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अध्याय छत्तीस: अरिष्टा, बैल दानव का वध

10.36श्री बादरायणिरुवाचअथ तह्ागतो गोष्टमरिष्टो वृषभासुरः ।

महीम्महाककुत्काय: कम्पयन्खुरविक्षताम्‌ ॥

१॥

श्री बादरायणि: उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; अथ--आगे; तहिं---तब; आगत:--आया; गोष्ठम्‌--ग्वालों के गाँव में;अरिष्ट:--अरिष्ट नामक; वृषभ-असुर: --वृषभासुर; महीम्‌--पृथ्वी को; महा--विशाल; ककुत्‌--डिलला वाला; काय:--शरीर; कम्पयन्‌--कँपाते हुए; खुर--अपने खुरों से; विक्षताम्‌-- क्षत-विक्षत

शुकदेव गोस्वामी ने कहा: तत्पश्चात्‌ अरिष्टासुर गोपों के गाँव में आया।

वह बड़े डिल्लेवाले बैल के रूप में प्रकट होकर अपने खुरों से पृथ्वी को क्षत-विक्षत करके उसे कँपाने लगा।

रम्भमाण: खरतरं पदा च विलिखन्महीम्‌ ।

उद्यम्य पुच्छे वप्राणि विषाणाग्रेण चोद्धरन्‌ ।

किश्ञित्किज्निच्छकृन्मुझ्नन्मृत्रयन्स्तब्धलोचन: ॥

२॥

रम्भभाण:--रँभाते हुए; खर-तरम्‌--खूब तेजी से; पदा--अपने खुरों से; च--तथा; विलिखन्‌--खुरचते हुए; महीम्‌--पृथ्वीको; उद्यम्थ--ऊपर उठाकर; पुच्छम्‌--अपनी पूँछ; वप्राणि--बाँधों को; विषाण--अपने सींगों की; अग्रेण--नोकों से; च--तथा; उद्धरन्‌--उठाकर चीरते हुए; किश्ञित्‌ किल्ञित्‌ू--कुछ कुछ; शकृत्‌--मल; मुझ्नन्‌ू--त्याग करते हुए; मूत्रयन्‌ू--पेशाबकरते हुए; स्तब्ध--चमकदार; लोचन:--आँखें |

अरिष्टासुर ने जोर से रँभाते हुए धरती को खुरों से कुरेदा।

वह अपनी पूँछ उठाये और अपनीआँखें चमकाता अपने सींगों के नौकों से बाँधों को चीरने लगा और बीच बीच में थोड़ा थोड़ामल-मूत्र भी छोड़ता जाता था।

यस्य निर्हादितेनाड़ निष्ठेरेण गवां नृणाम्‌ ।

पतन्त्यकालतो गर्भा: स्त्रवन्ति सम भयेन वै ॥

३॥

निर्विशन्ति घना यस्य ककुद्यचलशड्डया ।

त॑ तीक्ष्णश्रुड्डमुद्वीक्ष्य गोप्यो गोपाश्च तत्रसु; ॥

४॥

यस्य--जिसकी; निर्हादितेन--गर्जन से; अड्ग--हे राजा ( परीक्षित ); निष्ठेरेग--निष्ठर, निर्मोही; गबाम्‌--गौवों के; नृणाम्‌--मनुष्यों के; पतन्ति--गिर जाते हैं; अकालत:--असमय; गर्भा:--गर्भ; स््रवन्ति स्म--गर्भपात हो जाता है; भयेन-- भय से;वै--निस्सन्देह; निर्विशन्ति-- प्रवेश करते हैं; घना:--बादल; यस्य--जिसके; ककुदि--डिल्ले पर; अचल--पर्वत के रूप में;शट्डूया-- भ्रम से; तम्‌--उसको; तीक्षण--तेज; श्रृड़म्‌--सींग; उद्दीक्ष्य--देखकर; गोप्य: --गोपियाँ; गोपा:--तथा ग्वाले; च--तथा; तत्रसु:-- भयभीत हो उठे |

हे राजन, तीखे सींगो वाले अरिष्टासुर के डिल्ले को पर्वत समझकर बादल उसके आसपासमँडराने लगे, अतः जब ग्वालों तथा गोपियों ने उस असुर को देखा तो वे भयभीत हो उठे।

दरअसल उसकी गर्जना की तीव्र गूँज इतनी भयावह थी कि गर्मिणी गौवों तथा स्त्रियों केगर्भपात हो गये।

पशवो दुद्गुवुर्भीता राजन्सन्त्यज्य गोकुलम्‌ ।

कृष्ण कृष्णेति ते सर्वे गोविन्दं शरणं ययु: ॥

५॥

पशवः-घरेलू पशु; दुद्गुबः-- भाग गये; भीता:--डर के मारे; राजन्‌--हे राजन्‌; सन्त्यज्य--छोड़कर; गो-कुलम्‌ू--चरागाह;कृष्ण कृष्ण इति--' कृष्ण कृष्ण ' इस तरह; ते--वे ( वृन्दावनवासी ); सर्वे--सभी; गोविन्दम्‌--गोविन्द की; शरणम्‌--शरणमें; ययु:--गये |

हे राजन, घरेलू पशु भय के मारे चरागाह से भाग गये और सारे निवासी 'कृष्ण कृष्ण 'चिल्लाते हुए शरण के लिए भगवान्‌ गोविन्द के पास दौड़े।

भगवानपि तद्वीक्ष्य गोकुलं भयविद्वुतम्‌ ।

मा भेष्टेति गिराश्वास्य वृषासुरमुपाहयत्‌ ॥

६॥

भगवान्‌-- भगवान्‌ ने; अपि--निस्सन्देह; तत्‌--उसे; वीक्ष्य--देखकर; गो-कुलम्‌--गोकुल को; भय--भय से; विद्वुतम्‌--भगाया हुआ; मा भैष्ट--डरना मत; इति--इस प्रकार; गिरा--शब्दों से; आश्वास्य--आ श्वासन देकर; वृष-असुरम्‌--वृषासुर को;उपाहयत्--ललकारा।

जब भगवान्‌ ने देखा कि सारा गोकुल भय के मारे भगा जा रहा है, तो उन्होंने यह कहकरउन्हें आश्वासन दिया, 'डरना मत।

तत्पश्चात्‌ उन्होंने वृषासुर को इस प्रकार ललकारा।

गोपालै: पशुभिर्मन्द त्रासिते: किमसत्तम ।

मयि शास्तरि दुष्टानां त्वद्विधानां दुरात्मनाम्‌ ॥

७॥

गोपालै:--ग्वालों के साथ; पशुभि:--तथा उनके पशुओं के साथ; मन्द--हे मूर्ख; त्रासितैः --डरे हुए; किम्‌ू--क्या प्रयोजन;असत्तम-२ सर्वाधिक दुष्ट; मयि--मेरे रहते; शास्तरि--दण्ड देने वाले के रूप में; दुष्टानाम्‌ू--दुष्टों का; त्वत्‌-विधानाम्‌ू--तुमजैसे; दुरात्मनाम्‌--दुरात्माओं का।

रे मूर्ख! रे दुष्ट! तुम क्या सोचकर ग्वालों को तथा उनके पशुओं को डरा रहे हो जबकि मैंतुम जैसे दुरात्माओं को दण्ड देने के लिए यहाँ हूँ।

इत्यास्फोत्याच्युतोरिष्ट तलशब्देन कोपयन्‌ ।

सख्युरंसे भुजाभोगं प्रसार्यावस्थितो हरि: ॥

८॥

इति--इस प्रकार बोलते हुए; आस्फोत्य--अपनी भुजाएँ ठोंकते; अच्युत:--अच्युत भगवान्‌; अरिष्टम्‌--अरिष्टासुर को; तल--अपनी हथेली की ताल से; शब्देन--शब्द के साथ; कोपयन्‌--क्रोध करते हुए; सख्यु:--मित्र के; अंसे--कन्धे पर; भुज--अपनी बाँह; आभोगम्‌--साँप के शरीर ( जैसी ); प्रसार्य--फैलाकर; अवस्थित:--खड़े थे; हरिः--हरि भगवान्‌ |

ये शब्द कहकर अच्युत भगवान्‌ हरि ने अपनी हथेलियों से अपनी बाँहें ठोंकीं जिससे जोरकी ध्वनि से अरिष्ट और अधिक क्रुद्ध हो उठा।

तब भगवान्‌ अपनी बलशाली सर्प जैसी बाँहअपने एक सखा के कन्धे पर डालकर असुर की ओर मुँह करके खड़े हो गये।

सोप्येवं कोपितोरिष्ट: खुरेणावनिमुल्लिखन्‌ ।

उद्यत्पुच्छभ्रमन्मेघ: क्रुद्धः कृष्णमुपाद्रवत्‌ ॥

९॥

सः--वह; अपि--निस्सन्देह; एवम्‌--इस प्रकार; कोपित:--क्रुद्ध; अरिष्ट: --अरिष्ट; खुरेण-- अपने खुरों से; अवनिम्‌--पृथ्वीको; उल्लिखन्‌--कुरेदते हुए; उद्यत्‌ू--उठी हुईं; पुच्छ--अपनी पूँछ के भीतर; भ्रमन्‌--घूमते हुए; मेघ:--बादल; क्रुद्ध:--तमतमाया; कृष्णम्‌--कृष्ण की ओर; उपाद्रवत्‌--आक्रमण किया, झपटा |

इस तरह उकसाने पर अरिष्ट ने अपने एक खुर से धरती कुरेदी और तब वह क्रोध के साथकृष्ण पर झपटा।

ऊपर उठी हुई उसकी पूँछ के चारों ओर बादल मँडरा रहे थे।

अग्रन्यस्तविषाणाग्र: स्तब्धासूृग्लोचनोच्युतम्‌ ।

कटाक्षिप्याद्रवत्तूर्णमिन्द्रमुक्तोशनिर्यथा ॥

१०॥

अग्र--आगे; न्यस्त--झुकाते हुए; विषाण--अपने सींगों की; अग्र:--नोक; स्तब्ध--टकटकी लगाये; असृक्‌ू--लाल, रक्तजैसी; लोचन:--आँखें; अच्युतम्‌-- भगवान्‌ कृष्ण को; कट-आशक्षिप्य--कटाक्ष करते हुए; अद्गब॒त्‌--दौड़ा; तूर्णम्‌--पूरे बेगसे; इन्द्र-मुक्त:--इन्द्र द्वारा छोड़ा गया; अशनि:--वज्; यथा--सहृश |

अपने सींगों के अग्रभाग सामने की ओर सीधे किये हुए तथा अपनी रक्तिम आँखों की बगलसे तिरछे घूर कर भय दिखाकर अरिष्ट पूरे वेग से कृष्ण की ओर झपटा मानो इन्द्र द्वारा चलायागया वज्ज हो।

गृहीत्वा श्रूड़योस्तं वा अष्टादश पदानि सः ।

प्रत्यपोवाह भगवान्गज: प्रतिगजं यथा ॥

११॥

गृहीत्वा--पकड़कर; श्रृड़यो:--दोनों सींगों से; तम्‌--उसको; बै--निस्सन्देह; अष्टादश--अठारह; पदानि--पग; सः--उस;प्रत्यपोवाह--पीछे फेंका; भगवान्‌-- भगवान्‌ ने; गज:--हाथी; प्रति-गजम्‌--अपने प्रतिद्वन्द्दी हाथी को; यथा--जिस तरह।

भगवान्‌ कृष्ण ने अरिष्टासुर को सींगों से पकड़ लिया और उसे अठारह पग पीछे फेंक दिया जिस तरह एक हाथी अपने प्रतिद्वन्दी हाथी से लड़ते समय करता है।

सोपविद्धो भगवता पुनरुत्थाय सत्वरम्‌ ।

आपतल्स्विन्नसर्वाझे नि: श्वसन्क्रोधमूर्च्छित: ॥

१२॥

सः--वह; अपविद्ध:--पीछे फेंका गया; भगवता-- भगवान्‌ द्वारा; पुनः: --फिर; उत्थाय--उठकर; सत्वरम्‌--तुरन्‍्त; आपतत्‌--आक्रमण किया; स्विन्न--पसीने से तर; सर्व--सारे; अड्र:--अंग; नि: श्रसन्‌--हाँफते हुए; क्रोध--क्रो ध से; मूर्च्छित:--बेहोश,मूच्छित |

इस प्रकार भगवान्‌ द्वारा पीछे धकेले जाने पर, वृषासुर फिर से उठ खड़ा हुआ और हॉफताहुआ तथा सारे शरीर पर आए पसीने से तर अचेत-क्रोध में आकर उन पर झपटा।

तमापतन्तं स निगृह्य श्रृड़योःपदा समाक्रम्य निपात्य भूतले ।

निष्पीडयामास यथार्द्रमम्बरंकृत्वा विषाणेन जघान सोपतत्‌ ॥

१३॥

तम्‌--उसको; आपतन्तम्‌--आक्रमण करते; सः--उसने; निगृह्य--पकड़कर; श्रृड़यो: --दोनों सींगों से; पदा--अपने पाँव से;समाक्रम्य--कुचलते हुए; निपात्य--उसे गिराकर; भू-तले-- भूमि पर; निष्पीडयाम्‌ आस--उसे पीटा; यथा--जिस तरह;अर्द्रमू--गीले; अम्बरम्‌ू--कपड़े को; कृत्वा--करके ; विषाणेन--उसकी सींग से; जघान--प्रहार किया; सः--वह; अपतत्‌--गिर पड़ा

ज्योंही अरिष्ट ने आक्रमण किया, भगवान्‌ कृष्ण ने उसके सींग पकड़ लिये और अपने पाँवसे उसे धरती पर गिरा दिया।

तब भगवान्‌ ने उसे ऐसा लताड़ा मानो कोई गीला वस्त्र हो और अन्तमें उन्होंने उसका एक सींग उखाड़कर उसीसे उसकी तब तक पिटाई की जब तक वह दण्ड केसमान धराशायी नहीं हो गया।

असृग्वमन्मृत्रशकृत्समुत्सूजन्‌क्षिपंश्व पादाननवस्थितेक्षण: ।

जगाम कृच्छुं निरतेरथ क्षयंपुष्पै: किरन्तो हरिमीडिरे सुरा: ॥

१४॥

असृक्‌--रक्त; वमन्‌--उगलता; मूत्र--पेशाब; शकृत्‌--तथा मल; समुत्सूजन्‌ू--बुरी तरह से निकालता हुआ; क्षिपन्‌ू--फेंकतेहुए; च--तथा; पादान्‌--अपने पाँवों को; अनवस्थित-- अस्थिर; ईक्षण: -- आँखें; जगाम--चला गया; कृच्छुमू--पीड़ा केसाथ; निर्तेः--मृत्यु के; अथ--तब; क्षयम्‌ू-- धाम को; पुष्पैः--फूलों से; किरन्त:--बिखेरते हुए; हरिम्‌-- भगवान्‌ कृष्ण पर;ईंदिरि--पूजा की; सुर: --देवताओं ने

रक्त वमन करते तथा बुरी तरह से मल-मूत्र त्याग करते, अपने पाँव पटकते तथा अपनीआँखें इधर-उधर पलटते, अरिष्टासुर बड़ी ही पीड़ा के साथ मृत्यु के धाम चला गया।

देवताओं नेकृष्ण पर फूल बरसाकर उनका सम्मान किया।

एवं कुकुद्धिनं हत्वा स्तूयमान: द्विजातिभि: ।

विवेश गोष्ठ॑ सबलो गोपीनां नयनोत्सवः ॥

१५॥

एवम्‌--इस प्रकार; कुकुद्चिनम्‌--डिल्ले वाले ( वृषासुर ) को; हत्वा--मारकर; स्तूयमान:-- प्रशंसित हुए; द्विजातिभि: --ब्राह्मणों द्वारा; विवेश--प्रविष्ट हुआ; गोष्ठटम्‌-ग्वालों के गाँव में; स-बल:--बलराम सहित; गोपीनाम्‌ू--गोपियों के; नयन--आँखों के लिए; उत्सव: --उत्सव स्वरूप

इस तरह अरिष्ट नामक वृषासुर का वध करने के बाद, गोपियों के नेत्रों के लिए उत्सवस्वरूप कृष्ण, बलराम सहित ग्वालों के ग्राम में प्रविष्ट हुए।

अष्ष्टि निहते दैत्ये कृष्णेनाद्धुतकर्मणा ।

कंसायाथाह भगवान्नारदो देवदर्शन: ॥

१६॥

अरिष्टि--अरिष्ट के; निहते--मारे जाने पर; दैत्ये--असुर; कृष्णेन--कृष्ण द्वारा; अद्भुत-कर्मणा-- अद्भुत कर्मों वाले;कंसाय--कंस से; अथ--तब; आह--कहा; भगवान्‌--शक्तिशाली मुनि; नारद: --नारद ने; देव-दर्शन:--जिनकी दृष्टिदैवतुल्य है।

अद्भुत काम करने वाले श्रीकृष्ण द्वारा अरिष्टासुर का वध हो जाने पर नारदमुनि राजा कंससे बतलाने गये।

दैवीदृष्टि वाले इस शक्तिशाली मुनि ने राजा से इस प्रकार कहा।

यशोदायाः सुतां कन्यां देवक्या: कृष्णमेव च ।

राम च रोहिणीपुत्रं वसुदेवेन बिभ्यता ।

न्यस्तौ स्वमित्रे नन्‍दे वै याभ्यां ते पुरुषा हता: ॥

१७॥

यशोदाया:--यशोदा की; सुताम्‌--पुत्री को; कन्याम्‌--कन्या को; देवक्या: --देवकी के; कृष्णम्‌--कृष्ण को; एव च--भी;राममू--बलराम को; च--तथा; रोहिणी-पुत्रम्‌ू--रोहिणी का पुत्र; वसुदेवेन--वसुदेव द्वारा; बिभ्यता-- भयभीत; न्यस्तौ--रखदिया; स्व-मित्रे-- अपने मित्र ने; नन्दे--ननन्‍्द महाराज के यहाँ; वै--निस्सन्देह; याभ्याम्‌ू--इन दो के द्वारा; ते--तुम्हारे;पुरुषा:--मनुष्य; हता:--मारे गये।

नारद ने कंस से कहा : यशोदा की सन्‍्तान वस्तुतः कन्या थी और कृष्ण देवकी का पुत्र है।

यही नहीं, राम रोहिणी का पुत्र है।

वसुदेव ने डरकर कृष्ण तथा बलराम को अपने मित्र नन्‍्दमहाराज के हाथों में सौंप दिया और इन्हीं दोनों बालकों ने तुम्हािरे आदमियों को मारा है।

निशम्य तद्धोजपतिः कोपात्प्रचलितेन्द्रियः ।

निशातमसिमादत्त वसुदेवजिघांसया ॥

१८॥

निशम्य--सुनकर; तत्‌--वह; भोज-पति:-- भोज-वंश का स्वामी ( कंस ); कोपात्‌--क्रोध से; प्रचलित--विश्लुब्ध; इन्द्रिय:ः--इन्द्रियाँ; निशातम्‌ू--तेज; असिमू--तलवार को; आदत्त--उठा लिया; वसुदेव-जिघांसबा--वसुदेव को मार डालने की इच्छासे

यह सुनकर, भोजपति क्रुद्ध हो उठा और उसकी इन्द्रियाँ उसके वश में नहीं रह पाईं।

उसनेवसुदेव को मारने के लिए एक तेज तलवार उठा ली।

निवारितो नारदेन तत्सुतौ मृत्युमात्मन: ।

ज्ञात्वा लोहमयैः पाशैर्बबन्ध सह भार्यया ॥

१९॥

निवारितः--रोक दिया गया; नारदेन--नारद द्वारा; तत्‌-सुतौ-- उसके दोनों पुत्र; मृत्युम्‌--मृत्यु; आत्मन: --अपनी ही; ज्ञात्वा--जानकर; लोह-मयै:--लोहे से बनी; पाशैः--जँजीरों से; बबन्ध--( वसुदेव ) को बाँध दिया; सह--समेत; भार्यया--उसकीपली |

किन्तु नारद ने कंस को यह स्मरण दिलाते हुए रोका कि वसुदेव नहीं अपितु उसके दोनों पुत्रतुम्हारी मृत्यु के कारण बनेंगे।

तब कंस ने वसुदेव तथा उसकी पत्नी को लोहे की जंजीरों सेबँधवा दिया।

प्रतियाते तु देवर्षों कंस आभाष्य केशिनम्‌ ।

प्रेषयामास हन्येतां भवता रामकेशवौ ॥

२०॥

प्रतियाते--चले जाने पर; तु--तब; देव-ऋषौ--देवर्षि के; कंसः--राजा कंस; आभाष्य--सम्बोधित करते हुए; केशिनम्‌--केशी नामक असुर को; प्रेषयाम्‌ आस--उसे बुलाया; हन्येताम्‌-दोनों मारे जाने चाहिए; भवता--तुम्हारे द्वारा; राम-केशवौ--बलराम तथा कृष्ण

नारद के चले जाने पर राजा कंस ने केशी को बुलाया और उसे आदेश दिया, 'जाओ रामतथा कृष्ण का वध करो।

'ततो मुपष्टिकचाणूर शलतोशलकादिकान्‌ ।

अमात्यान्हस्तिपांश्रेव समाहूयाह भोजराट्‌ ॥

२१॥

ततः--तब; मुष्टिक-चाणूर-शल-तोशलक-आदिकान्‌--मुपष्टिक, चाणूर, शल, तोशल इत्यादि; अमात्यान्‌ू--अपने मंत्रियों को;हस्ति-पान्‌--अपने महावतों को; च एव-- भी; समाहूय--बुलाकर; आह--कहा; भोज-राट्‌-- भोजों के राजा ने

इसके बाद भोजराज ने मुप्टिक, चाणूर, शल, तोशल इत्यादि अपने मंत्रियों तथा अपनेमहावतों को भी बुलाया।

राजा ने उन्हें इस प्रकार सम्बोधित किया।

भो भो निशम्यतामेतद्वीरचाणूरमुष्टिकौ ।

नन्दब्रजे किलासाते सुतावानकदुन्दुभे: ॥

२२॥

रामकृष्णौ ततो मह्ं मृत्यु: किल निदर्शित: ।

भवद्भ्यामिह सम्प्राप्तौ हन्येतां मलललीलया ॥

२३॥

भो: भो:--मेरे प्रिय ( सलाहकारो ); निशम्यताम्‌--सुनो; एतत्‌--यह; वीर--हे वीरो; चाणूर-मुष्टिकौ--चाणूर तथा मुष्टिक;नन्द-ब्रजे--नन्द के ग्वाल-ग्राम में; किल--निस्सन्देह; आसाते--रह रहे हैं; सुतौ--दो पुत्र; आनकदुन्दुभे:-- वसुदेव के; राम-कृष्णौ--राम तथा कृष्ण; ततः--उनसे; महाम्‌--मेरी; मृत्युः--मौत; किल--निस्सन्देह; निदर्शित: --सूचित की गई है;भवद्भ्याम्‌-तुम दोनों के द्वारा; हह--यहाँ; सम्प्राप्ती--लाये जाकर; हन्येतामू--मार डाले जाने चाहिए; मलल--कुश्ती;लीलया--खेल के बहाने से।

मेरे बीरो, चाणूर तथा मुप्टिक, यह सुन लो।

आनकदुन्दुभि ( वसुदेव ) के पुत्र राम तथाकृष्ण नन्द के ब्रज में रह रहे हैं।

यह भविष्यवाणी हुई है कि ये दोनों बालक मेरी मृत्यु के कारणहोंगे।

जब वे यहाँ लाए जाय॑ँ तो तुम उन्हें कुश्ती लड़ने के बहाने मार डालना।

मश्ञा: क्रियन्तां विविधा मल्‍्लरड्डरपरिश्रिता: ।

पौरा जानपदाः सर्वे पश्यन्तु स्वैरसंयुगम्‌ ॥

२४॥

मन्चा:--मंच; क्रियन्तामू--बनाये जाँय; विविधा:--अनेक प्रकार के; मल्‍ल-रड्र--कुश्ती का अखाड़ा; परिश्चिता:--घिराहुआ; पौरा:--नगर के निवासी; जानपदा:--जनपदों के निवासी; सर्वे--सभी; पश्यन्तु--देखें; स्वैर--स्वेच्छापूर्वक; संयुगम्‌--प्रतिस्पर्द्धा, प्रतियोगिता |

तुम कुश्ती का अखाड़ा ( रंगभूमि ) तैयार करो जिसके चारों ओर देखने के अनेक मंच होंऔर नगर तथा जनपदों के सारे निवासियों को इस खुली प्रतियोगिता देखने के लिए ले आओ।

महामात्र त्वया भद्ग रड्डद्वार्युपनीयताम्‌ ।

द्विप: कुवबलयापीडो जहि तेन ममाहितौ ॥

२५॥

महा-मात्र--हे महावत; त्वया--तुम्हारे द्वारा; भद्र--मेरे अच्छे आदमी; रड़--अखाड़े के; द्वारि--दरवाजे तक; उपनीयताम्‌--लाया जाये; द्विप:--हाथी; कुबलयापीड:--कुवलयापीड़ नामक; जहि--विनष्ट कर दो; तेन--उस ( हाथी ) से; मम--मेरे;अहितौ-शजत्रुओं को

हे महावत, मेरे अच्छे आदमी, तुम अपने हाथी कुवलयापीड को अखाड़े के प्रवेशद्वार परखड़ा करना और उसके द्वारा मेरे दोनों शत्रुओं को मरवा डालना।

आरशशभश्यतां धनुर्यागश्चतुर्दश्यां यथाविधि ।

विशसन्तु पशून्मेध्यान्भूतराजाय मीढुषे ॥

२६॥

आरभ्यताम्‌--शुरू किया जाय; धनुः-याग:--धनुष-यज्ञ; चतुर्दश्याम्‌--चतुर्दशी के दिन; यथा-विधि--वैदिक आदेशानुसार;विशसन्तु--यज्ञ में भेंट; पशून्‌ू--पशुओं को; मेध्यान्‌--अर्पित करने योग्य; भूत-राजाय-- भूतप्रेतों के राजा, शिव को;मीढुषे--वर देने वाले |

वैदिक आदेशों के अनुसार चतुर्दशी के दिन धनुष यज्ञ प्रारम्भ किया जाय।

वर-दानीभगवान्‌ शिव को पशु-मेध में उपयुक्त प्रकार के पशु भेंट किये जाँय।

इत्यज्ञाप्यार्थतन्त्रज्ष आहूय यदुपुड्रवम्‌ ।

गृहीत्वा पाणिना पाएं ततोक्रूरमुवाच ह ॥

२७॥

इति--इन शब्दों के साथ; आज्ञाप्प--आज्ञा देकर; अर्थ--स्वार्थ के; तन्त्र--सिद्धान्त का; ज्ञ:--जानने वाला; आहूय--बुलाकर; यदु-पुड्रबम्‌--यदुओं में सर्वाधिक अग्रणी; गृहीत्वा--पकड़कर; पाणिना--अपने हाथ से; पाणिम्‌--हाथ को;ततः--तब; अक्रूरम्‌--अक्रूर से; उबाच ह--उसने कहा।

अपने मंत्रियों को इस तरह आदेश दे चुकने के बाद कंस ने यदुश्रेष्ठ अक्रूर को बुलवाया।

कंस निजी लाभ निकालने की कला जानता था अतः अक्रूर के हाथों को अपने हाथ में लेकरवह उससे इस प्रकार बोला।

भो भो दानपते महां क्रियतां मैत्रमाहतः ।

नान्यस्त्वत्तो हिततमो विद्यते भोजवृष्णिषु ॥

२८॥

भोः भोः--हे प्रिय; दान--दान के; पते--स्वामी; महामम्‌--मेरे लिये; क्रियताम्‌--करें; मैत्रमू--मित्रोचित अनुग्रह; आहत: --आदरवश; न--कोई नहीं; अन्य: --दूसरा; त्वत्त:--तुमसे बढ़कर; हित-तम:ः--अनुकूल कार्य करने वाला; विद्यते--है; भोज-वृष्णिषु-- भोजों तथा वृष्णियों में |

हे सर्वश्रेष्ठ दानी अक्रूरर आप आदर के साथ मुझ पर मित्रोचित अनुग्रह करें।

भोजों तथावृष्णियों में आपसे बढ़कर कोई अन्य हम पर कृपालु नहीं है।

अतत्त्वामाश्रितः सौम्य कार्यगौरवसाधनम्‌ ।

यथेन्द्रो विष्णुमाश्रित्य स्वार्थमध्यगमद्विभु: ॥

२९॥

अतः--अतएव; त्वामू--तुम पर; आश्रित:--( मैं ) आश्नित हूँ; सौम्य--हे भद्र पुरुष; कार्य--कर्तव्य; गौरव--गम्भीरतापूर्वक ;साधनम्‌--सम्पन्न करने वाला; यथा--जिस तरह; इन्द्र: --इन्द्र ने; विष्णुमू--विष्णु की; आश्रित्य--शरण ग्रहण करके; स्व-अर्थम्‌--अपना लक्ष्य; अध्यगमत्‌--प्राप्त किया; विभुः--स्वर्ग का शक्तिशाली राजा

हे भद्र अक्रूर, आप सदैव अपना कर्तव्य गम्भीरतापूर्वक करने वाले हैं अतएव मैं आप परउसी तरह आश्रित हूँ जिस तरह पराक्रमी इन्द्र ने अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए भगवान्‌ विष्णुकी शरण ली थी।

गच्छ नन्दक्रजं तत्र सुतावानकदुन्दुभे: ।

आसाते ताविहानेन रथेनानय मा चिरम्‌ ॥

३०॥

गच्छ--जाओ; नन्द-ब्रजम्‌--नन्द के गाँव; तत्र--वहाँ; सुतौ--पुत्रों को; आनकदुन्दुभेः --वसुदेव के; आसाते--रह रहे हैं;तौ--उन दोनों; इह--यहाँ; अनेन--इस; रथेन--रथ से; आनय--लाओ; मा चिरमू--बिना देर लगाये

कृपया नन्द-ग्राम जाँय जहाँ पर आनकदुन्दुभि के दोनों पुत्र रह रहे हैं और अविलम्ब उन्हें इसरथ पर चढ़ाकर यहाँ ले आयें।

निसृष्ट: किल मे मृत्युर्देववेंकुण्ठसंश्रयै: ।

तावानय सम गोपैर्नन्दाद्ये: साभ्युपायनै: ॥

३१॥

निसृष्ट:-- भेजा है; किल--निस्सन्देह; मे--मेरी; मृत्यु:--मृत्यु; देवैः--देवताओं द्वारा; बैकुण्ठ-- भगवान्‌ विष्णु के; संश्रयै:--शरणागत; तौ--उन दोनों को; आनय--लाओ; समम्‌--साथ में; गोपैः --ग्वालों; नन्द-आद्यै:--नन्द इत्यादि; स--सहित;अभ्युपायनै:--उपहारों |

विष्णु के संरक्षण में रहने वाले देवताओं ने इन दोनों बालकों को मेरी मृत्यु के रूप में भेजाहै।

उन्हें यहाँ ले आइये तथा उनके साथ नन्द तथा अन्य ग्वालों को अपने अपने उपहारों समेतआने दीजिये।

घातयिष्य इहानीतौ कालकल्पेन हस्तिना ।

यदि मुक्तौ ततो मल्लैर्घातये वैद्युतोपमै: ॥

३२॥

घातयिष्ये-- उन्हें मार डालूँगा; इहह--यहाँ; आनीतौ-- लाये गये; काल-कल्पेन--साक्षात्‌ मृत्यु रूप; हस्तिना--हाथी के द्वारा;यदि--यदि; मुक्तौ--बच जाते हैं; ततः--तब; मल्लै:--पहलवानों से; घातये--मरवा डालूँगा; वैद्युत--बिजली; उपमै:--कीतरह।

जब आप कृष्ण तथा बलराम को ले आयेंगे तो मैं उन्हें साक्षात्‌ मृत्यु के समान बलशालीअपने हाथी से मरवा दूँगा।

यदि कदाचित्‌ वे उससे बच जाते हैं, तो मैं उन्हें बिजली के समानप्रबल अपने पहलवानों से मरवा दूँगा।

तयोर्निहतयोस्तप्तान्वसुदेवपुरोगमान्‌ ।

तद्वन्धून्रिहनिष्यामि वृष्णिभोजदशाईकान्‌ ॥

३३॥

तयो:--उन दोनों के; निहतयो:--मारे जाने पर; तप्तानू--शोकसंतप्त; बसुदेव-पुरोगमान्‌--वसुदेव द्वारा ले जाये गये; तदू-बन्धून्‌--उनके सम्बन्धियों को; निहनिष्यामि--मार डालूँगा; वृष्णि-भोज-दशाहकान्‌--वृष्णियों, भोजों तथा दशाहों को |

जब ये दोनों मार डाले जायेंगे तो मैं वसुदेव तथा उनके सभी शोकसंतप्त सम्बन्धियों--वृष्णियों, भोजों तथा दशाहों--का वध कर दूँगा।

उग्रसेनं च पितरं स्थविरं राज्यकामुक ।

तदभ्रातरं देवकं च ये चान्ये विद्विषो मम ॥

३४॥

उग्रसेनम्‌--राजा उग्रसेन को; च--और; पितरम्‌ू--पिता; स्थविरम्‌--वृद्ध; राज्य--राज्य के लिए; कामुकम्‌--लोभी; तत्‌-भ्रातरम्‌--उसके भाई; देवकम्‌ू--देवक; च--भी; ये--जो; च--तथा; अन्ये--अन्य; विद्विष:--शत्रुगण; मम--मेरे |

मैं अपने बूढ़े पिता उग्रसेन को भी मार डालूँगा क्योंकि वह मेरे साम्राज्य के लिए लालायितहै।

मैं उसके भाई देवक तथा अपने अन्य सारे शत्रुओं को भी मार डालूँगा।

ततश्लैषा मही मित्र भवित्री नष्ठटकण्टका ॥

३५॥

ततः--तब; च--तथा; एषा--यह; मही--पृथ्वी; मित्र--हे मित्र; भवित्री--होगी; नष्ट--विनष्ट; कण्टका-- अपने काँटे |

तब हे मित्र, यह पृथ्वी काँटों से मुक्त हो जायेगी।

जरासन्धो मम गुरुद्िविदो दयित: सखा ।

शम्बरो नरको बाणो मय्येव कृतसौहदा: ।

तैरहं सुरपक्षीयान्हत्वा भोक्ष्ये महीं नूपान्‌ ॥

३६॥

जरासन्ध:--जरासन्ध; मम--मेरा; गुरु:--गुरुजन ( श्वसुर ); द्विविद:--द्विविद; दयित:--मेरा प्रिय; सखा--मित्र; शम्बर: --शम्बर; नरक:--नरक; बाण:--बाण; मयि--मेरे लिए; एव--निस्सन्देह; कृत-सौहदा:--प्रगाढ़ मैत्री रखने वाले; तैः--उनसे;अहम्‌--ैं; सुर--देवताओं के; पक्षीयान्‌ू--पक्ष वालों को; हत्वा--मारकर; भोक्ष्ये-- भोगूँगा; महीम्‌--पृथ्वी को; नृपान्‌--राजागण।

मेरा ज्येष्ठ सम्बन्धी जरासन्ध तथा मेरा प्रिय मित्र द्विविद मेरे अतीव शुभचिन्तक हैं और वैसेही शम्बर, नरक तथा बाण हैं।

मैं इन सबों का उपयोग उन राजाओं का वध करने के लिएकरूँगा जो देवताओं के पक्षधर हैं और तब मैं सारी पृथ्वी पर राज करूँगा।

एतज्ज्ञात्वानय क्षिप्रं रामकृष्णाविहार्भकौ ।

धनुर्मखनिरीक्षार्थ द्रर्ठ यदुपुरअियम्‌ ॥

३७॥

एतत्‌--यह; ज्ञात्वा--जानकर; आनय--लाओ; क्षिप्रमू-शीघ्र; राम-कृष्णौ--राम तथा कृष्ण को; इह--यहाँ; अर्भकौ --बालकों को; धनुः-मख--धनुष यज्ञ; निरीक्षा-अर्थम्‌--निरी क्षण करने के लिए; द्रष्टमू--देखने के लिए; यदु-पुर--यदुकुल कीराजधानी के; थ्रियमू--ऐश्वर्य को

चूँकि अब आप मेरे मनोभावों को जान चुके हैं अतः तुरन्त जाइये और कृष्ण तथा बलरामको धनुष यज्ञ निहारने तथा यदुओं की राजधानी का ऐश्वर्य देखने के लिए ले आइये।

श्रीअक्रूर उबाचराजन्मनीषितं सयक्तव स्वावद्यमार्जनम्‌ ।

सिद्धबसिद्धयो: समं कुयद्दिवं हि फलसाधनम्‌ ॥

३८ ॥

श्री-अक्वूर: उबाच-- श्री अक्रूर ने कहा; राजन्‌ू--हे राजन्‌; मनीषितम्‌--विचार; स॒यक्‌--पूर्ण; तब--तुम्हारा; स्व-- अपना;अवद्य-दुर्भाग्य; मार्जनम्‌--धोने वाला; सिद्धि-असिद्धबो: --सफलता तथा विफलता दोनों में; समम्‌--समान; कुर्यात्‌--करना चाहिए; दैवम्‌- भाग्य; हि--अन्तत:; फल--फल, परिणाम; साधनम्‌--प्राप्त करने का साधन।

श्री अक्रूर ने कहा : हे राजन, आपने अपने को दुर्भाग्य से मुक्त करने के लिए अच्छा उपायढूँढ निकाला है।

फिर भी मनुष्य को सफलता तथा विफलता में समभाव रहना चाहिए क्योंकिनिश्चित रूप से यह भाग्य ही है, जो किसी के कर्म के फलों को उत्पन्न करता है।

मनोरथान्करोत्युच्चैर्जनी देवहतानपि ।

युज्यते हर्षशोका भ्यां तथाप्याज्ञां करोमि ते ॥

३९॥

मनः-रथान्‌--उसकी इच्छाएँ; करोति--पालन करती है; उच्चैः --उत्साहपूर्वक; जनः--सामान्य व्यक्ति; दैव-- भाग्य से;हतानू--नष्ट किया हुआ; अपि-- भी; युज्यते--सामना करता है; हर्ष-शोकाभ्याम्‌--सुख तथा दुख से; तथा अपि--फिर भी;आज्ञामू--आज्ञा; करोमि--करूँगा; ते--तुम्हारी

सामान्य व्यक्ति अपनी इच्छाओं के अनुसार कर्म करने के लिए कृतसंकल्प रहता है भले हीउसका भाग्य उन्हें पूरा न होने दे।

अतः वह सुख तथा दुख दोनों का सामना करता है।

इतने परभी मैं आपके आदेश को पूरा करूँगा।

श्रीशुक उबाचएवमादिश्य चाक़ूरं मन्त्रिणश्च विषुज्य सः ।

प्रविवेश गृहं कंसस्तथाक्रूर: स्वमालयम्‌ ॥

४०॥

श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; आदिश्य--आदेश देकर; च--तथा; अक्ूरम्‌--अक्रूर को;मन्त्रिण:--अपने मंत्रियों को; च--तथा; विसृज्य--विदा करके; सः--वह; प्रविवेश--प्रविष्ट हुआ; गृहम्‌--अपने घर में;कंसः--कंस; तथा-- भी; अक्रूर:--अक्रूर; स्वमू--अपने; आलयमू--निवासस्थान को

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : अक्रूर को इस तरह आदेश देकर कंस ने अपने मंत्रियों को विदाकर दिया और स्वयं अपने घर में चला गया तथा अक्रूर अपने घर लौट आया।

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