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अध्याय तीन: भगवान कृष्ण का जन्म

10.3श्रीशुक उबाचअथ सर्वगुणोपेत: काल: परमशोभन: ।

यहाँवाजनजन्म्श्ल॑ शान्तक्षग्रहतारकम्‌ ॥

१॥

दिशः प्रसेदुर्गगनं निर्मलोडुगणोदयम्‌ ।

मही मड्नलभूयिष्ठपुरग्रामत्रजाकरा ॥

२॥

नद्यः प्रसन्ननलिला हृदा जलरुहश्रियः ।

द्विजालिकुलसन्नादस्तवका वनराजयः ॥

३॥

ववौ वायु: सुखस्पर्श: पुण्यगन्धवह: शुचि: ।

अग्नयश्च द्विजातीनां शान्तास्तत्र समिन्धत ॥

४॥

मनांस्यासन्प्रसन्नानि साधूनामसुरद्रुहाम्‌ ।

जायमानेजने तस्मिन्नेदुर्दुन्दुभयः समम्‌ ॥

५॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; अथ-- भगवान्‌ के आविर्भाव के समय; सर्व--चारों ओर; गुण-उपेतः --भौतिक गुणों से सम्पन्न; काल:--उपयुक्त समय; परम-शोभन:ः--अत्यन्त शुभ तथा सभी दृष्टियों से उपयुक्त; यहिं--- जब; एव--निश्चित रूप से; अजन जन्म-ऋक्षम्‌--रोहिणी नक्षत्र समूह; शान्त-ऋक्ष--सारे नक्षत्र शान्त थे; ग्रह-तारकम्‌--तथा ग्रह एवं तारे(यथा अश्विनी ); दिश:--सारी दिशाएँ; प्रसेदु:--अत्यन्त शुभ तथा शान्त प्रतीत हुईं; गगनमू--आकाश; निर्मल-उडु-गण-उदयम्‌--जिसमें सारे शुभ नक्षत्र दृष्टिगोचर थे; मही--पृथ्वी; मड्ल-भूयिष्ठ-पुर-ग्राम-त्रज-आकरा:--जिसके अनेक नगर,ग्राम, गोचर भूमि तथा खानें शुभ तथा निर्मल हो गईं; नद्यः--नदियाँ; प्रसन्न-सलिला:--जल स्वच्छ हो गया; हृदाः--झीलें याजलाशय; जलरुह-भ्रिय: --चारों ओर कमलों के खिलने से अत्यन्त सुन्दर लगने लगा; द्विज-अलि-कुल-सन्नाद-स्तवका: --पक्षियों ( विशेषतया कोयल ) तथा मधुमक्खियों का समूह मधुर ध्वनि में कीर्तन करने लगा, मानो भगवान्‌ की स्तुति कर रहे हों;वन-राजय: --हरे वृक्ष भी देखने में मनोहर लग रहे थे; बवौ--बहने लगी; वायु:--वायु, मन्द हवा; सुख-स्पर्श:--छूने मेंसुहावनी; पुण्य-गन्ध-वहः --सुगन्ध से पूरित; शुच्चिः-- धूल से रहित; अग्नयः च--तथा यज्ञस्थलों की अग्नियाँ; ट्विजातीनाम्‌--ब्राह्मणों की; शान्ता:--शान्त; तत्र--वहाँ; समिन्धत--जलती हुईं; मनांसि--ब्राह्मणों के मन ( जो कंस से भयभीत थे );आसनू--हो गए; प्रसन्नानि--पूर्ण तुष्ट तथा उत्पात से रहित; साधूनाम्‌--ब्राह्मणों के, जो सबके सब वैष्णव भक्त थे; असुर-द्हामू--जो धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न करते समय कंस तथा अन्य असुरों द्वारा सताए गए थे; जायमाने--जन्म होने से; अजने--अजन्मे, भगवान्‌ विष्णु के; तस्मिनू--उस स्थान में; नेदु:--बज उठीं; दुन्दुभयः--दुन्दुभियाँ; समम्‌--एकसाथ ( ऊपरी लोकोंसे)

तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ के आविर्भाव की शुभ बेला में सारा ब्रह्माण्ड सतोगुण, सौन्दर्य तथाशान्ति से युक्त हो गया।

रोहिणी नक्षत्र तथा अश्विनी जैसे तारे निकल आए सूर्य, चन्द्रमा तथाअन्य नक्षत्र एवं ग्रह अत्यन्त शान्त थे।

सारी दिशाएँ अत्यन्त सुहावनी लगने लगीं और मनभावननक्षत्र निःभ्र आकाश में टिमटिमाने लगे।

नगरों, ग्रामों, खानों तथा चरागाहों से अलंकृत पृथ्वीसर्व-मंगलमय प्रतीत होने लगी।

निर्मल जल से युक्त नदियाँ प्रवाहित होने लगीं और सरोवर तथाविशाल जलाशय कमलों तथा कुमुदिनियों से पूर्ण होकर अत्यधिक सुन्दर लगने लगे।

फूलों-पत्तियों से पूर्ण एवं देखने में सुहावने लगने वाले वृक्षों और हरे पौधों में कोयलों जैसे पक्षी तथाभौरों के झुण्ड देवताओं के लिए मधुर ध्वनि में गुंजार करने लगे।

निर्मल मन्द वायु बहने लगीजिसका स्पर्श सुखद था और जो फूलों की गन्ध से युक्त थी।

जब कर्मकाण्ड में लगे ब्राह्मणों नेवैदिक नियमानुसार अग्नि प्रज्वलित की तो अग्नि इस वायु से अविचलित रहती हुई स्थिर भावसे जलने लगी।

इस तरह जब अजन्मा भगवान्‌ विष्णु प्रकट होने को हुए तो कंस जैसे असुरोंतथा उसके अनुचरों द्वारा सताए गए साधुजनों तथा ब्राह्मणों को अपने हृदयों के भीतर शान्तिप्रतीत होने लगी और उसी समय स्वर्ग में दुन्दुभियाँ बज उठीं।

जगु: किन्नरगन्धर्वास्तुष्ठ॒वु: सिद्धचारणा: ।

विद्याधर्यश् ननृतुरप्सरोभि: सम॑ मुदा ॥

६॥

जगु:--शुभ गीत गाए; किन्नर-गन्धर्वा:--विभिन्न लोकों के निवासी किन्नर तथा गन्धर्व; तुष्ठवु:--स्तुतियाँ कीं; सिद्ध-चारणा:--स्वर्ग के अन्य निवासी सिद्ध तथा चारणों ने; विद्याधर्य: च--और विद्याधरियाँ, स्वर्गलोक के अन्य निवासी;ननृतु:--आनन्दपूर्वक नृत्य किया; अप्सरोभि:--अप्सराओं के, स्वर्ग की सुन्दर नर्तिकाएँ; समम्‌--साथ; मुदा--प्रमुदित होकर |

किन्नर तथा गन्धर्व शुभ गीत गाने लगे, सिद्धों तथा चारणों ने शुभ प्रार्थनाएँ कीं तथा अप्सराओं के साथ विद्याधरियाँ प्रसन्नता से नाचने लगीं।

मुमुचुर्मुनयो देवा: सुमनांसि मुदान्विता: ।

मन्दं मन्दं जलधरा जगर्जुरनुसागरम्‌ ।

निशीथे तमउद्धूते जायमाने जनार्दने ॥

७॥

देवक्यां देवरूपिण्यां विष्णु: सर्वगुहदाशय: ।

आविरासीद्यथा प्राच्यां दिशीन्दुरिव पुष्कल: ॥

८॥

मुमुचु;--बरसाया; मुनयः--मुनियों ने; देवा:--तथा देवताओं ने; सुमनांसि--सुन्दर तथा सुगन्धित फूल; मुदा अन्बिता: --प्रसन्नचित्त होकर; मन्दम्‌ मन्दम्‌--धीरे-धीरे; जल-धरा:--बादल; जगर्जु;:--गरजने लगे; अनुसागरम्‌--समुद्र की लहरों कीध्वनि के साथ; निशीथे--अर्धरात्रि में; तम:-उद्धूते--घना अंधकार होने पर; जायमाने--प्रकट होने पर; जनार्दने-- भगवान्‌विष्णु के; देवक्याम्‌-देवकी के गर्भ में; देव-रूपिण्याम्‌-- भगवान्‌ के रूप में ( आनन्दचिन्मय रस प्रतिभाविताभि: );विष्णु:-- भगवान्‌ विष्णु; सर्व-गुहा-शय:--हर एक के हृदय में स्थित; आविरासीत्‌ू--प्रकट हुए; यथा--जिस प्रकार; प्राच्याम्‌दिशि--पूर्व दिशा में; इन्दु: इब--पूर्ण चन्द्रमा के समान; पुष्कल:--सब प्रकार से पूर्ण

देवताओं तथा महान्‌ साधु पुरुषों ने प्रसन्न होकर फूलों की वर्षा की और आकाश में बादलउमड़ आए तथा मन्द स्वर से गर्जन करने लगे मानो समुद्र की लहरों की ध्वनि हो।

तब हर हृदयमें स्थित पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ विष्णु रात्रि के गहन अंधकार में देवकी के हृदय से उसी तरहप्रकट हुए जिस तरह पूर्वी क्षितिज में पूर्ण चन्द्रमा उदय हुआ हो क्योंकि देवकी श्रीकृष्ण की हीकोटि की थीं।

तमद्भुतं बालकमम्बुजेक्षणंचतुर्भुजं शब्बुगदाद्युदायुधम्‌ ।

श्रीवत्सलक्ष्मं गलशोभिकौस्तुभंपीताम्बरं सान्द्रययोदसौभगम्‌ ॥

९॥

महाईवैदूर्यकिरीटकुण्डलत्विषा परिष्वक्तसहस्त्रकुन्तलम्‌ ।

उद्दामकाज्च्यड्रदकड्डणादिभिर्‌विरोचमानं वसुदेव ऐक्षत ॥

१०॥

तम्‌--उस; अद्भुतम्‌ू-- अद्भुत; बालकम्‌ू--बालक को; अम्बुज-ईक्षणम्‌--कमल जैसी आँखों वाले; चतु:-भुजम्‌--चारभुजाओं वाले; शट्भ-गदा-आदि--चार हाथों में शंख, चक्र, गदा तथा कमल लिए हुए; उदायुधम्‌--विभिन्न आयुध; श्रीवत्स-लक्ष्मम्‌-- श्रीवत्स से अलंकृत, बालों का विशेष प्रकार श्रीवत्स कहलाता है और यह भगवान्‌ के वक्षस्थल पर ही उगता है; गल-शोभि-कौस्तुभम्‌--उनके गले में वैकुण्ठ-लोक में प्राप्त होने वाला कौस्तुभ मणि था; पीत-अम्बरम्‌--पीला वस्त्र; सान्द्र-'पयोद-सौभगम्‌--अत्यन्त सुन्दर तथा श्यामल रंग का; महा-अर्ह-बैदूर्य-किरीट-कुण्डल--उनका मुकुट तथा उनके कुण्डल मूल्यवान बैदूर्य मणि से जड़े थे; त्विषा--सौन्दर्य द्वारा; परिष्वक्त-सहस्त्र-कुन्तलम्‌--बिखरे बड़े-बड़े बालों के द्वारा चमचमाता;उद्दाम-काञ्जी-अड्भद-कड्ढूण-आदिभि:--कमर में चमकीली पेटी, भुजाओं में बलय, कलाइयों में कंकण इत्यादि से युक्त;विरोचमानम्‌--अत्यन्त सुन्दर ढंग से अलंकृत; वसुदेव: --कृष्ण के पिता वसुदेव ने; ऐक्षत--देखा |

तब वसुदेव ने उस नवजात शिशु को देखा जिनकी अद्भुत आँखें कमल जैसी थीं और जोअपने चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा तथा पद्य चार आयुध धारण किये थे।

उनके वक्षस्थल परश्रीवत्स का चिह्न था और उनके गले में चमकीला कौस्तुभ मणि था।

वह पीताम्बर धारण किएथे, उनका शरीर श्याम घने बादल की तरह, उनके बिखरे बाल बड़े-बड़े तथा उनका मुकुट औरकुण्डल असाधारण तौर पर चमकते वैदूर्यमणि के थे।

वे करधनी, बाजूबंद, कंगन तथा अन्यआभूषणों से अलंकृत होने के कारण अत्यन्त अद्भुत लग रहे थे।

स विस्मयोत्फुल्लविलोचनो हरिंसुतं विलोक्यानकदुन्दुभिस्तदा ।

कृष्णावतारोत्सवसम्भ्रमो स्पृशन्‌मुदा द्विजेभ्योड्युतमाप्लुतो गवाम्‌ ॥

११॥

सः--वह ( वसुदेव, जो आनकदुन्दुभि कहलाते हैं ); विस्मय-उत्फुल्ल-विलोचन:-- भगवान्‌ के सुन्दर स्वरूप को देखने सेआश्चर्यचकित आँखें; हरिम्‌ू-- भगवान्‌ हरि को; सुतम्‌--पुत्र रूप में; विलोक्य--देखकर; आनकदुन्दुभि: --वसुदेव द्वारा;तदा--उस समय; कृष्ण-अवतार-उत्सव--कृष्ण के आविर्भाव पर उत्सव मनाने के लिए; सम्भ्रम:--सम्मान के साथ भगवान्‌का स्वागत करने की इच्छा; अस्पृशत्‌--बाँटने का अवसर प्राप्त किया; मुदा--अत्यधिक हर्ष के साथ; द्विजेभ्य:--ब्राह्मणोंको; अयुतम्‌--दस हजार; आप्लुत:--विभोर; गवाम्‌-गाएँ।

जब वसुदेव ने अपने विलक्षण पुत्र को देखा तो उनकी आँखें आश्चर्य से विस्फारित रह गईं।

उन्होंने परम हर्ष में मन ही मन दस हजार गाएँ एकत्र कीं और उन्हें ब्राह्मणों में वितरित कर दिया मानो कोई दिव्य उत्सव हो।

अथेनमस्तौदवधार्य पूरुषंपर नताडु: कृतधी: कृताझलि: ।

स्वरोचिषा भारत सूतिकागहंविरोचयन्तं गतभी: प्रभाववित्‌ ॥

१२॥

अथ-तत्पश्चात्‌: एनम्‌--बालक को; अस्तौत्‌--स्तुति अर्पित किया; अवधार्य--यह निश्चय करके कि बालक भगवान्‌ था;पूरुषम्‌--परम पुरुष को; परम्‌--परम दिव्य; नत-अड्ड:--गिरकर; कृत-धी: --एकाग्र होकर; कृत-अज्जलि:--हाथ जोड़कर;स्व-रोचिषा-- अपने शारीरिक सौन्दर्य के तेज से; भारत--हे महाराज परीक्षित; सूतिका-गृहम्‌--वह स्थान, जहाँ भगवान्‌ काजन्म हुआ; विरोचयन्तम्‌--चारों ओर से प्रकाशित करते हुए; गत-भी:--भय से रहित होकर; प्रभाव-वित्‌--( भगवान्‌ के )प्रभाव को जान सका।

हे भरतवंशी, महाराज परीक्षित, वसुदेव यह जान गए कि यह बालक पूर्ण पुरुषोत्तमभगवान्‌ नारायण है।

इस निष्कर्ष पर पहुँचते ही वे निर्भव हो गए।

हाथ जोड़े, मस्तक नवाये तथा एकाग्रचित्त होकर वे उस बालक की स्तुति करने लगे जो अपने सहज प्रभाव के द्वारा अपनेजन्म-स्थान को जगमग कर रहा था।

श्रीवसुदेव उवाचविदितोसि भवान्साक्षात्पुरुष: प्रकृते: पर: ।

केवलानुभवानन्दस्वरूप: सर्वबुद्धिहक्‌ ॥

१३॥

श्री-वसुदेवः उवाच-- श्री वसुदेव ने प्रार्थना की; विदित: असि--अब मैं आपसे अवगत हूँ; भवान्‌--आप; साक्षात्‌- प्रत्यक्ष;पुरुष:--परम पुरूष; प्रकृते:--प्रकृति से; परः--दिव्य, परे; केवल-अनुभव-आनन्द-स्वरूप:--आपका स्वरूप सच्चिदानन्दविग्रह है और जो भी आपका अनुभव करता है, वह आनन्द से पूरित हो जाता है; सर्व-बुद्धि-हक्‌--परम प्रेक्षक, परमात्मा,प्रत्येक की बुद्धि

वसुदेव ने कहा : हे भगवान्‌, आप इस भौतिक जगत से परे परम पुरुष हैं और आपपरमात्मा हैं।

आपके स्वरूप का अनुभव उस दिव्य ज्ञान द्वारा हो सकता है, जिससे आप भगवान्‌के रूप में समझे जा सकते हैं।

अब आपकी स्थिति मेरी समझ में भलीभाँति आ गई है।

स एव स्वप्रकृत्येदं सृष्ठाग्रे त्रिगुणात्मकम्‌ ।

तदनु त्वं ह्प्रविष्ट: प्रविष्ट इव भाव्यसे ॥

१४॥

सः--वह ( भगवान्‌ ); एब--निस्सन्देह; स्व-प्रकृत्या--अपनी ही शक्ति से ( मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम्‌ ); इदम्‌--यह भौतिक जगत; सृष्ठा--सृजन करके; अग्रे--प्रारम्भ में; त्रि-गुण-आत्मकम्‌--प्रकृति के तीन गुणों से बने( सत्त्वरजस्तमोगुण ); तत्‌ अनु--तत्पश्चात्‌; त्वमू--आप; हि--निस्सन्देह; अप्रविष्ट:--प्रवेश न करने पर; प्रविष्ट: इब--ऐसाप्रतीत होता है कि प्रवेश किया है; भाव्यसे--ऐसा समझा जाता है।

हे भगवन्‌, आप वही पुरुष हैं जिसने प्रारम्भ में अपनी बहिरंगा शक्ति से इस भौतिक जगतकी सृष्टि की।

तीन गुणों ( सत्त्व, रजस्‌ तथा तमस्‌ ) वाले इस जगत की सृष्टि के बाद ऐसालगता है कि आपने उसके भीतर प्रवेश किया है यद्यपि यथार्थ तो यह है कि आपने प्रवेश नहींकिया।

यथेमेविकृता भावास्तथा ते विकृतैः सह ।

नानावीर्या: पृथग्भूता विराज॑ जनयन्ति हि ॥

१५॥

सन्निपत्य समुत्पाद्य दृश्यन्तेडनुगता इव ।

प्रागेव विद्यमानत्वान्न तेषामिह सम्भव: ॥

१६॥

एवं भवान्बुद्धयनुमेयलक्षणैर्‌ग्राह्म॑र्गुणै: सन्नपि तदगुणाग्रह: ।

अनावृतत्वाद्वहिरन्तरं न तेसर्वस्य सर्वात्मन आत्मवस्तुन: ॥

१७॥

यथा--जिस तरह; इमे-- भौतिक शक्ति से बनी ये भौतिक सृष्टियाँ; अविकृता:--छिन्न-भिन्न नहीं; भावा:--ऐसी विचारधारा से;तथा--उसी प्रकार; ते--वे; विकृतैः सह--सम्पूर्ण भौतिकशक्ति से उत्पन्न इन विभिन्न तत्त्वों के साथ; नाना-वीर्या:--प्रत्येकतत्त्व विभिन्न शक्तियों से पूर्ण है; पृथक्‌ु--विलग; भूताः:--होकर; विराजम्‌--सम्पूर्ण विश्व को; जनयन्ति--उत्पन्न करते हैं;हि--निस्सन्देह; सन्निपत्य--आध्यात्मिक शक्ति का साथ होने से; समुत्पाद्य--उत्पन्न किए जाने के बाद; दृश्यन्ते--प्रकट होते हैं;अनुगता:--उसके भीतर प्रविष्ट हुए; इब--मानो; प्राकु--शुरू से, इस जगत की सृष्टि के पूर्व से; एब--निस्सन्देह;विद्यमानत्वात्‌-- भगवान्‌ के अस्तित्व के कारण; न--नहीं; तेषामू--इन भौतिक तत्त्वों का; इह--इस जगत में; सम्भव:--प्रवेश करना सम्भव हुआ होता; एवम्‌--इस प्रकार; भवानू--हे प्रभु; बुद्धि-अनुमेय-लक्षणै:--असली बुद्धि से तथा ऐसेलक्षणों से; ग्राह्मै:--इन्द्रिय विषयों से; गुणैः--गुणों से; सन्‌ अपि--यद्यपि सम्पर्क में हैं; तत्‌-गुण-अग्रह:--उन गुणों के द्वारास्पर्श नहीं किए जाते; अनावृतत्वात्‌--सर्वत्र उपस्थित होने से; बहि: अन्तरम्‌--बाहर-भीतर; न ते--ऐसी कोई बात नहीं है;सर्वस्य--हर वस्तु का; सर्व-आत्मन:--सभी वस्तुओं के मूल स्वरूप; आत्म-वस्तुन:--हर वस्तु आपकी है, किन्तु आप हर वस्तुके बाहर तथा भीतर हैं।

सम्पूर्ण भौतिक शक्ति ( महत्‌ तत्त्व) अविभाज्य है, किन्तु भौतिक गुणों के कारण यहपृथ्वी जल, अग्नि, वायु तथा आकाश में विलग होती सी प्रतीत होती है।

ये विलग हुई शक्तियाँजीवभूत के कारण मिलकर विराट जगत को दृश्य बनाती हैं, किन्तु तथ्य तो यह है कि विराटजगत की सृष्टि के पहले से ही महत्‌ तत्त्व विद्यमान रहता है।

अतः महत्‌ तत्त्व का वास्तव में सृष्टिमें प्रवेश नहीं होता है।

इसी तरह यद्यपि आप अपनी उपस्थिति के कारण हमारी इन्द्रियों द्वाराअनुभवगम्य हैं, किन्तु आप न तो हमारी इन्द्रियों द्वारा अनुभवगम्य हो पाते हैं न ही हमारे मन याबचनों द्वारा अनुभव किए जाते हैं ( अवाइयनसागोचर )।

हम अपनी इन्द्रियों से कुछ ही वस्तुएँदेख पाते हैं, सारी वस्तुएँ नहीं।

उदाहरणार्थ, हम अपनी आँखों का प्रयोग देखने के लिए कर सकते हैं, आस्वाद के लिए नहीं।

फलस्वरूप आप इन्द्रियों के परे हैं।

यद्यपि आप प्रकृति केतीनों गुणों से संबद्ध हैं, आप उनसे अप्रभावित रहते हैं।

आप हर वस्तु के मूल कारण हैं,सर्वव्यापी अविभाज्य परमात्मा हैं।

अतएव आपके लिए कुछ भी बाहरी या भीतरी नहीं है।

आपनेकभी भी देवकी के गर्भ में प्रवेश नहीं किया प्रत्युत आप पहले से वहाँ उपस्थित थे।

य आत्मनो दृश्यगुणेषु सन्नितिव्यवस्यते स्वव्यतिरिकतोबुध: ।

विनानुवादं न च तन्मनीषितंसम्यग्यतस्त्यक्तमुपाददत्पुमान्‌ ॥

१८॥

यः--जो भी; आत्मन:--आत्मा का; दृश्य-गुणेषु--शरीर इत्यादि दृश्य पदार्थों में से; सन्‌ू--उस अवस्था को प्राप्त; इति--इसप्रकार; व्यवस्यते--कर्म करता रहता है; स्व-व्यतिरिकतः--मानो शरीर आत्मा से स्वतंत्र है; अबुध:-- धूर्त, मूढ़; विनाअनुवादम्‌--समुचित अध्ययन के बिना; न--नहीं; च--भी; तत्‌--शरीर तथा अन्य दृश्य वस्तुएँ; मनीषितम्‌--विवेचना कियाहुआ; सम्यक्‌--पूरी तरह; यतः--मूर्ख होने के कारण; त्यक्तम्‌--तिरस्कृत कर दिए जाते हैं; उपाददत्‌--इस शरीर कोवास्तविकता मान बैठता है; पुमानू--मनुष्य |

जो व्यक्ति प्रकृति के तीन गुणों से बने अपने हृश्य शरीर को आत्मा से स्वतंत्र मानता है, वहअस्तित्व के आधार से ही अनजान होता है और इसलिए वह मूढ़ है।

जो विद्वान हैं, वे इस निर्णयको नहीं मानते क्‍योंकि विवेचना द्वारा यह समझा जा सकता है कि आत्मा से निराभ्जित दृश्य शरीर तथा इन्द्रियाँ सारहीन हैं।

यद्यपि इस निर्णय को अस्वीकार कर दिया गया है, किन्तु मूर्खव्यक्ति इसे सत्य मानता है।

त्वत्तोस्य जन्मस्थितिसंयमान्विभोवदन्त्यनीहादगुणादविक्रियात्‌ ।

त्वयीश्वरे ब्रह्मणि नो विरुध्यते त्वदाश्रयत्वादुपचर्यते गुण: ॥

१९॥

त्वत्त:--आपसे; अस्य--सम्पूर्ण जगत की; जन्म--सृष्टि; स्थिति--पालन; संयमान्‌--तथा संहार; विभो--हे प्रभु; वदन्ति--विद्वान वैदिक पंडित कहते हैं; अनीहात्‌--प्रयत्न से मुक्त; अगुणात्‌--प्रकृति के गुणों से अप्रभावित; अविक्रियात्‌--आपकीदिव्य स्थिति में स्थिर रहने वाले; त्वयि--आप में; ईश्वर-- भगवान्‌ में; ब्रह्म णि--परब्रह्म में; नो--नहीं; विरुध्यते--विरोध होताहै; त्वत्‌-आश्रयत्वात्‌--आपके द्वारा नियंत्रित होने से; उपचर्यते--अपने आप चलती हैं; गुणैः--गुणों के कार्यशील होने से |

हे प्रभु, विद्वान वैदिक पंडित कहते हैं कि सम्पूर्ण विश्व का सृजन, पालन एवं संहार आपकेद्वारा होता है तथा आप प्रयास से मुक्त, प्रकृति के गुणों से अप्रभावित तथा अपनी दिव्य स्थितिमें अपरिवर्तित रहते हैं।

आप परब्रह्म हैं और आप में कोई विरोध नहीं है।

प्रकृति के तीनों गुण--सतो, रजो तथा तमोगुण आपके नियंत्रण में हैं अतः सारी घटनाएँ स्वतः घटित होती हैं।

स त्वं त्रिलोकस्थितये स्वमायया बिभर्षि शुक्ल खलु वर्णमात्मन: ।

सर्गाय रक्त रजसोपबुंहितंकृष्णं च वर्ण तमसा जनात्यये ॥

२०॥

सः त्वमू--आप, जो वही व्यक्ति अर्थात्‌ ब्रह्म हैं; त्रि-लोक-स्थितये--तीनों लोकों उच्च, मध्य तथा अधः लोकों का पालन करनेके लिए; स्व-मायया--अपनी निजी शक्ति से ( आत्ममायया ); बिभर्षि-- धारण करते हैं; शुक्लम्‌--सतोगुणी विष्णु के श्वेतरूप में; खलु-- भी; वर्णम्‌--रंग; आत्मन:--आपकी ही कोटि का ( विष्णुतत्त्व ); सर्गाय--सम्पूर्ण जगत की सृष्टि के लिए;रक्तम्‌-रजोगुण के रंग का लाल; रजसा--रजोगुण से युक्त; उपबृंहितम्‌--आविष्ट; कृष्णम्‌ च--तथा अंधकार का गुण;वर्णम्‌ू--रंग; तमसा--अज्ञान से आवृत; जन-अत्यये--सम्पूर्ण सृष्टि के विनाश हेतु

हे भगवन्‌, आपका स्वरूप तीनों भौतिक गुणों से परे है फिर भी तीनों लोकों के पालन हेतुआप सतोगुणी विष्णु का श्वेत रंग धारण करते हैं, सृजन के समय जो रजोगुण से आवृत होता हैआप लाल प्रतीत होते हैं और अन्त में अज्ञान से आवृत संहार के समय आप श्याम प्रतीत होते हैं।

त्वमस्य लोकस्य विभो रिरक्षिषु-गृहिउवतीर्णो इसि ममाखिले श्वर ।

राजन्यसंज्ञासुरकोटियूथपै-निर्व्यूह्यामाना निहनिष्यसे चमू: ॥

२१॥

त्वमू--आप; अस्य--इस जगत के; लोकस्य--विशेषतया इस मर्त्यलोक के; विभो--हे परमे श्वर; रिरक्षिषु;--( असुरों के उत्पातसे ) सुरक्षा के इच्छुक; गृहे--इस घर में; अवतीर्ण: असि--अब प्रकट हुए हो; मम--मेरे; अखिल-ई श्रर-- यद्यपि आप सम्पूर्णसृष्टि के स्वामी हैं; राजन्य-संज्ञ-असुर-कोटि-यूथ-पै:--राजनीतिज्ञों तथा राजाओं के रूप में लाखों असुरों तथा उनकेअनुयायियों समेत; निर्व्यूह्माना:--सारे संसार में विचरण कर रहे; निहनिष्यसे--मारेगा; चमू:--सेना, साज-सामान, सैनिक |

हे परमेश्वर, हे समस्त सृष्टि के स्वामी, आप इस जगत की रक्षा करने की इच्छा से मेरे घर मेंप्रकट हुए हैं।

मुझे विश्वास है कि आप क्षत्रियों का बाना धारण करने वाले राजनीतिज्ञों केनायकत्व में जो असुरों की सेनाएँ संसार भर में विचरण कर रही हैं उनका वध करेंगे।

निर्दोषजनता की सुरक्षा के लिए आपके द्वारा इनका वध होना ही चाहिए।

अयं त्वसभ्यस्तव जन्म नौ गृहेश्रुत्वाग्रजांस्ते न्‍्यवधीत्सुरेश्वर ।

स तेवतारं पुरुषै: समर्पितंश्रुत्वाधुनेवाभिसरत्युदायुध: ॥

२२॥

अयम्‌--इस ( धूर्त ) ने; तु--लेकिन; असभ्य:--तनिक भी सभ्य नहीं ( असुर का अर्थ ही होता है असभ्य और सुर का सभ्य );तब--आपका; जन्म--जन्म; नौ--हमारे; गृहे--घर में; श्रुत्वा--सुनकर; अग्रजान्‌ ते--आपसे पहले उत्पन्न हुए भाइयों को;न्यवधीत्‌--मार डाला; सुर-ईश्वर--हे सभ्य पुरुषों अर्थात्‌ देवताओं के ईश्वर; सः--वह ( असभ्य कंस ); ते--तुम्हारे, आपके;अवतारमू--प्राकट्य को; पुरुषै:--अपने सेनापतियों द्वारा; समर्पितम्‌-- सूचना दिया हुआ; श्रुत्वा--सुनकर; अधुना--अब;एव--निस्सन्देह; अभिसरति--तुरन्‍्त आएगा; उदायुध: --हथियार उठाए हुए।

हे परमेश्वर, हे देवताओं के स्वामी, यह भविष्यवाणी सुनकर कि आप हमारे घर में जन्म लेंगेऔर उसका वध करेंगे, इस असभ्य कंस ने आपके कई अग्रजों को मार डाला है।

वह ज्योंही अपने सेनानायकों से सुनेगा कि आप प्रकट हुए हैं, वह आपको मारने के लिए हथियार समेततुरन्त ही आ धमकेगा।

श्रीशुक उबाचअथेनमात्मजं वीक्ष्य महापुरुषलक्षणम्‌ ।

देवकी तमुपाधावत्कंसाद्धीता सुविस्मिता ॥

२३॥

श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; अथ--वसुदेव द्वारा प्रार्थना करने के बाद; एनम्‌--इस कृष्ण को;आत्मजम्‌--अपने पुत्र; वीक्ष्य--देखकर; महा-पुरुष-लक्षणम्‌--भगवान्‌ विष्णु के समस्त लक्षणों से युक्त; देवकी--कृष्ण कीमाता; तम्‌--उन ( कृष्ण ) की; उपाधावत्‌--प्रार्थना की; कंसात्‌ू--कंस से; भीता-- भयभीत; सु-विस्मिता--ऐसा अद्भुतबालक देखकर आश्चर्यचकित |

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : तत्पश्चात्‌ यह देखकर कि उनके पुत्र में भगवान्‌ के सारे लक्षणहैं, कंस से अत्यधिक भयभीत तथा असामान्य रूप से विस्मित देवकी भगवान्‌ से प्रार्थना करनेलगीं।

श्रीदेवक्युवाचरूप॑ यत्तत्प्राहुरव्यक्तमाद्यब्रह्म ज्योतिर्निर्गुणं निर्विकारम्‌ ।

सत्तामात्र॑ निर्विशेषं निरीहंसत्वं साक्षाद्विष्णुरध्यात्मदीप: ॥

२४॥

श्री-देवकी उवाच-- श्री देवकी ने कहा; रूपम्‌--स्वरूप; यत्‌ तत्‌--क्योंकि आप वही रूप हैं; प्राहु:--कहलाते हैं;अव्यक्तम्‌--अव्यक्त, भौतिक इन्द्रियों द्वारा अनुभूत न होने वाले ( अत: श्रीकृष्णनामादि न भवेद्‌ ग्राह्ममिन्द्रिय )।

आद्यमू--आदिकारण; ब्रह्म--ब्रह्म; ज्योति: -- प्रकाश; निर्गुणम्‌--भौतिक गुणों से रहित; निर्विकारम्‌--बिना परिवर्तन के विष्णु का शाश्वतस्वरूप; सत्ता-मात्रमू--आदि तत्त्व, सबका कारण; निर्विशेषम्‌-परमात्मा के रूप में सर्वत्र विद्यमान; निरीहम्‌--इच्छारहित;सः--वह परम पुरुष; त्वमू--आपको; साक्षात्‌-- प्रत्यक्ष ; विष्णु: -- भगवान्‌ विष्णु; अध्यात्म-दीप:--समस्त दिव्य ज्ञान के लिएदीपक ( आपको जान लेने पर सब कुछ जाना जा सकता है)

श्रीदेवकी ने कहा : हे भगवन, वेद अनेक हैं।

उसमें से कुछ आपको शब्दों तथा मन द्वाराअव्यक्त बतलाते हैं फिर भी आप सम्पूर्ण विश्व के उद्गम हैं।

आप ब्रह्म हैं, सभी वस्तुओं से बड़ेऔर सूर्य के समान तेज से युक्त।

आपका कोई भौतिक कारण नहीं, आप परिवर्तन तथाविचलन से मुक्त हैं और आपकी कोई भौतिक इच्छाएँ नहीं हैं।

इस तरह वेदों का कथन है किआप ही सार हैं।

अतः हे प्रभु, आप समस्त वैदिक कथनों के उद्गम हैं और आपको समझ लेनेपर मनुष्य हर वस्तु धीरे धीरे समझ जाता है।

आप ब्रह्मज्योति तथा परमात्मा से भिन्न हैं फिर भीआप उनसे भिन्न नहीं हैं।

आपसे ही सब वस्तुएँ उद्भूत हैं।

दरअसल आप ही समस्त कारणों केकारण हैं, आप समस्त दिव्य ज्ञान की ज्योति भगवान्‌ विष्णु हैं।

नष्टे लोके द्विपरार्धावसानेमहाभूतेष्वादिभूतं गतेषु ।

व्यक्तेव्यक्त कालवेगेन यातेभवानेकः शिष्यतेडशेषसंज्ञ: ॥

२५॥

नष्टे--संहार के बाद; लोके--विश्व के; द्वि-परार्ध-अवसाने--लाखों वर्षों के बाद ( ब्रह्म की आयु ); महा-भूतेषु--पाँचप्रारम्भिक तत्त्वों ( क्षिति, जल, पावक, गगन तथा समीर ) में; आदि-भूतम्‌ गतेषु--इन्द्रिय-बोध के सूक्ष्म तत्त्वों के भीतर प्रवेशकरते हैं; व्यक्ते-- प्रकट होने पर; अव्यक्तम्‌--अव्यक्त में; काल-वेगेन--काल के वेग से; याते-- प्रवेश करता है; भवान्‌--आप; एक:ः--केवल एक; शिष्यते--रहता है; अशेष-संज्ञ:--विभिन्न नामों से युक्त वही एक

लाखों वर्षो बाद विश्व-संहार के समय जब सारी व्यक्त तथा अव्यक्त वस्तुएँ काल के वेग सेनष्ट हो जाती हैं, तो पाँचों स्थूल तत्त्व सूक्ष्म स्वरूप ग्रहण करते हैं और व्यक्त वस्तुएँ अव्यक्त बनजाती हैं।

उस समय आप ही रहते हैं और आप अनन्त शेष-नाग कहलाते हैं।

योयं कालस्तस्य तेडव्यक्तबन्धोचेष्टामाहुश्रेष्ठते येन विश्वम्‌ ।

निमेषादिर्व त्सरान्तो महीयां-स्तं त्वेशानं क्षेमधाम प्रपह्मे ॥

२६॥

यः--जो; अयम्‌--यह; काल: --काल ( मिनट, घंटा, सेकंड ); तस्थ--उसका; ते--तुम्हारा; अव्यक्त-बन्धो--हे प्रभु! आपअव्यक्त के प्रारम्भकर्ता हैं ( महत्‌ तत्त्व या प्रकृति ); चेष्टामू--प्रयास या लीलाएँ; आहुः--कहा जाता है; चेष्टते--कार्य करता है;येन--जिससे; विश्वम्‌--सम्पूर्ण सृष्टि; निमिष-आदि:--काल के सूक्ष्म अंश आदि; वत्सर-अन्तः--वर्ष के अन्त तक; महीयान्‌ --शक्तिशाली; तमू--आपको; त्वा ईशानम्‌ू--परम नियंत्रक आपको; क्षेम-धाम--समस्त शुभ के आगार; प्रपद्ये--मैं पूरी तरहआपकी शरणागत में हूँ।

हे भौतिक शक्ति के प्रारम्भकर्ता, यह अद्भुत सृष्टि शक्तिशाली काल के नियंत्रण में कार्यकरती है, जो सेकंड, मिनट, घंटा तथा वर्षो में विभाजित है।

यह काल तत्त्व, जो लाखों वर्षोतक फैला हुआ है, भगवान्‌ विष्णु का ही अन्य रूप है।

आप अपनी लीलाओं के लिए काल केनियंत्रक की भूमिका अदा करते हैं, किन्तु आप समस्त सौभाग्य के आगार हैं।

मैं पूरी तरहआपकी शरणागत हूँ।

मर्त्यों मृत्युव्यालभीत: पलायन्‌लोकास्सरवान्निर्भयं नाध्यगच्छत्‌ ।

त्वत्पादाब्जं प्राप्प यहच्छयाद्यसुस्थः शेते मृत्युरस्मादपैति ॥

२७॥

मर्त्य:--जीव, जिनकी मृत्यु निश्चित है; मृत्यु-व्याल-भीत:--मृत्यु रूपी सर्प से भयभीत; पलायन्‌--भागते हुए; लोकान्‌ू--विभिन्न लोकों को; सर्वानू--सभी; निर्भयम्‌--निर्भीकता; न अध्यगच्छत्‌-प्राप्त नहीं करता; त्वत्‌ू-पाद-अब्जम्‌--आपकेचरणकमलों की; प्राप्प--शरण पाकर; यहच्छया--सौभाग्यवश, भगवान्‌ तथा गुरु की कृपा से ( गुरुकृपा, कृष्णकृपा );अद्य--इस समय; सु-स्थ:--अविचलित तथा शान्त; शेते--सो रहे हैं; मृत्यु:--मृत्यु; अस्मात्‌--उन लोगों से; अपैति--दूरभागता है।

इस भौतिक जगत में कोई भी व्यक्ति जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा तथा रोग--इन चार नियमों से छूटनहीं पाया भले ही वह विविध लोकों में क्यों न भाग जाए।

किन्तु हे प्रभु, अब चूँकि आप प्रकटहो चुके हैं अतः मृत्यु आपके भय से दूर भाग रही है और सारे जीव आपकी दया से आपकेचरणकमलों की शरण प्राप्त करके पूर्ण मानसिक शान्ति की नींद सो रहे हैं।

स त्वं घोरादुग्रसेनात्मजान्न-स्त्राहि त्रस्तान्भृत्यवित्रासहासि ।

रूपं चेदं पौरुषं ध्यानधिष्ण्यंमा प्रत्यक्ष मांसहरशां कृषीछ्ठा: ॥

२८॥

सः--वह; त्वमू--आप; घोरात्‌-- अत्यन्त क्रूर; उग्रसेन-आत्मजातू---उग्रसेन के पुत्र से; न:--हमारी; त्राहि--रक्षा कीजिए;त्रस्तानू--अत्यधिक भयभीत; भृत्य-वित्रास-हा असि--आप अपने दासों के भय को दूर करने वाले हैं; रूपम्‌--अपने विष्णुरूप में; च-- भी; इृदमू--इस; पौरुषम्‌--भगवान्‌ रूप को; ध्यान-धिष्ण्यम्‌-- ध्यान के द्वारा अनुभव किया गया; मा--नहीं;प्रत्यक्षम्‌-प्रत्यक्ष; मांस-दइशाम्‌ू--अपनी भौतिक आँखों से देखने वालों को; कृषीष्ठाः--होइए

हे प्रभु, आप अपने भक्तों के भय को दूर करने वाले हैं अतएव आपसे मेरी प्रार्थना है किआप कंस के विकराल भय से हमें बचाइए और हमें संरक्षण प्रदान कीजिए।

योगीजन आपकेविष्णु रूप का ध्यान में अनुभव करते हैं।

कृपया इस रूप को उनके लिए अदृश्य बना दीजिएजो केवल भौतिक आँखों से देख सकते हैं।

जन्म ते मय्यसौ पापो मा विद्यान्मधुसूदन ।

समुद्विजे भवद्धेतो: कंसादहमधीरधी: ॥

२९॥

जन्म--जन्म; ते--तुम्हारा, भगवान्‌ का; मयि--मेरे ( गर्भ ) में; असौ--वह कंस; पाप:--पापी; मा विद्यातू--हो सकता है किसमझ न पाए; मधुसूदन--हे मधुसूदन; समुद्विजे--चिन्ता से पूर्ण मैं; भवत्‌-हेतो:--आपके प्रकट होने से; कंसात्‌ू--कंस से,जिसका मुझे कटु अनुभव है; अहम्‌--मैं; अधीर-धी:--अधिकाधिक उद्दिग्न हूँ।

हे मधुसूदन, आपके प्रकट होने से मैं कंस के भय से अधिकाधिक अधीर हो रही हूँ।

अतःकुछ ऐसा कीजिए कि वह पापी कंस यह न समझ पाए कि आपने मेरे गर्भ से जन्म लिया है।

उपसंहर विश्वात्मन्नदो रूपमलौकिकम्‌ ।

शद्भुचक्रगदापदाश्रिया जुष्टे चतुर्भुजम्‌ ॥

३०॥

उपसंहर--वापस ले लीजिए; विश्वात्मनू--हे विश्वव्यापी भगवान्‌; अद:--उस; रूपम्‌ू-- स्वरूप को; अलौकिकम्‌--इस जगत मेंअप्राकृतिक; शद्भु-चक्र-गदा-पढ्य--शंख, चक्र, गदा तथा कमल से युक्त; अ्रिया--इन ऐश्वर्यों से युक्त; जुष्टमू-- अलंकृत;चतु:-भुजम्‌--चार हाथों वाले

हे प्रभु, आप सर्वव्यापी भगवान्‌ हैं और आपका यह चतुर्भुज रूप, जिसमें आप शंख, चक्र,गदा तथा पद्म धारण किए हुए हैं, इस जगत के लिए अप्राकृत है।

कृपया इस रूप को समेट लीजिए ( और सामान्य मानवी बालक बन जाइए जिससे मैं आपको कहीं छिपाने का प्रयास करसकूँ )।

विश्व यदेतत्स्वतनौ निशान्तेयथावकाशं पुरुष: परो भवान्‌ ।

बिभर्ति सोयं मम गर्भगो भू-दहो नृुलोकस्य विडम्बनं हि तत्‌ ॥

३१॥

विश्वम्‌--सम्पूर्ण विश्व को; यत्‌ एतत्‌--चर तथा अचर सृष्टियों से युक्त; स्व-तनौ--अपने शरीर के भीतर; निशा-अन्ते--संहारके समय; यथा-अवकाशमू्‌--बिना कठिनाई के आपके शरीर में शरण; पुरुष: -- भगवान्‌; पर: --दिव्य; भवान्‌--आप;बिभर्ति--पालन करते हैं; सः--वही ( भगवान्‌ ); अयम्‌ू--वह रूप; मम--मेरा; गर्भ-ग:--मेरे गर्भ में आया; अभूत्‌--हुआ;अहो--ओह; नृ-लोकस्य--जीवों के इस जगत का; विडम्बनमू--सोच पाना कठिन है; हि--निस्सन्देह; तत्‌--वह ( गर्भ )।

संहार के समय चर तथा अचर जीवों से युक्त सारी सृष्टियाँ आपके दिव्य शरीर में प्रवेश करजाती हैं और बिना कठिनाई के वहीं ठहरी रहती हैं।

किन्तु अब वही दिव्य रूप मेरे गर्भ से जन्मले चुका है।

लोग इस पर विश्वास नहीं करेंगे और मैं हँसी की पात्र बन जाऊँगी।

श्रीभगवानुवाचत्वमेव पूर्वसर्गे भू: पृश्टिन: स्वायम्भुवे सति ।

तदायं सुतपा नाम प्रजापतिरकल्मष: ॥

३२॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने देवकी से कहा; त्वमू-तुम; एव--निस्सन्देह; पूर्व-सर्गे--पूर्व युग में; अभू: -- थीं; पृश्नि: --पृश्टिन नामक; स्वायम्भुवे--स्वायम्भुव मनु के युग में; सति--हे सती; तदा--उस समय; अयम्‌--यह वसुदेव; सुतपा--सुतपा;नाम--नामक; प्रजापति:--प्रजापति; अकल्मष: --निर्मल व्यक्ति

श्रीभगवान्‌ ने उत्तर दिया: हे सती माता, आप अपने पूर्व जन्म में स्वायंभुव मनु कल्प मेंपृश्िन नाम से विख्यात थीं और वसुदेव सुतपा नामक अत्यन्त पवित्र प्रजापति थे।

युवां बै ब्रह्मणादिष्टौ प्रजासगें यदा ततः ।

सन्नियम्येन्द्रियग्रामं तेपाथे परमं तपः ॥

३३॥

युवाम्‌--तुम दोनों ( पृश्नि तथा सुतपा ); बै--निस्सन्देह; ब्रह्मणा आदिष्टौ--ब्रह्मा ( जो पितामह या प्रजापतियों के पिता कहलातेहैं ) की आज्ञा से; प्रजा-सर्गे--सन्तान उत्पन्न करने में; यदा--जब; ततः--तत्पश्चात्‌; सन्नियम्य--पूर्ण नियंत्रण में रखते हुए;इन्द्रिय-ग्रामम्‌--इन्द्रियों को; तेपाथे--की; परमम्‌--महान; तपः--तपस्या

जब भगवान्‌ ब्रह्मा ने तुम दोनों को सन्तान उत्पन्न करने का आदेश दिया तो तुम दोनों नेपहले अपनी इन्द्रियों को वश में रखते हुए कठोर तपस्या की।

वर्षवातातपहिमघर्मकालगुणाननु ।

सहमानौ श्वासरोधविनिर्धूतमनोमलौ ॥

३४॥

शीर्णपर्णानिलाहारावुपशान्तेन चेतसा ।

मत्त: कामानभीप्सन्तौ मदाराधनमीहतु: ॥

३५॥

वर्ष--वर्षा; वात--तेज हवा; आतप--तेज धूप; हिम--कड़ाके की ठंड; घर्म--घाम; काल-गुणान्‌ अनु--ऋतु परिवर्तनों केअनुसार; सहमानौ--सहन करके; श्रास-रोध--साँस रोककर, योगाभ्यास द्वारा; विनिर्धूत-- मन में जमी मैल धुल जाती है; मनः-मलौ--मन भौतिक कल्मष से मुक्त होकर शुद्ध बन गया; शीर्ण--शुष्क, त्यक्त; पर्ण--पेड़ों के पत्ते; अनिल--तथा वायु;आहारौ--खाकर; उपशान्तेन--शान्त; चेतसा-- पूर्ण संयमित मन से; मत्त:--मुझसे; कामान्‌ अभीप्सन्तौ--कुछ वर माँगने कीइच्छा से; मत्‌--मेरी; आराधनम्‌--पूजा; ईहतुः--तुम दोनों ने सम्पन्न की |

हे माता-पिता, तुम लोगों ने विभिन्न ऋतुओं के अनुसार वर्षा, तूफान, कड़ी धूप तथाकड़ाके की ठंड सभी प्रकार की असुविधाएँ सही थीं।

तुमने शरीर के भीतर वायु रोकने के लिएप्राणायाम करके तथा केवल हवा और वृक्षों से गिरे सूखे पत्ते खाकर अपने मन से सारे मैल कोसाफ कर दिया था।

इस तरह मेरे वर की इच्छा से तुम लोगों ने शान्त चित्त से मेरी पूजा की थी।

एवं वां तप्यतोस्तीब्रं तप: परमदुष्करम्‌ ।

दिव्यवर्षसहस्त्राणि द्वादशेयुर्मदात्मनो: ॥

३६॥

एवम्‌--इस तरह से; वाम्‌--तुम दोनों को; तप्यतो:--तपस्या करते; तीव्रमू--अत्यन्त कठोर; तप:ः--तपस्या; परम-दुष्करम्‌--सम्पन्न करना कठिन; दिव्य-वर्ष--स्वर्गलोक के अनुसार काल गणना; सहस्त्राणि--हजार; द्वादश--बारह; ईयु:--बीत गए;मत्‌-आत्मनो: --मेरी चेतना में लगे रहकर।

इस तरह तुम दोनों ने मेरी चेतना ( कृष्णभावना ) में कठिन तपस्या करते हुए बारह हजारदिव्य वर्ष बिता दिए।

तदा वां परितुष्टो हममुना वपुषानघे ।

तपसा श्रद्धया नित्यं भक्त्या च हदि भावितः ॥

३७॥

प्रादुरासं वरदराड्युवयो: कामदित्सया ।

ब्रियतां वर इत्युक्ते माइशो वां वृतः सुतः ॥

३८॥

तदा--तब ( बारह हजार दिव्य वर्ष बीत जाने पर ); वाम्‌-तुम दोनों के साथ; परितुष्ट: अहम्‌--मैं संतुष्ट हुआ; अमुना--इससे;वपुषा--कृष्ण के रूप में; अनघे--हे निष्पाप माता; तपसा--तपस्या के द्वारा; श्रद्धया-- श्रद्धापूर्वक; नित्यम्‌--निरन्तर ( लगेरहकर ); भक्त्या--भक्ति के द्वारा; च--भी; हृदि--हृदय के भीतर; भावित:--स्थिर ( संकल्प ); प्रादुरासम्‌--तुम्हारे समक्ष( उसी तरह ) प्रकट हुआ; वर-द-राट्‌-- श्रेष्ठ वरदायक; युवयो: --तुम दोनों का; काम-दित्सया--इच्छा पूरी करने के लिए;ब्रियतामू-तुमसे मन की बात कहने के लिए पूछा; वर:--वरदान के लिए; इति उक्ते--इस तरह अनुरोध किए जाने वाले;माहशः--मेरी ही तरह; वाम्‌--तुम दोनों का; वृतः--पूछा गया था; सुतः--तुम्हारे पुत्र रूप में ( तुमने मेरे जैसा पुत्र चाहा था )।

हे निष्पाप माता देवकी, उन बारह हजार दिव्य वर्षो के बीत जाने पर, जिनमें तुम अपने हृदयमें परम श्रद्धा, भक्ति तथा तपस्यापूर्वक निरन्तर मेरा ध्यान करती रही, मैं तुम से अत्यन्त प्रसन्न हुआ था।

चूँकि मैं वर देने वालों में सर्वश्रेष्ठ हूँ, अत: मैं इसी कृष्ण रूप में प्रकट हुआ कि तुममनवाउिछत वर माँगो।

तब तुमने मेरे सह पुत्र-प्राप्ति की इच्छा प्रकट की थी।

अजुष्टग्राम्यविषयावनपत्यौ च दम्पती ।

न वक्राथेपवर्ग मे मोहितौ देवमायया ॥

३९॥

अजुष्ट-ग्राम्प-विषयौ--विषयी जीवन तथा मुझ जैसा बालक उत्पन्न करने के लिए; अनपत्यौ--सन्तानविहीन होने के कारण;च--भी; दम्‌-पती--पति-पली दोनों; न--कभी नहीं; वब्राथे--माँगा ( कोई वर ); अपवर्गम्‌--इस जगत से मोक्ष; मे--मुझसे;मोहितौ--अत्यधिक आकर्षित होकर; देव-मायया--मेरे लिए दिव्य प्रेम के कारण ( मुझे अपने पुत्र रूप में चाहकर )

पति-पत्नी रूप में सन्तानहीन होने से आप लोग विषयी-जीवन के प्रति आकृष्ट हुए क्योंकिदेवमाया के प्रभाव अर्थात्‌ दिव्य प्रेम से तुम लोग मुझे अपने पुत्र के रूप में प्राप्त करना चाह रहेथे इसलिए तुम लोगों ने इस जगत से कभी भी मुक्त होना नहीं चाहा।

गते मयि युवां लब्ध्वा वरं मत्सहृ॒शं सुतम्‌ ।

ग्राम्यान्भोगानभुख्ाथां युवां प्राप्तमनोरथौ ॥

४०॥

गते मयि--मेरे चले जाने पर; युवाम्‌--तुम दोनों को ( दम्पतियों को ); लब्ध्वा--पाकर; वरम्‌--वरदान ( पुत्र प्राप्ति का ); मत्‌ू-सहशम्‌--मेरी ही तरह के; सुतम्‌--पुत्र को; ग्राम्यान्‌ भोगान्‌ू-- भोग-विलास में व्यस्त रहना; अभुज्जाथाम्‌-- भोग किया;युवाम्‌--तुम दोनों को; प्राप्त--प्राप्त करके; मनोरथौ--अभिलाषाएँ।

जब तुम वर प्राप्त कर चुके और मैं अन्तर्धान हो गया तो तुम मुझ जैसा पुत्र प्राप्त करने केउद्देश्य से विषयभोग में लग गए और मैंने तुम्हारी इच्छा पूरी कर दी।

अह्ृष्ठान्यतमं लोके शीलौदार्यगुणै: समम्‌ ।

अहं सुतो वामभवं पृश्निगर्भ इति श्रुतः ॥

४१॥

अद्ृष्टा--न पाकर; अन्यतमम्‌--किसी अन्य को; लोके--इस जगत में; शील-औदार्य-गुणैः--शील तथा उदारता के गुणों सेयुक्त; समम्‌--तुम्हारे तुल्य; अहम्‌--मैं; सुत:--पुत्र; वामू--तुम दोनों का; अभवम्‌--बना; पृश्नि-गर्भ:--पृश्टिन से उत्पन्न हुआ;इति--इस प्रकार; श्रुतः:--प्रसिद्ध हुआ |

चूँकि मुझे सरलता तथा शील के दूसरे गुणों में तुम जैसा बढ़ा-चढ़ा अन्य कोई व्यक्ति नहींमिला अतः मैं पृश्नि-गर्भ के रूप में उत्पन्न हुआ।

तयोर्वा पुनरेवाहमदित्यामास कश्यपात्‌ ।

उपेन्द्र इति विख्यातो वामनत्वाच्च वामन: ॥

४२॥

तयो:--तुम पति-पत्नी दोनों का; वाम्‌--दोनों में; पुन: एब--फिर से ही; अहम्‌--मैं; अदित्याम्‌-- अदिति के गर्भ में; आस--प्रकट हुआ; कश्यपात्‌--कश्यपमुनि के वीर्य से; उपेन्द्र:--उपेन्द्र नाम से; इति--इस प्रकार; विख्यात:--सुप्रसिद्ध; वामनत्वात्‌च--तथा बौना बनने से; वामन:--वामन नाम से विख्यात |

मैं अगले युग में तुम दोनों से, माता अदिति तथा पिता कश्यप से पुनः प्रकट हुआ।

मैं उपेन्द्रनाम से विख्यात हुआ और बौना होने के कारण मैं वामन भी कहलाया।

तृतीयेउस्मिन्भवेहं वै तेनेव वपुषाथ वाम्‌ ।

जातो भूयस्तयोरेव सत्यं मे व्याहतं सति ॥

४३॥

तृतीये--तीसरी बार; अस्मिन्‌ भवे--इस रूप में ( कृष्ण रूप के ); अहम्‌--मैं; वै--निस्सन्देह; तेन--उसी व्यक्ति से; एब--इसतरह; वपुषा--रूप द्वारा; अथ--जिस तरह; वाम्‌--तुम दोनों के; जात: --उत्पन्न; भूय:--फिर से; तयो:--तुम दोनों का;एव--निस्सन्देह; सत्यम्‌--सत्य मानकर; मे--मेरे; व्याहतम्‌--शब्द; सति--हे सती |

हे परम सती माता, मैं वही व्यक्ति अब तीसरी बार तुम दोनों के पुत्र रूप में प्रकट हुआ हूँ।

मेरे वचनों को सत्य मानें।

एतद्ठां दर्शितं रूप॑ प्राग्जन्मस्मरणाय मे ।

नान्यथा मद्धवं ज्ञानं मर्त्यलिड्रेन जायते ॥

४४॥

एतत्‌--विष्णु का यह रूप; वाम्‌ू--तुम दोनों को; दर्शितम्‌--दिखलाया गया; रूपमू--चतुर्भुज भगवान्‌ के रूप में मेरा स्वरूप;प्राकू-जन्म--पूर्व जन्मों का; स्मरणाय--तुमको स्मरण दिलाने के लिए; मे--मेरा; न--नहीं; अन्यथा--अन्यथा; मत्‌-भवम्‌--विष्णु का प्राकट्य; ज्ञामम्‌ू--यह दिव्य ज्ञान; मर्त्य-लिड्रेन--मानवी शिशु की तरह जन्म लेकर; जायते--उत्पन्न होता है।

मैंने तुम लोगों को यह विष्णु-रूप मात्र अपने पूर्वजन्मों का स्मरण कराने के लिएदिखलाया है।

अन्यथा यदि मैं सामान्य बालक की तरह प्रकट होता तो तुम लोगों को विश्वास नहो पाता कि भगवान्‌ विष्णु सचमुच प्रकट हुए हैं।

युवां मां पुत्रभावेन ब्रह्मभावेन चासकृत्‌ ।

चिन्तयन्तौ कृतस्नेहौ यास्येथे मद्गतिं पराम्‌ ॥

४५॥

युवाम्‌--तुम दोनों ( पति-पत्नी ); माम्‌--मुझको; पुत्र-भावेन--अपने पुत्र रूप में; ब्रह्म-भावेन--मुझे भगवान्‌ के रूप में जानतेहुए; च--तथा; असकृत्‌--निरन्तर; चिन्तयन्तौ--इस तरह सोचते हुए; कृत-स्नेहौ --प्रेम का बर्ताव करते हुए; यास्येथे--दोनोंको प्राप्त होगा; मत्‌ू-गतिम्‌--मेरा परम धाम; पराम्‌-दिव्य |

तुम पति-पत्ली निरन्तर अपने पुत्र के रूप में मेरा चिन्तन करते हो, किन्तु तुम यह जानते रहतेहो कि मैं भगवान्‌ हूँ।

इस तरह निरन्तर स्नेहपूर्वक मेरा चिन्तन करते हुए तुम लोग सर्वोच्च सिद्धिप्राप्त करोगे अर्थात्‌ भगवद्धाम वापस जाओगे।

श्रीशुक उबाचइत्युक्त्वासीद्धरिस्तृष्णीं भगवानात्ममायया ।

पित्रो: सम्पश्यतो: सद्यो बभूव प्राकृत: शिशु; ॥

४६॥

श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति उक्त्वा--इस तरह उपदेश देकर; आसीत्‌--रहे; हरि: -- भगवान्‌;तृष्णीमू--मौन; भगवान्‌-- भगवान्‌ विष्णु; आत्म-मायया--अपनी आध्यात्मिक शक्ति से कार्य करते हुए; पित्रो: सम्पश्यतो: --यथार्थ रूप में माता-पिता द्वारा देखे जाकर; सद्यः--तुरन्त; बभूव--हो गये; प्राकृत:--सामान्य व्यक्ति की तरह; शिशु:--बालक।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : अपने माता-पिता को इस तरह उपदेश देने के बाद भगवान्‌कृष्ण मौन रहे।

तब उन्हीं के सामने अपनी अंतरंगा शक्ति से उन्होंने अपने आप को एक छोटेशिशु के रूप में बदल लिया।

( दूसरे शब्दों में, उन्होंने स्वयं को अपने आदि रूप में रूपान्तरित कर दिया-- कृष्णस्तु भगवान्‌ स्वयम्‌ )।

ततश्च शौरिभ्भगवत्प्रचोदित:सुतं समादाय स सूतिकागृहात्‌ ।

यदा बहिर्गन्तुमियेष तहांजाया योगमायाजनि नन्दजायया ॥

४७॥

ततः--तत्पश्चात्‌; च--निस्सन्देह; शौरि: --वसुदेव; भगवत्-प्रचोदित:-- भगवान्‌ से आज्ञा पाकर; सुतम्‌--अपने पुत्र को;समादाय--सावधानी से ले जाकर; सः--उसने; सूतिका-गृहात्‌-- प्रसूतिगृह से, सौरी से; यदा--जब; बहिः गन्तुमू--बाहर जानेके लिए; इयेष--चाहा; तहि---तब, उस समय; अजा--न जन्म लेने वाली दिव्य शक्ति; या--जो; योगमाया--योगमाया ने;अजनि--जन्म लिया; नन्द-जायया--नन्द महाराज की पत्नी से।

तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ की प्रेरणा से जब वसुदेव नवजात शिशु को सूतिकागृह से ले जाने वालेथे तो बिलकुल उसी क्षण भगवान्‌ की आध्यात्मिक शक्ति योगमाया ने महाराज नन्द की पत्नीकी पुत्री के रूप में जन्म लिया।

तया हतप्रत्ययसर्ववृत्तिषुद्वा:स्थेषु पौरेष्वपि शायितेष्वथ ।

द्वारश्न सर्वा: पिहिता दुरत्ययाबृहत्कपाटायसकीलश्रुद्ुलै: ॥

४८ ॥

ताः कृष्णवाहे वसुदेव आगतेस्वयं व्यवर्यन्त यथा तमो रवे: ।

वर्ष पर्जन्य उपांशुगर्जितःशेषो<न्वगाद्वारि निवारयन्फणैः ॥

४९॥

तया--योगमाया के प्रभाव से; हत-प्रत्यय--सारी अनुभूति से रहित; सर्व-वृत्तिषु--अपनी समस्त इन्द्रियों सहित; द्वा:-स्थेषु --सारे द्वारपाल; पौरेषु अपि--तथा घर के सारे लोग भी; शायितेषु--गहरी नींद में मगन; अथ--जब वसुदेव ने अपने पुत्र कोबन्दीगृह से बाहर ले जाने का प्रयास किया; द्वार: च--तथा दरवाजे भी; सर्वा:--सारे; पिहिता:--निर्मित; दुरत्यया--अत्यन्तकठोर तथा हृढ़; बृहत्‌-कपाट--तथा बड़े दरवाजे पर; आयस-कौल- श्रूडुलैः--लोहे के काँटों से बने तथा लोहे की जंजीरों सेबन्द किए गए; ता:--वे सब; कृष्ण-वाहे--कृष्ण को लिए हुए; वसुदेवे--जब वसुदेव; आगते-- प्रकट हुए; स्वयम्‌--स्वयं;व्यवर्यन्त--खुल गए; यथा--जिस तरह; तम:--अँधेरा; रवे: --सूर्य के उदय होने पर; ववर्ष--पानी बरसे हुए; पर्जन्य:--आकाश में बादल; उपांशु-गर्जित:--मन्द गर्जना करते और रिमझिम बरसते; शेष: -- अनन्त नाग; अन्वगात्‌--पीछे-पीछे चला;वारि--वर्षा की झड़ी; निवारयन्‌--रोकते हुए; फणैः --अपने फनों को फैलाकर।

योगमाया के प्रभाव से सारे द्वारपाल गहरी नींद में सो गए, उनकी इन्द्रियाँ निष्क्रिय हो गईंऔर घर के अन्य लोग भी गहरी नींद में सो गए।

जिस प्रकार सूर्य के उदय होने पर अंधकारस्वतः छिप जाता है उसी तरह वसुदेव के प्रकट होने पर लोहे की कीलों से जड़े तथा भीतर सेलोहे की जंजीरों से जकड़े हुए बंद दरवाजे स्वतः खुल गए।

चूँकि आकाश में बादल मन्द गर्जनाकर रहे थे और झड़ी लगाए हुए थे अतः भगवान्‌ के अंश अनन्त नाग दरवाजे से ही वसुदेव तथादिव्य शिशु की रक्षा करने के लिए अपने फण फैलाकर वसुदेव के पीछे लग लिए।

मधघोनि वर्षत्यसकृद्यमानुजागम्भीरतोयौघजवोर्मिफेनिला ।

भयानकावर्तशताकुला नदीमार्ग ददौ सिन्धुरिव थ्िय: पते: ॥

५०॥

मधघोनि वर्षति--इन्द्र की वर्षा के कारण; असकृत्‌--निरन्तर; यम-अनुजा--यमुना नदी, जिसे यमराज की बहन माना जाता है;गम्भीर-तोय-ओघ--गहरे जल के; जब--वेग से; ऊर्मि-- लहरों से; फेनिला--फेन से पूर्ण; भयानक--भयानक; आवर्त-शत--भँवरों से; आकुला--श्षुब्ध; नदी--नदी ने; मार्गम्‌--रास्ता; ददौ--दे दिया; सिन्धु: इब--समुद्र के समान; थ्रियः पतेः--देवी सीता के पति भगवान्‌ रामचन्द्र को।

इन्द्र द्वारा बरसायी गयी निरन्तर वर्षा के कारण यमुना नदी में पानी चढ़ आया था और उसमेंभयानक भंँवरों के साथ फेन उठ रहा था।

किन्तु जिस तरह पूर्वकाल में हिन्द महासागर नेभगवान्‌ रामचन्द्र को सेतु बनाने की अनुमति देकर रास्ता प्रदान किया था उसी तरह यमुना नदीने वसुदेव को रास्ता देकर उन्हें नदी पार करने दी।

नन्दब्रजं शौरिरुपेत्य तत्र तान्‌गोपान्प्रसुप्तानुपलभ्य निद्रया ।

सुतं यशोदाशयने निधाय त-त्सुतामुपादाय पुनर्गृहानगात्‌ ॥

५१॥

नन्द-ब्रजम्‌--नन्द महाराज के गाँव या घर तक; शौरि:--वसुदेव; उपेत्य--पहुँचकर; तत्र--वहाँ; तान्‌--सारे लोगों को;गोपान्‌--सारे ग्वालों को; प्रसुप्तानू--सोया हुआ; उपलभ्य--जानकर; निद्रया--गहरी निद्रा में; सुतम्‌--पुत्र को ( वसुदेव केपुत्र को ); यशोदा-शयने--उस बिस्तर पर जिसमें यशोदा सो रही थीं; निधाय--रखकर; तत्‌-सुताम्‌--उसकी पुत्री को;उपादाय--लेकर; पुनः--फिर; गृहान्‌ू--अपने घर को; अगात्‌--लौट आया।

जब वसुदेव नन्‍्द महाराज के घर पहुँचे तो देखा कि सारे ग्वाले गहरी नींद में सोए हुए थे।

उन्होंने अपने पुत्र को यशोदा के पलँग में रख दिया, उसकी पुत्री को, जो योगमाया की अंश थी,उठाया और अपने घर कंस के बंदीगृह वापस लौट आए।

देवक्या: शयने न्यस्य वसुदेवोथ दारिकाम्‌ ।

प्रतिमुच्य पदोरलोहमास्ते पूर्ववदावृतः ॥

५२॥

देवक्या: --देवकी के; शयने--विस्तर पर; न्यस्य--रखकर; वसुदेव: --वसुदेव ने; अथ--इस प्रकार; दारिकाम्‌--लड़की को;प्रतिमुच्य--पुन: पहन कर; पदो: लोहम्‌--पाँवों की बेड़ियाँ; आस्ते--हो गया; पूर्ब-बत्‌--पहले की तरह; आवृतः--बँधाहुआ।

वसुदेव ने लड़की को देवकी के पलँग पर रख दिया और अपने पाँवों में बेड़ियाँ पहन लींतथा पहले की तरह बन गए।

यशोदा नन्दपत्नी च जात॑ परमबुध्यत ।

न तल्लिड़ूं परिश्रान्ता निद्रयापगतस्मृति: ॥

५३॥

यशोदा--यशोदा, गोकुल में कृष्ण की माता; नन्द-पत्नी--नन्द महाराज की पत्नी; च--भी; जातम्‌--उत्पन्न शिशु; परमू--परमपुरुष को; अबुध्यत--समझ गई; न--नहीं; तत्‌-लिड्रमू--कि बालक नर है या मादा; परिश्रान्ता--अत्यधिक प्रसव पीड़ा केकारण; निद्रया--नींद के वशीभूत; अपगत-स्मृतिः--चेतना खोकर।

शिशु जनने की पीड़ा से थककर यशोदा नींद के वशीभूत हो गई और यह नहीं समझ पाईकि उन्हें लड़का हुआ है या लड़की।

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