← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची
अध्याय सैंतालीस: मधुमक्खी का गीत
10.47श्रीशुक उबाचत॑ वीक्ष्य कृषानुचरं ब्रजस्त्रिय:प्रलम्बबाहुं नवकझ्जलोचनम् ।
पीताम्बरं पुष्करमालिनं लसन्ू-मुखारविन्दं परिमृष्टकुण्डलम् ॥
१॥
सुविस्मिता: कोयमपीव्यदर्शनःकुतश्च कस्याच्युतवेषभूषण: ।
इति स्म सर्वा: परिवत्रुरुत्सुका-स्तमुत्तम:ःशलोकपदाम्बुजा श्रयम् ॥
२॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; तम्--उस; वीक्ष्य--देखकर; कृष्ण-अनुचरम्-- भगवान् कृष्ण के अनुचर( उद्धव ) को; ब्रज-स्त्रिय:--व्रज की स्त्रियाँ; प्रलम्ब--नीचे तक; बाहुमू--बाँहों को; नव--नवीन; कज्ञ--कमल सहश;लोचनमू--आँखों को; पीत--पीला; अम्बरम्--वस्त्र पहने; पुष्कर--कमल की; मालिनम्ू--माला पहने; लसत्--शो भायमान;मख--मुख; अरविन्दमू--कमल सहश; परिमृष्ट--परिष्कृत किया; कुण्डलम्--कान का कुण्डल; सु-विस्मिता: -- अत्यधिकचकित; कः--कौन; अयम्--यह; अपीव्य--सुन्दर; दर्शन: --दर्शन; कुतः--कहाँ से; च--तथा; कस्य--किसका; अच्युत--कृष्ण का; वेष--वस्त्र धारण किये; भूषण:--तथा आभूषण; इति--इस प्रकार; स्म--निस्सन्देह; सर्वा:--सभी; परिवद्रु:--घिरे हुए; उत्सुका: --उत्सुक; तम्--उसको; उत्तम:-शलोक-- भगवान् कृष्ण का, जिनकी प्रशंसा सुन्दर श्लोकों द्वारा की जातीहै; पद-अम्बुज--चरणकमल की; आश्रयम्--शरण में आये हुए
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : ब्रज की ललनाएँ कृष्ण के अनुचर को देखकर चकित हो गईं।
उसके हाथ लम्बे लम्बे थे और आँखें नये खिले कमल जैसी थीं।
वह पीत वस्त्र धारण किये था,गले में कमल की माला थी तथा अत्यन्त परिष्कृत किये हुए कुण्डलों से चमकता उसकामुखमण्डल कमल जैसा था।
गोपियों ने पूछा, 'यह सुन्दर पुरुष कौन है? यह कहाँ से आया है?यह किसकी सेवा करता है? यह तो कृष्ण के वस्त्र और आभूषण पहने है!' यह कहकरगोपियाँ उद्धव के चारों ओर उत्सुकता से एकत्र हो गईं जिनका आश्रय भगवान् उत्तमश्लोकश्रीकृष्ण के चरणकमल थे।
त॑ प्रश्रयेणावनता: सुसत्कृतंसक्रीडहासेक्षणसूनृतादिभि: ।
रहस्यपृच्छन्रुपविष्टमासनेविज्ञाय सन्देशहरं रमापते: ॥
३॥
तमू--उसको; प्रश्रयेण--विनयपूर्वक ; अवनता:--झुककर ( गोपियाँ ); सु--उचित रीति से; सत्-कृतम्--आदर किया; स-ब्रीड--लज्जा सहित; हास--तथा हँसते हुए; ईक्षण--चितवनों; सूनृूत--मधुर शब्द; आदिभि:--इत्यादि से; रहसि--एकान्त में;अपृच्छनू--पूछा; उपविष्टम्ू--बैठा हुआ; आसने-- आसन पर; विज्ञाय-- समझ कर; सन्देश-हरम्--संदेशवाहक; रमा-पते: --लक्ष्मी के स्वामी का।
विनयपूर्वक अपना शीश झुकाते हुए गोपियों ने अपनी लजीली मुसकराती चितवनों तथामधुर शब्दों से उद्धव का उचित रीति से सम्मान किया।
वे उन्हें एकान्त स्थान में ले गईं, उन्हेंआराम से बैठाया और तब उन्हें लक्ष्मीपति कृष्ण का सन्देशवाहक मान कर उनसे प्रश्न करनेलगीं।
जानीमस्त्वां यदुपतेः पार्षदं समुपागतम् ।
भर्त्रेह प्रेषित: पित्रोर्भवान्प्रियचििकीर्षया ॥
४॥
जानीम:--हम जानती हैं; त्वाम्--तुमको; यदु-पतेः --यदुओं के प्रमुख का; पार्षदम्--निजी संगी; समुपागतम्--यहाँ आया;भर्त्रा--अपने स्वामी द्वारा; हह--यहाँ; प्रेषित:-- भेजा हुआ; पित्रो:--अपने माता-पिता का; भवान्--आप; प्रिय--सन्तोष,सुख; चिकीर्षया--देने के लिए इच्छुक |
गोपियों ने कहा : हम जानती हैं कि आप यदुश्रेष्ठ कृष्ण के निजी पार्षद हैं और अपने उसश्रेष्ठ स्वामी के आदेश से यहाँ आये हैं, जो अपने माता-पिता को सुख प्रदान करने के इच्छुक हैं।
अन्यथा गोब्जे तस्य स्मरणीयं न चक्ष्महे ।
स्नेहानुबन्धो बन्धूनां मुनेरपि सुदुस्त्यज: ॥
५॥
अन्यथा--नहीं तो; गो-ब्रजे--चरागाह में; तस्थ--उसका; स्मरणीयम्--स्मरण करने योग्य; न चक्ष्महे --हम नहीं देखती;स्नेह--स्नेह की; अनुबन्ध:--आसक्ति; बन्धूनाम्--सम्बन्धियों के लिए; मुने:--मुनियों के लिए; अपि-- भी; सु-दुस्त्यज:--छोड़ पाना मुश्किल।
अन्यथा हमें और कुछ भी ऐसा नहीं दीखता जिसे वे ब्रज के इन चरागाहों में स्मरणीयसमझते होंगे।
निस्सन्देह एक मुनि के लिए भी अपने पारिवारिक जनों का स्नेह-बंधन तोड़ पानाकठिन होता है।
अन्येष्वर्थकृता मैत्री यावदर्थविडम्बनम् ।
पुम्भिः स्त्रीषु कृता यद्वत्सुमन:स्विव घट्पदै: ॥
६॥
अन्येषु--अन्यों के प्रति; अर्थ--किसी उद्देश्य से; कृता--प्रकट; मैत्री--मित्रता; यावत्--जब तक; अर्थ--उद्देश्य ( जिसे कोईपूरा करता है ); विडम्बनम्ू--बहाना; पुम्भि:--मनुष्यों द्वारा; स्त्रीषु--स्त्रियों के लिए; कृता--दिखलाया गया; यद्वत्ू--जितना;सुमन:सु--फूलों के लिए; इब--सहश; षट््-पदै:-- भौरे द्वारा
किसी अन्य के प्रति, जो पारिवारिक सदस्य नहीं है, दिखलाई जाने वाली मित्रता स्वार्थ सेप्रेरित होती है।
अतः यह तो एक बहाना होता है, जो तब तक चलता है जबतक किसी का उद्देश्यपूरा नहीं हो जाता।
ऐसी मित्रता वैसी ही है, जिस तरह कि स्त्रियों के प्रति पुरुषों की या फूलों केप्रति भौंरों की रुचि।
निःस्वं त्यजन्ति गणिका अकल्पं नृपतिं प्रजा: ।
अधीतविद्या आचार्यमृत्विजो दत्तदक्षिणम् ॥
७॥
निःस्वमू--सम्पत्तिविहीन को; त्यजन्ति--छोड़ देती हैं; गणिका:--वेश्याएँ; अकल्पम्--अदक्ष; नू-पतिम्--राजा को; प्रज:--नागरिक; अधीत-विद्या:--जिन्होंने अपनी शिक्षा पूरी कर ली है; आचार्यम्--शिक्षक को; ऋत्विज:--पुरोहितगण; दत्त--( यज्ञकर्त्ता द्वारा ) दे चुकने पर; दक्षिणम्--दक्षिणाभेंट
वेश्याएँ निर्धन व्यक्ति को, प्रजा अयोग्य राजा को, शिक्षा पूरी होने पर विद्यार्थी अपनेशिक्षक को तथा पुरोहितगण दक्षिणा पाने के बाद यज्ञ करने वाले व्यक्ति को छोड़ जाते हैं।
खगा वीतफल वृक्ष भुक्त्वा चातिथयो गृहम् ।
दग्धं मृगास्तथारण्यं जारा भुकत्वा रतां स्त्रियम् ॥
८॥
खगा:--पक्षीगण; वीत--रहित; फलम्--फलों से; वृक्षम्--वृक्षको; भुक्त्वा--खाने के बाद; च--तथा; अतिथय: --अतिथिगण; गृहम्--घर को; दग्धम्--जले हुए; मृगा:--पशुगण; तथा--उसी प्रकार; अरण्यम्--जंगल को; जारा:--उपपति;भुक्त्वा-- भोग करने के बाद; रताम्--आकृष्ट; स्त्रियम्--स्त्री को |
फल न रहने पर पक्षी वृक्ष को, भोजन करने के बाद अतिथि घर को, जंगल जल जाने परपशु जंगल को तथा प्रेमी के प्रति आकृष्ट रहने के बावजूद भी स्त्री का भोग कर लेने पर प्रेमीउसका परित्याग कर देते हैं।
इति गोप्यो हि गोविन्दे गतवाक्कायमानसाः ।
कृष्णदूते समायाते उद्धवे त्यक्तलौकिका: ॥
९॥
गायन्त्य: प्रीयकर्माणि रुदन्त्यश्च गतहियः ।
तस्य संस्मृत्य संस्मृत्य यानि कैशोरबाल्ययो: ॥
१०॥
इति--इस प्रकार; गोप्य:--गोपियाँ; हि--निस्सन्देह; गोविन्दे--गोविन्द में; गत--केन्द्रित करके; वाकु--वाणी; काय--शरीर; मानस:--तथा अपने मन; कृष्ण-दूते--कृष्ण के दूत; समायाते--आकर उनके साथ हो लेने वाले; उद्धवे--उद्धव में;त्यक्त--छोड़कर; लौकिका:--सांसारिक कार्य; गायन्त्य: --गाती हुईं; प्रिय--अपने प्रिय के; कर्माणि--कार्यकलापों के विषयमें; रूदन्त्य:--फूट फूट कर रोती हुई; च--तथा; गत-हिय:--सारी लाज छोड़कर; तस्य--उसकी; संस्मृत्य संस्मृत्य--बार-बारयाद करके; यानि-- जो; कैशोर--किशोरावस्था; बाल्ययो:--तथा बालपन कीइस तरह बोलती हुई गोपियों ने जिनके वचन, शरीर तथा मन भगवान् गोविन्द के प्रतिपूर्णतया समर्पित थे, अपना नैत्यिक कार्य करना छोड़ दिया क्योंकि अब कृष्णदूत श्री उद्धवउनके बीच आया था।
वे अपने प्रिय कृष्ण के बाल्यकाल तथा किशोरावस्था की लीलाओं काअविरत स्मरण करके उनका गुणगान करने लगीं और लाज छोड़कर फूट-फूटकर रोने लगीं।
काचिन्मधुकरं हृष्ठा ध्यायन्ती कृष्णसड्रमम् ।
प्रियप्रस्थापितं दूत॑ं कल्पयित्वेदमब्रवीत् ॥
११॥
काचित्--कोई ( एक गोपी ); मधु-करम्-- भौरे को; हृष्ठा--देखकर; ध्यायन्ती--ध्यान में मग्न; कृष्ण-सड्रमम्--कृष्ण केसाथ अपने सान्रिध्य के विषय में; प्रिय--अपने प्रिय द्वारा; प्रस्थापितम्-- भेजे गये; दूतम्--दूत को; कल्पयित्वा--कल्पनाकरते हुए; इदम्--यह; अब्रवीत्--बोली
कोई एक गोपी जब कृष्ण के साथ अपने पूर्व सान्निध्य का ध्यान कर रही थी, तो उसनेअपने सामने एक भौंरा देखा और उसे लगा कि यह उसके प्रियतम द्वारा भेजा गया कोई दूत है।
अतः वह इस प्रकार बोली।
गोप्युवाचमधुप कितवबन्धो मा स्पृशडिंघ्रि सपत्या:'कुचविलुलितमालाकुड्डू मश्म श्रुभिर्न: ।
बहतु मधुपतिस्तन्मानिनीनां प्रसादयदुसदसि विडम्ब्यं यस्य दूतस्त्वमीहक् ॥
१२॥
गोपी उवाच--गोपी ने कहा; मधुप--हे भौरे; कितव--ठग के; बन्धो--हे मित्र; मा स्पृश--मत छूना; अद्धप्रिमू--पाँवों को;सपत्या:--हमारी प्रतियोगिनी प्रेमिका का; कुच--स्तन; विलुलित--गिरी हुईं; माला--माला से; कुट्डु म--लाल रंग काअंगराग; एम श्रुभि: --मूछों से; न:--हमारे; वहतु--लाने दो; मधु-पति:--मधुवंश के स्वामी; तत्--उसका; मानिनीनाम्--स्त्रियों के लिए; प्रसादम्ू--कृपा या दया; यदु-सदसि--यदुओं की राजसभा में; विडम्ब्यम्ू--उपहास का पात्र; यस्य--जिसका;दूतः--दूत; त्वमू--तुम; ईहक्--ऐसा
गोपी ने कहा : हे भौरे, हे छलिये के मित्र, अपनी उन मूछों से मेरे पाँवों को मत छूना जो उसकुंकुम से लेपित हैं, जो कृष्ण की माला में तब लग जाता था जब वह मेरी सौत के स्तनों द्वारामर्दित होती थी।
कृष्ण अब मथुरा की स्त्रियों को तुष्ट करें।
जो व्यक्ति तुम जैसे दूत को भेजेगा वह यदुओं की सभा में निश्चित रूप से उपहास का पात्र बनेगा।
सकृदधरसुधां स्वां मोहिनीं पाययित्वासुमनस इबव सद्यस्तत्यजेस्मान्भवाहक् ॥
'परिचरति कथं तत्पादपद्ां नु पद्माहापि बत हतचेता ह्युत्तम:ःशलोकजल्पै: ॥
१३॥
सकृत्--एक बार; अधर--होठों का; सुधाम्-- अमृत; स्वाम्-- अपने; मोहिनीम्--मोहते हुए; पाययित्वा--पिलाकर;सुमनसः--फूल; इब--सहश; सद्यः--एकाएक; तत्यजे--परित्याग कर दिया; अस्मान्ू--हमको; भवाहक् --तुम्हारी तरह;'परिचरति--सेवा करता है; कथम्--क््यों; तत्--उसका; पद-पद्ममू--चरणकमल; नु--मुझे आश्चर्य होता है; पद्मा--लक्ष्मी; हिअपि--निस्सन्देह, क्योंकि; बत--हाय; हृत--चुराया गया; चेता:--उसका मन; हि--निश्चय ही; उत्तम:-शलोक--कृष्ण के;जल्पै:--झूठे बचनों से
केवल एक बार अपने होठों का मोहक अमृत पिलाकर कृष्ण ने सहसा उसी तरह हमारापरित्याग कर दिया है, जिस तरह तुम किसी फूल को तुरन्त छोड़ देते हो।
तो फिर यह कैसे सम्भव है कि देवी पद्मा स्वेच्छा से उनके चरणकमलों की सेवा करती हैं? हाय! इसका उत्तरयही हो सकता है कि उनका चित्त उनके छलपूर्ण शब्दों द्वारा चुरा लिया गया है।
किमिह बहु षडड्श्ने गायसि त्वं यदूना-मधिपतिमगृहाणामग्रतो नः पुराणम् ।
विजयसखसखानां गीयतां तत्प्रसड़:क्षपितकुचरुजस्ते कल्पयन्तीष्टमिष्टा: ॥
१४॥
किम्-क्यों; इह--यहाँ; बहु-- अधिक; षट्-अड्घ्रे--हे घटपद; गायसि--गा रहे हो; त्वमू--तुम; यदूनाम्ू--यदुओं के;अधिपतिम्--स्वामी के विषय में; अगृहाणाम्--बिना घर-बार वाले; अग्रतः--समक्ष; न:--हमारे; पुराणम्-- पुरानी; विजय--अर्जुन के; सख--मित्र का; सखीनाम्--मित्रों के लिए; गीयताम्--गाया जाना चाहिए; तत्--उसकी; प्रसड्र:--कथाएँ;क्षपित--दूर हुई; कुच--जिनके स्तनों की; रुज:--पीड़ा; ते--वे; कल्पयन्ति--प्रदान करेंगी; इष्टम्ू--मनवांछित दान; इष्टा: --अपनी प्रियाओं को
हे भौरे, तुम घर-बार से रहित हम लोगों के समक्ष यदुओं के स्वामी के विषय में इतनाअधिक क्यों गाये जा रहे हो? ये कथाएँ हमारे लिए अब पुरानी हो चुकी हैं।
अच्छा हो कि तुमअर्जुन के उस मित्र के विषय में उसकी उन नई सखियों के समक्ष जाकर गाओ जिनके स्तनों कीदाहक इच्छा( कामेच्छा ) को उसने शान्त कर दिया है।
वे स्त्रियाँ अवश्य ही तुम्हें मनवांछितभिक्षा-दान देंगी।
दिवि भुवि च रसायां काः स्त्रियस्तहुरापा:कपटरुचिरहासभ्रूविजूम्भस्य या: स्युः ।
चरणरज उपास्ते यस्य भूतिर्वयं काअपि च कृपणपक्षे ह्युत्तम:ःशलोकशब्द: ॥
१५॥
दिवि--स्वर्ग में; भुवि--पृथ्वी में; च--तथा; रसायाम्ू--तथा रसातल में; का:--क्या; स्त्रियः--स्त्रियाँ; तत्ू--उसके द्वारा;दुरापा:--अप्राप्प; कपट--छल; रुचिर-- आकर्षक; हास--हँसी से युक्त; भ्रू-- भौंहें; विजृम्भस्य--टेढ़ी; या:-- जो; स्यु:--बन जाती हैं; चरण--पैरों की; रज:--धूल; उपास्ते--पूजा करती है; यस्थ--जिसकी; भूतिः--लक्ष्मी, नारायण-पत्ली;वयम्--हम; का--कौन; अपि च--फिर भी; कृपण-पक्षे--बेचारे दीनों के लिए; हि--निस्सन्देह; उत्तमः-शलोक-- भगवान्जिनका गुणगान उत्तम स्तुतियों द्वारा किया जाता है; शब्द:--नाम |
उन्हें स्वर्ग, पृथ्वी या पाताल में कौन-सी स्त्रियाँ अनुपलब्ध हैं ? वे केवल अपनी भौंहों कोतिरकी करके छलपूर्ण आकर्षण से हँसते हैं, तो वे सब उनकी हो जाती हैं।
लक्ष्मीजी तक उनकेचरण-रज की पूजा करती हैं, तो उनकी तुलना में हमारी क्या बिसात है? किन्तु जो दीन-दुखियारी हैं, वे कम से कम उनका उत्तमएलोक नाम तो ले ही सकती हैं! विसृज शिरसि पादं वेद्म्यहं चातुकारै-रनुनयविदुषस्ते भ्येत्य दौत्यर्मुकुन्दात् ।
स्वकृत इह विषुृष्टापत्यपत्यन्यलोकाव्यसृजदकृतचेता: कि नु सन्धेयमस्मिन् ॥
१६॥
विसृज--जाने दें; शिरसि--तुम्हारे सिर पर; पादम्--मेरा पाँव; वेदि--जानती हूँ; अहम्--मैं; चाठु-कारैः--चापलूसी भरेशब्दों से; अनुननय--समझौता करने की कला में; विदुष: -- प्रवीण; ते--तुम्हारा; अभ्येत्य--जानकर; दौत्यैः--दूत की तरहकार्य करके; मुकुन्दात्--कृष्ण से; स्व--उनके अपने; कृते--लिए, हेतु; इहह--इस जीवन में; विसृष्ट--परित्यक्त; अपत्य--बच्चे; पती--पति; अन्य-लोकाः --अन्य सारे लोग; व्यसृजत्--उसने छोड़ दिया है; अकृत-चेता:--कृतघ्न; किम् नु--क्योंकि;सन्धेयम्--क्या मैं समझौता कर लूँ; अस्मिन्--उससे |
तुम अपने सिर को मेरे पैरों से दूर ही रखो।
मुझे पता है कि तुम क्या कर रहे हो।
तुमने बहुतही दक्षतापूर्वक मुकुन्द से कूटनीति सीखी है और अब चापलूसी भरे शब्द लेकर उनके दूतबनकर आये हो।
किन्तु उन्होंने तो उन बेचारियों को ही छोड़ दिया है जिन्होंने उनके लिए अपनेबच्चों, पतियों तथा अन्य सम्बन्धियों का परित्याग किया है।
वे निपट कृतघ्न हैं।
तो मैं अब उनसे समझौता क्यों करूँ ?
मृगयुरिव कपीन्द्रं विव्यधे लुब्धधर्मास्त्रियमकृत विरूपां स्त्रीजित: कामयानाम् ।
बलिमपि बलिम््त्वावेष्टयद्ध्वाइ्ज्षवद्य-स्तदलमसितसख्यर्दुस्त्यजस्तत्कथार्थ: ॥
१७॥
मृगयु:--शिकारी; इब--सहश; कपि--बन्दरों के; इन्द्रमू--राजा; विव्यधे--बींध दिया; लुब्ध-धर्मा--क्रूर शिकारी जैसाआचरण करते हुए; स्त्रियम्--स्त्री ( शूर्पणखा ) को; अकृत--बना दिया; विरूपाम्--विकृत; स्त्री --स्त्री ( सीता देवी ) द्वारा;जितः--जीता गया; कामयानामू्--कामेच्छा से प्रेरित; बलिम्--राजा बलि को; अपि-- भी; बलिमू--उसका सम्मान, भाग;अत्त्वा--खाकर; अवेष्टयत्--बाँध लिया; ध्वाइज्लवत्--कौवे की तरह; यः--जो; तत्--इसलिए; अलमू--जाने भी दो;असित--श्याम कृष्ण से; सख्यै:--सभी प्रकार की मित्रता से; दुस्त्यज:--छोड़ पाना असम्भव; तत्--उसके विषय में; कथा--कथा का; अर्थ:--विस्तार।
शिकारी की तरह उन्होंने कपिराज को बाणों से निर्दयतापूर्वक बींध दिया।
चूँकि वे एक स्त्रीद्वारा जीते जा चुके थे इसलिए उन्होंने एक दूसरी स्त्री को, जो उनके पास कामेच्छा से आईं थीकुरूप कर दिया।
यही नहीं, बलि महाराज की बलि खाकर भी उन्होंने उन्हें रस्सियों से बाँधदिया मानो वे कोई कौवा हों।
अतः हमें इस श्यामवर्ण वाले लड़के से सारी मित्रता छोड़ देनीचाहिए भले ही हम उसके विषय में बातें करना बन्द न कर पायें।
यदनुचरितलीलाकर्णपीयूषविप्रुट्-सकृददनविधूतद्वन्द्धर्मा विनष्टा: ।
सपदि गृहकुटुम्बं दीनमुत्सूज्य दीनाबहव इह विहड्जा भिक्षुचर्या चरन्ति ॥
१८॥
यत्--जिसके; अनुचरित--निरन्तर किये गये कार्य; लीला--ऐसी लीलाओं के ; कर्ण--कानों के लिए; पीयूष-- अमृत की;विप्रुटू--एक बूँद का; सकृत्ू--केवल एक बार; अदन--पान; विधूत--पूर्णतया विलग; द्वन्द्द--द्वैत का; धर्मा:--उनकीरुचियाँ; विनष्टा:--नष्ट- भ्रष्ट; सपदि--तुरन््त; गृह-- अपने घर; कुटुम्बम्--तथा परिवार को; दीनम्--बेचारी; उत्सूज्य--त्यागकर; दीना:--स्वयं दीन बनकर; बहव:--अनेक व्यक्ति; उहह--यहाँ ( वृन्दावन में ); विहड्जाः--पक्षियों ( की तरह ); भिक्षु--भीख माँगने की; चर्यामू--आजीविका; चरन्ति--अपनाते हैं ।
कृष्ण द्वारा नियमित रूप से की जाने वाली लीलाओं के विषय में सुनना कानों के लिएअमृत के समान है।
जो लोग इस अमृत की एक बूँद का एक बार भी आस्वादन करते हैं, उनकीभौतिक द्वैत के प्रति अनुरक्ति विनष्ट हो जाती है।
ऐसे अनेक लोगों ने एकाएक अपने भाग्यहीनघरों तथा परिवारों को त्याग दिया है और वे स्वयं दीन बनकर पक्षियों की तरह इधर-उधर घूमते-फिरते हुए जीवन-निर्वाह के लिए भीख माँग-माँग कर वृन्दावन आये हैं।
वयमृतमिव जिह्ाव्याहतं अ्रहधाना:कुलिकरुतमिवाज्ञा: कृष्णवध्वो हरिण्य: ।
ददृशुरसकृदेतत्तन्नखस्पर्शतीब्र-स्मररुज उपमन्त्रिन्भण्यतामन्यवार्ता ॥
१९॥
वयम्--हम; ऋतम्--सच्ची; इव--सहृश; जिहा-- धोखेबाज, छलिया; व्याहतम्--उसकी वाणी; श्रद्दधाना:--विश्वास करके;कुलिक--शिकारी; रुतमू--गीत; इब--मानो; अज्ञा:--मूर्ख; कृष्ण--काले हिरन की; वध्व:--पत्नियाँ; हरिण्य:--हिरनी;दहशु:--अनु भव किया; असकृत्--बारम्बार; एतत्--यह; तत्--उसका; नख--नाखुनों के; स्पर्श--स्पर्श से; तीव्र--तेज;स्मर--कामदेव की; रुज:--वेदना; उपमन्धत्रिनू--हे दूत; भण्यताम्--बोलो; अन्य--दूसरी; वार्ता--कथा, बात |
उनके छलपूर्ण शब्दों को सच मानकर हम उस काले हिरन की मूर्ख पत्नियों के समान बनगईं जो निष्ठर शिकारी के गीत में भरोसा कर बैठती हैं।
इस तरह हम उनके नाखुनों के स्पर्श सेउत्पन्न काम की तीव्र पीड़ा का बारम्बार अनुभव करती रहीं।
हे दूत, अब कृष्ण के अतिरिक्तअन्य कोई बात कहो।
प्रियसख पुनरागा: प्रेयसा प्रेषित: किवरय किमनुरुन्धे माननीयोउसि मेउड्र ।
नयसि कथमिहास्मान्दुस्त्यजद्व न्धपा श्रसततमुरसि सौम्य श्रीर्वधू: साकमास्ते ॥
२०॥
प्रिय--मेरे प्यारे; सख--हे मित्र; पुनः--एक बार फिर; आगा: --आये हो; प्रेयसा--मेरे प्रेमी; प्रेषित:-- भेजा गया; किम्--क्या; वरय--चुन लो; किम्--क्या; अनुरुन्धे --जो चाहो; माननीय: --सम्मान के योग्य; असि--हो; मे--मेरे द्वारा; अड़--हेप्रिय; नयसि--लाये हो; कथम्--क्यों; इह--यहाँ; अस्मान्ू--हमको; दुस्त्यज--छोड़ पाना मुश्किल; द्वन्द्द--जिसके साथमाधुर्य सम्बन्ध हो; पार्श्रमू--बगल में; सततम्--निरन्तर; उरसि--वश्षस्थल पर; सौम्य--हे भद्ग; श्री:--लक्ष्मीजी; वधू:--उनकीप्रेयसी; साकम्--उनके साथ; आस्ते--उपस्थित है
हे मेरे प्रियतम के मित्र, क्या मेरे प्रेमी ने फिर से तुम्हें यहाँ भेजा है? हे मित्र, मुझे तुम्हारासम्मान करना चाहिए, अतः जो चाहो वर माँग सकते हो।
किन्तु तुम हमें उसके पास फिर से लेजाने के लिए यहाँ क्यों आये हो जिसके मधुर प्रेम को छोड़ पाना इतना कठिन है? कुछ भी हो,है भद्र भौरे, उनकी प्रेयसी तो लक्ष्मीजी हैं और वे उनके साथ सदैव ही उनके वशक्षस्थल परविराजमान रहती हैं।
अपि बत मधुपुर्यामार्यपुत्रो धु नास्तेस्मरति स पितृगेहान्सौम्य बन्धूंश्र गोपान् ।
क्वचिदपि स कथा नः किड्डूरीणां गृणीतेभुजमगुरुसुगन्धं मूर्ध््यधास्यत्कदा नु ॥
२१॥
अपि--निश्चय ही; बत--खेद है; मधु-पुर्याम्--मथुरा नगरी में; आर्य-पुत्र:--नन््द महाराज का पुत्र; अधुना--इस समय;आस्ते--रहता है; स्मरति--स्मरण करता है; सः--वह; पितृ-गेहान्-- अपने पिता के घरेलू काम-काज को; सौम्य--हे महात्मा( उद्धव ); बन्धून्ू-- अपने मित्रगण को; च--तथा; गोपान्ू--ग्वालबालों को; क्वचित्--कभी कभी; अपि--अथवा; सः--वह; कथा:--बातें; नः--हम; किड्डूरीणाम्-दासियों की; गृणीते--कहकर सुनाता है; भुजम्--हाथ; अगुरु-सु-गन्धम्--अगुरु की सुगंध वाला; मूर्ध्वि--सिर पर; अधास्यत्--रखेगा; कदा--कब; नु--हो सकता है।
हे उद्धव, दरअसल यह बहुत ही खेदजनक है कि कृष्ण मथुरा में वास करते हैं।
कया वेअपने पिता के गृहकार्यों तथा अपने ग्वालबाल मित्रों की याद करते हैं? हे महात्मा, क्या वे कभीअपनी इन दासियों की भी बातें चलाते हैं? वे कब अपने अगुरु-सुगन्धित हाथ को हमारे सिरोंपर रखेंगे ?
श्रीशुक उबाचअथोद्धवो निशम्यैवं कृष्णदर्शनलालसा: ।
सान्त्वयन्प्रियसन्देशैगोपीरिदमभाषत ॥
२२॥
श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; अथ--तब; उद्धव: --उद्धव ने; निशम्य--सुनकर; एवम्--इस प्रकार; कृष्ण-दर्शन--कृष्ण को देखने के पश्चात; लालसा:--लालायित; सान्त्वयन्ू-ढाढ़स बँधाते हुए; प्रिय--उनके प्रेमी के; सन्देशै:--संदेशों से; गोपी:--गोपियों से; इदम्--यह; अभाषत--उसने कहा।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : यह सुनकर उद्धव ने गोपियों को ढाढ़स बँधाने का प्रयास कियाजो कृष्ण का दर्शन पाने के लिए अत्यन्त लालायित थीं।
इस तरह वे उनके प्रेमी का सन्देश उनसेबताने लगे।
श्रीउद्धव उवाचअहो यूय॑ सम पूर्णार्था भवत्यो लोकपूजिता: ।
वबासुदेवे भगवति यासामित्यर्पितं मन: ॥
२३॥
श्री-उद्धव: उवाच-- श्री उद्धव ने कहा; अहो--निस्सन्देह; यूयम्--तुम सभी; स्म--निश्चय ही; पूर्ण--पूरे हो चुके; अर्था:--प्रयोजन; भवत्य:--तुम लोग; लोक--सभी लोगों द्वारा; पूजिता: --पूजित; वासुदेवे भगवति-- भगवान् वासुदेव कृष्ण में;यासाम्--जिनका; इति--इस प्रकार से; अर्पितम्--अर्पित किया हुआ; मन:--मन |
श्री उद्धव ने कहा : निश्चय ही तुम सारी गोपियाँ सभी प्रकार से सफल हो और विश्व-भर मेंपूजित हो क्योंकि तुमने इस तरह से भगवान् वासुदेव में अपने मन को समर्पित कर रखा है।
दानव्रततपोहोम जपस्वाध्यायसंयमै: ।
श्रेयोभिर्विविधैश्ान्यै: कृष्णे भक्तिहिं साध्यते ॥
२४॥
दान--दान; ब्रत--कठिन ब्रत; तपः--तपस्या; होम-- अग्नि यज्ञ; जप--मंत्रों का गुप्त उच्चारण; स्वाध्याय--वैदिक ग्रंथों काअध्ययन; संयमैः--तथा विधि-विधानों से; श्रेयोभि:--शुभ साधनों द्वारा; विविधै:--विविध; च-- भी; अन्यैः--अन्य;कृष्णे--कृष्ण के प्रति; भक्तिः--भक्ति; हि--निस्सन्देह; साध्यते--सम्पन्न की जाती है।
दान, कठिन ब्रत, तपस्या, अग्नि यज्ञ, जप, वैदिक ग्रंथों का अध्ययन, विधि-विधानों कापालन तथा अन्य अनेक शुभ साधनों द्वारा भगवान् कृष्ण की भक्ति प्राप्त की जाती है।
भगवत्युत्तम:श्लोके भवतीभिरनुत्तमा ।
भक्ति: प्रवर्तिता दिष्टया मुनीनामपि दुर्लभा ॥
२५॥
भगवति-- भगवान् में; उत्तम:-श्लोके --उत्तम काव्य द्वारा जिनका यशोगान किया जाये; भवतीभि: --अपने द्वारा; अनुत्तमा --अद्वितीय; भक्ति:--भक्ति; प्रवर्तीता--स्थापित; दिष्टघ्या--( बधाई है तुम्हारे ) सौभाग्य की; मुनीनाम्--बड़े बड़े मुनियों के लिए;अपि-भी; दुर्लभा--प्राप्त करना कठिन।
अपने सौभाग्य से तुम सबों ने भगवान् उत्तमश्लोक के प्रति शुद्ध-भक्ति का अद्वितीयमानदण्ड स्थापित किया है--यह मानदण्ड ऐसा है, जिसे मुनि भी कठिनाई से प्राप्त कर सकतेहैं।
दिष्टद्या पुत्रान्पतीन्देहान्स्वजनान्भवनानि च ।
हित्वावृनीत यूयं यत्कृष्णाख्यं पुरुषं परम् ॥
२६॥
दिष्टयया--सौभाग्य से; पुत्रान्--पुत्रों को; पतीन्ू--पतियों को; देहानू--शरीरों को; स्व-जनान्--सम्बन्धियों को; भवनानि-घरोंको; च--तथा; हित्वा--छोड़कर; अवृणीत--चुना; यूयम्--तुम सबों ने; यत्--यह तथ्य कि; कृष्ण-आख्यम्--कृष्ण नामक;पुरुषम्--पुरुष को; परमू--परम।
सौभाग्य से तुम लोगों ने अपने पुत्रों, पतियों, शारीरिक सुविधाओं, सम्बन्धियों तथा घरों कापरित्याग उस परम पुरुष के लिए किया है, जो कृष्ण नाम से जाना जाता है।
सर्वात्मभावोधिकृतो भवतीनामधोक्षजे ।
विरहेण महाभागा महान्मेनुग्रहः कृत: ॥
२७॥
सर्व-आत्म--सर्वतो भावेन; भाव: --प्रेम; अधिकृत:--अधिकार प्राप्त; भवतीनाम्--आपके द्वारा; अधोक्षजे--दिव्य स्वामी केलिए; विरहेण--विरह भाव से; महा-भागा:--हे अत्यन्त भाग्यशालिनी; महान्ू--महान्; मे--मुझको; अनुग्रह:--दया; कृत: --की गई।
हे परम भाग्यशालिनी गोपियो, तुम लोगों ने दिव्य स्वामी के लिए अनन्य प्रेम का अधिकारठीक ही प्राप्त किया है।
निस्सन्देह, कृष्ण के विरह में उनके प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करके तुमलोगों ने मुझ पर महती कृपा दिखलाई है।
श्रूयतां प्रियसन्देशों भवतीनां सुखावहः ।
यमादायागतो भद्गा अहं भर्तू रहस्करः ॥
२८॥
श्रूयताम्--कृपया सुनें; प्रिय-- अपने प्रेमी का; सन्देश:--सन्देश; भवतीनाम्ू--तुम लोगों के लिए; सुख--सुख; आवह:--लाकर; यम्ू--जो; आदाय--ढोकर; आगत:--आया हूँ; भद्गा:--उत्तम स्त्रियो; अहम्--मैं; भर्तु:--मेरे स्वामी का; रह: --गुहाकार्यो का; करः--करने वाला।
हे भद्र-देवियो, अब तुम सब अपने प्रेमी का सन्देश सुनो जिसे अपने स्वामी का विश्वसनीयदास होने से मैं तुम लोगों के पास लेकर आया हूँ।
श्रीभगवानुवाचभवतीनां वियोगो मे न हि सर्वात्मना क्वचित् ।
यथा भूतानि भूतेषु खं वाय्वग्निर्जलं मही ।
तथाहं च मनःप्राणभूतेन्द्रियगुणा अ्रयः ॥
२९॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; भवतीनाम्--तुम स्त्रियों का; वियोग:--विरह; मे--मुझसे; न--नहीं; हि--निस्सन्देह;सर्व-आत्मना--सारे जीवों की आत्मा से; क्वचित्--क भी; यथा--जिस तरह; भूतानि-- भौतिक तत्त्व; भूतेषु--सारे सृजितप्राणियों में; खम्-- आकाश; वायु-अग्नि:--वायु तथा अग्नि; जलम्--जल; मही--पृथ्वी; तथा--अत:; अहम्--मैं; च--तथा; मनः--मन; प्राण-- प्राण-वायु; भूत-- भौतिक तत्त्व; इन्द्रिय--शारीरिक इन्द्रियाँ; गुण--तथा प्रकृति के आदि गुण के;आश्रय:--आश्रय के रूप में उपस्थित |
भगवान् ने कहा है, 'तुम वास्तव में कभी भी मुझसे विलग नहीं हो क्योंकि मैं सारी सृष्टिका आत्मा हूँ।
जिस तरह प्रकृति के तत्त्व--आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी--प्रत्येकसृजित वस्तु में उपस्थित रहते हैं उसी तरह मैं हर एक के मन, प्राण तथा इन्द्रियों में और भौतिकतत्त्वों के भीतर तथा प्रकृति के गुणों में उपस्थित रहता हूँ।
आत्मन्येवात्मनात्मानं सूजे हन्म्यनुपालये ।
आत्ममायानुभावेन भूतेन्द्रियगुणात्मना ॥
३०॥
आत्मनि--अपने में; एब--निस्सन्देह; आत्मना--अपने से; आत्मानम्--स्वयं; सृजे--उत्पन्न करता हूँ; हन्मि--नष्ट करता हूँ;अनुपालये--पालनपोषण करता हूँ; आत्म--निजी; माया--योग शक्ति के; अनुभावेन--बल से; भूत-- भौतिक तत्त्व;इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; गुण--तथा गुण; आत्मना--से युक्त ।
मैं ही अपनी निजी शक्ति के द्वारा भौतिक तत्त्वों, इन्द्रियों तथा प्रकृति के गुणों का सृजन करता हूँ, उन्हें बनाये रखता हूँ और फिर अपने भीतर समेट लेता हूँ।
आत्मा ज्ञानमय: शुद्धो व्यतिरिक्तोडगुणान्वयः ।
सुषुप्तिस्वण्नजाग्रद्धिर्मायावृत्तिभिरीयते ॥
३१॥
आत्मा--आत्मा; ज्ञान-मय:ः--दिव्य ज्ञान से युक्त; शुद्धः --शुद्ध; व्यतिरिक्त:--पृथक्; अगुण-अन्वयः-- भौतिक गुणों केकर्मफलों से अलिप्त; सुषुप्ति--प्रगाढ़ निद्रा में; स्वप्न--सामान्य नींद; जाग्रद्धिः--तथा जागृत चेतना; माया--माया को;वृत्तिभिः--कार्यों से; ईयते-- अनुभव किया जाता है।
शुद्ध चेतना या ज्ञान से युक्त होने से आत्मा प्रत्येक भौतिक वस्तु से पृथक् है और प्रकृति केगुणों के पाश से अलिप्त है।
आत्मा का अनुभव भौतिक प्रकृति के तीन कार्यो के माध्यम सेकिया जा सकता है--ये हैं जाग्रत, स्वप्न तथा सुषुष्ति।
येनेन्द्रियार्थान्ध्यायेत मृषा स्वप्नवदुत्थितः ।
तन्निरुन्ध्यादिन्द्रियाणि विनिद्र: प्रत्यपद्यत ॥
३२॥
येन--जिस ( मन ) से; इन्द्रिय--इन्द्रियों के; अर्थान्ू--विषयों पर; ध्यायेत-- ध्यान करता है; मृषा--झूठा; स्वप्न-वत्--सपनेकी तरह; उत्थित:--नींद से जगा; तत्--उस ( मन ); निरुन्ध्यात्ू--वश में करे; इन्द्रियाणि--इन्द्रियों को; विनिद्र:--सोता हुआनहीं ( सतर्क ); प्रत्यपद्यत--प्राप्त करते हैं।
जिस तरह तुरन्त का जगा हुआ व्यक्ति स्वप्न के विषय में सोचता रह सकता है यद्यपि वहभ्रामक होता है उसी तरह मन के द्वारा मनुष्य इन्द्रियविषयों का ध्यान करता है जिन्हें बाद मेंइन्द्रियाँ प्राप्त कर सकती हैं।
इसलिए मनुष्य को पूर्णतया सतर्क रहना चाहिए और मन को वश में लाना चाहिए।
एतदन्तः समाम्नायो योग: साड्ख्यं मनीषिणाम् ।
त्यागस्तपो दमः सत्यं समुद्रान्ता इबापगा: ॥
३३॥
एतत्--यह; अन्त:--निष्कर्ष रूप में; समाम्नाय: --सम्पूर्ण वैदिक वाड्मय; योग:--योग पद्धति; साइड्ख्यम्--सांख्य ध्यान कीविधि जिससे मनुष्य आत्मा तथा पदार्थ के अन्तर को जान सकता है; मनीषिणाम्--बुद्ध्रिमानों का; त्याग:--त्याग; तप: --तपस्या; दम:--इन्द्रिय संयम; सत्यमू--तथा ईमानदारी; समुद्र-अन्ता:--समुद्र में जाने वाली; इब--सहृश; आप-गा:ः--नदियाँ |
बुद्धिमान अधिकारी जनों के अनुसार यही सारे वेदों तथा योगाभ्यास, सांख्य, त्याग,तपस्या, इन्द्रिय संयम तथा सचाई का चरम निष्कर्ष है, जिस तरह कि सारी नदियों का चरमगन्तव्य समुद्र है।
यत्त्वहं भवतीनां वै दूरे वर्ते प्रियो दहशाम् ।
मनसः सन्निकर्षार्थ मदनुध्यानकाम्यया ॥
३४॥
यत्--तथ्य यह है; तु--किन्तु; अहम्ू--मैं; भवतीनाम्--तुम सबों से; वै--निस्सन्देह; दूरे--बहुत दूर; वर्ते--स्थित हूँ; प्रियः--प्रिय; दहशाम्--आँखों के लिए; मनसः--मन का; सन्निकर्ष--आकर्षण; अर्थम्ू--के लिए; मत्--मुझ पर; अनुध्यान-- तुम्हारेध्यान के लिए; काम्यया--कामना करते हुए
किन्तु जिस असली कारण से तुम सबों की आँखों की प्रिय वस्तुरुप, मैं, तुम लोगों से अतिदूर रह रहा हूँ, वह यह है कि मैं अपने प्रति तुम सबों के चिंतन को प्रगाढ़ करना चाहता था औरइस तरह तुम्हारे मनों को अपने अधिक निकट लाना चाहता था।
यथा दूरच्रे प्रेष्ठि मन आविश्य वर्तते ।
स्त्रीणां च न तथा चेतः सन्निकृष्टेउश्षिगोचरे ॥
३५॥
यथा--जिस तरह; दूर-चरे--दूर स्थित होने पर; प्रेष्ठ--प्रेमी; मनः--मन; आविश्य--लीन होकर; वर्तते--रहता है; स्त्रीणाम्--स्त्रियों का; च--तथा; न--नहीं; तथा--अतः ; चेत:--उनके मन; सन्निकृष्ट--पास होने पर; अक्षि-गोचरे--उनकी आँखों केसामने मौजूद
जब प्रेमी दूर होता है, तो स्त्री उसके विषय में अधिक सोचती है बजाय इसके कि जब वहउसके समक्ष उपस्थित होता है।
मय्यावेश्य मनः कृत्स्नं विमुक्ताशेषवृत्ति यत् ।
अनुस्मरन्त्यो मां नित्यमचिरान्मामुपैष्यथ ॥
३६॥
मयि--मुझमें; आवेश्य--लीन होकर; मन: --अपने मन; कृत्स्म्--सम्पूर्ण; विमुक्त--छोड़ने के बाद; अशेष--समस्त;वृत्ति--अपना ( भौतिक ) कार्य; यत्-- क्योंकि; अनुस्मरन्त्य: --स्मरण कर करके; माम्--मुझको; नित्यम्--निरन्तर;अचिरातू--शीघ्र ही; मामू--मुझको; उपैष्यथ--तुम प्राप्त करोगी |
चूँकि तुम्हारे मन पूर्णतया मुझमें लीन रहते हैं और अन्य सारे कार्यो से मुक्त रहते हैं, तुमसदैव मेरा स्मरण करती हो और इसीलिए तुम लोग शीघ्र ही मुझे पुन: अपने सामने पा सकोगी।
या मया क्रीडता रात्र्यां वनेउस्मिन्त्रज आस्थिता: ।
अलब्धरासा: कल्याण्यो मापुर्मद्वीर्यचिन्तया ॥
३७॥
या:--जो स्त्रियाँ; मया--मेरे साथ; क्रीडता--खेल रही थीं; रात््यामू--रात में; वने--जंगल में; अस्मिनू--इस; ब्रजे--त्रज केग्राम में; आस्थिता: --रह गईं; अलब्ध--अनुभव न करते हुए; रासा:--रास-नृत्य; कल्याण्य:-- भाग्यशाली; मा--मुझको;आपु:--उन््होंने प्राप्त किया; मत्ू-बीर्य--मेरी शक्तिशाली लीलाओं पर; चिन्तया--एकाग्रता द्वारा |
यद्यपि कुछ गोपियों को ग्वाल-ग्राम में ही रह जाना पड़ा था जिससे वे रात में जंगल मेंरचाये गये रास-नृत्य में मेरे साथ क्रीड़ा नहीं कर पाईं, तो भी वे परम भाग्यशालिनी थीं।
दरअसल वे मेरी शक्तिशाली लीलाओं का ध्यान करके ही मुझे प्राप्त कर सकीं।
श्रीशुक उबाचएवं प्रियतमादिष्टमाकर्ण्य ब्रजयोषितः ।
ता ऊच्चुरुद्धवं प्रीतास्तत्सन्देशागतस्मृती: ॥
३८ ॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस तरह से; प्रिय-तम--अपने प्रेमी ( कृष्ण ) द्वारा दिये; आदिष्टम्--आदेशों को; आकर्णर्य--सुनकर; ब्रज-योषित:--व्रज की स्त्रियाँ; ताः--वे; ऊचु:--बोली; उद्धववम्--उद्धव से; प्रीत:--प्रसन्न;तत्--उस; सन्देश--सन्देश; आगत--वापस आयी हुईं; स्मृती: --स्मृतियाँ
शुकदेव गोस्वामी ने कहा: ब्रज की स्त्रियाँ अपने प्रियतम कृष्ण से यह सन्देशा सुनकरप्रसन्न हुईं।
उनके शब्दों से उनकी स्मृतियाँ ताजी हो गईं अतः उन्होंने उद्धव से इस प्रकार कहा।
गोप्य ऊचुःदिष्ट्याहितो हतः कंसो यदूनां सानुगोउघकृत् ।
दिष्टयाप्तैलब्धसर्वार्थें: कुशल्यास्तेच्युतोधुना ॥
३९॥
गोप्य: ऊचुः--गोपियों ने कहा; दिष्टया--सौभाग्य से; अहित:--शत्रु; हतः--मारा जा चुका है; कंस:--राजा कंस; यदूनाम्--यदुओं का; स-अनुग:--अपने अनुयायियों सहित; अघ--कष्ट का; कृतू--कारण; दिष्टया--सौभाग्य से; आप्तैः:--अपनेशुभचिन्तकों सहित; लब्ध--प्राप्त हुए; सर्व--समस्त; अर्थ: --अपनी इच्छाओं से; कुशली--सुखपूर्वक; आस्ते--रह रहा है;अच्युत:ः--कृष्ण; अधुना--इस समय |
गोपियों ने कहा : यह अच्छी बात है कि यदुओं का शत्रु एवं उन्हें सताने वाला कंस अबअपने अनुयायियों सहित मारा जा चुका है।
और यह भी अच्छी बात है कि भगवान् अच्युत अपनेशुभषी मित्रों तथा सम्बन्धियों के साथ सुखपूर्वक रह रहे हैं जिनकी हर इच्छा अब पूरी हो रही है।
कच्चिद्गदाग्रज: सौम्य करोति पुरयोषिताम् ।
प्रीति नः स्निग्धसब्रीडहासोदारेक्षणार्चित: ॥
४० ॥
'कच्चितू--शायद; गद-अग्रज:--गद के बड़े भाई, कृष्ण; सौम्य--हे भद्ग ( उद्धव ); करोति--दे रहा है; पुर--नगर की;योषिताम्--स्त्रियों का; प्रीतिम्--प्रेमपूर्ण सुख; नः--हमारा; स्निग्ध--वत्सल; स-ब्रीड--तथा लज्जालु; हास--हँसी से;उदार--उदार; ईक्षण--चितवनों से; अर्चित: --पूजित
है भद्र उद्धव, क्या गद का बड़ा भाई नगर की स्त्रियों को वह आनन्द प्रदान कर रहा है, जोवास्तव में हमारा है? हम ऐसा समझती हैं कि वे स्त्रियाँ उदार चितवनों तथा प्यारी लजीलीमुसकानों से उनकी पूजा करती होंगी।
कथं रतिविशेषज्ञ: प्रियश्च पुरयोषिताम् ।
नानुबध्येत तद्वाक्यर्विभ्रमैश्चानुभाजित: ॥
४१॥
कथम्--कैसे; रति--माधुर्य व्यापार का; विशेष--विशेष रूप से; ज्ञ:--ज्ञाता; प्रियः--प्रिय; च--तथा; पुर-योषिताम्--नगरकी स्त्रियों का; न अनुबध्येत--बँधा नहीं होगा; तत्--उनके; वाक्यै:--शब्दों से; विभ्रमैः--मोह में डालने वाले संकेतों से;च--तथा; अनुभाजित: --निरन्तर पूजित |
श्रीकृष्ण सभी प्रकार के माधुर्य व्यापार में दक्ष हैं और नगर की स्त्रियों के प्रिय हैं।
चूँकिअब वे उनके मोहक शब्दों तथा इशारों से निरन्तर पूजित हैं, तो भला फिर वे उनके पाश मेंक्योंकर नहीं बँधेंगे ?तात्पर्य : श्रीधर स्वामी के अनुसार इनमें से प्रत्येक श्लोक भिन्न भिन्न गोपियों द्वारा कहा गया है।
अपि स्मरति नः साधो गोविन्द: प्रस्तुते क्वचित् ।
गोष्टिमध्ये पुरस्त्रीणाम्ग्राम्या: स्वैरकथान्तरे ॥
४२॥
अपि--यही नहीं; स्मरति--स्मरण करता है; नः--हमको; साधो--हे पवित्रात्मा; गोविन्द: --कृष्ण; प्रस्तुते--बातचीत केदौरान; क्वचित्--कभी; गोष्टि--सभा; मध्ये--में; पुर-स्त्रीणाम्--नगर की स्त्रियों के; ग्राम्या:--ग्रामीण बालिकाएँ; स्वैर--स्वतंत्र; कथा--बातचीत; अन्तरे--के दौरान।
हे साधु-पुरुष, नगर की स्त्रियों से बातचीत के दौरान कया गोविन्द कभी हमारी याद करते हैं? क्या वे उनसे खुल कर वार्ता करते समय कभी हम ग्रामीण बालाओं का भी स्मरण करतेहैं?
ताः कि निशा: स्मरति यासु तदा प्रियाभि-वृन्दावने कुमुदकुन्दशशाड्ूरम्ये ।
रेमे क्वणच्चरणनूपुररासगोष्ठयाम्अस्माभिरीडितमनोज्ञकथः कदाचित् ॥
४३॥
ताः--वे; किम्--क्या; निशा:--रातें; स्मरति--स्मरण करता है; यासु--जिनमें ; तदा--तब; प्रियाभि:--अपनी प्रेयसियों केसाथ; वृन्दावने--वृन्दावन के जंगल में; कुमुद--कमलों; कुन्द--तथा चमेली के कारण; शशाद्भू--तथा चन्द्रमा के कारण;रम्ये--आकर्षक; रेमे--विहार या रमण किया; क्वणत्--बजते हुए; चरण-नूपुर--पाँव के घुूँघरू; रास-गोष्ठययाम्--रास-नृत्यकी गोष्ठी में; अस्माभिः--हमारे साथ; ईंडित-- प्रशंसित; मनोज्ञ--सुहावनी; कथ:--कथाएँ; कदाचित्ू--क भी ।
क्या वे वृन्दावन के जंगल में उन रातों का स्मरण करते हैं, जो कमल, चमेली तथाप्रकाशमान चन्द्रमा से सुन्दर लगती थीं? जब हम उनकी मनमोहिनी लीलाओं का गुणगान करतींतो वे रास-नृत्य के घेरे में जो कि घुँघरुओं के संगीत से गुंजायमान होता था, हम प्रेयसियों केसाथ आनन्द विहार करते थे।
अप्येष्यतीह दाशाईस्तप्ता: स्वकृतया शुच्ा ।
सञ्जीवयच्नु नो गात्रैर्यथेन्द्रो वनमम्बुदे: ॥
४४॥
अपि--क्या; एष्यति-- आयेगा; इह--यहाँ; दाशाई:--दशाईवंशी कृष्ण; तप्ता:--संतप्त; स्व-कृतया-- अपनी ही करनी से;शुचा--शोक से युक्त; सझ्ीवयन्ू--जीवनदान दिलाते हुए; नु--शायद; नः--हमको; गात्रै:--अपने अंगों के ( स्पर्श ) द्वारा;यथा--जिस तरह; इन्द्र: --इन्द्र; वनमू--जंगल को; अम्बुदैः--बादलों से
क्या वह दाशाई वंशज यहाँ फिर से आयेगा और अपने अंगों के स्पर्श से उन सबों को फिरसे जिलायेगा जो अब उन्हीं के द्वारा उत्पन्न किए गए शोक से जल रहे हैं? कया वह हमें उसीप्रकार बचा लेगा जिस तरह भगवान् इन्द्र जलधारी बादलों से जंगल को पुनः जीवनदान देते हैं ?
कस्मात्कृष्ण इहायाति प्राप्तराज्यो हताहितः ।
नरेन्द्रकन्या उद्घाह्म प्रीतः सर्वसुहृद्दृत: ॥
४५ ॥
कस्मातू-क्यों; कृष्ण:--कृष्ण; इहह--यहाँ; आयाति--आयेगा; प्राप्त--पाकर; राज्य; --राज्य; हत--मारकर; अहित:ः--अपने शत्रुओं को; नर-इन्द्र--राजाओं की; कन्या: --पुत्रियों को; उद्दाह्मय--विवाह कर; प्रीत:--सुखी; सर्व--सभी; सुहृत्--शुभचिन्तकों से; वृतः--घिरा हुआ।
भला राज्य जीत लेने, अपने शत्रुओं का वध कर लेने और राजाओं की पुत्रियों के साथविवाह कर लेने के बाद कृष्ण यहाँ क्यों आने लगे? वे वहाँ अपने सारे मित्रों तथा शुभचिन्तकोंसे घिरेरहकर प्रसन्न हैं।
किमस्माभिर्वनौकोभिरन्याभिर्वा महात्मन: ।
श्रीपतेराप्तकामस्य क्रियेतार्थ: कृतात्मनः ॥
४६॥
किम्--क्या; अस्माभि: --हम सबों के साथ; वन--जंगल; ओकोभि:--जिनका आवास; अन्याभि:--अन्य स्त्रियों के साथ;वा--अथवा; महा-आत्मन:--महापुरुष ( कृष्ण ) के लिए; श्री-- लक्ष्मी के; पतेः--पति के लिए; आप्त-कामस्य--जिनकीइच्छाएँ पूरी हो चुकी हैं; क्रियेत--सेवा की जानी है; अर्थ:--प्रयोजन; कृत-आत्मन:--जो पूर्ण है उसके लिए
महापुरुष कृष्ण लक्ष्मी के स्वामी हैं और वे जो भी चाहते हैं वह स्वतः पा लेते हैं।
जब वेअपने में पहले से पूर्ण हैं, तो हम वनवासिनियाँ या अन्य स्त्रियाँ उनके प्रयोजन को कैसे पूरा करसकती हैं ?
परं सौख्य॑ हि नैराशएयं स्वैरिण्यप्याह पिड़ला ।
तज्जानतीनां नः कृष्णे तथाप्याशा दुरत्यया ॥
४७॥
परमू--सर्वोच्च; सौख्यम्--सुख; हि--निस्सन्देह; नैराश्यम्ू-- अन्यमनस्कता; स्वैरिणी--व्यभिचारिणी; अपि--यद्यपि; आह--कहा; पिड्ुला--पिंगला नामक वेश्या; तत्--उस; जानतीनाम्--जानने वालों का; न:ः--हमारे लिए; कृष्णे--कृष्ण पर केन्द्रित;तथा अपि--फिर भी; आसा--आश्ा; दुरत्यया--पार करना असम्भव।
दरअसल सर्वोच्च सुख तो समस्त इच्छाओं का परित्याग करने में है जैसा कि पिंगला नामकवेश्या तक ने भी कहा है।
यह जानते हुए भी हम कृष्ण को पाने की अपनी आशाएँ नहीं छोड़सकतीं।
क उत्सहेत सन्त्यक्तुमुत्तम:शलोकसंविदम् ।
अनिच्छतोपि यस्य श्रीरज्भान्न च्यवते क्वचित् ॥
४८॥
कः--कौन; उत्सहेत--सहन कर सकता है; सन्त्यक्तुमू--त्याग कर पाना; उत्तम:ःशलोक-- भगवान् कृष्ण से; संविदम्-घनिष्टबातें; अनिच्छत: --न चाहते हुए; अपि-- भी; यस्य--जिसके ; श्री:--लक्ष्मीजी; अड्भत्--शरीर से; न च्यवते--विलग नहीं होनेदेते; क्वचित्ू--कभी
भला भगवान् कृष्ण से घुल-मिल कर बातें करने को छोड़ पाना कौन सहन कर सकता है ?यद्यपि वे श्रीदेवी में तनिक भी रुचि नहीं दर्शाते किन्तु वे उनके वक्षस्थल पर बने स्थान से कभीइधर-उधर नहीं होती।
सरिच्छैलवनोद्देशा गावो वेणुरवा इमे ।
सड्डर्षणसहायेन कृष्णेनाचरिता: प्रभो ॥
४९॥
सरित्--नदियाँ; शैल--पर्वत; वन-उद्देशा:--जंगली क्षेत्र; गाव: --गौवें; वेणु-रवा:--वंशी की ध्वनि; इमे--ये सब;सड्डूर्षण--बलराम; सहायेन--जिनके साथी; कृष्णेन--कृष्ण द्वारा; आचरिता:--उपभोग की गईं; प्रभो--हे स्वामी ( उद्धव )॥
हे उद्धव प्रभु, जब यहाँ कृष्ण बलराम के साथ थे तो वे इन सारी नदियों, पर्वतों, जंगलों,गौवों तथा वंशी की ध्वनियों का आनन्द लिया करते थे।
पुनः पुनः स्मारयन्ति नन्दगोपसुतं बत ।
श्रीनिकेतैस्तत्पदकैर्विस्मर्तु नैव शक्नुम: ॥
५०॥
पुनः पुन:ः--बारम्बार; स्मारयन्ति--याद दिलाती हैं; नन्द-गोप-सुतम्-ग्वालों के राजा नन्द के पुत्र की; बत--निश्चय ही;श्री--दैवी; निकेतैः--चिह्लों से युक्त; तत्ू--उसका; पदकै:ः--चरण-चिह्नों के कारण; विस्मर्तुमू- भुलाने के लिए; न--नहीं;एव--निस्सन्देह; शक््नुम:--हम सक्षम हैं।
ये सब हमें नन्द के पुत्र की सदैव याद दिलाते हैं।
निस्सन्देह चूँकि हम दैवी-चिन्हों सेअंकित कृष्ण के चरण-चिन्हों को देखती हैं अतः हम उन्हें कभी भी नहीं भुला सकतीं।
गत्या ललितयोदारहासलीलावलोकनै: ।
माध्व्या गिरा हतधिय: कथं तं विस्मराम हे ॥
५१॥
गत्या--अपनी चाल से; ललितया--आकर्षक; उदार--उदार; हास--हँसी; लीला--क्रौड़ापूर्ण;, अवलोकनै:--चितवतनों से;माध्व्या--मधु जैसी; गिरा--वाणी से; हत--चुराये गये; धिय:--चित्त; कथम्--कैसे; तम्--उसको; विस्मराम--हम भूलसकती हैं; हे-हे ( उद्धव )
हे उद्धव, हम उन्हें कैसे भुला सकती हैं जब उनकी मनोहर चाल, उनकी उदार हँसी, चपलचितवनों एवं मधुर शब्दों से हमारे चित्त चुराये जा चुके हैं ?
हे नाथ हे रमानाथ ब्रजनाथार्तिनाशन ।
मम्नमुद्धर गोविन्द गोकुलं वृजिनार्णवात् ॥
५२॥
है नाथ--हे स्वामी; हे रमा-नाथ--हे लक्ष्मीपति; वब्रज-नाथ--हे ब्रज के स्वामी; आर्ति--कष्ट के; नाशन--हे नष्ट करने वाले;मग्नमू--डूबी हुईं; उद्धर--उबारो; गोविन्द--हे गोविन्द; गोकुलम्ू--गोकुल को; वृजिन--दुख के; अर्णवात्--समुद्र से |
हे नाथ, हे रमानाथ, हे ब्रजनाथ! हे समस्त कष्टों के विनाशक गोविन्द! कृपया अपने गोकुलको व्यथा के उस सागर से उबार लें, जिसमें वह डूबा जा रहा है।
श्रीशुक उबाचततस्ताः कृष्णसन्देशैव्यपेतविरहज्वरा: ।
उद्धवं पूजयां चक्रुर्ज्ात्वात्मानमधोक्षजम् ॥
५३॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; ततः--तब; ताः--वे ; कृष्ण-सन्देशै:--कृष्ण के संदेशों से; व्यपेत--हटादिया; विरह--वियोग का; ज्वरा:--ज्वर; उद्धवम्--उद्धव को; पूजयाम् चक्रु:--पूजा की; ज्ञात्वा--जान कर; आत्मानम्--अपने आपको; अधोक्षजम्--परमेश्वर के रूप में
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : कृष्ण के सन्देशों से विरह का ज्वर हट जाने पर गोपियों नेउद्धव को अपने प्रभु कृष्ण से अभिन्न जान कर, उनकी पूजा की।
उवास कतिचिन्मासान्गोपीनां विनुदन्शुच्च: ।
कृष्णलीलाकथां गायत्रमयामास गोकुलम् ॥
५४॥
उबास--रहते थे; कतिचित्--कुछ; मासान्--महीनों तक; गोपीनाम्--गोपियों के; विनुदन्--दूर करते हुए; शुचः --दुख;कृष्ण-लीला--कृष्ण लीलाओं की; कथाम्ू--कथाएँ; गायन्--गाते हुए; रमयाम् आस--आनन््द दिया; गोकुलमू--गोकुलको।
उद्धव वहाँ पर कृष्ण की लीलाओं की कथाएँ कहकर गोपियों का दुख दूर करते हुए कईमहीनों तक रहे।
इस तरह वे सभी गोकुलवासियों के लिए आनन्द ले आये।
यावन्त्यहानि नन्दस्य ब्रजेवात्सीत्स उद्धव: ।
ब्रजौकसां क्षणप्रायाण्यासन्कृष्णस्य वार्तया ॥
५५॥
यावन्ति--जितने; अहानि--दिन; नन्दस्य--राजा नन्द के; ब्रजे--ब्रज में; अवात्सीत्--रहे; सः--वह; उद्धव:--उद्धव; ब्रज-ओकसामू--ब्रजवासियों को; क्षण-प्रायाणि--एक क्षण बीतने जैसे; आसनू-- थे; कृष्णस्य--कृष्ण की; वार्तया--वार्ताओं केकारण।
उद्धव जितने दिनों तक नन्द के ब्रज ग्राम में रहे वे सारे दिन वब्रजवासियों को एक क्षण केतुल्य प्रतीत हुए क्योंकि उद्धव सदा कृष्ण की वार्ताएँ करते रहते थे।
सरिद्वनगिरिद्रोणीर्वीक्षन्कुसुमितान्द्रमान् ।
कृष्णं संस्मारयन्रेमे हरिदासो बत्रजौकसाम् ॥
५६॥
सरित्--नदियाँ; वन--जंगल; गिरि--पर्वत; द्रोणी:--घाटियाँ; वीक्षन्--देखते हुए; कुसुमितानू--फूले हुए; द्रुमान्--वृश्षोंको; कृष्णम्--कृष्ण के विषय में; संस्मारयन्ू--याद दिलाते हुए; रेमे--आनन्द लिया; हरि-दास:--भगवान् हरि के सेवक ने;ब्रज-ओकसाम्--ब्रजवासियों के लिए
हरि के दास (उद्धव ) ने ब्रज की नदियों, जंगलों, पर्वतों, घाटियों तथा पुष्पित वृक्षों कोदेख देखकर और भगवान् कृष्ण के विषय में स्मरण करा-कराकर वृन्दावनवासियों को प्रेरणा देने में आनन्द का अनुभव किया।
इृष्टेवमादि गोपीनां कृष्णावेशात्मविक्लवम् ।
उद्धवः परमप्रीतस्ता नमस्यन्निदं जगौ ॥
५७॥
इृष्टा--देखकर; एवम्--इस तरह; आदि--तथा अधिक; गोपीनाम्--गोपियों के; कृष्ण-आवेश --कृष्ण के विचारों में उनकीतललीनता; आत्म--से युक्त; विक्लवम्--मानसिक क्षोभ; उद्धव:--उद्धव ने; परम--परम; प्रीत:--प्रसन्न; ताः--उनको;नमस्यन्--नमस्कार करते हुए; इृदम्--यह; जगौ--गाया।
इस तरह यह देखकर कि गोपियाँ किस तरह कृष्ण में पूर्णतया तल्लीन रहने से सदैवविश्लुब्ध रहती हैं, उद्धव अत्यधिक प्रसन्न थे।
उन्हें नमस्कार करने की इच्छा से उन्होंने यह गीतगाया।
एताः परं तनुभूतो भुवि गोपवध्वोगोविन्द एव निखिलात्मनि रूढभावा: ।
वाउ्छन्ति यद्भवभियो मुनयो वय॑ं चकि ब्रह्मजन्मभिरनन्तकथारसस्य ॥
५८ ॥
एताः--ये स्त्रियाँ; परमू--अकेले; तनु--अपने शरीर; भूतः--ठीक से पालती हैं; भुवि--पृथ्वी पर; गोप-वध्व: --ये युवतीगोपियाँ; गोविन्दे--गोविन्द में; एब--एकान्त रूप से; निखिल--सबों के; आत्मनि--आत्मा; रूढ-- पूर्ण; भावा:--प्रेमपूर्णआकर्षण; वाउ्छन्ति-- चाहती हैं; यत्--जो; भव-- भौतिक जगत; भिय:-- भयभीत; मुनयः-- मुनिगण; वयम्--हम; च--भी; किमू--क्या लाभ; ब्रह्म--ब्राह्मण के रूप में या ब्रह्मा के रूप में; जन्मभि:--जन्म लेने से; अनन्त--अनन्त भगवान् की;कथा--कथा के; रसस्य--रसिक के लिए
उद्धव ने गाया : पृथ्वी के समस्त व्यक्तियों में ये गोपियाँ ही वास्तव में अपने देहधारीजीवनों को सफल बना पाई हैं क्योंकि इन्होंने भगवान् गोविन्द के लिए शुद्ध प्रेम की पूर्णताप्राप्त कर ली है।
इस संसार से डरने वालों, बड़े-बड़े मुनियों तथा हम सबों को इनके शुद्ध प्रेमकी लालसा बनी रहती है।
जिसने अनन्त भगवान् की कथाओं का आस्वाद कर लिया है उसकेलिए उच्च ब्राह्मण के रूप में या साक्षात् ब्रह्मा के रूप में भी जन्म लेने से क्या लाभ ?
क्वेमा: स्त्रियो वनचरीव्यभिचारदुष्टा:कृष्णे क्व चैष परमात्मनि रूढभाव: ।
नन््वी श्वरो नु भजतो विदुषो पि साक्षा-च्छेयस्तनोत्यगदराज इवोपयुक्त: ॥
५९॥
क्व--कहाँ तो; इमाः --ये ; स्त्रियः--स्त्रियाँ; वन--वनों में; चरी:--विचरण करने वाली; व्यभिचार-- अनुचित आचरण से;दुष्टाः--दूषित; कृष्णे--कृष्ण के लिए; क््व च--और कहाँ; एष:--यह; परम-आत्मनि--परमात्मा में; रूढ-भाव:--पूर्ण-प्रेमकी अवस्था ( महाभाव ); ननु--निश्चय ही; ईश्वर: -- भगवान्; अनुभजत:--निरन्तर पूजा करने वाले के लिए; अविदुष:--विद्वान नहीं; अपि--यद्यपि; साक्षात्--साक्षात; श्रेयः--कल्याण; तनोति-- प्रदान करता है; अगद-- औषधियों का; राज:--राजा ( अमृत, जिसे देवता अमर होने के लिए पीते थे ); इब--मानो; उपयुक्त:--लिया हुआ।
यह कितना आश्चर्यजनक है कि जंगल में विचरण करने वाली एवं अनुपयुक्त आचरण केकारण दूषित सी प्रतीत होने वाली इन सीधी-सादी स्त्रियों ने परमात्मा कृष्ण के लिए शुद्ध प्रेमकी पूर्णता प्राप्त कर ली है।
तो भी यह सच है कि भगवान् एक अज्ञानी पूजक को भी अपनाआशीर्वाद देते हैं जिस प्रकार कि अज्ञानी व्यक्ति द्वारा किसी उत्तम औषधि के अवयवों सेअनजान होते हुए पी लेने पर भी वह अपना प्रभाव दिखलाती है।
नायं श्रियोउड् उ नितान्तरते: प्रसाद:स्वर्योषितां नलिनगन्धरुचां कुतोउन्या: ।
रासोत्सवेस्यथ भुजदण्डगृहीतकण्ठ-लब्धाशिषां य उदगादब्रजवल्लभीनाम् ॥
६०॥
न--नहीं; अयम्--यह; थ्रिय:--लक्ष्मी का; अड्जे--वक्षस्थल पर; उ--हाय; नितान्त-रतेः --घनिष्टतापूर्वक सम्बन्धित;प्रसाद:--अनुग्रह; स्व:ः--स्वर्गलोक की; योषिताम्--स्त्रियों का; नलिन--कमल के फूल की; गन्ध--सुगन्ध वाला; रुचामू--तथा शारीरिक कान्ति; कुतः:--काफी कम; अन्या: --अन्य; रस-उत्सवे--रास-नृत्य के उत्सव में; अस्य-- भगवान् कृष्ण की;भुज-दण्ड-- भुजाओं से; गृहीत--आलिंगित; कण्ठ--गले; लब्ध-आशिषाम्--ऐसा आशीर्वाद प्राप्त; यः--जो; उदगात्--प्रकट हुआ; ब्रज-वल्लभीनाम्--व्रजभूमि की दिव्य बालाओं का, सुन्दरी गोपियों का।
जब श्रीकृष्ण रासलीला में गोपियों के साथ नाच रहे थे तो भगवान् की भुजाएँ गोपियों काआलिंगन कर रही थीं।
यह दिव्य अनुग्रह न तो कभी लक्ष्मीजी को प्राप्त हुआ न वैकुण्ठ कीललनाओं ( अंगनाओं ) को।
निस्सन्देह कमल के फूल जैसी शारीरिक कान्ति तथा सुगंध से युक्तस्वर्गलोक की सबसे सुन्दर बालाओं ने भी कभी इस तरह की कल्पना तक नहीं की थी।
तो फिर उन संसारी स्त्रियों के विषय में क्या कहा जाय जो भौतिक दृष्टि से अतीव सुन्दर हैं ?
आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यांवृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम् ।
या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपर्थ च॒ हित्वाभेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्ू ॥
६१॥
आसमू--गोपियों की; अहो--ओह; चरण-रेणु--चरणकमलों की धूलि; जुषाम्--अनुरक्त; अहम् स्याम्-मैं बनूँ; वृन्दावने--वृन्दावन में; किम् अपि--कोई एक; गुल्म-लता-ओषधीनाम्--झाड़ियों, लताओं तथा वनौषधियों में से; या--जो; दुस्त्यजम्--छोड़ पाना अतीव कठिन; स्व-जनम्--पारिवारिक सदस्यों को; आर्य-पथम्--सतीत्व-मार्ग; च--तथा; हित्वा--त्यागकर;भेजु:--पूजा किया; मुकुन्द-पदवीम्--मुकुन्द या कृष्ण के चरणकमलों की; श्रुतिभि:--वेदों के द्वारा; विमृग्यामू--खोजे जानेके लिए
वृन्दावन की गोपियों ने अपने पतियों, पुत्रों तथा अन्य परिवार वालों का साथ त्याग दिया हैजिनको त्याग पाना अतीव कठिन होता है।
उन्होंने मुकुन्द कृष्ण के चरणकमलों की शरण पानेके लिए सतीत्व मार्ग का परित्याग कर दिया है, जिसे वैदिक ज्ञान द्वारा खोजा जाता है।
ओह! मैंवृन्दावन की इन झाड़ियों, लताओं तथा जड़ी-बूटियों में से कोई एक भी होने का सौभाग्य प्राप्तकरूँ क्योंकि गोपियाँ उन्हें अपने चरणों से रौंदती हैं और अपने चरणकमलों की धूल से उन्हेंआशीर्वाद देती हैं।
या वे श्रियार्चितमजादिभिराप्तकामै-येगिश्वरैरपि यदात्मनि रासगोष्ठय्याम् ।
कृष्णस्य तद्धगवतः चरणारविन्दंन्यस्तं स्तनेषु विजहुः परिरभ्य तापम् ॥
६२॥
याः--जो ( गोपियाँ ); बै--निस्सन्देह; श्रिया--लक्ष्मी द्वारा; अर्चितम्--पूजित; अज--अजन्मा ब्रह्मा; आदिभि:--तथा अन्यदेवताओं द्वारा; आप्त-कामैः --जिनकी समस्त इच्छाएँ पूर्ण हो चुकी हैं; योग-ई श्र:--योगशक्ति के स्वामियों द्वारा; अपि--यद्यपि; यत्--जो; आत्मनि--मन में; रास--रास-नृत्य की; गोष्ठय्याम्--गोष्टी में; कृष्णस्य--कृष्ण की; तत्--वे; भगवत: --भगवान् के; चरण-अरविन्दमू--चरणकमलों को; न्यस्तम्--रखा हुआ; स्तनेषु--अपने स्तनों पर; विजहु:--उन्होंने त्याग दिया;परिरभ्य--आलिंगन करके; तापमू--अपनी जलन
स्वयं लक्ष्मीजी तथा ब्रह्मा एवं अन्य सारे देवता जो योग सिद्धि के स्वामी हैं, भगवान् कृष्णके चरणकमलों की पूजा अपने मन के भीतर ही कर सकते हैं।
किन्तु रास-नृत्य के समय कृष्णने तो इन गोपियों के स्तनों पर अपने चरण रखे और गोपियों ने उन्हीं चरणों का आलिंगन करकेसारी व्यथाएँ त्याग दी।
वबन्दे नन्दब्रजस्त्रीणां पादरेणुमभीक्ष्णश: ।
यासां हरिकथोदगीतं पुनाति भुवनत्रयम् ॥
६३॥
वन्दे--मैं वन्दना करता हूँ; नन्द-ब्रज--ननन््द महाराज के गोप-ग्राम को; स्त्रीणाम्--स्त्रियों के; पाद--चरणों की; रेणुम्ू-- धूलको; अभीक्ष्णश: --निरन्तर; यासाम्--जिनकी; हरि--कृष्ण की; कथा--कथा के विषय में; उद्गीतम्--जोर से उच्चारण करतेहुए; पुनाति--पवित्र करती है; भुवन-त्रयम्ू--तीनों लोकों कोमैं
नन्द महाराज के गोप-ग्राम की स्त्रियों की चरण-रज की बारम्बार वन्दना करता हूँ।
जबये गोपियाँ श्रीकृष्ण के यश का जोर जोर से कीर्तन करती हैं, तो वह ध्वनि तीनों लोकों कोपवित्र कर देती है।
श्रीशुक उबाचअथ गोपीरनुज्ञाप्य यशोदां नन्दमेव च ।
गोपानामन्त्य दाशाहों यास्यन्नारुकुहे रथम् ॥
६४॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; अथ--तब; गोपी: --गोपियों की; अनुज्ञाप्प--अनुमति लेकर; यशोदाम्ू--मातायशोदा को; नन्दम्--राजा नन््द को; एव च--भी; गोपान्ू--ग्वालों को; आमन््रय--विदा लेकर; दाशाई: --दशाईवंशी उद्धव;यास्यन्--जाने ही वाले; आरुरुहे --चढ़ गये; रथम्--अपने रथ में |
शुकदेव गोस्वमी ने कहा : तत्पश्चात् दशाहवंशी उद्धव ने गोपियों तथा माता यशोदा एवं नन्दमहाराज से विदा होने की अनुमति ली।
उन्होंने सारे ग्वालों से विदा ली और प्रस्थान करने केलिए वे अपने रथ पर सवार हो गये।
त॑ निर्गत॑ समासाद्य नानोपायनपाणय: ।
नन्दादयो<नुरागेण प्रावोचन्नश्रुलोचना: ॥
६५॥
तमू--उसको ( उद्धव को ); निर्गतम्ू--गया हुआ; समासाद्य--पास आकर; नाना--विविध; उपायन--पूजा की व्स्तुएँ;'पाणय:--अपने हाथों में ; नन्द-आदय:--नन्द तथा अन्य लोग; अनुरागेण--स्नेहपूर्वक; प्रावोचन्--बोले; अश्रु-- आँसुओंसहित; लोचना:--आँखें |
जब उद्धव प्रस्थान करने वाले थे तो नन्द तथा अन्य लोग पूजा की विविध वस्तुएँ लेकरउनके पास पहुँचे।
उन लोगों ने अश्रुपूरित नेत्रों से उन्हें इस प्रकार सम्बोधित किया।
मनसो वृत्तयो नः स्युः कृष्ण पादाम्बुजाश्रया: ।
वाचोभिधायिनीर्नाम्नां कायस्तत्प्रहणादिषु ॥
६६॥
मनसः--मन के; वृत्तय:--कार्य; नः--हमारे; स्यु:--होयें; कृष्ण--कृष्ण के; पाद-अम्बुज--चरणकमलों की; आश्रया: --शरण लेकर; वाच: --हमारे शब्द; अभिधायिनी: --व्यक्त करते हुए; नाम्नामू--उनके नामों को; काय:--हमारे शरीर; तत्--उसके प्रति; प्रहण-आदिषु--नमस्कार इत्यादि में ( व्यस्त )
नन्द तथा अन्य ग्वालों ने कहा : हमारे मानसिक कार्य सदैव कृष्ण के चरणकमलों कीशरण ग्रहण करें, हमारे शब्द सदैव उन्हीं के नामों का कीर्तन करें और हमारे शरीर सदैव उन्हींको नमस्कार करें तथा उनकी ही सेवा करें।
कर्मभिर्भ्राम्यमाणानां यत्र क्वापी श्वरेच्छया ।
मड्ुलाचरितिदनि रतिर्न: कृष्ण ईश्वेर ॥
६७॥
कर्मभि:--सकाम कर्मों द्वारा; भ्राम्यमाणानामू--घुमाये जाने वालों का; यत्र क्व अपि--जहाँ कभी भी; ईश्वर-- भगवान् की;इच्छया--इच्छा से; मड्ल--शुभ; आचरितै:--कार्यो से; दानैः--दान से; रतिः--आसक्ति; न:--हमारी; कृष्णे--कृष्ण में;ईश्वरे-- भगवान्
भगवान् की इच्छा से हमें अपने सकाम कर्मों के फलस्वरूप इस संसार में जहाँ भी घूमनापड़े हमारे सत्कर्म तथा दान हमें सदा भगवान् कृष्ण का प्रेम प्रदान करें।
एवं सभाजितो गोपै: कृष्णभक्त्या नराधिप ।
उद्धव: पुनरागच्छन्मथुरां कृष्णपालिताम् ॥
६८ ॥
एवम्--इस प्रकार; सभाजित:--सम्मान प्रदर्शित; गोपै:--ग्वालों द्वारा; कृष्ण-भक्त्या--कृष्ण के प्रति भक्ति से; नर-अधिप--हे मनुष्यों के शासक ( परीक्षित ); उद्धव:--उद्धव; पुनः--फिर; आगच्छत्--लौट आया; मथुराम्--मथुरा; कृष्ण-पालिताम्--कृष्ण द्वारा सुरक्षित ।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे नृपति, इस तरह कृष्ण के प्रति भक्ति की अभिव्यक्ति द्वाराग्वालों से सम्मानित होकर उद्धव मथुरा नगरी वापस चले गये जो कृष्ण के संरक्षण में थी।
कृष्णाय प्रणिपत्याह भक्त्युद्रेके त्रजौकसाम् ।
वसुदेवाय रामाय राज्ञे चोपायनान्यदात् ॥
६९॥
कृष्णाय--कृष्ण को; प्रणिपत्य--सम्मान जताने के लिए गिर कर; आह--कहा; भक्ति--शुद्ध भक्ति की; उद्रेकम्--प्रचुरता;ब्रज-ओकसाम्--व्रजवासियों की; वसुदेवाय--वसुदेव को; रामाय--बलराम को; राज्ञे--राजा ( उग्रसेन ) को; च--तथा;उपायनानि--भेंट के रूप में प्राप्त वस्तुएँ; अदात्ू--दिया।
गिर कर प्रणाम करने के बाद उद्धव ने कृष्ण से व्रजवासियों की महती भक्ति का वर्णनकिया।
उद्धव ने इसका वर्णन वसुदेव, बलराम तथा राजा उग्रसेन से भी किया और उन्हें वेवस्तुएँ भेंट कीं जिन्हें वे अपने साथ लाये थे।
