बन्धियों को शान्त कर सकोगे।
हर व्यक्ति जानता है कि मणि तुम्हारेपास है क्योंकि तुम इस समय लगातार सोने की बनी वेदिकाओं में यज्ञ सम्पन्न कर रहे हो।
'एवं सामभिरालब्ध: श्रफल्कतनयो मणिम् ।
आदाय वाससाच्छन्न: ददौ सूर्यसमप्रभम् ॥
४० ॥
एवम्--इस प्रकार; सामभि:--समन्वयात्मक, सन्धिपूर्ण; आलब्ध:--धिक्कारा हुआ; श्रफल्क-तनय:--श्रफल्क का पुत्र;मणिम्--स्यमन्तक मणि को; आदाय--लेकर; वाससा--अपने वस्त्र में; आच्छन्न:--छिपाया हुआ; ददौ--दे दिया; सूर्य--सूर्यके; सम--समान; प्रभम्ू--तेज
इस तरह भगवान् कृष्ण के समन्वयात्मक शब्दों से लज्जित होकर श्रफल्क-पुत्र उस मणिको वहाँ से निकाल कर ले आया जहाँ उसने अपने वस्त्रों में छिपा रखा था और उसे भगवान् कोदे दिया।
यह चमकीला मणि सूर्य की तरह चमक रहा था।
स्यमन्तकं दर्शयित्वा ज्ञातिभ्यो रज आत्मनः ।
विमृज्य मणिना भूयस्तस्मै प्रत्यर्पयत्प्रभु; ॥
४१॥
स्यमन्तकम्--स्यमन्तक मणि को; दर्शयित्वा--दिखलाकर; ज्ञातिभ्य:-- अपने सम्बन्धियों को; रज:--कल्मष; आत्मन: --अपने ( झूठा थोपा हुआ ); विमृज्य--पोंछ कर; मणिना--मणि से; भूयः--पुनः ; तस्मै--उसको, अक्रूर को; प्रत्यर्पयत्--देदिया; प्रभु;--भगवान् ने |
अपने सम्बन्धियों को स्थमन््तक मणि दिखला चुकने के बाद सर्वशक्तिमान भगवान् ने अपनेविरुद्ध लगे झूठे आक्षेपों को दूर करते हुए उसे अक्रूर को लौटा दिया।
यस्त्वेतद्धगवत ई श्वरस्य विष्णो-वीर्याढ्यं वृजिनहरं सुमड्रलं च ।
आख्यानं पठति श्रुणोत्यनुस्मरेद्दादुष्कीर्ति दुरितमपोह्य याति शान्तिम्ू ॥
४२॥
यः--जो भी; तु--निस्सन्देह; एतत्--यह; भगवतः -- भगवान् का; ईश्वरस्थ--परम नियन्ता; विष्णो: --विष्णु का; वीर्य--पराक्रम से; आढ्यम्--समृद्ध; वृजिन--पापपूर्ण फल; हरम्--दूर करने वाला; सु-मड्रलम्--अत्यन्त शुभ; च--तथा;आख्यानमू--कथानक; पठति--पढ़ता है; श्रूणोति--सुनता है; अनुस्मरेत्--स्मरण करता है; वा--अथवा; दुष्कीर्तिम्--अपकीर्ति; दुरितम्--तथा पाप को; अपोह्य--दूर करके; याति--प्राप्त करता है; शान्तिमू--शान्ति |
यह आख्यान, जो भगवान् विष्णु के पराक्रम के वर्णनों से युक्त है, पापपूर्ण फलों को दूरकरता है और समस्त मंगल प्रदान करता है।
जो कोई भी इसे पढ़ता, सुनता या स्मरण करता है,वह अपनी अपकीर्ति तथा पापों को भगा सकेगा और शान्ति प्राप्त करेगा।
