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अध्याय पैंतालीसवाँ: कृष्ण ने अपने शिक्षक के पुत्र को बचाया

10.45श्रीशुक उबाचपितराबुपलब्धार्थों विदित्वा पुरुषोत्तम: ।

मा भूदिति निजांमायां ततान जनमोहिनीम्‌ ॥

१॥

श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; पितरौ--माता-पिता ने; उपलब्ध--अनुभव करने के बाद; अर्थौ-- भाव ( ईश्वरके रूप में उनका वैभवशाली पद ); विदित्वा--जानकर; पुरुष-उत्तम:--परम पुरुष ने; मा भूत्‌ इति--'ऐसा नहीं होनाचाहिए'; निजाम्‌ू--अपनी; मायाम्‌--माया को; ततान--विस्तार दिया; जन--भक्तगण को; मोहिनीम्‌--मोहने वाली

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : यह जानकर कि उनके माता-पिता उनके दिव्य ऐश्वर्य से अवगतहो चुके हैं, भगवान्‌ ने यह सोचा कि ऐसा नहीं होने दिया जाना चाहिए।

अतः उन्होंने अपनेभक्तों को मोहने वाली अपनी योगमाया का विस्तार किया।

उवबाच पितरावेत्य साग्रज: सात्वनर्षभ: ।

प्रश्रयावनत: प्रीणन्नम्ब तातेति सादरम्‌ ॥

२॥

उवबाच--कहा; पितरौ--अपने माता-पिता के; एत्य--निकट जाकर; स--सहित; अग्र-ज:--बड़े भाई, बलराम; सात्वत--सात्वत वंश का; ऋषभ:--महानतम वीर; प्रश्रय--विनीत भाव से; अवनत:--झुककर; प्रीणन्‌--प्रसन्न करते हुए; अम्ब तातइति--' हे माता, हे पिता '; स-आदरम्‌--सम्मानपूर्वक |

सात्वतों में महानतम भगवान्‌ कृष्ण अपने बड़े भाई सहित अपने माता-पिता के पास पहुँचे।

वे उन्हें विनयपूर्वक शीश झुकाकर और आदरपूर्वक 'हे माते' तथा 'हे पिताश्री ' संबोधितकरके प्रसन्न करते हुए इस प्रकार बोले।

नास्मत्तो युवयोस्तात नित्योत्कण्ठितयोरपि ।

बाल्यपौगण्डकैशोराः पुत्राभ्यामभवन्क्वचित्‌ ॥

३॥

न--नहीं; अस्मत्त:--हमारे कारण; युवयो: --आप दोनों के लिए; तात--हे पिता; नित्य--सदैव; उत्कण्ठितयो:--चिन्तित;अपि--निस्सन्देह; बाल्य--बालकाल का ( आनन्द ); पौगण्ड--बालपना; कैशोर: --तथा किशोरावस्था; पुत्राभ्यामू--आपकेदोनों पुत्रों के कारण; अभवनू्‌--हुआ था; क्वचित्‌--कुछ।

भगवान्‌ कृष्ण ने कहा : हे पिताश्री, हम दो पुत्रों के कारण आप तथा माता देवकी सदैवचिन्ताग्रस्त रहते रहे और कभी भी हमारे बाल्यकाल, पौगण्ड तथा किशोर अवस्थाओं काआनन्द भोग नहीं पाये।

न लब्धो दैवहतयोवासो नौ भवदन्तिके ।

यां बाला: पितृगेहस्था विन्दन्ते लालिता मुदम्‌ ॥

४॥

न--नहीं; लब्ध: --प्राप्त; दैव-- भाग्य द्वारा; हतयो: -- वंचित; वास:--आवास; नौ--हम दोनों के द्वारा; भवत्‌-अन्तिके--आपकी उपस्थिति में; यामू--जो; बाला:--बालक; पितृ--अपने माता-पिता के; गेह--घरमें; स्थ:--रहकर; विन्दन्ते--अनुभव करते हैं; लालिता:--पाले गये, लाड़-प्यार किये गये; मुदम्‌--सुख |

भाग्य द्वारा वंचित हम दोनों न तो आपके साथ रह पाये, न ही अधिकांश बालकों को उनकेमाता-पिता के घर में मिलने वाले लाड़-प्यार के सुख को हम भोग सके।

सर्वार्थसम्भवो देहो जनितः पोषितो यतः ।

न तयोर्याति निर्वेशं पित्रोर्मर्य: शतायुषा ॥

५॥

सर्व--समस्त; अर्थ--जीवनलक्ष्य का; सम्भव:--स्त्रोत; देह:--शरीर; जनित:--उत्पन्न; पोषित:--पालित; यत:--जिससे;न--नहीं; तयो:--उन दोनों को; याति--मिलता है; निर्वेशम्‌--उऋण होना; पित्रो:--माता-पिता के प्रति; मर्त्य:--मरणशील;शत--एक सौ ( वर्ष )) आयुषा--आयु से |

मनुष्य अपने शरीर से जीवन के सारे लक्ष्य प्राप्तकर सकता है और उसके माता-पिता ही हैंजो इस शरीर को जन्म देते और उसका पोषण करते हैं।

अतः कोई भी मर्त्यप्राणी, एक सौ वर्षके पूरे जीवन-काल तक उनकी सेवा करके भी, मातृ-पितृ ऋण से उक्करण नहीं हो सकता।

यस्तयोरात्मज: कल्प आत्मना च धनेन च ।

वृत्ति न द्यात्तं प्रेत्य स्वमांसं खादयन्ति हि ॥

६॥

यः--जो; तयो:--उन दोनों का; आत्म-ज:--पुत्र; कल्प:--समर्थ; आत्मना--अपने शारीरिक साधनों से; च--तथा; धनेन--सम्पत्ति से; च--भी; वृत्तिमू--जीविका; न दद्यात्‌--नहीं देती; तमू--उसको; प्रेत्य--मरने के बाद; स्व--अपना; मांसम्‌--मांस; खादयन्ति--खिलवाते हैं; हि--निस्सन्देह।

जो पुत्र समर्थ होते हुए भी अपने माता-पिता को अपने शारीरिक साधन तथा सम्पत्ति दिलानेमें विफल रहता है, उसे मृत्यु के बाद अपना ही मांस खाने के लिए बाध्य होना पड़ता है।

मातरं पितरं वृद्ध भार्यां साध्वीं सुतम्शिशुम्‌ ।

गुरुं विप्रं प्रपन्नं च कल्पो बिशभ्रच्छुसन्मृतः ॥

७॥

मातरम्‌--माता को; पितरमू--तथा पिता को; वृद्धम्‌--बूढ़े; भार्यामू--पत्नी को; साध्वीम्‌ू--सती-साध्वी; सुतम्‌--बेटे को;शिशुम्‌--अल्पायु वाले; गुरुम्‌-गुरु को; विप्रमू--ब्राह्मण को; प्रपन्नम्‌ू--शरण में आये हुए को; च--तथा; कल्प: --समर्थ;अबिभ्रतू--पालन न करके; श्वसन्‌-- श्वास लेता हुआ; मृत:--मरा हुआ।

जो व्यक्ति समर्थ होकर भी अपने बूढ़े माता-पिता, साध्वी-पत्नी, छोटे पुत्र या गुरु काभरण-पोषण करने से चूकता है या किसी ब्राह्मण या शरण में आये हुए की उपेक्षा करता है,वह जीवित होते हुए भी मरा हुआ माना जाता है।

तन्नावकल्पयो: कंसात्नित्यमुद्दिग्नचेतसो: ।

मोघमेते व्यतिक्रान्ता दिवसा वामनर्चतो: ॥

८॥

तत्‌--इसलिए; नौ--हम दोनों का; अकल्पयो:-- असमर्थ; कंसात्‌--कंस के कारण; नित्यम्‌ू--सदैव; उद्विग्न--चिन्तित;चेतसो: --मनों वाले; मोघम्‌--व्यर्थ ही; एते--ये; व्यतिक्रान्ता:--बिताया; दिवसा:--दिन; वाम्‌--आपको; अनर्चतो: --सम्मान न देकर।

इस तरह हमने इतने सारे दिन आपका समुचित सम्मान करने में असमर्थ होने के कारणव्यर्थ में ही गँवा दिये, क्योंकि हमारे मन सदैव कंस के भय से विचलित थे।

तद्षन्तुमई थस्तात मातनों परतन्त्रयो: ।

अकुर्वतोर्वा शुश्रूषां क्लष्टयोर्दुईदा भूशम्‌ ॥

९॥

ततू--उसे; क्षन्तुम्‌-- क्षमा करें; अर्हथ:--आप चाहें तो; तात--हे पिता; मातः--हे माता; नौ--हम दोनों को; पर-तन्त्रयो: --अन्यों के अधीन; अकुर्वतो:--न करते हुए; वामू--आपकी; शुश्रूषाम्‌-सेवा; क्लिष्टयो:--कष्ट पहुँचाया गया; दुईदा--कठोरहृदय ( कंस ) द्वारा; भूशम्‌-- अत्यधिक |

है पिता तथा माता, आप हम दोनों को आपकी सेवा न कर पाने के लिए क्षमा कर दें।

हमस्वतंत्र नहीं थे और क्रूर कंस द्वारा अत्यधिक त्रस्त कर दिये गये थे।

श्रीशुक उबाचइति मायामनुष्यस्य हरेविश्वात्मनो गिरा ।

मोहितावड्डजूमारोप्य परिष्वज्यापतुर्मुदम्‌ ॥

१०॥

श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; माया--अपनी अन्तरंगा शक्ति द्वारा; मनुष्यस्थ--मनुष्य के रूपमें प्रकट होने वाले; हरेः-- भगवान्‌ हरि का; विश्व--ब्रह्माण्ड का; आत्मन:--आत्मा; गिरा--शब्दों से; मोहितौ--मोह ग्रस्त;अड्डम्‌-गोद में; आरोप्य--उठाकर; परिष्वज्य--आलिंगन करके; आपतु:--अनुभव किया; मुदम्‌-हर्ष |

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार ब्रह्माण्ड के परमात्मा एवं अपनी अन्तरंगा भ्रामकशक्ति से मनुष्य-रूप में प्रकट होने वाले भगवान्‌ हरि के बचनों से मोहित होकर उनके माता-पिता ने हर्षपूर्वक उन्हें अपनी गोद में उठाकर उनका आलिंगन किया।

सिद्जन्तावश्रुधाराभि: स्नेहपाशेन चावृतौ ।

न किझ्चिदूचतू राजन्बाष्पकण्ठौ विमोहितौ ॥

११॥

सिद्न्तौ--सिक्त करते हुए; अश्रु--आँसुओं की; धाराभि:--धाराओं से; स्नेह--प्रेममयी; पाशेन--रस्सी से; च--तथा;आवृतौ-घिरे; न--नहीं; किल्लित्‌ू--कुछ भी; ऊचतु:--वे बोले; राजनू--हे राजा ( परीक्षित ); बाष्प--आँसुओं ( से पूर्ण );'कण्ठौ--गले; विमोहितौ--अवरुद्धभगवान्‌ के ऊपर अश्रुओं की धारा ढुलकाते हुए, स्नेह की रस्सी से बँधे उनके माता-पिताबोल न पाये।

हे राजन, वे भावविभोर थे और उनके गले अश्रुओं से अवरुद्ध हो चले थे।

एवमाश्चास्य पितरौ भगवान्देवकीसुतः ।

मातामहं तूग्रसेनं यदूनामकरोन्णूपम्‌ ॥

१२॥

एवम्‌--इस प्रकार; आश्वास्य--आश्वासन देकर; पितरौ--माता-पिता को; भगवान्‌-- भगवान्‌ ने; देवकी-सुतः--देवकी-पुत्र;मातामहम्‌--अपने नाना को; तु--तथा; उग्रसेनम्‌--उग्रसेन को; यदूनामू--यदुओं का; अकरोत्‌--बना दिया; नृपम्‌--राजा।

अपने माता-पिता को इस तरह सान्त्वना देकर तथा देवकी-पुत्र के रूप में प्रकट हुए,भगवान्‌ ने अपने नाना उग्रसेन को यदुओं का राजा बना दिया।

आह चास्मान्महाराज प्रजाश्षाज्ञप्तुमहसि ।

ययातिशापाद्यदुभिर्नासितव्यं नूपासने ॥

१३॥

आह--उसने ( कृष्ण ने ) कहा; च--तथा; अस्मान्‌--हमको; महा-राज--हे महान्‌ राजा; प्रजा:--आपकी प्रजा; च-- भी;आज्ञप्तुम्‌ अहंसि--आदेश दें; ययाति--प्राचीन राजा ययाति द्वारा; शापात्‌ू--शाप से; यदुभि:--यदुओं के; न आसितव्यम्‌--नहीं बैठना चाहिए; नृप--शाही; आसने--सिंहासन पर।

भगवान्‌ ने उनसे कहा : हे महाराज, हम आपकी प्रजा हैं, अतः आप हमें आदेश दें।

दरअसल, ययाति के शाप के कारण कोई भी यदुवंशी राज-सिंहासन पर नहीं बैठ सकता।

मयि भृत्य उपासीने भवतो विबुधादय: ।

बलिं हरन्त्यवनता: किमुतान्ये नराधिपा: ॥

१४॥

मयि--मुझमें; भृत्ये--सेवक रूप; उपासीने--सेवा में उपस्थित; भवत:--आपकी; विबुध--देवता; आदय: --इ त्यादि;बलिम्‌--प्रशस्ति, भेंट; हरन्ति--लायेंगे; अवनता: --विनीत भाव से झुके हुए; किम्‌ उत--तो फिर क्‍या कहा जाय; अन्ये--दूसरे; नर--मनुष्य का; अधिपा:ः--शासक |

चूँकि मैं आपके निजी सेवक के रूप में आपके पार्षदों के बीच उपस्थित हूँ अतः सारे देवतातथा अन्य प्रतिष्ठित व्यक्ति आपको अभिवादन करने के लिए सिर झुकाते हुए आयेंगे।

तो फिरमनुष्यों के शासकों के लिए क्‍या कहा जाय ?

सर्वान्स्वान्ज्नतिसम्बन्धान्दिग्भ्य: कंसभयाकुलान्‌ ।

यदुवृष्ण्यन्धकमधु दाशाहकुकुरादिकान्‌ ॥

१५॥

सभाजितान्समाश्चवास्य विदेशावासकर्शितान्‌ ।

न्यवासयत्स्वगेहेषु वित्तै: सन्तर्प्य विश्वकृत्‌ ॥

१६॥

सर्वानू--समस्त; स्वान्‌-- अपने; ज्ञाति--परिवार के लोग; सम्बन्धान्‌--तथा अन्य सम्बन्धी; दिग्भ्यः--सभी दिशाओं से; कंस-भय--कंस के डर से; आकुलान्‌--विचलित; यदु-वृष्णि-अन्धक-मधु-दाशाई कुकुर-आदिकान्‌--यदुओं, वृष्णियों, अन्धकों,मधुओं, दाशाहों, कुकुरों तथा अन्य को; सभाजितान्‌--समादरित; समाश्चास्य--आ श्वासन देकर; विदेश--विदेशी क्षेत्रों में;आवास--रहते हुए; कर्शितान्‌-- थकाये गये; न्‍्यवासयत्‌--बसा दिया; स्व--अपने; गेहेषु--घरों में; वित्तै:--बहुमूल्य भेंटोंसहित; सन्तर्प्यच--सत्कार करके; विश्व--ब्रह्माण्ड का; कृत्‌ू--निर्माता |

तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ अपने सारे नजदिकी परिवार वालों को तथा अन्य सम्बन्धियों को उनविविध स्थानों से वापस लाये जहाँ वे कंस के भय से भाग कर गये थे।

उन्होंने यदुओं, वृष्णियों,अन्धकों, मधुओं, दाशाहों, कुकुरों इत्यादि जाति-पक्ष वालों को सम्मानपूर्वक बुलवाया और उन्हेंसान्त्वना भी दी क्‍योंकि वे विदेशी स्थानों में रहते-रहते थक चुके थे।

तत्पश्चात्‌ ब्रह्माण्ड के स्त्रष्टाभगवान्‌ कृष्ण ने उन्हें उनके अपने घरों में फिर से बसाया और बहुमूल्य भेंटों से उनका सत्कारकिया।

कृष्णसड्डूर्षणभुजैर्गुप्ता लब्धमनोरथा: ।

गृहेषु रेमिरे सिद्धा: कृष्णरामगतज्वरा: ॥

१७॥

वीक्षन्तोहरहः प्रीता मुकुन्दबदनाम्बुजम्‌ ।

नित्य॑ प्रमुदितं श्रीमत्सदयस्मितवीक्षणम्‌ ॥

१८ ॥

कृष्ण-सड्डर्षण--कृष्ण तथा बलराम के; भुजैः:--बाहुओं से; गुप्ता: --सुरक्षित; लब्ध--प्राप्त करके; मन:-रथा: -- अपनीइच्छाएँ; गृहेषु-- अपने घरों में; रेमिरि-- भोग किया; सिद्धा:--पूर्णकाम; कृष्ण-राम--कृष्ण तथा बलराम के कारण; गत--दूरहो गया; ज्वरा:--ज्वर ( भौतिक जीवन का ); वीक्षन्त:--देखने से; अह: अह:--दिन-प्रतिदिन; प्रीता:--प्रिय; मुकुन्द--कृष्णका; वदन--मुख; अम्बुजमू--कमल सहश; नित्यमू--सदैव; प्रमुदितम्‌--प्रफुल्लित; श्रीमत्‌--सुन्दर; स-दय--दयालु;स्मित--मन्द हास युक्त; वीक्षणम्‌--चितवनों से |

इन वंशों के लोगों ने भगवान्‌ कृष्ण तथा संकर्षण की बाहुओं का संरक्षण पाकर यहअनुभव किया कि उनकी सारी इच्छाएँ पूरी हो गईं।

इस तरह वे अपने परिवारों के साथ अपने घरों में रहते हुए पूर्ण सुख का भोग करने लगे।

कृष्ण तथा बलराम की उपस्थिति से अब उन्हेंसांसारिक ज्वर नहीं सताता था।

ये प्रेमी भक्त प्रतिदिन मुकुन्द के कमल सहश नित्य प्रफुल्लितमुख को देख सकते थे, जो सुन्दर दयामय मन्द हास युक्त चितवनों से विभूषित था।

तत्र प्रवयसोप्यासन्युवानोडइतिबलौजस: ।

पिबन्तोक्षेर्मुकुन्दस्य मुखाम्बुजसुधां मुहु: ॥

१९॥

तत्र--वहाँ ( मथुरा में ); प्रवचयस:--गुरुजन; अपि-- भी; आसनू-- थे; युवान:--युवक; अति--अत्यधिक; बल--शक्ति;ओजसः:--तथा ओज से युक्त; पिबन्तः--पीते हुए; अक्षैः--अपने अपने नेत्रों से; मुकुन्दस्थ-- भगवान्‌ कृष्ण के; मुख-अम्बुज--कमल सहश मुख का; सुधाम्‌-- अमृत; मुहुः--बारम्बार

यहाँ तक कि उस नगरी के अत्यन्त वृद्धजन भी शक्ति तथा ओज से पूर्ण युवा लगने लगेक्योंकि वे अपनी आँखों से निरन्तर भगवान्‌ मुकुन्द के कमल-मुख का अमृत-पान करते थे।

अथ नन्दं समसाद्य भगवान्देवकीसुतः ।

सड्डूर्षणश्व राजेन्द्र परिष्वज्येदमूचतु: ॥

२०॥

अथ--तब; नन्दम्‌--नन्द महाराज के पास; समासाद्य-पहुँचकर; भगवान्‌-- भगवान्‌; देवकी-सुतः--देवकी-पुत्र, कृष्ण;स्डूर्षण:--बलराम; च--तथा; राज-इन्द्र--हे महान्‌ राजा ( परीक्षित ); परिष्वज्य--उसका आलिंगन करके; इदम्‌--यह;ऊचतु:--उन्होंने कहा

तत्पश्चात

हे महान्‌ राजा परीक्षित, देवकी-पुत्र भगवान्‌ कृष्ण भगवान्‌ बलराम के साथ नन्दमहाराज के पास पहुँचे ।

दोनों विभुओं ने उनका आलिंगन किया और उनसे इस प्रकार बोले।

पितर्युवाभ्यां स्निग्धाभ्यां पोषितो लालितौ भूशम्‌ ।

पित्रोरभ्यधिका प्रीतिरात्मजेष्वात्मनोडपि हि ॥

२१॥

पित:--हे पिताश्री; युवाभ्यामू--आप दोनों के द्वारा; स्निग्धाभ्यामू--स्नेहिल; पोषितौ--पालित-पोषित; लालितौ--दुलराये;भूशम्‌-- भलीभाँति; पित्रो: --माता-पिता के लिए; अभ्यधिका--से बढ़कर; प्रीति:ः--प्रेम; आत्मजेषु-- अपनी सन्‍्तानों के लिए;आत्मन:--अपनी अपेक्षा; अपि-- भी; हि--निस्सन्देह

कृष्ण और बलराम ने कहा : हे पिताश्री, आप तथा माता यशोदा ने हम दोनों को बड़ेस्नेह से पाला-पोसा है और हमारी इतनी अधिक परवाह की है।

निस्सन्देह माता-पिता अपनीसन्‍्तानों को अपने प्राणों से भी अधिक प्यार करते हैं।

सपितासा च जननी यौ पुष्णीतां स्वपुत्रवत्‌ ।

शिशून्बन्धुभिरुत्सृष्टानकल्पै: पोषरक्षणे ॥

२२॥

सः--वह; पिता--पिता; सा--वह; च--तथा; जननी--माता; यौ--जो; पुष्णीतामू--पालन-पोषण करते हैं; स्व--अपने;पुत्र--पुत्रों की; बत्‌ू--तरह; शिशून्‌ू--बालकों को; बन्धुभि: --अपने परिवार के द्वारा; उत्सृष्टानू--परित्यक्त; अकल्पै:--असमर्थ; पोष--पोषण करने के लिए; रक्षणे--तथा रक्षा करने के लिए

वे ही असली माता-पिता हैं, जो पालन-पोषण और देख-रेख करने में असमर्थ सम्बन्धियोंद्वारा परित्यक्त बालकों की देख-भाल अपने ही पुत्रों की तरह करते हैं।

यात यूय॑ ब्र॒ज॑न्तात वय॑ च स्नेहदुःखितान्‌ ।

ज्ञातीन्वो द्रष्टमेष्यामो विधाय सुहदां सुखम्‌ ॥

२३॥

यत--कृपया जाइये; यूयम्‌--तुम सब ( ग्वाले ); ब्रजमू--त्रज को; तात--हे पिता; वयम्‌--हम; च--तथा; स्नेह--स्नेह केकारण; दुःखितान्‌--दुखी; ज्ञातीन्‌ू--सम्बन्धियों को; व:ः--तुमको; द्रष्टू--देखने के लिए; एष्याम:--आयेंगे; विधाय--प्रदानकरके; सुहृदामू--आपके मित्रों को; सुखम्‌--सुख |

हे पिताश्री, अब आप सब ब्रज लौट जाँय।

हम आपके शुभचिन्तक मित्रों को कुछ सुख देलेने के बाद तुरन्त ही आपको तथा अपने उन प्रिय सम्बन्धियों को देखने के लिए आयेंगे जोहमारे वियोग से दुखी हैं।

एवं सान्त्वय्य भगवान्नन्दं सतब्रजमच्युतः ।

वासोलड्डारकुप्यादरहयामास सादरम्‌ ॥

२४॥

एवम्‌--इस प्रकार; सान्त्व्य--सान्त्वना देकर; भगवान्‌-- भगवान्‌; नन्दम्‌-राजा ननन्‍्द को; स-ब्रजम्‌-व्रज के अन्य लोगोंसहित; अच्युत:--अच्युत भगवान्‌; वास:--वस्त्र समेत; अलड्रार--आभूषण; कुप्य--धातुओं के बने पात्र; आद्यै:--इत्यादिसे; अर्हदयाम्‌ आस--उनका सत्कार किया; स-आदरम्‌--आदर पूर्वक

इस प्रकार नन्‍्द महाराज तथा ब्रज के अन्य लोगों को सान्त्वना देकर अच्युत भगवान्‌ ने उनसबों का वस्त्र, आभूषण, घरेलू-पात्र इत्यादि उपहारों से आदर समेत सत्कार किया।

इत्युक्तस्तौ परिष्वज्य नन्दः प्रणयविह्नलः ।

पूरयन्नश्रुभिनेत्रे सह गोपैद््रेजं ययौ ॥

२५॥

इति--इस प्रकार; उक्त:--सम्बोधित; तौ--दोनों को; परिष्वज्य--आलिंगन करके; नन्दः--नन्द महाराज; प्रणय--स्नेहपूर्वक;विहल:--भावविभोर; पूरयन्‌-- भरकर; अश्लुभि:--आँसुओं से; नेत्रे-- अपने नेत्रों में; सह--साथ; गोपै: --ग्वालों के; ब्रजम्‌--ब्रज को; ययौ--चला गया।

कृष्ण के शब्द सुनकर ननन्‍्द महाराज भावविह्नल हो गये और अश्रूपूरित नेत्रों से उन्होंने दोनोंभाइयों को गले लगाया।

तत्पश्चात्‌ वे ग्वालजनों के साथ ब्रज लौट गये।

अथ शूरसुतो राज-न्पुत्रयो: समकारयत्‌ ।

पुरोधसा ब्राह्मणैश्व यथावदिद्वजसंस्कृतिम्‌ ॥

२६॥

अथ--तब; शूर-सुतः--शूरसेन के पुत्र ( बसुदेव ) ने; राजन्‌ू--हे राजा ( परीक्षित ); पुत्रयो:--दोनों पुत्रों के; समकारयत्‌--सम्पन्न कराया; पुरोधसा-- पुरोहित द्वारा; ब्राह्मणै: --ब्राह्मणों द्वारा; च--तथा; यथा-वत्‌--उचित ढंग से; द्विज-संस्कृतिम्‌ू--ब्राह्मण की दीक्षा |

हे राजन, तब शूरसेन-पुत्र वसुदेव ने अपने दोनों पुत्रों का द्विज-संस्कार कराने के लिए एकपुरोहित तथा अन्य ब्राह्मणों की व्यवस्था की।

तेभ्योदाइक्षिणा गावो रुक्‍्ममाला: स्वलड्डू ता: ।

स्वलड्ड तेभ्य: सम्पूज्य सवत्सा: क्षौममालिनी: ॥

२७॥

तेभ्य:--उनको ( ब्राह्मणों को ); अदात्‌-दिया; दक्षिणा:--दक्षिणा, भेंट; गाव:--गौवें; रुक्म--सोने की; माला:--गले काहार; सु--सुन्दर; अलड्डू ता:--सज्जित; सु-अलड्डू तेभ्य:--अच्छे आभूषण पहने हुओं ( ब्राह्मणों ) को; सम्पूज्य--पूजा करके;स--सहित; वत्सा:--बछड़े; क्षौम--रेशमी; मालिनी:--मालाएँ धारण किये।

बसुदेव ने इन ब्राह्मणों की पूजा करते हुए तथा उन्हें सुन्दर आभूषण और सुन्दर आभूषणों सेसजी बछड़ों युक्त गौवें भेंट करके सम्मानित किया।

ये सभी गौवें सुनहरे हार तथा रेशमी मालाएँधारण किये थीं।

या: कृष्णरामजन्मक्षें मनोदत्ता महामति: ।

ताश्चाददादनुस्मृत्य कंसेनाधर्मतो हता: ॥

२८॥

यः--जो ( गौवें ); कृष्ण-राम--कृष्ण तथा बलराम के; जन्मऋक्षे-- जन्मदिन पर; मन:--मन में; दत्ता:--दान में दी गईं; महा-मति:--वदान्य ( बसुदेव ); ता:--उन्हें; च--तथा; आददातू्‌--दिया; अनुस्मृत्य--स्मरण करके; कंसेन--कंस द्वारा;अधर्मत:ः--अधर्मपूर्वक; हृत:ः--छीन ली गई

तब महात्मा वसुदेव को कृष्ण तथा बलराम के जन्म के अवसर पर मन ही मन दान की गईगौवों का स्मरण हो आया।

कंस ने वे गाएँ चुरा ली थीं किन्तु अब वसुदेव ने उन्हें फिर से प्राप्तकिया था और उन्हें भी दान में दे डाला।

ततश्च लब्धसंस्कारी द्विजत्वं प्राप्य सुत्रतौ ।

गर्गद्यदुकुलाचार्यादगायत्रं ब्रतमास्थितो ॥

२९॥

ततः--तब; च--तथा; लब्ध--प्राप्त करके; संस्कारौ--दीक्षा ( कृष्ण तथा बलराम की ); द्विजत्वम्‌-द्विज बनने की; प्राप्प--प्राप्त करके; सु-ब्रतौ--अपने ब्रत में निष्ठावान; गर्गात्‌--गर्ग मुनि से; यदु-कुल--यदुवबंश के; आचार्यात्‌--आध्यात्मिक गुरु से;गायत्रम्‌ू--ब्रह्मचर्य का; ब्रतम्‌-त्रत; आस्थितौ-- धारण किया।

दीक्षा द्वारा द्विजत्व प्राप्त कर लेने के बाद ब्रतनिष्ठ दोनों भाइयों ने यदुवंश के गुरु गर्ग मुनिसे ब्रह्मचर्य का व्रत ग्रहण किया।

प्रभवौ सर्वविद्यानां सर्वज्ञौ जगदी श्वरौ ।

नान्यसिद्धामलं ज्ञानं गूहमानौ नरेहितैः ॥

३०॥

अथो गुरुकुले वासमिच्छन्तावुपजग्मतु: ।

काश्यं सान्दीपनिं नाम हावन्तिपुरवासिनम्‌ ॥

३१॥

प्रभवौ--उद्‌गम स्वरूप; सर्व--समस्त विविधताओं के; विद्यानाम्‌--ज्ञान के; सर्व-ज्ञौ--सर्वज्ञाता; जगत्‌-ई श्ररौ-- ब्रह्माण्ड केस्वामी; न--नहीं; अन्य--अन्य किसी स्त्रोत से; सिद्ध--प्राप्त: अमलम्‌--विशुद्ध; ज्ञानम्‌ू--ज्ञान; गूहमानौ--छिपाते हुए; नर--मनुष्य की तरह; ईहितैः--अपने कार्यों से; अथ उ--तब; गुरु--गुरु की; कुले--पाठशाला में; वासम्‌-- आवास; इच्छन्तौ--चाहते हुए; उपजगतु:--पहुँचे; काश्यमू--काशी ( वाराणसी ) के वासी; सान्दीपनिम्‌ नाम--सान्दीपनि नामक; हि--निस्सन्देह;अवन्ति-पुर--अवन्ती नगरी ( वर्तमान उज्जैन ) में; वासिनमू--रह रहे

अपने मनुष्य जैसे कार्यों से अपने पूर्णज्ञान को भीतर ही भीतर रखते हुए, ब्रह्माण्ड के इन दोसर्वज्ञ भगवानों ने, ज्ञान की समस्त शाखाओं के उदगम होते हुए भी, गुरुकुल में जाकर रहने कीइच्छा व्यक्त की।

इस तरह वे काशीवासी सान्दीपनि मुनि के पास पहुँचे जो अवन्ती नगरी में रहरहे थे।

यथोपसाद्य तौ दान्तौ गुरौ वृत्तिमनिन्दिताम्‌ ।

ग्राहयन्ताबुपेतौ सम भकत्या देवमिवाहतौ ॥

३२॥

यथा--विधिपूर्वक; उपसाद्य--प्राप्त करके; तौ--वे दोनों; दान्तौ--आत्मसंयमी; गुरौ--गुरु के लिए; वृत्तिमू--सेवा;अनिन्दिताम्‌--निन्दारहित; ग्राहयन्तौ--दूसरों को भी ग्रहण कराते हुए; उपेतौ--सेवा के लिए पहुँचे; स्म--निस्सन्देह; भकत्या--भक्तिपूर्वक; देवम्‌-- भगवान्‌ को; इब--मानो; आहतौ--सम्मानित ( गुरु द्वारा ) |

सान्दीपनि इन दोनों आत्मसंयमी शिष्यों के प्रति बहुत ही उच्च विचार रखते थे जिन्हें उन्होंनेअकस्मात प्राप्त किया था।

दोनों ने गुरु की साक्षात्‌ भगवान्‌ जैसी ही भक्तिपूर्वक सेवा करते हुएअन्यों के समक्ष अनिन्द्य उदाहरण प्रस्तुत किया कि किस तरह आध्यात्मिक गुरु की पूजा कीजाती है।

तयोद्विजवसस्तुष्ट: शुद्धभावानुवृत्तिभि: ।

प्रोवाचच वेदानखिलान्साझ्ैपनिषदो गुरु: ॥

३३॥

तयो:--दोनों का; द्विज-वरः --ब्राह्मणों में श्रेष्ठ ( सान्दीपनि ); तुष्ट:--सन्तुष्ट; शुद्ध-शुद्ध; भाव--प्रेम से; अनुवृत्तिभि: --विनीत कार्यो से; प्रोवाच--बतलाया; वेदान्‌ू--वेद; अखिलान्‌ू--समस्त; स--सहित; अड़--छहो वेदांग; उपनिषदः--तथाउपनिषदों; गुरु:--गुरु ने।

ब्राह्मण- श्रेष्ठ गुरु सान्दीपनि उनके विनीत आचरण से सनन्‍्तुष्ट थे अतः उन्होंने दोनों को सारे वेद छह वेदांगों सहित तथा उपनिषद्‌ पढ़ाये।

सरहस्यं धनुर्वेदं धर्मान््यायपथांस्तथा ।

तथा चान्वीक्षिकीं विद्यां राजनीतिं च षड्वधाम्‌ ॥

३४॥

स-रहस्यम्‌-गुहा अंश समेत; धनु:-वेदम्‌-- धनुर्विद्या; धर्मान्‌ू--मानवीय विधि के सिद्धान्त; न्‍्याय--तर्क की; पथान्‌--विधियाँ; तथा-- भी; तथा च--और इसी तरह से; आन्सीक्षिकीम्‌--दार्शनिक वाद-विवाद की; विद्याम्‌--ज्ञान की शाखा;राज-नीतिम्‌--राजनीति शास्त्र; च--तथा; षट्‌-विधाम्‌ू--छह पक्षों में |

उन्होंने दोनों को रहस्यों सहित धनुर्वेद की शिक्षा दी।

साथ ही मानक विधि ग्रंथ, तर्क तथादर्शन विषयक वाद-विवाद की विधियाँ और राजनीति शास्त्र के छह भेदों की भी शिक्षा दी।

सर्व नरवरश्रेष्ठी सर्वविद्याप्रवर्तकौ ।

सकृन्निगदमात्रेण तौ सझ्जगृहतुर्नुप ॥

३५॥

अहोरात्रैश्वतु:षष्टया संयत्तौ तावती: कला: ।

गुरुदक्षिणयाचार्य छन्दयामासतुर्नुप ॥

३६॥

सर्वम्‌--हर बात; नर-वर--प्रथम श्रेणी के पुरुषों की; श्रेष्ठी -- श्रेष्ठ; सर्व--सभी; विद्या--ज्ञान की शाखाओं के; प्रवर्तकौ--शुभारम्भ करने वाले; सकृत्‌--एक बार; निगद--बतलाया जाकर; मात्रेण--केवल; तौ--दोनों; सञ्भगृहतु:-- आत्मसात्‌ करलेते; नृप--हे राजा ( परीक्षित ); अह:--दिन; रात्रै:--तथा रातों में; चतुः-षष्टया--चौंसठ; संयत्तौ-- ध्यानमग्न रहकर;तावती:--उतनी ही; कलाः--कलाएँ; गुरु-दक्षिणया-- गुरु-दक्षिणा से; आचार्यम्‌-- अपने गुरु को; छन्दयाम्‌ आसतु:--प्रसन्नकिया; नृप--हे राजा

हे राजन, पुरुष-श्रेष्ठ कृष्ण तथा बलराम स्वयं ही सभी प्रकार की विद्याओं के आदि-प्रवर्तक होने के कारण किसी भी विषय की व्याख्या को एक ही बार में सुनकर तुरन्त आत्मसातकर सकते थे।

इस तरह उन्होंने एकाग्र चित्त से चौंसठ कलाओं तथा चातुरियों को उतने ही दिनोंतथा रातों में सीख लिया।

तत्पश्चात्‌ हे राजन, उन्होंने गुरु-दक्षिणा देकर अपने गुरु को प्रसन्न हे राजन, विद्वान ब्राह्मण सान्दीपनि ने दोनों विभुओं के यशस्वी तथा अद्भुत गुणों एवंउनकी अति मानवीय बुद्धि के बारे में ध्यानपूर्वक विचार किया।

तत्पश्चात्‌ अपनी पत्नी सेपरामर्श करके उन्होंने गुरु-दक्षिणा के रूप में अपने नन्हे पुत्र की वापसी को चुना जो प्रभास क्षेत्रके समुद्र में मर चुका था।

विजस्तयोस्तं महिमानमद्धभुत संलोक्ष्य राजन्नतिमानुसीं मतिम्‌ ।

सम्मन्त्रय पत्या स महार्णवे मृत बालं प्रभासे वरयां बभूव ह ॥

३७॥

द्विज:--विद्वान ब्राह्मण; तयो:--उन दोनों की; तम्‌--उस; महिमानमू--महानता को; अद्भुतमू-- अद्भुत; संलक्ष्य-- भली-भाँतिदेखकर; राजन्‌--हे राजा; अति-मानुषीम्‌--मनुष्य की क्षमता से परे; मतिम्‌--बुद्धि; सम्मन्य--परामर्श करके; पल्या-- अपनीपतली से; सः--उसने; महा-अर्णवे-- महासागर में; मृतम्‌-मरे हुए; बालम्‌--अपने छोटे से पुत्र को; प्रभासे--प्रभास नामकपवित्र स्थान में; वरयाम्‌ बभूव ह--चुना |

है राजन, विद्वान ब्राह्मण सान्दीपनि ने दोनों विभुओं के यशस्वी तथा अद्भुत गुणों एव उनकी अति मानवीय बुद्धि के बारे में ध्यानपूर्वक विचार किया।

तत्पश्चात्‌ अपनी पत्नी स परामर्श करके उन्होंने गुरु-दक्षिणा के रूप में अपने नन्हे पुत्र की वापसी को चुना जो प्रभास क्षेत् के समुद्र में मर चुका था।

तेथेत्यथारुह्म महारथौ रथंप्रभासमासाद्य दुरन्तविक्रमौ ।

वेलामुपत्रज्य निषीदतुः क्षनंसिन्धुर्विदित्वाईनमाहरत्तयो: ॥

३८ ॥

तथा--ऐसा ही हो, बहुत अच्छा; इति--ऐसा कहकर; अथ--तब; आरुह्म-- चढ़कर; महा-रथौ--दो महारथी; रथम्‌--रथ पर;प्रभासमू-प्रभास तीर्थ; आसाद्य--पहुँचकर; दुरन्‍्त--असीम; विक्रमौ--पराक्रम वाले; वेलाम्‌--समुद्र तट तक; उपब्रज्य--चलकर; निषीदतु:--बैठ गये; क्षणम्‌-- क्षण-भर के लिए; सिन्धु:--सागर ( का अधिष्ठाता देव ); विदित्वा--पहचान कर;अह्णम्‌--सादर भेंट; आहरत्‌--लाया; तयो:--दोनों के लिए

असीम पराक्रम वाले दोनों महारथियों ने उत्तर दिया, 'बहुत अच्छा ' और तुरन्त ही अपनेरथ पर सवार होकर प्रभास के लिए रवाना हो गये।

जब वे उस स्थान पर पहुँचे तो वे समुद्र तटतक पैदल गये और वहाँ बैठ गये।

क्षण-भर में समुद्र का देवता उन्हें भगवान्‌ के रूप में पहचानकर श्रद्धा-रूप में भेंट लेकर उनके निकट आया।

तमाह भगवानाशू गुरुपुत्र: प्रदीयताम्‌ ।

योअसाविह त्वया ग्रस्तो बालको महतोर्मिणा ॥

३९॥

तम्‌--उससे; आह--कहा; भगवानू्‌-- भगवान्‌ ने; आशु--तुरन्‍्त; गुरु--मेरे गुरु का; पुत्र:--पुत्र; प्रदीयताम्‌-- प्रस्तुत कियाजाय; यः--जो; असौ--वह; इह--इस स्थान पर; त्वया--तुम्हारे द्वारा; ग्रस्त:--पकड़ा गया; बालक:--बालक; महता--बलशाली; ऊर्मिणा--तुम्हारी लहरों द्वारा

भगवान्‌ कृष्ण ने समुद्र के स्वामी से कहा, 'मेरे गुरु के पुत्र को तुरन्त उपस्थित किया जायेजिसे तुमने अपनी बलशाली लहरों से यहाँ जकड़ रखा है।

रीसमुद्र उवाचन चाहार्षमहं देव दैत्य: पञ्नजनो महान्‌ ।

अन्तर्जलचर: कृष्ण शद्भुरूपधरोसुर: ॥

४०॥

श्री-समुद्र: उबाच--साक्षात्‌ समुद्र ने कहा; न--नहीं; च--तथा; अहार्षम्‌--उसे ले गया; अहम्‌--मैं; देव--हे प्रभु; दैत्य:--दित वंशज; पञ्ञजन:--पञ्जजन नामक; महान्‌--शक्तिशाली; अन्त:--भीतर; जल--जल के; चर:--चलने वाला; कृष्ण--हेकृष्ण; शद्बु--शंख का; रूप--स्वरूप; धर:--धारण करके; असुर: --असुर।

समुद्र ने उत्तर दिया, 'हे भगवान्‌ कृष्ण, उसका हरण मैंने नहीं अपितु दिति के वंशजपञ्जजन नामक एक दैत्य ने किया है, जो शंख के रूप में जल में विचरण करता रहता है।

' आस्ते तेनाहतो नूनं तच्छ॒त्वा सत्वरं प्रभु: ।

जलमाविश्य तं हत्वा नापश्यदुदरेर्भकम्‌ ॥

४१॥

आस्ते--वह वहाँ है; तेन--उसके ( पञ्णञजन ) द्वारा; आहतः--हरण किया गया; नूनम्‌--निस्सन्देह; ततू--वह; श्रुत्वा--सुनकर;सत्वरम्‌-तेजी से; प्रभु:--प्रभु; जलम्‌--जल में; आविश्य--घुसकर; तम्‌--उसदैत्य को; हत्वा--मारकर; न अपश्यत्‌--नहींदेखा; उदरे--उसके पेट में; अर्भगम्‌--बालक को

सागर ने कहा, 'निस्सन्देह उसी देत्य ने उस बालक को चुरा लिया है।

यह सुनकर भगवान्‌कृष्ण समुद्र में घुस गये, पञ्नजन को ढूँढ़ लिया और उसको मार डाला।

किन्तु भगवान्‌ को उसदैत्य के पेट के भीतर वह बालक नहीं मिला।

तदड़ुप्रभवं शद्भुमादाय रथमागमत्‌ ।

ततः संयमनीं नाम यमस्य दयितां पुरीम्‌ ।

गत्वा जनार्दनः शट्डुं प्रदध्मौ सहलायुध: ॥

४२॥

शद्भुनिर्हांदमाकर्ण्य प्रजासंयमनो यम: ।

तयोः सपर्या महतीं चक्रे भक्त्युपबृंहिताम्‌ ॥

४३॥

उवाचावनतः कृष्णं सर्वभूताशयालयम्‌ ।

लीलामनुष्ययोर्विष्णो युवयो: करवाम किम्‌ ॥

४४॥

तत्‌--उस ( दैत्य ) के; अड़--शरीर से; प्रभवम्‌--उत्पन्न; शद्डमू--शंख को; आदाय--लेकर; रथम्‌--रथ पर; आगमत्‌--लौटआये; तत:ः--तब; संयमनीम्‌ नाम--संयमनी नामक; यमस्य--यमराज की; दयिताम्‌--प्रिय; पुरीम्‌--नगरी में; गत्वा--जाकर;जन-अर्दन:--समस्त पुरुषों के धाम, भगवान्‌ कृष्ण; शद्बुमू--शंख को; प्रदध्मौ--जोर से बजाया; स--सहित; हल-आयुध:--बलराम जिनका आयुध हल है; शट्बु--शंख की; निर्हादम्‌ू--गूँज; आकर्ण्य--सुनकर; प्रजा--जन्म लेने वाले का;संयमन: --संयमनी नामक; यम:--यमराज; तयो:--दोनों की; सपर्याम्‌--पूजा; महतीम्‌--विशद; चक्रे--सम्पन्न की; भक्ति--भक्ति के साथ; उपबृूंहितामू--उफनते; उबाच--कहा; अवनत:--झुककर; कृष्णम्‌--कृष्ण को; सर्व--समस्त; भूत--जीवितप्राणी; आशय--मन; आलयम्‌--आवास; लीला--आपकी लीला के रूप में; मनुष्ययो:--मनुष्यों के रूप में प्रकट हुए;विष्णो--हे विष्णु; युवयो:--तुम दोनों के लिए; करवाम--करूँ; किमू--क्या |

भगवान्‌ जनार्दन ने वह शंख ले लिया जो उस दैत्य के शरीर के चारों ओर उगा हुआ था औररथ पर वापस चले गये।

इसके पश्चात्‌ वे यमराज की प्रिय राजधानी संयमनी गये।

भगवान्‌बलराम के साथ वहाँ पहुँचकर उन्होंने तेजी से अपना शंख बजाया और उस गूँजती हुई आवाजको सुनते ही बद्धजीवों को नियंत्रण में रखने वाला यमराज वहाँ पहुँचा।

यमराज ने दोनों विभुओंकी अत्यन्त भक्तिपूर्वक पूजा की और तब प्रत्येक हृदय में वास करने वाले भगवान्‌ कृष्ण से कहा, 'हे भगवान्‌ विष्णु, मैं आप के लिए तथा भगवान्‌ बलराम के लिए जो सामान्य मनुष्योंकी भूमिका अदा कर रहे हैं, क्या करूँ?

श्रीभगवानुवाचगुरुपुत्रमिहानीतं निजकर्मनिबन्धनम्‌ ।

आनयस्व महाराज मच्छासनपुरस्कृत: ॥

४५ ॥

श्री-भगवान्‌ उबाच-- भगवान्‌ ने कहा; गुरु-पुत्रम्‌ू--मेरे गुरु के पुत्र को; हह--यहाँ; आनीतम्‌ू--लाया गया; निज--उसकाअपना; कर्म--पूर्वकर्मों के फलों का; निबन्धनम्‌--बन्धन-भोग करता हुआ; आनयस्व--ले आओ; महा-राज--हे महान्‌ राजा;मत्‌-मेरा; शासन--आदेश; पुरः-कृतः--प्राथमिकता देते हुए।

भगवान्‌ ने कहा, ' अपने विगत कर्म-बन्धन का भोग करने से मेरे गुरु का पुत्र आपके पासयहाँ लाया गया है।

हे महान्‌ राजा, मेरे आदेश का पालन करो और अविलम्ब उस बालक को मेरे पास ले आओ।

तथेति तेनोपानीतं गुरुपुत्र॑ यदूत्तमौ ।

दत्त्वा स्वगुरवे भूयो वृणीष्वेति तमूचतुः ॥

४६॥

तथा--ऐसा ही हो; इति--( यमराज ने ) ऐसा कहते हुए; तेन--उसके द्वारा; उपानीतम्‌--आगे लाया गया; गुरु-पुत्रमू--गुरु केपुत्र को; यदु-उत्तमौ--यदुओं में श्रेष्ठ कृष्ण तथा बलराम; दत्त्वा--देकर; स्व-गुरवे --अपने गुरु को; भूय:--फिर से;वृणीष्व--कृपया चुन लीजिए; इति--इस प्रकार; तम्‌--उससे; ऊचतु:--उन्होंने कहा ।

यमराज ने कहा, 'जो आज्ञा' और गुरु-पुत्र को सामने ला दिया।

तत्पश्चात्‌ यदुओं में श्रेष्ठउन दोनों ने उस बालक को लाकर अपने गुरु को भेंट करते हुए उनसे कहा, 'कृपया दूसरा वरमाँगिये।

श्रीगुरुकुवाचसम्यक्सम्पादितो वत्स भवदभ्यां गुरुनिष्क्रयः ।

को नु युष्मद्विधगुरो: कामानामवशिष्यते ॥

४७॥

श्री-गुरु: उवाच--उनके गुरू सान्दीपनि मुनि ने कहा; सम्यक्‌--पूरी तरह; सम्पादितः--पूरा हुआ; वत्स--मेरे बालक;भवद्भ्याम्‌--तुम दोनों के द्वारा; गुरु-निष्क्रयः--गुरु-दक्षिणा; क:--जो; नु--निस्सन्देह; युष्मत्‌ू-विध--आप जैसे पुरुषों के;गुरोः--गुरु के लिए; कामानाम्‌--उसकी इच्छाओं का; अवशिष्यते--शेष रहता है।

गुरु ने कहा : मेरे प्रिय बालको, तुम दोनों ने अपने गुरु को दक्षिणा देने के शिष्य-दायित्वको पूरा कर लिया है।

निस्सन्देह, तुम जैसे शिष्यों से गुरु को और क्या इच्छाएँ हो सकती हैं ?

गच्छतं स्वगृहं वीरौ कीर्तिवामस्तु पावनी ।

छन्‍्दांस्ययातयामानि भवन्त्विह परत्र च ॥

४८ ॥

गच्छतम्‌--जाओ; स्व-गृहम्‌-- अपने घर को; वीरौ--हे दोनों वीर; कीर्ति:--यश; वाम्‌--तुम्हारा; अस्तु--होए; पावनी--पावन बनाने वाला; छन्दांसि--वैदिक स्तुतियाँ; अयात-यामानि--नित नूतन; भवन्तु--होए; इह--इस जीवन में; परत्र--अगलेजीवन में; च--तथाहे वीरो, अब तुम अपने घर लौट जाओ।

तुम्हारा यश संसार को पवित्र बनाये और इस जन्ममें तथा अगले जन्म में वैदिक स्तुतियाँ तुम्हारे मन में सदैव ताजी बनी रहें।

गुरुणैवमनुज्ञातौ रथेनानिलरंहसा ।

आयातीौ स्वपुरं तात पर्जन्यनिनदेन वै ॥

४९॥

गुरुणा--उनके गुरु द्वारा; एबम्‌--इस तरह से; अनुज्ञातौ--विदा किये जाने पर; रथेन--अपने रथ में; अनिल--वायु की तरह;रंहसा--वेगवान; आयातौ--आये; स्व--अपने; पुरम्‌ू--नगर ( मथुरा ); तात--हे प्रिय ( राजा परीक्षित ); पर्जन्य--बादल कीतरह; निनदेन--गर्जन; बै--निस्सन्देह।

इस तरह अपने गुरु से विदा होने की अनुमति पाकर दोनों भाई अपने रथ पर बैठ अपनीनगरी लौट आये।

यह रथ वायु की तेजी से चल रहा था और बादल की तरह गूँज रहा था।

समनन्‍दन्प्रजा: सर्वा इृष्ठा रामजनार्दनौ ।

अपश्यन्त्यो बह्लहानि नष्टलब्धधना इव ॥

५०॥

समनन्दन्‌--खुशी मनाई; प्रजा:--नागरिकों ने; सर्वा:--सभी; हृष्टा--देखकर; राम-जनार्दनौ--बलराम तथा कृष्ण को;अपशयन्त्य:--न देख पाने से; बहु--अनेक; अहानि--दिन; नष्ट--खोया हुआ; लब्ध-- पुनः प्राप्त; धना:--सम्पत्ति वालों को;इब--सहश

सारे नागरिकजिन्होंने अनेक दिनों से कृष्ण तथा बलराम को नहीं देखा था, उन्हें देखकरपरम प्रसन्न हुए।

लोगों को वैसा ही लगा, जिस तरह धन खोये हुओं को उनका धन वापस मिलजाय।

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