← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची

अध्याय चालीस: अक्रूर की प्रार्थनाएँ

10.40नारायणंपूरुषमाद्यमव्ययम्‌।

यन्नाभिजातादरविन्दकोषाद्‌ब्रह्माविरासीद्यत एब लोक: ॥

१॥

श्री-अक्रूर: उवाच-- श्री अक्रूर ने कहा; नतः--विनत; अस्मि--हूँ; अहम्‌--मैं; त्वा--आपके प्रति; अखिल--समस्त; हेतु --कारणों के; हेतुमू--कारण; नारायणम्‌--नारायण को; पूरुषम्‌--परम पुरुष; आद्यम्‌ू--आदि; अव्ययम्‌--अव्यय; यत्‌--जिससे; नाभि--नाभि; जातात्‌--से उत्पन्न; अरविन्द--कमल के; कोषात्‌--कोष से; ब्रह्मा-- ब्रह्मा; अविरासीत्‌ू--प्रकट हुआ;यतः--जिससे; एष:--यह; लोक:--जगत |

श्री अक्रूर ने कहा : हे समस्त कारणों के कारण, आदि तथा अव्यय महापुरुष नारायण, मैंआपको नमस्कार करता हूँ।

आपकी नाभि से उत्पन्न कमल के कोष से ब्रह्मा प्रकट हुए हैं औरउनसे यह ब्रह्माण्ड अस्तित्व में आया है।

भूस्तोयमग्नि: पवनं खमादि-महानजादिर्मन इन्द्रियाणि ।

सर्वेन्द्रियार्था विबुधाश्च सर्वेये हेतवस्ते जगतोउड्भभूता: ॥

२॥

भू:--पृथ्वी; तोयम्‌ू--जल; अग्नि:--अग्नि; पवनम्‌-- वायु; खम्‌-- आकाश; आदि: --तथा इसका उद्गम, मिथ्या अहंकार;महानू--महत-तत्त्व; अजा--सम्पूर्ण भौतिक प्रकृति; आदिः--उसका उद्गम, परमेश्वर; मन:--मन; इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ; सर्व-इन्द्रिय--सारी इन्द्रियों के; अर्था:--विषय, वस्तुएँ; विबुधा:--देवतागण; च--तथा; सर्वे--सभी; ये--जो; हेतव:--कारण;ते--तुम्हारा; जगत:--जगत के; अड्र--शरीर से; भूताः--उत्पन्न |

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश एवं इसका स्त्रोत तथा मिथ्या अहंकार, महतू-तत्त्व,समस्त भौतिक प्रकृति और उसका उद्गम तथा भगवान्‌ का पुरुष अंश, मन, इन्द्रियाँ, इन्द्रियविषय तथा इन्द्रियों के अधिष्ठात्‌ देवबता-ये सब विराट जगत के कारण आपके दिव्य शरीर सेउत्पन्न हैं।

नैते स्वरूप विदुरात्मनस्तेहाजादयोअनात्मतया गृहीत: ।

अजो नुबद्ध: स गुणैरजायागुणात्परं वेद न ते स्वरूपम्‌ ॥

३॥

न--नहीं; एते--ये ( सृष्टि के तत्त्व ); स्वरूपमू--असली पहचान; विदुः--जानते हैं; आत्मन:--परमात्मा का; ते--तुम; हि--निस्सन्देह; अजा-आदय: --पूर्ण प्रकृति इत्यादि; अनात्मतया--निर्जीव पदार्थ होने से; गृहीता:--पकड़े हुए, बद्ध; अज:--ब्रह्मा; अनुबद्ध: --बँधा हुआ; सः--वह; गुणैः--गुणों से; अजाया:--प्रकृति के; गुणात्‌--इन गुणों से; परमू--दिव्य; वेदन--नहीं जानता; ते--आपके ; स्वरूपम्‌ू-- असली रूप को |

सम्पूर्ण भौतिक प्रकृति तथा ये अन्य सृजन-तत्त्व निश्चय ही आपको यथा-रूप में नहीं जानसकते क्योंकि ये निर्जीव पदार्थ के परिमण्डल में प्रकट होते हैं।

चूँकि आप प्रकृति के गुणों सेपरे हैं, अत: इन गुणों से बद्ध ब्रह्मजी भी आपके असली रूप को नहीं जान पाते।

त्वां योगिनो यजन्त्यद्धा महापुरुषमी श्वरम्‌ ।

साध्यात्मं साधिभूत॑ च साधिदैवं च साधव: ॥

४॥

त्वम्‌--तुम्हारे लिए; योगिन:--योगीजन; यजन्ति--यज्ञ करते हैं; अद्धा--निश्चय ही; महा-पुरुषम्‌--परम पुरुष के लिए;ईश्वरम्--ई श्वर के लिए; स-अध्यात्मम्‌--जीवों ( का साक्षी ); स-अधिभुतम्‌-- भौतिक तत्त्वों का; च--तथा; स-अधिदैवम्‌--नियंत्रक देवताओं का; च--तथा; साधव: --शुद्ध पुरुष

शुद्ध योगीजन आप की अर्थात्‌ परमेश्वर की तीन रूपों में अनुभूति करते हुए पूजा करते हैं।

ये तीन हैं-जीव, भौतिक तत्त्व जिनसे जीवों के शरीर बने हैं तथा इन तत्त्वों के नियंत्रक देवता( अधिदेव )।

त्रय्या च विद्यया केचित्त्वां वै वैतानिका द्विजा: ।

यजन्ते विततैर्यज्नैनानारूपामराख्यया ॥

५॥

अय्या--तीन वेदों के; च--तथा; विद्यया--मंत्रों से; केचित्‌--कुछ; त्वाम्‌--तुमको; वै--निस्सन्देह; वैतानिका:--तीनोंअग्नियों के विधानों का समादर करने वाले; द्विजा:--ब्राह्मण; यजन्ते-- पूजा करते हैं; विततैः--विस्तृत; यज्जैः--वज्ञों के द्वारा;नाना--विविध; रूप--रूप वाले; अमर--देवताओं की; आख्यया--उपाधियों से |

तीन पवित्र अग्नियों से सम्बद्ध नियमों का पालन करने वाले ब्राह्मण तीनों वेदों से मंत्रोचारकरके तथा अनेक रूपों और नामों वाले विविध देवताओं के लिए व्यापक अग्नि यज्ञ करकेपूजा करते हैं।

एके त्वाखिलकर्माणि सन्न्यस्योपशमं गता: ।

ज्ञानिनो ज्ञानयज्ञेन यजन्ति ज्ञानविग्रहम्‌ ॥

६॥

एके--कुछ लोग; त्वा--तुमको; अखिल--समस्त; कर्माणि--कार्य; सन्न्यस्थ--त्यागकर; उपशमम्‌--शान्ति; गता: --प्राप्तकरके; ज्ञानिन:--ज्ञानीजन; ज्ञान-यज्ञेन--ज्ञान-अनुशील के यज्ञ द्वारा; यजन्ति--पूजा करते हैं; ज्ञान-विग्रहम्‌--साक्षात्‌ ज्ञानको

आध्यात्मिक ज्ञान की खोज में कुछ लोग सारे भौतिक कार्यो का परित्याग कर देते हैं औरइस तरह शान्त होकर समस्त ज्ञान के आदि रूप आपकी पूजा करने के लिए ज्ञान-यज्ञ करते हैं।

अन्ये च संस्कृतात्मानो विधिनाभिहितेन ते ।

यजत्ति त्वन्मयास्त्वां वै बहुमूर्त्येकमूर्तिकम्‌ ॥

७॥

अन्ये--अन्य लोग; च--तथा; संस्कृत--शुद्ध किये हुए; आत्मान:--जिनकी बुद्धि; विधिना--( पदरात्र जैसे शास्त्रों के )आदेशों से; अभिहितेन-- प्रस्तुत किये गये; ते--तुम्हारे द्वारा; यजन्ति--पूजा करते हैं; त्वत्‌-मया: --तुम्हारे विचार से पूरित;त्वामू--तुमको; बै--निस्सन्देह; बहु-मूर्ति--अनेक रूपों वाले; एक-मूर्तिकम्‌--एक स्वरूप वाला।

और अन्य लोग जिनकी बुद्धि शुद्ध है वे आपके द्वारा लागू किये गये वैष्णव शास्त्रों केआदेशों का पालन करते हैं।

वे आपके चिन्तन में अपने मन को लीन करके आपकी पूजापरमेश्वर रूप में करते हैं, जो अनेक रूपों में प्रकट होता है।

त्वामेवान्ये शिवोक्तेन मार्गंण शिवरूपिणम्‌ ।

बह्ाचार्यविभेदेन भगवन्तर्नुपासते ॥

८॥

त्वामू--तुम; एव-- भी; अन्ये-- अन्य; शिव--शिव द्वारा; उक्तेन-- कहे गये; मार्गेण --मार्ग से; शिव-रूपिणम्‌--शिव के रूपमें; बहु-आचार्य--अनेक शिक्षकों के; विभेदेन--विभिन्न भेदों से; भगवन्तम्‌-- भगवान्‌ को; उपासते--पूजा करते हैं।

कुछ अन्य लोग भी हैं, जो आपकी पूजा भगवान्‌ शिव के रूप में करते हैं।

वे उनके द्वाराबताये गये तथा अनेक उपदेशकों द्वारा नाना प्रकार से व्याख्यायित मार्ग का अनुसरण करते हैं।

सर्व एवं यजन्ति त्वां सर्वदेवमयेश्वरम्‌ ।

येप्यन्यदेवताभक्ता यद्यप्यन्यधियः प्रभो ॥

९॥

सर्वे--सभी; एब--निस्सन्देह; यजन्ति--पूजा करते हैं; त्वम्‌--तुम्हारी; सर्व-देव--समस्त देवता; मय--हे वही आप, जो युक्तहो; ईश्वरम्‌-- भगवान्‌; ये--वे; अपि-- भी; अन्य--दूसरे; देवता--देवताओं का; भक्ता:--भक्तों; यदि अपि--यद्यपि; अन्य--अन्यत्र मुड़े;।

धियः--ध्यान; प्रभो--हे प्रभो |

किन्तु हे प्रभु, ये सारे लोग, यहाँ तक कि जिन्होंने आपसे अपना ध्यान मोड़ रखा है और जोअन्य देवताओं की पूजा कर रहे हैं, वे वास्तव में, हे समस्त देवमय, आपकी ही पूजा कर रहे हैं।

यथाद्रिप्रभवा नद्य: पर्जन्यापूरिता: प्रभो ।

विशन्ति सर्वतः सिन्धुं तद्वत्त्तां गतयोउन्तत: ॥

१०॥

यथा--जिस तरह; अद्वि--पर्वतों से; प्रभवा:--उत्पन्न; नद्यः--नदियाँ; पर्जन्य--वर्षा से; आपूरिता: --पूरित; प्रभो-हे प्रभु;विशन्ति--प्रवेश करती हैं; सर्वतः--सभी दिशाओं से; सिन्धुम्‌--समुद्र में; तद्बत्‌ू--उसी तरह; त्वाम्‌--तुम में; गतयः--मार्ग;अन्ततः--अन्त में |

हे प्रभो, जिस प्रकार पर्वतों से उत्पन्न तथा वर्षा से पूरित नदियाँ सभी ओर से समुद्र में आकरमिलती हैं उसी तरह ये सारे मार्ग अन्त में आप तक पहुँचते हैं।

सत्त्वं रजस्तम इति भवतः प्रकृतेर्गुणा: ।

तेषु हि प्राकृता: प्रोता आब्रह्मस्थावरादय: ॥

११॥

सत्त्वमू--सत्‌, अच्छाई; रज:--काम, रज; तम:ः--तम, अज्ञान; इति--इस प्रकार विख्यात; भवतः--आपकी ; प्रकृतेः:--प्रकृतिके; गुणा: --गुण; तेषु--उनमें; हि--निस्सन्देह; प्राकृता:--बद्धजीव; प्रोता:--बिने हुए, उलझे; आ-ब्रह्म -- ब्रह्म तक; स्थावर-आदयः--अचर प्राणी इत्यादि |

आपकी भौतिक प्रकृति के सतो, रजो तथा तमो गुण ब्रह्मा से लेकर अचर प्राणियों तक केसमस्त बद्धजीवों को पाशबद्ध किये रहते हैं।

तुभ्य॑ नमस्ते त्वविषक्तदृष्टये सर्वात्मने सर्वधियां च साक्षिणे ।

गुणप्रवाहोयमविद्यया कृतःप्रवर्तते देवनृतिर्यगात्मसु ॥

१२॥

तुभ्यम्‌ू-तुम्हें; नम: --नमस्कार; ते--तुम्हारा; तु--तथा; अविषक्त--पृथक्‌ , विलग; दृष्टये--दृष्टि वाले; सर्व-आत्मने--सबोंकी आत्मा को; सर्व--हरएक की; धियाम्‌ू--चेतना के; च--तथा; साक्षिणे--साक्षी को; गुण--गुणों की; प्रवाह: --धधारा;अयमू--यह; अविद्यया--अज्ञान के कारण; कृतः--उत्पन्न; प्रवर्तत--चलता रहता है; देव--देवताओं के रूप में; नू--मनुष्य;तिर्यक्‌--तथा पशु; आत्मसु--उनमें जिनका स्वरुप है|

मैं आपको नमस्कार करता हूँ, जो समस्त जीवों के परमात्मा रूप होकर निष्पक्ष दृष्टि से हरएक की चेतना के साक्षी हैं।

अज्ञान से उत्पन्न आपके भौतिक गुणों का प्रवाह उन जीवों के बीचप्रबलता के साथ प्रवाहित होता है, जो देवताओं, मनुष्यों तथा पशुओं का रूप धारण करते हैं।

अग्निर्मुखं तेउवनिरद्धप्रिरीक्षणंसूर्यो नभो नाभिरथो दिशः श्रुतिः ।

ञौः कं सुरेन्द्रास्तव बाहवोर्णवा:कुक्षिर्मरुत्प्राणबलं प्रकल्पितम्‌ ॥

१३॥

रोमाणि वृक्षौषधय: शिरोरुहामेघा: परस्यास्थिनखानि तेउद्रयः ।

निमेषणं रात््यहनी प्रजापति-मेंढ्रस्तु वृष्टिस्तव वीर्यमिष्यते ॥

१४॥

अग्नि:--अग्नि; मुखम्‌-- मुख; ते--तुम्हारा; अवनि:-- पृथ्वी; अद्भूप्रि:-- पाँव; इक्षणम्‌-- आँखें; सूर्य: --सूर्य; नभः--आकाश; नाभि:--नाभि; अथ उ--तथा भी; दिश:ः--दिशाएँ; श्रुति:-- श्रवणेन्द्रिय; द्यौ: --स्वर्ग; कम्‌--सिर; सुर-इन्द्रा: --प्रमुख देवता; तब--तुम्हारी; बाहवः--बाँहें; अर्गवा:--समुद्र; कुक्षिः--उदर; मरुतू--वायु; प्राण--प्राण-वायु; बलम्‌--तथाशारीरिक बल; प्रकल्पितमू--कल्पना किया हुआ; रोमाणि--शरीर के रोएँ; वृक्ष--पेड़; ओषधय:--जड़ी-बूटियाँ; शिरः-रुूहाः--सिर के ऊपर के बाल; मेघा: --बादल; परस्थ--परमेश्वर की; अस्थि--हड्डियाँ; नखानि--तथा नाखून; ते-- तुम्हारा;अद्रयः--पर्वत; निमेषणम्‌--पलक झाँपना; रात्रि-अहनी--दिन तथा रात; प्रजापति:--मनुष्य को जन्म देने वाला; मेढ़: --गुप्तांग, जननेन्द्रिय; तु--तथा; वृष्टि:--वर्षा; तब--तुम्हारा; वीर्यम्‌ू--वीर्य; इष्यते--माना जाता है।

अग्नि आपका मुख कही जाती है, पृथ्वी आपके पाँव हैं, सूर्य आपकी आँख है औरआकाश आपकी नाभि है।

दिशाएँ आपकी श्रवणेन्द्रिय हैं, प्रमुख देवता आपकी बाँहें हैं औरसमुद्र आपका उदर है।

स्वर्ग आपका सिर समझा जाता है और वायु आपकी प्राण-वायु तथाशारीरिक बल है।

वृक्ष तथा जड़ी-बूटियाँ आपके शरीर के रोम हैं, बादल आपके सिर के बालहैं तथा पर्वत आपकी अस्थियाँ तथा नाखून हैं।

दिन तथा रात का गुजरना आपकी पलकों काझपकना है, प्रजापति आपकी जननेन्द्रिय है और वर्षा आपका वीर्य है।

त्वय्यव्ययात्मन्पुरुषे प्रकल्पितालोका: सपाला बहुजीवसड्डू ला: ।

यथा जले सज्जिहते जलौकसो-प्युदुम्बरे वा मशका मनोमये ॥

१५॥

त्वयि--तुम्हारे भीतर; अव्यय-आत्मन्‌--अविनाशी; पुरुषे--भगवान्‌; प्रकल्पिता: --उत्पन्न; लोका:--जगत; स-पाला: --पालनकर्ता देवताओं समेत; बहु--अनेक; जीव--जीवों समेत; सह्लु ला:--एकत्र; यथा--जिस तरह; जले-- जल में;सज्िहते--इधर उधर घूमते हैं; जल-ओकसः--जल के प्राणी; अपि--निस्सन्देह; उदुम्बरे--उदुम्बर फल ( गूलर ) में; वा--अथवा; मशकाः--छोटे छोटे कीट; मनः--मन ( तथा अन्य इन्द्रियाँ ); मये--से युक्त आपमें।

अपने अपने अधिष्ठातृ देवताओं तथा असंख्य जीवों समेत सारे जगत आप परम अविनाशी सेउदभूत हैं।

ये सारे जगत मन तथा इन्द्रियों पर आधारित होकर आपके भीतर घूमते रहते हैं जिसप्रकार समुद्र में जलचर तैरते हैं अथवा छोटे छोटे कीट गूलर फल के भीतर छेदते रहते हैं।

यानि यानीह रूपाणि क्रीडनार्थ बिभर्षि हि ।

तैरामृष्टशुत्रो लोका मुदा गायन्ति ते यशः ॥

१६॥

यानि यानि--जो जो; इह--इस जगत में; रूपाणि--रूप; क्रीडन--खेल के; अर्थम्‌-हेतु; बिभर्षि-- प्रकट करते हो; हि--निस्सन्देह; तैः--उनके द्वारा; आमृष्ट-- धुला हुआ; शुचः--उनके दुखों का; लोकाः--लोग; मुदा--हर्षपूर्वक ; गायन्ति--गातेहैं; ते--तुम्हारा; यशः--यश

आप अपनी लीलाओं का आनन्द लेने के लिए इस भौतिक जगत में नाना रूपों में अपने कोप्रकट करते हैं और ये अवतार उन लोगों के सारे दुखों को धो डालते हैं, जो हर्षपूर्वक आपकेयश का गान करते हैं।

नमः कारणमत्स्याय प्रलयाब्धिचराय च ।

हयशीष्णें नमस्तुभ्यं मधुकेटभमृत्यवे ॥

१७॥

अकूपाराय बृहते नमो मन्दरधारिणे ।

प्लित्युद्धारविहाराय नम: शूकरमूर्तये ॥

१८॥

नमः--नमस्कार; कारण--सृष्टि के आदि कारण; मत्स्याय--मत्स्य के रूप में भगवान्‌ के प्राकट्य को; प्रलय--संहार के;अब्धि--सागर में; चराय--इधर उधर विचरण करने वाले; च--तथा; हय-शीष्णें--घोड़े के सिर से युक्त अवतार को; नम:--नमस्कार; तुभ्यम्‌ू--तुमको; मधु-कैटभ--मधु तथा कैटभ नामक असुरों के; मृत्यवे--मारने वाले को; अकूपाराय--कच्छपको; बृहते--विशाल; नम:--नमस्कार; मन्दर--मन्दराचल के; धारिणे-- धारण करने वाले को; क्षिति--पृथ्वी के; उद्धार--ऊपर उठाने; विहाराय--विहार के लिए; नमः--नमस्कार; शूकर--सुअर के; मूर्तये--रूप को |

मैं सृष्टि के कारण भगवान्‌ मत्स्य रूप आपको नमस्कार करता हूँ जो प्रलय के सागर में इधरउधर तैरते रहे।

मैं मधु तथा कैटभ के संहारक हयग्रीव को, मन्दराचल को धारण करने वालेविशाल कच्छप ( भगवान्‌ कूर्म ) को तथा पृथ्वी को उठाने में आनन्द का अनुभव करने वालेसूकर अवतार ( भगवान्‌ वराह ) रूप आपको नमस्कार करता हूँ।

नमस्तेद्भुतसिंहाय साधुलोकभयापह ।

वामनाय नमस्तुभ्य॑ क्रान्तत्रिभुवनाय च ॥

१९॥

नमः--नमस्कार; ते--तुमको; अद्भुत-- आश्चर्यजनक; सिंहाय--सिंह को; सधु-लोक--सारे साधु-भक्तों के; भय--डर के;अपह--हटाने वाले; वामनाय--वामन को; नमः--नमस्कार; तुभ्यम्‌--तुमको; क्रान्त--पग सेनापा; त्रि-भुवनाय--ब्रह्माण्ड केतीनों लोकों के; च--तथा।

अपने सनन्‍्त-भक्तों के भय को भगाने वाले अद्भुत सिंह ( भगवान्‌ नृसिंह ) तथा तीनों जगतोंको अपने पगों से नापने वाले वामन मैं आपको नमस्कार करता हूँ।

नमो भृगुणां पतये हृ्तक्षत्रवनच्छिदे ।

नमस्ते रघुवर्याय रावणान्तकराय च ॥

२०॥

नमः--नमस्कार; भूगूणाम्‌-- भूगुवंशियों के; पतये--स्वामी को ( परशुराम को ); हप्त--घमंडी; क्षत्र--राज-परिवार वालों के;वन--जंगल; छिदे--काटने वाला; नम:--नमस्कार; ते--तुम्हें; रघु-वर्याय--रघुवंशियों में श्रेष्ठ; रावण--रावण का; अन्त-'कराय--अन्त करने वाले; च--तथा।

घमंडी राजाओं रूपी जंगल को काट डालने वाले भूगुपति तथा राक्षस रावण का अन्त करनेवाले रघुकुल शिरोमणि भगवान्‌ राम, मैं आपको नमस्कार करता हूँ।

नमस्ते वासुदेवाय नमः सड्डूर्षणाय च ।

प्रद्युम्नायनिरुद्धाय सात्वतां पतये नम: ॥

२१॥

नमः--नमस्कार; ते--तुम्हें; वासुदेवाय-- श्री वासुदेव को; नम:--नमस्कार; सड्जर्षणाय--संकर्षण को; च--तथा;प्रद्यम्नाय--प्रद्युम्म को; अनिरुद्धाय--तथा अनिरुद्ध को; सात्वताम्‌--यादवों के; पतये--प्रधान को; नम: --नमस्कार।

सात्वतों के स्वामी आपको नमस्कार है।

आपके वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्म तथा अनिरुद्धरूपों को नमस्कार है।

नमो बुद्धाय शुद्धाय दैत्यदानवमोहिने ।

म्लेच्छप्रायक्षत्रहन्त्रे नमस्ते कल्किरूपिणे ॥

२२॥

नमः--नमस्कार; बुद्धाय--बुद्ध को; शुद्धाय--शुद्ध; दैत्य-दानव--दिति तथा दानु की सन्‍्तानों के; मोहिने--मोहने वाले को;म्लेच्छ--मांस-भक्षक अछूत के; प्राय--समान; क्षत्र--राजाओं ; हन्त्रे--मारने वाले को; नम:--नमस्कार; ते--तुम्हें; कल्कि-रूपिणे--कल्कि के रूप में।

आपके शुद्ध रूप भगवान्‌ बुद्ध को नमस्कार है, जो दैत्यों तथा दानवों को मोह लेगा।

आपके कल्कि रूप को नमस्कार है, जो राजा बनने वाले मांस-भक्षकों का संहार करने वालाहै।

भगवन्जीवलोकोयं मोहितस्तव मायया ।

अहं ममेत्यसदग्ाहो भ्राम्यते कर्मवर्त्मसु ॥

२३॥

भगवनू--हे भगवन्‌; जीव--जीवों का; लोक:--लोक; अयम्‌--यह; मोहितः--मोहग्रस्त; तब--तुम्हारी; मायया--माया द्वारा;अहम्‌ मम इति--मैं तथा मेरी धारणा पर आधारित; असत्‌ू--मिथ्या; ग्राह:--जिसकी अनुभूति; भ्राम्यते--घुमाती है; कर्म--सकाम कर्म के; वर्त्ससु--मार्गों पर

हे परमेश्वरइस जगत में सारे जीव आपकी शक्ति माया से भ्रमित हैं।

वे 'मैं' तथा 'मेरा 'की मिथ्या धारणाओं में फँसकर सकाम कर्मों के मार्गों पर भटकते रहने के लिए बाध्य होते रहतेहैं।

अहं चात्मात्मजागारदारार्थस्वजनादिषु ।

भ्रमामि स्वणकल्पेषु मूढ: सत्यधिया विभो ॥

२४॥

अहम्‌-ैं; च-- भी; आत्म--शरीर सम्बन्धी; आत्म-ज--सनन्‍्तानें; अगार--घर; दार--पली; अर्थ-- धन; स्व-जन--अनुयायियों; आदिषु--इत्यादि में; भ्रमामि--भम्र में पड़ा हूँ; स्वप्न--स्वप्न; कल्पेषु--के सहश; मूढ:--मूर्ख; सत्य--चूँकि वेअसली हैं; धिया-- भावना से; विभो--हे सर्वशक्तिमान प्रभु।

हे शक्तिशाली विभो, मैं भी अपने शरीर, सन्‍्तानों, घर, पत्ती, धन तथा अनुयायियों कोमूर्खता से वास्तविक मानकर इस प्रकार से भ्रमित हो रहा हूँ यद्यपि ये सभी स्वप्न के समानअसत्य हैं।

अनित्यानात्मदुःखेषु विपर्ययमतिहाहम्‌ ।

दन्द्दारामस्तमोविष्टो न जाने त्वात्मन: प्रियम्‌ू ॥

२५॥

अनित्य--नित्य नहीं; अनात्म--आत्मा नहीं; दुःखेषु--कष्ट के साधनों में; विपर्यय--उल्टी; मति:--मनोवृत्ति; हि--निस्सन्देह;अहम्‌--मैं; दन्द्र--द्वैत में; आराम: -- आनन्द लेता हुआ; तम:--अज्ञान में; विष्ट:--मग्न; न जाने--पहचान नहीं पा रहा; त्वा--आपको; आत्मन: --अपने; प्रियम्‌--प्रियतम को |

इस तरह नश्वर को नित्य, अपने शरीर को आत्मा तथा कष्ट के साधनों को सुख के साधनमानते हुए मैंने भौतिक द्वन्द्दों में आनन्द उठाने का प्रयतत किया है।

इस तरह अज्ञान से आवृतहोकर मैं यह नहीं पहचान सका कि आप ही मेरे प्रेम के असली लक्ष्य हैं।

यथाबुधो जल हित्वा प्रतिच्छन्नं तदुद्धवैः ।

अभ्येति मृगतृष्णां वे तद्वत््वाहं पराड्मुखः ॥

२६॥

यथा--जिस तरह; अबुध:--कोई अज्ञानी; जलमू--जल की; हित्वा--उपेक्षा करके; प्रतिच्छन्नम्‌--प्रच्छन्न; तत्‌-उद्धवैः--उसमेंउगे हुए वृक्षों से; अभ्येति--पास पहुँचता है; मृग-तृष्णाम्‌--मृगतृष्णा; वै--निस्सन्देह; तद्वत्‌--उसी तरह; त्वा--तुमसे; अहम्‌--मैंने; पराकू-मुख:--मुख मोड़ लिया।

जिस तरह कोई मूर्ख व्यक्ति जल के अन्दर उगी हुईं वनस्पति से ढके हुए जल की उपेक्षाकरके मृगतृष्णा के पीछे दौड़ता है उसी तरह मैंने आपसे मुख मोड़ रखा है।

नोत्सहेहं कृपणधी: कामकर्महतं मनः ।

रोद्धुं प्रमाथिभिश्चाक्षेह्वयमाणमितस्ततः ॥

२७॥

न उत्सहे--शक्ति नहीं पा रहा; अहम्‌--मैं; कृपण--कुंठित; धी:ः--बुर्द्धि; काम--भौतिक इच्छा; कर्म--तथा भौतिक कार्योंसे; हतमू--विचलित; मन:--मेरा मन; रोद्भुमू--रोके रखने के लिए; प्रमाधिभि:--अत्यन्त शक्तिशाली तथा इच्छा करने वाले;च--तथा; अक्षैः --इन्द्रियों से; हियमाणम्‌--घसीटा जाकर; इतः तत:--इधर उधर

मेरी बुद्धि इतनी कुंठित है कि मैं अपने मन को रोक पाने की शक्ति नहीं जुटा पा रहा जोभौतिक इच्छाओं तथा कार्यों से विचलित होता रहता है और मेरी जिद्दी इन्द्रियों द्वारा निरन्तर इधरउधर घसीटा जाता है।

सोहं तवाड्ठयुपगतो स्म्यसतां दुरापंतच्चाप्यहं भवदनुग्रह ईश मन्ये ।

पुंसो भवेद्यर्हि संसरणापवर्ग-स्त्वव्यब्जनाभ सदुपासनया मतिः स्यात्‌ ॥

२८॥

सः--ऐसा; अहम्‌--मैं; तब--तुम्हारे; अद्धप्रि--चरणों के ; उपगतः अस्मि--पास आया हूँ; असताम्‌--अशुद्धों के लिए;दुरापमू--प्राप्त करना असम्भव; तत्‌--वह; च--और; अपि-- भी; अहम्‌--मैं; भवत्‌-- आपकी; अनुग्रह:--दया; ईश--हेईश्वर; मन्ये--सोचता हूँ; पुंसः--मनुष्य का; भवेत्‌--होए; यहिं-- जब; संसरण-- भव-चक्र का; अपवर्ग:--अन्त; त्ववि--तुममें; अब्ज--कमल के समान; नाभ--नाभि वाले; सत्‌--शुद्ध भक्तों की; उपासनया--पूजा से; मतिः--चेतना; स्थात्‌--उत्पन्नहोती है|

हे प्रभु, इस तरह पतित हुआ मैं आपके चरणों में शरण लेने आया हूँ, क्योंकि, यद्यपिअशुद्ध लोग आपके चरणों को कभी भी प्राप्त नहीं कर पाते, मेरा विचार है कि आपकी कृपासे तो यह संभव हो सका है।

हे कमल-नाभ भगवान्‌, जब किसी का भौतिक जीवन समाप्त होजाता है तभी वह आपके शुद्ध भक्तों की सेवा करके आपके प्रति चेतना उत्पन्न कर सकता है।

नमो विज्ञानमात्राय सर्वप्रत्ययहेतवे ।

पुरुषेशप्रधानाय ब्रह्मणेडनन्तशक्तये ॥

२९॥

नमः--नमस्कार; विज्ञान--शुद्ध ज्ञान के; मात्राय--स्वरूप को; सर्व--समस्त; प्रत्यय--ज्ञान के रूपों के; हेतबे--कारण को;पुरुष--पुरुष की; ईश--नियंत्रण करने वाली शक्ति के; प्रधानाय--सर्वेसर्वा को; ब्रह्मणे--परब्रह्म को; अनन्त--असीम;शक्तये--शक्ति ।

असीम शक्तियों के स्वामी परम सत्य को नमस्कार है।

वे शुद्ध दिव्य-ज्ञान स्वरूप हैं, समस्तचेतनाओं के स्त्रोत हैं और जीव पर शासन चलाने वाली प्रकृति की शक्तियों के अधिपति हैं।

नमस्ते वासुदेवाय सर्वभूतक्षयाय च ।

हृषीकेश नमस्तुभ्यं प्रपन्न॑ पाहि मां प्रभो ॥

३०॥

नमः--नमस्कार; ते--तुम्हें; वासुदेवाय--वसुदेव के पुत्र को; सर्ब--समस्त; भूत--जीवों के; क्षयाय--निवास को; च--तथा;हृषीक-ईश--मन तथा इन्द्रियों के स्वामी; नमः--नमस्कार; तुभ्यम्‌ू--तुम्हें; प्रपन्नमू--शरणागत हूँ; पाहि--कृपया बचायें;माम्‌--मुझको; प्रभो--हे स्वामीहे वसुदेवपुत्र आपको नमस्कार है।

आपमें सारे जीवों का निवास है।

हे मन तथा इन्द्रियों केस्वामी, मैं पुन: आपको नमस्कार करता हूँ।

हे प्रभु, मैं आपकी शरण में आया हूँ।

आप मेरी रक्षाकरें।

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