← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची

अध्याय इकतालीसवाँ: कृष्ण और बलराम मथुरा में प्रवेश करते हैं

10.41श्रीशुक उवाचस्तुवतस्तस्य भगवान्दर्शयित्वा जले वपु: ।

भूयः समाहरत्कृष्णो नटो नाट्यमिवात्मनः ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; स्तुवतः--स्तुति करते समय; तस्य--अक्रूर का; भगवान्‌-- भगवान्‌ ने;दर्शयित्वा--दिखलाने के बाद; जले--जल में; वपु:--अपना साकार रूप; भूय:--फिर; समाहरत्‌--छिपा लिया; कृष्ण:--श्रीकृष्ण ने; नट:--अभिनेता; नाट्यमू--नाटक, प्रदर्शन; इब--सद्ृश; आत्मन:--अपना।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : अभी अक्रूर स्तुति कर ही रहे थे कि भगवान्‌ कृष्ण ने अपनावह रूप जिसे उन्होंने जल के भीतर प्रकट किया था, उसी तरह छिपा लिया जिस तरह कोई नटअपना खेल समाप्त कर देता है।

सोडपि चान्तर्हितं वीक्ष्य जलादुन्मज्य सत्वर: ।

कृत्वा चावश्यकं सर्व विस्मितो रथमागमत्‌ ॥

२॥

सः--वह, अक्रूर; अपि--निस्सन्देह; च--तथा; अन्तर्हितम्‌--अप्रकट हुआ; वीक्ष्य--देखकर; जलातू्‌--जल से; उन्मज्य--निकल कर; सत्वर:--तुरन्त; कृत्वा--पूरा करके; च--तथा; आवश्यकमू्‌--नियतकर्म ; सर्वम्‌ू--समस्त; विस्मित:--चकित;रथम्‌--रथ के पास; आगमत्‌-गया

जब अक्रूर ने उस दृश्य को अन्तर्धान होते देखा तो वे जल के बाहर आ गये और उन्होंनेजल्दी जल्दी अपने विविध अनुष्टान-कर्म सम्पन्न किये।

तत्पश्चात्‌ वे विस्मित होकर अपने रथ परलौट आये।

तमपृच्छद्धृषीकेश: किं ते दृष्टमिवाद्भधुतम्‌ ।

भूमौ वियति तोये वा तथा त्वां लक्षयामहे ॥

३॥

तम्‌--उससे; अपृच्छत्‌--पूछा; हषीक्श:--कृष्ण ने; किम्‌--क्या; ते--तुम्हारे द्वारा; दृष्टमू--देखा गया; इब--निस्सन्देह;अद्भुतमू--कुछ असाधारण; भूमौ--पृथ्वी पर; वियति--आकाश में; तोये--जल में; ब--अथवा; तथा--उसी तरह; त्वामू--तुमको; लक्षयामहे--हम अटकल लगाते हैं |

भगवान्‌ कृष्ण ने अक्रूर से पूछा: क्‍या आपने पृथ्वी पर, या आकाश में या जल में कोईअदभुत वस्तु देखी है? आपकी सूरत से हमें लगता है कि आपने देखी है।

श्रीअक्रूर उवाचअद्भुतानीह यावन्ति भूमौ वियति वा जले ।

त्वयि विश्वात्मके तानि किं मेदृष्ट विपश्यतः ॥

४॥

श्री-अक्रूरः उवाच-- श्री अक्रूर ने कहा; अद्भुतानि--अद्भुत वस्तुएँ; इह--इस लोक में; यावन्ति--जितनी भी; भूमौ--पृथ्वीपर; वियति--आकाश में; वा--अथवा; जले--जल में; त्वयि--तुम में; विश्व-आत्मके --हरवस्तु से युक्त; तानि--वे; किमू--क्या; मे--मेरे द्वारा; अदृष्टमू--नहीं देखा गया; विपश्यतः--आपको देखकर।

श्री अक्रूर ने कहा : पृथ्वी, आकाश या जल में जो भी अद्भुत वस्तुएँ हैं, वे सभी आपकमेंविद्यमान हैं।

चूँकि आप हर वस्तु से ओतप्रोत हैं अतः जब मैं आपका दर्शन कर रहा हूँ तो फिरवह कौन सी वस्तु है, जिसे मैंने नहीं देखा है ?

यत्राद्भधुतानि सर्वाणि भूमौ वियति वा जले ।

त॑ त्वानुपश्यतो ब्रह्मन्कि मे दृष्टमिहाद्भधुतम्‌ ॥

५॥

यत्र--जिसमें; अद्भुतानि-- अद्भुत वस्तुएँ; सर्वाणि--समस्त; भूमौ--पृथ्वी पर; वियति--आकाश में; वा-- अथवा; जले--जल में; तम्‌--उस; त्वा--तुमको; अनुपश्यत:--देखते हुए; ब्रह्मनू--हे परम सत्य; किम्‌ू--क्या; मे--मेरे द्वारा; दृष्टम्‌ू--देखागया; इह--इस संसार में; अद्भुतम्‌-- आश्चर्यजनक ।

और अब जबकि हे परम सत्य, मैं आपको देख रहा हूँ जिनमें पृथ्वी, आकाश तथा जल कीसारी अद्भुत वस्तुएँ निवास करती हैं, तो फिर भला मैं इस जगत में और कौन सी अद्भुत्‌ वस्तुएँदेख सकता था?

इत्युक्त्वा चोदयामास स्यन्दनं गान्दिनीसुतः ।

मथुरामनयद्रामं कृष्णं चैव दिनात्यये ॥

६॥

इति--इस प्रकार; उक्त्वा--कहकर; चोदयाम्‌ आस--आगे हाँका; स्यन्दनम्‌--रथ को; गान्दिनी-सुत:--गान्दिनी पुत्र, अक्रूरने; मथुरामू--मथुरा में; अनयत्‌--ले आया; रामम्‌--बलराम को; कृष्णम्‌--कृष्ण को; च--तथा; एव-- भी; दिन--दिन के;अत्यये--समाप्त होते |

इन शब्दों के साथ गान्दिनीपुत्र अक्रूर ने रथ आगे हाँकना शुरू कर दिया।

दिन ढलते ढलतेवे भगवान्‌ बलराम तथा भगवान्‌ कृष्ण को लेकर मथुरा जा पहुँचे।

मार्गे ग्रामजना राजंस्तत्र तत्रोपसड्भता: ।

वसुदेवसुतौ वीक्ष्य प्रीता दृष्टि न चाददु: ॥

७॥

मार्गे--रास्ते में; ग्राम--गाँवों के; जना:--लोग; राजनू्‌--हे राजा ( परीक्षित ); तत्र तत्र--जहाँ तहाँ; उपसड्डता:--पास आकर;वसुदेव-सुतौ--वसुदेव के दोनों पुत्रों को; वीक्ष्य--देखकर; प्रीता:--प्रसन्न; दृष्टिमू--दृष्टि; न--नहीं; च--तथा; आददुः--हटापाते

हे राजन्‌, वे मार्ग में जहाँ जहाँ से गुजरते, गाँव के लोग पास आकर वसुदेव के इन दोनोंपुत्रों को बड़े ही हर्ष से निहारते।

वस्तुत: ग्रामीणजन उनसे अपनी दृष्टि हटा नहीं पाते थे।

तावद्ब्रजौकसस्तत्र नन्दगोपादयोग्रतः ।

पुरोपवनमासाद्य प्रतीक्षन्तोवतस्थिरे ॥

८॥

तावत्‌ू--तब तक; ब्रज-ओकस:--ब्रजवासी; तत्र-- वहाँ; नन्द-गोप-आदय: --ग्वालों के राजा नन्द इत्यादि; अग्रत:--आगेआगे; पुर--नगर के; उपवनम्‌--उद्यान में; आसाद्य--आकर; प्रतीक्षन्त:ः--प्रतीक्षा में; अवतस्थिरे--रुके रहे ।

नन्द महाराज तथा वृन्दावन के अन्य वासी रथ से पहले ही मथुरा पहुँच गये थे और कृष्णतथा बलराम की प्रतीक्षा करने के लिए नगर के बाहरी उद्यान में रुके हुए थे।

तान्समेत्याह भगवानक्रूरं जगदी श्र: ।

गृहीत्वा पाणिना पाएं प्रश्नितं प्रहसन्निव ॥

९॥

तान्‌ू--उनके साथ; समेत्य--मिलकर; आह--कहा; भगवान्‌-- भगवान्‌ ने; अक्रूरम्‌--अक्रूर से; जगतू-ईश्वरः --ब्रह्माण्ड केस्वामी; गृहीत्वा--पकड़ कर; पाणिना--अपने हाथ से; पाणिम्‌--उसके हाथ को; प्रश्नितम्‌ू--विनीत; प्रहसन्‌--हँसते हुए;इब--सहश।

नन्द तथा अन्य लोगों से मिलने के बाद ब्रह्माण्ड के नियन्ता भगवान्‌ कृष्ण ने विनीत अक्रूरके हाथ को अपने हाथ में लेकर हँसते हुए इस प्रकार कहा।

भवान्प्रविशतामग्रे सहयान: पुरी गृहम्‌ ।

वबयं त्विहावमुच्याथ ततो द्रक्ष्यामहे पुरीम्‌ू ॥

१०॥

भवान्‌--आप; प्रविशताम्‌--प्रवेश करें; अग्रे-- आगे; सह--साथ में; यान:--रथ में; पुरीम्‌--नगर में; गृहम्‌ू--तथा अपने घरमें; वयम्‌--हम; तु--तो; इह--यहाँ; अवमुच्य--उतर कर; अथ--तब; ततः--तत्पश्चात्‌ द्रक्ष्यामहे--देखेंगे; पुरीम्‌--नगरीको

भगवान्‌ कृष्ण ने कहा आप रथ लेकर हमसे पहले नगरी में प्रवेश करें।

तत्पश्चात्‌ आपअपने घर जाँय।

हम यहाँ पर कुछ समय तक ठहर कर बाद में नगरी देखने जायेंगे।

श्रीअक्रूर उवाचनाहं भवदभ्यां रहितः प्रवेक्ष्ये मथुरां प्रभो ।

त्यक्तु नाहसि मां नाथ भक्त ते भक्तवत्सल ॥

११॥

श्री-अक्रूर: उवाच-- श्री अक्रूर ने कहा; न--नहीं; अहम्‌--मैं; भवद्भ्याम्‌--आप दोनों के ; रहित:--बिना; प्रवेक्ष्ये--प्रवेशकरूँगा; मथुरामू--मथुरा में; प्रभो--हे प्रभु; त्यक्तुमू--परित्याग करना; न अहसि--आपको नहीं चाहिए; माम्‌ू--मुझ; नाथ--हेनाथ; भक्तम्‌-भक्त को; ते--तुम्हारा; भक्त-वत्सल--अपने भक्तों पर पितृवत्‌ स्नेह रखने वाले |

श्री अक्रूर ने कहा : हे प्रभु, मैं आप दोनों के बिना मथुरा में प्रवेश नहीं करूँगा।

हे नाथ, मैंआपका भक्त हूँ अतः यह उच्चित नहीं होगा कि आप मेरा परित्याग कर दें क्योंकि आप अपनेभक्तों के प्रति सदैव वत्सल रहते हैं।

आगच्छ याम गेहान्न: सनाथान्कुर्वधोक्षज ।

सहाग्रज: सगोपालै: सुहद्धिश्व सुहत्तम ॥

१२॥

आगच्छ--कृपया आइये; याम--चलें; गेहान्‌--घर; नः--हमारे; स--सहित; नाथान्‌-- स्वामी; कुरु--कीजिये; अधोक्षज--हेदिव्य प्रभु; सह--साथ; अग्र-ज:--अपने बड़े भाई; स-गोपालैः--ग्वालों के साथ; सुहद्धिः--अपने मित्रों के साथ; च--तथा;सुहत्‌-तम--

हे परम शुभचिन्तक आइये, आप अपने बड़े भाई, ग्वालों तथा अपने संगियों समेत मेरे घर चलिये।

हे मित्रश्रेष्ठ,हे दिव्य प्रभु, इस तरह कृपया मेरे घर को कृतार्थ कीजिये।

पुनीहि पादरजसा गृहान्नो गृहमेधिनाम्‌ ।

यच्छौचेनानुतृप्यन्ति पितर: साग्नय: सुरा: ॥

१३॥

पुनीहि--पवित्र कीजिये; पाद--अपने पाँवों की; रजसा-- धूल से; गृहान्‌ू--घर को; नः--हमारे; गृह-मेधिनाम्‌--जो गृहस्थों केद्वारा किये जाने वाले अनुष्ठानों में आसक्त हैं; यत्‌--जिससे; शौचेन--शुद्धि से; अनुतृप्यन्ति--तुष्ट हो जायेंगे; पितर: --मेरेपितृगण; स--सहित; अग्नयः--यज्ञ की अग्नियाँ; सुरा:--तथा देवता।

मैं एक सामान्य गृहस्थ हूँ और विधिवत्‌ यज्ञों का पालन करने वाला हूँ।

अतः आप अपनेचरणकमलों की धूलि से मेरे घर को पवित्र कीजिये।

इस शुद्धि कर्म से मेरे पितर, यज्ञ-अग्नियाँतथा सारे देवता तुष्ट हो जायेंगे।

अवनिज्याड्प्रियुगलमासीत्शलोक्यो बलिमैहान्‌ ।

ऐश्वर्यमतुलं लेभे गतिं चैकान्तिनां तु या ॥

१४॥

अवनिज्य--पखार करके; अद्भघ्रि-युगलम्‌--दोनों पाँव; आसीत्‌--बन गया; एलोक्य: --यशस्वी; बलि:--राजा बलि;महान्‌ू-महान; ऐश्वर्यम्‌-शक्ति; अतुलमू--अनुपम; लेभे--प्राप्त किया; गतीम्‌--लक्ष्य; च--तथा; एकान्तिनाम्‌-- भगवान्‌ केअनन्य भक्तों के; तु--निस्सन्देह; या--जो

आपके चरणों को पखार कर यशस्वी बलि महाराज ने न केवल यश तथा अनुपम शक्तिप्राप्त की अपितु शुद्धभक्तों की अन्तिम गति भी प्राप्त की।

आपस्तेड्ठयवनेजन्यस्त्रीललोकान्शुचयो उपुनन्‌ ।

शिरसाधत्त याः जर्वः स्वर्याता: सगरात्मजा: ॥

१५॥

आपः--जल ( यथा गंगा नदी ); ते--तुम्हारे; अड्पघ्रि--पाँवों के; अवनेजन्य: --पखारने से प्राप्त; त्रीन्‌--तीनों; लोकानू--लोकों को; शुच्यय:--नितान्त आध्यात्मिक होने से; अपुनन्‌--पवित्र बना दिया है; शिरसा--सिर पर; आधत्त--धारण करलिया; या: --जिसे; शर्व:--शिव ने; स्व:--स्वर्ग को; याता:--गये; सगर-आत्मजा:--राजा सगर के पुत्र

आपके चरणों के पखारने से दिव्य होकर गंगा नदी के जल ने तीनों लोकों को पवित्र बनादिया है।

शिवजी ने उसी जल को अपने शिर पर धारण किया और उसी जल की कृपा से राजासगर के पुत्र स्वर्ग गये।

देवदेव जगन्नाथ पुण्यश्रवणकीर्तन ।

यदूत्तमोत्तम:शलोक नारायण नमोउस्तु ते ॥

१६॥

देव-देव--हे स्वामियों के स्वामी; जगत्‌-नाथ--हे ब्रह्माण्ड के स्वामी; पुण्य--पवित्र; श्रवण--सुनना; कीर्तन--तथा कीर्तनकरना; यदु-उत्तम--यदुश्रेष्ठ; उत्तम:-शलोक--उत्तम एलोकों से स्तुति किये जाने वाले; नारायण--हे नारायण; नम:ः--नमस्कार; अस्तु--होवे; ते--आपको |

हे देवों के देव, हे जगन्नाथ, हे आप जिनके यश को सुनना और गायन करना अत्यन्त पवित्र।

है! हे यदुश्रेष्ठ, हे पुण्यश्लोक, हे परम भगवान्‌ नारायण, मैं आपको नमस्कार करता हूँ।

श्रीभगवनुवाचआयास्ये भवतो गेहमहमर्यसमन्वितः ।

यदुचक्रद्गुहं हत्वा वितरिष्ये सुहृत्प्रियम्‌ ॥

१७॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; आयास्ये-- आऊँगा; भवत:ः--आपके; गेहम्‌--घर; अहम्‌--मैं; आर्य--अपने अग्रज( बलराम ); समन्वित:--सहित; यदु-चक्र --यदुओं के चक्र ( मंडल ) के; द्रहम्‌--शत्रु ( कंस ) को; हत्वा--मारकर;वितरिष्ये-- प्रदान करूँगा; सुहत्‌--अपने शुभचिन्तकों को; प्रियम्‌--सन्तोष |

परमेश्वर ने कहा : मैं अपने बड़े भाई के साथ आपके घर आऊँगा किन्तु पहले मुझे यदु जातिके शत्रु को मारकर अपने मित्रों तथा शुभचिन्तकों को तुष्ट करना है।

श्रीशुक उवाचएवमुक्तो भगवता सोक्रूरो विमना इव ।

पुरी प्रविष्ट: कंसाय कर्मावेद्य गृह ययौ ॥

१८ ॥

श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; उक्त: --सम्बोधित करने पर; भगवता-- भगवान्‌ द्वारा; सः--उस; अक्रूरः:--अक्रूर ने; विमना:--निराश; इब--सहश; पुरीम्‌--नगर मे; प्रविष्ट:--प्रवेश किया; कंसाय--कंस को; कर्म--कार्यकलापों के विषय में; आवेद्य--सूचित करके; गृहम्‌-- अपने घर; ययौ--चला गया।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : भगवान्‌ द्वारा ऐसे सम्बोधित किये जाने पर अक्रूर भारी मन सेनगर में प्रविष्ट हुए।

उन्होंने राजा कंस को अपने ध्येय की सफलता से सूचित किया और तब वेअपने घर चले गये।

अथापराह्ने भगवान्कृष्ण: सट्डर्षणान्वित: ।

मथुरां प्राविशद्गोपैर्दिहक्षु:ः परिवारित: ॥

१९॥

अथ--तब; अपर-अद्वि--तीसरे पहर, दोपहर के बाद; भगवान्‌-- भगवान्‌; कृष्ण: --कृष्ण ने; सद्डभूर्षण-अन्बित:--बलरामसहित; मथुराम्‌--मथुरा में; प्राविशत्‌-- प्रवेश किया; गोपै:--ग्वालबालों द्वारा; दिदृक्षु:--देखने की इच्छा वाले; परिवारित:--घिरे हुए |

भगवान्‌ कृष्ण मथुरा देखना चाहते थे अतः संध्या समय अपने साथ बलराम तथाग्वालबालों को लेकर उन्होंने नगर में प्रवेश किया।

ददर्श तां स्फाटिकतुड्रगोपुर-द्वारां बृहद्वेमकपाटतोरणाम्‌ ।

ताम्रारकोष्ठां परिखादुरासदा-मुद्यानरम्योपवनोपशोभिताम्‌ ॥

२०॥

सौवर्णश्रुड्राटकहर्म्यनिष्कुटै:श्रेणीसभाभिर्भवनैरुपस्कृताम्‌ ।

बैदूर्यवज्ञामलनीलविद्ुमै-मुक्ताहरिद्धिर्वलभीषु वेदिषु ॥

२१॥

जुष्टेचु जालामुखरन्श्रकुट्टिमे-ष्वाविष्टपारावतबर्हिनादिताम्‌ ।

संसिक्तरथ्यापणमार्गचत्वरांप्रकीर्णमाल्याड्डु रलाजतण्डुलाम्‌ ॥

२२॥

आपूर्णकुम्भेर्दधिचन्दनो क्षितैःप्रसूनदीपावलिभि: सपल्‍लवबै: ।

सवृन्दरम्भाक्रमुकैः सकेतुभिःस्वलड्डू तद्वारगृहां सपट्टिके: ॥

२३॥

दरदर्श--देखा; ताम्‌--उस ( नगरी ) को; स्फाटिक--स्फटिक से बने; तुड़--ऊँचा; गोपुर--मुख्य द्वार; द्वारामू-घरों केदरवाजे; बृहत्‌--विशाल; हेम--स्वर्ण; कपाट--किंवाड़; तोरणामू--तथा सजावटी मेहराब; ताप्र--ताँबे; आर--तथा पीतलके; कोष्ठाम्‌-- भंडारघर; परिखा--खाइयों समेत; दुरासदाम्‌--दुल॑ध्य; उद्यान--सार्वजनिक बगीचे; रम्य--आकर्षक; उपवन--तथा उपवन; उपशोभिताम्‌--सजाये गये; सौवर्ण--सोना; श्रुड़्ाटक--चौराहे; हर्म्य--अन्तःपुर, महल; निष्कुटैः--तथा आरामउद्यानों से; श्रेणी--व्यापारियों के; सभाभि:--सभाभवनों से; भवनैः--तथा घरों से; उपस्कृताम्‌--अलंकृत; बैदूर्य --वैदूर्यमणियों से; वज़्॒--हीरा; अमल--खेदार क्वार्ट्ज ( स्फटिक ); नील--नीलमों; विद्रुमैः --तथा मूँगों से; मुक्ता--मोतियों;हरिद्धिः--तथा हरितमणि से; वलभीषु--घरों के दरवाजों पर; वेदिषु--स्तम्भयुक्त छज्जों पर; जुष्टेपु--खचित; जाल-आमुख--जालीदार खिड़कियों के; रन्ध्च--छेदों में; कुट्टिमेषु--तथा रत्नजड़ित फर्श पर; आविष्ट--बैठकर; पारावत--पालतू कबूतरों;बहि--तथा मोरों से; नादितामू--प्रतिध्वनित; संसिक्त--जल से छिड़की हुईं; रथ्या--राजसी गलियों; आपण--व्यापारिक मार्गोंसे; मार्ग--तथा अन्य सड़कों; चत्वरामू--तथा आँगन या चौतरा; प्रकीर्ण--बिखरे हुए; माल्य-- फूल की मालाओं से;अह्'ु र--नवीन कोपलें; लाज--लावा; तण्डुलामू--तथा चावल; आपूर्ण--पूर्ण; कुम्भैः--घड़ों से; दधि--दही से; चन्दन--तथा चन्दनलेप से; उक्षितैः--लेप किया; प्रसून--फूलों की पंखड़ियों से; दीप-आवलिभि:--दीपों की पंक्तियों से; स-पल्‍लबै:--पत्तियों सहित; स-वृन्द--फूलों के गुच्छों सहित; रम्भा--केला के तनों से; क्रमुकैः--तथा सुपाड़ी के वृक्ष के तनोंसे; स-केतुभिः--झंडों से; सु-अलड्डू त--सुन्दर सजाया हुआ; द्वार-द्वारों से युक्त; गृहाम्‌-घरों को; स-पट्डिकैः--पत्नियों से

हे गवानू ने देखा कि मथुरा के ऊँचे ऊँचे दरवाजे तथा घरों के प्रवेशद्वार स्फटिक के बने हैं,इसके विशाल तोरण तथा मुख्य द्वार सोने के हैं, इसके अन्न गोदाम तथा अन्य भण्डार ताँबे तथापीतल के बने हैं और इसकी परिखा ( खाईं ) अप्रवेश्य है।

मनोहर उद्यान तथा उपवन इस शहरकी शोभा बढ़ा रहे थे।

मुख्य चौराहे सोने से बनाये गये थे और इसकी इमारतों के साथ निजीविश्राम-उद्यान थे, साथ ही व्यापारिकों के सभाभवन तथा अन्य अनेक इमारतें थीं।

मथुरा उनमोर तथा पालतू कबूतरों की बोलियों से गूँज रहा था, जो जालीदार खिड़कियों के छेदों पर,रत्नजटित फर्शों पर तथा ख भेदार छज्जों और घरों के सामने के सज्जित धरनों पर बैठे थे।

येछज्जे तथा धरने बैदूर्य मणियों, हीरों, स्फटिकों, नीलमों, मूँगों, मोतियों तथा हरित मणियों सेसजाये गये थे।

समस्त राजमार्गों तथा व्यापारिक गलियों में जल का छिड़काव हुआ था।

इसीतरह पार्श्गनलियों तथा चबूतरों को भी सींचा गया था।

सर्वत्र फूल मालाएँ, नव अंकुरित जौ,लावा तथा अक्षत बिखेरे हुए थे।

घरों के दरवाजों के प्रवेशमार्ग पर जल से भरे सुसज्जित घड़ेशोभा दे रहे थे जिन्हें आम की पत्तियों से अलंकृत किया गया था और दही तथा चन्दनलेप सेपोता गया था।

उनके चारों ओर फूल की पंखड़ियाँ तथा फीते लपेटे हुए थे।

इन घड़ों के पासझंडियाँ, दीपों की पंक्ति, फूलों के गुच्छे, केलों के तथा सुपारी के वृशक्षों के तने थे।

तां सम्प्रविष्टी वसुदेवनन्दनौवृतौ वयस्यैर्नरदेववर्त्मना ।

द्रष्ठू समीयुस्त्वरिता: पुरस्त्रियो हर्म्याणि चैवारुरुहुनृपोत्सुका: ॥

२४॥

तामू--उस ( मथुरा में ); सम्प्रविष्टी--घुसकर; वसुदेव--वसुदेव के; नन्दनौ--दोनों पुत्र; वृतौ--घिरे हुए; वयस्यैः--अपने तरुणमित्रों से; नर-देव--राजा की; वर्त्मना--सड़क से; द्रष्टम

--देखने के लिए; समीयु;:--निकल आईं; त्वरिता:--तेजी से; पुर--नगर की; स्त्रियः -स्त्रियाँ; हर्म्याणि-- अपने अपने घरों पर; च--तथा; एव-- भी; आरुरुहु:--ऊपर चढ़ गईं; नृप--हे राजा( परीक्षित ); उत्सुका:--उत्सुक ।

मथुरा की स्त्रियाँ जल्दी-जल्दी एकत्र हुईं और ज्योंही वसुदेव के दोनों पुत्र अपने ग्वाल-बालमित्रों से घिरे हुए राजमार्ग द्वारा नगर में प्रविष्ट हुए वे उन्हें देखने निकल आईं।

हे राजन, कुछस्त्रियाँ उन्हें देखने की उत्सुकता से अपने घरों की छतों पर चढ़ गईं।

काश्िद्ठिपर्यग्धृतवस्त्रभूषणाविस्मृत्य चैक॑ युगलेष्वथापरा: ।

कृतैकपत्रश्रवनैकनूपुरानाड्क्‍्त्वा द्वितीयं त्वपराश्न लोचनम्‌ ॥

२५॥

कश्चित्‌--उनमें से कुछ; विपर्यक्‌--उल्टा; धृत--पहन कर; बस्त्र--अपने वस्त्र; भूषण:--तथा गहने; विस्मृत्य-- भूल कर;च--तथा; एकम्‌--एक; युगलेषु--जोड़ी की; अथ--तथा; अपरा: --अन्य; कृत-- धारण करके; एक--केवल एक; पत्र--कुंडल; श्रवण--कान में; एक--या एक; नूपुराः--नूपुरों की जोड़ी; न अड्क्त्वा--बिना आँजे; द्वितीयम्‌--दूसरी; तु--लेकिन; अपराः:--अन्य स्त्रियाँ; च--तथा; लोचनमू--एक आँख ।

कुछ स्त्रियों ने अपने वस्त्र तथा गहने उल्टे पहन लिये, कुछ अपना एक कुंडल या पायलपहनना भूल गईं और अन्यों ने केवल एक आँख में अंजन लगाया, दूसरी में लगा ही न पाईं।

अश्नन्त्य एकास्तदपास्थ सोत्सवाअभ्यज्यमाना अकृतोपमज्ना: ॥

स्वपन्त्य उत्थाय निशम्य निःस्वनंप्रपाययन्त्यो भमपोह्य मातर: ॥

२६॥

अएनन्त्य:--भोजन कर रहीं; एक:--कुछ; तत्‌--उसे; अपास्य--छोड़कर; स-उत्सव: --हर्षपूर्वक; अभ्यज्यमाना: --मालिशकी जाती; अकृत--बिना पूरा किये; उपमज्जना: --अपना स्नान करना; स्वपन्त्य:--सोती हुईं; उत्थाय--उठकर; निशम्य--सुनकर; निःस्वनम्‌--तेज आवाजें; प्रपाययन्त्य:--दूध पिलाती; अर्भम्‌--अपने बच्चे को; अपोह्म--एक तरफ रखकर;मातरः--माताएँ।

जो भोजन कर रही थीं उन्होंने भोजन करना छोड़ दिया, अन्य स्त्रियाँ अधनहाई या उबटन पूरी तरह लगाये बिना ही चली आईं।

जो स्त्रियाँ सो रही थीं वे शोर सुनकर तुरन्त उठ गई औरमाताओं ने दूध पीते बच्चों को अपनी गोदों से उतारकर अलग रख दिया।

मनांसि तासामरविन्दलोचन:प्रगल्भलीलाहसितावलोकै: ।

जहार मत्तद्विरदेन्द्रविक्रमोहशां ददच्छीरमणात्मनोत्सवम्‌ ॥

२७॥

मनांसि--मन; तासाम्‌--उनके; अरविन्द--कमल जैसे; लोचन:--आँखें; प्रगल्भ--उद्धत; लीला--अपनी लीलाएँ; हसित--हँसते हुए; अवलोकै:--चितवनों से; जहार--हर लिया; मत्त--मतवाली; द्विरद-इन्द्र--शाही हाथी ( जैसी ); विक्रम: --चाल;इहशाम्‌ू--उनकी आँखों के लिए; ददत्‌--देते हुए; श्री--लक्ष्मी की; रमण-- आनन्द स्त्रोत; आत्मना--अपने शरीर से; उत्सवम्‌--उत्सव

अपनी साहसिक लीलाओं का स्मरण करके मुसकाते हुए कमल-नेत्रों वाले भगवान्‌ नेअपनी चितवतनों से स्त्रियों के मनों को मोह लिया।

वे शाही हाथी की तरह मतवाली चाल सेअपने दिव्य शरीर से उन स्त्रियों के नेत्रों के लिए उत्सव उत्पन्न करते हुए चल रहे थे।

उनका यहशरीर दिव्य देवी लक्ष्मी के लिए आनन्द का स्त्रोत है।

इष्टा मुहुः श्रुतमनुद्रुतचेतसस्तंतप्प्रेक्षणोत्स्मितसु धोक्षणलब्धमाना: ।

आनन्दमूर्तिमुपगुहा दशात्मलब्धंहृष्यत्त्तचो जहुरनन्तमरिन्दमाधिम्‌ ॥

२८ ॥

इद्ला--देखकर; मुहुः--बारम्बार; श्रुतम्‌--सुना गया; अनुद्गुत--पिघले हुए; चेतस:--हृदय; तम्‌ू--उसको; तत्‌-- उसकी;प्रेक्षण--चितवनों के; उत्‌-स्मित--तथा अट्वहास; सुधा--अमृत; उक्षण--छिड़कने से; लब्ध--प्राप्त करके; माना: --सम्मान;आनन्द-- आनन्द की; मूर्तिमु--साकार रूप को; उपगुह्ा--आलिंगन करके; दहशा--आँखों से होकर; आत्म--अपने भीतर;लब्धम्‌--प्राप्त किया गया; हृष्यत्‌--फूटकर; त्वच:--उनकी चमड़ी; जहुः--त्याग दिया; अनन्तम्‌--असीम; अरिम्‌-दम--हेशत्रुओं के दमनकर्ता ( परीक्षित ); आधिम्‌--मानसिक क्लेश।

मथुरा की स्त्रियों ने कृष्ण के विषय में बारम्बार सुन रखा था अतः उनका दर्शन पाते हीउनके हृदय द्रवित हो उठे ।

वे अपने को सम्मानित अनुभव कर रही थीं कि कृष्ण ने उन पर अपनीचितवन तथा हँसी रूपी अमृत का छिड़काव किया है।

अपने नेत्रों के द्वारा उन्हें अपने हृदयों मेंग्रहण करके उन सबों ने समस्त आनन्द की मूर्ति का आलिंगन किया और हे अरिन्दम! ज्योंहीउन्हें रोमांच हो आया वे उनकी अनुपस्थिति से जन्य असीम कष्ट को भूल गईं।

प्रासादशिखरारूढा: प्रीत्युत्फुल्लमुखाम्बुजा: ।

अभ्यवर्षन्सौमनस्यै: प्रमदा बलकेशवौ ॥

२९॥

प्रासाद--महलों की; शिखर--छतों पर; आरूढा: --चढ़कर; प्रीति--स्नेह से; उत्फुल्ल--खिले हुए; मुख--मुँह; अम्बुजा:--जो कमलों जैसे थे; अभ्यवर्षन्‌--वर्षा की; सौमनस्यैः--फूलों से; प्रमदा:--सुन्दर स्त्रियों ने; बल-केशवौ--बलराम तथा कृष्णपर

स्नेह से प्रफुल्लित कमल सहश मुखों वाली स्त्रियों ने जो अपने महलों की छतों पर चढ़ी हुईथीं, भगवान्‌ बलराम तथा भगवान्‌ कृष्ण पर फूलों की वर्षा की।

दध्यक्षतैः सोदपात्रै: स्रग्गन्धैरभ्युपायने: ।

तावानर्चुः प्रमुदितास्तत्र तत्र द्विजातय: ॥

३०॥

दधि--दही; अक्षतैः--तथा अखण्डित जौ के बीजों से; स--तथा; उद-पात्रै:--जल से पूरित घड़ों से; स्रकू--मालाओं;गन्धैः--तथा सुगन्धित द्रव्यों से; अभ्युपायनै:--पूजा की अन्य सामग्री से; तौ--दोनों ने; आनर्चु:--पूजा की; प्रमुदिता:--प्रसन्नचित्त; तत्र तत्र--विभिन्न स्थानों पर; द्वि-जातय:--ब्राह्मणों ने |

रास्ते के किनारे खड़े ब्राह्मणों ने दही, अक्षत ( जौ ), जल-भरे कलशों, फूल-मालाओंसुगन्धित द्र॒व्यों यथा चन्दन के लेप तथा पूजा की अन्य वस्तुओं की भेंटों से दोनों भाइयों कासम्मान किया।

ऊचु: पौरा अहो गोप्यस्तप: किमचरन्महत्‌ ।

या होतावनुपश्यन्ति नरलोकमहोत्सवी ॥

३१॥

ऊचु:--कहा; पौरा:--नगर की स्त्रियों ने; अहो--हाय; गोप्य: --( वृन्दावन की ) गोपियों ने; तप:--तपस्या; किमू--कौन-सी;अचरनू--की है; महत्‌--महान; या: --जो; हि--निस्सन्देह; एतौ--इन दोनों को; अनुपश्यन्ति--निरन्तर देखती हैं; नर-लोक--मानव-समाज के लिए; महा-उत्सवौ--आनन्द के महान्‌ स्त्रोत हैं।

मथुरा की स्त्रियाँ चिल्ला पड़ीं: अहा! समस्त मानव-जाति को अत्यन्त आनन्द प्रदान करनेवाले कृष्ण तथा बलराम को निरन्तर देखते रहने के लिए गोपियों ने कौन-सी कठोर तपस्याएँकी होंगी ?

रजकं कद्ञिदायान्तं रड़कारं गदाग्रज: ।

इृष्टायाचत वासांसि धौतान्यत्युत्तमानि च ॥

३२॥

रजकमू--धोबी को; कश्जित्‌--किसी; आयान्तम्‌--आते हुए; रड्र-कारम्‌--रँगाई करने वाले को; गद-अग्रज:--गद के बड़ेभाई कृष्ण ने; हृष्ठा--देखकर; अयाचत--याचना की; वासांसि--वस्त्रों की; धौतानि-- धुले; अति-उत्तमानि--अत्युत्तम; च--तथा।

कपड़ा रँगने वाले एक धोबी को अपनी ओर आते देखकर कृष्ण ने उससे उत्तमोत्तम धुलेवस्त्र माँगे।

देह्यावयो: समुचितान्यड्र वासांसि चाईतो: ।

भविष्यति परं श्रेयो दातुस्ते नात्र संशय: ॥

३३॥

देहि--दो; आवयो: --हम दोनों को; समुचितानि--उपयुक्त; अड्र--हे प्रिय; वासांसि--वस्त्र; च--तथा; अर्हईतोः--दोनों सुपात्रोंको; भविष्यति--होगा; परम्‌--अत्यन्त; श्रेयः--लाभ; दातु:--दाता के लिए; ते--तुम; न--नहीं है; अत्र--इसमें; संशय: --सन्देह।

भगवान्‌ कृष्ण ने कहा : कृपया हम दोनों को उपयुक्त वस्त्र दे दीजिये क्योंकि हम इनकेयोग्य हैं।

यदि आप यह दान देंगे तो इसमें सन्देह नहीं कि आपको सबसे बड़ा लाभ प्राप्त होगा।

स याचितो भगवता परिपूर्णेन सर्वतः ।

साक्षेपं रुषित: प्राह भृत्यो राज्ञ: सुदुर्मदः ॥

३४॥

सः--वह; याचित:--याचना किया गया; भगवता-- भगवान द्वारा; परिपूर्णेन--परम पूर्ण; सर्वतः--सभी प्रकार से; स-आक्षेपम्‌--अपमान करते हुए; रुषित:--क्रुद्ध; प्राह--बोला; भृत्य:--नौकर; राज्ञ:--राजा का; सु-- अत्यधिक; दुर्मदः --घमंडी।

सभी प्रकार से परिपूर्ण भगवान्‌ द्वारा इस प्रकार याचना किये जाने पर राजा का वह घमंडीनौकर क्रुद्ध हो उठा और अपमान- भरे बचनों में बोला।

ईहशान्येव वासांसी नित्यं गिरिवनेचर: ।

परिधत्त किमुद्वुत्ता राजद्र॒व्याण्यभीप्सथ ॥

३५॥

ईहशानि--इस तरह के; एव--निस्सन्देह; वासांसि--वस्त्र; नित्यमू--सदैव; गिरि--पर्वतों पर; वने--तथा जंगलों में; चरा:--विचरण करने वाले; परिधत्त--पहनेंगे; किम्‌ू--क्या; उद्दुत्ताः:--उहंड; राज--राजा की; द्र॒व्याणि--वस्तुएँ; अभीप्सध--तुमचाहते हो

धोबी ने कहा : अरे उहंड बालको! तुम पर्वतों तथा जंगलों में घूमने के आदी हो फिर भीतुम इस तरह के वस्त्रों को पहनने का साहस कर रहे हो।

तुम जिन्हें माँग रहे हो वे राजा कीसम्पत्ति हैं।

याताशु बालिशा मैवं प्रार्थ्य यदि जिजीवीषा ।

बध्नन्ति घ्नन्ति लुम्पन्ति ह॒प्तं राजकुलानि वै ॥

३६॥

यात--जाओ; आशु--शीघ्र; बालिश: --मूर्खो; मा--मत; एवम्‌--इस तरह; प्रार्थ्यम्‌--माँगो; यदि--यदि; जिजीविषा--जीवित रहना चाहते हो; बध्नन्ति--बाँध देते हैं; घ्नन्ति--मार डालते हैं; लुम्पन्ति--लूट लेते हैं; दृप्तम्‌--उच्छुृंखल; राज-कुलानि--राजा के लोग; वै--निस्सन्देह

मूर्खो, यहाँ से तुरन्त निकल जाओ।

यदि तुम जीवित रहना चाहते हो तो इस तरह मत माँगो।

जब कोई अत्यधिक उच्छुंखल हो जाता है, तो राजा के कर्मचारी उसे बन्दी बना लेते हैं और जानसे मार डालते हैं।

और उसकी सारी सम्पत्ति छीन लेते हैं।

एवं विकत्थमानस्य कुपितो देवकीसुतः ।

रजकस्य कराग्रेण शिर: कायादपातयत्‌ ॥

३७॥

एवम्‌--इस प्रकार; विकत्थमानस्थ--इस तरह बहककर बोलने वाले; कुपित:--क्रुद्ध; देवकी-सुत:--देवकी-पुत्र, कृष्ण ने;रजकस्य--धोबी का; कर--एक हाथ के; अग्रेण--अगले भाग से; शिर:ः--सिर; कायात्‌--शरीर से; अपातयत्‌--गिरा दिया |

जब वह धोबी इस तरह बहकी बातें बोला तो देवकी-पुत्र क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने अपनीअँगुलियों के अगले भाग से ही उसके शरीर से उसका सिर अलग कर दिया।

तस्यानुजीविन: सर्वे वासःकोशान्विसृज्य वै ।

दुह्ुवुः सर्वतों मार्ग वासांसि जगूहेउच्युत: ॥

३८॥

तस्य--उसके; अनुजीविन: --कर्मचारी; सर्वे--सभी; वास: --वस्त्रों के; कोशानू-गट्टरों को; विसृज्य--छोड़कर; बै--निश्चयही; दद्वुवु:--भाग गये; सर्वतः--चारों ओर; मार्गम्‌--रास्ते में; वासांसि--वस्त्र; जगृहे--ले लिया; अच्युत:-- भगवान्‌ कृष्णने

धोबी के नौकरों ने अपने अपने वस्त्रों के गट्टर गिरा दिये और मार्ग से भागकर चारों ओरतितर-बितर हो गये।

तब भगवान्‌ कृष्ण ने उन वस्त्रों को ले लिया।

वसित्वात्मप्रिये वस्त्रे कृष्ण: सड्डूर्षणस्तथा ।

शेषाण्यादत्त गोपेभ्यो विसृज्य भुवि कानिचित्‌ ॥

३९॥

वसित्वा--वस्त्र पहनकर; आत्म-प्रिये--अपनी इच्छानुसार; वस्त्रे--वस्त्रों की जोड़ी में; कृष्ण:--कृष्ण; सड्डूर्षण:--बलराम;तथा-- भी; शेषाणि--शेष; आदत्त--दे दिया; गोपेभ्य:--ग्वालबालों को; विसृज्य--फेंकते हुए; भुवि-- भूमि पर;कानिचित्‌--अनेक ।

कृष्ण तथा बलराम ने अपनी मनपसंद के वस्त्रों की जोड़ी पहन ली और तब कृष्ण ने शेषवस्त्रों को ग्वालबालों में वितरित करते हुए कुछ को भूमि पर बिखेर दिया।

ततस्तु वायकः प्रीतस्तयोवेंषमकल्पयत्‌ ।

विचित्रवर्ण श्वेलेयैराकल्पैरनुरूपत: ॥

४०॥

ततः--तब; तु--और भी; वायक:--बुनकर ( दर्जी ) ने; प्रीत:--स्नेहवान्‌; तयो:--दोनों के लिए; वेषम्‌--पोशाक;अकल्पयत्‌--व्यवस्था की; विचित्र--विविध; वर्णै:--रंगों से; चैलेयै:--वस्त्र से बने; आकल्पै:--गहनों से; अनुरूपत:--उपयुक्त

तत्पश्चात्‌ एक बुनकर आया और दोनों विभूतियों के प्रति स्नेह से वशीभूत होकर विविधरंगों बाले वस्त्र-आभूषणों से उनकी पोशाकें सजा दीं।

नानालक्षणवेषाभ्यां कृष्णरामौ विरेजतु: ।

स्वलड्डू तौ बालगजौ पर्वणीव सितेतरा ॥

४१॥

नाना--विविध; लक्षण--उत्तम गुणों से युक्त; वेषाभ्याम्‌-- अपने अपने उस्त्रों से; कृष्ण-रामौ--कृष्ण तथा बलराम;विरेजतु:--भव्य लग रहे थे; सु-अलड्डू तौ--अच्छी तरह से आभूषित; बाल--बच्चा; गजौ--हाथी; पर्वणि--उत्सव में; इब--मानो; सित- श्रेत; इतरौ--तथा उसके विपरीत ( श्याम )

कृष्ण तथा बलराम अपनी अपनी अद्भुत रीति से सजाई गई विशिष्ट पोशाक में शोभायमानदिखने लगे।

वे उत्सव के समय सजाये गये श्रेत तथा श्याम हाथी के बच्चों की जोड़ी के समानलग रहे थे।

तस्य प्रसन्नो भगवान्प्रादात्सारूप्यमात्मन: ।

श्रियं च परमां लोके बलैश्वर्यस्मृतीन्द्रियम्‌ ॥

४२॥

तस्य--उससे; प्रसन्न:--तुष्ट; भगवान्‌-- भगवान्‌ ने; प्रादात्‌ू-प्रदान किया; सारूप्यम्‌--उसी रूप से युक्त मुक्ति; आत्मन:--जैसाकि अपना था; थ्रियमू--ऐश्वर्य; च--तथा; परमाम्‌ू--परम; लोके--इस जगत में; बल--शारीरिक बल; ऐश्वर्य--प्रभाव;स्मृति--स्मरणशक्ति; इन्द्रियमू--इन्द्रिय दक्षता ।

उस बुनकर से प्रसन्न होकर भगवान्‌ कृष्ण ने उसे आशीर्वाद दिया कि वह मृत्यु के बादभगवान्‌ जैसा स्वरूप प्राप्त करके मोक्ष प्राप्त्करे और जब तक इस लोक में रहे तब तक वहपरम ऐश्वर्य, शारीरिक बल, प्रभाव, स्मृति तथा एन्द्रिय शक्ति का भोग करे।

ततः सुदाम्नो भवनं मालाकारस्य जमग्मतु: ।

तौ हृष्ठा स समुत्थाय ननाम शिरसा भुवि ॥

४३॥

ततः--तत्पश्चात्‌; सुदाम्न:--सुदामा के; भवनम्‌--घर; माला-कारस्य--माली के; जग्मतुः--दोनों गये; तौ--उन दोनों को;इृष्ठा--देखकर; सः--उसने; समुत्थाय--उठकर; ननाम--नमस्कार किया; शिरसा--सिर के बल; भुवि-- भूमि परतत्पश्चात्‌ दोनों भाई सुदामा माली के घर गये।

जब सुदामा ने उन्हें देखा तो वह तुरन्त खड़ाहो गया और भूमि पर मस्तक नवाकर उसने उन्हें प्रणाम किया।

तयोरासनमानीय पाद्य॑ चार्ध्याईणादिभिः ।

पूजां सानुगयोश्चक्रे स््रक्ताम्बूलानुलेपने: ॥

४४॥

तयो:--उन दोनों के लिए; आसनम्‌ू--आसन; आनीय--जाकर; पाद्यम्‌ू--पाँव धोने के लिये जल; च--तथा; अर्ध्य--हाथधोने के लिए पानी; अर्हण--भेंट; आदिभि:--इत्यादि से युक्त; पूजाम्‌ू--पूजा; स-अनुगयो: -- दोनों की, उनके संगियों समेत;चक्रे--सम्पन्न की; स्रकु--मालाओं से; ताम्बूल--पान से; अनुलेपनै:--तथा चन्दन-लेप से |

उन्हें आसन प्रदान करके तथा उनके पाँव परवारकर सुदामा ने उनकी तथा उनके साथियोंकी अर्घध्य, माला, पान, चन्दन-लेप तथा अन्य उपहारों के साथ पूजा की।

प्राह न: सार्थक जन्म पावितं च कुल प्रभो ।

पितृदेवर्षयो मह्मं तुष्ठा ह्रागमनेन वाम्‌ ॥

४५॥

प्राह--उसने कहा; न:--हमारा; स-अर्थकम्‌--सफल; जन्म--जन्म; पावितम्‌--पवित्र किया गया; च--तथा; कुलमू्‌--परिवार; प्रभो--हे प्रभु; पितृ--मेरे पितरगण; देव--देवतागण; ऋषय:--तथा ऋषिगण; महामम्‌-- मुझसे; तुष्टा: -- प्रसन्न हैं;हि--निस्सन्देह; आगमनेन-- आगमन से; वाम्‌--तुम दोनों के |

सुदामा ने कहा : हे प्रभु, अब मेरा जन्म पवित्र हो गया और मेरा परिवार निष्कलुष होगया।

चूँकि अब आप दोनों मेरे यहाँ आये हैं अतः मेंरे पितर, देवता तथा ऋषिगण सभी मुझसेनिश्चय ही संतुष्ट हुये हैं।

भवन्तौ किल विश्वस्य जगत: कारणं परम्‌ ।

अवतीर्णाविहांशेन क्षेमाय च भवाय च ॥

४६॥

भवन्तौ--आप दोनों; किल--निस्सन्देह; विश्वस्थ--सम्पूर्ण; जगत:--ब्रह्मण्ड के; कारणम्‌--कारण; परम्‌--चरम;अवतीर्णौ--अवतरित होकर; इह--यहाँ; अंशेन-- अपने अंशों समेत; क्षेमाय--लाभ के लिए; च--तथा; भवाय--समृद्धि केलिए; च--भी

आप दोनों भगवान्‌ इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के परम कारण हैं।

इस जगत को भरण-पोषणतथा समृद्धि प्रदान करने के लिए आप अपने अंशों समेत अवतरित हुए हैं।

नहि वां विषमा दृष्टि: सुहृदोज॑गदात्मनो: ।

समयो:ः सर्वभूतेषु भजन्तं भजतोरपि ॥

४७॥

न--नहीं है; हि--निस्सन्देह; वाम्‌--तुम दोनों को; विषमा--पक्षपातपूर्ण; दृष्टि:--दृष्टि; सुहदो:--शुभचिन्तक मित्र; जगत्‌--ब्रह्माण्ड का; आत्मनो:--आत्मा; समयो: --समान; सर्व--सभी; भूतेषु--जीवों के प्रति; भजन्तम्‌--आपकी पूजा करने वाले;भजतो:--पूजा करते हुए; अपि-- भी |

चूँकि आप शुभचिन्तक मित्र तथा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के परमात्मा हैं अतः आप सबों कोनिष्पक्ष दृष्टि से देखते हैं।

अत: यद्यपि आप अपने भक्तों से प्रेमपूर्ण पूजा का आदान-प्रदान करतेहैं फिर भी आप सभी प्राणियों पर सदा समभाव रखते हैं।

तावज्ञापयतं भृत्यं किमह॑ं करवाणि वाम्‌ ।

पुंसोउत्यनुग्रहो होष भवद्धिद्र्यन्नियुज्यते ॥

४८॥

तौ--वे दोनों; आज्ञापयतम्‌--आज्ञा दें; भृत्यमू--अपने सेवक को; किमू-- क्या; अहम्‌--मैं; करवाणि--करूँ; वामू--तुमदोनों को; पुंसः--किसी पुरुष के लिए; अति--अत्यधिक; अनुग्रह:--कृपा; हि--निस्सन्देह; एब: --यह; भवद्ध्धिः--आपकेद्वारा; यत्‌--जिसमें; नियुज्यते--उसे लगाया जाता है।

कृपया इस अपने दास को आप जो चाहते हों वह करने का आदेश दें।

आपके द्वारा किसीसेवा में लगाया जाना किसी के लिए भी महान्‌ वरदान है।

इत्यभिप्रेत्य राजेन्द्र सुदामा प्रीतमानस: ।

शस्तैः सुगन्धे: कुसुमैर्माला विरचिता ददौ ॥

४९॥

इति--इस प्रकार बोलते हुए; अभिप्रेत्म--उनके अभिप्राय को समझकर; राज-इन्द्र--हे राजाओं में श्रेष्ठ ( परीक्षित ); सुदामा--सुदामा; प्रीत-मानसः--हृदय में प्रसन्न; शस्तैः--ताजे; सु-गन्धैः--तथा सुगन्धित; कुसुमैः--फूलों से; मलः--मालाएँ;विरचिता:--बनाई गईं; ददौ--दिया।

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : हे राजाओं में श्रेष्ठ, ये शब्द कहकर सुदामा ने यह जानलिया कि कृष्ण तथा बलराम क्‍या चाह रहे थे।

इस तरह उसने अतीव प्रसन्नतापूर्वक उन्हें ताजेसुगन्धित फूलों की मालाएँ अर्पित कीं।

ताभिः स्वलड्डू तौ प्रीतौ कृष्णरामौ सहानुगौ ।

प्रणताय प्रपन्नाय ददतुर्वरदौ वरान्‌ ॥

५०॥

ताभिः--उन ( मालाओं ) से; सु-अलड्जू तौ--सुन्दर ढंग से सजकर; प्रीतौ--तुष्ट; कृष्ण-रामौ--कृष्ण तथा बलराम; सह--साथ; अनुगौ--अपने संगियों के; प्रणताय--नतमस्तक; प्रपन्नाय--शरणागत ( सुदामा ) को; ददतुः--दिया; वरदौ--वरदानदेने वाले दोनों ने; वरानू--इच्छित बरों को |

इन मालाओं से सुसज्जित होकर कृष्ण तथा बलराम अतीव प्रसन्न हुए और उसी तरह उनकेसंगी भी।

तब दोनों विभूतियों ने अपने समक्ष विनत शरणागत सुदामा को उसके मनवांछित वरप्रदान किये।

सोपि वद्रेडचलां भक्ति तस्मिन्नेवाखिलात्मनि ।

तद्धक्तेषु च सौहार्द भूतेषु च दयां पराम्‌ू ॥

५१॥

सः--उसने; अपि--तथा; वद्रे--चुना; अचलाम्‌-- अचल; भक्तिमू-- भक्ति; तस्मिन्‌ू--उन; एब--एकमात्र; अखिल--हरएकके; आत्मनि--परमात्मा के प्रति; तत्‌ू--उसके; भक्तेषु-- भक्तों के प्रति; च--तथा; सौहार्दम्‌--मैत्री; भूतेषु--सामान्य जीवों केप्रति; च--तथा; दयाम्‌--दया; पराम्‌--दिव्य |

सुदामा ने समस्त जगत के परमात्मा कृष्ण की अचल भक्ति, उनके भक्तों के साथ मित्रतातथा समस्त जीवों के प्रति दिव्य दया को चुना।

इति तस्मै वरं दत्त्वा भ्ियं चान्वयवर्धिनीम्‌ ।

बलमायुर्यशः कान्ति निर्जगाम सहाग्रज: ॥

५२॥

इति--इस प्रकार; तस्मै--उसको; वरम्‌--वर; दत्त्वा--देकर; थ्रियम्‌--ऐ श्रर्य; च--तथा; अन्वय--उसका परिवार;वर्धिनीम्‌--वृद्ध्धि करते हुए; बलम्‌ू--बलम; आयु:--दीर्घ-आयु; यश:--यश; कान्तिम्‌--सौन्दर्य ; निर्जगाम--चले गये;सह--साथ; अग्र-ज:--अपने बड़े भाई बलराम के

भगवान्‌ कृष्ण ने सुदामा को न केवल ये वर दिये अपितु उन्होंने उसे बल, दीर्घायु, यश, कान्ति तथा उसके परिवार की सतत बुद्धिमान हुई समृद्धि भी प्रदान की।

तत्पश्चात्‌ कृष्ण तथा उनके बड़े भाई ने उससे विदा ली।

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