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अध्याय चौंतीसवाँ: नंद महाराज को बचाया गया और शंखचूड़ का वध

10.34श्रीशुक उबाचएकदा देवयात्रायां गोपाला जातकौतुका: ।

अनोभिरनडुग़ुक्तै:प्रययुस्तेडम्बिकावनम्‌ ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; एकदा--एक बार; देव--देवता अर्थात्‌ शिवजी ( की पूजा करने के लिए );यत्रायामू--यात्रा पर; गोपाला: --सारे ग्वाले; जात-कौतुका: --उत्सुक; अनोभि:--गाड़ियों समेत; अनडुत्‌--बैलों से; युक्तै: --जुती; प्रययु:--गये; ते--वे; अम्बिका-वनम्‌--अम्बिका वन में |

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : एक दिन भगवान्‌ शिव की पूजा हेतु यात्रा करने के उत्सुकग्वाले बैलगाड़ियों द्वारा अम्बिका वन गये।

तत्र स्नात्वा सरस्वत्यां देव॑ पशुपतिं विभुम्‌ ।

आनर्चुरईणैर्भक्त्या देवीं च णूपतेडम्बिकाम्‌ ॥

२॥

तत्र--वहाँ; स्नात्वा--स्नान करके; सरस्वत्याम्‌--सरस्वती नदी में; देवम्‌--देवता; पशु-पतिम्‌--शिवजी को; विभुम्‌--शक्तिशाली; आनर्चु:--उन्होंने पूजा की; अर्हणै:--साज-सामग्री समेत; भक्त्या--भक्तिपूर्वक; देवीम्‌--देवी; च--तथा; नृ-पते--हे राजा; अम्बिकाम्‌--अम्बिका को

हे राजन, वहाँ पहुँचने के बाद उन्होंने सरस्वती नदी में स्नान किया और तब विविध पूजा-सामग्री से शक्तिशाली शिवजी तथा उनकी पत्नी देवी अम्बिका की भक्तिपूर्वक पूजा की।

गावो हिरण्यं वासांसि मधु मध्वन्नमाहता: ।

ब्राह्मणे भ्यो ददुः सर्वे देवो न: प्रीयतामिति ॥

३॥

गाव:--गौवें; हिरण्यम्‌--स्वर्ण; वासांसि--वस्त्र; मधु--मीठा; मधु--शहद से मिश्रित; अन्नम्‌--अन्न; आहता:--आदरपूर्वक;ब्राह्मणेभ्य: --ब्राह्मणों को; ददुः--दिया; सर्वे--सभी; देव:--स्वामी; नः--हम पर; प्रीयताम्‌--प्रसन्न हों; इति--इस प्रकार

प्रार्थना करते हुएग्वालों ने ब्राह्मणों को गौवें, स्वर्ण, वस्त्र तथा शहदमिश्रित पक्वान्न की भेंटें दान में दीं।

तत्पश्चात्‌ उन्होंने प्रार्थना की, हे प्रभु, हम पर आप प्रसन्न हों।

'ऊषुः सरस्वतीतीरे जलं प्राश्य यतब्रता: ।

रजनीं तां महाभागा नन्दसुनन्दकादय:ः ॥

४॥

ऊषु:--रुके रहे; सरस्वती-तीरे--सरस्वती के तट पर; जलम्‌--जल को; प्राशय--खाकर ( पीकर ); यत-ब्रता:--कठिन ब्रतकरते हुए; रजनीम्‌--रात को; ताम्‌--उस; महा-भागा: -- भाग्यशाली लोग; नन्द-सुनन्दक-आदय: --नन्द, सुनन्द इत्यादि

नन्द, सुनन्द तथा अन्य अत्यन्त भाग्यशाली ग्वालों ने वह रात सरस्वती के तट पर संयम सेअपने अपने ब्रत रखते हुए बिताईं।

उन्होंने केवल जल ग्रहण किया और उपवास रखा।

कश्चिन्महानहिस्तस्मिन्विपिनेउतिबुभुक्षित: ।

यहच्छयागतो नन्दं शयानमुरगोग्रसीत्‌ ॥

५॥

कश्चित्‌ू--किसी; महान्‌--बड़ा; अहिः--सर्प ने; तस्मिनू--उस; विपिने--जंगल के क्षेत्र में; अति-बुभुक्षित:--अत्यन्त भूखा;यहच्छया--अकस्मात्‌; आगत: --आया; नन्दम्‌--नन्द महाराज को; शयानम्‌--सोते हुए; उर-ग:--पेट के बल सरकता;अग्रसीत्‌ू--निगल लिया

रात में एक विशाल एवं अत्यन्त भूखा सर्प उस जंगल में प्रकट हुआ।

वह सोये हुए ननन्‍्दमहाराज के निकट अपने पेट के बल सरकता हुआ गया और उन्हें निगलने लगा।

स चुक्रोशाहिना ग्रस्त: कृष्ण कृष्ण महानयम्‌ ।

सर्पो मां ग्रसते तात प्रपन्न॑ परिमोचय ॥

६॥

सः--वह, नन्द महाराज; चुक्रोश--चिल्लाया; अहिना--साँप के द्वारा; ग्रस्त:--पकड़ा हुआ; कृष्ण कृष्ण--हे कृष्ण, हे कृष्ण;महान्‌ू--विशाल; अयम्‌--यह; सर्प:--सर्प; माम्‌ू--मुझको; ग्रसते--निगले जा रहा है; तात--मेरे बेटे; प्रपन्नम्‌--मुझशरणागत का; परिमोचय--उद्धार करो |

साँप के चंगुल में फँसे नन्द महाराज चिल्लाये, 'कृष्ण ! बेटे कृष्ण), यह विशाल सर्प मुझेनिगले जा रहा है।

मैं तो तुम्हारा शरणागत हूँ।

मुझे बचाओ 'तस्य चाक्रन्दितं श्रुत्वा गोपाला: सहसोत्थिता: ।

ग्रस्तं च इष्ठा विश्रान्ता: सर्प विव्यधुरुल्मुकै: ॥

७॥

तस्य--उसकी; च--तथा; आक्रन्दितम्‌--चिल्लाहट; श्रुत्वा--सुनकर; गोपाला:--ग्वाले; सहसा--एकाएक; उत्थिता: --उठकर; ग्रस्तम्‌--पकड़ा हुआ; च--तथा; हृष्टा--देखकर; विश्रान्ता:--विचलित; सर्पम्‌ू--साँप को; विव्यधु:--पीटा;उल्मुकै:--जलती मशालों, या लुकाठों से।

जब ग्वालों ने नन्द की चीखें सुनीं तो वे तुरन्त उठ गये और उन्होंने देखा कि नन्द को तो सर्पनिगले जा रहा है।

अत्यन्त विचलित होकर उन्होंने जलती मशालों से उस सर्प को पीटा।

अलातैर्दह्ममानोपि नामुजखत्तमुरड्रमः ।

तमस्पृशत्पदा भ्येत्य भगवान्सात्वतां पति: ॥

८॥

अलातै:--लुकाठों से; दह्ममान:--जलाये जाने पर; अपि--भी; न अमुझ्ञत्‌--नहीं छोड़ा; तम्‌--उसको; उरड्रम:--सर्प ने;तम्‌--उस साँप को; अस्पृशत्‌--छुआ; पदा--पाँव से; अभ्येत्य--आकर; भगवान्‌-- भगवान्‌ ने; सात्वताम्‌-भक्तों के;'पति:--स्वामीलुकाठों से जलाये जाने पर भी उस साँप ने ननन्‍्द महाराज को नहीं छोड़ा।

तब भक्तों केस्वामी भगवान्‌ कृष्ण उस स्थान पर आये और उन्होंने उस साँप को अपने पाँव से छुआ।

स वै भगवतः श्रीमत्पादस्पर्शहताशुभः ।

भेजे सर्पवपुर्हित्वा रूपं विद्याधराचितम्‌ ॥

९॥

सः--वह; वै--निस्सन्देह; भगवतः--भगवान्‌ के; श्री-मत्‌--दैवी; पाद--पाँव के ; स्पर्श--स्पर्श से; हत--विनष्ट हुए;अशुभ:ः--सारे अशुभ; भेजे-- धारण किया; सर्प-वपु:--साँप का शरीर; हित्वा--त्यागकर; रूपम्‌--रूप; विद्याधर--विद्याधरोंद्वारा; अचितम्‌--पूजित |

भगवान्‌ के दिव्य चरण का स्पर्श पाते ही सर्प के सारे पाप विनष्ट हो गये और उसने अपनासर्प-शरीर त्याग दिया।

वह पूज्य विद्याधर के रूप में प्रकट हुआ।

तमपृच्छद्धृषीकेश: प्रणतं समवस्थितम्‌ ।

दीप्यमानेन वपुषा पुरुषं हेममालिनम्‌ ॥

१०॥

तम्‌--उससे; अपृच्छत्‌-- पूछा; हषीकेश:-- भगवान्‌ हषीकेश ने; प्रणतम्‌--नमस्कार करते हुए; समवस्थितम्‌--उनके समक्षखड़ा; दीप्यमानेन--देदीप्यमान; वपुषा--शरीर से; पुरुषम्‌--पुरुष को; हेम--सुनहरे; मालिनम्‌--मालाएँ पहने ।

तब भगवान्‌ हृषीकेश ने इस व्यक्ति से जो देदीप्यमान शरीर से युक्त उनके समक्ष सिरझुकाये, सुनहरी मालाओं से सज्जित खड़ा था, पूछा।

को भवान्परया लक्ष्म्या रोचतेउद्भुतदर्शन: ।

कथ॑ जुगुप्सितामेतां गतिं वा प्रापितोडवश: ॥

११॥

कः--कौन; भवानू--आप; परया--महान; लक्ष्या--सौन्दर्य से युक्त; रोचते--चमक रहे हो; अद्भुत-- अनोखा; दर्शन:--देखने में; कथम्‌--क्‍्यों; युगुप्सितामू-- भयानक; एतामू--यह; गतिम्‌--लक्ष्य; वा--तथा; प्रापित:--धारण करना पड़ा;अवशः--अपने वश से बाहर।

भगवान्‌ कृष्ण ने कहा महाशय, आप तो अत्यधिक सौन्दर्य से चमत्कृत होने से इतनेअद्भुत लग रहे हैं।

आप कौन हैं? और आपको किसने सर्प का यह भयानक शरीर धारण करनेके लिए बाध्य किया ?

सर्प उवाचअहं विद्याधर: कश्रित्सुदर्शन इति श्रुतः ।

श्रिया स्वरूपसम्पत्त्या विमानेनाचरन्दिश: ॥

१२॥

ऋषीन्विरूपाड्रिरसः प्राहसं रूपदर्पित: ।

तैरिमां प्रापितो योनिं प्रलब्धेः स्वेन पाप्मना ॥

१३॥

सर्प: उवाच--सर्प ने कहा; अहम्‌--मैं; विद्याधर:--विद्याधर; कश्चित्‌--कोई; सुदर्शन:--सुदर्शन; इति--इस प्रकार; श्रुत:ः--विख्यात; अिया--ऐश्वर्य से; स्वरूप--अपने स्वरूप का; सम्पत्त्या--धन से; विमानेन--अपने विमान में; आचरनू--घूमते हुए;दिशः--दिशाएँ; ऋषीन्‌--ऋषिगण; विरूप--कुरूप; आड्विरस:--अडिगरा मुनि की शिष्य परम्परा के; प्राहसम्‌--मैंने हँसीउड़ाई; रूप--सौन्दर्य के कारण; दर्पित:--अत्यधिक गर्वित; तैः--उनके कारण; इमाम्‌--यह; प्रापित:-- धारण करना पड़ा;योनिमू--जन्म; प्रलब्धै:--जिनका मजाक उड़ा था; स्वेन--अपने ही; पाप्मना--पापों के कारण।

सर्प ने उत्तर दिया: मैं सुदर्शन नामक विख्यात विद्याधर हूँ।

मैं अत्यन्त सम्पत्तिवान तथा सुन्दरथा और अपने विमान में चढ़कर सभी दिशाओं में मुक्त विचरण करता था।

एक बार मैंने अंगिरामुनि की परम्परा के कुछ ऋषियों को देखा।

अपने सौन्दर्य से गर्वित मैंने उनका मजाक उड़ायाऔर मेरे पाप के कारण उन्होंने मुझे निम्न योनि धारण करने के लिए बाध्य कर दिया।

शापो मेअनुग्रहायैव कृतस्तै:ः करुणात्मभि: ।

यदहं लोकगुरुणा पदा स्पृष्टो हताशुभ: ॥

१४॥

शापः--शाप; मे--मेरे; अनुग्रहाय--वर के लिए; एव--निश्चय ही; कृत:ः--किया गया; तैः--उनके द्वारा; करूण-आत्मभि: --स्वभाव से दयालु; यत्‌--चूँकि; अहम्‌--मैं; लोक--सारे लोकों के; गुरुणा--गुरु द्वारा; पदा--पाँव से; स्पृष्ट:--स्पर्श किया;हत--नष्ट; अशुभ:--सारे अशुभ |

वास्तव में मेरे लाभ के लिए ही उन दयालु ऋषियों ने मुझे शाप दिया क्योंकि अब मैं समस्तलोकों के परम दिव्य गुरु के पाँव द्वारा स्पर्श किया जा चुका हूँ और इस तरह सारे अशुभों सेमुक्त हो चुका हूँ।

त॑ त्वाहं भवभीतानां प्रपन्नानां भयापहम्‌ ।

आपूृच्छे शापनिर्मुक्त: पादस्पर्शादमीवहन्‌ ॥

१५॥

तम्‌--वही पुरुष; त्वा--तुम; अहम्‌--मैं; भव--संसार का; भीतानाम्‌--डरे हुओं के लिए; प्रपन्नानामू--शरणागतों के; भय--भय के; अपहम्‌-- भगाने वाले; आपृच्छे-- आपकी अनुमति चाहता हूँ; शाप--शाप से; निर्मुक्त:--मुक्त; पाद-स्पर्शात्‌--आपके पाँव के स्पर्श से; अमीव--सारे दुखों के; हन्‌--नष्ट करने वाले

हे प्रभु, आप उन समस्त लोगों के सारे भय को नाश करने वाले हैं, जो इस भौतिक संसारसे डर कर आपकी शरण ग्रहण करते हैं।

अब मैं आपके चरणस्पर्श से ऋषियों के शाप से मुक्तहो गया हूँ।

हे दुखभंजन, अब मुझे अपने लोक वापस जाने की अनुमति दें।

प्रपन्नोउस्मि महायोगिन्महापुरुष सत्पते ।

अनुजानीहि मां देव सर्वलोकेश्वरेश्वर ॥

१६॥

प्रपन्न:--शरणागत; अस्मि--हूँ; महा-योगिन्‌--हे योगियों में महान; महा-पुरुष--हे महापुरुष; सत्‌-पते--हे भक्तों के स्वामी;अनुजानीहि--आज्ञा दें; मामू--मुझको; देव--हे ई ध्वर; सर्व--सभी; लोक--लोकों के; ई श्वर--नियन्ताओं के; ईश्वर--हे परमनियन्ता।

हे योगेश्वर, हे महापुरुष, हे भक्तों के स्वामी, मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ।

हे परमेश्वर,हे ब्रह्माण्ड के ईश्वरों के ईश्वर, आप जैसा चाहें वैसी मुझे आज्ञा दें।

ब्रह्मदण्डाद्विमुक्तो हं सद्यस्तेच्युत दर्शनात्‌ ।

यन्नाम गृह्नन्नखिलान्श्रोतृनात्माममेव च ।

सद्यः पुनाति कि भूयस्तस्य स्पृष्ट: पदा हि ते ॥

१७॥

ब्रह्म--ब्राह्मणों के; दण्डात्‌--दण्ड से; विमुक्त:--मुक्त; अहम्‌--मैं; सद्यः--तुरन्त; ते--आप; अच्युत--हे अच्युत भगवान्‌;दर्शनात्‌ू--दर्शन से; यत्‌ू--जिसके; नाम--नाम; गृहन्‌--कीर्तन करने; अखिलानू--समस्त; श्रोतृन्‌ू-- श्रोताओं; आत्मानम्‌--स्वयं; एव--निस्सन्देह; च-- भी; सद्यः--तुरन्त; पुनाति--पवित्र कर देता है; किम्‌ भूयः--तो फिर और अधिक क्या; तस्य--उसका; स्पृष्ट:ः --स्पर्श किया गया; पदा--पाँव से; हि--निस्सन्देह; ते--आपके

हे अच्युत, मैं आपके दर्शन मात्र से ब्राह्मणों के दण्ड से तुरन्त मुक्त हो गया।

जो कोईआपके नाम का कीर्तन करता है, वह अपने साथ-साथ अपने श्रोताओं को भी पवित्र बना देताहै।

तो फिर आपके चरणकमल का स्पर्श न जाने कितना लाभप्रद होगा ?

इत्यनुज्ञाप्य दाशाईं परिक्रम्याभिवन्द्य च ।

सुदर्शनो दिवं यातः कृच्छान्नन्दश्च मोचितः ॥

१८॥

इति--इस प्रकार; अनुज्ञाप्प-- अनुमति लेकर; दाशाहम्‌--कृष्ण से; परिक्रम्य--परिक्रमा करके; अभिवन्द्य--नमस्कार करके;च--तथा; सुदर्शन:--सुदर्शन; दिवम्‌--स्वर्ग को; यात:--चला गया; कृच्छात्‌--अपने संकट से; नन्दः--नन्द महाराज; च--भी; मोचित:--छूट गये |

इस प्रकार भगवान्‌ कृष्ण की अनुमति पाकर सुदर्शन ने उनकी परिक्रमा की, उन्हें झुककरनमस्कार किया और तब वह स्वर्ग के अपने लोक लौट गया।

इस तरह नन्द महाराज संकट सेउबर आये।

निशाम्य कृष्णस्य तदात्मवैभवं ब्रजौकसो विस्मितचेतसस्ततः ।

समाप्य तस्मिन्नियमं पुनर्त्रजंणजृपाययुस्तत्कथयन्त आहृता: ॥

१९॥

निशाम्य--देखकर; कृष्णस्य--कृष्ण का; तत्‌ू--वह; आत्म--अपना; वैभवम्‌--शक्ति का प्रदर्शन; ब्रज-ओकसः:--ब्रजवासी;विस्मित--चकित; चेतस: --अपने मन में; तत:--तब; समाप्य--समाप्त करके ; तस्मिन्‌--उस स्थान पर; नियमम्‌-- अपने ब्रत;पुनः--फिर; ब्रजम्‌-ग्वालों के गाँव में; नृप--हे राजा; आययु:--लौट आये; तत्‌--वह प्रदर्शन; कथयन्त:--बयान करते;आहता:--आदरपूर्वक |

कृष्ण की असीम शक्ति देखकर ब्रजवासी चकित रह गये।

हे राजन, तब उन्होंने भगवान्‌शिव की पूजा सम्पन्न की और रास्ते में कृष्ण के शक्तिशाली कार्यो का आदरपूर्वक वर्णन करतेहुए वे सभी ब्रज लौट आये।

कदाचिदथ गोविन्दो रामश्नाद्भुतविक्रम: ।

विजह॒तुर्वने रात्रयां मध्यगौ ब्रजयोषिताम्‌ ॥

२०॥

कदाचित्‌--एक समय; अथ--तब; गोविन्दः-- भगवान्‌ कृष्ण; राम:-- बलराम; च--तथा; अद्भुत--अद्भुत; विक्रम: --कार्य; विजहतु:--दोनों ने क्रीड़ा की; वने--वन में; रात्याम्‌--रात्रि के समय; मध्य-गौ--बीच में; त्रज-योषिताम्‌--ग्वालों कीस्त्रियों के |

एक बार अद्भुत कौशल दिखलाने वाले भगवान्‌ गोविन्द तथा राम रात्रि के समय ब्रज कीयुवतियों के साथ जंगल में क्रीड़ा कर रहे थे।

उपगीयमानौ ललित स्त्रीजनैर्बद्धसौहदे: ।

स्वलड्डू तानुलिप्ताड़ौ स्त्रग्विनौ विरजोम्बरौ ॥

२१॥

उपगीयमानौ--उनकी महिमा का गायन करते; ललितम्‌--मनोहर; स्त्री-जनै: --स्त्रियों के द्वारा; बद्ध--बँधा; सौहदैः--उनकेप्रति स्नेह से; सु-अलड्डू त--अत्यधिक सजी हुईं; अनुलिप्त--( चन्दन ) लेप किये; अज्जौ--अंगों वाली; सत्रकू-विनौ--फूलों कीमाला पहने; विरज:-- धूल से रहित, निर्मल; अम्बरौ--वस्त्र धारण किये।

कृष्ण तथा बलराम फूलों की माला तथा स्वच्छ वस्त्र धारण किये हुए थे और उनके अंगप्रत्यंग उत्तम विधि से सजाये तथा लेपित किये गये थे।

उनके स्नेह में बँधी हुई स्त्रियों ने उनकीमहिमा का मनोहर ढंग से गायन किया।

निशामुखं मानयन्तावुदितोडुपतारकम्‌ ।

मल्लिकागन्धमत्तालिजुष्टे कुमुदवायुना ॥

२२॥

निशा-मुखम्‌--रात्रि का शुभारम्भ; मानयन्तौ--दोनों ने सम्मान करते हुए; उदित--उदित होकर; उड्डप-- चन्द्रमा; तारकम्‌--तथा तारे; मल्लिका--चमेली के फूलों की; गन्ध--सुगन्ध से; मत्त--उन्मत्त; अलि--भौंरों के द्वारा; जुष्टमू--पसंद किये गये;कुमुद--कमलों की; वायुना--मन्द वायु से |

उन दोनों ने रात्रि आगमन की प्रशंसा की जिसका संकेत चन्द्रमा तथा तारों के उदित होने,कमल की गंध से युक्त मन्द वायु तथा चमेली के फूलों की सुगन्ध से मत्त भौंरों से हो रहा था।

जगतु: सर्वभूतानां मन: श्रवणमड्लम्‌ ।

तौ कल्पयन्तौ युगपत्स्वरमण्डलमूर्च्छितम्‌ ॥

२३॥

जगतु:--गाया; सर्व-भूतानाम्‌--समस्त प्राणियों के; मनः--मन; श्रवण--तथा कानों के लिए; मड़लम्‌--सुख; तौ--दोनोंजन; कल्पयन्तौ--उत्पन्न करते हुए; युगपत्‌--एकसाथ; स्वर--तान; मण्डल--समूह से; मूर्च्छितम्‌--वर्धित |

कृष्ण तथा बलराम ने एकसाथ आरोह अवरोह की सभी ध्वनियाँ से युक्त राग अलापा।

उनके गायन से सारे जीवों के कानों तथा मन को सुख प्राप्त हुआ।

गोप्यस्तद्गीतमाकर्णय मूर्च्छिता नाविदन्रूप ।

स्त्रंसहुकूलमात्मानं स्त्रस्तकेशस्त्रजं ततः ॥

२४॥

गोप्य:--गोपियाँ; तत्‌ू--उनके; गीतम्‌--गायन को; आकर्णर्य--सुनकर; मूर्च्छिता: --मूर्च्छित हो गईं; न अविदनू--ज्ञान न रहा;नृप--हे राजन्‌; स्त्रंसत्‌ू--खिसकते हुए; दुकूलम्‌--वस्त्र; आत्मानम्‌-- अपने आप; स्त्रस्त--बिखर गये; केश--बाल; स्त्रजम्‌--मालाएँ; ततः--उससे ( खिसककर )

जब गोपियों ने वह गायन सुना तो वे सम्मोहित हो गईं।

हे राजनू, वे अपने आपको भूल गईंऔर उन्होंने यह भी नहीं जाना कि उनके सुन्दर वस्त्र शिथिल हो रहे हैं तथा उनके बाल एवंमालाएँ बिखर रही हैं।

एवं विक्रीडतो: स्वैरं गायतो: सम्प्रमत्तवत्‌ ।

शद्डुचूड इति ख्यातो धनदानुचरोभ्यगात्‌ ॥

२५॥

एवम्‌--इस प्रकार; विक्रीडतो:--दोनों जन क्रीड़ा करते हुए; स्वैरम्‌--इच्छानुसार; गायतो:--गाते हुए; सम्प्रमत्त--मतवाले;वत्‌--सहृश; शट्डुचूड:--शंखचूड़; इति--इस प्रकार; ख्यात:--नामक; धन-द--देवताओं के खजाज्नी, कुवेर का;अनुचर:--सेवक; अभ्यगात्‌--आया

जब भगवान्‌ कृष्ण तथा भगवान्‌ बलराम स्वेच्छापूर्वक क्रीड़ा कर रहे थे और गाते हुएमतवाले हो रहे थे तभी कुवेर का शंखचूड़ नामक एक दास वहाँ आया।

तयोर्निरीक्षतो राजंस्तन्नाथं प्रमदाजनम्‌ ।

क्रोशन्तं कालयामास दिश्युदीच्यामशद्धितः ॥

२६॥

तयो:--दोनों के; निरीक्षतो:--देखते देखते; राजन्‌--हे राजन; तत्‌-नाथम्‌-- अपने प्रभुओं के; प्रमदा-जनम्‌--स्त्रियों के समूहको; क्रोशन्तम्‌-चिल्लाते हुए; कालयाम्‌ आस--भगाने लगा; दिशि--दिशा में; उदीच्याम्‌--उत्तरी; अशद्धित:ः--निर्भीक |

हे राजन, दोनों के देखते देखते शंखचूड़ उन स्त्रियों को उत्तर दिशा की ओर भागकर लेजाने लगा।

कृष्ण तथा बलराम को अपना स्वामी मान चुकीं स्त्रियाँ उनकी ओर देखते हुएचीखने- चिल्लाने लगीं।

क्रोशन्तं कृष्ण रामेति विलोक्य स्वपरिग्रहम्‌ ।

यथा गा दस्युना ग्रस्ता भ्रातरावन्‍्वधावताम्‌ ॥

२७॥

क्रोशन्तम्‌--चिल्लाते हुए; कृष्ण राम इति--हे कृष्ण, हे राम; विलोक्य--देखकर; स्व-परिग्रहम्‌--अपने भक्तों को; यथा--जिस तरह; गा:--गौवें; दस्युना--चोरों के द्वारा; ग्रस्ता:--पकड़ी हुई; भ्रातरौ--दोनों भाई; अन्वधावताम्‌--पीछे दौड़ा |

अपने भक्तों को 'कृष्ण, राम, ' कहकर चिल्लाते हुए सुनकर तथा यह देखकर कि वे चोरद्वारा गौवों की तरह चुराई जा रही हैं कृष्ण तथा बलराम उस असुर के पीछे दौड़ने लगे।

मा भेष्टेयभयारावीौ शालहस्तौ तरस्विनौ ।

आसेदतुस्तं तरसा त्वरितं गुह्यकाधमम्‌ ॥

२८ ॥

मा भैष्ट--मत डरो; इति--इस प्रकार पुकारते हुए; अभय--अभय दान करते हुए; आरावौ--जिसके शब्द; शाल--लट्ठे;हस्तौ--दोनों हाथों में ; तरस्विनौ--तेजी से घुमाते हुए; आसेदतु:--वे पास पहुँचे; तम्‌--उस असुर को; तरसा--जल्दी से;त्वरितम्‌-तेजी से घूम रहे; गुह्मक--यक्षों में; अधमम्‌--निकृष्ट |

भगवान्‌ ने उत्तर में पुकारा: डरना मत।

तत्पश्चात्‌ उन्होंने हाथ में शाल वृक्ष के लट्ठे उठालिये और उस अधमतम गुहाक का तेजी से पीछा करने लगे जो तेजी से भाग रहा था।

स वीक्ष्य तावनुप्राप्तौ कालमृत्यू इवोद्विजन्‌ ।

विषृज्य स्त्रीजनं मूढ: प्राद्रवज्जीवितेच्छया ॥

२९॥

सः--वह, शंखचूड़; वीक्ष्य--देखकर; तौ--दोनों को; अनुप्राप्तौी--निकट आया; काल-मृत्यू--समय तथा मृत्यु; इब--सहश;उद्विजन्‌--उद्विग्न होकर; विसृज्य--एक ओर छोड़कर; स्त्री-जनम्‌--स्त्रियों को; मूढः--मतिकध्रष्ट; प्राद्रबत्‌-- भाग गया;जीवित--अपना जीवन; इच्छया--बनाये रखने की इच्छा से |

जब शंखचूड़ ने उन दोनों को साक्षात्‌ काल तथा मृत्यु की तरह अपनी ओर आते देखा तोवह उद्विग्न हो उठा।

वह भ्रमित होकर स्त्रियों को छोड़कर अपनी जान बचाकर भाग गया।

तमन्वधावद्गोविन्दो यत्र यत्र स धावति ।

जिहीर्षुस्तच्छिरोरलं तस्थौ रक्षन्स्त्रियो बल: ॥

३०॥

तम्‌--उसके; अन्वधावत्‌--पीछे पीछे दौड़े; गोविन्दः--कृष्ण; यत्र यत्र--जहाँ जहाँ; सः--वह; धावति--दौड़ता था;जिहीर्षु:--निकालने की इच्छा से; तत्‌--उसके; शिर:--सिर पर; रलम्‌--रल, मणि को; तस्थौ--खड़े रहे; रक्षन्‌--रक्षा करतेहुए; स्त्रियः--स्त्रियाँ; बल:--बलराम

भगवान्‌ गोविन्द उस असुर के सिर की मणि निकालने के लिए उत्सुक होकर जहाँ जहाँ वहदौड़ रहा था, उसका पीछा कर रहे थे।

इसी बीच बलराम स्त्रियों की रक्षा करने के लिए उनकेसाथ रह गये।

अविदूर इवाभ्येत्य शिरस्तस्य दुरात्मन: ।

जहार मुष्टिनेवाड़ सहचूडमणिं विभु: ॥

३१॥

अविदूरे--पास ही; इब--मानो; अभ्येत्य--की ओर आकर; शिर:ः--सिर; तस्य--उसका; दुरात्मन:--दुष्ट; जहार--अलग करलिया; मुष्टिना--अपनी मुट्ठी से; एबव--केवल; अड्र--हे राजन्‌; सह--साथ; चूड-मणिम्‌--सिर के मणि को; विभु:--सर्वशक्तिमान भगवान्‌ ने।

हे राजन, शक्तिशाली भगवान्‌ ने दूर से ही शंखचूड़ को पकड़ लिया मानो निकट से हो औरतब अपनी मुट्ठी से उस दुष्ट के सिर को चूड़ामणि समेत धड़ से अलग कर दिया।

शद्डुचूडं निहत्यैवं मणिमादाय भास्वरम्‌ ।

अग्रजायाददात्प्रीत्या पश्यन्तीनां च योषिताम्‌ ॥

३२॥

शट्डुचूडम्‌-शंखचूड़ को; निहत्य--मारकर; एवम्‌--इस तरह; मणिम्‌--मणि को; आदाय--लाकर; भास्वरम्‌--चमकीली;अग्र-जाय--अपने बड़े भाई ( बलराम ) को; अददात्‌--दे दिया; प्रीत्या--प्रसन्नतापूर्वक; पश्यन्तीनाम्‌--देखते हुए; च--तथा;योषिताम्‌--स्त्रियों के |

इस प्रकार शंखचूड़ असुर को मारकर तथा उसकी चमकीली मणि लेकर भगवान्‌ कृष्ण नेइसे अपने बड़े भाई को बड़ी प्रसन्नतापूर्वक गोपियों के सामने भेंट किया।

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