← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची

अध्याय दो: गर्भ में भगवान कृष्ण के लिए देवताओं द्वारा प्रार्थना

10.2श्रीशुक उबाचप्रलम्बबकचाणूरतृणावर्तमहाशनै:॥

मुष्टिकारिष्टद्विविदपूतनाकेशी धेनुकै: ॥

१॥

अन्यैश्वासुरभूपालैर्बाणभौमादिभिर्युत: ।

यदूनां कदनं चक्रे बली मागधसंभ्रय: ॥

२॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; प्रलम्ब--प्रलम्ब नामक असुर; बक--बक नामक असुर; चाणूर--चाणूरनामक असुर; तृणावर्त--तृणावर्त नामक असुर; महाशनैः--अघासुर द्वारा; मुपष्टिक--मुष्टिक नामक असुर; अरिषप्ट--अरिष्ट असुर;द्विविद--द्विविद असुर जैसे; पूतना--पूतना; केशी--केशी; धेनुकैः--धेनुक द्वारा; अन्य: च--तथा अन्यों द्वारा; असुर-भूपालै:--पृथ्वी पर असुर राजाओं द्वारा; बाण--बाण असुर; भौम--भौमासुर; आदिभि:--इत्यादि के द्वारा; युतः--से सहायताप्राप्त करके; यदूनाम्‌--यदुबंश के राजाओं का; कदनम्‌--उत्पीड़न; चक्रे --किया; बली--अत्यन्त शक्तिशाली; मागध-संश्रयः--मगध के राजा जरासन्ध के संरक्षण में।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : मगधराज जरासंध के संरक्षण में शक्तिशाली कंस द्वारा यदुवंशीराजाओं को सताया जाने लगा।

इसमें उसे प्रलम्ब, बक, चाणूर, तृणावर्त, अघासुर, मुष्टिक,अरिष्ट, द्विविद, पूतना, केशी, धेनुक, बाणासुर, नरकासुर तथा पृथ्वी के अनेक दूसरे असुरराजाओं का सहयोग प्राप्त था।

ते पीडिता निविविशु: कुरुपज्ञालकेकयान्‌ ।

शाल्वान्विदर्भात्नेषधान्विदेहान्कोशलानपि ॥

३॥

ते--यदुवंशी राजा; पीडिता:--सताये हुए; निविविशु:--राज्यों में घुस आये; कुरु-पञ्ञाल--कुरुओं तथा पंचालों द्वाराअधिकृत देशों में; केकयान्‌ू--केकयों के देश; शाल्वान्‌--शाल्वों द्वारा अधिकृत देश; विदर्भान्‌ू--विदर्भो द्वारा अधिकृत देश;निषधान्‌--निषधों द्वारा अधिकृत देश; विदेहान्‌--विदेहों का देश; कोशलान्‌ अपि--कोशलों द्वारा अधिकृत देशों में भी

असुर राजाओं द्वारा सताये जाने पर यादवों ने अपना राज्य छोड़ दिया और कुरुओं, पश्ञालों,केकयों, शाल्वों, विदर्भो, निषधों, विदेहों तथा कोशलों के राज्य में प्रविष्ट हुए।

एके तमनुरुन्धाना ज्ञातय: पर्युपासते ।

हतेषु घट्सु बालेषु देवक्‍्या औग्रसेनिना ॥

४॥

सप्तमो वैष्णवं धाम यमनन्तं प्रचक्षते ।

गर्भो बभूव देवक्या हर्षशोकविवर्धन: ॥

५॥

एके--कुछ; तम्‌--उस कंस को; अनुरुन्धाना:--अपनी नीति का पालन करने वाले; ज्ञातय:--सम्बन्धीजन; पर्युपासते--उसकीहाँ में हाँ मिलाने लगे; हतेषु--मारे जाकर; षट्सु--छः ; बालेषु--बालक; देवक्या:--देवकी द्वारा उत्पन्न; औग्रसेनिना--उग्रसेनके पुत्र ( कंस ) द्वारा; सप्तम:--सातवाँ; वैष्णवम्‌--भगवान्‌ विष्णु के; धाम--अंश; यम्‌--जिसको; अनन्तम्‌-- अनन्त नाम से;प्रचक्षते--विख्यात है; गर्भ:--गर्भ; बभूव-- था; देवक्या:--देवकी का; हर्ष-शोक-विवर्धन:--एकसाथ हर्ष तथा शोक कोबढ़ाने वाला।

किन्तु उनके कुछ सम्बन्धी कंस के इशारों पर चलने लगे और उसकी नौकरी करने लगे।

जब उग्रसेन का पुत्र कंस देवकी के छह पुत्रों का वध कर चुका तो देवकी के गर्भ में कृष्ण कास्वांश प्रविष्ट हुआ जिससे उसमें कभी सुख की तो कभी दुख की वृद्धि होती।

यह स्वांश महान्‌मुनियों द्वारा अनन्त नाम से जाना जाता है और कृष्ण के द्वितीय चतुर्व्यूह से सम्बन्धित है।

भगवानपि विश्वात्मा विदित्वा कंसजं भयम्‌ ।

यदूनां निजनाथानां योगमायां समादिशत्‌ ॥

६॥

भगवानू-- श्रीकृष्ण ने; अपि-- भी; विश्वात्मा--हर एक का परमात्मा; विदित्वा--यदुओं तथा उनके अन्य भक्तों की स्थितिजानकर; कंस-जम्‌--कंस के कारण; भयम्‌--डर; यदूनाम्‌--यदुओं के; निज-नाथानाम्‌--अपने परम आश्रय स्वरूप;योगमायाम्‌--कृष्ण की आध्यात्मिक शक्ति योगमाया को; समादिशत्‌--आदेश दिया।

कंस के आक्रमण से अपने निजी भक्त, यदुओं, की रक्षा करने के लिए विश्वात्मा भगवान्‌ नेयोगमाया को इस प्रकार आदेश दिया।

गच्छ देवि ब्र॒जं भद्गे गोपगोभिरलड्डू तम्‌ ।

रोहिणी वसुदेवस्य भार्यास्ते नन्दगोकुले ।

अन्याश्व कंससंविग्ना विवरेषु वसन्ति हि ॥

७॥

गच्छ--अब जाओ; देवि--हे समस्त जगत की पूज्या; ब्रजम्‌्--व्रज भूमि में; भद्रे--हे समस्त जीवों का कल्याण करनेवाली;गोप-गोभि:-ग्वालों तथा गायों के साथ; अलड्डू तम्‌--अलंकृत, सज्जित; रोहिणी--रोहिणी; वसुदेवस्थ--कृष्ण के पितावसुदेव की; भार्या--पत्रियों में से एक; आस्ते--रह रही है; नन्द-गोकुले--गोकुल नाम से विख्यात महाराज नन्द के राज्य मेंजहाँ लाखों गायें पाली जाती हैं; अन्या: च--तथा अन्य पत्नियाँ; कंस-संविग्ना:--कंस के भय से; विवरेषु--एकान्त स्थानों में;वसन्ति--रह रही हैं; हि--निस्सन्देह।

भगवान्‌ ने योगमाया को आदेश दिया: हे समस्त जगत द्वारा पूज्या तथा समस्त जीवों कोसौभाग्य प्रदान करने वाली शक्ति, तुम ब्रज जाओ जहाँ अनेक ग्वाले तथा उनकी पत्नियाँ रहतीहैं।

उस सुन्दर प्रदेश में जहाँ अनेक गौवें निवास करती हैं, वसुदेव की पत्नी रोहिणी नन्द महाराजके घर में रह रही हैं।

वसुदेव की अन्य पत्लियाँ भी कंस के भय से वहीं अज्ञातवास कर रही हैं।

कृपा करके वहाँ जाओ।

देवक्या जठरे गर्भ शेषाख्यं धाम मामकम्‌ ।

तत्सन्निकृष्य रोहिण्या उदरे सन्निवेशय ॥

८॥

देवक्या:--देवकी के; जठरे--गर्भ में; गर्भभ्‌-- भ्रूण; शेष-आख्यम्‌--कृष्ण के अंश, शेष नाम से विख्यात; धाम--अंश;मामकमू--मेरा; तत्‌ू--उसको; सन्निकृष्य--निकाल करके; रोहिण्या:--रोहिणी के; उदरे--गर्भ के भीतर; सन्निवेशय--बिनाकठिनाई के स्थानान्तरित करो ।

देवकी के गर्भ में संकर्षण या शेष नाम का मेरा अंश है।

तुम उसे बिना किसी कठिनाई केरोहिणी के गर्भ में स्थानान्तरित कर दो।

अथाहमंशभागेन देवक्या: पुत्रतां शुभे ।

प्राप्स्यामि त्वं यशोदायां नन्दपत्न्यां भविष्यसि ॥

९॥

अथ--त्पश्चात्‌; अहम्‌ू-मैं; अंश-भागेन--अपने अंश द्वारा; देवक्या:--देवकी का; पुत्रतामू--पुत्र; शुभे--हे कल्याणीयोगमाया; प्राप्स्थामि--बनूँगा; त्वमू--तुम; यशोदायाम्‌--माता यशोदा के गर्भ में; नन्द-पत्याम्‌--महाराज नन्द की पत्नी;भविष्यसि--तुम भी प्रकट होगी |

हे सर्व-कल्याणी योगमायातब मैं अपने छहों ऐश्वर्यों से युक्त होकर देवकी के पुत्र रूप मेंप्रकट होऊँगा और तुम महाराज नन्द की महारानी माता यशोदा की पुत्री के रूप में प्रकट होगी।

अर्चिष्यन्ति मनुष्यास्त्वां सर्वकामवरेश्वरीम्‌ ।

धूपोपहारबलिभि: सर्वकामवरप्रदाम्‌ ॥

१०॥

अर्चिष्यन्ति-- पूजा करेंगे; मनुष्या:--मानव समाज; त्वाम्‌--तुम को; सर्व-काम-वर-ई श्वरीम्‌--सारी भौतिक इच्छाओं को पूराकरने वाले देवताओं में सर्वश्रेष्ठ होने से; धूप--सुगन्धित द्रव्य से; उपहार-- भेंट से; बलिभि:--यज्ञ द्वारा विविध प्रकार की पूजासे; सर्व-काम--सारी भौतिक इच्छाओं में से; वर--आशीर्वाद; प्रदामू--प्रदान कर सकने वाली |

सामान्य लोग पशुओं की बलि करके विविध सामग्री से तुम्हारी भव्य पूजा करेंगे क्योंकितुम हर एक की भौतिक इच्छाएँ पूरी करने में सर्वोपरि हो।

नामधेयानि कुर्वन्ति स्थानानि च नरा भुवि ।

दुर्गेति भद्रकालीति विजया वैष्णवीति च ॥

११॥

कुमुदा चण्डिका कृष्णा माधवी कन्यकेति च ।

माया नारायणीशानी शारदेत्यम्बिकेति च ॥

१२॥

नामधेयानि--विभिन्न नाम; कुर्वन्ति--देंगे; स्थानानि--विभिन्न स्थानों में; च-- भी; नराः--भौतिक भोग में रुचि रखने वालेलोग; भुवि-- पृथ्वी पर; दुर्गा इति--दुर्गा नाम; भद्रकाली इति--भद्गरकाली नाम; विजया--विजया नाम; वैष्णवी इति--वैष्णबीनाम; च--भी; कुमुदा--कुमुदा; चण्डिका--चण्डिका; कृष्णा--कृष्णा; माधवी--माधवी; कन्यका इति--कन्यका या'कन्याकुमारी; च-- भी; माया--माया; नारायणी -- नारायणी; ईशानी--ईशानी; शारदा--शारदा; इति--इस प्रकार;अम्बिका--अम्बिका; इति-- भी; च-- तथा |

भगवान्‌ कृष्ण ने मायादेवी को यह कहकर आशीर्वाद दिया: लोग तुम्हें पृथ्वी पर विभिन्नस्थानों में विभिन्न नामों से पुकारेंगे--यथा दुर्गा, भद्रकाली, विजया, वैष्णवी, कुमुदा, चण्डिका,कृष्णा, माधवी, कनन्‍्यका, माया, नारायणी, ईशानी, शारदा तथा अम्बिका।

गर्भसड्रूर्षणात्तं वै प्राहु: सड्डूर्षणं भुवि ।

रामेति लोकरमणाद्वलभद्रं बलोच्छुयात्‌ ॥

१३॥

गर्भ-सड्डूर्षणात्‌ू--देवकी के गर्भ से निकाल कर रोहिणी के गर्भ में पहुँचाये जाने के कारण; तमू--उसको ( रोहिणीनन्दन को );बै--निस्सन्देह; प्राहु:--लोग कहेंगे; सड्डर्षणम्‌--संकर्षण को; भुवि--संसार में; राम इति--राम कहलाएगा; लोक-रमणात्‌--लोगों को भक्त बनने में समर्थ बनाने से; बलभद्रमू--बलभद्र कहलाएगा; बल-उच्छुयात्‌-- प्रचुर बल के कारण।

देवकी के गर्भ से निकाल कर रोहिणी के गर्भ में भेजे जाने के कारण रोहिणी का पुत्रसंकर्षण भी कहलाएगा।

वह गोकुल के सारे निवासियों को प्रसन्न रखने की क्षमता होने केकारण राम कहलाएगा और अपनी प्रचुर शारीरिक शक्ति के कारण बलभद्र कहलाएगा।

सन्दिष्टेब भगवता तथेत्योमिति तद्बच: ।

प्रतिगृह्य परिक्रम्य गां गता तत्तथाकरोत्‌ ॥

१४॥

सन्दिष्टा--आदेश दिये जाने पर; एवम्‌--इस प्रकार; भगवता-- भगवान्‌ द्वारा; तथा इति--ऐसा ही हो; ३४--३% मंत्र; इति--इस प्रकार; तत्‌-वच: --उनके शब्द; प्रतिगृह्य--मानकर; परिक्रम्य--उनकी परिक्रमा करके; गाम्‌--पृथ्वी पर; गता--तुरन्तचली गई; तत्‌-- भगवान्‌ द्वारा दिया गया आदेश; तथा--उसी तरह; अकरोत्‌--किया

भगवान्‌ से इस तरह आदेश पाकर योगमाया ने उसे तुरन्त स्वीकार कर लिया।

उसने वैदिकमंत्र ३७ के साथ पुष्टि की कि उससे जो कहा गया है उसे वह करेगी।

इसके बाद उसने पूर्णपुरुषोत्तम भगवान्‌ की परिक्रमा की और वह पृथ्वी पर स्थित नन्दगोकुल नामक स्थान के लिएचल पड़ी।

वहाँ उसने वैसा ही किया जैसा कि उसे आदेश मिला था।

गर्भ प्रणीते देवक्‍्या रोहिणीं योगनिद्रया ।

अहो विस्त्रंसितो गर्भ इति पौरा विचुक्रुशु: ॥

१५॥

गर्भे--जब गर्भ; प्रणीते--ले जाया गया; देवक्या:--देवकी का; रोहिणीम्‌--रोहिणी के गर्भ में; योग-निद्रया --योगमाया द्वारा;अहो--हाय; विस्त्रंसित:--नष्ट हो गया; गर्भ:--गर्भ; इति--इस प्रकार; पौरा:--घर के रहने वाले; विचुक्रुशु:--विलाप करनेलगे

जब योगमाया द्वारा देवकी का बालक खींच करके रोहिणी के गर्भ में स्थानान्तरित करदिया गया तो देवकी को लगा कि उसे गर्भपात हो गया।

फलतः महल के सारे निवासी जोर-जोरसे यह कहकर विलाप करने लगे, ‘हाय! देवकी का बच्चा जाता रहा।

' भगवानपि विश्वात्मा भक्तानामभयड्डूरः ।

आविवेशांशभागेन मन आनकदुन्दुभे: ॥

१६॥

भगवान्‌-- भगवान्‌; अपि-- भी ; विश्वात्मा-- सारे जीवों के परमात्मा; भक्तानाम्‌--अपने भक्तों के; अभयम्‌-करः--भय केकारण को मारने वाले; आविवेश--प्रविष्ट हो गये; अंश-भागेन--अपने सारे ऐश्वर्यों के साथ ( षडैश्चर्यपूर्ण ); मनः--मन में;आनकदुन्दुभे:-- वसुदेव के मन में

इस तरह समस्त जीवों के परमात्मा तथा अपने भक्तों के भय को दूर करने वाले पूर्णपुरुषोत्तम भगवान्‌ वसुदेव के मन में अपने पूर्ण ऐश्वर्य के समेत प्रविष्ट हो गये।

स बिशभ्चत्पौरुषं धाम भ्राजमानो यथा रवि: ।

दुरासदोतिदुर्धर्षो भूतानां सम्बभूव ह ॥

१७॥

सः--वह ( वसुदेव ); बिभ्रत्‌-- धारण किये हुए; पौरुषम्‌--परम पुरुष सम्बन्धी; धाम-- आध्यात्मिक तेज; भ्राजमान:--प्रकाशमान; यथा--जिस तरह; रविः--सूर्य-प्रकाश; दुरासद: --देखे जाने में भी अत्यन्त कठिन; अति-दुर्धर्ष:-- अत्यन्तकठिनाई से पास पहुँचने योग्य; भूतानाम्‌--समस्त जीवों में; सम्बभूव--बन गया; ह--निश्चित रुप से

वसुदेव अपने हृदय के भीतर भगवान्‌ के स्वरूप को धारण किये हुए भगवान्‌ के दिव्यप्रकाशमान तेज को वहन कर रहे थे जिसके कारण वे सूर्य के समान चमकीले बन गये।

अतःउनकी ओर लौकिक दृष्टि द्वारा देखना या उन तक पहुँचना कठिन था, यहाँ तक कि वे कंस जैसेपराक्रमी व्यक्ति के लिए ही नहीं, अपितु सारे जीवों के लिए भी दुर्धर्ष थे।

ततो जगन्मड्रलमच्युतांशं समाहित शूरसुतेन देवी ।

दधार सर्वात्मकमात्मभूत॑काष्ठा यथानन्दकरं मनस्तः ॥

१८॥

ततः--तत्पश्चात्‌; जगत्‌-मड्नलम्‌--ब्रह्माण्ड भर के जीवों के लिए मंगल; अच्युत-अंशम्‌-- भगवान्‌ जो अपने अंशों में उपस्थितछह ऐश्वर्यों से कभी वियुक्त नहीं होते; समाहितम्‌--पूरी तरह स्थानान्तरित; शूर-सुतेन--शूरसेन के पुत्र बसुदेव द्वारा; देवी --देवकी देवी ने; दधार--वहन किया; सर्व-आत्मकम्‌--सबों के परमात्मा; आत्म-भूतम्‌--समस्त कारणों के कारण; काष्ठा--पूर्व दिशा; यथा--जिस तरह; आनन्द-करम्‌--आनन्दमय ( चन्द्रमा ); मनस्त:--मन के भीतर स्थित होने से |

तत्पश्चात्‌ परम तेजस्वी, सम्पूर्ण जगत के लिए सर्वमंगलमय समस्त ऐश्वर्यों से युक्त भगवान्‌अपने स्वांशों समेत वसुदेव के मन से देवकी के मन में स्थानान्तरित कर दिये गये।

इस तरहबसुदेव से दीक्षा प्राप्त करने से देबकी सबों की आदि चेतना, समस्त कारणों के कारण भगवान्‌कृष्ण को अपने अन्तःकरण में धारण करने के कारण सुन्दर बन गईं जिस तरह उदित चन्द्रमाको पाकर पूर्व दिशा सुन्दर बन जाती है।

सा देवकी सर्वजगन्निवास-निवासभूता नितरां न रेजे ।

भोजेन्द्रगेहे ईग्निशिखेव रुद्धासरस्वती ज्ञाखले यथा सती ॥

१९॥

सा देवकी --वह देवकी देवी; सर्व-जगत्‌-निवास--सारे ब्रह्माण्ड को धारण करने वाले भगवान्‌ का ( मत्स्थानि सर्वभूतानि );निवास-भूता--देवकी की कुक्षि अब निवास बनी हुई है; नितराम्‌--विस्तार से; न--नहीं; रेजे-- प्रकाशमान हो उठा; भोजेन्द्र-गेहे--कंस के घर की चहारदीवारी के भीतर; अग्नि-शिखा इब--आग की लपटों के समान; रुद्धा--ढकी हुई; सरस्वती--विद्या; ज्ञान-खले--ज्ञान-खल नामक व्यक्ति में, ऐसे व्यक्ति में जो ज्ञान होने पर भी उसको वितरित नहीं करता; यथा--जिसतरह; सती--होकर भी |

तब देवकी ने समस्त कारणों के कारण, समग्र ब्रह्माण्ड के आधार भगवान्‌ को अपने भीतररखा किन्तु कंस के घर के भीतर बन्दी होने से वे किसी पात्र की दीवालों से ढकी हुई अग्नि कीलपटों की तरह या उस व्यक्ति की तरह थीं जो अपने ज्ञान को जनसमुदाय के लाभ हेतु वितरितनहीं करता।

तां वीक्ष्य कंसः प्रभयाजितान्तरांविरोचयन्तीं भवनं शुचिस्मिताम्‌ ।

आषैष मे प्राणहरो हरिगटहांश्रुवं अ्रितो यन्न पुरेयमीहशी ॥

२०॥

ताम्‌--उस देवकी को; वीक्ष्य--देखकर; कंस:--उसके भाई कंस ने; प्रभया--उसके सौन्दर्य और प्रभाव के बढ़ने से; अजित-अन्तरामू--अजित या भगवान्‌ विष्णु को अपने भीतर रखने के कारण; विरोचयन्तीम्‌--प्रकाशित करती हुई; भवनम्‌--घर केसमूचे वातावरण को; शुचि-स्मिताम्‌--हँसती हुई तथा तेजस्वी; आह--अपने आप कहा; एष: --यह ( परम पुरुष ); मे--मेरा;प्राण-हर:--मेरी जान लेनेवाले; हरिः-- भगवान्‌ विष्णु ने; गुहामू--देवकी के गर्भ में; ध्रुवम्‌--निश्चित रूप से; भ्रितः--शरणली है; यत्‌--क्योंकि; न--नहीं थी; पुरा--पहले; इयम्‌-- देवकी; ईहशी--इस तरह

गर्भ में भगवान्‌ के होने से देवकी जिस स्थान में बन्दी थीं वहाँ के सारे वातावरण को वेआलोकित करने लगीं।

उसे प्रसन्न, शुद्ध तथा हँसमुख देखकर कंस ने सोचा, इसके भीतरस्थित भगवान्‌ विष्णु अब मेरा वध करेंगे।

इसके पूर्व देवकी कभी भी इतनी तेजवान तथा प्रसन्ननहीं दिखी।

किमद्य तस्मिन्करणीयमाशु मेयदर्थतन्त्रो न विहन्ति विक्रमम्‌ ।

स्त्रिया: स्वसुर्गुरुमत्या वधोयंयश: श्रियं हन्त्यनुकालमायु: ॥

२१॥

किम्‌--क्या; अद्य--अब तुरन्त; तस्मिनू--इस स्थिति में; करणीयम्‌--करने योग्य; आशु--बिना बिलम्ब किये; मे--मेराकर्तव्य; यत्‌ू-क्योंकि; अर्थ-तन्त्र:-- भगवान्‌, जो साधुओं की रक्षा करने तथा असाधुओं का वध करने के लिए कृतसंकल्प हैं;न--नहीं; विहन्ति--त्यागते हैं; विक्रमम्‌-- अपने पराक्रम को; स्त्रिया:--स्त्री का; स्वसु:--बहन का; गुरु-मत्या:--विशेषरूपसे जब वह गर्भवती है; वध: अयम्‌--वध; यश:ः--यश; श्रियम्‌ू--ऐश्वर्य; हन्ति--नष्ट हो जाएगा; अनुकालम्‌--हमेशा के लिए;आयुः--तथा उप्र |

कंस ने सोचा: अब मुझे क्‍या करना चाहिए? अपना लक्ष्य जानने वाले भगवान्‌( परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌ ) अपना पराक्रम त्यागने वाले नहीं हैं।

देवकी स्त्रीहै, वह मेरी बहन है और गर्भवती भी है।

यदि मैं उसे मार डालूँ तो मेरे यश, ऐश्वर्य तथा आयुनिश्चित रूप से नष्ट हो जाएँगे।

स एष जीवन्खलु सम्परेतोवर्तेत योउत्यन्तनृशंसितेन ।

देहे मृते तं मनुजा: शपन्तिगन्ता तमोउन्धं तनुमानिनो श्रुवम्‌ ॥

२२॥

सः--वह; एषः--वह ईर्ष्यालु व्यक्ति; जीवन्‌ू--जीवित रहते हुए; खलु-- भी; सम्परेत:--मृत है; वर्तेत--जीवित रह रहा है;यः--जो; अत्यन्त--अत्यधिक; नृशंसितेन--क्रूर कर्मो द्वारा; देहे--शरीर होने पर; मृते--समाप्त हो जाता है; तमू--उसको;मनुजा:--सारे मनुष्य; शपन्ति--निन्दा करते हैं; गन्ता--जाएगा; तमः अन्धम्‌ू--नारकीय जीवन को; तनु-मानिन:--देहात्मबो धवाले व्यक्ति के; ध्रुवम्‌--कोई सन्देह नहीं ॥

अत्यधिक क्रूर व्यक्ति को जीवित रहते हुए भी मृत माना जाता है क्योंकि उसके जीवित रहतेहुए या उसकी मृत्यु के बाद भी हर कोई उसकी निन्दा करता है।

देहात्मबुद्धिवाला व्यक्ति मृत्यु केबाद भी अन्धतम नरक को भेजा जाता है, इसमें कोई सन्देह नहीं।

इति घोरतमाद्धावात्सत्रिवृत्त: स्वयं प्रभु: ।

आत्ते प्रती क्ष॑स्तज्जन्म हरेवैंरानुबन्धकृत्‌ ॥

२३॥

इति--इस तरह उपर्युक्त विधि से सोचते हुए; घोर-तमात्‌ भावात्‌--अपनी बहन को किस तरह मारे इस अत्यन्त जघन्य विचार से;सन्निवृत्त:--विलग रहकर; स्वयम्‌--स्वयं विचार करके; प्रभु:--पूर्णज्ञान में ( कंस ); आस्ते--रहता रहा; प्रतीक्षन्‌ू--उस क्षणकी प्रतीक्षा करते हुए; तत्‌-जन्म--उसका जन्म होने तक; हरेः-- भगवान्‌ हरि के; बैर-अनुबन्ध-कृत्‌--ऐसा बैर चलाते रहने केलिए दृढ़।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस तरह तर्क-वितर्क करते हुए कंस यद्यपि भगवान्‌ के प्रतिशत्रुता बनाये रखने के लिए हढ़ था किन्तु अपनी बहन का जघन्य वध करने से कतराता रहा।

उसने भगवान्‌ के जन्म लेने तक प्रतीक्षा करने और तब जो आवश्यक हो, करने का निश्चयकिया।

आसीन: संविशंस्तिष्ठन्भुज्जान: पर्यटन्महीम्‌ ।

चिन्तयानो हषीकेशमपश्यत्तन्मयं जगत्‌ ॥

२४॥

आसीन:--कमरे या सिंहासन पर आराम से बैठे हुए; संविशन्‌ू--अथवा अपने बिस्तर पर लेटे हुए; तिष्ठन्‌ू--या अन्यत्र ठहरे हुए;भुझान:--खाते; पर्यटनू--घूमते; महीम्‌--पृथ्वी पर, इधर-उधर जाते हुए; चिन्तयान: --सदैव शत्रु-भाव से चिन्तन करते;हृषीकेशम्‌--सबों के नियन्ता भगवान्‌ को; अपश्यत्‌--देखा; तत्‌-मयम्‌--उससे ( कृष्ण से ) ही युक्त; जगत्‌--सारा संसार।

सिंहासन पर अथवा अपने कमरे में बैठे, बिस्तर पर लेटे या कहीं भी रहते हुए, खाते, सोतेया घूमते हुए कंस केवल अपने शत्रु भगवान्‌ हषीकेश को ही देखता था।

दूसरे शब्दों में, अपनेसर्वव्यापक शत्रु का चिन्तन करते करते कंस प्रतिकूल भाव से कृष्णभावनाभावित हो गया था।

ब्रह्मा भवश्व तत्रैत्य मुनिभिर्नारदादिभि: ।

देवै: सानुचरैः साक॑ गीर्मिवृषणमैडयन्‌ ॥

२५॥

ब्रह्मा--चतुर्मुख सर्वोच्च देवता; भव: च--तथा शिवजी; तत्र--वहाँ; एत्य-- आकर; मुनिभि: --मुनियों; नारद-आदिभि:--नारद इत्यादि के साथ; देवै:--तथा इन्द्र, चन्द्र, वरुण इत्यादि देवताओं के साथ; स-अनुचरैः--अपने अपने अनुयायियों केसाथ; साकम्‌--साथ; गीर्भि: --अपनी स्तुतियों से; वृषणम्‌--किसी को भी वर देने वाले भगवान्‌; ऐडयन्‌--प्रसन्न किया |

ब्रह्माजी तथा शिवजी, नारद, देवल तथा व्यास जैसे महामुनियों एवं इन्द्र, चन्द्र तथा वरुणजैसे देवताओं के साथ अदृश्य रूप में देवकी के कक्ष में पहुँचे जहाँ सबों ने मिलकर वरदायकभगवान्‌ को प्रसन्न करने के लिए सादर स्तुतियाँ कीं।

सत्यत्रतं सत्यपरं त्रिसत्यंसत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये ।

सत्यस्य सत्यमृतसत्यनेत्रसत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्ना: ॥

२६॥

सत्य-ब्रतम्‌-- भगवान्‌ जो अपने व्रत से कभी विचलित नहीं होते; * सत्य-परम्‌--परम सत्य ( जैसाकि श्रीमद्भागवत के प्रारम्भमें कहा गया है, सत्यं परं धीमहि ); त्रि-सत्यम्‌--वे इस जगत की सृष्टि, पालन तथा इसके संहार के बाद भी परम सत्य के रूप मेंविद्यमान रहते हैं; सत्यस्य--परम सत्य कृष्ण से उद्भूत सारे सत्यों के; योनिमू--कारण; निहितम्‌--प्रविष्ट; * *च--तथा;सत्ये--इस जगत को उत्पन्न करने वाले कारणों ( पंचतत्वों-क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर ); सत्यस्य--सत्य माने जाने वालेका; सत्यमू--भगवान्‌ जो आदि सत्य हैं; ऋत-सत्य-नेत्रमू--अच्छे लगने वाले सत्य के उद्गम ( सुनेत्रम्‌ ); सत्य-आत्मकम्‌--भगवान्‌ से सम्बद्ध हर वस्तु सत्य है ( सच्चिदानन्द ) ( उनका शरीर सत्य है, उनका ज्ञान सत्य है और उनका आनन्द सत्य है );त्वामू--तुम्हारी, हे भगवान्‌; शरणम्‌--शरण में; प्रपन्ना:ः--आपके संरक्षण में हम सभी |

( भगवान्‌ का ब्रत है--यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानंसृजाम्यहम्‌ ( भगवद्‌गीता ४७) ।

इसी व्रत को निभाने के लिए भगवान्‌ प्रकट हुए।

भगवान्‌ सारी वस्तुओं में यहाँ तक कि परमाणु के भीतर भी हैं--अण्डान्तरस्थपरमाणुचयान्तरस्थम्‌ ( ब्रह्म-संहिता ५ ४४ ) ।

इसीलिए वे अन्तर्यामी कहलाते हैं।

छाव कलटदेवताओं ने प्रार्थना की; हे प्रभो, आप अपने व्रत से कभी भी विचलित नहीं होते जो सदा हीपूर्ण रहता है क्योंकि आप जो भी निर्णय लेते हैं वह पूरी तरह सही होता है और किसी के द्वारारोका नहीं जा सकता।

सृष्टि, पालन तथा संहार--जगत की इन तीन अवस्थाओं में वर्तमान रहनेसे आप परम सत्य हैं।

कोई तब तक आपकी कृपा का भाजन नहीं बन सकता जब तक वह पूरीतरह आज्ञाकारी न हो अतः इसे दिखावटी लोग प्राप्त नहीं कर सकते।

आप सृष्टि के सारेअवयवों में असली सत्य हैं इसीलिए आप अन्‍्तर्यामी कहलाते हैं।

आप सबों पर समभाव रखते हैं और आपके आदेश प्रत्येक काल में हर एक पर लागू होते हैं।

आप आदि सत्य हैं अतः हमनमस्कार करते हैं और आपकी शरण में आए हैं।

आप हमारी रक्षा करें।

एकायनोसौ द्विफलस्त्रिमूल-श्वतूरसः पञ्जञविध: षडात्मा ।

सप्तत्वगष्टविटपो नवाक्षोदशच्छदी द्विखगो हादिवृक्ष: ॥

२७॥

एक-अयनः --सामान्यजीव का शरीर भौतिक तत्त्वों पर पूरी तरह आश्रित है; असौ--वह; द्वि-फल:--इस शरीर में हमें सुखतथा दुख मिलते रहते हैं, जो कर्मों से प्रतिफलित होते हैं; त्रि-मूल:--तीन जड़ों वाली प्रकृति के तीन गुण ( सतो, रजो तथातमोगुण ) जिनसे शरीर बना है; चतुः-रसः *--चार रस या आस्वाद; पश्च-विध:--ज्ञान प्राप्त करने की पाँच इन्द्रियों ( आँख,कान, नाक, जीभ तथा स्पर्श ) से युक्त; षघटू-आत्मा--छ:ः परिस्थितियाँ ( शोक, मोह, जरा, मृत्यु, भूख, प्यास ); सप्त-त्वक्‌--सात आवरण ( त्वचा, रक्त, पेशी, वसा, अस्थि, मज्जा तथा वीर्य ) वाला; अष्ट-विटप:ः--आठ शाखाएँ ( पाँच स्थूल तत्त्व पृथ्वी,जल, अग्नि, वायु और आकाश तथा मन, बुद्धि एवं अहंकार ); नव-अक्ष:--नौ दरवाजे; दश-छदी--दस प्रकार की प्राण वायुजो वृक्ष के पत्तों के सहश है; द्वि-खगः--दो पक्षी ( आत्मा तथा परमात्मा ); हि--निस्सन्देह; आदि-वृक्ष:--यही आदि वृक्ष याशरीर की बनावट है।

शरीर को अलंकारिक रूप में ‘आदि वृक्ष' कहा जा सकता है।

यह वृक्ष भौतिक प्रकृतिकी भूमि पर आश्रित होता है और उसमें दो प्रकार के--सुख भोग के तथा दुख भोग के--फललगते हैं।

इसकी तीन जड़ें तीन गुणों--सतो, रजो तथा तमो गुणों के साथ इस वृक्ष केकारणस्वरूप हैं।

शारीरिक सुख रूपी फलों के स्वाद चार प्रकार के होते हैं-- धर्म, अर्थ, कामतथा मोक्ष जो पाँच ज्ञान इन्द्रियों द्वारा छः प्रकार की परिस्थितियों--शोक, मोह, जरा, मृत्यु,भूख तथा प्यास के माध्यम से अनुभव किये जाते हैं।

इस वृक्ष की छाल में सात परतें होती हैं--त्वचा, रक्त, पेशी, वसा, अस्थि, मज्जा तथा वीर्य।

इस वृक्ष की आठ शाखाएँ हैं जिनमें से पाँचस्थूल तत्त्व तथा तीन सूक्ष्मतत्त्व हैं--क्षिति, जल, पावक, समीर, गगन, मन, बुद्धि तथाअहंकार।

शरीर रूपी वृक्ष में नौ छिद्र (कोठर) हैं--आँखें, कान, नथुने, मुँह, गुदा तथाजननेन्द्रिय।

इसमें दस पत्तियाँ हैं, जो शरीर से निकलने वाली दस वायु हैं।

इस शरीररूपी वृक्ष मेंदो पक्षी हैं--एक आत्मा तथा दूसरा परमात्मा।

त्वमेक एवास्य सतः प्रसूति-स्त्वं सबन्निधानं त्वमनुग्रहश्च ।

त्वन्मायया संवृतचेतसस्त्वां'पश्यन्ति नाना न विपश्चितो ये ॥

२८॥

त्वमू--तुम ( हे प्रभु); एक:--अकेले, आप ही सर्वस्व हैं; एब--निस्सन्देह; अस्य सत:ः--इस दृश्य जगत का; प्रसूतिः--मूलस्त्रोत; त्वमू--आप; सन्निधानम्‌--सर्वस्व विनष्ट हो जाने पर ऐसी सारी शक्ति का संरक्षण; त्वमू--आप; अनुग्रह: च--तथापालक; त्वतू-मायया--आपकी माया से; संवृत-चेतस:--उनका, जिनकी बुद्धि ऐसी माया से आवृत है; त्वामू--आपको;'पश्यन्ति--देखते हैं; नाना--अनेक प्रकार; न--नहीं; विपश्चित:--विद्वान या भक्तगण; ये--जो |

हे प्रभु, आप ही कई रूपों में अभिव्यक्त इस भौतिक जगत रूपी मूल वृक्ष के प्रभावशालीकारणस्वरूप हैं।

आप ही इस जगत के पालक भी हैं और संहार के बाद आप ही ऐसे हैं जिसमेंसारी वस्तुएँ संरक्षण पाती हैं।

जो लोग माया से आवृत हैं, वे इस जगत के पीछे आपका दर्शननहीं कर पाते क्योंकि उनकी दृष्टि विद्वान भक्तों जैसी नहीं होती।

बिभर्षि रूपाण्यवबोध आत्माक्षेमाय लोकस्य चराचरस्य ।

सत्त्वोपपन्नानि सुखावहानिसतामभद्राणि मुहु: खलानाम्‌ ॥

२९॥

बिभर्षि--आप स्वीकार करें; रूपाणि--अनेक रूप यथा मत्स्य, कूर्म, वराह, राम, नूसिंह आदि; अवबोध: आत्मा--विभिन्नअवतारों के बावजूद आप परम ज्ञाता बने रहते हैं; क्षेमाय--हर एक के और विशेषतया भक्तों के लाभ के लिए; लोकस्य--सारेजीवों के; चर-अचरस्य--जड़ तथा चेतन का; सत्त्व-उपपन्नानि--ऐसे सारे अवतार दिव्य होते हैं ( शुद्ध सत्त्त ); सुख-अवहानि--दिव्य आनन्द से पूरित; सताम्‌ू--भक्तों का; अभद्राणि--सारा अशुभ या संहार; मुहुः--पुनः पुनः; खलानाम्‌--अभक्तों का।

हे ईश्वर, आप सदैव ज्ञान से पूर्ण रहने वाले हैं और सारे जीवों का कल्याण करने के लिएआप विविध रूपों में अवतरित होते हैं, जो भौतिक सृष्टि के परे होते हैं।

जब आप इन अवतारोंके रूप में प्रकट होते हैं, तो आप पुण्यात्माओं तथा धार्मिक भक्तों के लिए मोहक लगते हैं किन्तुअभक्तों के लिए आप संहारकर्ता हैं।

त्वय्यम्बुजाक्षाखिलसतत्त्वधाम्निसमाधिनावेशितचेतसैके ।

त्वत्पादपोतेन महत्कृतेनकुर्वन्ति गोवत्सपदं भवाब्धिम्‌ ॥

३०॥

त्वयि--आप में; अम्बुज-अक्ष--हे कमल जैसे नेत्रवाले प्रभु; अखिल-सत्त्व-धाम्नि--जगत के आदि कारण जिससे हर वस्तुउदभूत होती है और जिसमें समस्त शक्तियाँ नवास करती हैं; समाधिना--स्थायी ध्यान तथा पूर्ण तल्‍लीनता ( आपके विचारों में )द्वारा; आवेशित-- पूर्णतया तल्‍लीन, संलग्न; चेतसा--चेतना द्वारा; एके--आपके चरणकमलों के विषय में चिन्तन की एकविधि; त्वत्‌-पाद-पोतेन--आपके चरणकमल रूपी नाव में चढ़कर; महत्‌-कृतेन--ऐसे कार्य द्वारा जो अत्यन्त शक्तिशाली मानाजाता है या जो महाजनों द्वारा सम्पन्न किया जाता है; कुर्वन्ति--करते हैं; गोवत्स-पदम्‌--बछड़े के खुर के निशान तुल्य; भव-अब्धिम्‌--संसार सागर को

हे कमलनयन प्रभु, सम्पूर्ण सृष्टि के आगार रूप आपके चरणकमलों में अपना ध्यान एकाग्रकरके तथा उन्हीं चरणकमलों को संसार-सागर को पार करने वाली नाव मानकर मनुष्यमहाजनों ( महान्‌ सन्‍्तों, मुनियों तथा भक्तों ) के चरणचिन्हों का अनुसरण करता है।

इस सरलसी विधि से वह अज्ञान सागर को इतनी आसानी से पार कर लेता है मानो कोई बछड़े के खुरका चिन्ह पार कर रहा हो।

स्वयं समुत्तीर्य सुदुस्तरं द्युमन्‌भवार्णवं भीममदभ्रसौहदा: ।

भवत्पदाम्भोरुहनावमत्र तेनिधाय याताः सदनुग्रहो भवान्‌ ॥

३१॥

स्वयम्‌--खुद, आप; समुत्तीर्य--पार करके; सु-दुस्तरम्‌--दुर्लघ्य; द्युमन्‌ू--अज्ञान के इस लोक के अंधकार में सूर्य के समानचमक ने वाले हे प्रभु; भव-अर्गवम्‌--संसार सागर को; भीमम्‌ू-- भयानक; अदभ्र-सौहृदा: -- भक्तगण जो पतितात्माओं के प्रतिसदैव मैत्रीभाव रखते हैं; भवत्‌-पद-अम्भोरुह-- आपके चरणकमल; नावम्‌--पार करने के लिए नाव को; अत्र--इस संसारमें; ते--वे ( वैष्णवजन ); निधाय--पीछे छोड़कर; याता:--चरम लक्ष्य, बैकुण्ठ; सत्‌-अनुग्रह:--भक्तों पर सदैव कृपालु तथादयालु; भवान्‌ू--आप |

हे झ्ुतिपूर्ण प्रभु, आप अपने भक्तों की इच्छा पूरी करने के लिए सदा तैयार रहते हैं इसीलिएआप वांछा-कल्पतरु कहलाते हैं।

जब आचार्यगण अज्ञान के भयावह भवसागर को तरने केलिए आपके चरणकमलों की शरण ग्रहण करते हैं, तो वे अपने पीछे अपनी वह विधि छोड़ेजाते हैं जिससे वे पार करते हैं।

चूँकि आप अपने अन्य भक्तों पर अत्यन्त कृपालु रहते हैं अतएवउनकी सहायता करने के लिए आप इस विधि को स्वीकार करते हैं।

येअन्येरविन्दाक्ष विमुक्तमानिन-स्त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः ।

आरुह्यम कृच्छेण परं पदं ततःपतन्त्यधो नाहतयुष्मदड्घ्रय: ॥

३२॥

ये अन्ये--कोई या अन्य सभी; अरविन्द-अक्ष--हे कमलनेत्र; विमुक्त-मानिन:-- भव-कल्मष के बन्धन से अपने को झूठे हीमुक्त मानने वाले; त्वयि--तुम में; अस्त-भावात्‌--विविध रूप से सोचते हुए किन्तु आपके चरणकमलों के विषय में अधिक नजानने की इच्छा रखते हुए; अविशुद्ध-बुद्धयः--जिनकी बुद्धि अब भी शुद्ध नहीं है और जो जीवन-लक्ष्य को नहीं जानते;आरुह्म--प्राप्त करके भी; कृच्छेण --कठिन तपस्या तथा श्रम के द्वारा; परम्‌ पदम्‌--सर्वोच्च पद ( अपनी कल्पना केअनुसार ); ततः--उस पद से; पतन्ति--गिरते हैं; अध:--पुनः नीचे भवसागर में; अनाहत--उपेक्षा किया हुआ; युष्मत्‌--आपके; अड्घ्रय:--चरणकमल।

( कोई कह सकता है कि भगवान्‌ के चरणकमलों की शरण खोजने वाले भक्तों केअतिरिक्त भी ऐसे लोग हैं, जो भक्त नहीं हैं किन्तु जिन्होंने मुक्ति प्राप्त करने के लिए भिन्नविधियाँ अपना रखी हैं।

तो उनका क्या होता है? इसके उत्तर में ब्रह्माजी तथा अन्य देवता कहतेहैं ) हे कमलनयन भगवान्‌, भले ही कठिन तपस्याओं से परम पद प्राप्त करने वाले अभक्तगणअपने को मुक्त हुआ मान लें किन्तु उनकी बुद्धि अशुद्ध रहती है।

वे कल्पित श्रेष्ठता के अपने पदसे नीचे गिर जाते हैं, क्योंकि उनके मन में आपके चरणकमलों के प्रति कोई श्रद्धाभाव नहींहोता।

तथा न ते माधव तावकाः क्वचिद्‌भ्रश्यन्ति मार्गात्त्वयि बद्धसौहदा: ।

त्वयाभिगुप्ता विचरन्ति निर्भयाविनायकानीकपपमूर्थसु प्रभो ॥

३३॥

तथा--उनकी ( अभक्तों की ) तरह; न--नहीं; ते--वे ( भक्तगण ); माधव--हे लक्ष्मीपति भगवान्‌; तावका: --भक्तिमार्ग केअनुयायी, भक्तगण; क्वचित्‌--किसी भी परिस्थिति में; भ्रश्यन्ति--नीचे गिरते हैं; मार्गात्‌--भक्ति मार्ग से; त्ववि--आप में;बद्ध-सौहदा:--आपके चरणकमलों में पूरी तरह से अनुरक्त होने के कारण; त्वया--आपके द्वारा; अभिगुप्ता:--सारे संकटों सेसुरक्षित; विचरन्ति--विचरण करते हैं; निर्भधा:--निर्भीक होकर; विनायक-अनीकप--शत्रु जो भक्ति विचारधारा का विरोधकरने के लिए साज-सामान रखते हैं; मूर्थसु--अपने सिरों पर; प्रभो-हे प्रभु

हे माधव, पूर्ण पुरुषोत्तम परमेश्वर, हे लक्ष्मीपति भगवान्‌, यदि आपके प्रेमी भक्तमण कभीभक्तिमार्ग से च्युत होते हैं, तो वे अभक्तों की तरह नहीं गिरते क्योंकि आप तब भी उनकी रक्षाकरते हैं।

इस तरह वे निर्भय होकर अपने प्रतिद्वन्द्रियों के मस्तकों को झुका देते हैं और भक्ति मेंप्रगति करते रहते हैं।

सत्त्व॑ विशुद्ध श्रयते भवान्स्थितौशरीरिणां श्रेयठपायनं वपु: ।

वेदक्रियायोगतपःसमाधिभि-स्तवाहणं येन जन: समीहते ॥

३४॥

सत्त्वम्‌--अस्तित्व; विशुद्धम्‌-दिव्य, तीन गुणों से अतीत; श्रयते--स्वीकार करता है; भवान्‌--आप; स्थितौ--इस जगत केपालन के समय; शरीरिणाम्‌--सारे जीवों के; श्रेयः--परम कल्याण का; उपायनम्‌--लाभ के लिए; वपु:--दिव्य शरीर; बेद-क्रिया--वेदविहित अनुष्ठानों के द्वारा; योग--भक्ति द्वारा; तपः--तपस्या द्वारा; समाधिभि: --समाधि द्वारा; तब--तुम्हारी;अर्हणम्‌--पूजा; येन--ऐसे कार्यों से; जन:--मानव समाज; समीहते--कृतज्ञता प्रकट करता है।

हे परमेश्वर, पालन करते समय आप त्रिगुणातीत दिव्य शरीर वाले अनेक अवतारों को प्रकटकरते हैं।

जब आप इस तरह प्रकट होते हैं, तो जीवों को वैदिक कर्म--यथा अनुष्ठान, योग,तपस्या, समाधि आपके चिंतन में भावपूर्ण तल्‍लीनता--में युक्त होने की शिक्षा देकर उन्हेंसौभाग्य प्रदान करते हैं।

इस तरह आपकी पूजा वैदिक नियमों के अनुसार की जाती है।

सत्त्वं न चेद्धातरिदं निजं भवेद्‌विज्ञानमज्ञानभिदापमार्जनम्‌ ।

गुणप्रकाशैरनुमीयते भवान्‌प्रकाशते यस्य च येन वा गुण: ॥

३५॥

सत्त्वम्‌--शुद्धसत्त्व, दिव्य; न--नहीं; चेतू--यदि; धात:--समस्त कारणों के कारण; इृदम्‌--यह; निजम्‌--मेरा, आध्यात्मिक;भवेत्‌--हो जाता; विज्ञानम्‌ू--दिव्य ज्ञान; अज्ञान-भिदा--तमोगुण को भगाने वाला; अपमार्जनम्‌--पूर्णतया से विलुप्त; गुण-प्रकाशै:--ऐसा दिव्य ज्ञान जागृत करके; अनुमीयते-- प्रकट होता है; भवानू--आप; प्रकाशते--प्रकट होते हैं; यस्थय--जिसके;च--तथा; येन--जिससे; वा--अथवा; गुण: --गुण या बुद्धि |

है कारणों के कारण ईश्वर, यदि आपका दिव्य शरीर गुणातीत न होता तो मनुष्य पदार्थ तथाअध्यात्म के अन्तर को न समझ पाता।

आपकी उपस्थिति से ही आपके दिव्य स्वभाव को जानाजा सकता है क्योंकि आप प्रकृति के नियन्ता हैं।

आपके दिव्य स्वरूप की उपस्थिति से प्रभावितहुए बिना आपके दिव्य स्वभाव को समझना कठिन है।

न नामरूपे गुणजन्मकर्मभि-निरूपितव्ये तव तस्य साक्षिण: ।

मनोवचोशभ्यामनुमेयवर्त्मनोदेव क्रियायां प्रतियन्त्यथापि हि ॥

३६॥

न--नहीं; नाम-रूपे--नाम तथा रूप; गुण--गुण; जन्म--जन्म; कर्मभि:--कार्यकलापों या लीलाओं से; निरूपितव्ये--निश्चित नहीं किये जा सकते; तब-- आपके; तस्य--उसके; साक्षिण: --साक्षी; मन: --मन का; वचोभ्याम्‌--शब्दों द्वारा;अनुमेय-- धारणा; वर्त्मन:--रास्ता; देव--हे प्रभु; क्रियायाम्‌-- भक्तिकार्यों में; प्रतियन्ति-- अनुभव करते हैं; अथ अपि--फिरभी; हि--निस्सन्देह ( भक्तों द्वारा आप अनुभवगम्य हैं )

है परमेश्वर, आपके दिव्य नाम तथा स्वरूप का उन व्यक्तियों को पता नहीं लग पाता, मात्रजो केवल कल्पना के मार्ग पर चिन्तन करते हैं।

आपके नाम, रूप तथा गुणों का केवल भक्तिद्वारा ही पता लगाया जा सकता है।

श्रण्वन्गृणन्संस्मरयं श्व चिन्तयन्‌नामानि रूपाणि च मड़लानि ते ।

क्रियासु यस्त्वच्चरणारविन्दयो-राविष्टचेता न भवाय कल्पते ॥

३७॥

श्रूण्बनू--निरन्तर भगवान्‌ के विषय में सुनते हुए ( श्रवर्ण कीर्तन विष्णो: ); गृणन्‌--कीर्तन करते हुए या सुनाते हुए;संस्मरयन्‌--स्मरण करते हुए ( भगवान्‌ के चरणकमलों तथा उनके स्वरूप के विषय में निरन्तर चिन्तन करते हुए ); च--तथा;चिन्तयन्‌--चिन्तन करते हुए ( भगवान्‌ के कार्यकलापों का ); नामानि--उनके दिव्य नाम; रूपाणि--उनके दिव्य स्वरूप; च--भी; मड्लानि--दिव्य होने से शुभ; ते--आपके ; क्रियासु-- भक्ति में लगे रहने पर; यः--जो; त्वत्‌-चरण-अरविन्दयो: --आपके चरण कमलों पर; आविष्ट-चेता: --पूर्णतया लीन रहनेवाला भक्त; न--नहीं; भवाय--भौतिक पद के लिए; कल्पते--योग्य है।

विविध कार्यो में लगे रहने पर भी जिन भक्तों के मन आपके चरणकमलों में पूरी तरह लीनरहते हैं और जो निरन्तर आपके दिव्य नामों तथा रूपों का श्रवण, कीर्तन, चिन्तन करते हैं तथाअन्यों को स्मरण कराते हैं, वे सदैव दिव्य पद पर स्थित रहते हैं और इस प्रकार से पूर्ण पुरुषोत्तमहाभगवान्‌ को समझ सकते हैं।

दिष्टया हरेउस्था भवतः पदो भुवोभारोपनीतस्तव जन्मनेशितु: ।

दिष्टबाड्धितां त्वत्यदकै: सुशोभनै-ईश्ष्याम गां दवां च तवानुकम्पिताम्‌ ॥

३८ ॥

दिछ्या-- भाग्यवश; हरे--हे भगवान्‌; अस्या:--इस ( संसार ) के; भवत:--आपके; पद: --स्थान का; भुवः--इस धरा पर;भारः--असुएों द्वारा उत्पन्न बोझ; अपनीत:ः --दूर हुआ; तब--आपके ; जन्मना--अवतार लेने से; ईशितु:--सबके नियन्ता आप;दिष्टया--तथा भाग्य से; अड्भिताम्‌--चिन्हित; त्वत्‌-पदकै:--आपके चरणकमलों से; सु-शोभनै:--शंख, चक्र, पद्म तथा गदा चिह्नों से अलंकृत; द्रक्ष्याम--हम देखेंगे; गाम्‌--इस पृथ्वी पर; द्याम्‌ च--तथा स्वर्ग में भी; तब अनुकम्पितामू--हम पर आपकीअहैतुकी कृपा होने से |

हे प्रभु, हम भाग्यशाली हैं कि आपके प्राकट्य से इस धरा पर असुरों के कारण जो भारीबोझा है, वह शीघ्र ही दूर हो जाता है।

निस्सन्देह हम अत्यन्त भाग्यशाली हैं क्योंकि हम इस धरामें तथा स्वर्गलोक में भी आपके चरणकमलों को अलंकृत करने वाले शंख, चक्र, पद्म तथागदा के चिन्हों को देख सकेंगे।

न तेभवस्येश भवस्य कारणंविना विनोदं बत तर्कयामहे ।

भवो निरोध: स्थितिरप्यविद्ययाकृता यतस्त्वय्यभया श्रयात्मनि ॥

३९॥

न--नहीं; ते--आपके ; अभवस्य--जो जैसे कि सामान्य जीव, उसका जन्म, मृत्यु, पालन पोषण से परे है, जो, उसका; ईश--हेईश्वर; भवस्थ-- आपके जन्म का; कारणम्‌--कारण; विना--रहित; विनोदम्‌--लीलाएँ ( आपको विवश होकर इस जगत मेंनहीं आना पड़ता है ); बत--फिर भी; तर्कयामहै--हम तर्क-वितर्क नहीं कर सकते ( लेकिन इन्हें अपकी लीला ही समझें );भव:ः--जन्म; निरोध: --मृत्यु; स्थिति:--पालन; अपि-- भी; अविद्यया--माया द्वारा; कृता:--किया गया; यत:-- क्योंकि;त्वयि--तुममें; अभय-आ श्रय--हे सबों के निर्भय आश्रय; आत्मनि--सामान्य जीवन का।

हे परमेश्वर, आप कोई सामान्य जीव नहीं जो सकाम कर्मों के अधीन इस भौतिक जगत मेंउत्पन्न होता है।

अतः इस जगत में आपका प्राकट्य या जन्म एकमात्र ह्रादिनी शक्ति के कारणहोता है।

इसी तरह आपके अंश रूप सारे जीवों के कष्टों--यथा जन्म, मृत्यु तथा जरा का कोईदूसरा कारण नहीं सिवाय इसके कि ये सभी आपकी बहिरंगा शक्ति द्वारा संचालित होते हैं।

मत्स्याश्रकच्छपनृसिंहवराहहंस-राजन्यविप्रविबुधेषु कृतावतार: ।

त्वं पासि नस्त्रिभुवनं च यथाधुनेशभारं भुवो हर यदूत्तम वन्दनं ते ॥

४०॥

मत्स्य--मत्स्यावतार; अश्व--घोड़े का अवतार; कच्छप--कूर्मावतार; नूसिंह--नृसिंह अवतार; वराह--वराह अवतार; हंस--हंस अवतार; राजन्य--रामचन्द्र तथा अन्य क्षत्रियों के रूप में अवतार; विप्र--वामनदेव जैसे ब्राह्मणों के रूप में अवतार;विबुधेषु--देवताओं के बीच; कृत-अवतार:--अवतारों के रूप में प्रकट हुए; त्वमू--आपको; पासि--कृपया बचायें; न: --हमें; त्रि-भुवनम्‌ च--तथा तीनों लोकों को; यथा--तथा; अधुना--अब; ईश--हे भगवान्‌; भारम्‌-- भार; भुव: --पृथ्वी का;हर--कृपया कम करें; यदु-उत्तम--हे यदुओं में श्रेष्ठ, हे कृष्ण; वन्दनम्‌ ते--हम आपकी वन्दना करते हैं।

हे परम नियन्ता, आप इसके पूर्व अपनी कृपा से सारे विश्व की रक्षा करने के लिए मत्स्य,अश्व, कच्छप, नृसिंहदेव, वराह, हंस, भगवान्‌ रामचन्द्र, परशुराम का तथा देवताओं में से वामनके रूप में अवतरित हुए हैं।

अब आप इस संसार का उत्पातों कम करके अपनी कृपा से पुनःहमारी रक्षा करें।

हे यदु श्रेष्ठ कृष्ण, हम आपको सादर नमस्कार करते हैं।

दिष्टद्याम्ब ते कुक्षिगत: पर: पुमा-नंशेन साक्षाद्धगवान्भवाय नः ।

माभूद्धयं भोजपतेर्मुमूर्षों-गेप्ता यदूनां भविता तवात्मज: ॥

४१॥

दिछ्या-- भाग्यवश; अम्ब--हे माता; ते--तुम्हारी; कुक्षि-गत:--कोख में; पर:--परमात्मा; पुमानू-- भगवान्‌; अंशेन--अपनीसमस्त शक्तियों सहित; साक्षात्‌-प्रत्यक्ष रूप से; भगवान्‌-- भगवान्‌; भवाय--कल्याण के लिए; नः--हम सबों के; माअभूत्‌ू-कभी न हों; भयम्‌-- भयभीत; भोज-पते: -- भोजवंश के राजा कंस से; मुमूर्षोः--जिसने भगवान्‌ के हाथों से मरने कीठान ली है; गोप्ता--रक्षक; यदूनाम्‌--यदुवबंश का; भविता--होगा; तब आत्मज: --तुम्हारा पुत्र |

हे माता देवकी, आपके तथा हमारे सौभाग्य से भगवान्‌ अपने सभी स्वांशों यथा बलदेवसमेत अब आपके गर्भ में हैं।

अतएव आपको उस कंस से भयभीत नहीं होना है, जिसने भगवान्‌के हाथों से मारे जाने की ठान ली है।

आपका शाश्वत पुत्र कृष्ण सारे यदुवंश का रक्षक होगा।

श्रीशुक उबाचइत्यभिष्टूय पुरुषं यद्रूपमनिदं यथा ।

ब्रह्ेशानौ पुरोधाय देवा: प्रतिययुर्दिवम्‌ ॥

४२॥

श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; अभिष्टूय--स्तुति करके; पुरुषम्‌--परम पुरुष की; यत्‌-रूपम्‌ू--जिसका स्वरूप; अनिदम्‌--दिव्य; यथा--जिस प्रकार; ब्रह्म--ब्रह्मा जी; ईशानौ--तथा शिवजी; पुरोधाय--आगेकरके; देवा:--सारे देवता; प्रतिययु:--लौट गये; दिवम्‌--अपने स्वर्ग निवास को

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ विष्णु की इस तरह स्तुति करने के बाद सारे देवता ब्रह्मजी तथाशिवजी को आगे करके अपने अपने स्वर्ग-आवासों को लौट गये।

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