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अध्याय बयालीसवाँ: यज्ञ धनुष को तोड़ना
10.42श्रीशुक उवाचअथ ब्रजन्राजपथेन माधव:स्त्रियं गृहीताड़्विलेपभाजनाम् ।
विलोक्य कुब्जां युवतीं वराननांपप्रच्छ यान्तीं प्रहसन्नसप्रद: ॥
१॥
श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; अथ--तब; ब्रजन्--टहलते हुए; राज-पथेन--राजमार्ग से; माधव: --कृष्ण;स्त्रियम्--स्त्री को; गृहीत--पकड़े; अड़--शरीर के; विलेप--लेप का; भाजनाम्ू-- थाल; विलोक्य--देखकर; कुब्जाम्--कुबड़ी को; युवतीम्--युवती; वर-आननाम्--सुन्दर मुख वाली; पप्रच्छ--पूछा; यान्तीमू--जाते हुए; प्रहसन्--हँसते हुए;रस- प्रेम के आनन्द का; प्रदः--देने वाला ।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब भगवान् माधव राजमार्ग पर जा रहे थे तो उन्होंने एक युवाकुबड़ी स्त्री को देखा जिसका मुख आकर्षक था और वह सुगन्धित लेपों का थाल लिए हुए जारही थी।
प्रेमानन्द दाता ने हँसकर उससे इस प्रकार पूछा।
का त्वं वरोर्वेतदु हानुलेपनंकस्याडुने वा कथयस्व साधु न: ।
देह्यावयोरड्रविलेपमुत्तमंश्रेयस्ततस्ते न चिराद्धविष्यति ॥
२॥
का--कौन; त्वमू--तुम; वर-ऊरु --सुन्दर जंघाओं वाली; एतत्--यह; उ ह--आह, निस्सन्देह; अनुलेपनम्--लेप; कस्य--किसके लिए; अड्डने--हे स्त्री; वा--अथवा; कथयस्व--कहो; साधु--सच सच; न:--हमको; देहि--दो; आवयो:--हम दोनोंको; अड्डभ-विलेपम्--शरीर का लेप; उत्तमम्--सर्वश्रेष्ठ; श्रे:--लाभ, कल्याण; ततः--तत्पश्चात्; ते--तुम्हारा; न चिरात्--शीघ्र ही; भविष्यति--होगा।
भगवान् कृष्ण ने कहा : हे सुन्दर जंघाओं वाली, तुम कौन हो ? ओह, लेप! हे सुन्दरी,यह किसके लिए है? हमें सच सच बता दो।
हम दोनों को अपना कोई उत्तम लेप दो तो तुम्हेंशीघ्र ही महान् वर प्राप्त होगा।
सैरज्युवाचदास्यस्म्यहं सुन्दर कंससम्मतात्रिवक़्नामा हानुलेपकर्मणि ।
मद्धावितं भोजपतेरतिप्रियंविना युवां कोउन्यतमस्तदर्हति ॥
३॥
सैरन्श्नी उवाच--दासी ने कहा; दासी--दासी; अस्मि--हूँ; अहम्--मैं; सुन्दर--हे सुन्दर; कंस--कंस द्वारा; सम्मता--आदरित;त्रिवक्र-नामा--त्रिवक्रा ( तीन स्थान से टेढ़ी ) नामक; हि--निस्सन्देह; अनुलेप--लेप; कर्मणि--मेरे कार्य के लिए; मत्--मेरेद्वारा; भावितमू--तैयार किया हुआ; भोज-पते:--भोजों के प्रमुख के लिए; अति-प्रियम्--अत्यन्त प्रिय; विना--के बिना;युवाम्--तुम दोनों; क:ः--कौन; अन्यतम:--कोई दूसरा; तत्ू--वह; अरहति--पा सकता है, योग्य है
दासी ने उत्तर दियाः हे सुन्दर, मैं राजा कंस की दासी हूँ।
वे मेरे द्वारा तैयार किये गये लेपोंका अतीव सम्मान करते हैं।
मेरा नाम त्रिवक्रा है।
जिन लेपों को भोजराज इतना अधिक चाहताहै, भला उनका पात्र आप दोनों के अतिरिक्त कौन हो सकता है ?
रूपपेशलमाधुर्य हसितालापवीक्षितै: ।
धर्षितात्मा ददौ सान्द्रमुभयोरनुलेपनम् ॥
४॥
रूप--उनसे सौंदर्य; पेशल-- आकर्षण; माधुर्य--मिठास; हसित--मन्द हँसी; आलाप--बातचीत; वीक्षितैः--तथा चितवनोंसे; धर्षित--अभिभूत; आत्मा--अपना मन; ददौ--दे दिया; सान्द्रमू--अत्यधिक; उभयो:--दोनों को; अनुलेपनम्-लेप ।
कृष्ण के सौन्दर्य, आकर्षण, मिठास, हँसी, वाणी तथा चितवनों से अभिभूत मन वालीत्रिवक्रा ने कृष्ण तथा बलराम को पर्याप्त मात्रा में लेप दे दिया।
ततस्तावड्रागेण स्ववर्णेतशशोभिना ।
सम्प्राप्पररभागेन शुशुभातेनुरख्जितौ ॥
५॥
ततः--तब; तौ--वे दोनों; अड्ग-- अपने शरीरों के; रागेण--रंगीन प्रसाधनों से; स्व--अपने; वर्ण--रंगों से; इतर--इसकेअतिरिक्त; शोभिना--अलंकृत करके; सम्प्राप्त--जिससे दिखने लगा; पर--सर्वोच्च; भगेन-- श्रेष्ठता; शुशुभाते--सुन्दर लगनेलगे; अनुरक्षितौ--लेप करके |
इन सर्वोत्तम अंगरागों का लेप करके, जिनसे उनके शरीर अपने रंगों से विपरीत रंगों से सजगए, दोनों भगवान् अत्यधिक सुन्दर लगने लगे।
प्रसन्नो भगवान्कुब्जां त्रिवक्रां रुचिराननाम् ।
ऋण्वीं कर्त मनश्चक्रे दर्शयन्दर्शने फलम् ॥
६॥
प्रसन्न:--तुष्ट; भगवान्-- भगवान् ने; कुब्जामू--कुबड़ी; त्रिवक्रा--त्रिवक्रा को; रुचिर--आकर्षक; आननाम्--मुख वाली;ऋज्वीम्--सीधी; कर्तुमू--करने के लिए; मनः चक्रे--निश्चय किया; दर्शयन्--दिखलाते हुए; दर्शने--उन्हें देखने का;'फलम्--फल।
भगवान् कृष्ण त्रिवक्रा से प्रसन्न हो गये अतः उन्होंने उस सुन्दर मुखड़े वाली कुबड़ी लड़कीको अपने दर्शन का फल दिखलाने मात्र के लिए उसे सीधा करने का निश्चय किया।
पदभ्यामाक्रम्य प्रपदे दर्यडुल्युत्तानपाणिना ।
प्रगृह्य चिबुके ध्यात्ममुदनीनमदच्युत:ः ॥
७॥
पदभ्याम्ू--अपने दोनों पैरों से; आक्रम्ध--दबाकर; प्रपदे--उसके अँगूठों पर; द्वि--दो; अद्डुलि--अँगुलियाँ; उत्तान--ऊपरउठाकर; पाणिना--अपने हाथों से; प्रगृह्य--पकड़कर; चिबुके--उसकी ठुड्डी; अध्यात्मम्--उसके शरीर को; उदनीनमत्--उठाया; अच्युत:--
कृष्ण ने उसके पैरों के अँगूठों को अपने दोनों पाँवों से दबाते हुए भगवान् अच्युत ने उसकी ठुड्डी केनीचे अपने दोनों हाथों की ऊपर उठी एक एक अँगुली रखी और उसके शरीर को सीधा कर दिया।
सा तदर्जुसमानाड़ी बृहच्छोणिपयोधरा ।
मुकुन्दस्पर्शनात्सद्यो बभूव प्रमदोत्तमा ॥
८॥
सा--वह; तदा--तब; ऋजु--सीधी; समान--समतल; अड्जी--अंग वाली; बृहत्--विशाल; श्रोणि--कूल्हे ( नितम्ब ); पय:-धरा--तथा स्तन वाली; मुकुन्द-स्पर्शनात्--मुकुन्द के स्पर्श से; सद्यः--सहसा; बभूब--हो गईं; प्रमदा --स्त्री ; उत्तमा--अत्यन्तसधी हुई
भगवान् मुकुंद के स्पर्श मात्र से त्रिवक्रा सहसा एक अतीव सुन्दर स्त्री में बदल गईं जिसकेअंग सधे हुए तथा सम-अनुपात वाले थे और नितम्ब तथा स्तन बड़े-बड़े थे।
ततो रूपगुणौदार्यसम्पन्ना प्राह केशवम् ।
उत्तरीयान्तमकृष्य स्मयन्ती जातहच्छया ॥
९॥
ततः--तत्पश्चात्८ रूप--सौन्दर्य; गुण--उत्तम आचरण; औदार्य--तथा उदारता से; सम्पन्ना--युक्त; प्राह--बोली; केशवम्--कृष्ण से; उत्तरीय--अंगौछे का; अन्तम्ू--छोर; आकृष्य--खींचकर; स्मयन्ती--हँसती हुई; जात--उत्पन्न करके; हत्-शया--'काम- भावनाएँ।
अब सौन्दर्य, आचरण तथा उदारता से युक्त त्रिवक्रा को भगवान् केशव के प्रति कामेच्छाओंका अनुभव होने लगा।
वह उनके अंगवस्त्र के छोर को पकड़कर हँसने लगी और उनसे इसप्रकार बोली।
एहि वीर गृहं यामो न त्वां त्यक्तुमिहोत्सहे ।
त्वयोन्मधितचित्ताया: प्रसीद पुरुषर्षभ ॥
१०॥
एहि--आओ ; वीर--हे वीर; गृहम्--मेरे घर; याम: -- चलें; न--नहीं ; त्वामू--तुमको; त्यक्तुमू--छोड़ना; इह--यहाँ; उत्सहे--सह सकती हूँ; त्ववा--आपके द्वारा; उन्मधित--उत्तेजित, मथा गया; चित्ताया:--चित्त वाली पर; प्रसीद--कृपा करें; पुरुष-ऋषभ--हे पुरुष- श्रेष्ठ
त्रिवक्रा ने कहा : हे वीर, आओ, मेरे घर चलो।
मैं आपको यहाँ छोड़कर जा नहींसकती।
हे नर-श्रेष्ठ, मुझ पर तरस खाओ क्योंकि आपने मेरे चित्त को उद्देलित कर डाला है।
एवं स्त्रिया याच्यमान: कृष्णो रामस्य पश्यतः ।
मुखं वीक्ष्यानु गोपानां प्रहसंस्तामुवाच ह ॥
११॥
एवम्---इस प्रकार; स्त्रिया--स्त्री द्वारा; याच्य नान: --अनुनय-विनय किये जाने पर; कृष्ण: --कृष्ण ने; रामस्य--बलराम के;'पश्यत:--देखते हुए; मुखम्--मुख को; वीक्ष्य--देखकर; अनु--तब; गोपानाम्-ग्वालबालों का; प्रहसन्--हँसते हुए;तामू--उससे; उवाच ह--कहा |
स्त्री द्वारा इस प्रकार अनुनय-विनय किये जाने पर भगवान् कृष्ण ने सर्वप्रथम बलराम केमुख की ओर देखा, जो इस घटना को देख रहे थे और तब ग्वालमित्रों के मुखों पर दृष्टि डाली।
तब हँसते हुए कृष्ण ने उसे इस प्रकार उत्तर दिया।
एष्यामि ते गृहं सुश्रु पुंसामाधिविकर्शनम् ।
साधितार्थोगृहाणां नः पान्थानां त्वं परायणम् ॥
१२॥
एष्यामि--जाऊँगा; ते--तुम्हारे; गृहम्-घर; सु- भ्रु--हे सुन्दर भौंहों वाली; पुंसामू--मनुष्यों की; आधि--मानसिक व्यथा;विकर्शनम्--नष्ट करने वाली; साधित--पूरा करके; अर्थ:--अपना कार्य; अगृहाणाम्--बिना घर वाले, बेघर; नः--हमारेलिए; पान्थानामू--पथििकों के लिए; त्वमू--तुम; पर--सर्व श्रेष्ठ अयनम्-- आश्रय |
भगवान् कृष्ण ने कहा : हे सुन्दर भौंहों वाली स्त्री, अपना कार्य पूरा करते ही मैं अवश्यतुम्हारे घर आऊँगा जहाँ लोगों को चिन्ता से मुक्ति मिल सकती है।
निस्सन्देह तुम हम जैसे बेघरपथिकों के लिए सर्वोत्तम आश्रय हो।
विसृज्य माध्व्या वाण्या ताम्ब्रजन्मार्गे वणिक्पथे: ।
नानोपायनताम्बूलस््रग्गन्थे: साग्रजोडचित: ॥
१३॥
विसृज्य--छोड़कर; माध्व्या--मधुर; वाण्या--वाणी से; तामू--उसको; ब्रजन्ू--चलते हुए; मार्गे--मार्ग पर; वणिक्-पथै:--व्यापारियों द्वारा; नाना--विविध; उपायन--सादर भेंटें; ताम्बूल--पान; सत्रकू--मालाएँ; गन्धैः--तथा सुगन्धित द्र॒व्यों से; स--सहित; अग्र-ज:--अपने बड़े भाई; अर्चितः --पूजा किया गया।
इस प्रकार मीठी बातें करके उससे विदा लेकर भगवान् कृष्ण मार्ग पर आगे बढ़े।
रास्ते-भरव्यापारियों ने पान, मालाएँ तथा सुगन्धित द्रव्य से युक्त नाना प्रकार की सादर भेंटें अर्पित करकेउनकी तथा उनके बड़े भाई की पूजा की।
तदर्शनस्मरक्षोभादात्मानं नाविदन्स्त्रिय: ।
विस्त्रस्तवासःकवर वलया लेख्यमूर्तयः ॥
१४॥
तत्--उसको; दर्शन--देखने से; स्मर--कामदेव के प्रभाव से; क्षोभात्--उद्वेलित होने से; आत्मानम्-स्वयं को; न अविदन्--नहीं पहचान पाई; स्त्रियः--स्त्रियाँ; विस्त्रस्त--ढीले हुए; वास:--वस्त्र; कवर--चोटियाँ; वलया:--तथा उनकी चूड़ियाँ;लेख्य--मानो चित्रित; मूर्तवः--आकृतियाँ।
कृष्ण के दर्शन से नगर की नारियों के हृदय में कामदेव जाग उठा।
इस प्रकार क्षुब्ध होकरवे अपनी सुध-बुध खो दीं।
उनके परिधान, लट तथा उनके कंगन ढीले पड़ जाते और वे चित्र मेंबनी आकृति सी स्तब्ध खड़ी रह जातीं।
'ततः पौरान्पूच्छमानो धनुष: स्थानमच्युतः ।
तस्मिग्प्रविष्टो ददृशे धनुरैन्द्रमिवाद्भुतम् ॥
१५॥
ततः--तब; पौरान्ू--नगरवासियों से; पृच्छमान: --पूछते-पाछते; धनुष:--धनुष के ; स्थानम्--स्थान को; अच्युत:--अच्युतभगवान् ने; तस्मिन्ू--वहाँ; प्रविष्ट:--घुसते हुए; ददशे--देखा; धनु:--धनुष; ऐन्द्रमू--इन्द्र का; इब--सहृश; अद्भुतम्--विस्मयकारी |
तत्पश्चात् कृष्ण ने स्थानीय लोगों से वह स्थान पूछा जहाँ धनुष-यज्ञ होना था।
जब वे वहाँगये तो उन्होंने विस्मथकारी धनुष देखा जो इन्द्र के धनुष जैसा था।
पुरुषैर्बहुभिर्गुप्तमर्चितं परमर्दद्रिमत् ।
वार्यमाणो नृभि: कृष्ण: प्रसहा धनुराददे ॥
१६॥
पुरुषैः:--लोगों द्वारा; बहुभि:-- अनेक; गुप्तम्--रक्षित; अर्चितम्ू--पूजित; परम--परम; ऋद्धि--ऐश्वर्य से; मत्--युक्त;वार्यमाण:--मना किये गये; नृभि:--रक्षकों द्वारा; कृष्ण: --कृष्ण ने; प्रसह्या--बलपूर्वक; धनु:--धनुष को; आददे--उठालिया।
उस अत्यन्त ऐश्वर्ययुक्त धनुष की लोगों की विशाल टोली द्वारा निगरानी की जा रही थी औरवे लोग उसकी आदर भाव से पूजा कर रहे थे।
तो भी कृष्ण आगे बढ़ते गये और रक्षकों के मनाकरने के बावजूद उन्होंने उस धनुष को उठा लिया।
करेण वामेन सलीलमुद्धृतंसज्यं च कृत्वा निमिषेण पश्यताम् ।
नृणां विकृष्य प्रबभञ्ञ मध्यतोयथेक्षुदण्डं मदकर्युरुक्रम: ॥
१७॥
'करेण--हाथ से; वामेन--बाएँ; स-लीलमू--खेल खेल में; उद्ध्ृतम्--उठाया; सज्यमू--डोरी चढ़ाकर; च--तथा; कृत्वा--करके; निमिषेण--पलक मारते; पश्यताम्--देखते देखते; नृणाम्ू--रक्षकों के; विकृष्य--खींचकर; प्रबभञ्--तोड़ डाला;मध्यत:--बीच से; यथा--जिस तरह; इश्लु--ईंख के; दण्डम्--तने को; मद-करी--मतवाला हाथी; उरुक्रम:--
कृष्ण नेअपने बाएँ हाथ से उस धनुष को आसानी से उठाकर भगवान् उरुक्रम ने राजा के रक्षकों केदेखते देखते एक क्षण से भी कम समय में डोरी चढ़ा दी।
तत्पश्चात् उन्होंने बलपूर्वक डोरीखींची और उस धनुष को बीच से तोड़ डाला जिस तरह मतवाला हाथी गज्ने को तोड़ दे।
धनुषो भज्यमानस्य शब्द: खं रोदसी दिश: ।
पूरयामास यं श्रुत्वा कंसस्त्रासमुपागमत् ॥
१८॥
धनुष:--धनुष के; भज्यमानस्य--टूटने से; शब्द: -- ध्वनि; खम्--पृथ्वी; रोदसी-- आकाश; दिश:--तथा सारी दिशाएँ;पूरयाम् आस--भर गईं; यम्--जिसे; श्रुत्वा--सुनकर; कंस:--राजा कंस ने; त्रासम्ू-- भय; उपागमत्-- अनुभव किया।
धनुष के टूटने की ध्वनि पृथ्वी तथा आकाश की सारी दिशाओं में भर गई।
इसे सुनकरकंस भयभीत हो उठा।
तद्रक्षिण: सानुचरं कुपिता आततायिन: ।
गृहीतुकामा आवल्नुर्गह्यातां वध्यतामिति ॥
१९॥
तत्--उसके; रक्षिण:--रक्षक; स--सहित; अनुचरम्--अपने संगी जनों; कुपिता:--क्रुद्ध; आततायिन:--हथियार लिए;गृहीतु--पकड़ने के लिए; कामा:--चाहते हुए; आवब्बु:--घेर लिया; गृह्मयतामू--पकड़ लो; वध्यताम्--मार डालो; इति--ऐसाकहते हुए
तब क्रुद्ध रक्षकों ने अपने अपने हथियार उठा लिये और कृष्ण तथा उनके संगियों कोपकड़ने की इच्छा से उन्हें घेर लिया और 'पकड़ लो, मार डालो ' कहकर चिल्लाने लगे।
अथ तान्दुरभिप्रायान्विलोक्य बलकेशवौ ।
क्रुद्धों धन्चन आदाय शकले तांश्व जघ्नतु: ॥
२०॥
अथ--त्पश्चात्; तान्ू--उनको; दुरभिप्रायान्--दुष्ट अभिप्राय वाले; विलोक्य--देखकर; बल-केशवौ--बलराम तथा कृष्ण ने;क्रुद्धों--क्रुद्ध; धन्वन:-- धनुष के; आदाय--लेकर; शकले--दोनों टूटे खंड; तान्ू--उनको; च--तथा; जष्नतु:-- प्रहारकिया।
दुर्भावना से रक्षकों को अपनी ओर आते देखकर बलराम तथा कृष्ण ने धनुष के दोनोंखण्डों को अपने हाथों में ले लिया और वे उन सबों को इन्हीं से मारने लगे।
बलं च कंसप्रहितं हत्वा शालामुखात्तत: ।
निष्क्रम्य चेरतुईएष्टी निरीक्ष्य पुरसम्पद: ॥
२१॥
बलम्--सेना; च--तथा; कंस-प्रहितम्--कंस द्वारा भेजी; हत्वा--मारकर; शाला--यज्ञस्थल के; मुखात्--द्वार से; ततः--तब; निष्क्रम्य--निकलकर; चेरतु:--दोनों विचरण करने लगे; हृष्टौ-- प्रसन्न; निरीक्ष्य--देखकर; पुर--नगर की; सम्पद:--सम्पदा।
कंस द्वारा भेजी गई सैन्य-टुकड़ी को भी मारकर कृष्ण तथा बलराम यज्ञशाला के मुख्य द्वारसे निकल आये और सुखपूर्वक ऐश्वर्यमय दृश्य देखते हुए नगर में घूमते रहे।
तयोस्तदद्धुतं वीर्य निशाम्य पुरवासिन: ।
तेज: प्रागल्भ्यं रूपं च मेनिरे विबुधोत्तमौ ॥
२२॥
तयो:--उन दोनों के; तत्--उस; अद्भुतम्-- अद्भुत; वीर्यम्--बीरतापूर्ण कार्य को; निशाम्य--देखकर; पुर-वासिन:--नगरनिवासी; तेज:--उनके तेज; प्रागल्भ्यम्-प्रगल्भता, साहस; रूपम्--सौन्दर्य को; च--तथा; मेनिरे--उन्होंने सोचा; विबुध--देवता; उत्तमौ--दो श्रेष्ठ |
कृष्ण तथा बलराम द्वारा किये गये अदभुत कार्य तथा उनके बल, साहस एवं सौन्दर्य कोदेखकर नगरवासियों ने सोचा कि वे अवश्य ही दो मुख्य देवता हैं।
तयोर्विचरतोः स्वैरमादित्योस्तमुपेयिवान् ।
कृष्णरामौ वृतौ गोपै: पुराच्छकटमीयतु: ॥
२३॥
तयो:--उन दोनों के; विचरतो:--विचरण करते; स्वैरम्--इच्छानुसार; आदित्य: --सूर्य; अस्तमू-- डूबने के; उपेयिवान्--निकट हो आया; कृष्ण-रामौ--कृष्ण तथा बलराम; वृतौ--घिरे; गोपै:--ग्वालों से; पुरात्ू--नगरसे; शकटम्--जहाँ परबैलगाड़ियाँ खड़ी थीं; ईयतु:--गये |
जब वे इच्छानुसार विचरण कर रहे थे तब सूर्य अस्त होने लगा था अतः वे ग्वालबालों केसाथ नगर को छोड़कर ग्वालों के बैलगाड़ी वाले खेमे में लौट आये।
गोप्यो मुकुन्दविगमे विरहातुरा याआशासताशिष ऋता मधुपुर्य भूवन् ।
सम्पश्यतां पुरुषभूषणगात्रलक्ष्मींहित्वेतरात्रु भजतश्चकमेउयनं श्री: ॥
२४॥
गोप्य:--गोपियाँ; मुकुन्द-विगमे--मुकुन्द के विदा होते समय; विरह--वियोग की भावना से; आतुरा:--शोकाकुल; या: --जो; आशासत--बोली थीं; आशिष:--वर, आशीर्वाद; ऋता:--सच; मधु-पुरि--मथुरा में; अभूवन्--हो गये; सम्पश्यताम्--देखने वालों के लिए; पुरुष--मनुष्यों के; भूषण-- आभूषण के; गात्र--शरीर के; लक्ष्मीमू--सौन्दर्य; हित्वा--त्यागकर;इतरान्--अन्य लोग; नु--निस्सन्देह; भजत:--उनकी पूजा करने वाले; चकमे--लालसा करने लगे; अयनम्--शरण के लिए;श्री:-- लक्ष्मी |
वृन्दावन से मुकुन्द ( कृष्ण ) के विदा होते समय गोपियों ने भविष्यवाणी की थी किमथुरावासी अनेक वरों का भोग करेंगे और अब उन गोपियों की भविष्यवाणी सत्य उतर रही थीक्योंकि मथुरा के वासी पुरुष-रत्न कृष्ण के सौन्दर्य को एकटक देख रहे थे।
निस्सन्देह लक्ष्मीजीउस सौन्दर्य का आश्रय इतना चाहती थीं कि उन्होंने अनेक अन्य लोगों का परित्याग कर दिया,यद्यपि वे उनकी पूजा करते थे।
अवनिक्ताडूप्रियुगलौ भुक्त्वा क्षीरोपसेचनम् ।
ऊपषतुस्तां सुख रात्रि ज्ञात्वा कंसचिकीर्षितम् ॥
२५॥
अवनिक्त--धुलाकर; अड्प्रि-युगलौ--दोनों के पाँव; भुक्त्वा--खाने के बाद; क्षीर-उपसेचनम्--खीर; ऊषतु:--वहाँ टिकेरहे; तामू--उस; सुखम्--सुखपूर्वक; रात्रिमू--रात; ज्ञात्वा--जानकर; कंस-चिकीर्षितम्--कंस के लिए जो चाह रहा था
कृष्ण तथा बलराम के पाँव धोये जाने के बाद दोनों भाइयों ने खीर खाई।
तत्पश्चात् यहजानते हुए ही कि कंस कया करना चाहता है, उन दोनों ने वहाँ सुखपूर्वक रात बिताई।
कंसस्तु धनुषो भड़ं रक्षिणां स्वबलस्य च ।
वर्ध॑ निशम्य गोविन्दरामविक्रीडितं परम् ॥
२६॥
दीर्घप्रजागरो भीतो दुर्निमित्तानि दुर्मति: ।
बहून्यचष्टो भयथा मृत्योदौत्यकराणि च ॥
२७॥
कंसः--कंस; तु--लेकिन; धनुष:--धनुष का; भड़म्--टूटना; रक्षिणाम्ू--रक्षकों का; स्व--अपने; बलस्य--सेना का; च--तथा; वधम्--मारा जाना; निशम्य--सुनकर; गोविन्द-राम--कृष्ण तथा राम का; विक्रीडितम्ू--खेलना; परम्--मात्र; दीर्घ--दीर्घकाल तक; प्रजागर:--जगा रहा; भीतः--डरा हुआ; दुर्निमित्तानि--अपशकुन; दुर्मति:--दुष्टबुद्ध्धि; बहूनि-- अनेक;अचष्ट--देखा; उभयथा--दोनों ही दशाओं ( जगते-सोते ) में; मृत्यो:--मृत्यु के; दौत्य-कराणि--दूतों को; च--तथा |
दूसरी ओर दुर्भति राजा कंस ने जब यह सुना कि किस तरह खेल की भान्ति कृष्ण तथाबलराम ने धनुष तोड़ डाला है और उसके रक्षकों तथा सैनिकों को मार डाला है, तो वहअत्यधिक भयभीत हो उठा।
वह काफी समय तक जागता रहा और जागते तथा सोते हुए उसनेमृत्यु के दूतों वाले कई अपशकुन देखे।
अदर्शनं स्वशिरस: प्रतिरूपे च सत्यपि ।
असत्यपि द्वितीये च द्वैरूप्यं ज्योतिषां तथा ॥
२८॥
छिद्रप्रतीतिश्छायायां प्राणघोषानुपश्रुति: ।
स्वर्णप्रतीतिर्वृक्षेषु स्वपदानामदर्शनम् ॥
२९॥
स्वप्ने प्रेतपरिष्वड्र: खरयानं विषादनम् ।
यायात्नलदमाल्येकस्तैला भ्यक्तो दिगम्बर: ॥
३०॥
अन्यानि चेत्थंभूतानि स्वप्जजागरितानि च ।
पश्यन्मरणसन्त्रस्तो निद्रां लेभे न चिन्तया ॥
३१॥
अदर्शनम्--न दिखाई पड़ना; स्व--अपना; शिरस:--सिर; प्रतिरूपे--परछाई में; च--तथा; सति--उपस्थित रहकर; अपि--भी; असति--नहीं होना; अपि-- भी; द्वितीये--दो-दो का कारण; च--त था; द्वै-रूप्यम्--दो प्रतिबिम्ब; ज्योतिषाम्--नक्षत्रोंके; तथा-- भी; छिद्गर--छेद का; प्रतीतिः--दिखना; छायायाम्-- अपनी छाया में; प्राण--अपनी प्राण-वायु की; घोष--अनुगूँज; अनुपश्रुति:--न सुनाई पड़ना; स्वर्ण--सुनहले रंग की; प्रतीति:--अनुभूति; वृक्षेषु--वृक्षों में; स्व-- अपना;पदानाम्-पदचिह्त; अदर्शनमू--न दिखना; स्वप्ने--सोते हुए; प्रेत-- भूत-प्रेतों से; परिष्वड़: --आलिंगित; खर--गधे पर;यानम्--सवारी करते; विष--जहर; अदनम्-- भक्षण करते; यायात्--जा रहा था; नलद--एक फूल, अडहुल; माली--मालापहने; एक:--कोई; तैल--तेल से; अभ्यक्त:--चपोड़े; दिक्ू-अम्बर:--नग्न; अन्यानि-- अन्य ( शकुन ); च--तथा; इत्थम्-भूतानि--इस तरह के; स्वप्न--सोते समय; जागरितानि--जगते हुए; च-- भी; पश्यन्--देखते हुए; मरण--मृत्यु से;सन्त्रस्त:-- भयभीत; निद्रामू--नींद; लेभे--प्राप्त कर सका; न--नहीं; चिन्तया--चिन्ता के कारण।
जब उसने अपनी परछाईं देखी तो उसमें उसे अपना सिर नहीं दिखा, अकारण ही चन्द्रमातथा तारे दो-दो लगने लगे; उसे अपनी छाया में छेद दिखा, उसे अपनी प्राण-वायु की ध्वनिसुनाई नहीं पड़ी, वृक्ष सुनहली आभा से प्रच्छन्न लगने लगे और वह अपने पदचिन्हों को न देखसका।
उसने स्वप्न में देखा कि भूत-प्रेत उसका आलिंगन कर रहे हैं, वह गधे पर सवार है औरविष पी रहा है।
यही नहीं, नलद ( अडहुल ) फूलों की माला पहने और तेल पोते एक नंगाव्यक्ति उधर से जा रहा है।
इन तथा अन्य ऐसे अपशकुनों को स्वप्न में तथा जागते हुए देखकरकंस अपनी मृत्यु की सम्भावना से भयभीत था और चिन्ता के कारण वह सो न सका।
व्यूष्टायां निशि कौरव्य सूर्ये चादभ्यः समुत्थिते ।
कारयामास वै कंसो मल्लक्रीडामहोत्सवम् ॥
३२॥
व्युष्टायामू--बीत जाने पर; निशि--रात; कौरव्य--हे कुरुवंशी ( परीक्षित ); सूर्य--सूर्य; च--तथा; अद्भ्य:--जल से;समुत्थिते--उदय होने पर; कारयाम् आस--पूरा कराया; बै--निस्सन्देह; कंसः--कंस; मल्ल--पहलवानों के; क्रीडा--खेल'का; महा-उत्सवम्--बहुत विशाल उत्सव।
जब अन्ततः रात बीत गई और सूर्य पुनः जल में से ऊपर निकला तो कंस विशाल कुश्ती-उत्सव ( दंगल ) का आयोजन करने लगा।
आनर्च: पुरुषा ऱडं तूर्यभेर्य श्र जघ्निरे ।
मज्जाश्नालड्डू ता: स्त्रग्भि: पताकाचैलतोरणै: ॥
३३॥
आनर्चु:--पूजा की; पुरुषा:--राजा के लोगों ने; रड्म्--रंगभूमि या शाला की; तूर्य--तुरही; भेय:--ढोल; च--तथा;जध्निरि--बजने लगे; मज्ञा: --देखने के मचान, चबूतरे; च--तथा; अलछड्डू ताः--सजाये गये थे; स्त्रग्भिः--मालाओं से;पताका--झंडियों से; चैल--वस्त्र के फीतों से; तोरणैः--द्वारों से, बन्दनवारों से |
राजा के लोगों ने मल्लस्थल ( दंगल ) की विधिवत् पूजा की, अपने ढोल तथा अन्य वाद्यबजाये और दर्शकदीर्घाओं को मालाओं, झंडियों, फीतों तथा बन्दनवारों से खूब सजाया गया।
तेषु पौरा जानपदा ब्रह्मक्षत्रपुरोगमा: ।
यथोपजोषं विविशू राजानश्चव॒ कृतासना: ॥
३४॥
तेषु--इन ( मंचों ) पर; पौरा:--नगरनिवासी; जानपदा: --आसपास से आये लोग; ब्रह्म--ब्राह्मणों; क्षत्र--श्षत्रियों के साथ;पुरः-गमाः --इत्यादि; यथा-उपजोषम्--सुविधानुसार; विविशु:--आकर बैठ गये; राजान:--राजागण; च-- भी; कृत--दियेगये; असना:--विशेष बैठने के स्थान।
नगरनिवासी तथा पड़ोसी जिलों के निवासी ब्राह्मण तथा क्षत्रियों इत्यादि के साथ आये औरदीर्घाओं में सुखपूर्वक बैठ गये।
राजसी अतिथियों को विशिष्ट स्थान दिये गये।
कंसः परिवृतो<मात्यै राजमञ्ञ उपाविशत् ।
मण्डलेश्वरमध्यस्थो हृदयेन विदूयता ॥
३५॥
कंसः--कंस; परिवृतः--घिरा हुआ; अमात्यै:--अपने मंत्रियों से; राज-मझ्ले--राजसी मंच पर; उपाविशति--बैठा; मण्डल-ईश्वर--विभिन्न मण्डलों के गौण शासक; मध्य--बीच में; स्थः:--स्थित; हृदयेन--हृदय से; विदूयता--थरथराता, काँपता |
अपने मंत्रियों से घि हुआ कंस अपने राजमंच पर आसीन हुआ।
किन्तु अपने विविधमण्डलेश्वरों के बीच में बैठे हुए भी उसका हृदय काँप रहा था।
वाद्यमानेसु तूर्येषु मल्लतालोत्तरेषु च ।
मल्लाः स्वलड्डू ताः दृप्ताः सोपाध्याया: समासत ॥
३६॥
वाह्यमानेषु--बजाये जाने पर; तूर्येषु--तुरही पर; मल्ल--कुश्ती के उपयुक्त; ताल--ताल, थाप; उत्तरेषु--प्रमुख; च--तथा;मल्ला:--पहलवान; सु-अलड्डू ता:--सुसज्जित; हप्ता:--गर्वित; स-उपाध्याया: --अपने अपने प्रशिक्षकों सहित; समासत--आकर बैठ गये।
जब कुश्ती के उपयुक्त ताल पर वाद्य यंत्र जोर जोर से बजने लगे तो खूब सजे गर्वीलेपहलवान अपने अपने प्रशिक्षकों समेत अखाड़े में प्रविष्ट हुए और बैठ गये।
चाणूरो मुष्टिक: कूतः शलस्तोशल एव च ।
त आसेदुरुपस्थानं वल्गुवाद्यप्रहर्षिता: ॥
३७॥
चाणूरः मुष्टिक: कूट:--चाणूर, मुष्टिक तथा कूट नामक पहलवान; शलः तोशल:--शल तथा तोशल; एवं च-- भी; ते--वे;आसेदु:--बैठ गये; उपस्थानमू-- अखाड़े की चटाई पर; वल्गु--मोहक; वाद्य--संगीत से; प्रहर्षिता:--हर्षित, उत्साहित |
आनंददायक संगीत से उललासित होकर चाणूर, मुपष्टिक, कूट, शल तथा तोशल अखाड़े कीचटाई पर बैठ गये।
नन्दगोपादयो गोपा भोजराजसमाहुता: ।
निवेदितोपायनास्त एकस्मिन्मञ्ञ आविशन् ॥
३८ ॥
नन्द-गोप-आदय: --नन्द गोप इत्यादि; गोपा:--ग्वाले; भोज-राज--कंस द्वारा; समाहुता:--आगे बुलाये जाने पर; निवेदित--प्रस्तुत करते हुए; उपायना:--अपनी भेंटें; ते--वे; एकस्मिन्--एक; मज्ले--दर्शक दीर्घा में; आविशन्--बैठ गये ।
भोजराज ( कंस ) द्वारा बुलाये जाने पर नंद महाराज तथा अन्य ग्वालों ने उसे अपनी अपनीभेंटें पेश कीं और तब वे एक दीर्घा में जाकर बैठ गये।
