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अध्याय पचास: कृष्ण ने द्वारका शहर की स्थापना की
10.50श्रीशुक उबाचअस्तिः प्राप्तिश्न कंसस्य महिष्यौ भरतर्षभ ।
मृते भर्तरि दुःखार्ते ईयतुः सम पितुर्गृहान् ॥
१॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; अस्तिः प्राप्ति: च--अस्ति तथा प्राप्ति; कंसस्य--कंस की; महिष्यौ--दोपटरानियाँ; भरत-ऋषभ--हे भरतवंशी के बीर ( परीक्षित ); मृते--मार डाले जाने पर; भर्तरि--अपने पति के; दुःख--दुख से;आर्ते--शोकमग्न; ईयतु: स्म--चली गईं; पितु:--अपने पिता के; गृहान्ू--घरों |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब कंस मार डाला गया तो हे भरतर्षभ, उसकी दो पटरानियाँअस्ति तथा प्राप्ति अत्यन्त दुखी होकर अपने पिता के घर चली गईं।
पित्रे मगधराजाय जरासन्धाय दुःखिते ।
बेदयां चक्रतु: सर्वमात्मवैधव्यकारणम् ॥
२॥
पित्रे--अपने पिता; मगध-राजाय--मगध के राजा; जरासन्धाय--जरासंध से; दु:ःखिते--दुखी; वेदयाम् चक्रतु: --उन्होंने कहसुनाया; सर्वम्--सारे; आत्म--अपने; वैधव्य--विधवा होने का; कारणमू--कारण।
दुखी रानियों ने अपने पिता मगध के राजा जरासन्ध से सारा हाल कह सुनाया कि वे किसतरह विधवा हुईं।
स तदप्रियमाकर्ण्य शोकामर्षयुतो नूप ।
अयादवीं महीं कर्तु चक्रे परममुद्यमम् ॥
३ ॥
सः--वह, जरासन्ध; तत्--उस; अप्रियम्--बुरे समाचार को; आकर्णर्य--सुनकर; शोक--शोक; अमर्ष--तथा असह्य क्रोध;युतः--अनुभव करते हुए; नृप--हे राजा; अयादवीम्ू--यादवों से विहीन; महीम्--पृथ्वी को; कर्तुम्ू--करने के लिए; चक्रे --किया; परमम्-- अत्यधिक; उद्यमम्-प्रयत |
हे राजन, यह अप्रिय समाचार सुनकर जरासन्ध शोक तथा क्रोध से भर गया और पृथ्वी कोयादवों से विहीन करने के यथासम्भव प्रयास में जुट गया।
अक्षौहिणीभिर्विशत्या तिसृभिश्चापि संवृतः ।
यदुराजधानीं मथुरां न्यरु धत्सर्वती दिशम् ॥
४॥
अक्षौहिणीभि:--अक्षौहिणियों से ( एक अक्षौहिणी में २१,८७० हाथी, २९,८७० रथ, ६५,६१० घुड़सवार तथा १,०९,३५०पैदल सैनिक होते हैं ); विंशत्या--बीस; तिसृभि: च अपि--तीन और; संवृतः--घेर लिया; यदु--यदुवंश की; राजधानीम्ू--राजधानी; मथुराम्--मथुरा को; न्यरुधत्ू--घेरा डाल दिया; सर्वतः दिशम्-ओन् अल्ल् सिदेस्
उसने तेईस अक्षौहिणी सेना लेकर यदुओं की राजधानी मथुरा के चारों ओर घेरा डाल दिया।
निरीक्ष्य तद्वलं कृष्ण उद्देलमिव सागरम् ।
स्वपुरं तेन संरुद्धं स्वजनं च भयाकुलम् ॥
५॥
चिन्तयामास भगवान्हरि: कारणमानुष: ।
तद्देशकालानुगुणं स्वावतारप्रयोजनम् ॥
६॥
निरीक्ष्य--देखकर; तत्--उस ( जरासन्ध ) के; बलम्ू--सैनिक-शक्ति; कृष्ण: --कृष्ण; उद्देलम्ू--सीमाओं को लाँघकर; इब--सहश; सागरम्--समुद्र; स्व-- अपनी; पुरम्ू--नगरी, मथुरा को; तेन--उससे; संरुद्धम्--घिरी; स्व-जनमू--अपनी प्रजा को;च--तथा; भय-- भय से; आकुलमू--व्याकुल; चिन्तयाम् आस--सोचा; भगवानू-- भगवान्; हरि: -- हरि ने; कारण --सभीके कारण; मानुष:--मनुष्य रूप में प्रकट होकर; तत्ू--उस; देश--स्थान; काल--तथा समय के; अनुगुणम्--उपयुक्त; स्व-अवतार--इस संसार में अपने अवतरण के; प्रयोजनम्--कारण के विषय में
यद्यपि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण इस संसार के आदि-कारण हैं किन्तु जब वे इस पृथ्वीपर अवतरित हुए तो उन्होंने मनुष्य की भूमिका निबाही।
अतः जब उन्होंने देखा कि जरासन्ध कीसेना ने उनकी नगरी को उसी तरह घेर लिया है, जिस तरह महासागर अपने किनारों को तोड़करबहने लगता है और जब उन्होंने देखा कि यह सेना उनकी प्रजा में भय उत्पन्न कर रही है, तो भगवान् ने विचार किया कि देश, काल तथा उनके वर्तमान अवतार के विशिष्ट प्रयोजन केअनुकूल उनकी उपयुक्त प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए।
हनिष्यामि बल॑ होतद्भुवि भारं समाहितम् ।
मागधेन समानीतं वश्यानां सर्वभूभुजाम् ॥
७॥
अक्षौहिणीभि: सड्ख्यातं भटाश्वरथकुञ्धरै: ।
मागधस्तु न हन्तव्यो भूयः कर्ता बलोद्यमम् ॥
८॥
हनिष्यामि--मैं मार डालूँगा; बलम्ू--सेना को; हि--निश्चय ही; एतत्--इस; भुवि--पृथ्वी पर; भारम्-- भार को;समाहितम्--एकत्र; मागधेन--मगध के राजा, जरासन्ध द्वारा; समानीतम्--लाया गया; वश्यानामू--अधीन; सर्व--सभी; भू-भुजाम्--राजाओं को; अक्षौहिणीभि:--अक्षौहिणियों में ; सड्ख्यातम्--गिनी जाने वाली; भट--पैदल सैनिकों; अश्व--घोड़े;रथ--रथ; कुझ्रैः--तथा हाथियों से युक्त; मागध:--जरासन्ध; तु--किन्तु; न हन्तव्य:--नहीं मारा जाना चाहिए; भूय:ः--फिरसे; कर्ता--करेगा; बल--सेना ( एकत्र करने के लिए ); उद्यमम्-प्रयास
भगवान् ने सोचा : चूँकि पृथ्वी पर इतना भार है, अतः मैं जरासन्ध की इस सेना कोविनष्ट कर दूँगा जिसमें अक्षौहिणियों पैदल सैनिक, घोड़े, रथ तथा हाथी हैं, जिसे मगध के राजाने अपने अधीनस्थ राजाओं से बटोरकर यहाँ ला खड़ा किया है।
किन्तु मुझे जरासंध को नहींमारना चाहिए क्योंकि भविष्य में वह निश्चित रूप से दूसरी सेना जोड़ लेगा।
एतदर्थोवतारोयं भूभारहरणाय मे ।
संरक्षणाय साधूनां कृतोउन्येषां वधाय च ॥
९॥
एतत्--इस; अर्थ:--प्रयोजन के लिए; अवतार:--अवतार; अयम्--यह; भू--पृथ्वी का; भार--बोझ; हरणाय--हटाने केलिए; मे--मेरे द्वारा; संरक्षणाय--पूरी सुरक्षा के लिए; साधूनामू--साधुओं की; कृत:--किया गया; अन्येषाम्--अन्यों( असाधुओं ) का; वधाय--मारने के लिए; च--तथा।
मेरे इस अवतार का यही प्रयोजन है--पृथ्वी के भार को दूर करना, साधुओं की रक्षा करनाऔर असाधुओं का वध करना।
अन्योपि धर्मरक्षायै देह: संभ्रियते मया ।
विरामायाप्यधर्मस्य काले प्रभवतः क्वचित् ॥
१०॥
अन्य:--दूसरा; अपि-- भी; धर्म-- धर्म की; रक्षायै--रक्षा के लिए; देह:--शरीर; संथ्रियते-- धारण किया जाता है; मया--मेरेद्वारा; विरामाय--रोकने के लिए; अपि-- भी; अधर्मस्य--अधर्म का; काले--समय के साथ; प्रभवत:--प्रधान बनने पर;क्वचित्--जब भी |
मैं धर्म की रक्षा करने तथा जब जब समय के साथ अधर्म की प्रधानता होती है, तो उसकाअन्त करने के लिए भी अन्य शरीर धारण करता हूँ।
एवं ध्यायति गोविन्द आकाशात्सूर्यवर्चसौ ।
रथावुपस्थितौ सद्य: ससूतौ सपरिच्छदौ ॥
११॥
एवम्--इस प्रकार से; ध्यायति--विचार करते हुए; गोविन्दे-- भगवान् कृष्ण द्वारा; आकाशात्--आकाश से; सूर्य--सूर्य जैसे;वर्चसौ--तेज वाले; रथौ--दो रथ; उपस्थितौ--प्रकट हो गये; सद्यः--सहसा; स--सहित; सूतौ--सारथियों; स--सहित;परिच्छदौ--साज-सामान।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब भगवान् गोविन्द इस तरह सोच रहे थे तो सूर्य के समानतेज वाले दो रथ आकाश से सहसा नीचे उतरे।
वे सारथियों तथा साज-सज्जा से युक्त थे।
आयुधानि च दिव्यानि पुराणानि यहच्छया ।
इृष्ठा तानि हषीकेश: सड्डूर्षणमथात्रवीत् ॥
१२॥
आयुधानि--हथियार; च--तथा; दिव्यानि--दिव्य; पुराणानि--पुराने; यहच्छया--स्वतः; इृष्ला --देखकर; तानि-- उनको;हृषीकेश:-- भगवान् कृष्ण; सद्डूर्षणम्--बलराम से; अथ--तब; अब्रवीत्--बोलेउसी समय भगवान् के दिव्य हथियार भी स्वतः उनके समक्ष प्रकट हो गये।
इन्हें देखकरइन्द्रियों के स्वामी श्रीकृष्ण ने भगवान् संकर्षण से कहा।
पश्यार्य व्यसन प्राप्तं यदूनां त्वावतां प्रभो ।
एष ते रथ आयातो दयितान्यायुधानि च ॥
१३॥
एतदर्थ हि नौ जन्म साधूनामीश शर्मकृत् ।
त्रयोविंशत्यनीकाख्यं भूमेर्भारमपाकुरू ॥
१४॥
पश्य--देखिये; आर्य--सम्मान्य; व्यसनम्--खतरा, संकट; प्राप्तम्--आया हुआ; यदूनाम्ू--यदुओं के लिए; त्वा--तुम्हारेद्वारा; अवताम्--सुरक्षित; प्रभो--हे स्वामी; एब: --यह; ते--तुम्हारा; रथ: --रथ; आयात:--आ चुका है; दयितानि--प्रिय;आयुधानि--हथियार; च--तथा; एतत्-अर्थम्--इस प्रयोजन के लिए; हि--निस्सन्देह; नौ--हमारा; जन्म--जन्म; साधूनामू--साधु-भक्तों का; ईश-े प्रभु; शर्म--लाभ; कृत्ू--करते हुए; त्रय:-विंशति--तेईस; अनीक--सेनाएँ; आख्यम्--के नाम से;भूमे:--पृथ्वी का; भारमू-- भार; अपाकुरु--हटाइये
भगवान् ने कहा : हे पूज्य ज्येष्ठ भ्राता, आप अपने आश्रित यदुओं पर आये हुए इससंकट को तो देखिये! और हे प्रभु, यह भी देखिये कि आपका निजी रथ तथा आपकी पसन्द केहथियार आपके समक्ष आ चुके हैं।
हे प्रभु! हमने जिस उद्देश्य से जन्म लिया है, वह अपने भक्तोंके कल्याण को सुरक्षित करना है।
कृपया अब इन तेईस सैन्य-टुकड़ियों के भार को पृथ्वी सेहटा दीजिये।
एवं सम्मन्य दाशाहों दंशितौ रथिनौ पुरात् ।
निर्जग्मतु: स्वायुधाढ्यौं बलेनाल््पीयसा वृतौ ॥
१५॥
एवम्--इस तरह; सम्मन्त्य--आमंत्रित करके; दाशाहौं--दशाई के दो वंशज ( कृष्ण तथा बलराम ); दंशितौ--कवच पहनकर;रथिनौ--रथों पर आरूढ़ होकर; पुरात्--नगरी से; निर्जग्मतु:--बाहर गये; स्व--अपने; आयुध--हथियार; आढ्यौ--चमचमाते; बलेन--सेना द्वारा; अल्पीयसा--अत्यन्त लघु; वृतौ--साथ में लेकर
भगवान् कृष्ण द्वारा अपने भाई को इस तरह आमंत्रित करने के बाद, दोनों दशा कृष्णतथा बलराम कवच पहन कर और अपने अपने चमचमाते हथियारों को प्रदर्शित करते हुए अपनेरथों पर चढ़कर नगरी के बाहर चले गये।
उनके साथ सैनिकों की छोटी-सी टुकड़ी ही थी।
शड्डुं दध्मौ विनिर्गत्य हरिदारुकसारथि: ।
ततो<भूत्परसैन्यानां हृदि वित्रासवेपथु: ॥
१६॥
शब्डबुमू-- अपना शंख; दध्मौ--बजाया; विनिर्गत्य--बाहर जाकर; हरि: --कृष्ण ने; दारूक-सारथि:--जिनका सारथी दारुकथा; ततः--तत्पश्चात्; अभूत्--उठी; पर--शत्रु के; सैन्यानामू--सैनिकों के; हृदि--हृदयों में; वित्रास-- भय से; वेपथु:--कँपकँपी।
जब भगवान् कृष्ण दारुक द्वारा हाँके जा रहे अपने रथ पर चढ़कर नगरी से बाहर आ गयेतो उन्होंने अपना शंख बजाया।
इससे शत्रु-सैनिकों के हृदय भय से काँपने लगे।
तावाह मागधो वीक्ष्य हे कृष्ण पुरुषाधम ।
न त्वया योद्धुमिच्छामि बालेनैकेन लजया ।
गुप्तेन हि त्वया मन्द न योत्स्ये याहि बन्धुहन् ॥
१७॥
तौ--दोनों से; आह--कहा; मागध: --जरासंध ने; वीक्ष्य--देखकर; हे कृष्ण--हे कृष्ण; पुरुष-अधम--पुरुषों में सबसे निम्न;न--नहीं; त्ववा--तुमसे; योद्दुमू--लड़ने के लिए; इच्छामि--इच्छा करता हूँ; बालेन--बालक के साथ; एकेन--अकेला;लज्या--शर्म से; गुप्तेत--छिपी; हि--निस्सन्देह; त्वया--तुम्हारे द्वारा; मन्द--हे मूर्ख; न योत्स्ये--नहीं लड़ूँगा; याहि--चलेजाओ; बन्धु--सम्बन्धियों का; हन्ू--ओरे वध करने वाले
जरासन्ध ने दोनों की ओर देखा और कहा : ओरे पुरुषों में अधम कृष्ण, मैं तुझसे अकेलेनहीं लड़ना चाहता क्योंकि एक बालक से युद्ध करना लज्जा की बात होगी।
अरे अपने को गुप्तरखने वाले मूर्ख, अपने सम्बन्धियों की हत्या करने वाले, तू भाग जा! मैं तुझसे युद्ध नहींकरूँगा।
तब राम यदि श्रद्धा युध्यस्व धैर्यमुद्ठह ।
हित्वा वा मच्छरैश्छन्नं देहं स्वर्याहि मां जहि ॥
१८ ॥
तव--तुम्हारा; राम--हे बलराम; यदि--यदि; अ्रद्धा--विश्वास; युध्यस्व--लड़ो; धैर्यम्--थैर्य; उद्दद-- धारण करो; हित्वा--छोड़कर; वा--या तो; मत्--मेरे; शरैः--बाणों से; छिन्नमू--खण्ड खण्ड होकर; देहम्ू--तुम्हारा शरीर; स्वः--स्वर्ग को;याहि--जाओ; मामू--( या फिर ) मुझको; जहि--मारो |
रे बलराम, तू थैर्य सँजो करके मुझसे लड़, यदि तू सोचता है कि तू ऐसा कर सकता है।
यातो तू मेरे बाणों के द्वारा खण्ड खण्ड होने से अपना शरीर त्याग और इस तरह स्वर्ग प्राप्त कर याफिर तू मुझे जान से मार।
श्रीभगवानुवाचन वै शूरा विकत्थन्ते दर्शयन्त्येव पौरुषम् ।
न गृह्वीमो बचो राजन्नातुरस्य मुमूर्षत: ॥
१९॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; न--नहीं; बै--निस्सन्देह; शूरा:--वीर; विकत्थन्ते--डींग मारते हैं; दर्शबन्ति--दिखलाते हैं; एब--केवल; पौरुषम्-- अपना पराक्रम; न गृह्वीम:--हम नहीं मानते; वचः--शब्द; राजन्ू--हे राजन;आतुरस्य--मानसिक रूप से व्याकुल के; मुमूर्षतः--मरने वाले ।
भगवान् ने कहा : असली वीर केवल डींग नहीं मारते अपितु अपने कार्य के द्वारा पराक्रमका प्रदर्शन करते हैं।
जो चिन्ता से पूर्ण हो और मरना चाहता हो उसके शब्दों को हम गम्भीरतासे नहीं ले सकते।
श्रीशुक उबाचजरासुतस्तावभिसृत्य माधवौमहाबलौघेन बलीयसावूनोत् ।
ससैन्ययानध्वजवाजिसारथी सूर्यानलौ वायुरिवाभ्ररेणुभि: ॥
२०॥
श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; जरा-सुतः--जरा का पुत्र; तौ--वे दोनों; अभिसृत्य--पास जाकर; माधवौ--मधु के वंशज; महा--विशाल; बल--सैनिक-शक्ति की; ओघेन--बाढ़ से; बलीयसा--बलवान; आवृणोत्--घेर लिया; स--सहित; सैन्य--सैनिकों के; यान--रथ; ध्वज--झंडे; वाजि--घोड़े; सारथी --रथ हाँकने वाले; सूर्य--सूर्य; अनलौ--तथाअग्नि; वायु:--वायु; इब--सहृश; अभ्र--बादलों से; रेणुभि:--धूल के कणों से |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जिस तरह वायु बादलों से सूर्य को या धूल से अग्नि को ढकलेती है उसी तरह जरा का पुत्र, मधु के दो वंशजों की ओर चल पड़ा और उसने अपनी विशालसेनाओं से उन्हें तथा उनके सैनिकों, रथों, पताकाओं, घोड़ों तथा सारथधियों को घेर लिया।
सुपर्णतालध्वजचिहित्नौ रथा-वलक्षयन्त्यो हरिरामयोर्मुधे ।
स्त्रियः पुराह्ालकहर्म्यगोपुरंसमाश्रिता: सम्मुमुहु: शुचार्दित: ॥
२१॥
सुपर्ण--गरुड़; ताल--तथा ताड़ ( चिह्नों ) से युक्त; ध्वज--झंडों से; चिह्नितौ-- अंकित; रथौ--दोनों रथ; अलक्षयन्त्य:--नपहचान पाती हुई; हरि-रामयो: --कृष्ण तथा बलराम के; मृधे--युद्ध में; स्त्रियः--स्त्रियाँ; पुर--नगरी की; अट्टालक--अटारियों; हर्म्ष--प्रासादों; गोपुरम्--तथा द्वारों पर; समाञ्रिता:--चढ़कर; सम्मुमुहुः--मूर्च्छित हो गईं; शुचचा--शोक से;अर्दिता:--पीड़ित |
स्त्रियाँ अटारियों, महलों तथा नगर के ऊँचे द्वारों पर खड़ी हुई थीं।
जब उन्हें कृष्ण तथाबलराम के रथ नहीं दिखाई पड़े, जिनकी पहचान गरुड़ तथा ताड़-वृक्ष के प्रतीकों से चिन्हितपताकाओं से होती थी, तो वे शोकाकुल होकर मूच्छित हो गईं।
हरिः परानीकपयोमुचां मुहुःशिलीमुखात्युल्बणवर्षपीडितम् ।
स्वसैन्यमालोक्य सुरासुरार्चितंव्यस्फूर्जयच्छार्डशरासनोत्तमम् ॥
२२॥
हरि: --कृष्ण; पर--शत्रु की; अनीक--सेनाओं के; पयः-मुचाम्--( जो ) बादलों ( की तरह थे ); मुहुः--बारम्बार;शिलीमुख--उनके बाणों के; अति--अत्यधिक; उल्बण-- भयावनी; वर्ष--वर्षा से; पीडितम्ू-- पीड़ित; स्व--अपनी;सैन्यम्ू--सेना को; आलोक्य--देखकर; सुर--देवताओं; असुर--तथा असुरों द्वारा; अर्चितम्--पूजित; व्यस्फूर्जवत्--टंकारकिया; शार्इ्--शार्ड्ध नामक; शर-असन--अपना धनुष; उत्तमम्--उत्तम |
अपने चारों ओर बादलों जैसी विशाल शत्रु सेनाओं के बाणों की भयानक तथा निर्मम वर्षासे अपनी सेना को पीड़ित देखकर भगवान् हरि ने अपने उस उत्तम धनुष शार्ड़र पर टंकार की जोदेवताओं तथा असुरों दोनों के द्वारा पूजित है।
गृह्नत्रिशज्ञदथ सन्दधच्छरान्विकृष्य मुझ्नन्शितबाणपूगान् ।
निष्नत्रथान्कुझ्रवाजिपत्तीन्निरन्तरं यद्वदलातचक्रम् ॥
२३॥
गृहननू--निकालते हुए; निशज्ञत्--तरकस से; अथ--त्पश्चात; सन्दधत्--स्थिर करते हुए; शरान्--बाणों को; विकृष्य--खींचकर; मुझ्नन्--छोड़ते हुए; शित--तीक्षण; बाण--बाणों की; पूगान्--बाढ़; निघ्नन्ू-- प्रहार करते हुए; रथान्--रथों;कुझर--हाथियों; वाजि--घोड़ों; पत्तीनू--तथा पैदल सिपाहियों को; निरन्तरम्--लगातार; यद्वतू--की तरह; अलात-चक्रम्--आग का गोला, लुकाठी।
भगवान् कृष्ण ने अपने तरकस से तीर निकाले, उन्हें प्रत्यंचा ( धनुष की डोरी ) पर स्थितकिया ( चढ़ाया ), डोरी खींची और तीक्ष्ण बाणों की झड़ी लगा दी जिसने शत्रु के रथों,हाथियों, घोड़ों तथा पैदल सिपाहियों पर जाकर वार किया।
भगवान् अपने तीरों को अलात-चक्र की तरह छोड़ रहे थे।
निर्मिन्नकुम्भा: करिणो निपेतु-रनेकशो श्रा: शरवृक्णकन्धरा: ।
रथा हताश्चवध्वजसूतनायका:पदायतश्छिन्नभुजोरुकन्धरा: ॥
२४॥
निर्भिन्न--फटे हुए; कुम्भा:--माथे का गण्डस्थल; करिण:--हाथी; निपेतु:--गिर पड़े; अनेकश:--एक बार में कई कई;अश्वा:--घोड़े; शर--बाणों से; वृकण--कटे हुए; कन्धरा: -गर्दनें; रथा: --रथ; हत--मारे गये; अश्व--घोड़े; ध्वज--पताकाएँ; सूत--सारथी; नायकाः--तथा नायक ( स्वामी ); पदायत:ः--पैदल सैनिक; छिन्न--कटी हुई; भुज-- भुजाएँ; ऊरुू--जाँघें; कन्धरा:--तथा कंधे
हाथी धराशायी हो गये, उनके माथे फट गये, कटी गर्दनों वाले सेना के घोड़े गिर गये, रथघोड़ों, झंडों, सारथियों तथा स्वामियों समेत टूट-फूटकर गिर गये और कटी हुई भुजाओं, जाँघोंतथा कन्धों वाले पैदल सिपाहियों ने दम तोड़ दिए।
सज्छिद्यमानद्विपदेभवाजिना-मड्डप्रसूता: शतशोसृगापगा: ।
भुजाहयः पूरुषशीर्षकच्छपाहतद्विपद्वीपहय ग्रहाकुला: ॥
२५॥
'करोरुमीना नरकेशशैवलाधनुस्तरड्रायुधगुल्मसह्लू ला: ।
अच्छूरिकावर्तभयानका महा-मणिप्रवेकाभरणाएमशर्करा: ॥
२६॥
प्रवर्तिता भीरु भयावहा मृथेमनस्विनां हर्षकरीः परस्परम् ।
विनिध्नतारीन्मुषलेन दुर्मदान्सड्डूर्षणेनापरीमेयतेजसा ॥
२७॥
बल॑ तदड्ार्णवदुर्ग भैरवंदुरन्तपारं मगधेन्द्रपालितम् ।
क्षयं प्रणीतं वसुदेवपुत्रयो-विक्रीडितं तजगदीशयो: परम् ॥
२८ ॥
सज्छिद्यमान--खण्ड खण्ड होकर; द्वि-पद--दो पैर वाले ( मनुष्य ); इभ--हाथी; वाजिनाम्--तथा घोड़ों के; अड्ड--अंगों से;प्रसूताः--बहते हुए; शतशः--सैकड़ों; असृक् --रक्त की; आप-ग:ः--नदियाँ; भुज--बाँहें; अहय:--सर्पों की तरह; पूरूुष--मनुष्यों की; शीर्ष--सिर; कच्छपा:-- कछुवों की तरह; हत--मृत; द्विप--हाथी; द्वीप--द्वीपों की तरह; हय--तथा घोड़ों से;ग्रह--घड़ियालों की तरह; आकुला:--पूरित; कर--हाथ; ऊरु--तथा जाँघें; मीन:--मछलियों की तरह; नर--मनुष्य के;केश--बाल; शैवला: --सिवार की तरह; धनु:--धनुष; तरड्ग--लहरों की तरह; आयुध--तथा हथियार; गुल्म--झाड़ियों केकुंज की तरह; सह्डू लाः --एकत्रित; अच्छूरिका--रथ के पहिए; आवर्त--भँवरों की तरह; भयानका:-- भयावनी; महा-मणि--बहुमूल्य मणियाँ; प्रवेक--उत्तम; आभरण--तथा गहने; अश्म--पत्थरों की तरह; शर्करा:--तथा बालू; प्रवर्तिता:--बाहर निकालते हुए; भीरू--कायर के लिए; भय-आवहा:--डराने वाले; मृधे --युद्धभूमि में; मनस्विनाम्--बुद्धिमानों के लिए;हर्ष-करी:--हर्ष प्रदान करने वाले; परस्परम्--एक-दूसरे से; विनिषध्नता--प्रहार करते हुए; अरीन्--अपने शत्रुओं को;मुषलेन--अपने हलायुध से; दुर्मदान्--प्रचण्ड, क्रुद्ध; सड्डूर्षणेन--बलराम द्वारा; अपरिमेय--अथाह; तेजसा--बल से;बलमू--सैन्य-शक्ति; तत्--उस; अड़--हे प्रिय ( राजा परीक्षित ); अर्गब--सागर की तरह; दुर्ग--अगाध; भेरवम्--तथाभयावना; दुरन््त--दुर्लध्य; पारम्ू--सीमा; मगध-इन्द्र--मगध के राजा जरासन्ध द्वारा; पालितमू--देखभाल किया हुआ;क्षयम्--विनाश को; प्रणीतम्--प्राप्त हुआ; बसुदेव-पुत्रयो: --वसुदेव के पुत्रों के लिए; विक्रीडितम्-- खेल; तत्ू--वह;जगत्--ब्रह्माण्ड; ईशयो:--प्रभुओं के लिए; परम्ू--परम |
युद्धभूमि में मनुष्यों, हाथियों तथा घोड़ों के खण्ड खण्ड हो जाने से रक्त की सैकड़ों नदियाँबह चलीं।
इन नदियों में बाँहें सर्पों के तुल्य, मनुष्यों के सिर कछुवों की तरह, मृत हाथी द्वीपोंकी तरह तथा मृत घोड़े घड़ियालों की तरह प्रतीत हो रहे थे।
उनके हाथ तथा जाँघें मछली कीतरह, मनुष्यों के बाल सिवार की तरह, बाण लहरों की तरह तथा विविध हथियार झाड़ियों के कुंज जैसे लग रहे थे।
रक्त की नदियाँ इन सारी वस्तुओं से पड़ी थीं।
रथ के पहिए भयावनी भँवरों जैसे और बहुमूल्य मोती तथा आभूषण तेजी से बहती लालरंग की नदियों में पत्थरों तथा रेत की तरह लग रहे थे, जो कायरों में भय और बुद्ध्रिमानों में हर्षउत्पन्न करने वाले थे।
अपने हलायुध के प्रहारों से अत्यधिक शक्तिशाली बलराम ने मगधेन्द्र कीसैनिक-शक्ति विनष्ट कर दी।
यद्यपि यह सेना दुर्लध्य सागर की भाँति अथाह एवं भयावनी थीकिन्तु वसुदेव के दोनों पुत्रों के लिए, जो कि ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं, यह युद्ध खिलवाड़ सेअधिक नहीं था।
स्थित्युद्धवान्तं भुवनत्रयस्य यःसमीहितेनन्तगुण: स्वलीलया ।
न तस्य चित्र परपश्षनिग्रह-स्तथापि मर्त्यानुविधस्य वर्ण्यते ॥
२९॥
स्थिति--पालन; उद्धव--सूजन; अन्तम्--तथा संहार; भुवन-त्रयस्य--तीनों लोकों का; यः--जो; समीहिते-- प्रभाव;अनन्त--अनन्त; गुण: --जिनके दिव्य गुण; स्व-लीलया--अपनी लीलाओं के रूप में; न--नहीं; तस्य--उसका; चित्रम्--अद्भुत; पर--विरोधी; पक्ष--पक्ष का; निग्रह:--दमन; तथा अपि--फिर भी; मर्त्य--मनुष्य; अनुविधस्थ-- अनुकरण करनेवाला; वर्ण्यते--वर्णन किया जाता है।
जो तीनों लोकों के सृजन, पालन और संहार को एकसाथ सम्पन्न करने वाले हैं तथा जोअसीम दिव्य गुणों वाले हैं उनके लिए विरोधी दल का दमन कर देना आश्चर्यजनक नहीं है।
फिरभी जब भगवान् मानव-आचरण का अनुकरण करते हुए ऐसा करते हैं, तो साधुगण उनकेकार्यो का गुणगान करते हैं।
जग्राह विरथं रामो जरासन्ध॑ महाबलम् ।
हतानीकावशिष्टासूं सिंह: सिंहमिवौजसा ॥
३०॥
जग्राह--पकड़ लिया; विरथम्--रथविहीन; राम: --बलराम; जरासन्धम्--जरासन्ध को; महा--अत्यन्त; बलमू--बलवान;हत--मारी गई; अनीक--सेना; अवशिष्ट--शेष; असुम्-- श्वास; सिंहः--एक सिंह; सिंहम्--दूसरे सिंह को; इब--सहृश;ओजसा--बलपूर्वक |
रथविहीन होने तथा सारे सैनिक मारे जाने से जरासन्ध के पास केवल श्वास शेष थी।
उससमय बलराम ने उस बलशाली योद्धा को उसी तरह पकड़ लिया जिस तरह एक सिंह दूसरे सिंहको पकड़ लेता है।
बध्यमानं हतारातिं पाशै्वारुणमानुषै: ।
वारयामास गोविन्दस्तेन कार्यचिकीर्षया ॥
३१॥
बध्यमानमू--बाँधे जाते समय; हत--मारा गया; अरातिम्ू--शत्रु को; पाशै:--रस्सियों से; वारुण--वरुणदेव की; मानुषै:--तथा सामान्य मनुष्यों की; वारयाम् आस--रोका; गोविन्द:--कृष्ण ने; तेन--उसके ( जरासन्ध ) द्वारा; कार्य--कुछ काम;चिकीर्षया--करने की इच्छा से |
अनेक शत्रुओं का वध करने वाले बलराम, जरासन्ध को वरुण के दैवी-पाश से तथा अन्यलौकिक रस्सियों से बाँधने लगे।
किन्तु गोविन्द को अभी जरासन्ध के माध्यम से कुछ कार्यकरना शेष था अतः उन्होंने बलराम से रुक जाने के लिए कहा।
सा मुक्तो लोकनाथाभ्यां ब्रीडितो वीरसम्मतः ।
तपसे कृतसड्डूल्पो बारित: पथ्चि राजभि: ॥
३२॥
वाक्य: पवित्रार्थपदेर्नयनैः प्राकृतैरपि ।
स्वकर्मबन्धप्राप्तोयं यदुभिस्ते पराभव: ॥
३३॥
सः--वह, जरासन्ध; मुक्त:--छोड़ दिया गया; लोक-नाथाभ्याम्--दोनों लोके श्वरों द्वारा; ब्रीडित:--लज्जित; वीर--वीरों से;सम्मत:--आदरित; तपसे--तपस्या करने; कृत-सट्लल्प:--मन को पक्का करके; वारित:--रोका गया; पथ्चि--मार्ग में;राजभि:ः--राजाओं द्वारा; वाक्यै:--वाक्यों द्वारा; पवित्र--शुद्ध करने वाला; अर्थ--अर्थ वाला; पदैः--शब्दों के द्वारा;नयनैः--तर्क से; प्राकृतेः--संसारी; अपि-- भी; स्व--निजी; कर्म-बन्ध--गत कर्म के न बच पाने वाले फल के कारण;प्राप्त: --प्राप्त; अयम्--यह; यदुभि:--यदुओं द्वारा; ते--तुम्हारी; परा भव: --हार
जरासन्ध जिसको योद्धा अत्यधिक सम्मान देते थे, जब ब्रह्माण्ड के दोनों स्वामियों ने उसेछोड़ दिया तो वह अत्यन्त लज्जित हुआ और उसने तपस्या करने का निश्चय किया।
किन्तु मार्ग मेंकई राजाओं ने आध्यात्मिक ज्ञान तथा संसारी तर्को के द्वारा उसे आश्वस्त किया कि उसेआत्मोत्सर्ग का विचार त्याग देना चाहिए उन्होंने उससे कहा, 'यदुओं द्वारा आपको हराया जानातो आपके गत कर्मों का परिहार्य फल है।
'हतेषु सर्वानीकेषु नृपो बाईद्रथस्तदा ।
उपेक्षितो भगवता मगधान्दुर्ममा ययौ ॥
३४॥
हतेषु--मारे जाने पर; सर्व--सारे; अनीकेषु--सेना के सारे सैनिक; नृप:--राजा; बाईद्रथ: --बृहद्रथ का पुत्र, जरासन्ध; तदा--तब; उपेक्षित ह--उपेक्षित; भगवता-- भगवान् द्वारा; मगधान्ू--मगध राज्य में; दुर्मना:--उदास; ययौ--चला गया।
अपनी सारी सेना मारी जाने तथा स्वयं भी भगवान् द्वारा उपेक्षित होने से बृहद्रथ-पुत्र राजाजरासन्ध उदास मन से अपने राज्य मगध को लौट गया।
मुकुन्दोप्यक्षतबलो निस्तीर्णारिबलार्णव: ।
विकीर्यमाण: कुसुमैस्त्रीदशैरनुमोदित: ॥
३५॥
माथ्रैरुपसड्रम्य विज्वरैर्मुदितात्मभि: ।
उपगीयमानविजयः सूतमागधवन्दिभि: ॥
३६॥
मुकुन्द:--कृष्ण; अपि-- भी; अक्षत--बाल बाँका न होने से; बलः--अपनी सेना; निस््तीर्ण--पार कराकर; अरि--अपने शत्रुकी; बल--सेना के; अर्णव:--समुद्र; विकीर्यमाण:--उन पर बरसाये गये; कुसुमैः --फूलों से; त्रिदशै:--देवताओं द्वारा;अनुमोदित:--बधाई दिये गये; माथुरै:--मथुरा के लोगों के द्वारा; उपसड्रम्य--मिलकर; विज्वरैः --ज्वर से मुक्त; मुदित-आत्मभि:--अतीव हर्ष से युक्त; उपगीयमान--गीत गाये जाकर; विजय:--विजय; सूत-मागध--पुराण के गायक; वन्दिभि:--उन्दीजनों द्वारा |
भगवान् मुकुन्द ने अक्षत अपनी पूर्णतः सेना के द्वारा अपने शत्रु की सेनाओं के समुद्र कोपार कर लिया था।
स्वर्ग के निवासियों ने उन पर फूलों की वर्षा करते हुए उन्हें बधाइयाँ दीं।
मथुरा के निवासी अपनी ज्वरयुक्त चिन्ता से मुक्त होकर तथा हर्ष से पूरित होकर उनसे मिलने केलिए बाहर निकल आये और सूतों, मागधों तथा बन्दीजनों ने उनकी विजय की प्रशंसा में गीतगाये।
शद्डदुन्दुभयो नेदुर्भेरीतूर्याण्यनेकशः ।
वीणावेणुमृदड्जानि पुरं प्रविशति प्रभा ॥
३७॥
सिक्तमार्गा हृष्टजनां पताकाभिरभ्यलड्डू ताम् ।
निर्धुष्ठां ब्रह्मघोषेण कौतुकाबद्धतोरणाम् ॥
३८॥
शट्भु--शंख; दुन्दुभय:--तथा दुन्दुभियाँ; नेदु:--बजने लगीं; भेरी--ढोल; तूर्याणि--तथा तुरहियाँ; अनेकश:ः --एकसाथ कई;वीणा-वेणु-मृदड्रानि--वीणा, बाँसुरी तथा मृदंग; पुरम्--नगर में; प्रविशति--उनके प्रवेश करते ही; प्रभौ--प्रभु; सिक्त--पानीसे सींचा गया; मार्गामू--रास्तों का; हष्ट--प्रसन्न; जनाम्--नागरिकों को; पताकाभि:--पताकाओं से; अभ्यलड्डू तामू--खूबसजाया गया; निर्धुष्ठामू--प्रतिध्वनित; ब्रह्म--वेदों के; घोषेण--उच्चारण से; कौतुक--उत्सवपूर्ण; आबद्ध--आभूषण;तोरणाम्-प्रवेशद्वारों पर
ज्योंही भगवान् ने नगरी में प्रवेश किया, शंख तथा दुन्दुभियाँ बजने लगीं और अनेक ढोल,तुरहियाँ, वीणा, वंशी तथा मृदंग एकसाथ बजने लगे।
रास्तों को जल छिड़का गया था, सर्वत्रपताकाएँ लगी थीं तथा प्रवेशद्वारों को समारोह के लिए सजाया गया था।
उसके नागरिकउत्साहित थे और नगरी वैदिक स्तोत्रों के उच्चारण से गूँज रही थी।
निच्ीयमानो नारीभिर्माल्यदध्यक्षताडु रैः ।
निरीक्ष्ममाण: ससनेहं प्रीत्युत्तलितलोचनै: ॥
३९॥
निचीयमान: --उन पर बिखेरकर; नारीभि:--स्त्रियों द्वारा; माल्य--फूलों की मालाएँ; दधि--दही; अक्षत--लईया; अह्डुरैः ज-तथा अंकुर; निरीक्ष्यमाण:--देखे जा रहे; स-स्नेहम्--स्नेहपूर्वक; प्रीति--प्रेमवश; उत्कलित--फैली हुई; लोचनैः:--आँखों से ॥
ज्योंही नगरी की स्त्रियों ने भगवान् पर स्नेहयुक्त दृष्टि डाली, उनके नेत्र प्रेमवश खुले के खुलेरह गये।
उन्होंने भगवान् पर फूल-मालाएँ, दही, अक्षत तथा नवांकुरों की वर्षा की।
आयोधनगतं वित्तमनन्तं वीरभूषणम् ।
यदुराजाय तत्सर्वमाहतं प्रादिशत्प्रभु; ॥
४० ॥
आयोधन-गतम्--युद्धभूमि में गिरी हुई; वित्तमू--बहुमूल्य सामग्री; अनन्तम्--अनगिनत; वीर--वीरों के; भूषणम्--आभूषण;यदु-राजाय--यदुओं के राजा, उग्रसेन को; तत्ू--वह; सर्वम्--सब; आहतम्--लाई गई; प्रादिशत्-- भेंट की; प्रभुः--भगवान्ने
तत्पश्चात् भगवान् कृष्ण ने यदुराज को वह सारी सम्पत्ति लाकर भेंट की जो युद्धभूमि मेंगिरी थी अर्थात् जो मृत योद्धाओं के अनगिनत आभूषणों के रूप में थी।
एवं सप्तदशकृत्वस्तावत्यक्षीहिणीबल: ।
युयुधे मागधो राजा यदुभि: कृष्णपालितैः ॥
४१॥
एवम्--इस प्रकार; सप्त-दश--सत्रह; कृत्व: --बार; तावति--इतने पर भी ( हारने पर ); अक्षौहिणी--कई अक्षौहिणी वाली;बलः:--सैनिक-शक्ति; युयुधे--युद्ध किया; मागध: राजा--मगध के राजा ने; यदुभि:--यदुओं से; कृष्ण-पालितै:--कृष्णद्वारा सुरक्षित,मगध का राजा इसी तरह से सत्रह बार पराजित होता रहा।
फिर भी इन पराजयों में वहअपनी कई अक्षौहिणी सेनाओं से यदुबंश की उन सेनाओं के विरुद्ध लड़ता रहा जो श्रीकृष्णद्वारा संरक्षित थीं।
अक्षिण्वंस्तद्वलं सर्व वृष्णय: कृष्णतेजसा ।
हतेषु स्वेष्वनीकेषु त्यक्तोगादरिभिनप: ॥
४२॥
अक्षिण्वनू--नष्ट कर दी; तत्--उसकी; बलमू--सेना; सर्वम्--सारी; वृष्णय:--वृष्णियों ने; कृष्ण-तेजसा-- भगवान् कृष्णकी शक्ति से; हतेषु--मृत होने पर; स्वेषु--अपनी; अनीकेषु --सेना के; त्यक्त:--छोड़ा गया; अगात्--चला जाता; अरिभि:--शत्रुओं द्वारा; नृप:--राजा, जरासन्ध |
भगवान् कृष्ण की शक्ति से, वृष्णिजन जरासन्ध की सारी सेना को नष्ट करते रहे और जबउसके सारे सैनिक मार डाले जाते तो राजा ( जरासन्ध ) अपने शत्रुओं द्वारा छोड़ दिये जाने परपुनः वहाँ से चला जाता।
अष्टादशम सड़्ग्राम आगामिनि तदन्तरा ।
नारदप्रेषितो वीरो यवन: प्रत्यहश्यत ॥
४३॥
अष्टा-दशम--अठारहवें; सड़ग्रामे--युद्ध में; आगामिनि--घटित होने वाले; तत्-अन्तरा--उस बीच; नारद--नारदमुनि द्वारा;प्रेषित: -- भेजा हुआ; वीर: --योद्धा; यवन:--बर्बर ( कालयवन नामक ); प्रत्यदहश्यत--प्रकट हुआ
जब अठारहवाँ युद्ध होने ही वाला था, तो कालयवन नामक एक बर्बर योद्धा, जिसे नारद नेभेजा था, युद्ध-दक्षेत्र में प्रकट हुआ।
रुरोध मथुरामेत्य तिसूभिम्लेच्छकोटिभि: ।
नूलोके चाप्रतिद्वन्द्ो वृष्णीन्श्रुत्वात्मसम्मितानू ॥
४४॥
रुरोध--घेर लिया; मथुराम्ू--मथुरा नगरी को; एत्य--आकर; तिसृभि: --तीन गुना; म्लेच्छ--बर्बरों से; कोटिभि: --एककरोड़; नू-लोके--मनुष्यों में; च--तथा; अप्रतिद्वन्द्वः --जिसका कोई उपयुक्त प्रतिद्वन्द्दी न हो; वृष्णीन्--वृष्णियों को; श्रुत्वा--सुनकर; आत्म--अपनी ही; सम्मितानू--जोड़ वाला |
मथुरा आकर इस यवन ने तीन करोड़ बर्बर ( म्लेच्छ ) सैनिकों समेत इस नगरी में घेरा डालदिया।
उसे कभी अपने से लड़ने योग्य प्रतिद्वन्द्दी व्यक्ति नहीं मिला था किन्तु उसने सुना था किवृष्णिजन उसकी जोड़ के हैं।
तं दृष्टाचिन्तयत्कृष्ण: सड्डर्षण सहायवान् ।
अहो यदूनां वृजिन प्राप्त ह्युभयतो महत् ॥
४५॥
तम्--उसको ;; हृष्ठा--देखकर; अचिन्तयत्--सोचा; कृष्ण: --कृष्ण ने; स्जूरषण --बलराम द्वारा; सहाय-वन्--सहायतापहुँचाया हुआ; अहो--आह; यदूनामू--यदुओं के लिए; वृजिनम्--समस्या; प्राप्तम्--आई हुईं; हि--निस्सन्देह; उभयत:--दोनों ओर से ( कालयवन से तथा जरासन्ध से ); महत्--महान् |
जब भगवान् कृष्ण तथा भगवान् संकर्षण ने कालयवन को देखा तो कृष्ण ने स्थिति परविचार किया और कहा, 'ओह! अब तो यदुओं पर दो ओर से संकट आ पड़ा है।
यवनोयं निरुन्धेस्मानद्य तावन््महाबल: ।
मागधोप्यद्य वा श्रो वा परश्रो वागमिष्यति ॥
४६॥
यवनः--विदेशी बर्बर, म्लेच्छ; अयम्ू--यह; निरुन्धे--विरोध कर रहा है; अस्मान्--हमको; अद्य--आज; तावत्--तब तक;महा-बलः--अत्यन्त बलवान; मागध:--जरासन्ध; अपि-- भी; अद्य--आज; वा--अथवा; श्रः--कल; वा-- अथवा; पर-श्र:ः--परसों; वा-- अथवा; आगमिष्यति-- आयेगा |
हमें यह यवन पहले से घेरे हुए है और शीघ्र ही यदि आज नहीं, तो कल या परसों तकमगध का बलशाली राजा यहाँ आ पहुँचेगा।
आवयो: युध्यतोरस्य यद्यागन्ता जरासुत: ।
बन्धून्हनिष्यत्यथ वा नेष्यते स्वपुरं बली ॥
४७॥
आवयोः: --हम दोनों; युध्यतो: -- लड़ते हुए; अस्य--उससे ( कालयवन से ); यदि--यदि; आगन्ता--आता है; जरा-सुतः--जराका पुत्र; बन्धून्ू--हमारे सम्बन्धी; हनिष्यति--मार डालेगा; अथ वा--या फिर; नेष्यते--ले जायेगा; स्व-- अपनी; पुरम्--नगरीमें; बली--बलवान |
यदि हमारे दोनों के कालयवन से युद्ध करने में संलग्न रहते समय, बलशाली जरासन्धआता है, तो वह या तो हमारे सम्बन्धियों को मार सकता है या फिर उन्हें पकड़कर अपनीराजधानी ले जा सकता है।
'तस्मादद्य विधास्यामो दुर्ग द्विपददुर्गमम् ।
तत्र ज्ञातीन्समाधाय यवनं घातयामहे ॥
४८॥
तस्मात्--इसलिए; अद्य-- आज; विधास्थाम:--बनायेंगे; दुर्गम्--किला; द्विपद--मनुष्यों के लिए; दुर्गमम्--दुर्गम; तत्र--वहाँ; ज्ञातीनू--अपने परिवार वालों को; समाधाय--रखकर; यवनम्--बर्बर को; घातयामहे--हम मार डालेंगे
अतः हम तुरन्त ऐसा किला बनायेंगे जिसमें मानवी सेना प्रवेश न कर पाये।
अपनेपारिवारिक जनों को उसमें वसा देने के पश्चात् हम म्लेच्छकज का वध करेंगे।
इति सम्मन्त्रय भगवान्दुर्ग द्वादशयोजनम् ।
अन्तःसमुद्रे नगरं कृत्स्नाद्भुतमचीकरत् ॥
४९॥
इति--इस प्रकार; सम्मन््य--सलाह करके; भगवान्-- भगवान् ने; दुर्गम्--किला; द्वादइश-योजनम्--बारह योजन का(लगभग १०० मील ); अन्तः--भीतर; समुद्रे--समुद्र के; नगरम्--नगर; कृत्सन--हर वस्तु से युक्त; अद्भुतम्ू-- अद्भुत;अचीकरत्--बनवा दिया।
इस तरह बलराम से सलाह करने के बाद भगवान् ने समुद्र के भीतर बारह योजन परिधिवाला एक किला बनवाया।
इस किले के भीतर उन्होंने एक ऐसा नगर बनाया जिसमें एक सेएक बढ़ कर अद्भुत वस्तुएँ उपलब्ध थीं।
हृश्यते यत्र हि त्वाष्ट विज्ञानं शिल्पनैपुणम् ।
रथ्याचत्वरवीथीभिर्यथावास्तु विनिर्मितम् ॥
५०॥
सुरद्रुमलतोद्यानविचित्रोपवनान्वितम् ।
हेमश्रुड्रैदिविस्पृर्भि: स्फटिकाड्टालगोपुरै: ॥
५१॥
राजतारकुटै: कोष्ठैहमकुम्भरलड्ड तैः ।
रलकूतैगहिर्हमैर्महामारकतस्थलै: ॥
५२॥
वास्तोष्पतीनां च गृहैर्वल्लभीभिश्च निर्मितम् ।
चातुर्वर्ण्यजनाकीर्ण यदुदेवगृहोल्लसत् ॥
५३॥
हृश्यते--देखा जाता था; यत्र--जिसमें; हि--निस्सन्देह; त्वाप्टमू-त्वष्टा ( विश्वकर्मा ) का; विज्ञानम्--वैज्ञानिक ज्ञान; शिल्प--शिल्पकला में; नैपुणम्--निपुणता; रथ्या--मुख्य मार्गों सहित; चत्वर--चौराहा या चौक; वीथीभि:--तथा व्यापारिक मार्गों से;यथा-वास्तु--काफी बड़े भू-खण्ड पर; विनिर्मितम्--बनाया हुआ; सुर--देवताओं के; द्रुम--वृक्षों; लता--तथा लताओं सेयुक्त; उद्यान--बगीचों; विचित्र--विचित्र; उपवन--तथा पार्को; अन्वितम्--से युक्त; हैम--स्वर्ण; श्रृद्रै:--चोटी से युक्त;दिवि--आकाश को; स्पृग्भि:--स्पर्श करते हुए; स्फटिका--स्फटिक के; अट्टाल--अटारियाँ; गोपुरैः--दरवाजों से युक्त;राजत--चाँदी के; आरकुटैः--तथा पीतल के; कोष्ठेः:--कोषागार, भंडार, अस्तबल आदि से युक्त; हेम--स्वर्ण; कुम्भेः-घड़ोंसे; अलड्डू तैः--सुसज्जित; रत्न--रत्तजटित; कूतैः--चोटियों वाले; गृहैः--घरों से; हेमैः --सोने के; महा-मारकत--बहुमूल्यमरकत मणियों से; स्थलै:--फर्श से युक्त; वास्तो:--घर-बार के; पतीनाम्--अधिष्ठाता देवों के; च--तथा; गृहैः--मन्दिरों से;वलल्लभीभि:--चौकसी बुर्जों से; च--तथा; निर्मितम्--बनाये गये; चातु:-वर्ण्य--चारों वर्णो के; जन--लोगों से;आकी्णम्--पूरित; यदु-देव--यदुओं के स्वामी, श्रीकृष्ण का; गृह--घरों से; उललसत्--अलंकृत
उस नगर के निर्माण में विश्वकर्मा के पूर्ण विज्ञान तथा शिल्पकला को देखा जा सकता था।
उसमें चौड़े मार्ग, व्यावसायिक सड़कें तथा चौराहे थे, जो विस्तृत भू-खण्ड में बनाये गये थे।
उसमें भव्य पार्क थे और स्वर्ग-लोक से लाये गये वृक्षों तथा लताओं से युक्त बगीचे भी थे।
उसके गोपुर के मीनारों के ऊपर सोने के बुर्ज थे, जो आकाश को चूम रहे थे।
उनकी अटारियाँस्फटिक मणियों से बनी थीं।
सोने से आच्छादित घरों के सामने का भाग सुनहरे घड़ों से सजायागया था और उनकी छतें रलजटित थीं तथा फर्श में बहुमूल्य मरकत मणि जड़े थे।
घरों के पासही कोषागार, भंडार तथा आकर्षक घोड़ों के अस्तबल थे, जो चाँदी तथा पीतल के बने हुए थे।
प्रत्येक आवास में एक चौकसी बुर्जी थी और घरेलू अर्चाविग्रह के लिए मन्दिर था।
यह नगरचारों वर्णों के लोगों से पूरित था और यदुओं के स्वामी श्रीकृष्ण के महलों के कारण विशेषरूप से अलंकृत था।
सुधर्मा पारिजातं च महेन्द्र: प्राहिणोद्धरे: ।
यत्र चावस्थितो मर्त्यों मर्त्यधर्मर्न युज्यते ॥
५४॥
सुधर्माम्--सुधर्मा नामक सभागार; पारिजातम्--पारिजात वृक्ष; च--तथा; महा-इन्द्र: --स्वर्ग के राजा इन्द्र ने; प्राहिणोत्--लाकर दिया; हरेः --कृष्ण को; यत्र--जिसमें ( सुधर्मा में ); च--तथा; अवस्थित: --स्थित; मर्त्य:--मर्त्य, मरणशील; मर्त्य-धर्म: --मरने के नियमों से; न युज्यते--प्रभावित नहीं है
इन्द्र ने श्रीकृष्ण के लिए सुधर्मा सभागार ला दिया जिसके भीतर खड़ा मनुष्य मृत्यु केनियमों से प्रभावित नहीं होता।
इन्द्र ने पारिजात वृक्ष भी लाकर दिया।
श्यामैकवर्णान्वरुणो हयान्शुक्लान्मनोजवान् ।
अष्टौ निधिपति: कोशान्लोकपालो निजोदयान् ॥
५५॥
श्याम--गहरा नीला; एक--नितान्त; वर्णान्ू--रंग का; वरुण:--सागरों का शासक वरुण; हयान्--घोड़े; शुक्लान्ू--सफेद;मनः--मन ( की तरह के ); जवान्--तेज; अष्टौ--आठ; निधि-पति:--देवताओं का कोषाध्यक्ष, कुवेर; कोशानू--खजाने को;लोक-पाल:--विभिन्न लोकों के शासक; निज--अपने; उदयान्--ऐश्वर्य विभूति
वरुण ने मन के समान वेग वाले घोड़े दिये जिनमें से कुछ शुद्ध श्याम रंग के थे और कुछसफेद थे।
देवताओं के कोषाध्यक्ष कुवेर ने अपनी आठों निधियाँ दीं और विभिन्न लोकपालों नेअपने अपने ऐश्वर्य प्रदान किये।
यद्यद्धगवता दत्तमाधिपत्यं स्वसिद्धये ।
सर्व प्रत्यर्पयामासुईरो भूमिगते नूप ॥
५६॥
यत् यत्--जो जो; भगवता-- भगवान् द्वारा; दत्तम्ू--दी गई; आधिपत्यम्--नियंत्रण करने की प्रदत्त शक्ति; स्व--निजी;सिद्धये--अधिकार जताने की सुविधा के लिए; सर्वम्ू--सारी; प्रत्यर्पयाम् आसु:--वापस दे दीं; हरौ--कृष्ण को; भूमि--पृथ्वीमें; गते--आये हुए; नृप--हे राजा ( परीक्षित )
हे राजन, जब भगवान् पृथ्वी पर आ गये तो इन देवताओं ने उन सभी सिद्द्रियों को उन्हेंअर्पित कर दिया जो उन्हें अपने विशेष अधिकार के निष्पादन के लिए पहले प्राप्त हुई थीं।
तत्र योगप्रभावेन नीत्वा सर्वजनं हरिः ।
प्रजापालेन रामेण कृष्ण: समनुमन्त्रित: ।
निर्जगाम पुरद्वारात्पदामाली निरायुध: ॥
५७॥
तत्र--वहाँ; योग--अपनी योगशक्ति के; प्रभावेन--प्रभाव से; नीत्वा--लाकर; सर्व--सभी; जनम्--अपनी प्रजा को; हरि: --भगवान् कृष्ण; प्रजा--नागरिकों के; पालेन--रक्षक; रामेण--बलराम द्वारा; कृष्ण: --कृष्ण ने; समनुमन्त्रित:--सलाह की;निर्जगाम--बाहर चले गये; पुर--नगर के; द्वारातू-द्वार से; पदा--कमल के फूलों की; माली--माला पहन कर; निरायुध: --बिना हथियार के |
अपनी योगमाया-शक्ति के बल से जब भगवान् कृष्ण ने अपनी सारी प्रजा को नये नगर मेंपहुँचा दिया तो उन्होंने बलराम से सलाह की जो मथुरा में उसकी रक्षा करने के लिए रह गये थे।
तब गले में कमल के फूलों की माला पहने और बिना हथियार के भगवान् कृष्ण मुख्य दरवाजेसे होकर मथुरा से बाहर चले गये।
