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अध्याय इक्कीसवाँ: गोपियाँ कृष्ण की बाँसुरी के गीत की महिमा करती हैं

10.21श्रीशुक उवाचइत्थं शरत्स्वच्छजलं पद्माकरसुगन्धिना ।

न्यविशद्वायुनावातं स गोगोपालकोच्युतः ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इत्थम्‌--इस प्रकार से; शरत्‌--शरद ऋतु का; स्वच्छ--साफ; जलम्‌--जलयुक्त; पढा-आकर--कमलपुष्पों से लदे सरोवर से; सु-गन्धिना--मीठी गंध से; न्‍्यविशत्‌-- प्रवेश किया; वायुना--वायुद्वारा; वातमू--चलायमान्‌; स--सहित; गो--गौवें; गोपालक:--तथा ग्वालबाल; अच्युतः--अच्युत भगवान्‌ ने।

श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस तरह वृन्दावन का जंगल स्वच्छ शारदीय जलाशयों सेपूरित था और स्वच्छ जलाशयों में खिले कमल पुष्पों की सुगंधवाली वायु से शीतल था।

अपनीगौवों तथा ग्वालसखाओं समेत अच्युत भगवान्‌ ने उस जंगल में प्रवेश किया।

कुसुमितवनराजिशुष्मिभू ड्र-द्विजकुलघुष्टसर:सरिन्महीश्वम्‌ ।

मधुपतिरवगाहा चारयन्गाः:सहपशुपालबलश्चुकूज वेणुम्‌ ॥

२॥

कुसुमित--पुष्पित; बन-राजि--वृक्षों के समूहों में; शुष्पि--उन्मत्त; भूड़--भौरे; द्विज--पक्षी; कुल--तथा समूह; घुष्ट--गुंजारकरते; सर:--जलाशय; सरित्‌--नदियाँ; महीश्रम्‌--तथा पर्वत; मधु-पति:--मधु के स्वामी ( कृष्ण ); अवगाह्म-- प्रवेश करके;चारयन्‌--चराते हुए; गा:ः--गौवें; सह-पशु-पाल-बल:--्वालबालों तथा बलराम के संग; चुकूज--बजाया; वेणुम्‌--अपनीबंशी को |

वृन्दावन के सरोवर, नदियाँ तथा पर्वत पुष्पित वृक्षों पर मँडराते उन्मत्त भौंरों तथा पक्षियों केसमूहों से गुंजरित हो रहे थे।

मधुपति ( श्रीकृष्ण ) ने ग्वालबालों तथा बलराम के संग उस जंगलमें प्रवेश किया और गौवें चराते हुए वे अपनी वंशी बजाने लगे।

तद्ब्जस्त्रिय आश्रुत्य वेणुगीतं स्मरोदयम्‌ ।

काश्रित्परोक्ष॑ं कृष्णस्य स्वसखी भ्योउन्ववर्णयन्‌ ॥

३॥

तत्‌--उस; ब्रज-स्त्रियः--ग्वालों के गाँव की स्त्रियाँ; आश्रुत्य--सुनकर; वेणु-गीतम्‌--वंशी का गीत; स्मर-उदयम्‌--कामदेवको उत्पन्न करनेवाला; काश्चित्‌--उनमें से कोई; परोक्षम्‌--एकान्त में; कृष्णस्य--कृष्ण के; स्व-सखीभ्य:-- अपनी सखियों से;अन्ववर्णयन्‌--वर्णन किया।

जब ब्रजग्राम की तरुण स्त्रियों ने कृष्ण की वंशी का गीत सुना, जो काम उत्पन्न करनेवालाथा, तो उनमें से कुछ स्त्रियाँ अपनी सखियों से एकान्त में कृष्ण के गुणों का बखान करने लगीं।

तद्वर्णयितुमारब्धा: स्मरन्त्य: कृष्णचेष्टितम्‌ ।

नाशकन्स्मरवेगेन विक्षिप्तमनसो नृप ॥

४॥

तत्‌--उस; वर्णयितुम्‌--वर्णन करने के लिए; आरब्धा:--प्रारम्भ करके; स्मरन्त्य:--स्मरण करती; कृष्ण-चेष्टितम्‌--कृष्ण कीचेष्टाओं का; न अशकन्‌--असमर्थ थीं; स्मर-वेगेन--काम के वेग से; विक्षिप्त--विचलित; मनस:--मन वाली; नृप--हे राजापरीक्षित |

गोपियाँ कृष्ण के विषय में बातें करने लगीं किन्तु जब उन्होंने कृष्ण के कार्यकलापों कास्मरण किया तो हे राजनू, काम ने उनके मनों को विचलित कर दिया जिससे वे कुछ भी न कहपाईं।

बह्हापी्ड नटवरवपु: कर्णयो: कर्णिकारंबिभ्रद्वास: कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्‌ ।

रन्ध्रान्वेणोरधरसुधयापूरयन्गोपवृन्दैर्‌वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद्गीतकीर्ति: ॥

५॥

बईह--मोरपंख; आपीडम्‌--उनके सिर के अलंकरण स्वरूप; नट-वर--नर्तकों में श्रेष्ठ; वपु;--दिव्य शरीर; कर्णयो: --कानोंमें; कर्णिकारमू--कमल जैसा नीला फूल; बिभ्रत्‌--पहने हुए; वास:--वस्त्र; कनक--सोने जैसा; कपिशम्‌--पीलाभ;वैजयन्तीम्‌--वैजयन्ती नामक; च--तथा; मालाम्‌--माला, हार; रन्श्रान्‌ू--छेद; वेणो:--वंशी के; अधर--होंठों पर; सुधया--अमृत से; आपूरयन्‌--भरते हुए; गोप-वृन्दैः--ग्वालबालों द्वारा; वृन्दा-अरण्यम्‌-- वृन्दावन की; स्व-पद--अपने चरणकमल केचिह्नों से; रमणम्‌--मुग्ध करनेवाले, रमणीय; प्राविशत्‌-- प्रवेश किया; गीत--गाया जाता हुआ; कीर्ति:--उनका यश

अपने सिर पर मोरपंख का आभूषण, अपने कानों में नीले कर्णिकार फूल, स्वर्ण जैसाचमचमाता पीला वस्त्र तथा वैजयन्ती माला धारण किये भगवान्‌ कृष्ण ने सर्वश्रेष्ठ नर्तक कादिव्य रूप प्रदर्शित करते हुए वृन्दावन के वन में प्रवेश करके अपने पदचिन्हों से इसे रमणीकबना दिया।

उन्होंने अपने होंठों के अमृत से अपनी वंशी के छेदों को भर दिया और ग्वालबालों नेउनके यश का गान किया।

इति वेणुरवं राजन्सर्वभूतमनोहरम्‌ ।

श्रुत्वा ब्रजस्त्रिय: सर्वा वर्णयन्त्योडभिरेभिरे ॥

६॥

इति--इस प्रकार; वेणु-रवम्‌--वंशी की ध्वनि; राजन्‌--हे राजा परीक्षित; सर्व-भूत--सारे जीवों के; मन:ः-हरम्‌--मनों कोहरनेवाला; श्रुत्वा--सुनकर; ब्रज-स्त्रिय:--ब्रज ग्राम में खड़ी स्त्रियों ने; सर्वा:--सभी; वर्णयन्त्य:--बखान करने में व्यस्त;अभिरेभिरे--एक-दूसरे का आलिंगन किया।

हे राजन, जब ब्रज की युवतियों ने सभी प्राणियों के मन को मोह लेने वाली कृष्ण की वंशीकी ध्वनि सुनी तो वे एक-दूसरे का आलिंगन कर-करके उसका बखान करने लगीं।

श्रीगोप्य ऊचुःअक्षण्वतां फलमिदं न पर विदाम:सख्य: पशूननुविवेशयतोर्वयस्यै: ।

वक्त्र ब्रजेशसुतयोरनवेणुजुष्टयैर्वा निपीतमनुरक्तकटाक्षमोक्षम्‌ ॥

७॥

श्री-गोप्य: ऊचु:--गोपियों ने कहा; अक्षण्वताम्‌-- आँखवालों को; फलम्‌--फल; इृदम्‌--यह; न--नहीं; परम्‌-- अन्य;विदाम:--हम जानती हैं; सख्य:--हे सखियो; पशून्‌ू--गौवों को; अनुविवेशयतो: --एक जंगल से दूसरे जंगल में प्रवेशकराकर; वयस्यै:--हमउम्र सखाओं के साथ; वक्त्रमू--मुख; ब्रज-ईश--महाराज नन्द के; सुतयो: --दोनों पुत्रों के; अनु-वेणु-जुष्टम्‌--वंशी से लैस; यैः--जिससे; वा--अथवा; निपीतम्‌--प्रेरित; अनुरक्त--प्रेममय; कट-अक्ष--तिरछी दृष्टि, चितवन;मोक्षम्‌-छोड़ते हुए

गोपियों ने कहा : सखियो, जो आँखें नन्‍्द महाराज के दोनों पुत्रों के सुन्दर मुखमण्डलों कादर्शन करती हैं, वे निश्चय ही भाग्यशाली हैं।

ज्योंही वे दोनों अपने मित्रों से घिरकर तथा गौवोंको अपने आगे आगे करके जंगल में प्रवेश करते हैं, तो वे अपने मुख में अपनी वंशियाँ धारणकरके वृन्दावनवासियों पर प्यार-भरी चितवन से देखते हैं।

जो आँखोंवाले हैं उनके लिए हमारीसमझ में देखने की इससे बड़ी अन्य कोई वस्तु नहीं है।

चूतप्रवालबरईस्तबकोत्पलाब्ज-मालानुपृक्तपरिधानविचित्रवेशौ ।

मध्ये विरिजतुरलं पशुपालगोष्ठयांरड्डे यथा नटवरौ कवच गायमानौ ॥

८॥

चूत--आम का वृक्ष; प्रवाल--कोंपलों से युक्त; बह--मोरपंख; स्तबक--फूल के गुच्छे; उत्पल--कमल; अब्ज--तथाकुमुदिनियाँ; माला--मालाओं से; अनुपृक्त--स्पर्श किया हुआ; परिधान--उनके वस्त्र; विचित्र--तरह तरह के; वेशौ--वेश में;मध्ये--बीच में; विरेजतु:--वे दोनों सुशोभित थे; अलम्‌--शान से; पशु-पाल--ग्वालबालों की; गोष्ठय्याम्‌-गोष्ठी के भीतर;र्के--रंगमंच पर; यथा--जिस तरह; नट-वरौ--दो श्रेष्ठ नतक; क्वच--कभी; गायमानौ--गाते हुए।

तरह तरह के आकर्षक परिधानों के ऊपर अपनी मालाएँ डाले और मोरपंख, कमल,कमलिनी, आम की कोंपलों तथा पुष्पकलियों के गुच्छों से अपने को अलंकृत किये हुए कृष्णतथा बलराम ग्वालबालों की टोली में शोभायमान हो रहे हैं।

वे नाटक-मंच पर प्रकट होनेवालेश्रेष्ठ नर्तकों की तरह दिख रहे हैं और कभी कभी वे गाते भी हैं।

गोप्य: किमाचरदयं कुशल सम वेणु-दामोदराधरसुधामपि गोपिकानाम्‌ ।

भुड़े स्वयं यदवशिष्टरसं हृदिन्योहृष्यत्त्वचो श्रु मुमुचुस्तरवो यथार्य: ॥

९॥

गोप्य:--हे गोपियो; किम्‌--क्या; आचरत्‌--कर डाला; अयम्‌--यह; कुशलम्‌--शुभ कृत्य; स्म--निश्चय ही; वेणु:--बाँसुरी;दामोदर--कृष्ण की; अधर-सुधाम्‌--होंठ का अमृत; अपि-- भी; गोपिकानाम्‌--गोपियों का; भुड्ढे -- भोग करता है;स्वयम्‌--स्वतंत्र रूप से; यत्‌--जिसके लिए; अवशिष्ट--बचा हुआ; रसम्‌ू--केवल स्वाद; हृदिन्य:--नदियाँ; हृष्यत्‌--प्रसन्नहोते हुए; त्वच:--जिनके शरीर; अश्रु--आँसू; मुमुचु:--गिरे; तरव: --वृक्ष; यथा--जिस तरह; आर्या:--बाप-दादे

हे गोपियो, कृष्ण के अधरों का मुक्तरूप अमृतपान करने और हम गोपियों के हेतु जिनकेलिए ही वास्तव में यह अमृत है केवल स्वादमात्र छोड़ने के लिए इस वंशी ने कौन-से शुभ-कृत्यकिये होंगे।

वंशी के बाप-दादे बाँस के वृक्षों ने हर्ष के अश्रु गिराये होंगे।

जिस नदी के तट परयह वृक्ष उत्पन्न हुआ होगा उस मातारूपी नदी ने हर्ष का अनुभव किया होगा; इसीलिए ये खिलेहुए कमल के फूल उसके शरीर के रोमों की भाँति खड़े हुए हैं।

यद्देवकीसुतपदाम्बुजलब्धलक्षिम ।

गोविन्दवेणुमनु मत्तमयूरनृत्यंप्रेक्ष्याद्रिसान्ववरतान्यसमस्तसत्त्वम्‌ ॥

१०॥

वृन्दावनम्‌--वृन्दावन; सखि--हे सखी; भुवः--पृथ्वी पर; वितनोति--फैलाता है; कीर्तिम्‌ू--यश को; यत्‌-- क्योंकि; देवकी-सुत--देवकी-पुत्र के; पद-अम्बुज--चरणकमलों से; लब्ध--प्राप्त; लक्षिम--कोष; गोविन्द-वेणुम्‌--गोविन्द की वंशी;अनु--सुनने पर; मत्त--उम्मत्त; मयूर--मोरों का; नृत्यम्‌--जिसमें नृत्य होता है; प्रेक्ष्य--देखकर; अद्वि-सानु--पर्वतों कीचोटियों पर; अवरत--स्तम्भित; अन्य--दूसरे; समस्त--सभी; सत्त्वम्‌--प्राणी |

है सखी, देवकी पुत्र कृष्ण के चरणकमलों का कोष पाकर वृन्दावन पृथ्वी की कीर्ति कोफैला रहा है।

जब मोर गोविन्द की वंशी सुनते हैं, तो वे मस्त होकर नाचने लगते हैं और जबअन्य प्राणी उन्हें पर्वत की चोटी से इस तरह नाचते देखते हैं, तो वे सभी स्तब्ध रह जाते हैं।

जाह्ज्कःधन्या: सम मूढगतयोपि हरिण्य एताया नन्दनन्दनमुपात्तविचित्रवेशम्‌ ।

आकर्णय्य वेणुरणितं सहकृष्णसारा:पूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोकै: ॥

११॥

धन्या:--धन्य; स्म--निश्चय ही; मूढ-गतय: --अज्ञानी पशु योनि में जन्म लेकर; अपि--यद्यपि; हरिण्य:--हिरणी; एता: --ये;या:--जो; नन्द-नन्दनम्‌--महाराज नन्द के पुत्र को; उपात्त-विचित्र-वेशम्‌--अत्यन्त आकर्षक वस्त्र पहने; आकर्ण्य --सुनकर;वेणु-रणितम्‌--उनकी वंशी की ध्वनि; सह-कृष्ण-सारा:--कृष्ण हिरणों ( अपने पतियों ) के साथ; पूजाम्‌ दधु:--पूजा की;विरचिताम्‌--सम्पन्न किया; प्रणय-अवलोकै: --अपनी प्रेमपूर्ण चितवनों से |

ये मूर्ख हिरनियाँ धन्य हैं क्योंकि ये नन्‍्द महाराज के पुत्र के निकट पहुँच गई हैं, जो खूबसजेधजे हुए हैं और अपनी बाँसुरी बजा रहे हैं।

सचमुच ही हिरनी तथा हिरन दोनों ही प्रेम तथा कृष्णं निरीक्ष्य वनितोत्सवरूपशीलंश्रुत्वा च तत्क्वणितवेणुविविक्तगीतम्‌ ।

देव्यो विमानगतय: स्मरनुन्नसाराभ्रश्यत्प्रसूनकबरा मुमुहुर्विनीव्य; ॥

१२॥

कृष्णम्‌--कृष्ण को; निरीक्ष्य--देखकर; वनिता--स्त्रियों के लिए; उत्सव--उत्सव; रूप--जिसका सौन्दर्य; शीलम्‌--तथाचरित्र; श्रुत्वा--सुनकर; च--तथा; तत्‌--उनसे; क्वणित-- ध्वनित; वेणु--वंशी का; विविक्त--स्पष्ट; गीतम्‌--गीत; देव्य:--देवताओं की पत्नियाँ; विमान-गतयः--अपने विमानों में यात्रा करती; स्मर--कामदेव द्वारा; नुन्न--विचलित; सारा:--जिनकेहृदय; भ्रश्यत्‌--बिछलते हुए; प्रसून-कबरा:--केश में बँधे फूल; मुमुहुः--मोहित हो गईं; विनीव्य:--उनकी पेटियाँ ( नीवीबन्धन ) ढीले पड़ गये |

कृष्ण का सौन्दर्य तथा शील समस्त स्त्रियों के लिए उत्सव स्वरूप है।

देवताओं की पत्नियाँअपने पतियों के साथ विमानों में उड़ते हुए जब उन्हें देखती हैं और उनके गूँजते हुए वेणुगीत कीध्वनि सुनती हैं, तो उनके हृदय कामदेव द्वारा दहला दिये जाते हैं और वे इतनी मोहित हो जाती हैंकि उनके केशों से फूल गिर जाते हैं और उनकी करधनियाँ ( पेटियाँ ) ढीली पड़ जाती हैं।

गावश्च कृष्णमुखनिर्गतवेणुगीत-पीयूषमुत्तभितकर्णपुटै: पिबन्त्य: ।

शावाः स्नुतस्तनपय:कवला: सम तस्थु-गेविन्दमात्मनि हशाश्रुकला: स्पृशन्त्य; ॥

१३॥

गावः--गौवें; च--तथा; कृष्ण-मुख--कृष्ण के मुँह से; निर्गत--निकले; बेणु--वंशी के; गीत--गीत के; पीयूषम्‌-- अमृतको; उत्तभित--ऊँचे उठाये हुए; कर्ण--कानों के; पुटैः--दोनों से; पिबन्त्य:--पीते हुए; शावा:ः--बछड़े; स्नुत--निकलताहुआ; स्तन--स्तनों से; पयः--दूध; कवला:--कौर; स्म--निस्सन्देह; तस्थु:--शान्त खड़ी; गोविन्दम्‌-- भगवान्‌ कृष्ण को;आत्मनि--अपने मनों में; हशा--अपनी दृष्टि से; अश्रु-कला:--आँसुओं की झड़ी; स्पृशन्त्यः:--छूते हुए |

गौवें अपने नलिकारूपी दोनों कानों को उठाये हुए कृष्ण के मुख से निकले वेणुगीत केअपृत का पान कर रही हैं।

बछड़े अपनी माताओं के गीले स्तनों से निकले दूध को मुख में भरे-भरे स्थिर खड़े रहते हैं जब वे अपने अश्रुपूरित नेत्रों से गोविन्द को अपने भीतर ले आते हैं औरअपने हृदयों में उनका आलिंगन करते हैं।

प्रायो बताम्ब विहगा मुनयो वनेस्मिन्‌कृष्णेक्षितं तदुदितं कलवेणुगीतम्‌ ।

आरुह्व ये द्रुमभुजान्नुचिरप्रवालान्‌श्रृण्वन्ति मीलितहशो विगतान्यवाच: ॥

१४॥

प्राय:--लगभग; बत--निश्चय ही; अम्ब--हे माता; विहगा:--पक्षीगण; मुनयः--मुनिगण; बने--जंगल में; अस्मिन्‌--इस;कृष्ण-ईक्षितम्‌-कृष्ण का दर्शन करने के लिए; तत्‌-उदितम्‌--उनके द्वारा उत्पन्न; कल-वेणु-गीतम्‌--वंशीवादन से उत्पन्नमधुर ध्वनि; आरुह्मय --उठकर; ये--जो; द्रुम-भुजान्‌--वृक्षों की शाखाओं को; रुचिर-प्रवालान्‌--सुन्दर लताओं से युक्त;श्रुण्वन्ति--सुनते हैं; मीलित-ह॒शः--अपनी आँखें बन्द करके; विगत-अन्य-वाच:--अन्य सारी ध्वनियाँ रोककर

अरी माई! कृष्ण का दर्शन करने हेतु इस जंगल में सारे पक्षी उड़कर वृक्षों की सुन्दरशाखाओं पर बैठ गये हैं।

वे एकान्त में अपनी आँखें मूँदकर उनकी वंशी की मधुर ध्वनि को हीसुन रहे हैं और वे किसी अन्य ध्वनि की ओर आकृष्ट नहीं होते।

सचमुच ये पक्षी महामुनियों कीकोटि के हैं।

नदहावस्तदा तदुपधार्य मुकुन्दगीत-मावर्तलक्षितमनो भवभग्नवेगा: ।

आलिड्नस्थगितमूर्मि भुजैर्मुरारे-गृह्न्ति पादयुगलं कमलोपहारा: ॥

१५॥

नद्यः--नदियाँ; तदा--तब; तत्‌--उसे; उपधार्य--अनुभव करके; मुकुन्द--कृष्ण के; गीतम्‌--वेणुगीत को; आवर्त--भँवरोंसे; लक्षित-- प्रकट; मन:-भव--अपनी दाम्पत्य इच्छा से; भग्न--टूटी; बेगा:-- धाराएँ; आलिड्रन--उनके आलिंगन से;स्थगितम्‌--जड़ हुई; ऊर्मि-भुजैः--लहर रूपी भुजाओं से; मुरारेः--मुरारी के; गृह्न्ति--पकड़ लेती हैं; पाद-युगलम्‌--दोनोंचरणकमल; कमल-उपहारा: --कमल फूलों की भेंटें लेकर

जब नदियाँ कृष्ण का वेणुगीत सुनती हैं, तो उनके मन उन्हें चाहने लगते हैं जिससे नदियोंकी धाराओं का प्रवाह खंडित हो जाता है और जल क्षुब्ध हो उठता है और भँवर बनकर घूमनेलगता है।

तत्पश्चात्‌ नदियाँ अपनी लहरों रूपी भुजाओं से मुरारी के चरणकमलों का आलिंगनकरती हैं और उन्हें पकड़कर उनपर कमलपुष्पों की भेंटें चढ़ाती हैं।

इश्ठातपे ब्रजपशून्सह रामगोपै:सश्जारयन्तमनु वेणुमुदीरयन्तम्‌ ।

प्रेमप्रवृद्ध उदितः कुसुमावलीभि:सख्युर्व्यधात्स्ववपुषाम्बुद आतपत्रम्‌ ॥

१६॥

इष्ठा--देखकर; आतपे--सूर्य की भरी गर्मी में; ब्रज-पशून्‌--त्रज के पालतू पशु; सह--साथ-साथ; राम-गोपै:--बलराम तथाग्वालों के; सजञ्जारयन्तमू--चराते हुए; अनु--बारम्बार; वेणुम्‌--वंशी; उदीरयन्तम्‌--तेजी से बजाते हुए; प्रेम--प्रेमवश;प्रवृद्ध:--बढ़ा हुआ; उदित:--उठकर; कुसुम-आवलीभि:--फूलों के समूहों से ( ओस के कणों से युक्त ); सख्यु:--अपनेमित्रों के लिए; व्यधात्‌ू--बनाया; स्व-वपुषा-- अपने ही शरीर से; अम्बुदः --बादल ने; आतपत्रम्‌--छाता |

भगवान्‌ कृष्ण बलराम तथा ग्वालबालों के संग में ब्रज के समस्त पशुओं को चराते हुएग्रीष्म की कड़ी धूप में भी निरन्तर अपनी बाँसुरी बजाते रहते हैं।

यह देखकर आकाश के बादलने प्रेमवश अपने को फैला लिया है।

ऊँचे उठकर तथा फूल जैसी असंख्य जल की बूँदों से उसनेअपने मित्र के लिए अपने ही शरीर को छाता बना लिया है।

पूर्णा: पुलिन्द उरुगायपदाब्जराग-श्रीकुद्डु मेन दयितास्तनमण्डितेन ।

तहर्शनस्मररुजस्तृणरूषितेनलिम्पन्त्य आननकुचेषु जहुस्तदाधिम्‌ ॥

१७॥

पूर्णा:--पूर्णतया संतुष्ट; पुलिन्द्ः--शबर जाति की स्त्रियाँ; उरुगाय-- भगवान्‌ कृष्ण के; पद-अब्ज--चरणकमलों से; राग--लाल रंग का; श्री-कुट्डू मेन--दिव्य कुंकुम चूर्ण से; दयिता--अपनी प्रेयसी के; स्तन--वक्षस्थल; मण्डितेन--अलंकृत हुए;तत्‌--उसके; दर्शन--देखने से; स्मर--कामदेव का; रुज:--कष्ट अनुभव करते हुए; तृण--घास के ऊपर; रूषितेन--अनुरक्त;लिम्पन्त्य:--पोतते हुए; आनन--मुख; कुचेषु--तथा स्तनों पर; जहु: --उन्होंने त्याग दिया; तत्‌ू--उस; आधिम्‌--मानसिकपीड़ा को

वृन्दावन क्षेत्र की आदिवासी ललनाएँ लाल लाल कुंकुम चूर्ण से अंकित घास को देखकरकामोत्तेजित हो उठती हैं।

कृष्ण के चरणकमलों के रंग से प्रदत्त यह चूर्ण मूलतः उनकीप्रेमिकाओं के स्तनों को अलंकृत करता था और जब उसे ही आदिवासी स्त्रियाँ अपने मुखों तथास्तनों पर मल लेतीं हैं, तो उनकी सब चिंताए जाती रहती हैं।

हन्तायमद्रिरबला हरिदासवर्योयद्रामकृष्णचरणस्परश प्रमोद: ॥

मान तनोति सहगोगणयोस्तयोर्यत्‌'पानीयसूयवसकन्दरकन्दमूलै: ॥

१८॥

हन्त--ओह; अयम्‌--यह; अद्विः--पर्वत; अबला:--हे सखियो; हरि-दास-वर्य:--भगवान्‌ के सेवकों में से सर्व श्रेष्ठ; यत्‌--चूँकि; राम-कृष्ण-चरण--कृष्ण तथा बलराम के चरणकमलों के; स्परश--स्पर्श से; प्रमोद:ः--हर्षित; मानम्‌-- आदर;'तनोति-- प्रदान करता है; सह--साथ; गो-गणयो:--गौवें, बछड़े तथा ग्वालबाल के; तयो:--उन दोनों ( श्रीकृष्ण तथाबलराम ) को; यत्‌-- क्योंकि; पानीय--पेय जल के साथ; सूयवस--अत्यन्त मुलायम घास; कन्दर--गुफाएँ; कन्द-मूलै:--तथा खाद्य कनन्‍्दों से

यह गोवर्धन पर्वत समस्त भक्तों में सर्वश्रेष्ठ है।

सखियो, यह पर्वत कृष्ण तथा बलराम केसाथ ही साथ उनकी गौवों, बछड़ों तथा ग्वालबालों की सभी प्रकार की आवश्यकताओं-पीनेका पानी, अति मुलायम घास, गुफाएँ, फल, फूल तथा तरकारियों-की पूर्ति करता है।

इस तरहयह पर्वत भगवान्‌ का आदर करता है।

कृष्ण तथा बलराम के चरणकमलों का स्पर्श पाकरगोवर्धन पर्वत अत्यन्त हर्षित प्रतीत होता है।

गा गोपकैरनुवनं नयतोरुदार-वेणुस्वन: कलपदैस्तनुभृत्सु सख्यः ।

अस्पन्दनं गतिमतां पुलकस्तरुणांनिर्योगपाशकृतलक्षणयोर्विचित्रम्‌ ॥

१९॥

गाः--गौवें; गोपकैः--ग्वालबालों के साथ; अनु-वनमू--प्रत्येक जंगल तक; नयतोः--ले जानेवाले; उदार--अत्यन्त उदार;वेणु-स्वनै:--वंशी की ध्वनि से; कल-पदैः--मधुर स्वर से; तनुभृत्सु--जीवों से; सख्य:--हे सखियो; अस्पन्दनम्‌-स्पन्दन काअभाव; गति-मताम्‌--गति करनेवाले जीवों का; पुलक:--हर्ष; तरुणम्‌--वृक्षों का; निर्योग-पाश--गौवों के पिछले पाँवों कोबाँधने के लिए प्रयुक्त रस्सी, नोई; कृत-लक्षणयो:--लक्षणों वालों का; विचित्रमू-- आश्चर्यजनक |

हे सखियो, जब कृष्ण तथा बलराम अपने ग्वालमित्रों के साथ जंगल से होकर अपनी गौवेंलेकर गुजरते हैं, तो वे अपने साथ दूध दोहन के समय गौवों की पिछली टाँगें बाँधने के लिएनोई लिये रहते हैं।

जब भगवान्‌ कृष्ण अपनी वंशी बजाते हैं, तो मधुर संगीत से चर प्राणी स्तब्धरह जाते हैं और अचर वृक्ष आनन्दातिरिक से हिलने लगते हैं।

निश्चय ही ये बातें अत्यन्तआश्चर्यजनक हैं।

एवंविधा भगवतो या वृन्दावनचारिण: ।

वर्णयन्त्यो मिथो गोप्य: क्रीडास्तन्मयतां ययु: ॥

२०॥

एवमू-विधा:--ऐसा; भगवत: -- भगवान्‌ का; या: --जो; वृन्दावन-चारिण: --वृन्दावन के जंगल में घूमनेवाला; वर्णयन्त्य: --वर्णन करती हुई; मिथ:--परस्पर; गोप्य: --गोपियों ने; क्रीडा:--लीलाएँ; तत्‌-मयताम्‌ू--उनका भावमय ध्यान; ययुः:--प्राप्तकिया।

इस तरह वृन्दावन के जंगल में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ द्वारा विचरण से सम्बन्धित क्रीड़ामयीलीलाओं को एक-दूसरे से कहती हुई गोपियाँ उनके विचारों में पूर्णतया निमग्न हो गईं।

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