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अध्याय अठारह: भगवान बलराम ने दानव प्रलंब का वध किया
10.18श्रीशुक उबाचअथ कृष्ण: परिवृतो ज्ञातिभिर्मुदितात्मभि: ।
अनुगीयमानो न्यविशद्ब्र॒जं गोकुलमण्डितम् ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; अथ--इसके बाद; कृष्ण: --कृष्ण; परिवृतः--घिर कर; ज्ञातिभि:--अपनेसंगियों से; मुदित-आत्मभि:--स्वभाव से प्रसन्न रहने वाले; अनुगीयमान:--यश का गान किया जाता हुआ; न्यविशत्-प्रविष्टहुए; ब्रजम्-ब्रज में; गो-कुल--गायों के झुंडों से; मण्डितम्--सुशोभित |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : अपने आनन्द-विभोर साथियों से घिरे हुए, जो निरन्तर उनकेयश का गान कर रहे थे, श्रीकृष्ण ब्रज ग्राम में प्रविष्ट हुए जो गौवों के झुंडों से मण्डित था।
ब्रजे विक्रीडतोरेवं गोपालच्छदामायया ।
ग्रीष्मो नामर्तुरभवन्नातिप्रेयाउछरीरिणाम् ॥
२॥
ब्रजे--वृन्दावन में; विक्रीडतो:--दोनों के खेलते हुए; एवम्--इस प्रकार; गोपाल--ग्वालबालों का; छद्य--वेश बनाकर;मायया--माया द्वारा; ग्रीष्म:--गर्मी; नाम--नामक; ऋतु:--ऋतु; अभवत्--आ गई; न--नहीं; अति-प्रेयान्-- अत्यधिकअनुकूल; शरीरिणाम्--देहधारियों के लिए
जब कृष्ण तथा बलराम इस तरह से सामान्य ग्वालबालों के वेश में वृन्दावन में जीवन काआनन्द ले रहे थे तो शनै-शने ग्रीष्म ऋतु आ गईं।
यह ऋतु देहधारियों को अधिक सुहावनी नहींलगती।
सच वृन्दावनगुणैर्वसन्त इव लक्षितः ।
यत्रास्ते भगवान्साक्षाद्रामेण सह केशव: ॥
३॥
सः--वह ( ग्रीष्म ऋतु ); च--फिर भी; वृन्दावन--वृन्दावन के; गुणैः--दिव्य गुणों के कारण; वसनन््तः--वसन्त ऋतु; इब--सहश; लक्षित:--लक्षण प्रकट करती हुई; यत्र--जिसमें ( वृन्दावन ); आस्ते--रहते हैं; भगवान्-- भगवान्; साक्षात्--स्वयं;रामेण सह--बलराम सहित; केशव: -- श्रीकृष्ण |
फिर भी चूँकि साक्षात् भगवान् कृष्ण बलराम सहित वृन्दावन में रह रहे थे अतएव ग्रीष्मऋतु वसन्त के गुण प्रकट कर रही थी।
वृन्दावन की भूमि के ऐसे हैं गुण।
यत्र निर्झरनिर्हादनिवृत्तस्वनझिल्लिकम् ।
शश्वत्तच्छीकरजीषद्गुममण्डलमण्डितम् ॥
४॥
यत्र--जिस ( वृन्दावन ) में; निर्शर--झरनों की; निर्हाद--तीब्र ध्वनि ने; निवृत्त--रोक दिया; स्वन--ध्वनि; झिल्लिकम्--झींगुरों की; शश्वत्--निरन्तर; तत्--उन ( झरनों ) की; शीकर--जल की बूँदों से; ऋजीष-- भीगे; द्रुम--वृक्षों के; मण्डल--समूहों से; मण्डितम्--सुशोभित |
वृन्दावन में झरनों की तीब्र ध्वनि से झींगुरों की झंकार छिप गई और उन झरनों की फुहार सेनिरन्तर नम रहते हुए वृक्षों के समूहों ने सम्पूर्ण क्षेत्र को मण्डित कर दिया।
सरित्सरः प्रस्नवणोर्मिवायुनाकह्ाारकञ्जोत्पलरेणुहारिणा ।
न विद्यते यत्र बनौकसां दवोनिदाघवहन्यर्क भवोउतिशाद्वले ॥
५॥
सरित्--नदियों; सर:--झीलों का; प्रस्नवण--धाराओं का ( स्पर्श करके ); ऊर्मि--तथा लहरें; वायुना--वायु द्वारा; कह्ार-कञ्ज-उत्पल--कह्ाार, कंज तथा उत्पल ( कमलों ) के; रेणु--पराग-कण; हारिणा--ले जाते हुए; न विद्यते--नहीं था; यत्र--जिसमें; वन-ओकसाम्--जंगल के निवासियों के लिए; दवः--तपती धूप; निदाघ--ग्रीष्म ऋतु की; वह्ि--दावाग्नि से;अर्क--तथा सूर्य से; भव:--उत्पन्न; अति-शाद्वले--जहाँ प्रचुर हरी भरी घास थी।
सरोवरों की लहरों तथा बहती हुई नदियों का स्पर्श करती हुई अनेक प्रकार के कमलों तथाकमलिनियों के पराग-कण अपने साथ लेती हुई वायु सम्पूर्ण वृन्दावन को शीतल बनाती थी।
इस तरह वहाँ के निवासियों को ग्रीष्म की जलती धूप तथा मौसमी दावाग्नियों से उत्पन्न गर्मी सेकष्ट नहीं उठाना पड़ता था।
निस्सन्देह वृन्दावन ताजी हरीभरी घास से भरापुरा था।
अगाधतोयह॒दिनीतटोरमिंभि-द्रवत्पुरीष्या: पुलिनै: समन्ततः ।
न यत्र चण्डांशुकरा विषोल्बणाभुवो रस शाद्वलितं च गृह्वते ॥
६॥
अगाध--बहुत गहरा; तोय--जल; हृदिनी--नदियों के; तट--किनारों पर; ऊर्मिभि: --लहरों से; द्रवत्--द्रवी भूत; पुरीष्या: --कीचड़; पुलिनैः:--रेतीले तटों से; समन्ततः--चारों ओर; न--नहीं; यत्र--जिस पर; चण्ड--सूर्य की; अंशु-करा:--किरणें;विष--विष के समान; उल्बणा:--विकराल; भुवः--पृथ्वी पर; रसमू--रस; शाद्वलितम्--हरियाली; च--तथा; गृह्वते--लेतीहैं।
गहरी नदियाँ अपनी उठती लहरों से अपने तटों को तर करके उन्हें गीला तथा दलदला बनादेती थीं।
इस तरह विष की तरह विकराल सूर्य की किरणें न तो पृथ्वी के रस को उड़ा पातीं नइसकी हरी घास को सुखा पातीं।
बन कुसुमितं श्रीमन्नदच्चित्रमृगद्धिजम् ।
गायन्मयूरभ्रमरं कूजत्कोकिलसारसम् ॥
७॥
वनम्--जंगल; कुसुमितम्--फूलों से पूर्ण; श्रीमत्--अत्यन्त सुन्दर; नदत्--शोर करते; चित्र--नाना प्रकार के; मृग--पशु;द्विजम्ू--तथा पक्षियों को; गायन्--गाते हुए; मयूर--मोर; भ्रमरम्-तथा भौंरों को; कूजत्-कुहू कुह्टू करते; कोकिल--'कोयलों; सारसम्--तथा सारसों को
फूलों से वृन्दावन बड़े ही सुन्दर ढंग से सजा हुआ था और नाना प्रकार के पशु तथा पक्षीअपनी ध्वनि से उसे पूरित कर रहे थे।
मोर तथा भौरे गा रहे थे और कोयल तथा सारस कुहू कुहूकर रहे थे।
क्रीडिष्यमाणस्तत्करष्णो भगवान्बलसंयुतः ।
वेणुं विरणयन्गोपैर्गो धनैः संवृतोडउविशत् ॥
८॥
क्रीडिष्यमाण:--क्रीड़ा करने की इच्छा से; तत्ू--उस ( वृन्दावन ); कृष्ण:--कृष्ण; भगवान्-- भगवान्; बल-संयुत:ः--बलरामके साथ; वेणुम्-- अपनी वंशी; विरणयन्--बजाते हुए; गोपै: --ग्वालबालों से; गो-धनैः--गौवों से, जो कि उनकी सम्पति हैं;संबृत:ः--घिरे हुए; अविशत्ू-प्रविष्ट हुए |
क्रीड़ा करने की इच्छा से, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण ग्वालबालों भगवान् बलराम सहिततथा गौवों से घिर कर अपनी बाँसुरी बजाते हुए वृन्दावन के जंगल में प्रविष्ट हुए।
प्रवालबईस्तबकर््रग्धातुकृतभूषणा: ॥
रामकृष्णादयो गोपा ननुतुर्युयुधुर्जगु; ॥
९॥
प्रवाल--कोंपलें; बह--मोर पंख; स्तबक--छोटे छोटे फूलों के गुच्छे; स्रकू--मालाएँ; धातु--तथा रंगीन खनिज ( गेरू );कृत-भूषणा: --उन्हें अपना आभूषण बनाकर; राम-कृष्ण-आदय: --बलराम, कृष्ण इत्यादि; गोपा:--ग्वालबाल; ननृतु:--नाचने लगे; युयुधु;--लड़ने लगे; जगुः--गाने लगे ।
कोंपलों, मोरपंखों, मालाओं, फूल की कलियों के गुच्छों तथा रंगविरंगे खनिज पदार्थों सेअपने आपको सजाकर बलराम, कृष्ण तथा उनके ग्वालमित्र नाचने लगे, कुश्ती लड़ने तथा गानेलगे।
कृष्णस्य नृत्यतः केचिज्जगु: केचिदवादयन् ।
वेणुपाणितलै: श्रृद्ढेः प्रशशंसुरथापरे ॥
१०॥
कृष्णस्य नृत्यतः--कृष्ण के नाचते समय; केचित्--उनमें से कोई; जगुः--गाने लगा; केचित्--कोई; अवादयन्--बजानेलगा; वेणु--वंशी; पाणि-तलै:ः --खड़ तालियों से; श्रृड्रे:--सींग से; प्रशशंसु:--प्रशंसा ( बाहवाही ) करने लगे; अथ--तथा;अपरे--अन्य लोग।
जब कृष्ण नाचने लगे तो कुछ बालक गाकर और कुछ बाँसुरी, हाथ के मंजीरे तथा भैसों के सींग बजा बजाकर उनका साथ देने लगे तथा कुछ अन्य बालक उनके नाच की प्रशंसा करनेलगे।
गोपजातिप्रतिच्छन्ना देवा गोपालरूपिणौ ।
ईंडिरे कृष्णरामौ च नटा इव नर्टं नृप ॥
११॥
गोप-जाति--ग्वालों की जाति के सदस्यों के रूप में ; प्रतिच्छन्ना:--वेश बनाये; देवा:--देवताओं ने; गोपाल-रूपिणौ--ग्वालबालों का रूप धारण किये; ईडिरे--पूजा की; कृष्ण-रामौ--कृष्ण तथा बलराम की; च--तथा; नटा: --पेशेवर नर्तकों;इब--सहश; नटम्ू--अन्य नर्तक; नृप--हे राजन
हे राजन, देवताओं ने गोप जाति के सदस्यों का वेश बनाया और जिस तरह नाटक केनर्तक दूसरे नर्तक की प्रशंसा करते हैं उसी तरह उन्होंने ग्वालबालों के रूप में प्रकट हुए कृष्णतथा बलराम की पूजा की।
भ्रमणैर्लडूनै: क्षेपरास्फोटनविकर्षणै: ।
चिक्रीडतुर्नियुद्धेन काकपक्षधरौ क्वचित् ॥
१२॥
भ्रमणै:--चक्कर लगाकर; लड्डनैः:--कूदफाँद कर; क्षेपैः--फेंककर; आस्फोटन--पटकी देकर; विकर्षणै: --तथा घसीट कर;चिकृईंडतु:--उन्होंने ( कृष्ण तथा बलराम ने ) क्रीड़ा की; नियुद्धेन--लड़ते हुए; काक-पक्ष--बालों के गुच्छा दोनों ओरलटकते; धरौ--पकड़ते हुए; क्वचित्--कभी
कृष्ण तथा बलराम चक्कर काटते, कूदते, फेंकते, थपथपाते तथा लड़ते भिड़ते हुए अपनेग्वाल सखाओं के साथ खेलने लगे।
कभी कभी कृष्ण तथा बलराम बालकों के सिरों कीचुटिया खींच लेते थे।
क्वचिच्रृत्यत्सु चान्येषु गायकौ वादकौ स्वयम् ।
शशंसतुर्महाराज साधु साध्विति वादिनौ ॥
१३॥
क्वचित्--कभी; नृत्यत्सु--नृत्य करते समय; च--तथा; अन्येषु-- अन्यों के; गायकौ--दोनों ( कृष्ण तथा बलराम ) गाते हुए;वादकौ--ोनों बाजा बजाते हुए; स्वयम्--स्वयं; शशंसतु:--प्रशंसा करते; महा-राज--हे महान् राजा; साधु साधु इति--बहुतअच्छा, बहुत अच्छा; वादिनौ--कहते हुए
हे राजनू, जब अन्य बालक नाचते होते तो कृष्ण तथा बलराम कभी कभी गीत तथा वाद्यसंगीत से उनका साथ देते और कभी कभी वे दोनों ‘बहुत अच्छा', ‘बहुत अच्छा' कहकरलड़कों की प्रशंसा करते थे।
क्वचिद्विल्वै: क्वचित्कुम्भेः क्वचामलकमुष्टिभि: ।
अस्पृश्यनेत्रबन्धाद्ये: क्वचिन्मृगखगेहया ॥
१४॥
क्वचित्--कभी; बिल्वै:ः--बेल के फल से; क्वचित्--कभी; कुम्भैः--कुम्भ फलों से; क्वच--तथा कभी; आमलक-मुष्टिभिः--मुठ्ठी भर आँवलों से; अस्पृश्य--छुई-छुऔअल खेल; नेत्र-बन्ध--आँख मिचौनी में एक दूसरे को पहचानने कीकोशिश करते हुए; आद्यि:--इत्यादि द्वारा; क्वचित्--क भी; मृग-- पशु; खग--तथा पक्षियों की तरह; ईहया--नकल करतेहुए।
ग्वालबाल कभी बिल्व या कुम्भ फलों से खेलते और कभी मुट्ठी में आमलक फलों कोलेकर खेलते।
कभी वे एक दूसरे को छूने का या आँख मिचौनी के समय किसी को पहचाननेका खेल खेलते तो कभी वे पशुओं तथा पक्षियों की नकल उतारते।
क्वचिच्च दर्दुरप्लावैर्विविधेरुपहासकै: ।
कदाच्त्स्यन्दोलिकया कर्हिचिन्रूपचेष्टया ॥
१५॥
क्वचित्--कभी कभी; च--तथा; दर्दुर--मेढकों की तरह; प्लावैः--कूद कर; विविध: -- अनेक प्रकार के; उपहासकै:--ठिठोलियों से; कदाचित्ू--कभी कभी; स्यन्दोलिकया--झूले में पेंग मार कर; कहिंचितू--क भी कभी; नृप-चेष्टया--राजा कीनकल करके
कभी कभी वे मेढ़कों की तरह फुदक फुदक कर चलते, कभी तरह तरह के हास परिहासकरते, कभी झूले में झूलते और कभी राजाओं की नकल उतारते।
एवं तौ लोकसिद्धाभि: क्रीडाभिश्वैरतुर्वने ।
नद्यद्विद्रोणिकुझ्षेषु काननेषु सरःसु च ॥
१६॥
एवम्--इस प्रकार से; तौ--वे दोनों, कृष्ण तथा बलराम; लोक-सिद्धाभि:--मानव समाज में भली भाँति ज्ञात; क्रीडाभि: --क्रीड़ाओं से; चेरतु:--घूमते हुए; बने--जंगल में; नदी--नदियों; अद्वि--पर्वतों; द्रोणि--घाटियों; कुझेषु--तथा कुंजों केबीच; काननेषु--छोटे जंगलों में; सरःसु--सरोवरों के किनारे; च--तथा।
इस तरह से कृष्ण तथा बलराम वृन्दावन की नदियों, पर्वतों, घाटियों, कुंजों, वृक्षों तथासरोवरों के बीच घूमते हुए सभी प्रकार के प्रसिद्ध खेल खेलते रहते।
पशूंश्चारयतोगपैस्तद्वने रामकृष्णयो: ।
गोपरूपी प्रलम्बोगादसुरस्तज्जिहीर्षया ॥
१७॥
पशून्--पशुओं को; चारयतो:--दोनों व्यक्ति चराते हुए; गोपैः:--ग्वालबालों के साथ; ततू-वने--उस जंगल में, वृन्दावन में;राम-कृष्णयो:--राम तथा कृष्ण; गोप-रूपी--ग्वालबाल का रूप धारण कर; प्रलम्ब:--प्रलम्ब; अगात्--आया; असुर:--असुर; तत्--उनको; जिहीर्षया--उठाकर भाग जाने ( हरण करने ) की इच्छा से |
इस तरह जब उस वृन्दावन के जंगल में राम, कृष्ण तथा उनके ग्वालमित्र गौवें चरा रहे थे तोप्रलम्ब नामक असुर उनके बीच में घुस आया।
कृष्ण तथा बलराम का हरण करने के इरादे सेउसने ग्वालबाल का वेश बना लिया था।
त॑ं विद्वानपि दाशाहों भगवान्सर्वदर्शनः ।
अन्वमोदत तत्सख्यं वध्धं तस्य विचिन्तयन् ॥
१८ ॥
तमू--उस प्रलम्बासुर को; विद्वानू-- भलीभाँति जानते हुए; अपि--यद्यपि; दाशाई:--दशाई के वंशज; भगवानू-- भगवान् ने;सर्व-दर्शन: --सर्वज्ञ; अन्वमोदत--स्वीकार कर ली; तत्--उसके साथ; सख्यम्--मित्रता; वधम्--वध; तस्य--उसका;विचिन्तयन्--सोचते हुए
चूँकि दशाई वंश में उत्पन्न भगवान् श्रीकृष्ण सब कुछ देखते हैं अतएव वे जान गये कि वहअसुर कौन है।
फिर भी भगवान् ने ऐसा दिखावा किया जैसे कि वे उसे अपना मित्र मान चुके होंजबकि वे गम्भीरतापूर्वक यह विचार कर रहे थे कि उसको कैसे मारा जाय।
तत्रोपाहूय गोपालान्कृष्ण: प्राह विहारवित् ।
है गोपा विहरिष्यामो द्वन्द्वीभूय यथायथम् ॥
१९॥
तत्र--तत्पश्चात्; उपाहूय--बुलाकर; गोपालानू--ग्वालबालों को; कृष्ण:--कृष्ण ने; प्राह--कहा; विहार-वित्--समस्तक्रीड़ाओं के ज्ञाता; हे गोपा:--हे ग्वालबालो; विहरिष्याम: --चलो खेलें; द्वन्द्दी-भूय--दो टोलियों में बँटकर; यथा-यथम्--उचित रीति से
तब समस्त क्रीड़ाओं के ज्ञाता कृष्ण ने सारे ग्वालबालों को बुलाया और उनसे इस प्रकारकहा : हे ग्वालबालो, अब चलो खेलें, हम अपने आपको दो समान टोलियों में बाँट लें।
तत्र चक्कुः परिवृढ्दो गोपा रामजनार्दनौ ।
कृष्णसड्डबट्टिनः केचिदासत्रामस्य चापरे ॥
२०॥
तत्र--उस खेल में; चक्कु:--उन्होंने बनाये; परिवृढी--दो अगुआ; गोपा: --ग्वालबाल; राम-जनार्दनौ--बलराम तथा कृष्ण;कृष्ण-सट्डट्टिन:--कृष्ण की टोली के सदस्य; केचित्--उनमें से कुछ; आसन्--हो गये; रामस्थ--बलराम के; च--तथा;अपरे--अन्यग्वाल
बालों ने कृष्ण तथा बलराम को दोनों टोलियों का अगुआ ( नायक ) चुन लिया।
कुछबालक कृष्ण की ओर थे और कुछ बलराम के साथ थे।
आचेरुविंविधा: क्रीडा वाह्यवाहकलक्षणा: ।
यत्रारोहन्ति जेतारो वहन्ति च पराजिता: ॥
२१॥
आचेरु:--सम्पन्न किया; विविधा:--तरह तरह के; क्रीडा:--खेल; वाह्म -- ले जाये जाने वाले द्वारा; वाहक--ले जाने वाला;लक्षणा:--लक्षणों से युक्त; यत्र--जिसमें; आरोहन्ति--चढ़ते हैं; जेतारः --जीतने वाले; वहन्ति--ढछोते हैं, ले जाते हैं; च--तथा; पराजिता:--हारने वाले।
बालकों ने तरह तरह के खेल खेले जिनमें पीठ पर चढ़ना तथा उठाना जैसे खेल होते हैं।
इनखेलों में जीतने वाले हार जाने वालों की पीठ पर चढ़ते हैं और हारने वाले उन्हें अपनी पीठ परचढ़ाते हैं।
वहन्तो वाह्ममानाश्न चारयन्तश्न गोधनम् ।
भाण्डीरक॑ नाम बरट्ट जग्मुः कृष्णपुरोगमा: ॥
२२॥
वहन्त:ः--चढ़ते; वाह्ममाना: -- चढ़ाते हुए; च--तथा; चारयन्त:--चराते हुए; च-- भी; गो-धनम्--गौवों को; भाण्डीरकम्नाम--भाण्डीरक नामक; वटम्--बरगद के पेड़ तक; जग्मुः--गये; कृष्ण-पुर:-गमा:--कृष्ण को आगे करके |
इस तरह एक दूसरे पर चढ़ते और चढ़ाते हुए और साथ ही गौवें चराते सारे बालक कृष्ण केपीछे पीछे भाण्डीरक नामक बरगद के पेड़ तक गये।
रामसड्डट्टिनो यहिं श्रीदामवृषभादय: ।
क्रीडायां जयिनस्तांस्तानूहु: कृष्णादयो नृप ॥
२३॥
राम-सद्डृट्टिन: --बलराम की टोली के सदस्य; यहिं--जब; श्रीदाम-वृषभ-आदय: -- श्रीदामा, वृषभ तथा अन्य ( यथा सुबल );क्रीडायाम्--खेलों में; जयिन:--विजयी; तान् तानू--इनमें से प्रत्येक; ऊहुः--चढ़ाते थे; कृष्ण-आदय:--कृष्ण तथा उनकीटोली के अन्य सदस्य; नृप--हे राजन
हे राजा परीक्षित, जब इन खेलों में भगवान् बलराम की टोली के श्रीदामा, वृषभ तथा अन्यसदस्य विजयी होते तो कृष्ण तथा उनके साथियों को उन सबों को अपने ऊपर चढ़ाना पड़ताथा।
उवाह कृष्णो भगवान्श्रीदामानं पराजित: ।
वृषभ भद्गसेनस्तु प्रलम्बो रोहिणीसुतम् ॥
२४॥
उबाह--चढ़ाते थे; कृष्ण: --कृष्ण; भगवान्--भगवान्; श्रीदामानम्--अपने भक्त तथा सखा श्रीदामा को; पराजित:--हारकर; वृषभम्--वृषभ को; भद्गसेन: --भद्गसेन; तु--तथा; प्रलम्ब:ः--प्रलम्ब; रोहिणी-सुतम्--रोहिणी पुत्र ( बलराम ) को |
हार कर, भगवान् श्रीकृष्ण ने श्रीदामा को अपने ऊपर चढ़ा लिया।
भद्गसेन ने वृषभ कोतथा प्रलम्ब ने रोहिणी पुत्र बलराम को चढ़ा लिया।
अविषट्ठं मन्यमान: कृष्णं दानवपुड़ुवः ।
बहन्द्रुततरं प्रागादवरोहणत: परम् ॥
२५॥
अविषहाम्--दुर्दम; मन्यमान:--विचार करते हुए; कृष्णम्--कृष्ण को; दानव-पुड़वः--वह अग्रगण्य असुर; वहन्--ले जातेहुए; द्रत-तरम्-तेजी से; प्रागात्ू--चलने लगा; अवरोहणतः परम्--उतारने के लिए निश्चित स्थान से आगे।
भगवान् कृष्ण को दुर्दम सोच कर वह जाना आना असुर ( प्रलम्ब ), बलराम को तेजी सेउस स्थान से बहुत आगे ले गया जहाँ उतारना निश्चित किया गया था।
तमुद्दहन्धरणिधरेन्द्रगौरवंमहासुरो विगतरयो निजं वपु: ।
स आस्थितः पुरटपरिच्छदो बभौतडिद्दयुमानुडुपतिवाडिवाम्बुद: ॥
२६॥
तम्--उन्हें, बलदेव को; उद्ददनू--ऊँचे ले जाकर; धरणि-धर-इन्द्र--पर्वतों के राजा सुमेरु की तरह; गौरवम्-- भार; महा-असुरः--महान् असुर; विगत-रयः --अपना वेग खो कर; निजम्ू--अपने असली; वपु:--शरीर को; सः--वह ना; आस्थित: --स्थित होकर; पुरट--सुनहरे; परिच्छद:--आशभूषणों से युक्त; बभौ--चमक रहा था; तडित्--बिजली की तरह; द्यु-मान्--चमकीला; उडु-पति--चन्द्रमा; वाट्ू--वहन करते हुए; इब--सहृश; अम्बु-दः--बादल।
जब वह महान् असुर बलराम को लिये जा रहा था, तो वे विशाल सुमेरु पर्वत की तरह भारीहो गये जिससे प्रलम्ब को अपना गति धीमी करनी पड़ी।
इसके बाद उसने अपना असली रूपधारण किया--तेजमय शरीर जो सुनहरे आभूषणों से ढका था और उस बादल के समान लगरहा था जिसमें बिजली चमक रही हो और जो अपने साथ चन्द्रमा लिये जा रहा हो।
निरीक्ष्य तद्बपुरलमम्बरे चरत्प्रदीप्तहग्भ्रुकुटितटोग्रदंप्टकम् ।
ज्वलच्छिखं कटककिरीटकुण्डल-त्विषाद्धुतं हलधर ईषदत्रसत् ॥
२७॥
निरीक्ष्य--देखकर; तत्--उस प्रलम्बासुर का; वपु:--शरीर; अलम्--तेजी से; अम्बरे--आकाश में; चरत्--विचरण करते;प्रदीप्त--प्रज्वलित; हक्--आँखें; भ्रु-कुटि--अपनी भौंहों पर के गुस्से का; तट--किनारे पर; उग्र-- भयानक; दंघ्रकम्--दाँतोंको; ज्वलत्-- अग्नि तुल्य; शिखम्--बाल; कटक--अपने बाजूबन्द; किरीट--मुकुट; कुण्डल--तथा कुंडलों के; त्विषा--तेज से; अद्भुतमू--आश्चर्यजनक; हल-धर:--हल धारण करने वाले, बलराम; ईषत्--टुक, थोड़ा; अत्रसत्-- भयभीत हुए।
जब हलधर भगवान् बलराम ने आकाश में विचरण करते हुए उस असुर की जलती हुईआँखें, अग्नि सदृूश बाल, भौंहों तक उठे भयानक दाँत तथा उसके बाजूबन्दों, मुकुट तथाकुंडलों से उत्पन्न आश्चर्यजनक तेज युक्त विराट शरीर को देखा तो वे कुछ कुछ भयभीत से होगये।
अथागतस्मृतिरभयो रिपुं बलोविहाय सार्थमिव हरन्तमात्मन: ।
रुषाहनच्छिरसि हढेन मुष्टिनासुराधिपो गिरिमिव वज़रंहसा ॥
२८॥
अथ--तब; आगत-स्मृति:-- अपना स्मरण करते हुए; अभय: --निर्भय; रिपुमू--शत्रु को; बल:--बलराम ने; विहाय--छोड़कर; सार्थमू--साथ; इब--निस्सन्देह; हरन्तम्ू--हरण करते हुए; आत्मन:--अपने आप; रुषा--क्रोध के साथ; अहनतू--प्रहार किया; शिरसि--सिर के ऊपर; हृढेन--कठोर; मुष्टिना--अपनी मुट्ठी से; सुर-अधिप:--देवताओं के राजा, इन्द्र; गिरिम्--पर्वत पर; इब--सहृश; वज़--वज् का; रंहसा--फुर्ती से
वास्तविक स्थिति का स्मरण करते हुए निभीक बलराम की समझ में आ गया कि यह असुरमेरा अपहरण करके मुझे मेरे साथियों से दूर ले जाने का प्रयास कर रहा है।
तब वे क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने असुर के सिर पर अपनी कठोर मुट्ठी से उसी तरह प्रहार किया जिस प्रकार देवताओंके राजा इन्द्र अपने वज् से पर्वत पर प्रहार करते हैं।
स आहतः सपदि विशीर्णमस्तकोमुखाद्वमन्रुधिरमपस्मृतो सुरः ।
महारवं व्यसुरपतत्समीरयन्गिरिर्यथा मघवत आयुधाहतः ॥
२९॥
सः--वह, प्रलम्बासुर; आहत:--प्रहार किया गया; सपदि--तुरन्त; विशीर्ण--विदीर्ण; मस्तक: --सिर; मुखात्-- मुँह से;वमन्--उगलता हुआ; रुधिरमू--रक्त; अपस्मृत:--बेहोश; असुर:--असुर; महा-रवम्-- भीषण शब्द; व्यसु:--निर्जीव;अपतत्--गिर पड़ा; समीरयन्--आवाज करता हुआ; गिरि:--पर्वत; यथा--जिस तरह; मघवत:--इन्द्र के; आयुध--हथियारसे; आहत:--चोट खाकर ।
बलराम की मुट्ठी के प्रहार से प्रलम्ब का सिर तुरन्त ही फट गया।
वह मुख से रक्त उगलनेलगा और बेहोश हो गया।
तत्पश्चात् वह निष्प्राण होकर पृथ्वी पर भीषण धमाके के साथ ऐसेगिर पड़ा मानो इन्द्र द्वारा विनष्ट कोई पर्वत हो।
इष्ठा प्रलम्बं॑ निहतं बलेन बलशालिना ।
गोपा: सुविस्मिता आसन्साधु साध्विति वादिन: ॥
३०॥
इृष्टा--देखकर; प्रलम्बम्--प्रलम्बासुर को; निहतम्--मारा गया; बलेन--बलराम द्वारा; बल-शालिना--बलशाली; गोपा: --ग्वालबाल; सु-विस्मिता: --अत्यन्त चकित; आसन्--हुए; साधु साधु--' अति उत्तम , ' ‘अति उत्तम '; इति--ये शब्द;वादिन:--कहते हुए
ग्वालबाल यह देखकर अत्यन्त चकित थे कि बलशाली बलराम ने किस तरह प्रलम्बासुरको मार डाला और वे सभी ‘बहुत खूब ' ‘बहुत खूब ' कहकर चिल्ला उठे।
आशिषोभिगृणन्तस्तं प्रशशंसुस्तदर्हणम् ।
प्रेत्यागतमिवालिड्ग्य प्रेमविह्ललचेतस: ॥
३१॥
आशिषः: --आशीर्वाद; अभिगृणन्त:--भेंटें देते हुए; तमू--उन््हें; प्रशशंसु:--प्रशंसा की; तत्-अर्हणम्--उस सुपात्र को; प्रेत्य--मरकर; आगतम्--वापस आया हुआ; इब--मानो; आलिन्य--आलिंगन करते हुए; प्रेम--प्रेमवश; विह्ल-- भावविभोर;चेतस:--मन।
उन्होंने बलराम को खूब आशीर्वाद दिया और सभी तरह की प्रशंसा के पात्र होने के कारणउनकी खूब प्रशंसा की।
उनके मन प्रेम से विभोर हो उठे और उन्होंने उनका इस प्रकार आलिंगनकिया मानो वे मरकर लौटे हों।
पापे प्रलम्बे निहते देवा: परमनिर्वृता: ।
अभ्यवर्षन्बलं माल्यै: शशंसु: साधु साध्विति ॥
३२॥
पापे--पापी; प्रलम्बे--प्रलम्बासुर पर; निहते--मारे जाने पर; देवा:--देवताओं ने; परम--अत्यधिक; निर्वृता:--प्रसन्न;अभ्यवर्षन्--बरसाया; बलम्--बलराम को; माल्यै: --मालाओं से; शशंसु:--स्तुतियाँ की; साधु साधु इति--' अति उत्तम'‘अति उत्तम' आलाप करते हुए।
पापी प्रलम्बासुर के मारे जाने पर देवता अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने बलराम पर'फूलमालाओं की वर्षा की।
उन्होंने उनके उत्तम कार्य की प्रशंसा की।
