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अध्याय अड़तालीसवाँ: कृष्ण अपने भक्तों को प्रसन्न करते हैं

10.48श्रीशुक उबाचअथ विज्ञाय भगवास्सववत्मा सर्वदर्शनः ।

सैरन्या:कामतप्ताया: प्रियमिच्छन्गृहं ययौ ॥

१॥

श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; अथ--तब; विज्ञाय--जानकर; भगवान्‌-- भगवान्‌; सर्व--सबों के;आत्मा--आत्मा; सर्व--सबों के ; दर्शन: --द्रष्टा; सैरन्या:--सेवा करने वाली लड़की त्रिवक्रा के; काम--कामवासना से;तप्ताया:--संतप्त; प्रियम्‌--तुष्टि; इच्छन्‌--चाहने वाली; गृहम्‌--घर; ययौ--गये

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : उद्धव के सन्देश को आत्मसात करने के बाद समस्त प्राणियोंके सर्वज्ञ आत्मा भगवान्‌ कृष्ण ने सेवा करने वाली लड़की त्रिवक्रा को तुष्ट करना चाहा जोकामवासना से पीड़ित थी।

अतः वे उसके घर गये।

महाहोंपस्करैराढ्यं कामोपायोपबूंहितम्‌ ।

मुक्तादामपताकाभिर्वितानशयनासने: ।

धूपै: सुरभिभिर्दीपै: स्त्रग्गन्थेरपि मण्डितम्‌ ॥

२॥

महा-अर्ह--महँगे; उपस्करैः --साज-सामान से; आढ्यम्‌--सम्पन्न; काम--कामवासना का; उपाय--साज-सामान;उपबृंहितम्‌-- भरा-पुरा; मुक्ता-दाम--मोतियों की लड़ियों से; पताकाभि:--तथा झंडों से; वितान--चँदोवों से; शयन--पलँग;आसनै:--तथा आसमनों से; धूपैः--अगुरु से; सुरभिभि: --सुगन्धित; दीपैः--दीपकों से; सत्रकु--फूल की मालाओं से; गन्धै:--तथा सुगन्धित चन्दन-लेप से; अपि-- भी; मण्डितम्‌--सजाया हुआ।

त्रिवक्रा का घर ऐश्वर्ययुक्त साज-सामान से बड़ी शान से सजाया हुआ था और कामोत्तेजनाउभाड़ने वाली साज-सामग्री से भरा-पूरा था।

उसमें झंडियाँ, मोती की लड़ें, चँदोवा, सुन्दर सेजतथा बैठने के आसन थे और सुगन्धित अगुरु, दीपक, फूल-मालाएँ तथा सुगन्धित चन्दन-लेपभी था।

गृहं तमायान्तमवेक्ष्य सासनात्‌सद्यः समुत्थाय हि जातसम्भ्रमा ।

यथोपसड़ुम्य सखीभिरच्युतंसभाजयामास सदासनादिभि:ः ॥

३॥

गृहम्‌--अपने घर पर; तम्‌--उसको; आयान्तम्‌--आया हुआ; अवेक्ष्य--देखकर; सा--वह; आसनात्‌--आसन से; सद्यः --तुरन्त; समुत्थाय--उठकर; हि--निस्सन्देह; जात-सम्भ्रमा-- हड़बड़ाकर; यथा--समुचित ढंग से; उपसण्गम्य-- आगे आकर;सखीभि:--अपनी सखियों सहित; अच्युतम्‌-- भगवान्‌ कृष्ण को; सभाजयाम्‌ आस--आदरपूर्वक सत्कार किया; सतू-आसन--उत्तम आसन; आदिभिः--इत्यादि से ।

जब त्रिवक्रा ने उन्हें अपने घर की ओर आते देखा तो वह हड़बड़ाकर तुरन्त ही अपने आसनसे उठ खड़ी हुईं।

अपनी सखियों समेत आगे आकर उसने भगवान्‌ अच्युत को उत्तम आसन तथा पूजा की अन्य सामग्रियाँ अर्पित करते हुए उनका सत्कार किया।

तथोद्धव: साधुतयाभिपूजितोन्यषीददुर्व्यामभिमृश्य चासनम्‌ ।

कृष्णोपि तूर्ण शयनं महाधनंविवेश लोकाचरितान्यनुव्रत: ॥

४॥

तथा--भी; उद्धव: --उन्दधव; साधुतया--साधु-पुरुष की तरह; अभिपूजित:--पूजित; न्यषीदत्‌--बैठ गये; उर्व्यामू--जमीन पर;अभिमृश्य--स्पर्श करके; च--तथा; आसनम्‌--आसन का; कृष्ण: -- भगवान्‌ कृष्ण; अपि--तथा; तूर्णम्‌--अविलम्ब;शयनमू--सेज पर; महा-धनम्‌-- अत्यन्त वैभवशाली; विवेश--लेट गये; लोक--मानव समाज का; आचरितानि--आचरणोंका; अनुब्रत:--अनुकरण करते हुए।

उद्धव को भी सम्मानयुक्त आसन प्राप्त हुआ।

चुँकि वे साधु सदृश पुरुष थे अतः उन्होंनेउसका स्पर्श ही किया और फिर फर्श पर बैठ गये।

तब भगवान्‌ कृष्ण मानव समाज के आचारों( लोकाचार ) का अनुकरण करते हुए ऐश्वर्यशाली शय्या पर लेट गये।

सा मज्जनालेपदुकूलभूषण-सर्रग्गन्धताम्बूलसुधासवादिभि: ।

प्रसाधितात्मोपससार माधवसब्रीडलीलोत्स्मितविशभ्रमेक्षितै: ॥

५॥

सा--वह, त्रिवक्रा; मज्जन--स्नान करके; आलेप--लेप लगाकर; दुकूल--सुन्दर वस्त्र पहनकर; भूषण-- आभूषणों से;सत्रकू--मालाओं से; गन्ध--सुगन्ध; ताम्बूल--पान; सुधा-आसव--सुगन्धित पेय; आदिभि:--आदि से; प्रसाधित--तैयारकिया; आत्मा--अपना शरीर; उपससार--पास आई; माधवम्‌-- भगवान्‌ कृष्ण के; स-ब्रीड--सलज; लीला--खिलवाड़-भरी, लीलामयी; उत्स्मित--अपनी हँसी का; विभ्रम--लुभाने वाली; ईक्षितैः--चितवनों से|

त्रिवक्रा नहाकर, अपने शरीर में लेप लगाकर तथा सुन्दर वस्त्र पहनकर और तब आभूषणऔर मालाएँ पहन कर और सुगन्ध लगाने के बाद पान-सुपारी चबाकर और सुगन्धित पेय पीकरतैयार हुई।

तब वह लजीली, लीलामयी हँसी तथा लुभाने वाली चितवनों से माधव के पासपहुँची।

आहूय कान्तां नवसड्रमहियाविशद्ितां कट्ढडणभूषिते करे ।

प्रगृह्म शय्यामधिवेश्य रामयारेमेउनुलेपार्पणपुण्यलेशया ॥

६॥

आहूय--बुलाकर; कान्ताम्‌--अपनी प्रियतमा को; नव--नवीन; सड्रम--संसर्ग का; हिया--लाज से युक्त; विशद्धिताम्‌--सशंकित; कड्ढडण--चूड़ियों से; भूषिते--आभूषित; करे--दोनों हाथों में; प्रगृह्क--पकड़े; शय्याम्‌--सेज पर; अधिवेश्य--बैठकर; रामया--सुन्दरी स्त्री के साथ; रेमे--रमण किया; अनुलेप--लेप का; अर्पण--अर्पण; पुण्य--पवित्रता का;लेशया--तनिक भी |

इस नवीन सम्पर्क ( मिलन ) की प्रत्याशा से सशंकित तथा लजीली प्रेमिका को आगे आनेके लिए बुलाते हुए भगवान्‌ ने कंगन से सुशोभित उसके हाथों को पकड़कर अपनी सेज परखींच लिया।

इस तरह उन्होंने उस सुन्दरी के साथ रमण किया जिसकी एकमात्र पवित्रता इतनीही थी कि उसने पहले किसी समय भगवान्‌ को लेप अर्पित किया था।

सानड्रतप्तकुचयोरुरसस्तथाक्ष्णो -जिप्रन्त्यनन्तचरणेन रुजो मृजन्ती ।

दोर्भ्या स्तनान्तरगतं परिरभ्य कान्त-मानन्दमूर्तिमजहादतिदीर्घतापम्‌ ॥

७॥

स--वह; अनड्ु--कामदेव द्वारा; तप्त--जलती हुई; कुचयो:--अपने स्तनों के; उरसः--अपनी छाती के; तथा--और;अक्ष्णो:--अपनी आँखों के; जिप्रन्ती --सूँघती; अनन्त-- अनन्त भगवान्‌ कृष्ण के; चरणेन--चरणों से; रुज:--पीड़ा;मृजन्ती--पोंछती हुई; दोर्भ्यामू-- अपनी बाहुओं से; स्तन--स्तनों के; अन्तर-गतम्‌--बीच; परिरभ्य--आलिंगन करके;कान्तम्‌-प्रेमी को; आनन्द--समस्त आनन्द की; मूर्तिम्‌--साक्षात्‌ अभिव्यक्तिको; अजहातू--त्याग दिया; अति--अत्यधिक;दीर्घ--दीर्घकालीन; तापम्‌-कष्ट को

भगवान्‌ के चरणकमलों की सुगन्धि से ही त्रिवक्रा ने अपने स्तनों, छाती तथा आँखों मेंकामदेव द्वारा उत्पन्न जलती हुई कामवासना को धो दिया।

अपनी दोनों बाँहों से उसने अपने स्तनों के मध्य स्थित अपने प्रेमी श्रीकृष्ण का आलिंगन किया जो आनन्द की मूर्ति हैं और इस तरहउसने अपने दीर्घकालीन व्यथा को त्याग दिया।

सैवं कैवल्यनाथं त॑ प्राप्य दुष्प्राप्पमी श्वरम्‌ ।

अड्डरागार्पणेनाहो दुर्भगेदमयाचत ॥

८॥

स--उसने; एवम्‌--इस प्रकार; कैवल्य--मुक्ति के; नाथम्‌--नियन्ता; तम्‌--उस; प्राप्प--प्राप्त करके; दुष्प्राप्पम्‌-प्राप्त न होसकने वाले; ईश्वरम्‌-- भगवान्‌ को; अड्ड-राग--शरीर का लेप; अर्पणेन-- प्रदान करने से; अहो-- ओह; दुर्भगा--अभागी;इदम्‌--यह; अयाचत--उसने माँगा

केवल शरीर का लेप प्रदान करने से ही अलभ्य भगवान्‌ को इस प्रकार पाकर उस अभागीत्रिवक्रा ने स्वतंत्रता ( मोक्ष ) के उन स्वामी से निम्नलिखित याचना की।

सहोष्यतामिह प्रेष्ठ दिनानि कतिचिन्मया ।

रमस्व नोत्सहे त्यक्तु सड़ूं तेम्बुरुहेक्षण ॥

९॥

सह--साथ में; उष्यताम्‌-ठहरें; इह--यहाँ; प्रेष्ट--हे प्रिय; दिनानि--दिन; कतिचित्‌--कुछ; मया--मेंरे साथ; रमस्व--रमणकरें; न उत्सहे--सहन नहीं कर सकती; त्यक्तुमू--छोड़ पाना; सड्रम्‌--साथ; ते--तुम्हारा; अम्बुरुह-ईक्षण--हे कमल-नेत्र |

त्रिवक्रा ने कहा : हे प्रियतम! आप यहाँ पर मेरे साथ कुछ दिन और रुकें और रमण करें।

है कमल-नेत्र! मैं आपका साथ छोड़कर नहीं रह सकती।

तस्ये कामवरं दत्त्वा मानयित्वा च मानदः ।

सहोद्धवेन सर्वेश: स्वधामागमहद्द्धिमत्‌ू ॥

१०॥

तस्यै--उसको; काम-- भौतिक इच्छा का; वरम्‌ू--वर; दत्त्वा--देकर; मानयित्वा--अपना आदर दिखलाकर; च--तथा; मान-दः--अन्यों का आदर करने वाले; सह उद्धवेन--उद्धव के साथ; सर्व-ईश:--सभी जीवों के प्रभु; स्‍्व--अपने; धाम--वासस्थान; अगमत्‌--चले गये; ऋद्द्धि-मत्‌--अत्यन्त समृद्धिवान।

इस काम-इच्छा को पूरा करने का वचन देकर, समस्त जीवों के स्वामी, सबका मान रखनेवाले कृष्ण ने त्रिवक्रा का अभिवादन किया और तब उद्धव समेत अपने अत्यन्त समृद्द्रिशालीधाम को लौट आये।

दुरा्ध्य समाराध्य विष्णु सर्वेश्रेश्वरम्‌ ।

यो वृणीते मनोग्राह्ममसत्त्वात्कुमनीष्यसौ ॥

११॥

दुराराध्यम्‌--विरले ही पूजित; समाराध्य--पूरी तरह पूजा करके ; विष्णुम्‌--विष्णु की; सर्व--सबों के; ईश्वर--नियन्ता के;ईश्वरमू--परम नियन्ता; यः--जो; वृणीते--वर के रूप में चुनता है; मन:ः--मन तक; ग्राह्ममू--पहुँच रखने वाला, अर्थात्‌ इन्द्रियतृप्ति; असत्त्वात्‌ू-तुच्छता के कारण; कुमनीषी--बुद्धिहीन; असौ--वह व्यक्ति

सामान्यतया समस्त ई श्वरों के परम ईश्वर भगवान्‌ विष्णु तक पहुँच पाना कठिन है।

अतः जोव्यक्ति उनकी समुचित पूजा करने के बाद उनसे इन्द्रियतृप्ति का वर माँगता है, वह निश्चित रूपसे कम बुद्धि वाला ( दुर्बुद्धि ) है क्योंकि वह तुच्छ फल से तुष्ट हो जाता है।

अक्रूरभवनं कृष्ण: सहरामोद्धव: प्रभु: ।

किज्ञिच्चिकीर्षयन्प्रागादक्रूरप्रीयकाम्यया ॥

१२॥

अक्रूर-भवनम्‌--अक्रूर के घर; कृष्ण: --कृष्ण के सह--साथ; राम-उद्धव: -- बलराम तथा उद्धव; प्रभुः --परमेश्वर;किझ्जित्‌ू--कुछ-कुछ; चिकीर्षयन्‌--कराने की इच्छा से; प्रागात्‌--गये; अक्वूर--अक्रूर की; प्रिय--तुष्टि; काम्यया--इच्छासे।

तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ कृष्ण कुछ कार्य कराने की इच्छा से अक्रूर के घर बलराम और उद्धव केसाथ गये।

भगवान्‌ अक्रूर को भी तुष्ठट करना चाहते थे।

स तान्नरवरश्रेष्ठानाराद्वीक्ष्य स्वबान्धवान्‌ ।

प्रत्युत्थाय प्रमुदितः परिष्वज्याभिनन्द्य च ॥

१३॥

ननाम कृष्णं रामं च स तैरप्यभिवादितः ।

'पूजयामास विधिवत्कृतासनपरिग्रहान्‌ ॥

१४॥

सः--वह ( अक्रूर ); तान्‌ू--उनको ( कृष्ण, बलराम तथा उद्धव को ); नर-वर-- श्रेष्ठ पुरुषों में; श्रेष्ठानू--सबसे बड़ा; आरातू--दूर से; वीक्ष्य--देखकर; स्व--अपने ( अक्रूर के ); बान्धवान्‌--सम्बन्धियों को; प्रत्युत्थाय--उठकर; प्रमुदित:--प्रसन्न;परिष्वज्य--आलिंगन करके; अभिनन्द्य-- स्वागत करके; च--तथा; ननाम--नमस्कार किया; कृष्णम्‌ रामम्‌ च--कृष्ण तथाबलराम को; सः--वह; तैः--उनके द्वारा; अपि--तथा; अभिवादित:--स्वागत किया; पूजयाम्‌ आस--पूजा की; विधि-वत्‌--शास्त्रीय आदेशों के अनुसार; कृत--किया हुआ; आसन--बैठने के आसनों का; परिग्रहान्‌ू--स्वीकार करना ।

जब अक्ूर ने अपने ही सम्बन्धियों एवं पुरुष शिरोमणियों को दूर से आते देखा तो वेहर्षपूर्वक उठकर खड़े हो गये।

उनको गले मिलने आलिंगन और स्वागत करने के बाद अक्रूर नेकृष्ण और बलराम को नमस्कार किया और बदले में उन दोनों ने उनका अभिवादन किया।

फिरजब उनके अतिथि आसन ग्रहण कर चुके तो उन्होंने शास्त्रीय नियमों के अनुसार उनकी पूजाकी।

पादावनेजनीरापो धारयन्शिरसा नृप ।

अर्हणेनाम्बरर्दिव्यर्गन्धस्त्रग्भूषणोत्तमै: ॥

१५॥

अर्चित्वा शिरसानम्य पादावड्डूगतौ मृजन्‌ ।

प्रश्रयावनतोक्रूरः कृष्णरामावभाषत ॥

१६॥

पाद--उनके पाँव; अवनेजनी:--स्नान के काम आने वाला; आ--सर्वत्र; आप:--जल; धारयन्‌-- धारण करते हुए; शिरसा--सिर पर; नृप--हे राजा ( परीक्षित ); अर्हणेन-- भेंटों से; अम्बरैः--वस्त्रों से; दिव्यै:--स्वर्गिक; गन्ध--सुगन्धित चन्दन का लेप;सत्रकू--फूल-मालाएँ; भूषण--तथा आभूषण; उत्तमैः --उत्तम; अर्चित्वा--पूजा करके; शिरसा--सिर के बल; आनम्य--झुककर; पादौ--( कृष्ण के ) पाँव; अड्डू--- अपनी गोद में; गतौ--रख लिए; मृजन्‌--दबाते हुए; प्रश्रय--दीनतापूर्वक;अवनतः--सिर झुकाकर; अक्रूरः:--अक्रूर; कृष्ण-रामौ--कृष्ण तथा बलराम से; अभाषत--बोला |

हे राजन, अक्रूर ने भगवान्‌ कृष्ण तथा बलराम के चरण पखारे और तब उस चरणोदक कोअपने सिर पर छिड़का।

उन्होंने उन दोनों को उत्तम वस्त्र, सुगन्धित चन्दन-लेप, फूल-मालाएँतथा उत्तम आभूषण भेंट में दिये।

इस तरह दोनों विभुओं की पूजा करने के बाद उन्होंने अपनेशिर से फर्श को स्पर्श करके नमस्कार किया।

फिर वे कृष्ण के चरणों को अपनी गोद में लेकरदबाने लगे और नप्रभाव से अपना सिर नीचे किये कृष्ण तथा बलराम से इस प्रकार बोले।

दिष्ठ्या पापो हतः कंस: सानुगो वामिदं कुलम्‌ ।

भवद्भ्यामुद्धृतं कृच्छाहुरन्ताच्चय समेधितम्‌ ॥

१७॥

दिछ्टया-- भाग्य से; पाप:--पापी; हतः --मारा गया; कंसः--कंस; स-अनुग: -- अपने भाइयों तथा अन्य अनुयायियों सहित;वाम्‌--आपके; इृदम्‌--इस; कुलमू--वंश को; भवद्भ्याम्‌--आप दोनों के द्वारा; उद्धृतम्‌--उद्धार किया गया; कृच्छात्‌--कठिनाई से; दुरन्तात्‌--अन्तहीन; च--तथा; समेधितम्‌ू--सम्पन्न बनाया |

अक्रूर ने कहा : यह तो हमारा सौभाग्य है कि आप दोनों ने दुष्ट कंस तथा उसके अनचरोंका वध कर दिया है।

इस तरह आपने अपने वंश को अन्तहीन कष्ट से उबारकर उसे समृद्धबनाया है।

युवां प्रधानपुरुषौ जगद्धेतू जगन्मयौ ।

भवदृभ्यां न विना किद्ञित्परमस्ति न चापरम्‌ ॥

१८॥

युवाम्‌--तुम दोनों; प्रधान-पुरुषौ--आदि-पुरुषों ने; जगत्‌--ब्रह्माण्ड के; हेतू--कारण; जगत्‌-मयौ--ब्रह्माण्ड से अभिन्न;भवद्भ्यामू--आपकी अपेक्षा; न--नहीं; विना--के अतिरिक्त; किल्ञित्‌--कुछ भी; परम्‌--कारण; अस्ति--है; न च--न तो;अपरम्‌ू--फल।

आप दोनों आदि परम पुरुष, ब्रह्माण्ड के कारण तथा इसके सार हैं।

जरा सा भी सूक्ष्मकारण या सृष्टि की कोई भी अभिव्यक्ति आपसे पृथक्‌ नहीं रह सकती।

आत्मसृष्टमिदं विश्वमन्वाविश्य स्वशक्तिभि: ।

ईयते बहुधा ब्रह्मन्श्रु तप्रत्यक्षणोचरम्‌ ॥

१९॥

आत्म-सृष्टमू--आपके द्वारा सृजित; इदम्‌--यह; विश्वम्‌--ब्रह्माण्ड; अन्वाविश्य--बाद में प्रवेश करके ; स्व-- अपनी;शक्तिभि:--शक्तियों से; ईयते-- अनुभव किये जाते हो; बहुधा--विविध; ब्रह्मनू--हे परब्रहम; श्रुत--शास्त्रों से सुनकर;प्रत्यक्ष--तथा प्रत्यक्ष अनुभूति से; गोचरम्‌--ज्ञेय ।

हे परम सत्य आप अपनी निजी शक्तियों से इस ब्रह्माण्ड का सृजन करते हैं और तब उसमेंप्रवेश करते हैं।

इस तरह महाजनों से सुनकर तथा प्रत्यक्ष अनुभव करके मनुष्य आपको अनेकविभिन्न रूपों में अनुभव कर सकता है।

यथा हि भूतेषु चराचरेषुमह्यादयो योनिषु भान्ति नाना ।

एवं भवान्केवल आत्मयोनि-घ्वात्मात्मतन्त्रो बहुधा विभाति ॥

२०॥

यथा--जिस तरह; हि--निस्सन्देह; भूतेषु--प्रकट जीवों में; चर--चेतन; अचरेषु--तथा जड़ में; मही-आदय: --पृथ्वी इत्यादि( सृष्टि के मूलभूत तत्त्व ); योनिषु--योनियों में; भान्ति--प्रकट होते हैं; नाना--विविध प्रकार से; एवम्‌--इस तरह; भवान्‌--आप; केवल: --एकमात्र; आत्म--स्वयं; योनिषु--योनियों में; आत्मा--परमात्मा; आत्म-तन्त्र:--आत्म-निर्भर; बहुधा--कईप्रकार से; विभाति--प्रकट होता है।

जिस प्रकार जड़ तथा चेतन जीव-योनियों में मूलभूत तत्त्व अपने को पृथ्वी इत्यादिअनेकानेक किस्मों के रूप में प्रकट करते हैं उसी तरह आप एक स्वतंत्र परमात्मा के रूप मेंअपनी सृष्टि के विविधतापूर्ण पदार्थों में अनेक रूपों में प्रकट होते हैं।

सृजस्यथो लुम्पसि पासि विश्वरजस्तमःसत्त्वगुणै: स्वशक्तिभि: ।

न बध्यसे तदगुणकर्मभिर्वाज्ञानात्मनस्ते क्व च बन्धहेतु: ॥

२१॥

सृजसि--सृजन करते हो; अथ उ--और तब; लुम्पसि--संहार करते हो; पासि--रक्षा करते हो; विश्वम्‌--ब्रह्मण्ड को; रज:--रजो; तम:ः--तमो; सत्त्व--तथा सतो; गुणैः --गुणों के द्वारा; स्व-शक्तिभि:--अपनी शक्तियों से; न बध्यसे--बँधते नहीं हो;तत्‌--इस जगत के; गुण--गुणों से; कर्मभि:-- भौतिक कार्यकलापों द्वारा; वा--अथवा; ज्ञान-आत्मन: --साक्षात्‌ ज्ञान हैं;ते--तुम्हारे लिए; क्व च--जहाँ कोई भी; बन्ध--बन्धन का; हेतु:--कारण |

आप अपनी निजी शक्तियों रजो, तमो तथा सतो गुणों से इस ब्रह्माण्ड का सृजन, संहार औरपालन भी करते हैं।

फिर भी आप इन गुणों द्वारा या इनसे उत्पन्न कर्मों द्वारा बाँधे नहीं जाते।

चूँकि आप समस्त ज्ञान के आदि-स्रोत हैं, तो फिर मोह द्वारा आपके बंधन का कारण क्‍या होसकता है?

हाद्युपाधेरनिरूपितत्वाद्‌भवो न साक्षान्न भिदात्मनः स्यात्‌ ।

अतो न बन्धस्तव नैव मोक्षःस्याताम्निकामस्त्वयि नोडविवेक: ॥

२२॥

देह--शरीर; आदि--इत्यादि की; उपाधे: --उपाधियों के रूप में; अनिरूपितत्वात्‌ू--निश्चित न हो पाने से; भव:--जन्म; न--नहीं; साक्षात्‌--शाब्दिक; न--न तो; भिदा--द्वैत; आत्मन:--परमात्मा के लिए; स्यात्‌--विद्यमान है; अत:--इसलिए; न--नहीं; बन्ध:--बन्धन; तब--तुम्हारा; न एब--न तो, वास्तव में; मोक्ष: --मुक्ति; स्थाताम्‌--यदि हो; निकाम: --तुम्हारी स्वयं कीइच्छा से; त्वयि--तुममें; न:--हमारा; अविवेक: --त्रुटिपूर्ण विवेक |

चूँकि यह कभी प्रदर्शित नहीं हुआ है कि आप भौतिक शारीरिक उपाधियों से प्रच्छन्न हैंअतः यह निष्कर्ष रूप में यह समझना होगा कि शाब्दिक अर्थ में नतो आपका जन्म होता है नही कोई द्वैत है।

इसलिए आपको बन्धन या मोक्ष का सामना नहीं करना होता।

और यदि आपऐसा करते प्रतीत होते हैं, तो यह आपकी इच्छा के कारण ही है कि हम आपको इस रूप मेंदेखते हैं या कि हममें विवेक का अभाव है इसलिए ऐसा है।

त्वयोदितोयं जगतो हिताययदा यदा वेदपथ:ः पुराण: ।

बाध्येत पाषण्डपथेरसद्धि -स्तदा भवान्सत्त्वगुणं बिभर्ति ॥

२३॥

त्वया--तुम्हारे द्वारा; उदित:--कहा गया है; अयम्‌--यह; जगतः--ब्रह्माण्ड के; हिताय--लाभ के लिए; यदा यदा--जब जब;वेद--वैदिक शास्त्रों का; पथ:--( धार्मिकता का ) मार्ग; पुराण: -- प्राचीन; बाध्येत--रोका जाता है; पाषण्ड--नास्तिकता का;पथे:--मार्ग का अनुसरण करने वालों के द्वारा; असद्द्धिः--दुष्ट पुरुष द्वारा; तदा--तब; भवान्‌--आप; सत्त्व-गुणम्‌-शुद्धसतो गुण; बिभर्ति-- धारण करते हैं।

आपने समस्त विश्व के लाभ के लिए प्रारम्भ में वेदों के प्राचीन धार्मिक पथ की व्याख्या कीथी।

जब भी दुष्ट व्यक्तियों द्वारा नास्तिकता का मार्ग ग्रहण करने के फलस्वरूप यह पथ अवरुद्धहोता है, तो आप दिव्य सतोगुण से युक्त कोई न कोई रूप में अवतरित होते हैं।

स त्वम्प्रभोड्द्य वसुदेवगृहेउवर्तीर्ण:स्वांशेन भारमपनेतुमिहासि भूमेः ।

अक्षौहिणीशतवधेन सुरेतरांश-राज्ञाममुष्य च कुलस्य यशो वितन्वन्‌ ॥

२४॥

सः--वह; त्वमू--तुम; प्रभो--हे स्वामी; अद्य--अब; वसुदेव-गृहे--वसुदेव के घर में; अवतीर्ण: --अवतरित; स्व--अपने ही;अंशेन-प्रत्यक्ष अंश ( बलराम ); भरम्‌-- भार; अपनेतुम्‌--हटाने के लिए; इह--यहाँ; असि--हो; भूमेः--पृथ्वी का;अक्षौहिणी--सेनाओं का; शत--सौ; वधेन--मारकर; सुर-इतर--देवताओं के विपक्षियों का; अंश--अंश रूप; राज्ञाम्‌--राजाओं का; अमुष्य--इसका; च--तथा; कुलस्थ--कुल का ( यदुकुल का ); यशः--ख्याति; वितन्वन्‌--विस्तार करते हुए

हे प्रभु, आप वही परम पुरुष हैं और अब आप अपने अंश समेत वसुदेव के घर में प्रकट हुएहैं।

आपने देवताओं के शत्रुओं के अंश रूप राजाओं के नेतृत्व वाली हजारों सेनाओं का वधकरके पृथ्वी का भार हटाने तथा हमारे कुल की ख्याति का विस्तार करने के लिए ऐसा कियाहै।

अद्येश नो वसतयः खलु भूरिभागायः सर्वदेवपितृभूतनृदेवमूर्ति: ।

यत्पादशौचसलिल त्रिजगत्पुनातिस त्वं जगद्गुरुरधोक्षज या: प्रविष्ट: ॥

२५॥

अद्य--आज; ईश--हे भगवन्‌; नः--हमारे; वसतय:--निवासस्थान; खलु--निस्सन्देह; भूरि-- अत्यन्त; भागा: -- भाग्यशाली;यः--जो; सर्व-देव--परमे श्वर; पितृ--पूर्वज, पितरगण; भूत--सारे जीव; नृ--मनुष्य; देव--तथा देवता; मूर्तिः--देहधारी;यत्‌--जिसके; पाद--पाँवों को; शौच-- धोने वाला है; सलिलम्‌ू--जल ( गंगाजल ); त्रि-जगत्‌--तीनों लोक; पुनाति--पवित्रकरता है; सः--वह; त्वमू--तुम; जगत्‌-- ब्रह्माण्ड के; गुरु:ः--गुरु; अधोक्षज-- भौतिक इन्द्रियों के क्षेत्र से परे रहने वाले,इन्द्रियातीत; या:--जो; प्रविष्ट:--प्रविष्ट होकर

हे प्रभु, आज मेरा घर अत्यन्त भाग्यशाली बन गया है क्योंकि आपने इसमें प्रवेश किया है।

परम सत्य के रूप में आप पितरों, सामान्य प्राणियों, मनुष्यों एवं देवताओं की मूर्ति हैं और जिसजल से आपके पाँवों को प्रक्षालित किया गया है, वह तीनों लोकों को पवित्र बनाता है।

निस्सन्देह हे इन्द्रियातीत, आप ब्रह्माण्ड के आध्यात्मिक गुरु हैं।

कः पण्डितस्त्वदपरं शरणं समीयाद्‌भक्तप्रियाहतगिर: सुहृदः कृतज्ञात्‌ ।

सर्वान्ददाति सुहदो भजतोडभिकामा-नात्मानमप्युपचयापचयौ न यस्य ॥

२६॥

कः--कौन; पण्डित:--विद्वान; त्वत्‌--आपसे बढ़कर; अपरम्‌--दूसरा; शरणम्‌--शरण के लिए; समीयात्‌--जाये; भक्त--अपने भक्त के लिए; प्रियात्‌ू--स्नेहिल; ऋत--सदैव सच; गिर: --शब्द; सुहृद:--शुभचिन्तक; कृत-ज्ञातू-कृतज्ञ; सर्वानू--सभी; ददाति--आप देते हैं; सुहद:--अपने शुभचिन्तक भक्तों को; भजत:--आपकी पूजा करने वाले; अभिकामान्‌-चच्छाएँ;आत्मानम्‌-- अपने आपको; अपि-- भी; उपचय--वृद्धि; अपचयौ---या हास; न--कभी नहीं; यस्य--जिसका |

जब आप अपने भक्तों के प्रति इतने स्नेहिल, कृतज्ञ तथा सच्चे शुभचिन्तक हैं, तो फिर कौनऐसा विद्वान होगा जो आपको छोड़कर किसी दूसरे के पास जायेगा ? जो लोग सच्चे साख्यभावसे आपकी पूजा करते हैं उन्हें आप मुँहमाँगा वरदान, यहाँ तक कि अपने आपको भी, दे देते हैंफिर भी आपमें न तो वृद्धि होती है न हास।

दिष्टद्या जनार्दन भवानिह नः प्रतीतोयोगेश्वरैरपि दुरापगतिः सुरेशैः ।

छिन्ध्याशु न: सुतकलत्रधनाप्तगेह-देहादिमोहरशनां भवदीयमायाम्‌ ॥

२७॥

दिछ्टद्या-- भाग्य से; जनार्दन--हे कृष्ण; भवान्‌--आप; इह--यहाँ; न:ः--हमरे द्वारा; प्रतीत:--अनुभवगम्य; योग-ई श्ररै: -- योगके स्वामियों द्वारा; अपि-- भी; दुराप-गति:--लक्ष्य को प्राप्त करना कठिन; सुर-ईशैः--तथा देवताओं के शासकों द्वारा;छिन्धि--काट दें; आशु--तुरन्त; नः--हमारे; सुत--सन्तान; कलत्र--पत्नी; धन--सम्पत्ति; आप्त--योग्य मित्र; गेह--घर;देह--शरीर; आदि--इत्यादि; मोह--मोह की; रशनाम्‌--रस्सियों को; भवदीय--अपनी; मायाम्‌--माया को |

हे जनार्दन, हमारे बड़े भाग्य हैं कि हमें आपके दर्शन हो रहे हैं क्योंकि बड़े बड़े योगेश्वर तथाअग्रणी देवता भी इस लक्ष्य को बड़ी मुश्किल से प्राप्त कर पाते हैं।

कृपया शीघ्र ही सन्तान,पत्नी, धन, समृद्ध मित्र, घर तथा शरीर के प्रति हमारी मायामयी आसक्ति की रस्सियों को काटदें।

ऐसी सारी आसक्ति आपकी भ्रामक एवं भौतिक माया का ही प्रभाव है।

इत्यर्चितः संस्तुतश्च भक्तेन भगवान्हरि: ।

अक्रूरं सस्मितं प्राह गीर्भि: सम्मोहयन्निव ॥

२८ ॥

इति--इस प्रकार; अर्चित: --पूजित; संस्तुत:ः--अत्यधिक स्तुति किये गये; च--तथा; भक्तेन--अपने भक्त द्वारा; भगवान्‌--भगवान्‌; हरि:ः--कृष्ण; अक्रूरम्‌ू--अक्रूर से; स-स्मितम्‌--हँसते हुए; प्राह--बोले; गीर्भि:--वाणी से; सम्मोहयन्‌--पूरी तरहमोहित करते हुए; इब--प्राय: ।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : अपने भक्त द्वारा इस तरह पूजित तथा संस्तुत होकर भगवान्‌हरि ने हँसते हुए अपनी वाणी से अक्रूर को पूर्णतया मोहित करके सम्बोधित किया।

श्रीभगवानुवाचत्वं नो गुरु: पितृव्यश्न श्लाघ्यो बन्धुश्न नित्यदा ।

वबयं तु रक्ष्या: पोष्याश्च अनुकम्प्या: प्रजा हि व: ॥

२९॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; त्वम्‌--तुम; नः--हमारे; गुरु: --गुरु; पितृव्य;--चाचा ( ताऊ ); च--तथा; श्लाघ्य: --प्रशंसनीय; बन्धु:--मित्र; च--तथा; नित्यदा--सदैव; वयम्‌ू--हम; तु--तो; रक्ष्या:--रक्षा किये जाने के लिए; पोष्या:--पालन किये जाने के लिए; च--तथा; अनुकम्प्या:--दया दिखाये जाने के लिए; प्रजा:--आशञ्रित; हि--निस्सन्देह; व:--आपके

भगवान्‌ ने कहा : आप हमारे गुरु, चाचा तथा इलाधघ्य मित्र हैं और हम आपके पुत्रवत्‌ हैं;अतः हम सदैव आपकी रक्षा, पालन तथा दया पर अश्रित हैं।

भवद्विधा महाभागा निषेव्या अर्हसत्तमा: ।

श्रेयस्कामैनृभिर्नित्यं देवा: स्वार्था न साधव: ॥

३०॥

भवतू-विधा: --आपके समान; महा-भागा: --अत्यन्त विख्यात; निषेव्या:--सेवा किये जाने के योग्य; अर्ह--पूज्य; सत्‌-तमाः--अतीव साधु; श्रेयः--सर्वोच्च शुभ, मंगल; कामैः--चाहने वाले; नृभि:--पुरुषों के द्वारा; नित्यमू--सदैव; देव: --देवतागण; स्व-अर्था:--निजी लाभ के लिए; न--ऐसे नहीं; साधव: --साधु भक्तगण

आप जैसे महात्मा ही सेवा के असली पात्र हैं और जीवन में सर्वोच्च मंगल के इच्छुक लोगोंके लिए अत्यन्त पूज्य महाजन हैं।

देवतागण सामान्यतया अपने स्वार्थों में लगे रहते हैं किन्तुसाधु-भक्त ऐसे नहीं होते।

न हाम्मयानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामया: ।

ते पुनन्त्युरूकालेन दर्शनादेव साधव: ॥

३१॥

न--नहीं; हि--निस्सन्देह; अपू-मयानि--जल से बना; तीर्थानि--पवित्र स्थान; न--ऐसा नहीं है; देवा:--अर्चा विग्रह; मृत्‌--मिट्टी; शिला--तथा पत्थर से; मया: --निर्मित; ते--वे; पुनन्ति--पवित्र बनाते हैं; उर-कालेन--दीर्घकाल के बाद; दर्शनात्‌ू--दर्शन से; एबव--केवल; साधव:--साधु-सन्त |

इससे कोई इनकार नहीं करेगा कि अनेक तीर्थस्थानों में पवित्र नदियाँ होती हैं या किदेवताओं के अर्चाविग्रह मिट्टी तथा पत्थर से बने होते हैं।

किन्तु ये सब दीर्घकाल के बाद हीआत्मा को पवित्र करते हैं जबकि सनन्‍्त-पुरुषों के दर्शनमात्र से आत्मा पवित्र हो जाती है।

स भवान्सुहदां वै नः श्रेयान्श्रेयश्चिकीर्षया ।

जिज्ञासार्थ पाण्डवानां गच्छस्व त्वं गजाह्ययम्‌ ॥

३२॥

सः--वह व्यक्ति; भवानू--आप; सुहृदाम्‌--शुभचिन्तकों का; वै--निश्चय ही; न:--हमारा; श्रेयान्‌--सर्व श्रेष्ठ में से; श्रेय: --मंगल के लिए; चिकीर्षबा--नियोजित करने की इच्छा से; जिज्ञासा--पूछताछ के; अर्थम्‌--लिए; पाण्डवानाम्‌--पाएडु के पुत्रोंकी; गच्छस्व--जाओ; त्वम्‌ू--तुम; गज-आह्यम्‌--गजाह्यय ( कुरुवंश की राजधानी, हस्तिनापुर )।

दरअसल आप हमारे सर्वश्रेष्ठ मित्र हैं अतः आप हस्तिनापुर जाँय और पाण्डवों केशुभचिन्तक के रूप में पता लगायें कि वे कैसे हैं।

पितर्युपरते बाला: सह मात्रा सुदु:खिता: ।

आनीताः स्वपुरं राज्ञा वसन्‍्त इति शुश्रुम ॥

३३॥

पितरि--पिता के; उपरते--देहान्त होने पर; बाला:--छोटे बालक; सह--साथ; मात्रा--माता के; सु--अत्यन्त; दु:ःखिता:--दुखी; आनीता:--लाये गये; स्व--अपने; पुरम्‌--राजधानी में; राज्ञा--राजा द्वारा; वसन्ते--रह रहे हैं; इति--इस प्रकार;शुश्रुम--हमने सुना है।

हमने सुना है कि अपने पिता के दिवंगत हो जाने के बाद बालक पाण्डवों को उनकी दुखीमाता समेत राजा धृतराष्ट्र द्वारा राजधानी में लाये गए थे और अब वे वहीं रह रहे हैं।

तेषु राजाम्बिकापुत्रो भ्रातृपुत्रेषु दीनधीः ।

समो न वर्तते नूनं दुष्पुत्रवशगोन्धहक्‌ ॥

३४॥

तेषु--उनके प्रति; राजा--राजा ( धृतराष्ट्र )अम्बिका--अम्बिका का; पुत्र:--पुत्र; भ्रातृ--अपने भाई के; पुत्रेषु--पुत्रों के प्रति;दीन-धी:--दुष्ट बुद्धि; सम:ः--समभाव; न वर्तते--नहीं बरतता; नूनम्‌--निश्चय ही; दुः--दुष्ट; पुत्र--अपने पुत्रों का; वश-गः--अधीन; अन्ध--अन्धा; हक्‌--दृष्टि |

असल में अम्बिका का दुर्बल चित्त वाला पुत्र धृतराष्ट्र अपने दुष्ट पुत्रों के वश में आ चुका हैअतएव वह अन्धा राजा अपने भाई के पुत्रों के साथ ठीक व्यवहार नहीं कर रहा है।

गच्छ जानीहि तद्गुत्तमधुना साध्वसाधु वा ।

विज्ञाय तद्ठिधास्यामो यथा शं सुहृदां भवेत्‌ ॥

३५॥

गच्छ--जाओ; जानीहि--पता लगाओ; तत्‌--उस ( धृतराष्ट्र ) की; वृत्तमू--करतूत; अधुना--इस समय; साधु-- अच्छा;असाधु--बुरा; वा--अथवा; विज्ञाय--जान कर; तत्‌--ऐसी; विधास्याम: --हम व्यवस्था करेंगे; यथा--जिससे; शम्‌--लाभ;सुहृदाम--हमारे प्रियजनों का; भवेत्‌--हो सके |

जाइये और देखिये कि धृतराष्ट्र ठीक से कार्य कर रहा है या नहीं।

पता लग जाने पर हमअपने प्रिय मित्रों की सहायता करने की आवश्यक व्यवस्था करेंगे।

इत्यक्रूरं समादिश्य भगवान्हरिरी श्वर: ।

सड्डर्षणोद्धवाभ्यां वै ततः स्वभवनं ययौ ॥

३६॥

इति--इन शब्दों से; अक्रूरम्‌--अक्रूर को; समादिश्य--आदेश देकर; भगवनू-- भगवान्‌; हरिः ईश्वर: -- भगवान्‌ हरि;सड्डर्षण--बलराम; उद्धवाभ्यामू-तथा उद्धव के साथ; बै--निस्सन्देह; ततः--तब; स्व--अपने; भवनम्‌--घर; ययौ--चलेगये।

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : इस प्रकार से अक्रूर को पूरी तरह से आदेश देकरसंकर्षण एवं उद्धव के साथ भगवान्‌ हरि अपने घर लौट आये।

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