← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची

अध्याय पैंतीसवाँ: जंगल में घूमते समय गोपियाँ कृष्ण का गीत गाती हैं

10.35श्रीशुक उबाचगोप्यः कृष्णे बन॑ याते तमनुद्रुत॒चेतस: ।

कृष्णलीला: प्रगायन्त्यो निन्युर्दु:खेन वासरान्‌ ॥

१॥

श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; गोप्य:--गोपियाँ; कृष्णे--कृष्ण के; वनमू--वन को; याते--जाने पर;तम्‌--उसके; अनुद्गुत--पीछा करते; चेतस:--जिनके मन; कृष्ण-लीला:--कृष्ण की दिव्य लीलाएँ; प्रगायन्त्य:--जोर जोर सेगाती हुई; निन्यु:--बिताया; दुःखेन--दुख के साथ; वासरानू--दिन |

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब भी कृष्ण वन को जाते थे तो गोपियों के मन उन्हीं के पीछेभाग जाते थे और इस तरह युवतियाँ उनकी लीलाओं का गान करते हुए खिन्नतापूर्वक अपने दिनबिताती थीं।

श्रीगोष्य ऊचु:वामबाहुकृतवामकपोलोवल्गितश्रुरधरार्पितवेणुम्‌ ।

'कोमलाडुलिभिराश्रितमार्गगोप्य ईरयति यत्र मुकुन्दः ॥

२॥

व्योमयानवनिताः सह सिद्धै-विस्मितास्तदुपधार्य सलज्ञा: ।

काममार्गणसमर्पितचित्ताः'कश्मलं ययुरपस्मृतनीव्य: ॥

३॥

श्री-गोप्य: ऊचु:--गोपियों ने कहा; वाम--बायीं; बाहु-- भुजा पर; कृत--रखकर; वाम--बाएँ; कपोल:--गाल को;वल्गित--हिलती हुई; भ्रु:--भौंहें; अधर--होंठों पर; अर्पित--रखी; वेणुम्‌--बाँसुरी को; कोमल--सुकुमार; अद्डुलिभि:--अपनी अँगुलियों से; आश्नित-मार्गम्‌--बन्द किये गये छेद; गोप्य:--हे गोपियो; ईरयति--बजाते हैं; यत्र--जहाँ; मुकुन्दः --कृष्ण; व्योम--आकाश में; यान--विचरण करती; वनिता:--स्त्रियाँ; सह--साथ; सिद्धैः--सिद्ध देवताओं के; विस्मिता:--चकित; तत्‌-- उसे; उपधार्य--सुनकर; स--सहित; लज्जा:--लाज; काम--कामवासना का; मार्गण--पीछा करते; समर्पित--अर्पित; चित्ता:--उनके मन; कश्मलम्‌--कष्ट; ययु;-- अनुभव किया; अपस्मृत-- भूलकर; नीव्य:--कमरबंध

गोपियों ने कहा : जब मुकुन्द अपने होंठों पर रखी बाँसुरी के छेदों को अपनी सुकुमारअँगुलियों से बन्द करके उसे बजाते हैं, तो वे अपने बाएँ गाल को अपनी बाईं बाँह पर रखकरअपनी भौंहों को नचाने लगते हैं।

उस समय आकाश में अपने पतियों अर्थात्‌ सिद्धों समेतविचरण कर रही सिद्धपत्नियाँ चकित हो उठती हैं।

जब ये स्त्रियाँ वंशी की ध्वनि सुनती हैं, तोउनके मन कामवासना से चलायमान हो उठते हैं और अपनी पीड़ा में उन्हें इसकी भी सुधि नहींरह जाती कि उनके कमरबंध शिथिल हुए जा रहे हैं।

हन्त चित्रमबला: श्रुणुतेदंहारहास उरसि स्थिरविद्युत्‌ ।

नन्दसूनुरयमार्तजनानांनर्मदो यहिं कूजितवेणु; ॥

४॥

वृन्दशो ब्रजवृषा मृगगावोवेणुवाद्यहतचेतस आरात्‌ ।

दन्तदष्टकवला धृतकर्णानिद्विता लिखितचित्रमिवासन्‌ ॥

५॥

हन्त--ओह; चित्रमू--आश्चर्य; अबला: --हे बालाओ; श्रुणुत--सुनो; इृदम्‌--यह; हार--गले के हार सहश ( चमकीला );हास:ः--हँसी; उरसि--वक्षस्थल पर; स्थिर-- अचल; विद्युत्‌ू--बिजली; नन्द-सूनु:--नन्द महाराज का पुत्र; अयम्‌--यह;आर्त--दुखी; जनानामू--मनुष्यों के लिए; नर्म--प्रसन्नता का; दः--देने वाला; यहिं--जब; कूजित--ध्वनित; वेणु:--वंशी;वृन्दशः--झुंडों में; त्रज--चरागाह में रखे गये; वृषा:--बैल; मृग--हिरण; गाव:--गाएँ; वेणु--बाँसुरी के; वाद्य--बजाने से;हृत--चुराये गये; चेतसः--मन; आरातू--दूरी पर; दन्‍्त--अपने दाँतों से; दष्ट--काटा गया; कवला:--कौर; धृत--खड़ा कियेहुए; कर्णा:--अपने कान; निद्विता:--सुप्त; लिखित--अंकित; चित्रमू--चित्र; इब--सहृश; आसनू--थे |

हे बालाओ, दुखियों को आनन्द देने वाला यह नन्द का बेटा अपने वक्षस्थल पर अविचलदामिनी वहन करता है और इसकी हँसी रत्तजटित हार जैसी है।

अब जरा कुछ विचित्र बातसुनो ।

जब वह अपनी बाँसुरी बजाता है, तो बहुत दूरी पर खड़े ब्रज के बैल, हिरण तथा गौवें केझुंड के झुंड इस ध्वनि से मोहित हो जाते हैं।

वे सब जुगाली करना बंद कर देते हैं और अपनेकानों को खड़ा कर लेते हैं ( चौकन्ने हो जाते हैं )।

वे स्तम्भित होकर ऐसे लगते हैं मानो सो गयेहों या चित्रों में बनी आकृतियाँ हों।

बर्हिणस्तबकधातुपलाशै-ब॑द्धमललपरिबर्ईविडम्ब: ।

कह्िचित्सबल आलि स गोपै-गा: समाह्ययति यत्र मुकुन्दः ॥

६॥

तहिं भग्नगतयः सरितो वैतत्पदाम्बुजरजोनिलनीतम्‌ ।

स्पृहयतीर्वयमिवाबहुपुण्या:प्रेमवेपितभुजा: स्तिमिताप: ॥

७॥

बर्हिण--मोरों के; स्तबक--पंखों से; धातु--रंगीन खनिज ( गेरू ); पलाशैः--तथा पत्तियों से; बद्ध--व्यवस्थित; मल्‍ल--कुश्ती लड़ने वाले या पहलवान का; परिब्ह--वेश; विडम्ब:--अनुकरण करने वाला; कहिंचित्‌ू--क भी कभी; स-बलः--बलराम सहित; आलि--हे गोपी; सः--वह; गोपै:--ग्वालबालों के साथ; गाः:--गौवों को; समाह्यति--बुलाता है; यत्र--जब; मुकुन्दः--मुकुन्द; तहि---तब; भग्न--टूटी; गतयः--उनकी गति, हिलना-डुलना; सरितः--नदियाँ; बै--निस्सन्देह;तत्‌--उसके; पद-अम्बुज--चरणकमलों की; रज:--धूलि; अनिल--वायु से; नीतम्‌--लाई हुईं; स्पृहयती:--लालसा करतीहुई; वयम्‌--हम सब; इब--जिस तरह; अबहु--कुछ कुछ; पुण्या:--पुण्यकर्म; प्रेम-- भगवत्प्रेम के कारण; वेपित--काँपती;भुजा:--बाहें ( लहरें ); स्तमित--रुक गया; आप:--जल

हे प्रिय गोपी, कभी कभी कृष्ण अपने को पत्तियों, मोरपंखों तथा रंगीन खनिजों से सजाकरपहलवान का वेश बनाते हैं।

तत्पश्चात्‌ वे बलराम तथा ग्वालबालों के साथ बैठकर गौवों कोबुलाने के लिए अपनी बाँसुरी बजाते हैं।

उस समय नदियाँ बहना बन्द कर देती हैं, उनका जलउस आनन्द से स्तम्भित हो उठता है, जिसे वे उस वायु की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करते हुएअनुभव करती हैं, जो उनके लिए भगवान्‌ के चरणकमलों की धूल लाएगा।

किन्तु हमारी हीतरह नदियाँ अधिक पवित्र नहीं हैं, अतः वे प्रेमवश काँपते हुए बाँहों से उनकी प्रतीक्षा करतीरहती हैं।

अनुचरै: समनुवर्णितवीर्यआदिपूरुष इवाचलभूतिः ।

वनचरो गिरितटेषु चरन्ती-वेणुनाह्ययति गा: स यदा हि ॥

८॥

वनलतास्तरव आत्मनि विष्णुंव्यज्ञयन्त्य इव पुष्पफलाढ्या: ।

प्रणतभारविटपा मधुधारा:प्रेमहष्टतनवो ववृषु: सम ॥

९॥

दर्शनीयतिलको वनमाला-दिव्यगन्धतुलसीमधुमत्तै: ।

अलिकुलैरलघु गीतामभीष्ट-माद्वियन्य्हिं सन्धितवेणु; ॥

१०॥

सरसि सारसहंसविहड़ा-श्वारुगीताहतचेतस एत्य ।

हरिमुपासत ते यतचित्ताहन्त मीलितह॒शो धृतमौना: ॥

११॥

अनुचरैः--साथियों के द्वारा; समनुवर्णित--विस्तार से वर्णित होकर; बीर्य:--पराक्रम; आदि-पूरुष: --आदिपुरुष; इब--सहश; अचल--स्थिर; भूतिः--ऐश्वर्य; बन--वन में; चर: --इधर-उधर घूमते; गिरि--पर्वतों के; तटेषु--पार्श् में, तराई में;चरन्ती:--चरती हुई; वेणुना--अपनी बाँसुरी से; आहृयति--बुलाता है; गाः:--गौवों को; सः--वह; यदा--जब; हि--निस्सन्देह; वन-लता:--जंगल की लताओं; तरव: --तथा वृक्षों ने; आत्मनि-- अपने में; विष्णुमू-- भगवान्‌ विष्णु को;व्यज्ञयन्त्यः:--प्रकट करते हुए; इब--मानो; पुष्प--फूलों; फल--तथा फलों से; आढ्या: --सम्पन्न; प्रणत--झुके हुए; भार--भार से; विटपा:--डालें; मधु--मधुर रस की; धाराः--धधाराएँ; प्रेम--प्रेम से; हृष्ट--रोमांचित; तनव:--शरीर ( तने ); ववृषुःस्म--वर्षा की; दर्शनीय--देखने में आकर्षक लोगों में; तिलक:--सर्व श्रेष्ठ बन-माला--जंगल के फूलों से बनी माला पर;दिव्य--अलौकिक; गन्ध--सुगन्ध; तुलसी--तुलसी के फूलों की; मधु--शहद जैसी मिठास से; मत्तैः--प्रमत्त; अलि-- भौंरोंके; कुलैः--झुंडों से; अलघु--प्रबल; गीतम्‌--गायन; अभीष्टम्‌--इच्छित; आद्वियन्‌--कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार करते हुए;यहिं--जब; सन्धित--रखा; वेणु:--अपनी बाँसुरी; सरसि--झील में; सारस--सारस पक्षी; हंस--हंस; विहड्ञाः--तथा अन्यपक्षी; चारु--मनोहर; गीत--( वंशी के ) गीत से; हत--चुराये गये; चेतस:--मन; एत्य--आगे आकर; हरिम्‌-- भगवान्‌ कृष्णको; उपासत--पूजा करते हैं; ते--वे; यत--वश में; चित्ता:--मन; हन्त--हाय; मीलित--बन्द; हशः--उनकी आँखें; धृत--धारण किया हुआ; मौना:--मौन |

कृष्ण अपने सखाओं के साथ जंगल में घूमते फिरते हैं।

ये सखा उनके शानदार कार्यो काजोरशोर से यशगान करते हैं।

इस तरह वे पूर्ण पुरुषोत्तम परमेश्वर की तरह अपने अक्षय ऐश्वर्यका प्रदर्शन करते प्रतीत होते हैं।

जब गाएँ पर्वत की तलहटी में घूमती हैं और कृष्ण अपनी बंशीकी तान से उन्हें बुलाते हैं, तो वृक्ष तथा जंगल की लताएँ, प्रत्युत्तर में, फूलों तथा फलों से इतनीलद॒ जाती हैं कि वे अपने हृदयों के भीतर भगवान्‌ विष्णु को प्रकट करती प्रतीत होती हैं।

जबभार से उनकी शाखाएँ नीचे झुक जाती हैं, तो उनके तनों के तन्तु तथा लताएँ भगवत्प्रेम से रोमजैसी उठ खड़ी होती हैं और वृक्ष तथा लताएँ दोनों ही मधुर रस की वर्षा करने लगते हैं।

कृष्ण द्वारा पहनी गयी माला के तुलसी के फूलों की मधु जैसी दिव्य गंध से उन्मत्त भौंरों केसमूह उनके लिए उच्च स्वर से गुंजार करने लगते हैं और पुरुषों में सर्वाधिक सुन्दर वह कृष्णअपने अधरों पर अपनी वंशी रखकर और उसे बजाकर उनके गीत की धन्यवाद-सहित प्रशंसाकरते हैं।

तब मनोहारी वंशी-गीत सारसों, हंसों तथा झील में रहने वाले अन्य पक्षियों के चित्तको चुरा लेता है।

निस्सन्देह ये सभी अपनी आँखें बन्द किये और मौन साधे उनके पास जाते हैंऔर गहन ध्यान में उन पर अपनी चेतना को स्थिर करते हुए उनकी पूजा करते हैं।

सहबल: स्त्रगवतंसविलास:सानुषु क्षितिभूतो ब्रजदेव्य: ।

हर्षयन्यहिं वेणुरवेणजातहर्ष उपरम्भति विश्वम्‌ ॥

१२॥

महदतिक्रमणश्डितचेतामन्दमन्दमनुगर्जति मेघ: ।

सुहृदमभ्यवर्षत्सुमनोभि-एछायया च विदधत्प्रतपत्रम्‌ ॥

१३॥

सह-बलः:--बलराम के साथ; सत्रकु--फूल की माला; अवतंस--सिर पर आभूषण की तरह; विलास:--खेलखेल में पहनकर;सानुषु--तलहटी में; क्षिति-भूत:ः--पर्वत की; ब्रज-देव्य:--हे वृन्दावन की देवियो ( गोपियो ); हर्षयन्‌--हर्ष उत्पन्न करते हुए;यहि--जब; वेणु--उनकी वंशी की; रवेण--प्रतिध्वनि से; जात-हर्ष: --हर्षित होकर; उपरम्भति--आस्वादन कराते हैं;विश्वम्‌--सारे जगत को; महत्‌--महापुरुष के; अतिक्रमण---अवमानना; शद्धित--डरा हुआ; चेता: --मन में; मन्द-मन्दम्‌--अत्यन्त धीरे धीरे; अनुगर्जति-- बदले में गरजता है; मेघ:--बादल; सुहृदम्‌--अपने मित्र के ऊपर; अभ्यवर्षत्‌--वर्षा करता है; सुमनोभि:-- फूलों से; छायया--अपनी छाया से; च--तथा; विदधत्‌--प्रदान करते हुए; प्रतपत्रमू--सूर्य से रक्षा के लिएछाता।

हे ब्रज-देवियो, जब कृष्ण बलराम के साथ खेलखेल में अपने सिर पर फूलों की मालाधारण करके पर्वत की ढालों पर विहार करते हैं, तो वे अपनी वंशी की गूँजती ध्वनि से सबों कोआह्ादित कर देते हैं।

इस तरह वे सम्पूर्ण विश्व को प्रमुदित करते हैं।

उस समय महान्‌ पुरुष केअप्रसन्न होने के भय से भयभीत होकर निकटवर्ती बादल उनके साथ होकर मंद मंद गर्जनाकरता है।

यह बादल अपने प्रिय मित्र कृष्ण पर फूलों की वर्षा करता है और धूप से बचाने केलिए छाते की तरह छाया प्रदान करता है।

विविधगोपचरणेषु विदग्धोवेणुवाद्य उरुधा निजशिक्षा: ।

तब सुतः सति यदाधरबिम्बेदत्तवेणुरनयत्स्वरजाती: ॥

१४॥

सवनशस्तदुपधार्य सुरेशाःशक्रशर्वपरमेष्ठिपुरोगा: ।

कवय आनतकन्धरचित्ता:कश्मलं ययुरनिश्चिततत्त्वा: ॥

१५॥

विविध--अनेक; गोप--्वालों के; चरणेषु-- कार्यो में; विदग्ध:--पटु; वेणु--वंशी के; वाद्ये--बजाने में; उरधा--कई गुना;निज--अपनी; शिक्षा:--जिसकी शिक्षाएँ; तब--तुम्हारा; सुतः--बेटा; सति--हे पवित्र स्त्री ( यशोदा ); यदा--जब; अधर--होंठों पर; बिम्बे--बिम्ब फलों जैसे लाल; दत्त--रखी हुई; वेणु:--वंशी; अनयत्‌--ले आया; स्वर--संगीत ध्वनि की;जातीः--जातियाँ; सवनशः --उच्च, मध्यम तथा निम्न आरोहों से; तत्‌--उसे; उपधार्य--सुनकर; सुर-ईशा:ः--मुख्य देवता;शक्र--इन्द्र; शर्व--शिवजी; परमेष्ठि--तथा ब्रह्मा; पुरः:-गा:--आदि; कवय: --विद्वान; आनत--झुका लिया; कन्धर-गर्दनें;चित्ता:--तथा मन; कश्मलम्‌ ययु: --मोहित हो गये; अनिश्चित--निश्चय कर पाने में असमर्थ; तत्त्वा:--सार हे सती

यशोदा माता, गौवों के चराने की कला में निपुण आपके लाड़ले ने वंशी बजाने कीकई शैलियाँ खोज निकाली हैं।

जब वह अपने बिम्ब सदृश लाल होंठों पर अपनी वंशी रखता हैऔर विविध तानों में स्वर निकालता है, तो इस ध्वनि को सुनकर ब्रह्मा, शिव, इन्द्र तथा अन्यप्रधान देवता मोहित हो जाते हैं।

यद्यपि वे महान्‌ विद्वान अधिकारी हैं तो भी वे उस संगीत कासार निश्चित नहीं कर पाते; इसलिए वे अपना सिर तथा मन से नतमस्तक हो जाते हैं।

निजपदाब्जदलैधध्वजवज्ञ-नीरजाहू शविचित्रललामै: ।

ब्रजभुवः शमयन्खुरतोदंवर्ष्पधुर्यगतिरीडितवेणु; ॥

१६॥

ब्रजति तेन वयं सविलास-वीक्षणार्पितमनो भववेगा: ।

कुजगतिं गमिता न विदामःकश्मलेन कवरं वसनं वा ॥

१७॥

निज--अपने; पद-अब्ज--चरणकमलों के; दलैः--फूलों की पंखड़ियों जैसे; ध्वज--पताका; वज़--वज़; नीरज--कमल;अद्भुश--तथा अंकुश का; विचित्र-- भाँति भाँति के; ललामैः--चिह्लों से; ब्रज--व्रज की; भुवः-- भूमि को; शमयन्‌--शान्तकरते हुए; खुर--गाय के खुरों से; तोदम्‌--पीड़ा; वर्ष्ष--अपने शरीर से; धुर्य--जिस तरह हाथी की; गति:ः--चाल; ईंडित--प्रशंसित; वेणु;--जिसकी वंशी; ब्रजति--चलता है; तेन--उससे; वयम्‌--हम; सविलास--क्रीड़ायुक्त; वीक्षण--चितवन से;अर्पित--अर्पित; मन:-भव--कामवासना का; वेगा:--मंथन; कुज--वृक्षों जैसी; गतिम्‌ू--चाल ( गति का अभाव );गमिता:--प्राप्त किया हुआ; न विदाम: --हम नहीं जान पातीं; कश्मलेण-- अपने मोह के कारण; कवरमू--चोटी; वसनम्‌--अपने वस्त्र; वा--अथवा।

जब कृष्ण अपने कमल-दल जैसे पाँवों से ब्रज में घूमते हैं, तो भूमि पर पताका, वज्,कमल तथा अंकुश जैसे प्रतीकों के स्पष्ट चिन्ह बनते जाते हैं और वे पृथ्वी को गौवों के खुरों सेअनुभव होने वाली पीड़ा से प्रशमित करते हैं।

जब वे अपनी विख्यात बाँसुरी बजाते हैं, तोउनका शरीर हाथी की अदा में झूमता है।

इस तरह हम गोपियाँ, जो कृष्ण की विनोदप्रियचितवन के कारण कामदेव द्वारा चंचल हो उठती हैं, वृक्षों की तरह स्तब्ध खड़ी रह जाती हैं औरहमें अपने बालों की लर तथा वस्त्रों के शिधिल पड़ने जाने की भी सुध नहीं रह जाती।

मणिधर: क्वचिदागणयन्गामालया दयितगन्धतुलस्या: ॥

प्रणयिनोनुचरस्य कदांसेप्रक्षिपन्भुजमगायत यत्र ॥

१८॥

क्‍्वणितवेणुरववश्ञितचित्ता:कृष्णमन्वसत कृष्णगृहिण्यः ।

गुणगणार्णमनुगत्य हरिण्योगोपिका इव विमुक्तगृहाशा: ॥

१९॥

मणि--मणियों की ( लड़ ); धर:-- धारण किये; क्वचित्‌--कहीं; आगणयनू--गिनते हुए; गा:--गौवों को; मालया--फूलोंकी माला से; दयित--अपनी प्रिया; गन्ध--सुगन्ध पाकर; तुलस्या:--तुलसी के फूल जिनपर; प्रणयिन:--प्रेमी; अनुचरस्य--संगी का; कदा--किसी समय; अंसे--कंधे पर; प्रक्षिपनू--फेंकते हुए; भुजम्‌--अपनी बाँह; अगायत--गाया; यत्र--जब;क्वणित--बजायी हुईं; वेणु--बाँसुरी की; रव--ध्वनि से; वश्चित--चुराये गये; चित्ता:--हृदय; कृष्णम्‌--कृष्ण के;अन्वसत--निकट बैठ गईं; कृष्ण--काले हिरण की; गृहिण्य:--पत्नियाँ; गुण-गण--समस्त गुणों के; अर्णमू--समुद्र;अनुगत्य--पास आकर; हरिण्य:--हिरनियाँ; गोपिका: --गोपियाँ; इब--सहश्य; विमुक्त--त्यागकर; गृह--घर तथा परिवारकी; आशाः--अपनी आशाएँ।

अब कृष्ण कहीं पर अपनी मणियों की लड़ी में गौवों की गिनती करते हुए खड़े हैं।

वेतुलसी के फूलों की माला पहने हैं जिसमें उनकी प्रिया की सुगन्‍न्ध बसती है और अपनी एक बाँहअपने प्रिय ग्वालमित्र के कन्धे पर रखे हुए हैं।

ज्योंही कृष्ण अपनी बाँसुरी बजाकर गाते हैं, तोउस गीत से कृष्ण-हिरणों की पत्नियाँ आकृष्ट होती हैं और वे दिव्य गुणों के सागर कृष्ण तकपहुँचकर उनके पास बैठ जाती हैं।

वे भी हम गोपियों की तरह पारिवारिक जीवन के सुख कीसारी आशाएँ त्याग चुकी हैं।

कुन्ददामकृतकौतुकवेषोगोपगोधनवृतो यमुनायाम्‌ ।

नन्दसूनुरनघे तब वत्सोनर्मदः प्रणयिणां विजहार ॥

२०॥

मन्दवायुरुपवात्यनुकूलंमानयन्मलयजस्पर्शेन ।

बन्दिनस्तमुपदेवगणा येवाद्यगीतबलिभि: परिवत्रु; ॥

२१॥

कुन्द--चमेली के फूलों की; दाम--माला से; कृत--बनायी गई; कौतुक--क्रीड़ापूर्ण; वेष: --वेशभूषा; गोप--गोपबालोंद्वारा; गोधन--तथा गायों द्वारा; वृतः--घिरा हुआ; यमुनायाम्‌--यमुना के तट पर; नन्द-सूनु:--ननन्‍्द महाराज का बेटा;अनघे--हे निष्पाप महिला; तब--तुम्हारा; वत्स:--लाड़ला बेटा; नर्म-दः--मनोरंजन कराने वाला; प्रणयिणाम्‌--अपने प्रियसंगियों के; विजहार--खेल चुका है; मन्द--धीमी; वायु:--वायु; उपवाति--बहती है; अनुकूलम्‌-- अनुकूल; मानयन्‌--आदरदिखलाते हुए; मलय-ज--चन्दन ( की सुगंध ) के; स्पर्शेन--स्पर्श से; वन्दिन:--प्रशंसा करने वाले; तम्‌--उसको; उपदेव--लघु देवता की; गणा:--विभिन्न कोटियों के सदस्य; ये--जो; वाद्य--वाद्य यंत्रों वाले संगीत; गीत--गायन; बलिभि: --तथाउपहारों सहित; परिवत्रु:--घेर लिया है।

हे निष्पाप यशोदा, तुम्हारे लाड़ले नन्दनन्दन ने चमेली की माला से अपना विचित्र वेश सजालिया है और इस समय वह यमुना के तट पर गौवों तथा ग्वालबालों के साथ अपने प्रिय संगियोंका मनोरंजन कराते हुए खेल रहे हैं।

मन्द वायु अपनी सुखद चन्दन-सुगंध से उनका आदर कररही है और विविध उपदेवता चारों ओर बन्दीजनों के समान खड़े होकर अपना संगीत, गायनतथा श्रद्धा के उपहार भेंट कर रहे हैं।

वत्सलो ब्रजगवां यदगक्नोवन्द्यमानचरण: पथि वृद्धैः ।

कृत्स्नगोधनमुपोहा दिनान्तेगीतवेणुरनुगेडितकीर्ति: ॥

२२॥

उत्सवं श्रमरूचाषि दहशीना-मुन्नयन्खुररजश्छुरितसत्रक्‌ ।

दित्सयैति सुहदासिष एबदेवकीजठरभूरुडुराज: ॥

२३॥

वत्सलः--स्नेहिल; ब्रज-गवाम्‌--ब्रज की गौवों के प्रति; यत्‌--क्योंकि; अग--पर्वत को; श्र:ः--धारण करने वाले;वन्द्यमान--पूजित; चरण: --उनके पैर; पथि--रास्ते पर; वृद्धैः--वृद्ध या गुरुजनों द्वारा; कृत्स्न--सम्पूर्णफ; गो-धनम्‌ू--गौवोंका समूह; उपोह्म --एकत्र करके; दिन--दिन का; अन्ते--अन्त होने पर; गीता-वेणु: --अपनी वंशी बजाते हुए; अनुग--सँगियों से; ईंडित--प्रशंसित; कीर्ति:--यश; उत्सवम्‌--उत्सव; श्रम-- थकान से; रुचा--रंजित; अपि-- भी; हशीनाम्‌--आँखोंके लिए; उन्नयन्‌ू--उठाते हुए; खुर--गौवों के खुरों से; रज:--धूल से; छुरित--सनी; सत्रकू--माला; दित्सया--इच्छा से;एति--आ रहा है; सुहत्‌-- अपने मित्रों को; आशिष:--उनकी इच्छाएँ; एब: --यह; देवकी--माता यशोदा के; जठर--गर्भ से;भू:--उत्पन्न; उडु-राज:--चन्द्रमा |

ब्रज की गौवों के प्रति अत्यधिक स्नेह के कारण कृष्ण गोवर्धनधारी बने।

दिन ढलने परअपनी सारी गौवों को समेट कर वे अपनी बाँसुरी पर गीत की धुन बजाते हैं और उनके मार्ग केकिनारे खड़े उच्च देवतागण उनके चरणकमलों की पूजा करते हैं तथा उनके साथ चल रहेग्वालबाल उनके यश का गान करते हैं।

उनकी माला गौवों के खुरों से उठी धूल से धूसरित हैऔर थकान के कारण बढ़ी हुई उनकी सुन्दरता हरएक के नेत्रों के लिए आह्लादयुक्त उत्सवप्रस्तुत करने वाली है।

अपने मित्रों की इच्छाएँ पूरी करने के लिए उत्सुक, कृष्ण माता यशोदाकी कोख से उदित चन्द्रमा हैं।

मदविधूर्णितलोचन ईषनू-मानदः स्वसुहृदां वनमाली ।

बदरपाण्डुवदनो मृदुगण्डंमण्डयन्कनककुण्डललक्ष्म्या ॥

२४॥

यदुपतिद्विरदराजविहारोयामिनीपतिरिवैष दिनान्ते ।

मुदितवक्त्र उपयाति दुरन्तंमोचयन्त्रजगवां दिनतापम्‌ ॥

२५॥

मद--नशे से; विघूर्णित--घूमती हुई; लोचन:--आँखें; ईषत्‌--कुछ कुछ; मान-दः--मान प्रदर्शित करते; स्व-सुहृदाम्‌-- अपनेशुभचिन्तक मित्रों को; वन-माली--वन के पुष्पों की माला पहने; बदर--बेर फल की तरह; पाण्डु-- श्रेताभ; बदन: --मुख;मृदु--कोमल; गण्डम्‌--गाल; मण्डयन्‌--अलंकृत किये हुए; कनक--सुनहरे; कुण्डल--कान के आभूषणों की; लक्ष्म्या--शोभा से; यदु-पति:--यदुवंश के स्वामी; द्विरद-राज--शाही हाथी की तरह; विहार: --खेलकूद; यामिनी-पति: --रात्रि कापति ( चन्द्रमा ); इब--सहृश; एष:--वह; दिन-अन्ते--दिन बीतने पर, संध्या-समय; मुदित--प्रसन्न; वक्‍त्र:--मुख; उपयाति--आ रहा है; दुरन्तम्-दुर्लध्य; मोचयन्‌-- भगाते हुए; ब्रज--त्रज की; गवाम्‌--गौवों के या जिनपर कृपा की जानी है उनके;दिन--दिन के; तापम्‌--पीड़ादायी धूप।

जब श्रीकृष्ण अपने शुभचिन्तक सखाओं को आदरपूर्वक शुभकामनाएँ देते हैं, तो उनकीआँखें थोड़ी-सी इस तरह घूमती हैं जैसे नशे में हों।

वे फूलों की माला पहने हैं और उनके कोमलगालों की शोभा उनके सुनहरे कुण्डलों की चमक से तथा बदर बेर के रंग वाले उनके मुख कीश्रेतता से बढ़ जाती है।

रात्रि के स्वामी चन्द्रमा के सहश अपने प्रसन्न मुख वाले यदुपति राजसीहाथी की अदा से चल रहे हैं।

इस तरह वे ब्रज की गौवों को दिन-भर की गर्मी से छुटकारादिलाते हुए संध्या-समय घर लौटते हैं।

श्रीशुक उबाच एवं ब्रजस्त्रियो राजन्कृष्णलीलानुगायती: ।

रेमिरेडहःसु तच्चित्तास्तन्मनस्का महोदया: ॥

२६॥

श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्‌--इस तरह; ब्रज-स्त्रियः--ब्रज की स्त्रियाँ; राजन्‌ू--हे राजन; कृष्ण-लीला--कृष्ण की लीलाओं के विषय में; अनुगायती:--निरन्तर कीर्तन करती; रेमिरि--आनन्द लूटतीं; अहःसु--दिन के समय;ततू-चित्ता:--उनमें लीन इनके हृदय; तत्‌-मनस्का:--उनके मन; महा--महान; उदया: --उत्सव का-सा अनुभव करते।

श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजनू, इस तरह वृन्दावन की स्त्रियाँ दिन के समय कृष्णकी लीलाओं का निरन्तर गान करते हुए आनन्द लूटतीं और उन सबों के मन तथा हृदय उन्हीं मेंलीन रहकर अपार उत्सवभाव से भरे रहते।

TO

← पिछला अध्याय · अगला अध्याय →

← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची