← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची

अध्याय उनतालीसं: अक्रूर का दर्शन

10.39श्रीशुक उबाचसुखोपविष्ट: पर्यड्ले रमकृष्णोरुमानित: ।

लेभे मनोरथान्सर्वान्पथि यान्स चकार ह ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; सुख--सुखपूर्वक; उपविष्ट: --बैठे हुए; पर्यद्ले-- पलंग पर; राम-कृष्ण--बलराम तथा कृष्ण द्वारा; उरुू--अत्यन्त; मानित:--सम्मान किया गया; लेभे--प्राप्त किया; मन:-रथान्‌ू--इच्छाओं को;सर्वानू--समस्त; पथ्चि--मार्ग में; यानू--जो; सः--उसने; चकार ह-- प्रकट किया।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा: भगवान्‌ बलराम तथा भगवान्‌ कृष्ण द्वारा इतना अधिकसम्मानित किये जाने पर पलंग में सुखपूर्वक बैठे अक्रूर को लगा कि उन्होंने रास्ते में जितनीइच्छाएँ की थीं वे सभी अब पूरी हो गई हैं।

किमलभ्यं भगवति प्रसन्ने श्रीनिकेतने ।

तथापि तत्परा राजन्न हि वाउ्छन्ति किज्लन ॥

२॥

किम्‌--क्या; अलभ्यम्‌--अप्राप्य है; भगवति-- भगवान्‌ के; प्रसन्ने--प्रसन्न होने पर; श्री--लक्ष्मी के; निकेतने--विश्रामस्थलमें; तथा अपि--फिर भी; ततू-परा:--उनके भक्तगण; राजन्‌--हे राजा ( परीक्षित ); न--नहीं; हि--निस्सन्देह; वाउ्छन्ति--चाहते हैं; किल्नन--कुछ भी |

हे राजनू, जिसने लक्ष्मी के आश्रय पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ को सन्तुष्ट कर लिया हो भलाउसके लिए क्या अलभ्य है? ऐसा होने पर भी जो उनकी भक्ति में समर्पित हैं, वे कभी भी उनसेकुछ नहीं चाहते।

सायन्तनाशनं कृत्वा भगवान्देवकीसुतः ।

सुहत्सु वृत्तं कंसस्य पप्रच्छान्यच्चिकीर्षितम्‌ ॥

३॥

सायन्तन--शाम का; अशनम्‌-- भोजन; कृत्वा--करके; भगवान्‌-- भगवान्‌; देवकी -सुतः--देवकी पुत्र; सुहत्सु--अपनेशुभचिन्तक सम्बन्धियों तथा मित्रों के प्रति; वृत्तमू--आचरण के विषय में; कंसस्य--कंस के; पप्रच्छ--पूछा; अन्यत्‌ू--अन्य;चिकीर्षितम्‌--इरादे |

शाम के भोजन के बाद देवकीपुत्र भगवान्‌ कृष्ण ने अक्रूर से पूछा कि कंस अपने प्रियसम्बन्धियों तथा मित्रों के साथ कैसा बर्ताव कर रहा है और वह क्‍या करने की योजना बना रहाहै।

श्रीभगवानुवाचतात सौम्यागत: कच्चित्स्वागतं भद्रमस्तु वः ।

अपि स्वज्ञातिबन्धूनामनमीवमनामयम्‌ ॥

४॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; तात--हे चाचा; सौम्य--हे सदय; आगत:--आया हुआ; कच्चित्‌-- क्या; सु-आगतमू--स्वागत; भद्गरम्‌ू--मंगल; अस्तु--होए; वः--तुम्हारे लिए; अपि-- क्या; स्व--अपने शुभचिन्तक मित्रों; ज्ञाति--सगे-सम्बन्धी; बन्धूनामू--तथा अन्य पारिवारिक सदस्यों के लिए; अनमीवम्‌--दुख से छुटकारा; अनामयर्न--रोग से मुक्ति

भगवान्‌ ने कहा : हे भद्ग पुरुष, प्रिय चाचा अक्रूर, यहाँ की आपकी यात्रा सुखद तो रही ?आपका कल्याण हो।

हमारे शुभचिन्तक मित्र तथा हमारे निकट और दूर के सम्बन्धी सुखी तथास्वस्थ तो हैं?

कि नु नः कुशल पृच्छे एधमाने कुलामये ।

कंसे मातुलनाम्नाडु स्वानां नस्तत्प्रजासु च ॥

५॥

किम्‌--क्या; नु-- प्रत्युत; नः--हमारी; कुशलम्‌-- कुशलता के बारे में; पृच्छे-मैं पूछूँगा; एधमाने--जब वह सम्पन्न हो रहाहो; कुल--हमारे परिवार का; आमये--रोग; कंसे--राजा कंस; मातुल-नाम्ना--मामा नाम से पुकारा जाने वाला; अड्भ--मेराप्रिय; स्वानाम्‌--सम्बन्धियों का; नः--हमारा; तत्‌--उसके; प्रजासु--नागरिकों का; च--तथा।

किन्तु हे अक्रूर, जब तक मामा कहलाने वाला तथा हमारे परिवार के लिए रोगस्वरूप राजाकंस समृद्ध हो रहे हैं, तब तक मैं अपने परिवार वालों तथा उसकी अन्य प्रजा के विषय में पूछने की झंझट में पड़े ही क्यों ?अहो अस्मदभूद्धूरि पित्रोर्व॑जिनमार्ययो: ।

यद्धेतो: पुत्रमरणं यद्धेतोर्बन्धनं तयो; ॥

६॥

अहो--ओह; अस्मत्‌--मेरे कारण; अभूत्‌-- था; भूरि--महान; पित्रो: --मेरे माता-पिता के लिए; वृजिनम्‌--कष्ट; आर्ययो: --निरपराध; यत्-हेतो:--जिसके कारण; पुत्र--उनके पुत्रों की; मरणम्‌--मृत्यु; यत्‌-हेतो:--जिसके कारण; बन्धनम्‌--बन्धन;तयो:--उनके |

जरा देखिये न, कि मैंने अपने निरपराध माता-पिता के लिए कितना कष्ट उत्पन्न कर दियाहै! मेरे ही कारण उनके कई पुत्र मारे गये और वे स्वयं बन्दी हैं।

दिष्टबयाद्य दर्शन स्वानां मह्यं व: सौम्य काड्क्षितम्‌ ।

सज्ञातं वर्ण्यतां तात तवागमनकारणम्‌ ॥

७॥

दिछ्या--सौभाग्य से; अद्य--आज; दर्शनम्‌-दर्शन; स्वानाम्‌-- अपने सगे-सम्बन्धी का; महाम्‌-मेरे लिए; वः--तुम;सौम्य--हे भद्ग पुरुष; का््क्षितम्‌--इच्छित; सझ्ञातम्‌ू--घटित हुआ है; वर्ण्यताम्‌ू--कृपा करके बतलाइये; तात--हे चाचा;तव--तुम्हारे; आगमन-- आने का; कारणमू--कारण।

हे प्रिय स्वजन, सौभाग्यवश आपको देखने की हमारी इच्छा आज पूरी हुई है।

हे सदयचाचा, कृपा करके यह बतलायें कि आप आये क्‍यों हैं ?

श्रीशुक उबाचपृष्टो भगवता सर्व वर्णयामास माधव: ।

वैरानुबन्ध॑ यदुषु वसुदेववधोद्यमम्‌ ॥

८ ॥

श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; पृष्ट:--पूछे जाने पर; भगवता-- भगवान्‌ द्वारा; सर्वम्‌--हर बात; वर्णयाम्‌आस--बतलाया; माधव: --मधु का वंशज, अक्रूर ने; बैर-अनुबन्धम्‌--शत्रुवत्‌ मनोभाव; यदुषु--यदुओं के प्रति; बसुदेव--वसुदेव की; वध--हत्या करने का; उद्यमम्‌--प्रयास |

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : भगवान्‌ के पूछे जाने पर मधुवंशी अक्रूर ने सारी परिस्थिति कहसुनाई जिसमें यदुओं के प्रति कंस की शत्रुता तथा उसके द्वारा वसुदेव के वध का प्रयास भी सम्मिलित था।

यत्सन्देशो यदर्थ वा दूत: सम्प्रेषित: स्वयम्‌ ।

यदुक्त नारदेनास्थ स्वजन्मानकदुन्दुभे: ॥

९॥

यत्‌--जिस; सन्देश: --सन्देश सहित; यत्‌--जिस; अर्थम्‌--उद्देश्य से; वा--तथा; दूत: --दूत के रूप में; सम्प्रेषित:-- भेजा;स्वयम्‌ू--अक्ूर; यत्‌--जो; उक्तम्‌ू--कहा गया था; नारदेन--नारद द्वारा; अस्थय--उस ( कंस ) से; स्व--उसका ( कृष्ण का );जन्म--जन्म; आनकदुन्दुभेः--वसुदेव से |

अक्रूर को जिस सन्देश को देने के लिए भेजा गया था उसे उन्होंने कह सुनाया।

उसने कंसके असली इरादे भी बतला दिये और ( यह भी बतला दिया कि ) नारद ने किस तरह कंस कोसूचित किया कि कृष्ण ने वसुदेव के पुत्र रूप में जन्म लिया है।

श्रुत्वाक्रवच: कृष्णो बलश्च परवीरहा ।

प्रहस्य नन्दं पितरं राज्ञा दिष्टे विजज्ञतु: ॥

१०॥

श्रुत्वा--सुनकर; अक्ूर-बच: --अक्रूर के वचन; कृष्ण:-- भगवान्‌ कृष्ण; बल:--बलराम; च--तथा; पर-वीर--प्रतियोगीवीरों का; हा--नष्ट करने वाला; प्रहस्य--हँस कर; नन्दम्‌--नन्द महाराज से; पितरम्‌--अपने पिता; राज्ञा--राजा द्वारा;दिष्टम्‌--आदेश दिया गया; विजज्नतु: --उन्होंने सूचित किया |

अक्रूर के वचनों को सुनकर वीर प्रतिद्वन्द्रियों का विनाश करने वाले भगवान्‌ कृष्ण तथाभगवान्‌ बलराम हँस पड़े।

तब उन्होंने अपने पिता नन्द महाराज को राजा कंस का आदेशबतलाया।

गोपान्समादिशत्सोपि गृह्मतां सर्वगोरसः ।

उपायनानि गृह्वीध्वं युज्यन्तां शकटानिच ।

यास्याम: श्रो मधुपुरीं दास्यामो नूपते रसान्‌ ॥

११॥

द्रक्ष्याम: सुमहत्पर्व यान्ति जानपदा: किल ।

एवमाघोषयक्ष्षत्रा नन्दगोप: स्वगोकुले ॥

१२॥

गोपानू-ग्वालों को; समादिशात्‌--आदेश दिया; सः--उस ( नन्द महाराज ) ने; अपि-- भी; गृह्मयताम्‌ू--एकत्र कर लिया है;सर्व--सारा; गो-रसः--दुग्ध के बने पदार्थ; उपायनानि--उत्तम उपहार; गृह्नीध्वम्‌--ले लो; युज्यन्तामू--जोत दो; शकटानि--छकड़े; च--तथा; यास्याम: --हम चलेंगे; श्र: --कल; मधु-पुरीम्‌--मथुरा को; दास्याम:--हम देंगे; नृपतेः--राजा को;रसान्‌--दुग्ध उत्पाद; द्रक्ष्याम:--हम देखेंगे; सु-महत्‌-- अत्यन्त महान; पर्व--उत्सव; यान्ति--जा रहे हैं; जानपदा:--सुदूरजिलों के निवासी; किल--निस्सन्देह; एवम्‌--इस प्रकार; आघोषयत्‌--उसने घोषणा करा दी थी; क्षत्रा--गाँव के मुखियाद्वारा; नन्द-गोप: --ननन्‍्द महाराज; स्व-गोकुले--अपने गोकुल के लोगों से |

तब नन्द महाराज ने गाँव के मुखिया को बुलाकर नन्द के ब्रज मंडल में ग्वालों के लिएनिम्नलिखित घोषणा करने के लिए आदेश दिया, 'जाओ और जितना दूध-दही उपलब्ध होसके एकत्र करो।

बहुमूल्य उपहार ले लो और अपने-अपने छकड़े जोत लो।

कल हम लोग मथुराजायेंगे और राजा को अपना दूध-दही भेंट करेंगे तथा महान्‌ उत्सव देखेंगे।

समस्त पड़ोसी जिलोंके निवासी भी इसमें जा रहे हैं।

'गोप्यस्तास्तदुपश्रुत्य बभूवुर्व्यधिता भूशम्‌ ।

रामकृष्णौ पुरी नेतुमक्रूरं त्रजमागतम्‌ ॥

१३॥

गोप्य:--गोपियाँ; ताः--वे; तत्‌--तब; उपश्रुत्य--सुनकर; बभूवु:--हो गईं; व्यधिता: --खिन्न; भूशम्‌-- अत्यधिक; राम-कृष्णौ--बलराम तथा कृष्ण; पुरीम्‌--नगर में; नेतुमू--ले जाने के लिए; अक्रूरम्‌--अक्रूर को; ब्रजम्‌--वृन्दावन में;आगतम्‌--आया हुआ।

जब गोपियों ने सुना कि अक्रूर कृष्ण तथा बलराम को नगर ले जाने के लिए ब्रज में आयेहैं, तो वे अत्यन्त खिन्न हो उठीं।

काश्चित्तत्कृतहत्ताप श्रासम्लानमुखभ्रियः ।

सत्रंसहुकूलवलय केश ग्रन्थ्यश्व काश्चन ॥

१४॥

काश्चित्‌ू--उनमें से कुछ; तत्‌--उससे ( सुनने से ); कृत--उत्पन्न; हतू--हृदयों में; ताप--पीड़ा से; ध्रास--सिसकने से;म्लान--पीली हुई; मुख--उनके मुखों की; थ्रियः--कान्ति; स्रंसत्‌ू--शिथिल हुए; दुकूल--वस्त्र; वलय--कंगन; केश--बालों में; ग्रन्थ्य:--लटें; च--तथा; काश्चन-- अन्य |

कुछ गोपियों ने अपने हृदय में इतनी पीड़ा का अनुभव किया कि सिसकियाँ ले लेकर उनकेमुख पीले पड़ गये।

अन्य गोपियाँ इतनी अधिक पीड़ित थीं कि उनके वस्त्र, बाजूबंद तथा जूड़ेशिथिल पड़ गये।

अन्याश्च तदनुध्यान निवृत्ताशेषवृत्तय: ।

नाभ्यजानतन्निमं लोकमात्मलोक॑ गता इव ॥

१५॥

अन्या:--दूसरी; च--तथा; तत्‌--उनका; अनुध्यान--स्थिर ध्यान करने से; निवृत्त--बन्द किया हुआ; अशेष--सारे;वृत्तय:--इन्द्रियों के कार्य; न अभ्यजानन्‌--न जानती हुईं; इमम्‌--इस; लोकम्‌ू--लोक का; आत्म--आत्म-साक्षात्कार के;लोकमू--लोक में; गता:--प्राप्त हुई; इब--मानो |

अन्य गोपियों की चित्तवृत्तियाँ पूरी तरह रुक गईं और वे कृष्ण के ध्यान में स्थिर हो गईं।

उन्हें आत्मसाक्षात्कार-पद प्राप्त करने वालों की भाँति बाह्य-जगत की सारी सुधि-बुधि भूल गई।

स्मरन्त्यश्लापरा: शौरेरनुरागस्मितेरिता: ।

हृदिस्पृशश्चित्रपदा गिर: सम्मुमुहु: स्त्रियः ॥

१६॥

स्मरन्त्यः--स्मरण करतीं; च--तथा; अपरा: --अन्य; शौरे: --कृष्ण का; अनुराग--स्नेहिल; स्मित--उनकी हँसी से; ईरिता:--भेजी गई; हृदि--हृदय में; स्पृश:--स्पर्श करती; चित्र--विचित्र; पदा:--वाक्यांशों से; गिर:--वाणी; सम्मुमुहुः --अचेत;स्त्रियः--स्त्रियाँ और कुछ तरुणियाँ

भगवान्‌ शौरि ( कृष्ण ) के शब्दों का स्मरण करके ही अचेत हो गईं।

येशब्द विचित्र पदों से अलंकृत तथा स्नेहमयी मुसकान से व्यक्त होने से उन तरुणियों के हृदयोंका गम्भीरता से स्पर्श करने वाले होते थे।

गतिं सुललितां चेष्टां स्निग्धहासावलोकनम्‌ ।

शोकापहानि नर्माणि प्रोद्ामचरितानि च ॥

१७॥

चिन्तयन्त्यो मुकुन्दस्थ भीता विरहकातरा: ।

समेता: सद्डृशः प्रोचुरश्रुमुख्योउच्युताशया: ॥

१८॥

गतिम्‌--चाल; सु-ललिताम्‌--अत्यन्त आकर्षक; चेष्टाम्‌--चेष्टाएँ; स्निग्ध--स्नेहिल; हास--हँसी; अवलोकनम्‌--चितवनें;शोक--दुख; अपहानि--दूर करने वाली; नर्माणि--ठिठोलियाँ; प्रोह्याम--विशाल; चरितानि--कार्यकलाप; च--तथा;चिन्तयन्त्य:--सोचती हुईं; मुकुन्दस्य-- भगवान्‌ कृष्ण के; भीत:-- भयभीत; विरह--विरह के कारण; कातरा:--अत्यन्त दुखी;समेता:--एकसाथ मिलकर; सड्ढ्श:--टोली में; प्रोचु:--बोलीं; अश्रु--आँसू से युक्त; मुख्य:--मुख; अच्युत-आशया: --भगवान्‌ अच्युत में लीन मन वाली

गोपियाँ भगवान्‌ मुकुन्द के क्षणमात्र वियोग की आशंका से भी भयातुर थीं अतः जब उन्हेंउनकी ललित चाल, उनकी लीलाओं, उनकी स्नेहिल हँसीली चितवन, उनके वीरतापूर्ण कार्यों तथा दुख हरने वाली ठिठोलियों का स्मरण हो आया तो वे सम्भाव्य परम विरह के विचार सेउत्पन्न चिंता में अपने आपे के बाहर हो गईं।

वे झुंड की झुंड एकत्र होकर एक-दूसरे से बातेंकरने लगीं।

उनके मुख आँसुओं से पूरित थे तथा उनके मन अच्युत में पूर्णतया लीन थे।

श्रीगोप्य ऊचुःअहो विधातस्तव न क्वचिद्यासंयोज्य मैत्र्या प्रणयेन देहिनः ।

तांश्वाकृतार्थान्वियुनड्छ््यपार्थकविक्रीडितं तेर्भकचेष्टितं यथा ॥

१९॥

श्री-गोप्य: ऊचु:--गोपियों ने कहा; अहो--ओह; विधात:--विधाता; तव--तुम्हारा; न--नहीं है; क्वचित्‌--कहीं भी; दया--दया; संयोज्य--मिलाकर; मैत्र्या--मित्रता से; प्रणयेन--तथा प्रेम से; देहिन:--देहधारी जीवों को; तान्‌ू--उन; च--तथा;अकृत--अधूरे; अर्थान्‌--उद्देश्य; वियुनड्क्षि--विलग कर देते हो; अपार्थकम्‌--व्यर्थ ही; विक्रीडितम्‌--खेल; ते--तुम्हारा;अर्भक--बच्चे की; चेष्टितम्‌--चेष्टा; यथा--जिस तरह |

गोपियों ने कहा : हे विधाता, आपमें तनिक भी दया नहीं है।

आप देहधारी प्राणियों को मैत्रीतथा प्रेम द्वारा एक-दूसरे के पास लाते हैं और तब उनकी इच्छाओं के पूरा होने के पूर्व ही व्यर्थमें उन्हें विलग कर देते हैं।

आपका यह भ्रमपूर्ण खेलवाड़ बच्चों की चेष्टा के समान है।

यस्त्वं प्रदर्ासितकुन्तलावृतंमुकुन्दवक्त्रं सुकपोलमुन्नसम्‌ ।

शोकापनोदस्मितलेशसुन्दरंकरोषि पारोक्ष्यमसाधु ते कृतम्‌ ॥

२०॥

यः--जो; त्वमू--तुम; प्रदर्श--दिखलाकर; असित--श्याम; कुन्तल--घुँघराले बालों से; आवृतम्‌--ढका; मुकुन्द--कृष्णका; वक्त्रमू--मुखमण्डल; सु-कपोलम्‌--सुन्दर कपोलों से युक्त; उत्‌-नसम्‌--तथा उठी हुई नाक; शोक--शोक; अपनोद--समूल नष्ट करने वाली; स्मित--अपनी हँसी से; लेश--तनिक; सुन्दरम्‌--सुन्दर; करोषि--करते हो; पारोक्ष्यम्‌--अद्ृष्ट;असाधु--बुरा; ते--तुम्हारे द्वारा; कृतम्‌--किया गया।

श्याम घुँघराले बालों से घिरा तथा सुन्दर गालों से सुशोभित, उठी हुई नाक तथा समस्त कष्टोंको हरने वाली मृदु हँसी से युक्त, मुकुन्द के मुख को दिखलाने के बाद अब आप उस मुख कोहमसे ओझल करने जा रहे हैं।

आपका यह वर्ताव तनिक भी अच्छा नहीं है।

क्रूरस्त्वमक्रूरसमाख्यया सम न-अ्क्षु्ि दत्त हरसे बताज्ञवत्‌ ।

येनैकदेशेखिलसर्गसौष्ठ वंत्वदीयमद्राक्ष्म वय॑ मधुद्विष: ॥

२१॥

क्रूरः--क्रूर; त्वमू-तुम ( हो ); अक्रूर-समाख्यया--अक्रूर नाम से जाने जाने वाले ( जिसका अर्थ है, जो क्रूर नहीं है ); स्म--निश्चय ही; नः--हमारी; चक्षु:--आँखें; हि--निस्सन्देह; दत्तमू--दिया गया; हरसे--छीने ले रहे हो; बत--हाय; अज्ञ--मूर्ख;वत्‌--सहश; येन--जिन ( आँखों ) से; एक--एक; देशे--स्थान में; अखिल--समस्त; सर्ग--सृष्टि की; सौष्ठवम्‌--पूर्णता;त्वदीयम्‌--आपका; अद्वाक्ष्म--देख चुकीं; वयम्‌--हम; मधुद्विष:--मधु असुर के शत्रु, भगवान्‌ कृष्ण का।

हे विधाता, यद्यपि आप यहाँ अक्रूर के नाम से आये हैं किन्तु हैं आप क्रूर क्योंकि आपमूर्खो के समान हमसे उन्हें ही छीने ले रहे हैं, जिन्हें कभी आपने हमें दिया था--हमारी वे आँखेंजिनसे हमने भगवान्‌ मधुद्विष के रूप के उस एक में भी आपकी सम्पूर्ण सृष्टि की पूर्णता देखीहै।

न नन्दसूनु: क्षणभड़सौहदःसमीक्षते न: स्वकृतातुरा बत ।

विहाय गेहान्स्वजनान्सुतान्पतीं -स्तद्यास्यमद्धोपगता नवप्रियः ॥

२२॥

न--नहीं; नन्द-सूनु:--नन्द महाराज का पुत्र; क्षण--एक क्षण में; भड़--तोड़ना; सौहद: --जिसकी मैत्री का; समीक्षते--देखते हैं; न:--हमको; स्व--अपने द्वारा; कृत--बनाया गया; आतुरा:--अपने वश में; बत--हाय; विहाय--छोड़कर;गेहानू--हमारे घरों को; स्व-जनान्‌--सम्बन्धियों को; सुतानू--बालकों को; पतीन्‌--पतियों को; तत्‌--उसके प्रति; दास्यम्‌--दासता; अद्धघा--प्रत्यक्ष; उपगता:--ग्रहण की हुई; नव--नये नये; प्रिय: --प्रेमी

हाय! क्षण-भर में प्रेमपूर्ण मैत्री को भंग करने वाला नन्द का बेटा अब हमको सीधे एकटकदेख भी नहीं सकेगा।

उसके वशीभूत होकर उसकी सेवा करने के लिए हमने अपने घरों,सम्बन्धियों, बच्चों तथा पतियों तक का परित्याग कर दिया किन्तु वह सदैव नितनये प्रेमियों कीखोज में रहता है।

सुखं प्रभाता रजनीयमाशिष:सत्या बभूवुः पुरयोषितां श्रुवम्‌ ।

या; संप्रविष्टस्य मुखं ब्रजस्पते:पास्यन्त्यपाड्रोत्कलितस्मितासवम्‌ ॥

२३॥

सुखम्‌--सुखमय; प्रभाता--प्रातःकाल; रजनी--रात का; इयमू--यह; आशिष:--आशाएँ; सत्या:--सच; बभूवु:--हो चुकीहैं; पुर--नगर की; योषिताम्‌--स्त्रियों के; ध्रुवम्‌--निश्चय ही; या:ः--जो; संप्रविष्टस्य--( मथुरा में ) प्रवेश किये हुए का;मुखम्‌--मुख; ब्रज:-पते: --ब्रज के स्वामी का; पास्यन्ति--पीयेंगी; अपाड़--तिरछी चितवन; उत्कलित--फैली हुई; स्मित--हँसी; आसवम्‌--अमृत

इस रात्रि के बाद का प्रातःकाल निश्चित रूप से मथुरा की स्त्रियों के लिए मंगलमय होगा।

अब उनकी सारी आशाएँ पूरी हो जायेंगी क्योंकि जैसे ही त्रजपति उनके नगर में प्रवेश करेंगे वेउनके मुख की तिरछी चितवन से निकलने वाली हँसी के अमृत का पान कर सकेंगी।

तासां मुकुन्दो मधुमझुभाषितै-गृहीतचित्त: परवान्मनस्व्यपि ।

कथं पुनर्न: प्रतियास्यतेडबलाग्राम्या: सलज्जस्मितविश्रमै भ्रमन्‌ ॥

२४॥

तासाम्‌ू--उनके; मुकुन्दः--कृष्ण; मधु--शहद सहश; मज्जु--मीठी; भाषितै:--वाणी से; गृहीत--वशीभूत; चित्त: --मन;परवान्‌ू--पराधीन; मनस्वी--बुद्धिमान; अपि--यद्यपि; कथम्‌--कैसे; पुनः--फिर; नः--हमको; प्रतियास्यते--लौटेगा;अबला:--हे बालाओं ; ग्राम्या:--ग्रामीण; स-लज्ज--लजीली; स्मित--हँसती हुईं; विभ्रमैः--वशीकरण से; भ्रमन्‌--मुग्ध हुई

हे गोपियो, यद्यपि हमारा मुकुन्द बुद्धिमान तथा अपने माता-पिता का अत्यन्त आज्ञाकारी हैकिन्तु एक बार मथुरा की स्त्रियों के मधु सहश मीठे शब्दों के जादू में आ जाने और उनकीआकर्षक लजीली मुसकानों से मुग्ध हो जाने पर भला वह हम गँवार देहाती अबलाओं के पासफिर कभी क्‍यों लौटने लगा ?

अद्य थ्रुवं तत्र हशो भविष्यतेदाशाईभोजान्धकवृष्णिसात्वताम्‌ ।

महोत्सव: श्रीरमणं गुणास्पदंद्रक्ष्यन्ति ये चाध्वनि देवकीसुतम्‌ ॥

२५॥

अद्य--आज; ध्रुवम्‌ू--निश्चय ही; तत्र--वहाँ; हशः--आँखों के लिए; भविष्यते--होगा; दाशाह-भोज-अन्धक-वृष्णि-सात्वताम्‌ू-दाशाई, भोज, अन्धक, वृष्णि तथा सात्वत वंशों के सदस्यों के; महा-उत्सवः--महान्‌ उत्सव; श्री--लक्ष्मीजी का;रमणम्‌--प्रिय; गुण--सारे दिव्य गुणों का; आस्पदम्‌--आगार, भण्डार; द्रक्ष्यन्ति--देखेंगे; ये--जो; च-- भी; अध्वनि--मार्गपर; देवकी-सुतम्‌--देवकीपुत्र, श्रीकृष्ण को |

जब दाशाई, भोज, अन्धक, वृष्णि तथा सात्वत लोग मथुरा में देवकी के पुत्र को देखेंगे तोउनके नेत्रों के लिए महान्‌ उत्सव तो होगा ही, साथ ही साथ नगर के मार्ग में यात्रा करते हुए जोलोग उन्हें देखेंगे उनके लिए भी महान्‌ उत्सव होगा।

आखिर, वे श्री लक्ष्मीजी के प्रियतम औरसमस्त दिव्य गुणों के आगार जो हैं।

मैतद्विधस्याकरुणस्य नाम भू-दक्कूर इत्येतदतीव दारुण: ।

योसावनाश्चास्य सुदुःखितम्जनंप्रियात्प्रियं नेष्यति पारमध्वन: ॥

२६॥

मा--मत; एतत्‌-विधस्य--ऐसे; अकरुणस्य--क्रूर व्यक्ति का; नाम--नाम; भूत्‌--होये; अक्वूरः इति--अक्रूर; एतत्‌--यह;अतीव--अत्यन्त; दारुण: --क्रूर; यः--जो; असौ--वह; अनाश्चास्थ-- धीरज धराते हुए; सु-दुःखितम्‌--अत्यन्त दुखी;जनम्‌--लोगों को; प्रियात्‌-प्रियतम्‌ से अधिक; प्रियम्‌--प्रिय ( कृष्ण ); नेष्यति--ले जायेगा; पारम्‌ अध्वन: --हमारी दृष्टि सेपरे।

जो ऐसा निर्दय कार्य कर रहा हो उसे अक्रूर नहीं कहलाया जाना चाहिए।

वह इतना क्रूर हैकि ब्रज के दुखी निवासियों को धीरज धराने का प्रयास किए बिना ही उस कृष्ण को लिये जारहा है, जो हमारे प्राणों से भी हमें अधिक प्रिय है।

अनार्द्रधीरेष समास्थितो रथंतमन्वमी च त्वरयन्ति दुर्मदा: ।

गोपा अनोभि: स्थविरिरुपेक्षितंदेवं च नोउद्य प्रतिकूलमीहते ॥

२७॥

अनार्द्र-धी:--निष्ठर; एष:--यह ( कृष्ण ); समास्थित:--आसीन होकर; रथम्‌--रथ में; तम्‌ू--उसको; अनु--पीछे चलने वाले;अमी--ये; च--तथा; त्वरयन्ति-- जल्दबाजी; दुर्मदा: --बेवकूफ बनाये गये; गोपा:--ग्वाले; अनोभि:ः--अपनी बैलगाड़ियों में;स्थविरे:--वृद्धजनों द्वारा; उपेक्षितम्‌--उपेक्षित; दैवम्‌-- भाग्य को; च--तथा; न:--हमारे साथ; अद्य--आज; प्रतिकूलमू--विपरीत; ईहते--कार्य कर रहा है|

निष्ठर कृष्ण पहले ही रथ पर चढ़ चुके हैं और अब ये मूर्ख ग्वाले अपनी बैलगाड़ियों मेंउनके पीछे पीछे जाने की जल्दी मचा रहे हैं।

यहाँ तक कि बड़े-बूढ़े भी उन्हें रोकने के लिए कुछभी नहीं कह रहे।

आज भाग्य हमारे विपरीत कार्य कर रहा है।

निवारयाम: समुपेत्य माधवंकि नोकरिष्यन्कुलवृद्धबान्धवा: ।

मुकुन्दसड्न्निमिषार्धदुस्त्यजाद्‌दैवेन विध्वंसितदीनचेतसाम्‌ ॥

२८॥

निवारयाम:--चलो हम रोकें; समुपेत्य--पास जाकर; माधवम्‌--कृष्ण को; किमू--क्या; न:--हमारा; अकरिष्यन्‌--करेंगे;कुल--परिवार के; वृद्ध--बूढ़े लोग; बान्धवा:--तथा हमारे सम्बन्धीजन; मुकुन्द-सड्भात्‌-- भगवान्‌ मुकुन्द के साथ से;निमिष--पलक झाँपने के; अर्ध--आधा; दुस्त्यजात्‌ू--जिसे त्यागना असम्भव है; दैवेन-- भाग्य द्वारा; विध्वंसित--विलगकिया गया; दीन--दुखियारा; चेतसाम्‌--हृदयों वाले |

चलो हम सीधे माधव के पास चलें और उन्हें जाने से रोकें।

हमारे परिवार के बड़े-बूढ़े तथाअन्य सम्बन्धीजन हमारा कया बिगाड़ सकते हैं ? अब जबकि भाग्य हमें मुकुन्द से विलग कर रहाहै, हमारे हृदय पहले से ही दुखित हैं क्योंकि हम एक पल के एक अंश के लिए भी उनके संगके त्याग को सहन नहीं कर सकतीं।

यस्यानुरागललितस्मितवल्गुमन्त्र-लीलावलोकपरिरम्भणरासगोष्टाम्‌ ।

नीता: सम न: क्षणमिव क्षणदा विना तंगोप्य: कथ॑ न्वतितरेम तमो दुरन्तम्‌ ॥

२९॥

यस्य--जिसके; अनुराग--स्नेह से; ललित--मनोहर; स्मित--( जहाँ ) हँसी ( थी ); वल्गु--आकर्षक; मन्त्र--घुलमिलकरबातचीत; लीला--क्रौड़ापूर्ण;, अवलोक--चितवन; परिरम्भण--तथा आलिंगन; रास--रासनृत्य की; गोष्टाम्‌--गोष्ठी को;नीता: स्म--लाई गई; न:--हमारे लिए; क्षणम्‌ू-- क्षण; इब--सहृश; क्षणदा:--रातें; विना--रहित; तमू--उसके; गोप्य:--हेगोपियो; कथम्‌--कैसे; नु--निस्सन्देह; अतितरेम--हम पार कर जायेंगी; तम:--अंधकार; दुरन्तमू--दुर्लघ्य |

जब वे हमें रासनृत्य की गोष्ठी में ले आये जहाँ हमने उनकी स्नेहपूर्ण तथा मनोहर मुसकानेंका, उनकी आह्ादकारी गुप्त बातों, उनकी लीलापूर्ण चितवनों तथा उनके आलिंगनों काआनन्द लूटा तब हमने अनेक रात्रियाँ बितायी जो मात्र एक क्षण के तुल्य लगी।

हे गोपियो, तोभला हम उनकी अनुपस्थिति के दु्लघ्य अंधकार को कैसे पार कर सकती हैं ?

योऊह्तः क्षये त्रजमनन्तसख:ः परीतोगोपैर्विशन्खुररजएछुरितालकस्त्रक्‌ ।

वेणुं क्वणन्स्मितकताक्षनिरीक्षणेनचित्तं क्षिणोत्यमुमृते नु कथं भवेम ॥

३०॥

यः--जो; अहृूः--दिन के; क्षये--अन्त होने पर; ब्रजमू--व्रज-ग्राम में; अनन्त--अनन्त या बलराम का; सखः--मित्र, कृष्ण;परीत:--चारों ओर से घिरा; गोपै: --ग्वालबालों से; विशन्‌-- प्रवेश करते हुए; खुर--गो-खुरों की; रज:-- धूल से; छुरित--धूसरित; अलक--घुँघराले बाल; सत्रकू--तथा माला; वेणुम्‌--बाँसुरी को; क्वणन्‌--बजाते हुए; स्मित--मन्द हास करते हुए;कट-अक्ष--बाँकी चितवन से; निरीक्षणेन--देखने से; चित्तम्‌ू--हमारे मन को; क्षिणोति--नष्ट करता है; अमुम्‌--उसके;ऋते--बिना; नु--निस्सन्देह; कथम्‌--कैसे; भवेम--हम जीवित रह सकती हैं|

हम अनन्त के मित्र कृष्ण के बिना भला कैसे जीवित रह सकती हैं? वे शाम को ग्वालबालों के साथ ब्रज लौटा करते थे तो उनके बाल तथा उनकी माला गौवों के खुरों से उठती धूल सेधूसरित हो जाते थे।

जब वे बाँसुरी बजाते तो वे अपनी हँसीली बाँकी चितवन से हमारे मन कोमोह लेते थे।

श्रीशुक उबाचएवं ब्रुवाणा विरहातुरा भूशंब्रजस्त्रिय: कृष्णविषक्तमानसा: ।

विसृज्य लज्जां रुरुदुः सम सुस्वरंगोविन्द दामोदर माधवेति ॥

३१॥

श्री-शुक:ः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; ब्रुवाणा:--बोलती हुई; विरह--वियोग की भावनाओं से;आतुरा:--व्याकुल; भृूशम्‌--नितान्त; ब्रज-स्त्रिय:--व्रज की स्त्रियाँ; कृष्ण--कृष्ण से; विषक्त--अनुरक्त; मानसा:--मनवाली; विसृज्य--त्यागकर; लज्ञाम्‌--लज्जा; रुरुदु: स्म--चिल्लाने लगीं; सु-स्वरम्‌--जोर जोर से; गोविन्द दामोदर माधवइति--हे गोविन्द, हे दामोदर, हे माधव ।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इन शब्दों को कहने के बाद ब्रज की स्त्रियाँ, जो कृष्ण के प्रतिइतनी अनुरक्त थीं, उनके आसन्न वियोग से अत्यन्त श्षुब्ध हो उठीं।

वे सारी लाज-हया भूल गईऔर जोरों से 'हे गोविन्द, हे दामोदर, हे माधव, ' चिल्ला उठीं।

स्त्रीणामेवं रुदन्‍्तीनामुदिते सवितर्यथ ।

अक्रूरश्रोदयामास कृतमैत्रादिको रथम्‌ ॥

३२॥

स्त्रीणाम्‌-स्त्रियों के; एवम्‌--इस प्रकार से; रुदन्‍्तीनाम्‌ू--रूदन करती हुईं; उदिते--उदय होते हुए; सवितरि--सूर्य; अथ--तब; अक्रूरः:--अक्ूर; चोदबाम्‌ आस--चल पड़ा; कृत--पूरा करके; मैत्र-आदिक:--प्रातःकालीन पूजा तथा नैतिक कार्य;रथम्‌--रथ पर

किन्तु गोपियों द्वारा इस प्रकार क्रन्दन करते रहने पर भी अक्ूर प्रातःकालीन पूजा तथा अन्यकार्य समाप्त करके अपना रथ हाँकने लगे।

गोपास्तमन्वसज्जन्त नन्दाद्या: शकटैस्ततः ।

आदायोपायनं भूरि कुम्भानगोरससम्भूतान्‌ ॥

३३॥

गोपाः-ग्वालों ने; तमू--उसका; अन्वसज्जन्त--पीछा किया; नन्द-आद्या:--नन्द इत्यादि; शकटैः--अपने छकड़ों में; तत:--तब; आदाय--ले लेकर; उपायनम्‌--भेंटें; भूरि-- प्रचुर; कुम्भान्‌ू-घड़े; गो-रस--दूध की बनी वस्तुएँ; सम्भृतान्‌ू--भरी हुई

नन्द महाराज को आगे करके ग्वाले अपने अपने छकड़ों में भगवान्‌ कृष्ण के पीछे पीछे होलिये।

ये लोग अपने साथ राजा के लिए अनेक भेंटें लिये हुए थे जिनमें घी तथा अन्य दुग्धउत्पादों से भरे हुए मिट्टी के घड़े सम्मिलित थे।

गोप्यश्च दयितं कृष्णमनुव्रज्यानुरक्लिता: ।

प्रत्यादेशं भगवतः कादक्षन्त्यश्चावतस्थिरे ॥

३४॥

गोप्य:--गोपियाँ; च--तथा; दबितम्‌--अपने प्रियतम; कृष्णम्‌--कृष्ण के; अनुव्रज्य--पीछे पीछे चलकर; अनुरज्विता:--प्रसन्न; प्रत्यादेशम्‌--बदले में कुछ आदेश; भगवत:ः--भगवान्‌ से; काड्क्षन्त्य:--आकांक्षा करती हुईं; च--तथा; अवतस्थिरे--खड़ी रहीं।

भगवान्‌ कृष्ण ने ( अपनी चितवन से ) गोपियों को कुछ कुछ ढाढस बँधाया और वे भीकुछ देर तक उनके पीछे पीछे चलीं।

फिर इस आशा से वे बिना हिले-डुले खड़ी रहीं कि वे उन्हेंकुछ आदेश देंगे।

तास्तथा तप्यतीर्वीक्ष्य स्वप्रस्थाणे यदूत्तम: ।

सान्त्वयामस सप्रेमैरायास्यथ इति दौत्यके: ॥

३५॥

ताः--उन्हें ( गोपियों को ); तथा--इस तरह; तप्यती:--विलाप करती; वीक्ष्य--देखकर; स्व-प्रस्थाने-- अपने विदा होते समय;यदु-उत्तम:--यदुओं में श्रेष्ठ; सान्तवयाम्‌ आस--उन्हें ढाढ़स बँधाया; स-प्रेमैः --प्रेम से युक्त होकर; आयास्ये इति--' मैं वापसआऊँगा'; दौत्यकैः--दूत से भेजे गये शब्दों से |

जब वे विदा होने लगे तो उन यदुश्रेष्ठ ने देखा कि गोपियाँ किस तरह विलाप कर रही थीं।

अतः उन्होंने एक दूत भेजकर यह प्रेमपूर्ण वादा भेजा कि 'मैं वापस आऊँगा' इस प्रकार उन्हें सान्त्वना प्रदान की।

यावदालक्ष्यते केतुर्यावद्रेणू रथस्य च ।

अनुप्रस्थापितात्मानो लेख्यानीवोपलक्षिता: ॥

३६॥

यावत्‌--जब तक; आलक्ष्यते--दिखाई देता रहा; केतु:-- ध्वजा; यावत्‌--जब तक; रेणु:-- धूल; रथस्य--रथ की; च--तथा;अनुप्रस्थापित--पीछे पीछे भेजती हुईं; आत्मान:--अपने मनों को; लेख्यानि--लिखित चित्रों; इब--सहृश; उपलक्षिता:--प्रकटहो रही थीं

गोपियाँ अपने अपने मन को कृष्ण के साथ भेजकर, किसी चित्र में बनी आकृतियों कीभाँति निश्चेष्ट खड़ी रहीं।

वे वहाँ तब तक खड़ी रहीं जब तक रथ के ऊपर की पताक दिखती रहीऔर जब तक रथ के पहियों से उठी हुई धूल उन्हें दिखलाई पड़ती रही।

ता निराशा निववृतुर्गोविन्दविनिवर्तने ।

विशोका अहनी निन्‍्युर्गायन्त्य: प्रियचेष्टितम्‌ ॥

३७॥

ताः--वे; निराशा:--आशारहित; निववृतु:--लौट आई; गोविन्द-विनिवर्तने--गोविन्द की वापसी का; विशोका:--अत्यन्तदुखी; अहनी--दिन तथा रात; निन्युः--बिताया; गायन्त्य:--कीर्तन करते; प्रिय--अपने प्रियतम की; चेष्टितम्‌ू--लीलाओं याकार्यकलापों के विषय में।

तब गोपियाँ निराश होकर लौट गईं।

उन्हें इसकी आशा नहीं रही कि गोविन्द उनके पासकभी लौटेंगे भी।

वे शोकाकुल होकर अपने प्रिय की लीलाओं का कीर्तन करती हुईं अपने दिनऔर रातें बिताने लगीं।

भगवानपि सम्प्राप्तो रामाक्रूरयुतो नृप ।

रथेन वायुवेगेन कालिन्दीमघनाशिनीम्‌ ॥

३८ ॥

भगवान्‌--भगवान्‌; अपि--तथा; सम्प्राप्त: -पहुँचे; राम-अक्रूर-युतः--बलराम तथा अक्रूर के साथ; नृूप--हे राजा( परीक्षित ); रथेन--रथ के द्वारा; वायु--वायु जैसे; वेगेन--तेज; कालिन्दीम्‌ू--कालिन्दी ( यमुना ) पर; अघध--पाप;नाशिनीम्‌--नष्ट करने वाली |

हे राजन, भगवान्‌ कृष्ण भगवान्‌ बलराम तथा अक्रूर समेत उस रथ में वायु जैसी तेजी सेयात्रा करते हुए सारे पापों को विनष्ट करने वाली कालिन्दी नदी पर पहुँचे ।

तत्रोपस्पृश्य पानीयं पीत्वा मृष्टे मणिप्रभम्‌ ।

वृक्षषण्डमुपब्रज्य सरामो रथमाविशत्‌ ॥

३९॥

तत्र--वहाँ; उपस्पृश्य--जल का स्पर्श करके; पानीयम्‌ू--अपने हाथ में; पीत्वा--पीकर; मृष्टम्‌--मधुर; मणि--मणियों केतुल्य; प्रभम्‌--तेजयुक्त; वृक्ष--वृक्षों के; षण्डम्‌--कुंज; उपब्रज्य--के पास चलकर; स-राम:--बलराम सहित; रथम्‌--रथमें; आविशत्‌--सवार हो गये।

नदी का मधुर जल चमकीली मणियों से भी अधिक तेजवान था।

भगवान्‌ कृष्ण ने शुद्धिके लिए जल से मार्जन किया और हाथ में लेकर आचमन किया।

तत्पश्चात्‌ अपने रथ को एकवृक्ष-कुंज के पास मँगाकर बलराम सहित उस पर पुनः सवार हो गये।

अक्रूरस्तावुपामन्त्रय निवेश्य च रथोपरि ।

कालिन्द्या हृदमागत्य स्नानं विधिवदाचरत्‌ ॥

४०॥

अक्रूरः:--अक्रूर; तौ--उन दोनों से; उपामन्त्रय-- अनुमति लेकर; निवेश्य--उन्हें बैठाकर; च--तथा; रथ-उपरि--रथ पर;कालिन्द्या:--यमुना के; हृदम्‌-कुंड में; आगत्य--जाकर; स्नानम्‌ू--स्नान; विधि-वत्‌--शास्त्रीय विधि के अनुसार;आचरत्‌-पूरा किया |

अक्रूर ने दोनों भाइयों से रथ पर बैठने के लिये कहा।

तत्पश्चात्‌ उनसे अनुमति लेकर वेयमुना कुंड में गये और शास्त्रों में निर्दिष्ट विधि के अनुसार स्नान किया।

निमज्य तस्मिन्सलिले जपन्ब्रह्न सनातनम्‌ ।

तावेब दहदृशेक्रूरो रामकृष्णौ समन्वितौ ॥

४१॥

निमज्य--घुसकर; तस्मिन्‌ू--उस; सलिले--जल में; जपन्‌--उच्चारण करते हुए; ब्रह्म--वैदिक मंत्र; सनातनम्‌--नित्य; तौ--दोनों ने; एब--निस्सन्देह; दहशे--देखा; अक्रूर: --अक्रूर ने; राम-कृष्णौ--बलराम तथा कृष्ण; समन्वितौ--साथ साथ |

जल में प्रविष्ट होकर वेदों से नित्य मंत्रों का जप करते हुए अक्रूर ने सहसा बलराम तथाकृष्ण को अपने सम्मुख देखा।

तौ रथस्थौ कथमिह सुतावानकदुन्दुभे: ।

तहिं स्वित्स्यन्दने न स्त इत्युन्मज्य व्यचष्ट सः ॥

४२॥

तत्रापि च यथापूर्वमासीनौ पुनरेव सः ।

न्यमज्जहर्शन यन्मे मृषा कि सलिले तयो; ॥

४३॥

तौ--वे दोनों; रथ-स्थौ--रथ पर आसीन; कथम्‌--कैसे; इह--यहाँ; सुतौ--दोनों पुत्र; आनकदुन्दुभे:--वसुदेव के; तहि--तब; स्वित्‌ू--क्या; स्यन्दने--रथ पर; न स्तः--नहीं हैं; इति--यह सोचते हुए; उन्‍्मज्य--जल से निकलकर; व्यचष्ट--देखा;सः--उसने; तत्र अपि--उसी स्थान पर; च--तथा; यथा--जिस तरह; पूर्वम्‌ू--पहले; आसीनौ--बैठे हुए; पुनः--फिर से;एव--निस्सन्देह; सः--वह; न्यमज्जत्‌--जल में घुस गया; दर्शनम्‌--दर्शन; यत्‌--यदि; मे--मेरा; मृषा--झूठ; किमू--शायद;सलिले--जल में; तयो:--उन दोनों का।

अक्रूर ने सोचा: ' आनकदुन्दुभि के दोनों पुत्र, जो कि रथ पर बैठे हैं यहाँ जल में किस तरहखड़े हो सकते हैं? अवश्य ही उन्होंने रथ छोड़ दिया होगा।

' किन्तु जब वे नदी से निकलकरबाहर आये तो वे दोनों पहले की तरह रथ पर थे।

अपने आप यह प्रश्न करते हुए कि 'क्या जलमें मैने उनका जो दर्शन किया वह भ्रम था ?' अक्रूर पुनः कुंड में प्रविष्ट हो गये।

भूयस्तत्रापि सोद्राक्षीत्स्तूयमानमही श्वरम्‌ ।

सिद्धचारणगन्धर्वैरसुरैर्नतकन्धरै: ॥

४४॥

सहस््रशिरसं देवं सहस्रफणमौलिनम्‌ ।

नीलाम्बरं विसश्रेतं श्रद्ढेः श्रेतमिव स्थितम्‌ ॥

४५॥

भूय:--पुनः; तत्र अपि--उसी स्थान पर; सः--उसने; अद्राक्षीत्‌--देखा; स्तूयमानम्‌--स्तुति किये जाते; अहि-ई श्वरम्‌-सर्पो केस्वामी ( अनन्त शेष जो कि बलराम के स्वांश हैं और विष्णु की शय्या रूप हैं ); सिद्ध-चारण-गन्धर्व: --सिद्धों, चारणों तथागन्धर्वों द्वारा; असुरैः--तथा असुरों द्वारा; नत--झुका हुआ; कन्धरैः--गर्दनों से; सहस्त्र--हजारों; शिरसम्‌--सिर वाले; देवम्‌--भगवान्‌ को; सहस्त्र--हजारों; फण--फणों से; मौलिनम्‌--और मुकुट; नील--नीला; अम्बरम्‌--वस्त्र; विस--कमल-नालकेतन्तु जैसा; श्वेतमू-सफेद; श्रृद्री:--चोटियों समेत; श्वेतम्‌--कैलाश पर्वत; इब--सहश; स्थितम्‌--स्थित |

अब अक्रूर ने वहाँ सर्पपाज अनन्त शेष को देखा जिनकी प्रशंसा सिद्ध, चारण, गन्धर्व तथाअसुरगण अपना अपना शीश झुकाकर कर रहे थे।

अक्रूर ने जिन भगवान्‌ को देखा उनकेहजारों सिर, हजारों फन तथा हजारों मुकुट थे।

उनका नीला वस्त्र तथा कमल-नाल के तन्तुओं-सा श्वेत गौर वर्ण ऐसा लग रहा था मानो अनेक चोटियों वाला श्वेत कैलाश पर्वत हो।

तस्योत्सड़े घनश्यामं पीतकौशेयवाससम्‌ ।

पुरुष चतुर्भुजं शान्तं पद्मपत्रारुणेक्षणम्‌ ॥

४६॥

चारुप्रसन्नवदनं चारुहासनिरीक्षणम्‌ ।

सुभ्रूत्रसं चारुकर्ण सुकपोलारुणाधरम्‌ ॥

४७॥

प्रलम्बपीवरभुजं तुझंसोर:स्थलभञ्रियम्‌ ।

कम्बुकण्ठं निम्ननाभि वलिमत्पल्लवोदरम्‌ ॥

४८॥

तस्य--उस ( अनन्त शेष ) की; उत्सड़े--गोद में; घन--वर्षा के बादल की तरह; श्यामम्‌--गहरा नीला; पीत--पीला;कौशेय--रेशमी; वाससम्‌-- वस्त्र; पुरुषम्‌-परमेश्वर को; चतु:-भुजम्‌--चार भुजाओं वाले; शान्तम्‌-शान्त; पढा--कमल के; पत्र--पत्ते के समान; अरुण--लाल; ईक्षणम्‌-- आँखें; चारु-- आकर्षक; प्रसन्न--प्रसन्न; वदनम्‌--मुखमण्डल; चारु--आकर्षक; हास--हँसी; निरीक्षणम्‌--जिसकी चितवन; सु--सुन्दर; धू-- भौंहें; उत्‌--उठी; नसम्‌ू--नाक; चारु--आकर्षक;कर्णम्‌--कान; सु--सुन्दर; कपोल--गाल; अरुण--लाल; अधरम्‌--होंठों को; प्रलम्ब--बड़ी; पीवर--मजबूत; भुजम्‌--भुजाओं को; तुड्ड---उठी; अंस--कंधे; उर:-स्थल--तथा छाती; थ्रियम्‌--सुन्दर; कम्बु--शंख की तरह; कण्ठम्‌--गला;निम्न--गहरी; नाभिमू--नाभि; वलि--रेखाएँ, सिलवटें; मत्‌--से युक्त; पल्‍लव--पत्ती के समान; उदरम्‌ू--उदर।

तब अक़ूर ने भगवान्‌ को अनन्त शेष की गोद में शान्तिपूर्वक शयन करते देखा।

उस परमपुरुष का रंग गहरे नीले बादल के समान था।

वे पीताम्बर पहने थे, उनके चार भुजाएँ थीं औरउनकी आँखें लाल कमल की पंखुड़ियों जैसी थीं।

उनका मुख आकर्षक एवं हँसी से युक्त होनेसे प्रसन्न लग रहा था।

उनकी चितवन मोहक थी, भौंहें सुन्दर थीं, नाक उठी हुई, कान सुडौलतथा गाल सुन्दर और होंठ लाल लाल थे।

भगवान्‌ के चौड़े कंधे तथा विशाल वक्षस्थल सुन्दरलग रहे थे और उनकी भुजाएँ लम्बी तथा बलिष्ठ थीं।

उनकी गर्दन शंख जैसी, नाभि गहरी तथाउनके पेट में वटवृक्ष के पत्तों जैसी रेखाएँ थीं।

बृहत्कतिततश्रोणि करभोरुद्दयान्वितम्‌ ।

चारुजानुयुगं चारु जज्लायुगलसंयुतम्‌ ॥

४९॥

तुड्गुल्फारुणनख ब्रातदीधितिभिर्वृतम्‌ ।

नवाडुल्यडुष्टदलैविलसत्पादपड्ूजम्‌ ॥

५०॥

बृहत्‌--विशाल; कटि-तट--कमर का भाग; श्रोणि--तथा कूल्हे; करभ--हाथी के सूँड़ जैसे; ऊरू--जाँघों का; द्ृय--जोड़ा;अन्वितम्‌--युक्त; चारु--आकर्षक; जानु-युगम्‌ू--दो घुटने; चारु--आकर्षक; जज्ञा--जाँघों का; युगल--जोड़ा; संयुतम्‌--से युक्त; तुड़-- ऊँचा; गुल्फ--टखने; अरुण--लाल; नख-ब्रात--नाखूनों से; दीधितिभि:--तेजस्वी किरणों से; वृतम्‌--घिराहुआ; नव--कोमल; अड्डुलि-अड्'ुषठ --अँगूठे तथा अँगुलियाँ; दलैः--फूलों की पंखड़ियों की तरह; विलसत्‌--चमकती; पाद-पड्डुजम्‌--चरणकमल।

उनकी कमर तथा कूल्हे विशाल थे, जाँघें हाथी की सूँड़ जैसी तथा घुटने और रानें सुगठितथे।

उनके उठे हुए टखनों से उनके फूलों पंखड़ियों जैसी पाँव की उंगलियों के नाखूनों सेनिकलने वाला चमकीला तेज परावर्तित होकर उनके चरणकमलों को सुन्दर बना रहा था।

सुमहाईमणित्रात किरीटकटकाडूदै: ।

कटिसूत्रब्रह्मसूत्र हारनूपुरकुण्डलैः ॥

५१॥

भ्राजमानं पद्ाकरं शद्भुचक्रगदाधरम्‌ ।

श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभं वनमालिनम्‌ ॥

५२॥

सु-महा--अत्यधिक; अर्ह--मूल्यवान; मणि-ब्रात--अनेक मणियों; किरीट--मुकुट; कटक--कड़े; अड्गदैः--बाजूबंदों सेयुक्त; कटि-सूत्र--करधनी से; ब्रह्म-सूत्र--जनेऊ; हार--गले का हार; नूपुर--पायल; कुण्डलैः --तथा कान के कुंडलों से;भ्राजमानम्‌--तेजयुक्त; पद्य--कमल; करम्‌--हाथ में; शट्गडु--शंख; चक्र--चक्र; गदा--तथा गदा; धरम्‌-- धारण किये;श्रीवत्स-- श्रीवत्स चिह्न; वक्षसम्‌--छाती पर; भ्राजत्‌--सुशोभित; कौस्तुभम्‌--कौस्तुभ मणि से; वन-मालिनम्‌--फूलों कीमाला धारण किये।

अनेक बहुमूल्य मणियों से युक्त मुकुट, कड़े तथा बाजूबंदों से सुशोभित तथा करधनी,जनेऊ, गले का हार, नूपुर तथा कुण्डल धारण किये भगवान्‌ चमचमाते तेज से युक्त थे।

वे एकहाथ में कमल का फूल लिये थे और अन्यों में शंख, चक्र तथा गदा धारण किये थे।

उनकेवक्षस्थल पर श्रीवत्स चिन्ह, देदीप्यमान कौस्तुभ मणि तथा फूलों की माला शोभायमान थी।

सुनन्दनन्दप्रमुखै: पर्षदे: सनकादिभि: ।

सुरेशै्ब्रह्मरुद्राद्यैन॑वभिश्च द्विजोत्तमै: ॥

५३॥

प्रह्मदनारदवसु प्रमुखर्भागवतोत्तमै: ।

स्तूयमानं पृथग्भावैर्वचोभिरमलात्मभि: ॥

५५॥

अ्रिया पुष्ठया गिरा कान्त्या कीर्ल्या तुष्येलयोर्जया ।

विद्ययाविद्यया शकत्या मायया च निषेवितम्‌ ॥

५५॥

सुनन्द-नन्द-प्रमुखैः --सुनन्द, नन्द इत्यादि; पर्षदैः--अपने पार्षदों सहित; सनक-आदिभि:--सनक कुमार तथा उनके भाइयोंसहित; सुर-ईशैः--मुख्य देवताओं से; ब्रह्म-रुद्र-आद्यै:--ब्रह्म, रुद्र इत्यादि से; नवभि:--नौ; च--तथा; द्विज-उत्तमैः --मुख्यब्राह्मणों ( मरीचि आदि ) से; प्रह्मद-नारद-वसु-प्रमुखैः--प्रह्माद, नारद, उपरिचर वसु इत्यादि से; भागवत-उत्तमै: --सर्व श्रेष्ठभक्तों द्वारा; स्तूयमानम्‌--प्रशंसित; पृथक्‌-भावैः -- प्रत्येक द्वारा भिन्न भावों से; वचोभि:--शब्दों से; अमल-आत्मभि: --पवित्रकृत; श्रीया पुष्ठया गीरा कान्त्या कीर्त्या तुष्ठया इलया ऊर्जया-- श्री, पुष्टि, गीर, कान्ति, कीर्ति, तुष्टि, इला, ऊर्जा नामक अन्तरंगाशक्तियों से; विद्यया अविद्यया--विद्या तथा अविद्या नामक शक्तियों से; शक्‍त्या--अपनी हादिनी शक्ति से; मायया--अपनीसृजनात्मक शक्ति से; च--तथा; निषेवितम्‌--सेवित होकर ।

भगवान्‌ के चारों ओर घेरा बनाकर पूजा करने बालों में नन्‍्द, सुनन्द तथा उनके अन्य निजीपार्षद, सनक तथा अन्य कुमारगण, ब्रह्मा, रुद्र तथा अन्य प्रमुख देवता, नौ मुख्य ब्राह्मण तथाप्रह्ाद, नारद, उपरिचर वसु इत्यादि महाभागवत थे।

इनमें से प्रत्येक महापुरुष अपने अपनेविशिष्टभाव में भगवान्‌ की प्रशंसा में पवित्र शब्दोच्चार करके पूजा कर रहा था।

यही नहीं,भगवान्‌ की सेवा में उनकी मुख्य अन्तरंगा शक्तियों--श्री, पुष्टि, गीर, कान्ति, कीर्ति, तुष्टि, इलातथा ऊर्जा-के साथ साथ भौतिक शक्तियाँ विद्या, अविद्या, माया तथा उनकी अंतरंगा ह्ादिनीशक्ति जुटी हुई थीं।

विलोक्य सुभूशं प्रीतो भक्त्या परमया युतः ।

हृष्यत्तनूरूहों भावपरिक्लिन्नात्मलोचन: ॥

५६॥

गिरा गद्गदयास्तौषीत्सत्त्वमालम्ब्य सात्वतः ।

प्रणम्य मूर्ध्नावहितः कृताझ्ललिपुट: शनै: ॥

५७॥

विलोक्य--( अक्रूर ने ) देखकर; सु-भूशम्‌--अत्यधिक; प्रीत:--प्रसन्न; भक्त्या-- भक्ति से; परमया--परम; युतः--युक्त;हृष्यत्‌--खड़े हुए; तनू-रूह:--शरीर के रोम; भाव--प्रेमानन्द से; परिक्लिन्न--आर्द्र, नम; आत्म--शरीर; लोचन:--तथाआँखें; गिरा--वाणी से; गदगदया--अवरुद्ध; अस्तौषीतू--स्तुति की; सत्त्वम्‌--गम्भीरता; आलम्ब्य--सहारा लेकर;सात्वतः--महाभागवत; प्रणम्य--झुककर; मूर्धश्ना--सिर के बल; अवहितः-ध्यानपूर्वक; कृत-अद्जलि-पुट:--आदरपूर्वकहाथ जोड़कर; शनै:--धीरे धीरे।

ज्योंही महाभागवत अक्रूर ने यह दृश्य देखा, वे अत्यन्त प्रसन्न हो उठे और उनमें दिव्य शक्तिजाग उठी।

तीव्र आनन्द से उन्हें रोमांच हो आया और नेत्रों से अश्रु बह चले जिससे उनका साराशरीर भीग गया।

किसी तरह अपने को सँभालते हुए अक्रूर ने पृथ्वी पर अपना सिर झुका दिया।

तत्पश्चात्‌ सम्मान में अपने हाथ जोड़े और भावविभोर वाणी से अत्यन्त धीमे धीमे तथाध्यानपूर्वक भगवान्‌ की स्तुति करने लगे।

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