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अध्याय तिरपनवां: कृष्ण ने रुक्मिणी का अपहरण कर लिया
10.53श्रीशुक उबाचवैदर्भ्या: स तु सन्देशं निशम्य यदुनन्दनः ।
प्रगृह्य पाणिना पाणिं प्रहसन्निदमब्रवीत् ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; वैदर्भ्या:--विदर्भ की राजकुमारी का; सः--वह; तु--तथा; सन्देशम्--गुप्तसन्देश; निशम्य--सुनकर; यदु-नन्दन:--यदुवंशी श्रीकृष्ण ने; प्रगृह्य--पकड़ कर; पाणिना--अपने हाथ से; पाणिम्--हाथ( ब्राह्मण-दूत का ); प्रहसन्--मुसकाते हुए; इृदम्--यह; अब्रवीतू-- कहा |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस तरह कुमारी वैदर्भी का गुप्त सन्देश सुनकर यदुनन्दन नेब्राह्मण का हाथ अपने हाथ में ले लिया और मुसकाते हुए उससे इस प्रकार बोले।
श्रीभगवानुवाचतथाहमपि तच्चित्तो निद्रां च न लभे निशि ।
वेदाहग्रुक्मिणा द्वेषान्ममोद्दाहों निवारित: ॥
२॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; तथा--इसी तरह से; अहम्--मैं; अपि-- भी; तत्--उस पर स्थिर किये; चित्त: --अपनेमन को; निद्रामू--नींद; च--तथा; न लभे--नहीं पाता; निशि--रात में; वेद--जानता हूँ; अहम्--मैं; रुक्मिणा --रुक्मी द्वारा;द्वेषातू-शत्रुतावश; मम--मेरी; उद्बाह: --विवाह; निवारित:--रोका गया।
भगवान् ने कहा : जिस तरह रुक्मिणी का मन मुझ पर लगा है उसी तरह मेरा मन उस परलगा है।
मैं रात में सो तक नहीं सकता।
मैं जानता हूँ कि द्वेषवश रुक््मी ने हमारा विवाह रोकदिया है।
तामानयिष्य उन्मथ्य राजन्यापसदान्मृधे ॥
मत्परामनवद्याड्रमेधसो ग्नेशिखामिव ॥
३॥
तामू--उसको; आनयिष्ये--मैं यहाँ लाऊँगा; उन्मथ्य--मथ कर; राजन्य--राजवर्ग के; अपसदानू--अयोग्य सदस्यों को;मृधे--युद्ध में; मत्--मेरे प्रति; पराम्-पूर्णतया समर्पित; अनवद्य--निर्विवाद; अड्जीम्--शारीरिक सौन्दर्य वाली को; एधस:--अग्नि जलाने वाला काष्ठ; अग्नि--अग्नि की; शिखाम्ू--लपटों; इब--सहृश |
वह अपने आपको एकमात्र मेरे प्रति समर्पित कर चुकी है और उसका सौन्दर्य निष्कलंक है।
मैं उन अयोग्य राजाओं को युद्ध में उसी तरह मथ कर उसे यहाँ लाऊँगा जिस तरह काठ सेप्रज्वलित अग्नि उत्पन्न की जाती है।
श्रीशुक उबाचउद्धाहर्श्न च विज्ञाय रुक्मिण्या मधुसूदन: ।
रथ: संयुज्यतामाशु दारुकेत्याह सारथिम् ॥
४॥
श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; उद्बाह--विवाह की; ऋशक्षम्--लग्न; च--तथा; विज्ञाय--जान कर;रुक्मिण्या:--रुक्मिणी के; मधुसूदन:--भगवान् कृष्ण ने; रथ:--रथ; संयुज्यताम्ू--जोता जाय; आशु--तुरनन््त; दारूक--हेदारूक; इति--इस प्रकार; आह--कहा; सारथिम्--अपने सारथी से
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : भगवान् मधुसूदन रुक्मिणी के विवाह की सही सही लग्न कासमय भी समझ गये।
अतः उन्होंने अपने सारथी से कहा, 'हे दारुक, मेरा रथ तुरन्त तैयारकरो।
सचाश्वै: शैब्यसुग्रीवमेघपुष्पललाहकै: ।
युक्त रथमुपानीय तस्थौ प्राज्ललिरग्रत: ॥
५॥
सः--वह, दारुक; च--तथा; अश्वै:--घोड़ों से; शैब्य-सुग्रीव-मेघपुष्प-बलाहकै: --शैब्य, सुग्रीव, मेघपुष्प तथा बलाहकनामक; युक्तम्--जोता; रथम्--रथ को; उपानीय--लाकर; तस्थौ--खड़ा हुआ; प्राज्ललिः--आदरपूर्वक हाथ जोड़ कर;अग्रतः--सामने
दारुक भगवान् का रथ ले आया जिसमें शैब्य, सुग्रीव, मेघपुष्प तथा बलाहक नामक घोड़ेजुते थे।
फिर वह अपने हाथ जोड़ कर भगवान् कृष्ण के सामने खड़ा हो गया।
आरुह्य स्यन्दनं शौरिद्विजमारोप्य तूर्णगैः ।
आनर्तादेकरात्रेण विदर्भानगमद्धयै: ॥
६॥
आरुह्म--चढ़ कर; स्यन्दनम्--अपने रथ में; शौरि:--कृष्ण; द्विजम्--ब्राह्मण को; आरोप्य--बैठाकर; तूर्ण-गैः--तेज;आनर्तातू--आनर्त जिले से; एक--एकही; रात्रेण--रात में; विदर्भान्ू--विदर्भ राज्य तक; अगमत्--गये; हयैः--अपने घोड़ोंसेभगवान् शौरि अपने रथ में सवार हुए और फिर ब्राह्मण को चढ़ाया।
तत्पश्चात् भगवान् केतेज घोड़े एक रात में ही उन्हें आनर्त जिले से विदर्भ ले गये।
राजा स कुण्डिनपतिः पुत्रस्नेहवशानुग: ।
शिशुपालाय स्वां कन्यां दास्यन्कर्माण्यकारयत् ॥
७॥
राजा--राजा; सः--वह, भीष्मक; कुण्डिन-पति:--कुण्डिन का स्वामी; पुत्र--अपने पुत्र के; स्नेह--स्नेह के; वश--वशीभूत;अनुग:--आज्ञापालन करते हुए; शिशुपालाय--शिशुपाल को; स्वाम्--अपनी; कन्याम्--पुत्री; दास्यनू-देने ही वाला;कर्माणि--आवश्यक कार्य; अकारयत्--कर चुका था
कुण्डिन का स्वामी राजा भीष्मक अपने पुत्र के स्नेह के वशीभूत होकर अपनी कन्याशिशुपाल को देने ही वाला था।
राजा ने समस्त आवश्यक तैयारियाँ पूरी कर ली थीं।
पुरं सम्मृष्टसंसिक्तमार्गरथ्याचतुष्पथम् ।
चित्रध्वजपताकाभिस्तोरणै: समलड्डू तम् ॥
८॥
स््रग्गन्धमाल्याभरणैर्विरजोम्बरभूषितै: ।
जुष्ट स्त्रीपुरुषै: श्रीमद्गृहैरगुरुधूपिते: ॥
९॥
पुरम्ू--नगरी को; सम्पृष्ट--अच्छी तरह साफ कराया; संसिक्त--तथा जल छिड़काया; मार्ग--मुख्य सड़कें; रथ्या--व्यावसायिक सड़कें; चतु:-पथम्--तथा चौराहों को; चित्र--रंगबिरंगे; ध्वज--झंडियों; पताकाभि:--पताकाओं से; तोरणै: --तथा गोल दरवाजों से; समलड्डू तम्ू--सजाया; सत्रकू--रत्लजटित हारों से; गन्ध--सुगन्धित वस्तुएँ, यथा चन्दन-लेप; माल्य--'फूल की मालाएँ; आभरणै:--तथा अन्य आभूषणों से; विरज:--स्वच्छ; अम्बर--वस्त्र से; भूषितैः--सजाये गये; जुष्टम्--युक्त; स्त्री--स्त्रियों; पुरुष: --तथा पुरुषों से; श्री-मत्--ऐश्वर्यवान्; गृहैः--घरों से; अगुरु-धूपितैः--अगुरु धूप से सुगन्धित।
राजा ने मुख्य मार्गों, व्यापारिक सड़कों तथा चौराहों को ठीक से साफ कराया और तब उनपर जल छिड़कवाया।
उसने विजय तोरणों तथा खंभों पर रंगबिरंगी झंडियों से नगर को सजवाया।
नगर के स्त्री-पुरुषों ने साफ-सुथरे वस्त्र पहने और अपने अपने शरीरों पर सुगन्धितचन्दन-लेप लगाया और बहुमूल्य हार, फूल की मालाएँ तथा रलजटित आभूषण धारण किये।
उनके भव्य घर अगुरु की सुगन्ध से भर गये।
पितृन्देवान्समभ्यर्च्य विप्रांश्व विधिवन्नप ।
भोजयित्वा यथान्यायं वाचयामास मड़़लम् ॥
१०॥
पितृन्--पूर्वजों; देवान्ू--देवतागण; समभ्यर्च्य--ठीक से पूजा की; विप्रान्--ब्राह्मणों को; च--तथा; विधि-बत्--विधि-विधानों के अनुसार; नृप--हे राजा ( परीक्षित ); भोजयित्वा-- भोजन कराकर; यथा--जिस तरह; न्यायम्ू--उचित है; वाचयाम्आस--उच्चारित किया था; मड़लम्--शुभ मंत्र
हे राजनू, महाराज भीष्मक ने पितरों, देवताओं तथा ब्राह्मणों को भलीभाँति भोजन कराकरउनकी विधिवत पूजा की।
तत्पश्चात् उसने दुलहन के मंगल के लिए परम्परागत मंत्रों का उच्चारणकरवाया।
सुस्नातां सुद्ती कन्यां कृतकौतुकमड्लाम् ।
आहतांशुकयुग्मेन भूषितां भूषणोत्तमै: ॥
११॥
सु-स्नातामू--ठीक से स्नान कराई गई; सु-दतीम्--सुन्दर दाँतों वाली; कन्याम्ू--दुलहन को; कृत--सम्पन्न करके; कौतुक-मड्डलाम्--मांगलिक वैवाहिक हार पहनाने का उत्सव; आहत--कोरा; अंशुक--वस्त्र की; युग्मेन--जोड़ी से; भूषिताम्--अलंकृत; भूषण--गहनों से; उत्तमैः--सुन्दर सुन्दर
दुलहन ने अपने दाँत साफ किये और फिर स्नान किया और इसके बाद उसने मांगलिकवैवाहिक हार धारण किया।
तत्पश्चात् उसे उत्तम कोटि के नये वस्त्रों की जोड़ी पहनाई गई औरअत्यन्त सुन्दर रत्तजटित गहनों से सजाया गया।
चक्रुः सामर्ग्यजुर्मन्त्रैरवध्वा रक्षां द्विजोत्तमा: ।
पुरोहितोथर्वविद्वै जुहाव ग्रहशान्तये ॥
१२॥
चक्रुः--किया; साम-ऋगू-यजु:--साम, ऋग तथा यजुर्वेदों के; मन्त्रै:--मंत्रों से; वध्वा:--दुलहन या वधू की; रक्षाम्--रक्षा;द्विज-उत्तम:--उत्तम ब्राह्मण; पुरोहित:ः--पुरोहित; अथर्व-वित्-- अथर्ववेद के मंत्रों में पठु; बै--निस्सन्देह; जुहावब--घी कीआहुति डाली; ग्रह--नियन्ता ग्रहों को; शान्तये--शान्त करने के लिए
उत्तमोत्तम ब्राह्मणजनों ने वधू की रक्षा के लिए ऋगू, साम तथा यजुर्वेदों के मंत्रों काउच्चारण किया और अथर्ववेद में पटु पुरोहित ने नियन्ता ग्रहों को शान्त करने के लिए आहुतियाँदीं।
हिरण्यरूप्य वासांसि तिलांश्व गुडमिश्रितान् ।
प्रादाद्धेनूश्व विप्रेभ्यो राजा विधिविदां वर: ॥
१३॥
हिरण्य--सोना; रूप्य--चाँदी; वासांसि--तथा वस्त्र; तिलानू--तिल; च--तथा; गुड--गुड़; मिश्रितानू--से मिश्रित;प्रादात्ू--दिया; धेनू: --गौवें; च-- भी ; विप्रेभ्य: --ब्राह्मणों को; राजा--राजा भीष्मक ने; विधि--विधि-विधान; विदाम्--जानने वालों में; वर:-- श्रेष्ठ |
राजा ने विधि-विधानों के ज्ञान में दक्ष व अद्वितीय ब्राह्मणों को सोना, चाँदी, वस्त्र, गौवेंतथा गुड़-मिश्रित तिलों की दक्षिणा दी।
एवं चेदिपती राजा दमघोष: सुताय वै ।
कारयामास मन्त्रज् सर्वमभ्युदयोचितम् ॥
१४॥
एवम्--इस प्रकार; चेदि-पति:--चेदि का राजा; राजा दमघोष: --राजा दमघोष ने; सुताय--अपने पुत्र ( शिशुपाल ) के लिए;वै--निस्सन्देह; कारयामू आस--कराया था; मन्त्र-ज्जैः--मंत्र जानने वालों के द्वारा; सर्वम्ू--सबकुछ; अभ्युदय--उसके उत्थानके लिए; उचितमू--उपयुक्त |
चेदि नरेश राजा दमघोष ने भी अपने पुत्र की समृद्धि सुनिश्चित करने के लिए समस्त कृत्योंको सम्पन्न करने के लिए मंत्रोच्चार में पटु ब्राह्मणों को लगाया था।
मदच्युद्धिर्गजानीकै: स्वन्दनैर्देममालिभि: ।
पत्त्यश्वसड्जू लै: सैन्य: परीतः कुण्दीनं ययौ ॥
१५॥
मद--मस्तक से चूने वाला द्रव; च्युद्धिः--चूता हुआ; गज--हाथियों के; अनीकै: --समूह से; स्यन्दनैः--रथों के साथ; हेम--सुनहला; मालिभि:--मालाओं से सुसज्जित; पत्ति--पैदल सैनिकों; अश्व--तथा घोड़ों सहित; सह्ड लैः--एकत्रित; सैन्यैः --सेनाओं द्वारा; परीत:--साथ साथ; कुण्डिनम्-- भीष्यक की राजधानी कुण्डिन में; ययौ--गया |
राजा दमघोष ने मद टपकाते हाथियों, लटकती सुनहरी साँकलों वाले रथों तथा असंख्यघुड़सवार और पैदल सैनिकों के साथ कुण्डिन की यात्रा की।
तं वै विदर्भाधिपति: समभ्येत्याभिपूज्य च ।
निवेशयामास मुदा कल्पितान्यनिवेशने ॥
१६॥
तम्--उस ( दमघोष ) को; बै--दरअसल ; विदर्भ-अधिपति:--विदर्भ के स्वामी भीष्यक ने; समभ्येत्य--बढ़कर अगवानीकरके; अभिपूज्य--आदर करके; च--तथा; निवेशयाम् आस--ठहराया; मुदा--हर्षपूर्वक; कल्पित--बनवाया; अन्य--विशेष; निवेशने-- जनवासे में ।
विदर्भराज भीष्मक नगर से बाहर गये और राजा दमघोष से विशेष सत्कार के प्रतीकों केसाथ मिले।
फिर भीष्मक ने दमघोष को इस अवसर के लिए विशेष रूप से निर्मित आवास- ग्रहमें ठहराया।
तत्र शाल्वो जरासन्धो दन्तवक्रो विदूरथः ।
आजममुश्चद्यपक्षीया: पौण्ड्रकाद्या: सहस्त्रश: ॥
१७॥
तत्र--वहाँ; शाल्व: जरासन्ध: दन्तवक्र: विदूरथ:--शाल्व, जरासन्ध, दन्तवक्र तथा विदूरथ; आजग्मु:--आये; चैद्य--शिशुपालके; पक्षीया:--पक्षधर; पौण्ड्रक--पौण्ड्रक; आद्या:--इत्यादि; सहस्त्रशः--हजारों |
शाल्व, जरासन्ध, दन्तवक्र तथा विदूरथ जो शिशुपाल के समर्थक थे, वे सभी पौण्ड्रक तथाहजारों अन्य राजाओं के साथ आये।
कृष्णरामद्विषो यत्ता: कन्यां चैद्याय साधितुम् ।
यद्यागत्य हरेत्कृष्नो रामाद्यैर्यदुभिवृतः ॥
१८ ॥
योत्स्यामः संहतास्तेन इति निश्चितमानसा: ।
आजममुर्भूभुज: सर्वे समग्रबलवाहना: ॥
१९॥
कृष्ण-राम-द्विष:--कृष्ण तथा बलराम से द्वेष करने वालों ने; यत्ता:--तैयारी की; कन्याम्--दुलहन को; चैद्याय--शिशुपालके लिए; साधितुम्--प्राप्त करने के लिए; यदि--यदि; आगत्य--आकर; हरेत्ू--हरण कर ली जाय; कृष्ण: --कृष्ण; राम--बलराम; आइद्यि:--इत्यादि के द्वारा; यदुभि:--यादवों के; वृतः--साथ में; योत्स्थाम: --हम युद्ध करेंगे; संहताः--साथ होकर;तेन--उसके साथ; इति--इस प्रकार; निश्चित-मानसा: --कृतसंकल्प; आजग्मु:--आये; भू-भुज:--राजा; सर्वे--सभी;समग्र--पूर्ण; बल--सैन्य-शक्ति; वाहना:--तथा वाहनों के साथ |
शिशुपाल को दुलहन दिलाने के लिए कृष्ण तथा बलराम से ईर्ष्या करने वाले राजाओं नेपरस्पर यह निश्चय किया, 'यह कृष्ण यदि बलराम तथा अन्य यदुओं के साथ दुलहन काअपहरण करने यहाँ आता है, तो हम सब मिलकर उससे युद्ध करेंगे।
अतः वे ईर्ष्यालु राजाअपनी सारी सेनाएँ तथा सारे सैन्य वाहन लेकर विवाह में गये।
श्र॒ुत्वैतद्धगवात्रामो विपक्षीय नृपोद्यमम् ।
कृष्णं चैकं गतं हर्तु कन्यां कलहशड्ितः ॥
२०॥
बलेन महता सार्ध भ्रातृस्नेहपरिप्लुतः ।
त्वरित: कुण्डिनं प्रागादगजाश्वरथपत्तिभि: ॥
२१॥
श्रुत्वा--सुनकर; एतत्--यह; भगवान् राम:--बलराम; विपक्षीय--शत्रुपक्ष के; नृूप--राजाओं की; उद्यमम्--तैयारियाँ;कृष्णम्--कृष्ण को; च--तथा; एकम्--अकेला; गतम्--गया हुआ; हर्तुम्--हरण करने केलिए; कन्याम्--कन्या को;कलह--युद्ध की; शद्धित:ः--आशंका से; बलेन--सेना; महता--विशाल; सार्धम्--साथ; भ्रातृ--अपने भाई के प्रति; स्नेह--स्नेह में; परिप्लुत:--निमग्न; त्वरित:--तुरन्त; कुण्डिनम्--कुण्डिन को; प्रागातू--गये; गज--हाथी; अश्व--घोड़े; रथ--रथ;पत्तिभिः--पैदल सेना सहित।
जब बलराम ने विपक्षी राजाओं की इन तैयारियों तथा कृष्ण द्वारा दुलहन का हरण करने केलिए अकेले ही प्रस्थान किये जाने के बारे में सुना तो उन्हें शंका होने लगी कि कहीं युद्ध न ठनजाय।
अत: वे अपने भाई के स्नेह में निमग्न होकर अपनी विशाल सेना के साथ तेजी से कुण्डिनके लिए कूच कर गये।
उनकी सेना में पैदल तथा हाथी, घोड़े और रथ पर सवार सैनिक थे।
भीष्पकन्या वरारोहा कादुक्षन्त्यागमनं हरे: ।
प्रत्यापत्तिमपश्यन्ती द्विजस्यथाचिन्तयत्तदा ॥
२२॥
भीष्प-कन्या-- भीष्मक-पुत्री ने; वर-आरोहा --सुन्दर नितम्बों वाली; काड्क्षन्ती -- प्रतीक्षा करती; आगमनम्--आने की;हरे: --कृष्ण के; प्रत्यापत्तिमू--वापसी; अपश्यन्ती --न देखती हुईं; द्विजस्य--ब्राह्मण की; अचिन्तयत्--सोचा; तदा--तब |
भीष्मक की सुप्रिया पुत्री कृष्ण के आगमन की प्रतीक्षा उत्सुकतापूर्वक कर रही थी किन्तुजब उसने ब्राह्मण को वापस आए हुए नहीं देखा तो उसने इस प्रकार सोचा।
अहो त्रियामान्तरित उद्घाहो मेउल्पराधस: ।
नागच्छत्यरविन्दाक्षो नाहं वेद्म्यत्र कारणम् ।
सोउपि नावर्ततेउद्यापि मत्सन्देशहरो द्विज:ः ॥
२३॥
अहो--हाय; त्रि-याम--तीन पहर ( नौ घंटे ) अर्थात् पूरी रात; अन्तरितः--बीत चुकी; उद्बाह: --विवाह; मे--मेरा; अल्प--अपर्याप्त; राधसः--सौभाग्य; न आगच्छति--नहीं आता है; अरविन्द-अक्ष:--कमल-नेत्रों वाले कृष्ण; न--नहीं; अहम्--मैं;वेद्ि--जानती हूँ; अत्र--इस; कारणम्--कारण के लिए; सः--वह; अपि-- भी; न आवर्तते--नहीं लौटा है; अद्य अपि--अबभी; मत्-मेरे; सन्देश--सन्देश का; हर: --ले जाने वाला; द्विज:--ब्राह्मण |
राजकुमारी रुक्मिणी ने सोचा : हाय! रात बीत जाने पर मेरा विवाह होना है! मैं कितनीअभागिनी हूँ! कमल-नेत्र कृष्ण अभी भी नहीं आये।
मैं नहीं जानती क्यों? यहाँ तक किब्राह्मण-दूत भी अभी तक नहीं लौटा।
अपि मय्यनवद्यात्मा इष्ठा किज्ञिज्जुगुप्सितम् ।
मत्पाणिग्रहणे नूनं नायाति हि कृतोद्यम: ॥
२४॥
अपि--शायद; मयि--मुझमें; अनवद्य--निर्दोष; आत्मा--मन तथा शरीर वाला; दृष्टा--देखकर; किश्ञित्--कुछ कुछ;जुगुप्सितम्ू--घृणित; मत्--मेरा; पाणि--हाथ; ग्रहणे--ग्रहण करने के लिए; नूनम्--निस्सन्देह; न आयाति--नहीं आया है;हि--निश्चय ही; कृत-उद्यम:--पहले ऐसा चाहते हुए भी |
लगता है कि निर्दोष प्रभु ने यहाँ आने के लिए तैयार होते समय भी मुझमें कुछ घृष्णगित बातदेखी हो, जिससे वे मेरा पाणिग्रहण करने नहीं आये।
दुर्भगाया न मे धाता नानुकूलो महेश्वरः ।
देवी वा विमुखी गौरी रुद्राणी गिरिजा सती ॥
२५॥
दुर्भगाया:--अभागी; न--नहीं; मे--मुझ पर; धाता--स्त्रष्टा ( ब्रह्म )विधाता; न--नहीं; अनुकूल:--अनुकूल; महा-ई श्वर: --शिवजी; देवी--देवी ( उनकी प्रिया ); वा--अथवा; विमुखी--विरुद्ध; गौरी--गौरी; रुद्राणी--रुद्र की पत्ती; गिरि-जा--हिमालय की पुत्री; सती--सती, जो पूर्वजन्म में दक्ष पुत्री थी और जिसने अपना शरीर-त्याग किया था।
मैं घोर अभागिनी हूँ क्योंकि न तो स्त्रष्टा विधाता मेरे अनुकूल है, न ही महेश्वर ( शिवजी )अथवा शायद शिव-पत्नी देवी जो गौरी, रुद्राणी, गिरिजा तथा सती नाम से विख्यात हैं, मेरेविपरीत हो गई हैं।
एवं चिन्तयती बाला गोविन्दहतमानसा ।
न््यमीलयत कालन्ना नेत्रे चाश्रुकलाकुले ॥
२६॥
एवम्--इस प्रकार; चिन्तयती--सोचती हुई; बाला--युवती; गोविन्द--कृष्ण द्वारा; हृत--चुराया हुआ; मानसा--मन से;न्यमीलयत--बन्द कर लिया; काल--समय; ज्ञा--जानने वाली; नेत्रे--अपनी आँखें; च--तथा; अश्रु-कला-- आँसू से;आकुले--डबडबाये।
इस तरह से सोच रही तरुण बाला ने, जिसका मन कृष्ण ने चुरा लिया था, यह सोचकर किअब भी समय है, अपने अश्रुपूरित नेत्र बन्द कर लिये।
एवं वध्वा: प्रतीक्षन्त्या गोविन्दागमनं नृप ।
वाम ऊरुर्भुजो नेत्रमस्फुरन्प्रियभाषिण: ॥
२७॥
एवम्--इस प्रकार; वध्वा:--बधु, दुलहन; प्रतीक्षन्त्या: --प्रतीक्षारत; गोविन्द-आगमनम्--कृष्ण का आगमन; नृप--हे राजा( परीक्षित ); वाम:--बाँईं; ऊरु:--जाँघ; भुज:--बाँह; नेत्रमू--तथा आँख; अस्फुरनू--फड़कने लगीं; प्रिय--वांछित;भाषिण:--बताती हुईं |
हे राजनू, जब वह दुलहन गोविन्द के आगमन की इस तरह प्रतीक्षा कर रही थी तो उसे लगाकि उसकी बाईं जाँघ, बाईं भुजा तथा बाईं आँख फड़क रही हैं।
यह इसका संकेत था कि कुछप्रिय घटना घटने वाली है।
अथ कृष्णविनिर्दिष्ट: स एव द्विजसत्तम: ।
अन्तःपुरचरीं देवीं राजपुत्रीम्ददर्श ह ॥
२८ ॥
अथ--तत्पश्चात; कृष्ण-विनिर्दिष्ट:--कृष्ण द्वारा आदेश दिया गया; सः--वह; एव--ही; द्विज--विद्वान ब्राह्मण; सत्-तम:--परम शुद्ध; अन्तः-पुर-- भीतरी महल में; चरीम्--ठहरी हुई; देवीम्--देवी रुक्मिणी को; राज--राजा की; पुत्रीम्-पुत्री को;ददर्श ह--देखातभी
वह शुद्धतम विद्वान ब्राह्मण, कृष्ण के आदेशानुसार दिव्य राजकुमारी रुक्मिणी से भेंटकरने राजमहल के अन्तःपुर में आया।
सातं प्रहष्टवदनमव्यग्रात्मगतिं सती ।
आलक्ष्य लक्षणाभिज्ञा समपृच्छच्छुचिस्मिता ॥
२९॥
स--वह; तम्--उसको; प्रहष्ट--प्रसन्न; वदनम्--मुख वाला; अव्यग्र--व्यग्रतारहित; आत्म--जिसके शरीर की; गतिमू--चाल;सती--साध्वी तरुणी; आलक्ष्य--देखकर; लक्षण--लक्षणों की; अभिज्ञा--जानने वाली; समपृच्छत्-- पूछा; शुचि--शुद्ध;स्मिता--मुसकान सहित |
ब्राह्मण के प्रसन्न मुख तथा शान्त चाल को देखकर ऐसे लक्षणों की दक्ष-व्याख्या करनेवाली साध्वी रुक्मिणी ने शुद्ध मन्द-हास के साथ उससे पूछा।
तस्या आवेदयत्प्राप्त शशंस यदुनन्दनम् ।
उक्त च सत्यवचनमात्मोपनयनं प्रति ॥
३०॥
तस्या:--उससे; आवेदयत्--सूचना दी; प्राप्तम्--आकर; शशंस--बतलाया; यदु-नन्दनम्ू--यदुओं के पुत्र कृष्ण ने; उक्तम्--जो कहा था; च--तथा; सत्य--आश्वासन के; वचनम्--शब्द; आत्म--उसके साथ; उपनयनम्--विवाह के; प्रति--विषय में
ब्राह्मण ने उनसे यदुनन्दन के आगमन की सूचना सुनाई और उनके साथ विवाह करने केभगवान् के वचन को कह सुनाया।
तमागतं समाज्ञाय बैदर्भी हृष्टमानसा ।
न पश्यन्ती ब्राह्मणाय प्रियमन्यन्ननाम सा ॥
३१॥
तम्--उसको, कृष्ण को; आगतम्--आया हुआ; समाज्ञाय-- अच्छी तरह समझकर; बैदर्भी--रुक्मिणी; हष्ट--प्रफुल्लित;मानसा--मन वाली; न पश्यन्ती--न देखती हुई; ब्राह्यणाय--ब्राह्मण को; प्रियम्--प्रिय; अन्यत्--कुछ और; ननाम--नमस्कारकिया; सा--उसने |
राजकुमारी वैदर्भी कृष्ण का आगमन सुनकर अत्यधिक प्रसन्न हुई।
पास में देने योग्य कोईउपयुक्त वस्तु न पाकर उसने ब्राह्मण को केवल नमस्कार किया।
प्राप्तौ श्रुत्वा स्वदुहितुरुद्वाहप्रेक्षणोत्सुकौ ।
अभ्ययात्तूर्यघोषेण रामकृष्णौ समईहणै: ॥
३२॥
प्राप्ती--आया हुआ; श्रुत्वा--सुनकर; स्व--अपनी ( मेरी ); दुहितु:--पुत्री का; उद्बाह--विवाह; प्रेक्षण--देखने के लिए;उत्सुकौ--उत्सुक; अभ्ययात्--आगे आया; तूर्य--बाजे; घोषेण--शब्द से; राम-कृष्णौ--बलराम तथा कृष्ण के पास;समर्ईणै:--पर्याप्त भेंटों सहित |
जब राजा ने सुना कि कृष्ण तथा बलराम आये हैं और वह उसकी पुत्री का विवाह देखने केलिए उत्सुक हैं, तो वह बाजे-गाजे के साथ उनका सत्कार करने के लिए पर्याप्त भेंटें लेकर आगेबढ़ा।
मधुपर्कमुपानीय वासांसि विरजांसि सः ।
उपायनान्यभीष्टानि विधिवत्समपूजयत् ॥
३३॥
मधु-पर्कम्--दूध तथा शहद का मिश्रण; उपानीय--लेकर; वासांसि-- वस्त्र; विरजांसि-- स्वच्छ; सः --उसने; उपायनानि--भेंटें; अभीष्टानि-- वांछित; विधि-वत्--शास्त्रीय विधियों के अनुसार; समपूजयत्-पूजा की।
उन्हें मधुपर्क, नये वस्त्र तथा अन्य वांछित भेंटें देकर उसने निर्धारित विधियों के अनुसारउनकी पूजा की।
तयोर्निवेशनं श्रीमदुपाकल्प्य महामतिः ।
ससैन्ययो: सानुगयोरातिथ्यं विदधे यथा ॥
३४॥
तयो:--दोनों के लिए; निवेशनम्--ठहरने का स्थान; श्री-मत्--ऐश्वर्यशाली, भव्य; उपाकल्प्य--व्यवस्था करके; महा-मतिः--उदार; स--सहित; सैन्ययो:--उनके सैनिकों; स--सहित; अनुगयो:--उनके निजी संगियों; आतिथ्यम्--सत्कार;विदधे--किया; यथा--उचित रीति से
उदार राजा ने दोनों प्रभुओं के लिए तथा उनकी सेना एवं उनके संगियों के लिए भव्यआवासों की व्यवस्था की।
इस तरह उसने उनको समुचित आतिथ्य प्रदान किया।
एवं राज्ञां समेतानां यथावीर्य यथावय: ।
यथाबलं यथावित्तं सर्व: कामैः समरहयत् ॥
३५॥
एवम्---इस प्रकार; राज्ञामू--राजाओं के लिए; समेतानाम्--एकत्र हुए; यथा--के अनुसार; वीर्यम्ू--उनके पराक्रम; यथा--केअनुसार; वबः--उनकी आयु; यथा--के अनुसार; बलमू--उनकी शक्ति; यथा--के अनुसार; वित्तम्ू--उनकी सम्पत्ति; सर्वै:--समस्त; कामै:--इच्छित वस्तुओं से; समर्हयत्--उनका आदर किया |
इस तरह भीष्मक ने इस अवसर पर एकत्र हुए राजाओं को सारी वांछित वस्तुएँ प्रदान कींऔर उनकी राजनैतिक शक्ति, आयु, शारीरिक बल तथा सम्पत्ति के अनुसार उनका सम्मान किया।
कृष्णमागतमाकर्णय्य विदर्भपुरवासिन: ।
आगत्य नेत्राज्जलिभि: पपुस्तन्मुखपड्डजम् ॥
३६॥
कृष्णम्--कृष्ण को; आगतम्--आया हुआ; आकर्ण्य--सुनकर; विदर्भ-पुर--विदर्भ की राजधानी के; वासिन:--निवासी;आगत्य--आकर; नेत्र--अपनी आँखों की; अज्ञलिभि: --अंजुलियों से; पपु:--पिया; तत्--उसका; मुख--मुँह; पड्डजम्--कमल।
जब विदर्भवासियों ने सुना कि भगवान् कृष्ण आए हैं, तो वे सब उनका दर्शन करने गये।
अपनी आँखों की अंजुली से उन्होंने उनके कमलमुख के मधु का पान किया।
अस्यैव भार्या भवितुं रुक्मिण्यहति नापरा ।
असावप्यनवद्यात्मा भैष्या: समुचितः पति: ॥
३७॥
अस्य--उसकी; एव--एकमात्र; भार्या--पत्नी; भवितुम्-होने के लिए; रुक्मिणी--रुक्मिणी; अर्हति--पात्र है; न अपरा--कोई दूसरी नहीं; असौ--वह; अपि-- भी; अनवद्य--निर्दोष; आत्मा--स्वरूप; भैष्म्या:--भीष्मक की पुत्री के लिए;समुचित:--उपयुक्त; पति:--पति।
नगरवासियों ने कहा एकमात्र रुक्मिणी उनकी पत्नी बनने के योग्य हैं और वे भीदोषरहित सौन्दर्यवान होने से राजकुमारी भेष्मी के लिए एकमात्र उपयुक्त पति हैं।
किश्ञित्सुचरितं यन्नस्तेन तुष्टस्त्रलोककृत् ।
अनुगृह्वातु गृह्नातु वैदर्भ्या: पाणिमच्युत: ॥
३८ ॥
किझ्जित्--तनिक भी; सु-चरितम्--पुण्य कर्म; यत्ू--जो भी; न:--हमारे; तेन--उसी से; तुष्ट:--संतुष्ट; त्रि-लोक--तीनोंलोक का; कृत्--स्त्रष्टा, विधाता; अनुगृह्वातु--दया दिखलाये; गृह्नातु--जिससे ग्रहण करे; वैदर्भ्या:--रुक्मिणी का; पाणिमू--हाथ; अच्युत:--कृष्ण |
हम लोगों ने जो भी पुण्य कर्म किये हों उनसे तीनों लोकों के स्त्रष्टा अच्युत प्रसन्न हों और वेवैदर्भी का पाणिग्रहण करने की अनुकम्पा दिखलायें।
एवं प्रेमकलाबद्धा वदन्ति सम पुरौकसः ।
कन्या चान्तःपुराद्रागाद्धटैर्गुप्ताम्बिकालयम् ॥
३९॥
एवम्--इस प्रकार; प्रेम--शुद्ध प्रेम की; कला--वृद्ध्ि से; बद्धा:--बँधे हुए; वदन्ति स्म--बोल रहे थे; पुरओकसः --नगरनिवासी; कन्या--दुलहन; च--तथा; अन्तः-पुरातू--अन्तःपुर से; प्रागातू--बाहर गई; भटैः--अंगरक्षकों द्वारा; गुप्ता--रक्षित; अम्बिका-आलयमू--देवी अम्बिका के मन्दिर तक।
अपने उमड़ते प्रेम से बँध कर नगर के निवासी इस तरह की बातें कर रहे थे।
तभीअंगरक्षकों से संरक्षित दुलहन अम्बिका के मन्दिर में जाने के लिए अंतःपुर से बाहर आईं।
पदभ्यां विनिर्ययौ द्र॒ष्टर भवान्या: पादपललवम् ।
सा चानुध्यायती सम्यड्मुकुन्दचरणाम्बुजम् ।
यतवाड्मातृभि: सार्थ सखीभिः परिवारिता ॥
४०॥
गुप्ता राजभटै: शूरैः सन्नद्धैरुद्मयतायुथे: ।
मृडड्भशशट्भुपणवास्तूर्यभेर्य श्र जघ्निरि ॥
४१॥
पद्भ्यामू-पैदल; विनिर्ययौ--बाहर गईं; द्रष्टमू--देखने के लिए; भवान्या:--माता भवानी के; पाद-पलल्लवम्--कमल कीपंखड़ियों जैसे चरण; सा--वह; च--तथा; अनुध्यायती-- ध्यान करती हुई; सम्यक् --पूर्णत:; मुकुन्द--कृष्ण के; चरण-अम्बुजमू--चरणकमलों पर; यत-वाक्--मौन धारण किये; मातृभि:--अपनी माताओं के; सार्थम्--साथ; सखीभि: --सखियोंसे; परिवारिता--घिरी; गुप्ता--रक्षित; राज--राजा के; भटैः--अंगरक्षकों द्वारा; शूरः--बहादुर; सन्नद्धैः--सशस्त्र तथा तत्पर;उद्यत--उठे हुए; आयुधे:--हथियारों से; मृदड़-शद्डगु-पणवा:--मृदंग, शंख तथा ढोल; तूर्य--तुरही; भेर्य:--भेरी, सींग काबाजा; च--तथा; जध्निरि--बज रहे थे।
रुक्मिणी मौन होकर देवी भवानी के चरणकमलों का दर्शन करने के लिए पैदल ही चलपड़ी।
उनके साथ माताएँ तथा सखियाँ थीं और वे राजा के बहादुर सैनिकों द्वारा संरक्षित थीं जोअपने हथियार ऊपर उठाये हुए सन्नद्ध थे।
रुक्मिणी केवल कृष्ण के चरणकमलों में अपने मनको ध्यानस्थ किये थीं।
मार्ग-भर में मृदंग, शंख, पणव, तुरही तथा अन्य बाजे बजाये जा रहे थे।
नानोपहार बलिभिर्वारमुख्या: सहस््रशः ।
स्रग्गन्धवस्त्राभरणैद्विजपत्य: स्वलड्डू ता: ॥
४२॥
गायन्त्यश्व स्तुवन्तश्च गायका वाद्यवादका: ।
परिवार्य बधूं जग्मु: सूतमागधवन्दिन: ॥
४३॥
नाना--विविध; उपहार--पूजा-सामग्री; बलिभि:--तथा भेंटों सहित; वार-मुख्या:-- प्रमुख गणिकाएँ; सहस्त्रश:--हजार;सत्रकू--फूल की मालाओं; गन्ध--सुगन्धियों; वस्त्र--वस्त्र; आभरणैः--तथा आभूषणों से; द्विज--ब्राह्मणों की; पत्य:--पत्नियाँ; स्व्-अलड्डू ता:--भलीभाँति आभूषित; गायन्त्य:--गाती हुईं; च--तथा; स्तुवन्तः--स्तुतियाँ करतीं; च--तथा;गायका:--गवैये; वाद्य-वादका:--बाजे बजाने वाले; परिवार्य--साथ होकर; वधूम्--दुलहन के ; जग्मुः--गये; सूत--सूत;मागध--मागध; वन्दिन:--तथा वन्दीजन |
दुलहन के पीछे पीछे हजारों प्रमुख गणिकाएँ थीं जो नाना प्रकार की भेंटें लिये थीं।
उनकेसाथ ब्राह्मणों की सजी-धजी पत्नियाँ गीत गा रही थीं और स्तुतियाँ कर रही थीं।
वे माला,सुगन्ध, वस्त्र तथा आभूषण की भेंटें लिये थीं।
साथ ही पेशेवर गवैये, संगीतज्ञ, सूत, मागध तथावन्दीजन थे।
आसाद्य देवीसदनं धौतपादकराम्बुजा ।
उपस्पृश्य शुच्ि: शान्ता प्रविवेशाम्बिकान्तिकम् ॥
४४॥
आसाद्य-पहुँचकर; देवी --देवी के; सदनम्ू--आवास; धौत-- धोकर; पाद--पाँव; कर--तथा हाथ; अम्बुजा--कमल जैसे;उपस्पृश्य--जल का आचमन करके; शुच्ि:--पवित्र होकर; शान्ता--शान्त; प्रविवेश-- अन्दर गई; अम्बिका-अन्तिकम्--अम्बिका के समक्ष।
देवी के मन्दिर में पहुँचकर रुक्मिणी ने सबसे पहले अपने कमल सहश पैर तथा हाथ धोयेऔर तब शुद्धि के लिए आचमन किया।
इस तरह पवित्र एवं शान्त भाव से वे माता अम्बिका केसमक्ष पधारीं।
तां वै प्रवयसो बालां विधिज्ञा विप्रयोषित: ।
भवानीं वन्दयां चक्रुर्भवपतलीं भवान्विताम् ॥
४५॥
तामू--उसको; बै--निस्सन्देह; प्रवयस:--बड़ी बूढ़ी; बालाम्--युवती को; विधि--विधि-विधान की; ज्ञा:--जानने वाली;विप्र--ब्राह्मणों की; योषित:ः--पत्नियाँ; भवानीमू--देवी भवानी को; वन्दयाम् चक्कु:--वन्दना करायी; भव-पत्लीम्ू-- भव( शिवजी ) की पत्नी की; भव-अन्विताम्-- भव समेत |
ब्राह्मणों की बड़ी बूढ़ी पत्तियाँ जो विधि-विधान में पटु थीं, रुक्मिणी को भवानी कोनमस्कार कराने ले गईं जो अपने प्रियतम भगवान् भव ( शिवजी ) के साथ प्रकट हुईं।
नमस्ये त्वाम्बिकेभीक्ष्णं स्वसन्तानयुतां शिवाम् ।
भूयात्पतिर्में भगवान्कृष्णस्तदनुमोदताम् ॥
४६॥
नमस्ये--मैं नमस्कार करती हूँ; त्वा--तुम्हें; अम्बिके --हे अम्बिका; अभीक्ष्णम्--निरन्तर; स्व-- आपके; सनन््तान--बच्चों;युताम्-सहित; शिवाम्ू--शिव-पत्नी को; भूयात्--होयें; पति: --पति; मे--मेरे; भगवान्-- भगवान्; कृष्ण: -- कृष्ण; तत्--उसे; अनुमोदताम्--अनुमति दें
राजकुमारी रुक्मिणी ने प्रार्थना की हे शिव-पत्नी माता अम्बिका! मैं बारम्बार आपकोतथा आपकी सन््तान को नमस्कार करती हूँ।
कृपया यह वर दें कि भगवान् कृष्ण मेरे पति होएँ।
अद्िर्गन्धाक्षतैर्धपैरवास:सत्रड्माल्य भूषणै: ।
नानोपहारबलिभि: प्रदीपावलिभि: पृथक् ॥
४७॥
विप्रस्न्रियः पतिमतीस्तथा तैः समपूजयत् ।
लवणापूपताम्बूलकण्ठसूत्रफले क्षुभि: ॥
४८ ॥
अद्धिः--जल से; गन्ध--सुगन्धित वस्तु; अक्षतैः--तथा अन्नों से; धूपैः-- धूप से; वास:--वस्त्र से; स्रकू--फूल की मालाओंसे; माल्य--रत्नजटित हारों; भूषणै: --तथा गहनों से; नाना--अनेक प्रकार की; उपहार-- भेंटों; बलिभि: --तथा भेंटों से;प्रदीप--दीपक की; आवलिभि:--पंक्तियों से; पृथक्-- अलग; विप्र-स्त्रियः--ब्राह्मण पत्नियाँ; पति--पतियों; मती:--सेयुक्त; तथा--भी; तैः--इन वस्तुओं से; समपूजयत्--पूजा की; लवण--नमकीन पदार्थ; आपूप--पुए; ताम्बूल--पान; कण्ठ-सूत्र--उपबीत या जनेऊ; फल--फल; इक्षुभि: --तथा गन्ना से
रुक्मिणी ने जल, सुगन्धि, अन्न, धूप, वस्त्र, माला, हार, आभूषण तथा अन्य संस्तुत उपहारोंसे और दीपकों की पंक्तियों से देवी की पूजा की।
उन्हीं के साथ साथ विवाहिता ब्राह्मणियों नेउन्हीं वस्तुओं से और नमकीन, पूए, पान-सुपारी, जनेऊ, फल तथा गन्ने के रस की भेंटें चढ़ाकर पूजा की।
तस्यै स्त्रियस्ता: प्रददु: शेषां युयुजुराशिष: ।
ताभ्यो देव्ये नमश्नक्रे शेषां च जगृहे वधू: ॥
४९॥
तस्वै--रुक्मिणी को; स्त्रियः--स्त्रियों ने; ताः--उन; प्रददुः--दिया; शेषघाम्ू--बचा हुआ ( प्रसाद ); युयुजु:--प्रदान किया;आशिष:--आशीर्वाद; ताभ्य: --उनको; देव्यै--तथा देवी को; नमः चक्रे--नमस्कार किया; शेषाम्--बचा हुआ ( प्रसाद );च--तथा; जगूृहे-- ग्रहण किया; वधू:--दुलहन ने |
स्त्रियों ने दुलहन को प्रसाद दिया और फिर आशीर्वाद प्रदान किया।
उसने भी उन्हें तथा देवीको नमस्कार किया और प्रसाद ग्रहण किया।
मुनिव्रतमथ त्यक्त्वा निश्चक्रामाम्बिकागृहात् ।
प्रगृह्य पाणिना भृत्यां रत्लमुद्रोपशोभिना ॥
५०॥
मुनि--मौन; ब्रतम्-द्रत; अथ--तब; त्यक्त्वा--त्याग कर; निश्चक्राम--बाहर आई; अम्बिका-गृहात्-- अम्बिका मन्दिर से;प्रगृह्ा-पकड़कर; पाणिना--हाथ से; भृत्याम्--दासी को; रत्त--रलजटित; मुद्रा--अँगूठी से; उपशोभिना--शोभित |
तब राजकुमारी ने अपना मौन-ब्रत तोड़ दिया और वह रत्नजटित अँगूठी से सुशोभित अपनेहाथ से एक दासी को पकड़ कर अम्बिका मन्दिर के बाहर आई।
तां देवमायामिव धीरमोहिनींसुमध्यमां कुण्डलमण्डिताननाम् ।
श्यामां नितम्बार्पितरत्नमेखलांव्यञ्ञत्त्तनीं कुन्तलशड्वितेक्षणाम् ।
शुचिस्मितां बिम्बफलाधरद्युति-शोणायमानद्विजकुन्दकुड्मलाम् ॥
५१॥
पदा चलन्तीं कलहंसगामिनींसिज्ञत्कलानूपुरधामशोभिना ।
विलोक्य वीरा मुमुहु: समागतायशस्विनस्तत्कृतहच्छयार्दिता: ॥
५२॥
यां वीक्ष्य ते नृपतयस्तदुदारहास-ब्रीदावलोकहतचेतस उज्झ्ितास्त्रा: ।
पेतु: क्षितौ गजरथाश्वगता विमूढायात्राच्छलेन हरयेडर्पयतीं स््वशोभाम् ॥
५३॥
सैवं शनैश्वलयती चलपद्यकोशौप्राप्ति तदा भगवतः प्रसमीक्षमाणा ।
उत्सार्य वामकरजैरलकानपडैःप्राप्तान्हियैक्षत नृपान्ददृशे उच्युतं च ॥
५४॥
तां राजकन्यां रथमारुरक्षतींजहार कृष्णो द्विषतां समीक्षताम् ॥
५५॥
तामू--उसको; देव-- भगवान् की; मायाम्-- माया; इब--सहृश; धीर--गम्भीर रहने वाले भी; मोहिनीम्--मोहने वाली; सु-मध्यमाम्--सुघड़ कमर वाली; कुण्डल--कान के कुण्डलों से; मण्डित--सुसज्जित; आननाम्--मुख वाली; श्यामाम्--निष्कलुष सौन्दर्य; नितम्ब--कूल्हे पर; अर्पित--स्थित; रत्तन--रलजटित; मेखलाम्--करधनी; व्यञ्ञत्ू--उभड़ रहे; स्तनीम्--स्तनों वाली; कुन्तल--केशराशि का; शद्डगित--डरी हुई; ईक्षणाम्--नेत्रों वाली; शुचि--शुद्ध; स्मितामू--मन्दहास-युक्त;बिम्ब-फल--बिम्ब फल की तरह; अधर--होंठों वाली; द्युति--चमक से; शोणायमान--लाल लाल हो रही; द्विज--दाँत;कुन्द--चमेली की; कुड्मलाम्--कलियों जैसे; पदा--पाँवों से; चलन्तीम्--चलती हुई; कल-हंस--राजहंस की तरह;गामिनीम्--गमन करने वाली; सिज्ञत्ू--रुनझुन करती; कला--पदुता से सँवारे; नूपुर--पायलों के; धाम--तेज से;शोभिना--सुशोभित; विलोक्य--देखकर; वीरा:--वीरगण; मुमुहुः --मुग्ध हो गये; समागता:--एकत्र हुए; यशस्विन: --सम्मानित; तत्--उससे; कृत--उत्पन्न; हत्ू-शय--कामवासना से; अर्दिता:--पीड़ित; यामू--जिसको; वीक्ष्य--देखकर; ते--वे; नू-पतयः--राजागण; तत्--उसकी; उदार--विस्तृत; हास--हँसी से; ब्रीडा--लज्जा का; अवलोक--तथा चितवन; हत--चुराये गये; चेतस:--जिनके मन; उज्झित--डालकर; अस्त्रा:--अपने हथियार; पेतु:--गिर पड़े; क्षितौ--पृथ्वी पर; गज--हाथियों; रथ--रथों; अश्व--तथा घोड़ों पर; गता:--बैठे; विमूढा:--मूर्छित होकर; यात्रा-- जुलूस के; छलेन--बहाने; हरये--हरि या कृष्ण के प्रति; अर्पयतीम्--अर्पित कर रही; स्व-- अपना; शोभाम्--सौन्दर्य; सा--वह; एवम्--इस तरह; शनै:--ध धीरेधीरे; चलयती--चलती हुई; चल--हिल रहे; पद्मय--कमल के फूल के; कोशौ--दो कोश ( दो पाँव ); प्राप्तिमू--आगमन;तदा--तब; भगवतः-- भगवान् की; प्रसमीक्षमाणा --उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करती; उत्सार्य--धकेलते हुए; वाम--बाँयें; कर-जैः--अपने हाथ के नाखुनों से; अलकान्--बालों को; अपाडु्रैः--तिरछी चितवन से; प्राप्तान्--वहाँ उपस्थित; हिया--लज्जासे; ऐक्षत--उसने देखा; नृपानू--राजाओं को; दहशे--देखा; अच्युतम्--कृष्ण को; च--तथा; ताम्--उस; राज-कन्याम्--राजकुमारी को; रथम्--उसका रथ; आरुरुक्षतीम्ू--चढ़ने के लिए तैयार; जहार--पकड़ लिया; कृष्ण: --कृष्ण ने; द्विषताम्ू--अपने शत्रु के; समीक्षताम्--देखते देखतेरुक्मिणी भगवान् की उस मायाशक्ति की तरह मोहने वाली प्रतीत हो रही थीं जो बड़े बड़ेधीर-गम्भीर पुरुषों को भी मोह लेती है।
इस तरह राजागण उनके सुकुमार सौन्दर्य, उनकी सुघड़कमर तथा कुण्डलों से सुशोभित मुख को निहारने लगे।
उनके कूल्हे पर रलजटित करधनीशोभा पा रही थी, उनके स्तन अभी उभड़ ही रहे थे और उनकी आँखें उनकी लटकती केशराशिसे चंचल लग रही थीं।
वे मधुर हँसी से युक्त थीं और उनके चमेली की कली जैसे दाँतों से उनकेबिम्ब जैसे लाल होंठों की चमक प्रतिबिम्बित हो रही थी।
जब वे राजहंस जैसी चाल से चलनेलगीं तो उनके रुनझुन करते पायलों के तेज से उनके चरणों की शोभा बढ़ गई।
उन्हें देखकर एकत्रित वीरजन पूर्णतया मोहित हो गये।
कामवासना से उनके हृदय विदीर्ण हो गये।
दरअसलजब राजाओं ने उनकी विस्तृत मुसकान तथा लजीली चितवन देखी तो वे सम्मोहित हो गये,उन्होंने अपने अपने हथियार डाल दिये और वे मूछित होकर अपने अपने हाथियों, रथों तथा घोड़ोंपर से जमीन पर गिर पड़े।
जुलूस के बहाने रुक्मिणी ने अकेले कृष्ण के लिए ही अपना सौन्दर्यप्रदर्शित किया।
उन्होंने भगवान् के आगमन की प्रतीक्षा करते हुए धीरे धीरे चलायमानकमलकोश रूपी दो चरणों को आगे बढ़ाया।
उन्होंने अपने बाँए हाथ के नाखुनों से अपने मुखपर लटकते केश-गुच्छों को हटाया और अपने समक्ष खड़े राजाओं की ओर कनखियों से देखा।
उसी समय उन्हें कृष्ण दिख गये।
तभी अपने दुश्मनों के देखते देखते भगवान् ने राजकुमारी कोपकड़ लिया जो उनके रथ पर चढ़ने के लिए आतुर थी।
रथं समारोप्य सुपर्णलक्षणंराजन्यचक्रं परिभूय माधव: ।
ततो ययौ रामपुरोगमः शनेःश्रूगालमध्यादिव भागहद्धरि: ॥
५६॥
रथम्--रथ पर; समारोप्य--उठाकर; सुपर्ण--गरुड़; लक्षणम्--चिह्न वाले; राजन्य--राजाओं के; चक्रम्--घेरे को;'परिभूय--हराकर; माधव:--कृष्ण; ततः--वहाँ से; ययौ--चले गये; राम--राम द्वारा; पुर:-गमः--आगे आगे; शनैः--धीरेधीरे; श्रगाल--सियारों के; मध्यात्ू--बीच से; इब--जिस तरह; भाग--अपना हिस्सा; हतू--निकाल कर; हरि:ः--सिंह |
राजकुमारी को उठाकर अपने गरुड़-ध्वज वाले रथ में बैठाकर माधव ने राजाओं के घेरे कोपीछे धकेल दिया।
वे बलराम को आगे करके धीरे से उसी तरह बाहर निकल गये जिस तरहसियारों के बीच से अपना शिकार उठाकर सिंह चला जाता है।
तं॑ मानिनः स्वाभिभवं यश्ञः क्षयंपरे जरासन्धमुखा न सेहिरे ।
अहो धिगस्मान्यश आत्तधन्वनांगोपैईतं केशरिणां मृगैरिव ॥
५७॥
तम्--उसको; मानिनः --अभिमानी; स्व--अपने; अभिभवम्--हार; यश:--अपने सम्मान; क्षयम्--विनष्ट करते हुए; परे--शत्रुगण; जरासन्ध-मुखा:--जरासन्ध इत्यादि; न सेहिरि--सहन नहीं कर सके; अहो--ओह; धिक् --धिक्कार है; अस्मान्-हमें;यशः--सम्मान; आत्त-धन्वनाम्-- धनुषधारियों का; गोपैः--ग्वालों द्वारा; हतम्--ले जाये गये; केशरिणाम्--सिंहों के;मृगैः--छोटे जानवरों द्वारा; इब--मानो |
भगवान् के जरासन्ध जैसे शत्रु राजा, इस अपमानजनक हार को सहन नहीं कर सके।
वेचीख पड़े, 'ओह! हमें धिक्कार है! यद्यपि हम बलशाली धनुर्धर हैं, किन्तु इन ग्वालों मात्र नेहमसे हमारा सम्मान उसी तरह छीन लिया है, जिस तरह छोटे छोटे पशु सिंहों का सम्मान हरलें ।
