← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची

अध्याय बत्तीस: पुनर्मिलन

10.32श्रीशुक उबाचइति गोप्यः प्रगायन्त्य: प्रलपन्त्यश्च चित्रधा ।

रुरुदुः सुस्वरं राजन्कृष्णदर्शनलालसा: ॥

१॥

श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार, जैसाकि ऊपर कहा गया; गोप्य:--गोपियाँ; प्रगायन्त्य:--गाती हुईं; प्रलपन्त्य:--बातें करतीं; च--तथा; चित्रधा-- अनेक मनमोहक विधियों से; रुरुदु:--चिल्लाईं; सु-स्वरम्‌--तेजी से;राजनू--हे राजा; कृष्ण-दर्शन--कृष्ण का दर्शन करने की; लालसा:--लालसाएँ।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजनू, इस तरह गाकर तथा अपने हृदय की बातों को विविधमोहक विधियों से प्रकट करके गोपियाँ जोर जोर से रोने लगीं।

वे कृष्ण का दर्शन करने के लिएअत्यन्त लालायित थीं।

तासामाविरभूच्छौरि: स्मयमानमुखाम्बुज: ।

पीताम्बरधरः स्त्रग्वी साक्षान्मन्मथमन्मथ:ः ॥

२॥

तासामू--उनके समक्ष; आविरभूत्‌--प्रकट हुए; शौरि: -- भगवान्‌ कृष्ण; स्मयमान--हँसते हुए; मुख--मुँह; अम्बुज:--कमलसहश; पीत--पीला; अम्बर--वस्त्र; धर: --पहने; सत्रकू-वी--फूलों की माला पहने; साक्षात्‌-प्रत्यक्ष; मन्‌-मथ--मन कोमोहित करने वाले, कामदेव का; मन्‌--मन का; मथ: --मथने या मोहने वाला।

तब भगवान्‌ कृष्ण अपने मुखमण्डल पर हँसी धारण किये गोपियों के समक्ष प्रकट हो गये।

माला तथा पीत वस्त्र पहने वे ऐसे लग रहे थे, जो सामान्य जनों के मन को मोहित करने वालेकामदेव के मन को भी मोहित कर सकते थे।

त॑ विलोक्यागत॑ प्रेष्ठे प्रीत्युतफुल्लहशोबला: ।

उत्तस्थुर्युगपत्सर्वास्तन्व: प्राणमिवागतम्‌ ॥

३॥

तम्‌--उस; विलोक्य--देखकर; आगतमू--वापस आया; प्रेष्ठम्‌-- अपने प्रियतम को; प्रीति--स्नेह से; उत्फुल्ल--खिली हुई;हृशः--आँखें; अबला: --युवतियाँ; उत्तस्थु:--खड़ी हो गईं; युगपत्‌--तुरन्‍्त एकसाथ; सर्वा:--सभी; तन्व: --शरीर के;प्राणम्‌-- प्राण वायु; इब--सहृश; आगतम्‌--आया हुआ |

जब गोपियों ने देखा कि उनका परमप्रिय कृष्ण उनके पास लौट आया है, तो वे सहसा उठखड़ी हुईं और स्नेह के कारण उनकी आँखें पूरी तरह खिल उठीं।

ऐसा लगा मानों उनके ( मृत )शरीर में प्राण वापस आ गये हों।

काचित्कराम्बुजं शौरेज॑गृहेज्जलिना मुदा ।

काचिद्दधार तद्ठाहुमंसे चन्दनभूषितम्‌ ॥

४॥

काचित्‌--उनमें से एक; कर-अम्बुजमू--कर-कमल को; शौरे: -- भगवान्‌ कृष्ण के; जगृहे--पकड़ लिया; अज्ञलिना--अपनीहथेली में; मुदा--हर्ष के मारे; काचित्‌--दूसरी ने; दधार--रख लिया; ततू-बाहुमू--उनकी भुजा को; अंसे--अपने कंधे पर;चन्दन--चन्दन लेप से; भूषितम्‌--सजाई गईं।

एक गोपी ने हर्षित होकर कृष्ण के हाथ को अपनी हथेलियों के बीच में ले लिया औरदूसरी ने चन्दनलेप से विभूषित उनकी भुजा अपने कंधे पर रख ली।

काचिदझ्जलिनागृह्ञत्तन्वी ताम्बूलचर्वितम्‌ ।

एका तदड्प्रिकमलं सन्तप्ता स्तनयोरधात्‌ ॥

५॥

काचित्‌--एक; अज्जञलिना--हथेलियों से; अगृह्नात्‌ू--ले लिया; तन्वी--छरहरी ने; ताम्बूल--पान का; चर्वितम्‌--जूठन;एका--एक ने; तत्‌--उसका; अड्ध्रि--पाँव; कमलम्‌ू--कमलवत्‌; सन्तप्ता--तपते हुए; स्तनयो:--अपने स्तनों पर; अधातू--रख लिया |

एक छरहरी गोपी ने आदरपूर्वक अपनी हथेलियों में उनके चबाये पान का जूठन ले लिया और ( काम ) इच्छा से तप्त दूसरी गोपी ने उनके चरणकमल अपने स्तनों पर रख लिए।

एका श्रुकुटिमाबध्य प्रेमसंरम्भविह्नला ।

घ्नन्तीवैक्षत्कटाक्षेपै: सन्दष्टद्शनच्छदा ॥

६॥

एका--एक अन्य गोपी ने; भ्रु-कुटिमू-- अपनी भौंहों को; आबध्य--सिकोड़ कर; प्रेम-- अपने शुद्ध प्रेम; संरम्भ--क्रोध से;विहला--आपे में न रहकर; घ्वन्ती--चोट पहुँचाती; इब--मानो; ऐक्षत्‌--देखा; कट--अपने कटाक्ष से; आशक्षेपैः --आक्षेपोंसे; सन्दष्ट--काटते हुए; दशन--अपने दाँत के; छदा--आवरण ( अपने होठों को )

एक गोपी प्रेममय क्रोध से विहल होकर अपने होंठ काटने लगी और क्रुद्ध भौहों से उन्हेंताकने लगी मानो वह अपनी कुटिल चितवनों से उन्हें घायल कर देगी।

अपरानिमिषदृग्भ्यां जुषाणा तन्मुखाम्बुजम्‌ ।

आपीतमपि नातृप्यत्सन्तस्तच्चरणं यथा ॥

७॥

अपरा--एक अन्य गोपी; अनिमिषत्‌-- अपलक; द्ग्भ्यामू-- आँखों से; जुषाणा--आस्वाद करती; तत्‌--उसका; मुख-अम्बुजम्‌ू--कमलमुख; आपीतम्‌--पूर्णतया आस्वादित; अपि--यद्यपि; न अतृप्यत्‌--तृप्त नहीं हुईं; सन्‍्तः--सन्त गण; ततू-चरणमू--उनके चरणों को; यथा--जिस तरह।

एक अन्य गोपी उनके कमल को अपलक नेत्रों से देखती रही किन्तु माधुरी का गहनआस्वाद कर लेने पर भी तुष्ट नहीं हुई जिस तरह सन्त पुरुष भगवान्‌ के चरणों का ध्यान करतेहुए तृप्त ही नहीं होते।

त॑ काचिच्नेत्ररन्श्रेण हदि कृत्वा निमील्य च ।

पुलकाड्ग्युपगुद्यास्ते योगीवानन्दसम्प्लुता ॥

८॥

तमू--उसको; काचित्‌--उनमें से एक; नेत्र--अपनी आँखों के ; रन्श्रेण--छिद्र से; हदि--अपने हृदय में; कृत्वा--रखकर;निमील्य--बन्द करके; च--तथा; पुलक-अड्डी --अंग अंग में रोमांचित हुई; उपगुह्ा--आलिंगन करके; आस्ते--रहती रही;योगी--योगी; इब--सहृश; आनन्द--आननन्‍द में; सम्प्लुता--निमग्न |

एक गोपी ने भगवान्‌ को अपनी आँखों के छिद्र से ले जाकर उन्हें अपने हृदय में रख लिया।

तब उसने अपनी आँखें बन्द कर लीं और रोमांचित होकर वह भीतर ही भीतर उनका लगातारआलिंगन करने लगी।

इस तरह दिव्य आनन्द में निमग्न वह भगवान्‌ का ध्यान करने वाले योगीजैसी लग रही थी।

सर्वास्ता: केशवालोकपरमोत्सवनिर्वृता: ।

जहुर्विरहजं ताप॑ प्राज्जं प्राप्प यथा जना: ॥

९॥

सर्वा:--सभी; ता:ः--उन गोपियों ने; केशव-- भगवान्‌ कृष्ण के; आलोक--दिखाई पड़ने से; परम--परम; उत्सव--उललासया उत्सव का; निर्वृता:--हर्ष का अनुभव करतीं;; जहु:--त्याग दिया; विरह-जम्‌--उनके विरह से उत्पन्न; तापम्‌--कष्ट को;प्राज्ममू-- आध्यात्मिक रूप से प्रबुद्ध व्यक्ति को; प्राप्प--पाकर; यथा--जिस तरह; जना:--सामान्य लोग।

सभी गोपियों ने जब अपने प्रिय केशव को फिर से देखा तो उन्हें परम उल्लास का अनुभवहुआ।

उन्होंने विरह-दुःख को त्याग दिया जिस तरह कि सामान्य लोग आध्यात्मिक रूप से प्रबुद्धव्यक्ति की संगति पाकर अपने दुख भूल जाते हैं।

ताभिर्विधूतशोकाभिर्भगवानच्युतो वृतः ।

व्यरोचताधिकं तात पुरुष: शक्तिभिर्यथा ॥

१०॥

ताभि:--इन गोपियों द्वारा; विधूत--पूर्णतया धुली; शोकाभि:--अपने शोक से; भगवान्‌--भगवान्‌; अच्युत: --अच्युत;बृतः--घिरी हुई; व्यरोचत--उज्वल दिखीं; अधिकम्‌--अत्यधिक; तात--हे प्रिय ( राजा परीक्षित ); पुरुष: --परमात्मा;शक्तिभि:ः--अपनी दिव्य शक्तियों से; यथा--जिस तरह।

समस्त शोक से मुक्त हुईं गोपियों से घिरे हुए पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ अच्युत भव्यता के साथचमक रहे थे।

हे राजन्‌, कृष्ण ऐसे लग रहे थे जिस तरह अपनी आध्यात्मिक शक्तियों से घिरे हुएपरमात्मा हों।

ता: समादाय कालि-न्द्या निर्विश्य पुलिनं विभुः ।

विकसत्कुन्दमन्दार सुरभ्यनिलषट्पदम्‌ ॥

११॥

शरच्चन्द्रांशुसन्दोहध्वस्तदोषातम: शिवम्‌ ।

कृष्णाया हस्ततरला चितकोमलवालुकम्‌ ॥

१२॥

ताः--उन गोपियों को; समादाय--लेकर; कालिन्द्या:--यमुना के; निर्विश्य--प्रवेश करके; पुलिनम्‌--तट पर; विभु:--सर्वशक्तिमान भगवान्‌; विकसत्‌--खिले हुए; कुन्द-मन्दार--कुन्द तथा मन्दार के फूलों की; सुरभि--सुगन्धित; अनिल--मन्दवायु से; सत्‌-पदम्‌-- भौंरों से; शरत्‌--शरदकालीन; चन्द्र--चन्द्रमा की; अंशु--किरणों की; सन्दोह--प्रचुरता से; ध्वस्त--दूरहुआ; दोषा--रात्रि का; तमः --अँधेरा; शिवम्‌--शुभ; कृष्णाया:--यमुना नदी का; हस्त--हाथों की तरह; तरल--अपनीलहरों से; आचित--एकत्रित; कोमल--मुलायम; वालुकम्‌--बालू, रेत |

तत्पश्चात्‌ सर्वशक्तिमान भगवान्‌ गोपियों को अपने साथ कालिन्दी के तट पर ले गये जिसनेअपने तट पर अपनी लहरों रूपी हाथों से कोमल बालू के ढेर बिखेर दिये थे।

उस शुभ स्थान मेंकुन्द तथा मन्दार फूलों के खिलने से बिखरी सुगन्धि को लेकर मन्द मन्द वायु अनेक भौंरों कोआकृष्ट कर रही थी और शरदकालीन चन्द्रमा की प्रभूत किरणों रात्रि के अंधकार को दूर कररही थीं।

तदरर्शनाह्नादविधूतहद्रुजोमनोरथान्तं श्रुतयो यथा ययु: ।

स्वैरुत्तरीयैः कुचकुड्डू माड्डितै-रचीक्रिपन्नासनमात्मबन्धवे ॥

१३॥

तत्‌--उस कृष्ण को; दर्शन--देखने से; आह्ाद-- आनन्द से; विधूत--बहकर, ले जाई गई; हत्‌-- अपने हृदयों में; रुज:--पीड़ा; मनः-रथ-- अपनी इच्छाओं की; अन्तम्‌--पूर्ति; श्रुत॒थः-- श्रुतियाँ, शास्त्र; यथा--जिस तरह; ययुः:--प्राप्त किया;स्वैः-- अपनी; उत्तरीयै:--ओढ़नी से; कुच--स्तनों के; कुड्डू म--सिन्‍्दूर से; अड्जभितैः--लेप की हुई; अचीक़िपन्‌--बना दिया;आसनम्‌--आसन; आत्म--अपनी आत्मा के; बन्धवे--मित्र के लिए |

अपने समक्ष साक्षात्‌ वेद रूप कृष्ण के दर्शन के आनन्द से गोपियों की हृदय-वेदना शमितहो गई और उन्हें लगा कि उनकी सारी इच्छाएँ पूरी हो गईं।

उन्होंने अपने प्रिय मित्र कृष्ण के लिएअपनी ओढ़नियों से, जो कि उनके स्तनों में लगे कुंकुम से सनी थीं, आसन बना दिया।

तत्रोपविष्टो भगवान्स ई श्वरोयोगेश्वरान्तहदे कल्पितासनः ।

चकास गोपीपरिषद्गतोर्चित-स्त्रैलोक्यलक्ष्म्येकपदं वपुर्दधत्‌ ॥

१४॥

तत्र--वहाँ; उपविष्ट:--आसीन; भगवान्‌-- भगवान्‌; सः--वह; ईश्वर: --परम नियन्ता; योग-ईश्वर--यौगिक ध्यान के स्वामियोंके; अन्तः--भीतर; हृदि--हृदयों में; कल्पित--बना लिया; आसन:--अपना स्थान; चकास--चमत्कृत लगने लगे; गोपी-'परिषत्‌--गोपियों की सभा में; गत:ः--उपस्थित; अर्चित:ः--पूजित; त्रै-लोक्य--तीनों लोकों के; लक्ष्मी--सौन्दर्य तथा अन्यऐश्वर्यों के; एक--एकमात्र; पदम्‌ू--आगार; वपु:--साकार स्वरूप; दधतू--प्रदर्शित करते हुए।

जिन भगवान्‌ कृष्ण के लिए बड़े बड़े योगेश्वर अपने हृदयों में आसन की व्यवस्था करते हैंवही कृष्ण गोपियों की सभा में आसन पर बैठ गये।

उनका दिव्य शरीर, जो तीनों लोकों मेंसौन्दर्य तथा ऐश्वर्य का एकमात्र धाम है, गोपियों द्वारा कृष्ण की पूजा करने पर जगमगा उठा।

सभाजयित्वा तमनड्ढदीपनंसहासलीलेक्षणविश्रमश्रुवा ।

संस्पर्शनेनाड्डकृताड्प्रिहस्तयो:संस्तुत्य ईषत्कुपिता बभाषिरे ॥

१५॥

सभाजयित्वा--सम्मानित करके; तम्‌--उसको; अनड्र--कामेच्छाओं के; दीपनम्‌--उद्यीप्त करने वाला; स-हास--हँसते हुए;लीला--क्रीड़ापूर्ण; ईक्षण--चितवन से; विभ्रम--खिलवाड़ करते; भ्रुवा--अपनी भौहैं से; संस्पर्शनेन--स्पर्श से; अड्डू--अपनी गोदों में; कृत--रख कर; अड्ध्रि--उनके पाँवों; हस्तयो: --तथा हाथों को; संस्तुत्य--प्रशंसा करके; ईषत्‌--कुछ कुछ;कुपिता:--छुद्ध।

बभाषिरे--बोलीं |

श्रीकृष्ण ने गोपियों के भीतर कामवासना जागृत कर दी थी और वे अपनी क्रीड़ापूर्ण हँसीसे उनको निहारतीं, अपनी भौंहों से प्रेममय इशारे करतीं तथा अपनी अपनी गोदों में उनके हाथतथा पाँव रखकर उन्हें मलती हुईं उनका सम्मान करने लगीं।

किन्तु उनकी पूजा करते हुए भी वेकुछ कुछ रुष्ट थीं अतएव वे उनसे इस प्रकार बोलीं ।

श्रीगोप्य ऊचु:भजतो नुभजन्त्येक एक एतद्ठिपर्ययम्‌ ।

नोभयांश्व भजन्त्येक एतन्नो ब्रूहि साधु भोः ॥

१६॥

श्री-गोप्य: ऊचु:--गोपियों ने कहा; भजत:--अपना सम्मान करने वालों से; अनु--परस्पर; भजन्ति--आदर करते हैं; एके --कुछ; एके--कुछ; एतत्‌--इसके; विपर्ययम्‌--विपरीत; न उभयान्‌--दोनों से नहीं; च--तथा; भजन्ति--परस्पर प्रशंसा करतेहैं; एके--कुछ; एतत्‌--यह; नः--हमसे; ब्रूहि--बोलिये; साधु--ढंग से; भोः--ओरे।

गोपियों ने कहा : कुछ लोग केवल उन्हीं से स्नेह जताते हैं, जो उनके प्रति स्नेहिल होते हैंजबकि अन्य लोग उनके प्रति भी स्नेह दिखाते हैं, जो शत्रुवत्‌ या उदासीन होते हैं।

फिर भी कुछलोग किसी से भी स्नेह नहीं जताते।

हे कृष्ण, हमसे इस विषय की समुचित व्याख्या करें।

श्रीभगवानुवाचमिथो भजन्ति ये सख्य: स्वार्थेकान्तोद्यमा हि ते ।

न तत्र सौहदं धर्म: स्वार्थार्थ तद्द्धि नान्‍न्यथा ॥

१७॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; मिथ: --परस्पर; भजन्ति--प्रेम करते हैं; ये--जो; सख्य: --मित्रगण; स्व-अर्थ--अपनेलिए; एक-अन्त--नितान्त; उद्यमा:--जिनका प्रयत्न; हि--निस्सन्देह; ते--वे; न--नहीं; तत्र--वहाँ पर; सौहदम्‌--सच्चीमित्रता; धर्म:--असली धार्मिकता; स्व-अर्थ--अपने लाभ; अर्थम्‌--के लिए; तत्‌--वह; हि--निस्सन्देह; न--नहीं; अन्यथा --अन्यथा।

भगवान्‌ ने कहा : तथाकथित मित्र जो अपने लाभ के लिए एक दूसरे से स्नेह जताते हैं, वेवास्तव में स्वार्थी हैं।

न तो उनकी मित्रता सच्ची होती है न ही वे धर्म के असली सिद्धान्तों का पालन करते हैं।

यदि वे एक दूसरे से लाभ की आशा न करें तो वे प्रेम नहीं कर सकते।

भजन्त्यभजतो ये वै करुणा: पितरौ यथा ।

धर्मो निरपवादोत्र सौहदं च सुमध्यमा: ॥

१८ ॥

भजन्ति--निष्ठापूर्वक सेवा करते हैं; अभजत:--न सेवा करने वालों के साथ; ये--जो; वै--निस्सन्देह; करुणा:--दयालु;पितरौ--माता पिता; यथा--जिस तरह; धर्म:--धार्मिक कर्तव्य; निरपवाद:--त्रुटिरहित; अत्र--इसमें; सौहदम्‌--मित्रता; च--तथा; सु-मध्यमा: --हे पतली कमर वालियो |

हे पतली कमर वाली गोपियों, कुछ लोग सचमुच दयालु होते हैं या माता-पिता की भाँतिस्वाभाविक रूप से स्नेहिल होते हैं।

ऐसे लोग उन लोगों की भी निष्ठापूर्वक सेवा करते हैं, जोबदले में उनसे प्रेम करने से चूक जाते हैं।

वे ही धर्म के असली त्रुटिविहीन मार्ग का अनुसरणकरते हैं और वे ही असली शुभचिन्तक हैं।

भजतोपि न वै केचिद्धजन्त्यभजतः कुतः ।

आत्मारामा ह्याप्तकामा अकृतज्ञा गुरुद्गरहः ॥

१९॥

भजतः:--अनुकूल कार्य करने वालों के साथ; अपि-- भी; न--नहीं; बै--निश्चय ही; केचित्‌--कुछ; भजन्ति--प्रेम करते हैं;अभजतः--अनुकूल कार्य न करने वालों के साथ; कुत:ः--क्या कहा जाय; आत्म-आरामा:--आत्म-तुष्ट; हि--निस्सन्देह;आप्त-कामा:--जिनकी भौतिक इच्छाएँ पूर्ण हो चुकी हैं; अकृत-ज्ञा:--कृतघ्न; गुरु-द्रुह:ः--गुरुजनों के शत्रु॥

फिर कुछ व्यक्ति ऐसे हैं, जो आध्यात्मिक रूप से आत्म तुष्ट हैं, भौतिक दृष्टि से परिपूर्ण हैंया स्वभाव से कृतघ्न हैं या सहज रूप से श्रेष्ठजनों से ईर्ष्या करने वाले हैं।

ऐसे लोग उनसे भीप्रेम नहीं करते जो उनसे प्रेम करते हैं, तो फिर जो शत्रुवत्‌ हैं उनका क्या कहना ?

नाहं तु सख्यो भजतोपि जन्तून्‌भजाम्यमीषामनुवृत्तिवृत्तये ।

यथाधनो लब्धधने विनष्टेतच्चिन्तयान्यन्निभृतो न वेद ॥

२०॥

न--नहीं; अहम्‌--मैं; तु--दूसरी ओर; सख्य:--हे मित्रो; भजत:--पूजा करते हुए; अपि-- भी; जन्तून्‌ू--जीवों से; भजामि--आदान-प्रदान करता हूँ; अमीषाम्‌--उनकी; अनुवृत्ति--लालसा ( शुद्ध प्रेम के लिए ); वृत्तये--प्रेरित करने के लिए; यथा--जिस तरह; अधन: --निर्धन व्यक्ति; लब्ध--प्राप्त करके; धने--सम्पत्ति; विनष्ट--तथा नष्ट होने पर; तत्‌--उसका; चिन्तया--उत्सुक विचार से; अन्यत्‌--अन्य कोई वस्तु; निभृत:--पूरित; न वेद--नहीं जानता।

किन्तु हे गोपियो, मैं उन जीवों के प्रति भी तत्क्षण स्नेह प्रदर्शित नहीं कर पाता जो मेरी पूजाकरते हैं।

इसका कारण यह है कि मैं उनकी प्रेमाभक्ति को प्रगाढ़ करना चाहता हूँ।

इससे वे ऐसेनिर्धन व्यक्ति के सदश बन जाते हैं जिसने पहले कुछ सम्पत्ति प्राप्त की थी किन्तु बाद में उसे खोदिया है।

इस तरह उसके बारे में वह इतना चिन्तित हो जाता है कि और कुछ सोच ही नहीं पाता।

एवं मदर्थोज्झितलोकवेद-स्वानां हि वो मय्यनुवृत्तयेडबला: ।

मयापरोक्ष॑ भजता तिरोहितंमासूयितु मार्हथ तत्प्रियं प्रिया: ॥

२१॥

एवम्‌--इस प्रकार; मत्‌--मेरे; अर्थ--हेतु; उज्झित--त्यागकर; लोक--सांसारिक मत; वेद--वेदों का मत; स्वानामू--तथासम्बन्धियों को; हि--निस्सन्देह; व: --तुम्हारा; मयि--मेरे लिए; अनुवृत्तये--प्रेमाधिक्य के लिए; अबला:--हे बालाओ;मया--मेरे द्वारा; अपरोक्षम्‌--तुम्हारी दृष्टि से ओझल; भजता--वास्तव में प्रेम करने वाला; तिरोहितम्‌--अन्‍्तर्धान; मा--मेरेसाथ; असूयितुम्‌-शत्रुता होने से; म अर्हथ--नहीं चाहिए; तत्‌--अत:ः; प्रियम्‌--अपने प्रियतम के साथ; प्रिया: --हे प्रियाओ

हे बालाओ, यह जानते हुए कि तुम सबों ने मेरे ही लिए लोकमत, वेदमत तथा अपनेसम्बन्धियों के अधिकार को त्याग दिया है मैंने जो किया वह अपने प्रति तुम लोगों की आसक्तिको बढ़ाने के लिए ही किया है।

तुम लोगों की दृष्टि से सहसा अपने को ओझल बनाकर भी मैंतुम लोगों से प्रेम करना रोक नहीं पाया।

अतः प्रिय गोपियो, तुम अपने प्रेमी अर्थात्‌ मेरे प्रतिदुर्भावनाओं को स्थान न दो।

न पारयेहं निरवद्यसंयुजांस्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि व: ।

या माभजन्दुर्जरगेहश्रृद्डला:संवृश्च्य तद्ठः प्रतियातु साधुना ॥

२२॥

न--नहीं; पारये--बना पाने में समर्थ; अहम्‌--मैं; निरवद्य-संयुजाम्‌--छल से पूर्णतया मुक्त होने वालों के प्रति; स्व-साधु-कृत्यम्‌--उचित हर्जाना; विबुध-आयुषा--देवताओं के बराबर आयु में; अपि--यद्यपि; वः--तुमको; या: -- जो; मा--मुझको;अभजनू-पूजा कर चुके हैं; दुर्जर--जीत पाना कठिन; गेह- श्रूडुला: --गृहस्थ जीवन की बेड़ी; संवृश्च्य--काट कर; ततू--वह; वः--तुमको; प्रतियातु--लौटाया जाय; साधुना--शुभ कर्म द्वारा

मैं आपलोगों की निस्पृह सेवा के ऋण को ब्रह्म के जीवनकाल की अवधि में भी चुकानहीं पाऊँगा।

मेरे साथ तुमलोगों का सम्बन्ध कलंक से परे है।

तुमने उन समस्त गृह-बन्धनों कोतोड़ते हुए मेरी पूजा की है जिन्हें तोड़ पाना कठिन होता है।

अतएव तुम्हारे अपने यशस्वी कार्यही इसकी क्षतिपूर्ति कर सकते हैं।

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