← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची

अध्याय पांच: नंद महाराज और वासुदेव की मुलाकात

10.5श्रीशुक उबाचनन्दस्त्वात्मज उत्पन्ने जाताह्नादो महामना: ।

आहूय विप्रान्वेदज्ञान्सनातः शुचिरलड्डू त: ॥

१॥

वाचयित्वा स्वस्त्ययनं जातकर्मात्मजस्य वे ।

'कारयामास विधिवत्पितृदेवार्चनं तथा ॥

२॥

श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; नन्द:--महाराज नन्द; तु--निस्सन्देह; आत्मजे--अपने पुत्र के; उत्पन्ने--उत्पन्नहोने में; जात--अभिभूत हुए; आह्वाद: --अत्यधिक हर्ष; महा-मना:--विशाल मन वाले; आहूय--बुलाया; विप्रानू--ब्राह्मणोंको; वेद-ज्ञानू--वेदों के ज्ञाता; स्नात:ः--स्नान करके; शुचि:--अपने को शुद्ध करके; अलड्डू त:ः--सुन्दर आभूषणों तथा नएउस्त्रों से सज्जित; वाचयित्वा--पाठ करके; स्वस्ति-अयनम्‌--( ब्राह्मणों द्वारा ) वैदिक मंत्र; जात-कर्म--जन्मोत्सव;आत्मजस्य--अपने लड़के का; वै--निस्सन्देह; कारयाम्‌ आस--सम्पन्न कराया; विधि-वत्‌--वैदिक विधान के अनुसार; पितृ-देव-अर्चनम्‌-पूर्वजों तथा देवताओं की पूजा; तथा--साथ ही साथ |

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : नन्‍्द महाराज स्वभाव से अत्यन्त उदार थे अतः जब भगवान्‌श्रीकृष्ण ने उनके पुत्र रूप में जन्म लिया तो वे हर्ष के मारे फूले नहीं समाए।

अतएव स्नान द्वारा अपने को शुद्ध करके तथा समुचित ढंग से वस्त्र धारण करके उन्होंने वैदिक मंत्रों का पाठ करनेवाले ब्राह्मणों को बुला भेजा।

जब ये योग्य ब्राह्मण शुभ बैदिक स्तोत्रों का पाठ कर चुके तोननन्‍्द ने अपने नवजात शिशु के जात-कर्म को विधिवत्‌ सम्पन्न किए जाने की व्यवस्था की।

उन्होंने देवताओं तथा पूर्वजों की पूजा का भी प्रबन्ध किया।

धेनूनां नियुते प्रादाद्विप्रेभ्य: समलड्डू ते ।

तिलाद्रीन्सप्त रत्तौघशातकौम्भाम्बरावृतान्‌ ॥

३॥

धेनूनामू-दुधारू गायों का; नियुते--बीस लाख; प्रादात्‌-दान में दिया; विप्रेभ्य:--ब्राह्मणों को; समलड्डू ते--पूरी तरहसज्जित; तिल-अद्रीनू--तिल ( अन्न ) के पहाड़; सप्त--सात; रत्त-ओघ-शात-कौम्भ-अम्बर-आवृतान्‌--रलों तथा सुनहरेकिनारे वाले बस्त्रों से ढके |

नन्द महाराज ने ब्राह्मणों को वस्त्रों तथा रत्नों से अलंकृत बीस लाख गौवें दान में दीं।

उन्होंने रत्नों तथा सुनहरे गोटे वाले बस्त्रों से ढके तिल से बनाये गये सात पहाड़ भी दान में दिए।

कालेन स्नानशौचाभ्यां संस्कारैस्तपसेज्यया ।

शुध्यन्ति दाने: सन्तुष्टया द्रव्याण्यात्मात्मविद्यया ॥

४॥

कालेन--समय आने पर ( स्थल तथा अन्य वस्तुएँ पवित्र हो जाने पर ); स्नान-शौचाभ्याम्‌--स्नान तथा सफाई के द्वारा ( शरीरतथा मलिन वस्तुएँ शुद्ध होती हैं ); संस्कारैः--संस्कार द्वारा ( जन्म शुद्ध होता है ); तपसा--तपस्या द्वारा ( इन्द्रियाँ शुद्ध होतीहैं ); इज्यया--पूजा द्वारा ( ब्राह्मण शुद्ध बनते हैं ); शुध्यन्ति--शुद्ध बनते हैं; दानैः--दान द्वारा ( सम्पत्ति शुद्ध होती है );सन्तुष्ठया--सन्तोष से ( मन शुद्ध होता है ); द्रव्याणि--सारी सम्पत्ति यथा गौवें, भूमि तथा सोना; आत्मा--आत्मा ( शुद्ध बनताहै ); आत्म-विद्यया--आत्म-साक्षात्कार द्वारा)

हे राजनू, समय बीतने के साथ ही, धरती तथा अन्य सम्पत्ति शुद्ध हो जाती हैं; स्नान सेशरीर शुद्ध होता है और सफाई करने से मलिन वस्तुएँ शुद्ध होती हैं।

संस्कार अनुष्ठानों से जन्मशुद्ध होता है, तपस्या से इन्द्रियाँ शुद्ध होती हैं तथा पूजा से और ब्राह्मणों को दान देने से भौतिकसम्पत्ति शुद्ध होती है।

सन्‍्तोष से मन शुद्ध होता है और आत्मज्ञान अर्थात्‌ कृष्णभावनामृत सेआत्मा शुद्ध होता है।

सौमडुल्यगिरो विप्रा: सूतमागधवन्दिन: ।

गायकाश्च जगुननेंदुर्भर्यों दुन्दुभयो मुहु: ॥

५॥

सौमड्ूल्य-गिर:ः--जिनकी वाणी से निकले मंत्र तथा स्तोत्र वातावरण को शुद्ध करते थे; विप्रा:--ब्राह्मणणण; सूत--इतिहासगाने में पठु लोग; मागध--राजपरिवारों के इतिहास गाने में पटु लोग; वन्दिन:--सामान्य वाचक; गायकाः --गवैये; च-- भी;जगु:--उच्चारण किया; नेदु:--बजाया; भेर्य:--एक प्रकार का वाद्य यंत्र; दुन्दुभय:--एक प्रकार का बाजा; मुहुः --निरन्तर |

ब्राह्मणों ने मंगलकारी वैदिक स्तोत्र सुनाए जिनकी ध्वनि से वातावरण शुद्ध हो गया।

प्राचीन इतिहासों या पुराणों को सुनाने वाले, राजपरिवारों के इतिहास सुनाने वाले तथा सामान्यवाचकों ने गायन किया जबकि गयदैयों ने भेरी, दुन्दुभी आदि अनेक प्रकार के वाद्य यंत्रों कीसंगत में गाया।

ब्रज: सम्मृष्टसंसिक्तद्वाराजिरगृहान्तर: ।

चित्रध्वजपताकासत्रक्नैलपललवतोरणै: ॥

६॥

ब्रज:--नन्द महाराज के अधिकार वाला भू-क्षेत्र; सम्पृष्ट-- अत्यन्त स्वच्छ की गई; संसिक्त--अच्छी तरह धोई गई; द्वार--दरवाजे; अजिर--आँगन; गृह-अन्तरः:--घर के भीतर की सारी वस्तुएँ; चित्र--रंग-बिरंगी; ध्वज--झंडियाँ; पताका--झंडे;सत्रकू--फूलों के हार; चैल--कपड़े के; पललव--आम की पत्तियों के; तोरणैः--विभिन्न स्थानों पर बनाए गए द्वारों के द्वारा(अलंकृत )

नन्द महाराज का निवास ब्रजपुर रंग-बिरंगी झंडियों तथा झंडों से पूरी तरह सजाया गया थाऔर विभिन्न स्थानों पर नाना प्रकार के फूलों की मालाओं, वस्त्रों तथा आम की पत्तियों से तोरणबनाए गए थे।

आँगन, सड़कों के पास के दरवाजे तथा घरों के कमरों के भीतर की सारी वस्तुएँअच्छी तरह से झाड़ बुहार कर पानी से धोई गई थीं।

गावो वृषा वत्सतरा हरिद्रातिलरूषिता: ।

विचित्रधातुबर्हस्त्रग्वस्त्रकाज्लनमालिन: ॥

७॥

गाव: --गौवें; वृषा:--बैल; वत्सतरा:--बछड़े; हरिद्रा--हल्दी; तैल--तेल; रूषिता: --लेप किए गए; विचित्र--तरह-तरह के;धातु--रंगीन खनिज; बई-स्त्रकू--मोरपंख के हार; वस्त्र--कपड़े; काञ्लन--सुनहरे गहने; मालिन:--मालाओं से सजाए हुए।

गौवों, बैलों तथा बछड़ों के सारे शरीर में हल्दी तथा तेल के साथ नाना प्रकार के खनिजोंका लेप किया गया था।

उनके मस्तकों को मोर पंखों से सजाया गया था, उन्हें मालाएँ पहनाईगई थीं और ऊपर से वस्त्र तथा सुनहरे गहनों से आच्छादित किया गया था।

महाईवस्त्राभरणकञ्जुकोष्णीषभूषिता: ।

गोपाः समाययू राजन्नानोपायनपाणय: ॥

८ ॥

महा-अरई--अत्यन्त मूल्यवान; वस्त्र-आभरण--कपड़ों तथा गहनों से; कञ्जुक--वृन्दावन में पहना जाने वाला विशेष वस्त्र,अँगरखा; उष्णीष--पगड़ी से; भूषिता:--अच्छी तरह सजे; गोपा:--सारे ग्वाले; समाययु;:--वहाँ आए; राजन्‌--हे राजन्‌( महाराज परीक्षित ); नाना--अनेक प्रकार की; उपायन-- भेंटें; पाणय:--हाथ में लिए हुएहे राजा परीक्षित, ग्वाले अत्यन्त मूल्यवान गहने तथा कंचुक और पगड़ी जैसे वस्त्रों से खूबसजे-धजे थे।

इस तरह से सजधज कर तथा अपने हाथों में तरह-तरह की भेंटें लेकर वे नन्दमहाराज के घर आए।

गोप्यश्चाकर्ण्य मुदिता यशोदाया: सुतोद्धवम्‌ ।

आत्मानं भूषयां चक्रुर्वस्त्राकल्पाझ्ननादिभि: ॥

९॥

गोप्य:--ग्वालों की पत्नियाँ, गोपियाँ; च--भी; आकर्ण्य--सुनकर; मुदिता: --अत्यंत्र प्रसन्न हुए; यशोदाया:--यशोदा माताके; सुत-उद्धवम्‌--पुत्र जन्म को; आत्मानम्‌--स्वयं; भूषयाम्‌ चक्रु:--उत्सव में जाने के लिए अच्छी तरह से सज गईं; वस्त्र-आकल्प-अद्धन-आदिभि: --उपयुक्त वस्त्रों, गहनों, काजल इत्यादि से।

गोपियाँ यह सुनकर अत्यधिक प्रसन्न थीं कि माता यशोदा ने पुत्र को जन्म दिया है, अतः वे उपयुक्त वस्त्रों, गहनों, काजल आदि से अपने को सजाने लगीं।

नवकुड्जू मकिज्ञल्कमुखपड्डजभूतय: ।

बलिभिस्त्वरितं जग्मु: पृथुश्रोण्यश्चलत्कुचा: ॥

१०॥

नव-कुद्डु म-किज्लल्क--केसर तथा नव-विकसित कुंकुम फूल से; मुख-पड्मज-भूतय:--अपने कमल जैसे मुखों में असाधारणसौन्दर्य प्रकट करते हुए; बलिभि:--अपने हाथों में भेंटें लिए हुए; त्वरितम्‌--जल्दी से; जग्मु;ः--( माता यशोदा के घर ) गई;पृथु- श्रोण्य: --स्त्रीयोचित सौन्दर्य के अनुरूप भारी नितम्बों वाली; चलतू-कुचा:--हिल रहे बड़े-बड़े स्तन।

अपने कमल जैसे असाधारण सुन्दर मुखों को केसर तथा नव-विकसित कुंकुम से अलंकृतकरके गोपियाँ अपने हाथों में भेंटें लेकर माता यशोदा के घर के लिए तेजी से चल पढ़ीं।

प्राकृतिक सौन्दर्य के कारण उनके नितम्ब बड़े-बड़े थे तथा तेजी से चलने के कारण उनकेबड़े-बड़े स्तन हिल रहे थे।

गोप्य: सुमृष्टमणिकुण्डलनिष्ककण्ठ्य-श्वित्राम्बरा: पथि शिखाच्युतमाल्यवर्षा: ।

नन्दालयं सवलया ब्रजतीर्विरेजु-व्यालोलकुण्डलपयोधरहारशोभा: ॥

११॥

गोप्य:--गोपियाँ; सु-मृष्ट--अत्यन्त चमकीले; मणि--रत्नों से बने; कुण्डल--कान की बालियाँ पहने; निष्क-कण्ठदय:--गलेमें पहना गया हार; चित्र-अम्बरा:--रंगीन किनारे वाली पोशाकें पहने; पथि--यशोदा माई के घर के रास्ते में; शिखा-च्युत--उनके बालों से गिरे हुए; माल्य-वर्षा:--फूलों की मालाओं की वर्षा; नन्द-आलयमू--महाराज नन्द के घर को; स-वलया: --हाथों में चूड़ियाँ पहने; ब्रजती: --जाती हुईं; विरिजु:--अत्यधिक सुन्दर लग रही थीं; व्यालोल--हिलते; कुण्डल--कान कीबालियों से युक्त; पयोधर--स्तन वाली; हार--फूलों के हारों से युक्त; शोभा: --अत्यन्त सुन्दर लगने वाली |

गोपियों के कानों में चमचमाते रत्नजटित बालियाँ थी और उनके गले में धातुओं के हाँसलटक रहे थे।

उनके हाथ चूड़ियों से विभूषित थे, उनकी वेशभूषाएँ विविध रंगों की थीं औरउनके बालों में लगे फूल रास्तों पर गिर रहे थे मानो वर्षा हो रही हो।

इस प्रकार नन्‍्द महाराज केघर जाते समय गोपियाँ, उनके कुंडल, उनके हिलते स्तन तथा मालाएँ अतीव सुन्दर लग रही थीं।

ता आशिष: प्रयु्ञानाश्चिरं पाहीति बालके ।

हरिद्राचूर्णतैलाड्द्ि: सिज्ञन्त्योडजनमुज्जगु: ॥

१२॥

ताः--सारी स्त्रियाँ, ग्वालों की पत्नियाँ तथा पुत्रियाँ; आशिष:--आशीर्वाद; प्रयुज्ञाना:-- भेंट; चिरम्‌ू--दीर्घकाल तक; पाहि--आप ब्रज के राजा बनें और इसके सारे निवासियों का पालन करें; इति--इस प्रकार; बालके --नवजात शिशु को; हरिद्रा-चूर्ण--हल्दी का चूर्ण; तैल-अद्द्धिः--तेल से मिश्रित; सिश्जन्त्यः--छिड़काव करते हुए; अजनमू--अजन्मा भगवान्‌ की;उज्जगु:--स्तुतियाँ कीं।

ग्वालों की पत्नियों तथा पुत्रियों ने नवजात शिशु, कृष्ण, को आशीर्वाद देते हुए कहा,’आप ब्रज के राजा बनें और यहाँ के सारे निवासियों का दीर्घकाल तक पालन करें।

' उन्होंनेअजन्या भगवान्‌ पर हल्दी, तेल तथा जल का मिश्रण छिड़का और प्रार्थनाएँ कीं ।

अवाद्यन्त विचित्राणि वादित्राणि महोत्सवे ।

कृष्णे विश्वेश्वरेडनन्ते नन्दस्य ब्रजमागते ॥

१३॥

अवाद्यन्त--वसुदेव के पुत्रोत्सव पर बजाया; विचित्राणि--विविध प्रकार के; वादित्राणि--वाद्ययंत्र; महा-उत्सवे--महान्‌ उत्सवमें; कृष्णे--जब भगवान्‌ कृष्ण; विश्व-ई श्वरे -- सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्वामी; अनन्ते--असीम; नन्दस्थ--महाराज नन्द के;ब्रजम्‌--चरागाह में; आगते--आए हुए

चूँकि अब सर्वव्यापी, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्वामी, अनन्त भगवान्‌ कृष्ण महाराज नन्‍्द कीपुरी में पदार्पण कर चुके थे, अतएवं इस महान्‌ उत्सव के उपलक्ष्य में नाना प्रकार के वाद्ययंत्रबजाये गये।

गोपाः परस्परं हष्टा दधिक्षीरघृताम्बुभि: ।

आसिजश्जन्तो विलिम्पन्तो नवनीतैश्व चिक्षिपु: ॥

१४॥

गोपाः-ग्वाले; परस्परम्‌--एक दूसरे से; हृष्टा:--प्रसन्न होकर; दधि--दही; क्षीर--औंटाया दूध ( खीर ); घृत-अम्बुभि:--घीके साथ मिले जल से; आसिद्ञन्त:ः--छिड़कते हुए; विलिम्पन्त:--लेप करके; नवनीतै: च--तथा मक्खन से; चिक्षिपु:--एकदूसरे पर फेंकने लगे।

ग्वालों ने प्रसन्न होकर एक दूसरे के शरीरों में दही, खीर, मक्खन तथा जल का घोलछिड़ककर इस महोत्सव का आनन्द लिया।

उन्होंने एक दूसरे पर मक्खन फेंका और एक दूसरेके शरीरों में पोता भी।

नन्दो महामनास्ते भ्यो वासोलड्डारगोधनम्‌ ।

सूतमागधवन्दिभ्यो येउन्ये विद्योपजीविन: ॥

१५॥

तैस्तैः कामैरदीनात्मा यथोचितमपूजयत्‌ ।

विष्णोराराधनार्थाय स्वपुत्रस्योदयाय च ॥

१६॥

नन्दः--महाराज नन्द; महा-मना:--जो ग्वालों में सर्वाधिक न्‍न्यायशील तथा माननीय पुरुष थे; तेभ्य:--ग्वालों को; वास:--वस्त्र; अलड्वार-गहने; गो-धनम्‌--तथा गाएँ; सूत-मागध-वन्दिभ्य: --सूतों ( प्राचीन गाथा गाने वालों ), मागधों( राजबंशों कीगाथा गाने वालों ) तथा वन्दीजनों ( सामान्य स्तुति गायकों ) को; ये अन्ये--तथा अन्यों को; विद्या-उपजीविन:--विद्या के बलपर जीविका चलाने वाले; तैः तैः--उन उन; कामै:--इच्छाओं से; अदीन-आत्मा--महाराज नन्द, जो इतने वदान्य थे; यथा-उचितम्‌--जो उपयुक्त था; अपूजयत्‌--उनकी पूजा की अथवा उन्हें तुष्ट किया; विष्णो: आराधन-अर्थाय--भगवान्‌ विष्णु कोप्रसन्न करने के उद्देश्य से; स्व-पुत्रस्य-- अपने पुत्र के; उदयाय--सर्वतोमुखी प्रगति के लिए; च--तथा |

उदारचेता महाराज नन्द ने भगवान्‌ विष्णु को प्रसन्न करने के लिए ग्वालों को वस्त्र,आभूषण तथा गाएँ दान में दीं।

इस तरह उन्होंने अपने पुत्र की दशा को सभी प्रकार से सँवारा।

उन्होंने सूतों, मागधों, वन्दीजनों तथा अन्य वृत्ति वाले लोगों को उनकी शैक्षिक योग्यता केअनुसार दान दिया और हर एक की इच्छाओं को तुष्ट किया।

रोहिणी च महाभागा नन्दगोपाभिनन्दिता ।

व्यचरहिव्यवाससत्रक्रणठाभरणभूषिता ॥

१७॥

रोहिणी--बलदेव की माता, रोहिणी; च-- भी; महा-भागा--परम भाग्यशालिनी ( कृष्ण तथा बलराम को साथ-साथ पालने केकारण ); नन्द-गोपा-अभिनन्दिता--नन्द महाराज तथा माता यशोदा द्वारा सम्मानित; व्यचरत्‌--इधर-उधर विचरण करने मेंव्यस्त; दिव्य--सुन्दर; वास--वेशभूषा; सत्रकु--माला; कण्ठउ-आभरण--गले के गहने से; भूषिता--विभूषित |

बलदेव की माता अति-भाग्यशालिनी रोहिणी नन्‍्द महाराज तथा यशोदा द्वारा अभिनन्दितहुईं।

उन्होंने भी शानदार वस्त्र पहन रखे थे और गले के हार, माला तथा अन्य गहनों से अपने कोसजा रखा था।

वे उस उत्सव में अतिथि-स्त्रियों का स्वागत करने के लिए इधर-उधर आ-जा रहीथीं।

तत आरशभ्य नन्दस्य ब्रज: सर्वसमृद्धिमान्‌ ।

हरेर्निवासात्मगुणै रमाक्रीडमभून्रूप ॥

१८॥

ततः आरभ्य--उस समय से लेकर; नन्दस्य--महाराज नन्द का; ब्रज: --ब्रजभूमि, गौवों को पालने तथा संरक्षण प्रदान करने कीभूमि; सर्व-समृद्द्धिमान्‌ू--सभी प्रकार के धन से ऐश्वर्यवान; हरे: निवास-- भगवान्‌ के निवास स्थान का; आत्म-गुणै: --दिव्यगुणों से; रमा-आक्रीडम्‌--लक्ष्मी की लीलास्थली; अभूत्‌--बनी; नृप--हे राजा ( परीक्षित )

हे महाराज परीक्षित, नन्द महाराज का घर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ तथा उनके दिव्य गुणोंका शाश्वत धाम है फलत: उसमें समस्त सम्पदाओं का ऐश्वर्य सदैव निहित है।

फिर भी कृष्ण केआविर्भाव के दिन से ही वह घर देवी लक्ष्मी की क्रीड़ास्थली बन गया।

गोपान्गोकुलरक्षायां निरूप्य मथुरां गत: ।

नन्दः कंसस्य वार्षिक्यं करं दातुं कुरूद्दद ॥

१९॥

गोपान्‌ू-ग्वालों को; गोकुल-रक्षायामू--गोकुल मण्डल की रक्षा के लिए; निरूप्य--नियुक्त करके; मथुराम्‌--मथुरा; गत: --गए; नन्द: --नन्द महाराज; कंसस्य--कंस का; वार्षिक्यम्‌-वार्षिक कर; करम्‌--लाभांश; दातुमू-- भुगतान करने के लिए;कुरु-उद्ठद-हे कुरु वंश के रक्षक, महाराज परीक्षित |

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : हे महाराज परीक्षित, हे कुरुवंश के सर्वश्रेष्ठ रक्षक, उसकेबाद नन्द महाराज ने स्थानीय ग्वालों को गोकुल की रक्षा के लिए नियुक्त किया और स्वयं राजाकंस को वार्षिक कर देने मथुरा चले गए।

बसुदेव उपश्रुत्य भ्रातरे नन्दमागतम्‌ ।

ज्ञात्वा दत्तकरं राज्ने ययौ तदवमोचनम्‌ ॥

२०॥

बसुदेव:--वसुदेव; उपश्रुत्य--सुनकर; भ्रातरम्‌--अपने मित्र तथा भाई; नन्दम्‌--नन्द महाराज को; आगतम्‌--मथुरा आयाहुआ; ज्ञात्वा--जानकर; दत्त-करम्‌--पहले ही कर चुकता किया जा चुका था; राज्ञे--राजा के पास; ययौ--गया; ततू-अवमोचनम्‌--नन्द महाराज के डेरे तक ।

जब वसुदेव ने सुना कि उनके अत्यन्त प्रिय मित्र तथा भाई नन्‍्द महाराज मथुरा पधारे हैं औरवे कंस को कर भुगतान कर चुके हैं, तो वे नन्‍्द महाराज के डेरे में गए।

त॑ दृष्ठा सहसोत्थाय देहः प्राणमिवागतम्‌ ।

प्रीत: प्रियतमं दोर्भ्या सस्वजे प्रेमविहलः ॥

२१॥

तम्‌--उसको ( वसुदेव को ); दृष्टा--देखकर; सहसा--अचानक; उत्थाय--उठकर; देह: --वही शरीर; प्राणम्‌-- प्राण; इब--मानो; आगतम्‌--लौट आया हो; प्रीत:--इतना प्रसन्न; प्रिय-तमम्‌--अपने प्रिय मित्र तथा भाई; दोर्भ्याम्‌--अपनी दोनों बाहुओंद्वारा; सस्वजे--गले मिले; प्रेम-विहलः--प्रेम तथा स्नेह से अभिभूत |

जब नन्द महाराज ने सुना कि वसुदेव आए हैं, तो बे प्रेम तथा स्नेह से अभिभूत हो उठे औरइतने प्रसन्न हुए मानो उन्हें पुन: जीवन पा लिया हो।

वसुदेव को अचानक उपस्थित देखकर वे उठखड़े हुए और अपनी दोनों भुजाओं में लेकर गले लगा लिया।

पूजितः सुखमासीन: पृष्ठानामयमाहतः ।

प्रसक्तधी: स्वात्मजयोरिदमाह विशाम्पते ॥

२२॥

'पूजित:--इस तरह प्रेम पूर्वक स्वागत किए गए वसुदेव; सुखम्‌ आसीन: --सुखपूर्वक बैठने के लिए स्थान दिए गए; पृष्ठा --पूछकर; अनामयम्‌--शुभ प्रश्न; आहत:--समादरित; प्रसक्त-धी:--अत्यन्त आसक्त होने के कारण; स्व-आत्मजयो: --अपनेदोनों पुत्रों ( कृष्ण तथा बलराम ); इृदम्‌--इस प्रकार; आह--पूछा; विशाम्‌-पते--हे महाराज परीक्षित।

हे महाराज परीक्षित, नन्द महाराज द्वारा, इस प्रकार आदरपूर्वक सत्कार एवं स्वागत किएजाने पर वसुदेव बड़ी ही शान्ति से बैठ गए और अपने दोनों पुत्रों के प्रति अगाध-प्रेम के कारणउनके विषय में पूछा।

दिष्टद्या भ्रात: प्रवयस इदानीमप्रजस्य ते ।

प्रजाशाया निवृत्तस्य प्रजा यत्समपद्यत ॥

२३॥

दिछ्या--सौभाग्यवश; भ्रात:--हे भाई; प्रवयस:--अधिक आयु वाले आपका; इदानीम्‌--इस समय; अप्रजस्यथ--सन्तानहीनका; ते--आपका; प्रजा-आशाया: निवृत्तस्य--जिसे इस अवस्था में पुत्र प्राप्ति की आशा न रह गई हो, उसका; प्रजा--पुत्र;यत्‌--जो भी; समपद्यत-- भाग्यवश प्राप्त हो गया।

मेरे भाई नन्‍्द महाराज, इस वृद्धावस्था में भी आपका कोई पुत्र न था और आप निराश होचुके थे।

अतः अब जबकि आपको पुत्र प्राप्त हुआ है, तो यह अत्यधिक सौभाग्य का लक्षण है।

दिष्टद्या संसारचक्रे उस्मिन्वर्तमान: पुनर्भव: ।

उपलब्धो भवानद्य दुर्लभं प्रियदर्शनम्‌ ॥

२४॥

दिछ्या--सौभाग्य से ही; संसार-चक्रे अस्मिन्‌ू--इस जन्म-मृत्यु वाले जगत में; वर्तमान:--विद्यमान होकर; पुनः-भव:--आपकी मेरी भेंट दूसरे जन्म की तरह है; उपलब्ध: --मेरे द्वारा प्राप्त होकर; भवान्‌--आप; अद्य--आज; दुर्लभम्‌--यद्यपि इसेकभी घटित नहीं होना था; प्रिय-दर्शनम्‌--हे मित्र आपको पुनः देखने के लिए

यह मेरा सौभाग्य ही है कि मैं आपके दर्शन कर रहा हूँ।

इस अवसर को प्राप्त करके मुझेऐसा लग रहा है मानो मैंने फिर से जन्म लिया हो।

इस जगत में उपस्थित रह कर भी मनुष्य केलिए अपने घनिष्ठ मित्रों तथा प्रिय सम्बन्धियों से मिल पाना अत्यन्त कठिन होता है।

नैकत्र प्रियसंवास: सुहृदां चित्रकर्मणाम्‌ ।

ओधेन व्यूह्ममानानां प्लवानां सत्रोतसो यथा ॥

२५॥

न--नहीं; एकत्र--एक स्थान में; प्रिय-संवास:--अपने प्रिय मित्रों तथा सम्बन्धियों के साथ रहना; सुहृदाम्‌--मित्रों का; चित्र-कर्मणाम्‌--हम सबका जिन्हें अपने विगत कर्म के कारण नाना प्रकार के फल भोगने होते हैं; ओघेन--बल के द्वारा;व्यूह्ममानानामू--ले जाया जाकर; प्लवानामू--जल में तैरने वाले तिनके तथा अन्य पदार्थों का; स्रोतस:--लहरों का; यथा--जिस तरह।

लकड़ी के फट्टे और छड़ियाँ एकसाथ रुकने में असमर्थ होने से नदी की लहरों के वेग सेबहा लिए जाते हैं।

इसी तरह हम अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों से घनिष्ठ सम्बन्ध रखते हुए भी अपने नाना प्रकार के विगत कर्मों तथा काल की लहरों के कारण एकसाथ रहने में असमर्थ होतेहैं।

'कच्चित्पशव्यं निरुजं भूर्यम्बुतृणवीरु धम्‌ ।

बृहद्वनं तदधुना यत्रास्से त्वं सुहृद्बृत: ॥

२६॥

कच्चित्‌--चाहे; पशव्यम्‌--गौवों की सुरक्षा; निरुजम्‌--बिना कष्ट या रोग के; भूरि--पर्याप्त; अम्बु--जल; तृण--घास;वीरुधम्‌--पौधे; बृहत्‌ वनम्‌--विशाल जंगल; तत्‌--ये सारे प्रबन्ध वहाँ हैं; अधुना--अब; यत्र--जहाँ; आस्से--रह रहे हैं;त्वमू--तुम, आप; सुहत्‌-बृतः--मित्रों से घिरे हुए

हे मित्र नन्द महाराज, आप जिस स्थान में रह रहे हैं क्या वहाँ का जंगल पशुओं-गौवों केलिए अनुकूल है? आशा है कि वहाँ रोग या कोई असुविधा नहीं होगी।

वह स्थान जल, घासतथा अन्य पौधों से भरा-पुरा होगा।

भ्रातर्मम सुतः कच्चिन्मात्रा सह भवदव्रजे ।

तातं भवन्तं मन्वानो भवद्भ्यामुपलालित: ॥

२७॥

भ्रात:--मेरे भाई; मम--मेरे; सुत:--पुत्र ( रोहिणी पुत्र बलदेव ); कच्चित्‌--क्या; मात्रा सह--अपनी माता रोहिणी के साथ;भवत्‌ू-ब्रजे--अपने घर में; तातमू--पिता तुल्य; भवन्तम्‌--आपको; मन्वान: --सोचते हुए; भवद्भ्यामू--आप तथा आपकीपतली यशोदा द्वारा; उपलालित:--ठीक से पाले जाने से

आप तथा यशोदा देवी के द्वारा पाले जाने के कारण मेरा पुत्र बलदेव आप दोनों को अपनामाता-पिता मानता तो है न, वह आपके घर में अपनी असली माता रोहिणी के साथ शान्तिपूर्वकरह रहा है न! पुंसस्त्रिवर्गो विहितः सुहदो हानुभावित: ।

न तेषु क्लिशएयमानेषु त्रिवर्गोर्थाय कल्पते ॥

२८॥

पुंस:--मनुष्य का; त्रि-वर्ग:--जीवन के तीन उद्देश्य ( धर्म, अर्थ और काम ); विहितः--वैदिक संस्कारों के अनुसार आदिष्ट;सुहृद:--सम्बन्धियों तथा मित्रों के प्रति; हि--निस्सन्देह; अनुभावितः--सही मार्ग में होने पर; न--नहीं; तेषु--उनमें;क्लिश्यमानेषु--क्लेश में पड़े हुए; त्रि-वर्ग:--जीवन के तीन उद्देश्य; अर्थाय--किसी प्रयोजन के लिए; कल्पते--ऐसा हो जाताहै

जब किसी के मित्र तथा सम्बन्धीगण अपने-अपने पदों पर ठीक तरह से बने रहते हैं, तोवैदिक साहित्य में उल्लिखित उनके धर्म, अर्थ तथा काम लाभप्रद होते हैं।

अन्यथा, मित्रों तथासम्बन्धियों के क्लेशग्रस्त होने पर इन तीनों से कोई सुख नहीं मिल पाता।

श्रीनन्द उवाचअहो ते देवकीपुत्रा: कंसेन बहवो हताः ।

एकावशिष्टावरजा कन्या सापि दिवं गता ॥

२९॥

श्री-नन्दः उवाच--नन्द महाराज ने कहा; अहो--हाय; ते--तुम्हारे; देवकी-पुत्रा:--तुम्हारी पत्नी के सारे पुत्र; कंसेन--कंसद्वारा; बहवः--अनेक; हता:--मारे गए; एका--एक; अवशिष्टा--बची हुईं; अवरजा--सबसे छोटी; कन्या--कन्या; साअपि--वह भी; दिवम्‌ गता--स्वर्गलोक को चली गई।

नन्द महाराज ने कहा : हाय! राजा कंस ने देवकी से उत्पन्न तुम्हारे अनेक बालकों को मारडाला।

और तुम्हारी सन्‍्तानों में सबसे छोटी एक कन्या स्वर्गलोक को चली गई।

नूनं ह्ादृष्टनिष्ठो यमहष्टपरमो जन: ।

अद्दष्टमात्मनस्तत्त्वं यो वेद न स मुहाति ॥

३०॥

नूनमू--निश्चय ही; हि--निस्सन्देह; अहष्ट--अनदेखा; निष्ठ: अयम्‌--यही अन्त है; अदृष्ट--अहृष्ट प्रारब्ध; परम:--परम; जन:ः--संसार का हर जीव; अदृष्टम्‌--वही प्रारब्ध; आत्मन:--अपना ही; तत्त्वमू--परम सत्य; यः--जो; वेद--जानता है; न--नहीं;सः--वह; मुहाति--मोहग्रस्त होता है|

प्रत्येक व्यक्ति निश्चय ही प्रारब्ध द्वारा नियंत्रित होता है क्योंकि उसी से मनुष्य के सकामकर्मो के फल निर्धारित होते हैं।

दूसरे शब्दों में, अद्ृष्ट प्रारब्ध के कारण ही मनुष्य को पुत्र यापुत्री प्राप्त होती है और जब पुत्र या पुत्री नहीं रहते, तो वह भी अद्दष्ट प्रारब्ध के ही कारण होताहै।

प्रारब्ध ही हर एक का अनन्तिम नियंत्रक है।

जो इसे जानता है, वह कभी मोहग्रस्त नहींहोता।

श्रीवसुदेव उवाचकरो वे वार्षिको दत्तो राज्ञे दृष्टा वयं च वः ।

नेह स्थेयं बहुतिथं सन्त्युत्पाताश्च गोकुले ॥

३१॥

श्री-वसुदेवः उवाच-- श्री वसुदेव ने उत्तर दिया; कर:ः--कर; बै--निस्सन्देह; वार्षिक: --वार्षिक ( सालाना ); दत्त:--दियाहुआ; राज्े--राजा को; दृष्टा:--देखा गया; वयम्‌ च--हम दोनों; वः--तुम्हारा; न--नहीं; इह--इस स्थान में; स्थेयम्‌ू--रुकना,ठहरना; बहु-तिथम्‌--बहुत दिनों तक; सन्ति--हो सकते हैं; उत्पाता: च--अनेक उपद्रव; गोकुले--आपके घर गोकुल में।

बसुदेव ने नन्द महाराज से कहा : मेरे भाई, अब तो आपने कंस को वार्षिक कर चुका दियाहै और मुझसे भी भेंट कर ली है, अतः इस स्थान पर अब अधिक दिन मत रूुको।

गोकुल लौट जाना बेहतर है क्योंकि मैं जानता हूँ कि वहाँ कुछ उपद्रव हो सकते हैं।

श्रीशुक उबाचइति नन्दादयो गोपाः प्रोक्तास्ते शौरिणा ययु: ।

अनोभिरनडुद्ुक्तैस्तमनुज्ञाप्प गोकुलम्‌ ॥

३२॥

श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; नन्द-आदय:--नन्द महाराज तथा उनके साथी; गोपा: --ग्वाले; प्रोक्ता:--सलाह दिए जाने पर; ते--वे; शौरिणा--वसुदेव द्वारा; ययु:--उस स्थान से रवाना हो गए; अनोभि:--बैलगाड़ियों द्वारा; अनडुत्‌-युक्ती:--बैलों से जुती; तम्‌ अनुज्ञाप्प--वसुदेव से अनुमति लेकर; गोकुलम्‌--गोकुल के लिए।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब वसुदेव ने नन्‍्द महाराज को इस प्रकार सलाह दी तो नन्दमहाराज तथा उनके संगी ग्वालों ने वसुदेव से अनुमति ली, अपनी-अपनी गाड़ियों में बैल जोतेऔर सवार होकर गोकुल के लिए प्रस्थान कर गये।

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