← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची
अध्याय बारह: राक्षस अघासुर का वध
10.12श्रीशुक उबाचक्वचिद्दनाशाय मनो दधदव्॒जात्प्रात: समुत्थाय वयस्यवत्सपान् ।
प्रबोधयज्छुड्ररवेण चारुणाविनिर्गतो वत्सपुरःसरो हरि: ॥
१॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; क्वचित्--एक दिन; वन-आशाय--जंगल में विहार करने हेतु; मनः--मन;दधतू-बध्यान दिया; ब्रजात्ू-ब्रजभूमि से बाहर गये; प्रातः:--सुबह होते ही; समुत्थाय--जग कर; वयस्य-वत्स-पान्--ग्वालबालों तथा बछड़ों को; प्रबोधयन्--जगाकर बतलाते हुए; श्रृड्अ-रवेण--सींग के बने बिगुल से आवाज करते हुए;चारुणा--अत्यन्त सुन्दर; विनिर्गतः--ब्रजभूमि से बाहर आये; वत्स-पुरःसर:--बछड़ों को आगे करके; हरिः-- भगवान्
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजनू, एक दिन कृष्ण ने जंगल में विहार करते हुए कलेवाकरना चाहा।
उन्होंने बड़े सुबह उठ कर सींग का बिगुल बजाया तथा उसकी मधुर आवाज सेग्वालबालों तथा बछड़ों को जगाया।
फिर कृष्ण तथा सारे बालक अपने अपने बछड़ों के समूहोंको आगे करके ब्रजभूमि से जंगल की ओर बढ़े।
तेनैव साक॑ पृथुकाः सहस्त्रशःस्निग्धा: सुशिग्वेत्रविषाणवेणव: ।
स्वान्स्वान्सहस्त्रोपरिसड्ख्ययान्वितान्वत्सान्पुरस्कृत्य विनिर्ययुर्मुदा ॥
२॥
तेन--उनके; एव--निस्सन्देह; साकम्--साथ; पृथुका:--बालक; सहस्रश:ः --हजारों; स्निग्धा:--अत्यन्त आकर्षक; सु--सुन्दर; शिकू--कलेवा की पोटली; वेत्र--बछड़े हाँकने के लिए लाठियाँ; विषाण--सींग के बने बिगुल; वेणव:--बाँसुरियाँ;स्वान् स्वान्ू-- अपनी अपनी; सहस्त्र-उपरि-सड्ख्यया अन्वितान्--संख्या में एक हजार से ऊपर; वत्सान्ू--बछड़ों को; पुरः-कृत्य--आगे करके; विनिर्ययु;:--बाहर आ गये; मुदा--प्रसन्नतापूर्वक |
उस समय लाखों ग्वालबाल ब्रजभूमि में अपने अपने घरों से बाहर आ गये और अपने साथ के लाखों बछड़ों की टोलियों को अपने आगे करके कृष्ण से आ मिले।
ये बालक अतीव सुन्दरथे।
उनके पास कलेवा की पोटली, बिगुल, वंशी तथा बछड़े चराने की लाठियाँ थीं।
कृष्णवत्सैरसड्ख्यातैर्यूथीकृत्य स्ववत्सकान् ।
चारयन्तोर्भलीलाभिर्विजह॒स्तत्र तत्र ह ॥
३॥
कृष्ण--कृष्ण का; वत्सैः--बछड़ों के साथ; असड्ख्यातैः--अनन्त; यूथी-कृत्य--उन्हें एकत्र करके; स्व-वत्सकान्-- अपनेबछड़ों को; चारयन्तः--चराते हुए; अर्भ-लीलाभि:--बाल-लीलाओं द्वारा; विजहः --आनन्द मनाया; तत्र तत्र--यहाँ वहाँ;ह--निस्सन्देह।
कृष्ण ग्वालबालों तथा उनके बछड़ों के समूहों के साथ बाहर निकले तो असंख्य बछड़ेएकत्र हो गये।
तब सारे लड़कों ने जंगल में परम प्रसन्न होकर खेलना प्रारम्भ कर दिया।
'फलप्रबालस्तवकसुमन:पिच्छधातुभि: ।
काचगुज्ञामणिस्वर्ण भूषिता अप्यभूषयन् ॥
४॥
'फल--जंगल के फल; प्रबाल--हरी पत्तियाँ; स्तवक--गुच्छे; सुमन: --सुन्दर फूल; पिच्छ--मोरपंख; धातुभि:--रंगीन खनिजपदार्थ, गेरू द्वारा; काच--एक प्रकार का पत्थर; गुझ्ला--छोटे छोटे शंख; मणि--मोती; स्वर्ण--सोना; भूषिता:--अलंकृत;अपि अभूषयन्--माताओं द्वारा सजाये जाने पर भी स्वयं इन वस्तुओं से अपने को सजाने लगे।
यद्यपि इन बालकों की माताओं ने पहले से इन्हें काच, गुझ्ला, मोती तथा सोने के आभूषणोंसे सजा रखा था किन्तु फिर भी जंगल में जाकर उन्होंने फलों, हरी पत्तियों, फूलों के गुच्छों,मोरपंखों तथा गेरू से अपने को सजाया।
मुष्णन्तोउन्योन्यशिक्यादीन्ज्ञातानाराच्च चिह्षिपु: ।
तत्रत्याश्व पुनर्दूराद्धसन्तश्न पुनर्ददु; ॥
५॥
मुष्णन्त:--चुराते हुए; अन्योन्य--एक-दूसरे से; शिक्य-आदीन्ू--कलेवा के डिब्बे तथा अन्य वस्तुएँ; ज्ञातानू--उसके असलीमालिक द्वारा जान लिये जाने पर; आरात् च--दूर स्थान को; चिक्षिपु:--फेंक दिया; तत्रत्या: च--जो उस स्थान पर थे, वे भी;पुनः दूरात्ू--और आगे; हसन्तः च पुनः ददुः--हँसते हुए फिर से मालिक को लौटा दिया।
सारे ग्वालबाल एक-दूसरे की कलेवा की पोटली चुराने लगे।
जब कोई बालक जान जाताकि उसकी पोटली चुरा ली गयी है, तो दूसरे लड़के उसे दूर फेंक देते और वहाँ पर खड़े बालकउसे और दूर फेंक देते।
जब पोटली का मालिक निराश हो जाता तो दूसरे बालक हँस पड़ते औरमालिक रो देता तब वह पोटली उसे लौटा दी जाती।
यदि दूरं गत: कृष्णो वनशोभेक्षणाय तम् ।
अहं पूर्वमहं पूर्वमिति संस्पृश्य रेमिरि ॥
६॥
यदि--यदि; दूरम्--दूर स्थान को; गत: --गये; कृष्ण: --कृष्ण; बन-शोभ--जंगल का सौन्दर्य; ईक्षणाय--देखने तथा आनन्दलेने के लिए; तम्--कृष्ण को; अहम्--ैं; पूर्वम्--प्रथम; अहम्--मैं; पूर्वमू--प्रथम; इति--इस प्रकार; संस्पृश्य--उन्हें छूकर; रेमिरि--जीवन का आनन्द लेते।
कभी कभी कृष्ण जंगल की शोभा देखने के लिए दूर तक निकल जाते।
तो सारे बालकउनके साथ जाने के लिए, यह कहते हुए दौते, ‘दौड़ कर कृष्ण को छूने वाला मैं पहला हूँगा! मैंकृष्ण को सबसे पहले छुऊँगा।
' इस तरह वे कृष्ण को बारम्बार छू-छू कर जीवन का आनन्दलेते।
केचिद्वेणून्वादयन्तो ध्मान्तः श्रुड्भराणि केचन ।
केचिद्धड़ैः प्रगायन्तः कूजन्त: कोकिलै: परे ॥
७॥
विच्छायाभि: प्रधावन्तो गच्छन्तः साधुहंसकै: ।
बकैरुपविशन्तश्च नृत्यन्तश्न कलापिभि: ॥
८॥
विकर्षन्त: कीशबालानारोहन्तश्न तैर्द्रमान् ।
विकुर्वन्तश्च तै: साक॑ प्लवन्तश्च पलाशिषु ॥
९॥
साकं भेकैर्विलड्डन्तः सरितः स्त्रवसम्प्लुता: ।
विहसन्त: प्रतिच्छाया: शपन्तश्च प्रतिस्वनान् ॥
१०॥
इत्थं सतां ब्रह्मसुखानु भूत्यादास्यं गतानां परदैवतेन ।
मायाज्ितानां नरदारकेणसाक॑ विजह्ु: कृतपुण्यपुझ्ञा: ॥
११॥
केचित्--उनमें से कोई; वेणून्ू--बाँसुरियों को; वादयन्त:--बजाते हुए; ध्मान्त:--बजाते; श्रूज्ञणि--सींग का बिगुल;केचन--अन्य कोई; केचित्--कोई; भृड्ठैः-- भौंरों के साथ; प्रगायन्त:--गाते हुए; कूजन्तः--कूजते हुए; कोकिलैः --कोयलोंके साथ; परे--अन्य; विच्छायाभि:--दौड़ती परछाइयों के साथ; प्रधावन्त:--चिड़ियों के पीछे दौते हुए; गच्छन्त:--साथ साथजाते हुए; साधु--सुन्दर; हंसकैः --हंसों के साथ; बकै:--एक स्थान पर बैठे बगुलों के साथ; उपविशन्तः च--उन्हीं के समानचुपचाप बैठते हुए; नृत्यन्त: च--तथा नाचते हुए; कलापिभि: --मोरों के साथ; विकर्षन्त:--आकर्षित करते हुए; कीश-बालानू्--बन्दरों के बच्चों को; आरोहन्तः च--चढ़ते हुए; तैः--बन्दरों के साथ; द्रुमानू--वृक्षों पर; विकुर्वन्त: च--उनकीनकल करते हुए; तैः--उनके; साकम्--के साथ; प्लवन्त: च--कूदते हुए; पलाशिषु--वृक्षों पर; साकम्--साथ; भेकै: --मेंढ़कों के; विलड्डन्त:--उन्हीं की तरह कूदते हुए; सरित:--जल; स्त्रव-सम्प्लुता:--नदी के जल में भीग गये; विहसन्तः--हँसतेहुए; प्रतिच्छाया:--परछाईं पर; शपन्त:ः च--निन्दा करते हुए; प्रतिस्वनानू--अपनी प्रतिध्वनि की आवाज; इत्थम्--इस प्रकार;सताम्--अध्यात्मवादियों का; ब्रह्म-सुख-अनुभूत्या--ब्रह्म-सुख के उद्गम, कृष्ण के साथ; दास्यम्--दास्यभाव; गतानाम्ू--भक्तों का जिन्होंने स्वीकार किया है; पर-दैवतेन-- भगवान् के साथ; माया-आश्नितानाम्ू--माया के वशीभूतों के लिए; नर-दारकेण--जिन्होंने सामान्य बालक के सहृश उनके साथ; साकम्--साथ में; विजहु:-- आनन्द लूटा; कृत-पुण्य-पुझ्ला:--येसारे बालक जिन्होंने जन्म-जन्मांतर के पुण्यकर्मों के फल एकत्र कर रखे थे।
सारे बालक भिन्न भिन्न कार्यों में व्यस्त थे।
कुछ अपनी बाँसुरियाँ बजा रहे थे, कुछ सींग काबिगुल बजा रहे थे।
कुछ भौरों की गुंजार की नकल तो अन्य बालक कोयल की कुहू कुहू कीनकल कर रहे थे।
कुछ बालक उड़ती चिड़ियों की भूमि पर पड़ने वाली परछाइयों के पीछे दौड़कर उनकी नकल कर रहे थे, तो कुछ हंसों की सुन्दर गति तथा उनकी आकर्षक मुद्राओं कीनकल उतार रहे थे।
कुछ चुपचाप बगुलों के पास बैठ गये और अन्य बालक मोरों के नाच कीनकल करने लगे।
कुछ बालकों ने वृक्षों के बन्दरों को आकृष्ट किया, कुछ इन बन्दरों की नकलकरतेहुए पेड़ों पर कूदने लगे।
कुछ बन्दरों जैसा मुँह बनाने लगे और कुछ एक डाल से दूसरीडाल पर कूदने लगे।
कुछ बालक झरने के पास गये और उन्होंने मेंढ्रकों के साथ उछलते हुएनदी पार की और पानी में अपनी परछाईं देख कर वे हँसने लगे।
वे अपनी प्रतिध्वनि की आवाजकी निन््दा करते।
इस तरह सारे बालक उन कृष्ण के साथ खेला करते जो ब्रह्मज्योति में लीनहोने के इच्छुक ज्ञानियों के लिए उसके उद्गम हैं और उन भक्तों के लिए भगवान् हैं जिन्होंनेनित्यदासता स्वीकार कर रखी है किन्तु सामान्य व्यक्तियों के लिए वे ही एक सामान्य बालक हैं।
ग्वालबालों ने अनेक जन्मों के पुण्यकर्मों का फल संचित कर रखा था फलत:ः वे इस तरहभगवान् के साथ रह रहे थे।
भला उनके इस महाभाग्य का वर्णन कौन कर सकता है ?
यत्पादपांसुर्बहुजन्मकृच्छुतोधृतात्मभिर्योगिभिरप्यलभ्यः ।
स एव यदूग्विषय: स्वयं स्थितःकिं वर्ण्यते दिष्टमतो ब्रजौकसाम् ॥
१२॥
यत्--जिसके; पाद-पांसु;:--चरणकमलों की धूल; बहु-जन्म--अनेक जन्मों में; कृच्छृत:--योग, ध्यान आदि के लिए कठिनतपस्या करने से; धृत-आत्मभि:--मन को वश में रखने वालों के द्वारा; योगिभि: --ऐसे योगियों द्वारा ( ज्ञानयोगी, राजयोगी,ध्यानयोगी इत्यादि ); अपि--निस्सन्देह; अलभ्य:--प्राप्तन किया जा सकने वाली; सः--भगवान्; एव--निस्सन्देह; यत्-हक् -विषयः--साक्षात् दर्शन की वस्तु बन गया है; स्वयम्--स्वयं; स्थित:--उनके समक्ष उपस्थित; किम्--क्या; वर्ण्यते--वर्णनकिया जा सकता है; दिष्टम्ू-- भाग्य के विषय में; अत:--इसलिए; ब्रज-ओकसाम्--ब्रजभूमि वृन्दावन के वासियों के |
भले ही योगी अनेक जन्मों तक यम, नियम, आसन तथा प्राणायाम द्वारा जिनमें से कोई भीसरलता से नहीं किया जा सकता है, कठोर से कठोर तपस्या करें फिर भी समय आने पर जबइन योगियों को मन पर नियंत्रण करने की सिद्धि प्राप्त हो जाती है, तो भी वे भगवान् केचरणकमलों की धूल के एक कण तक का आस्वाद नहीं कर सकते।
तो भला ब्रजभूमिवृन्दावन के निवासियों के महाभाग्य के विषय में क्या कहा जाय जिनके साथ साथ साक्षात्भगवान् रहे और जिन्होंने उनका प्रत्यक्ष दर्शन किया ?
अथाघनामाभ्यपतन्महासुर-स्तेषां सुखक्रीडनवीक्षणाक्षम: ।
नित्यं यदन्तर्निजजीवितेप्सुभि:पीतामृतैरप्यमरैः प्रतीक्ष्यते ॥
१३॥
अथ--तत्पश्चात्; अध-नाम--अघ नामक शक्तिशाली असुर; अभ्यपतत्--उस स्थान पर प्रकट हुआ; महा-असुरः--महान,अत्यन्त शक्तिशाली असुर; तेषाम्-ग्वालबालों की; सुख-क़ीडन--दिव्य लीलाओं का आनन्द; वीक्षण-अक्षम: --देख करसहन कर पाने में अक्षम; नित्यम्--शा श्वत; यत्-अन्त:--अघासुर का अन्त; निज-जीवित-ईप्सुभि: --अघासुर द्वारा बिना सतायेहुए जीने के लिए; पीत-अमृतैः अपि-- प्रतिदिन अमृत-पान करते हुए भी; अमरैः--देवताओं द्वारा; प्रतीक्ष्यते--प्रतीक्षा की जारही थी ( देवता भी अघासुर के वध की प्रतीक्षा कर रहे थे )
हे राजा परीक्षित, तत्पश्चात् वहाँ पर एक विशाल असुर प्रकट हुआ जिसका नाम अघासुर थाऔर देवता तक जिसकी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे थे।
यद्यपि देवता प्रतिदिन अमृत-पान करते थेफिर भी वे इस महान् असुर से डरते थे और उसकी मृत्यु की प्रतीक्षा में थे।
यह असुर जंगल मेंग्वालबालों द्वारा मनाये जा रहे दिव्य आनन्द को सहन नहीं कर सका।
इृष्टार्भकान्कृष्णमुखानघासुरःकंसानुशिष्ट: स बकीबकानुज: ।
अयं तु मे सोदरनाशकृत्तयो-ईयोम॑मैनं सबल॑ हनिष्ये ॥
१४॥
इृष्ठा--देख कर; अर्भकान्--सारे ग्वालबालों को; कृष्ण-मुखान्ू--कृष्ण आदि; अघासुर: --अघासुर नामक राक्षस; कंस-अनुशिष्ट:--कंस द्वारा भेजा गया; सः--वह ( अघासुर ); बकी-बक-अनुज: --पूतना तथा बकासुर का छोटा भाई; अयम्ू--यहकृष्ण; तु--निस्सन्देह; मे--मेरा; सोदर-नाश-कृत्-- भाई तथा बहिन का मारने वाला; तयो:--अपने भाई तथा बहिन के लिए;द्वयो:--दोनों के लिए; मम--मेरा; एनम्--कृष्ण को; स-बलम्--उसके सहायक ग्वालबालों समेत; हनिष्ये--जान सेमारूँगा।
कंस द्वारा भेजा गया अघासुर पूतना तथा बकासुर का छोटा भाई था।
अतएव जब वहआया और उसने देखा कि कृष्ण सारे ग्वालबालों का मुखिया है, तो उसने सोचा, ‘इस कृष्ण नेमेरी बहन पूतना तथा मेरे भाई बकासुर का वध किया है।
अतएव इन दोनों को तुष्ट करने केलिए मैं इस कृष्ण को इसके सहायक अन्य ग्वालबालों समेत मार डालूँगा।
'एते यदा मत्सुहदोस्तिलापःकृतास्तदा नष्ट्समा ब्रजौकसः ।
प्राणे गते वर्ष्मसु का नु चिन्ताप्रजासव: प्राणभूतो हि ये ते ॥
१५॥
एते--यह कृष्ण तथा उसके संगी ग्वालबाल; यदा--जब; मत्ू-सुहृदो: --मेंरे भाई तथा बहिन का; तिल-आप: कृता:--तिलतथा जल से अन्तिम संस्कार हो; तदा--उस समय; नष्ट-समा: --प्राणविहीन; ब्रज-ओकस: --ब्रज भूमि वृन्दावन के सारेनिवासी; प्राणे-- प्राण के; गते--निकल जाने पर; वर्ष्पसु--जहाँ तक शरीर का सम्बन्ध है; का--क्या; नु--निस्सन्देह;चिन्ता--सोच-विचार; प्रजा-असवः--अपने बच्चों के लिए जिनका प्रेम अपने जीवन के प्रति प्रेम जैसा ही है; प्राण-भृतः--वेजीव; हि--निस्सन्देह; ये ते--ये सारे व्रजभूमिवासी |
अघासुर ने सोचा: यदि मैं किसी तरह कृष्ण तथा उनके संगियों को अपने भाई तथा बहिनकी दिवंगत आत्माओं के लिए तिल तथा जल की अन्तिम भेंट बना सकूँ तो व्रजभूमि के सारेवासी, जिनके लिए ये बालक प्राणों के तुल्य हैं, स्वयमेव मर जायेंगे।
यदि प्राण नहीं रहेंगे तोफिर शरीर की क्या आवश्यकता ? फलस्वरूप अपने अपने पुत्रों के मरने पर ब्रज के सारे वासीस्वतः मर जायेंगे।
इति व्यवस्यथाजगर बृहद्वपुःस योजनायाममहाद्विपीवरम् ।
धृत्वाद्भुतं व्यात्तगुह्दाननं तदापथि व्यशेत ग्रसनाशया खलः ॥
१६॥
इति--इस प्रकार; व्यवस्थ--निश्चय करके; आजगरम्---अजगर; बृहत् बपु:--अत्यन्त भारी शरीर; सः--अघासुर ने; योजन-आयाम--आठ मील भूमि घेरने वाला; महा-अद्वि-पीवरम्--विशाल पर्वत के समान मोटा; धृत्वा--रूप धारण कर; अद्भुतम्--अद्भुत; व्यात्त--फैला दिया; गुहा-आननम्--विशाल पर्वत-गुफा जैसे मुँह वाला; तदा--उस समय; पथि--रास्ते में;व्यशेत--घेर लिया; ग्रसन-आशया--सारे ग्वालबालों को निगलने की आशा से; खलः-ुष्ट |
यह निश्चय करने के बाद उस दुष्ट अघासुर ने एक विशाल अजगर का रूप धारण करलिया, जो विशाल पर्वत की तरह मोटा तथा आठ मील तक लम्बा था।
इस तरह अद्भुत अजगरका शरीर धारण करने के बाद उसने अपना मुँह पर्वत की एक बड़ी गुफा के तुल्य फैला दियाऔर रास्ते में कृष्ण तथा उनके संगी ग्वालबालों को निगल जाने की आशा से लेट गया।
धराधरोष्टो जलदोत्तरोष्टोदर्याननान्तो गिरिश्रुड्डदंष्रः ।
ध्वान्तान्तरास्यो वितताध्वजिह्ःपरुषानिलश्वासदवेक्षणोष्ण: ॥
१७॥
धरा--पृथ्वी; अधर-ओएष्ठ :--जिसका निचला होंठ; जलद-उत्तर-ओष्ठ:--जिसका ऊपरी होंठ बादलों को छू रहा था; दरी-आनन-अन्त:--जिसका मुँह पर्वत-गुफा के समान चौड़ाई में फैल गया था; गिरि- श्रूड्र-- पर्वत की चोटी के समान; दंष्ट:--दाँत; ध्वान्त-अन्तः-आस्य:--मुँह के भीतर का वायुमण्डल यथासम्भव अंधकारपूर्ण था; वितत-अध्व-जिह्ः--जिसकी जीभचौ रास्ते की भाँति थी; परुष-अनिल-श्रास--जिसकी श्वास गर्म हवा की तरह थी; दव-ईक्षण-उष्ण:--जिसकी चितवन आगकी लपटों जैसी थी।
उसका निचला होठ पृथ्वी पर था और ऊपरी होठ आकाश के बादलों को छू रहा था।
उसकेमुख की बगलें पर्वत की विशाल गुफाओं के समान थीं और मुख का मध्य भाग अत्यन्तअंधकारमय था।
उसकी जीभ चौ मार्ग के तुल्य थी, उसकी श्वास गर्म हवा जैसी थी और उसकीआँखें आग की लपटों जैसी जल रही थीं।
इृष्ठा तं ताद॒शं सर्वे मत्वा वृन्दावनश्रियम् ।
व्यात्ताजगरतुण्डेन हुप्प्रेक्षन्ते सम लीलया ॥
१८॥
इृष्ठा--देख कर; तम्--उस अघासुर को; ताहशम्--उस अव्स्था में; सर्वे--कृष्ण तथा सारे बालकों ने; मत्वा--सोचा कि;बृन्दावन-अियम्--वृन्दावन की सुन्दर मूर्ति; व्यात्त--फैला हुआ; अजगर-तुण्डेन--अजगर के मुँह जैसा; हि--निस्सनदेह;उत्प्रेक्षन्ते--मानों देख रहा हो; स्म-- भूतकाल में; लीलया--लीला के रूप में |
इस असुर का अद्भुत रूप विशाल अजगर के समान था।
इसे देख कर बालकों ने सोचाकि हो न हो यह वृन्दावन का कोई रम्य स्थल है।
तत्पश्चात् उन्होंने कल्पना की कि यह विशालअजगर के मुख के समान है।
दूसरे शब्दों में, निर्भाक बालकों ने सोचा कि विशाल अजगर रूपीयह मूर्ति उनके क्रीड़ा-आनन्द के लिए बनाई गई है।
अहो मित्राणि गदत सत्त्वकूटं पुरः स्थितम् ।
अस्मत्सड्ग्रसनव्यात्तव्यालतुण्डायते नवा ॥
१९॥
अहो--ओह; मित्राणि--सारे मित्र; गदत--हमें बताओ तो; सत्त्व-कूटमू--मृत अजगर; पुरः स्थितम्ू--पहले से पड़ा हुआ;अस्मतू--हम सबों को; सड्ग्रसन--निगलने के लिए; व्यात्त-व्याल-तुण्डा-यते--अजगर ने मुख फैला रखा है; न वा--यहतथ्य है अथवा नहीं।
बालकों ने कहा : मित्रो, क्या यह मृत है या सचमुच यह जीवित अजगर है, जिसने हम सबोंको निगलने के लिए अपना मुँह फैला रखा है? इस सन्देह को दूर करो न! सत्यमर्ककरारक्तमुत्तराहनुवद्धनम् ॥
अधराहनुवद्रोधस्तत्प्रतिच्छाययारुणम् ॥
२०॥
सत्यम्ू--यह सचमुच जीवित अजगर है; अर्क-कर-आरक्तम्ू--धूप जैसा लगने वाला; उत्तरा-हनुवत् घनम्--बादल पर ऊपरीहोंठ की तरह; अधरा-हनुवत्--निचले होंठ की तरह; रोध:--विशाल किनारा; तत्-प्रतिच्छायया--धूप के प्रतिबिम्ब से;अरुणम्ू--लाल-लाल।
तत्पश्चात् उन्होंने निश्चय किया : मित्रो, यह निश्चित रूप से हम सबों को निगल जाने के लिएयहाँ बैठा हुआ कोई पशु है।
इसका ऊपरी होंठ सूर्य की धूप से रक्तिम हुए बादल की तरह हैऔर निचला होंठ बादल की लाल-लाल परछाईं-सा लगता है।
प्रतिस्पर्थते सृक्कभ्यां सव्यासव्ये नगोदरे ।
तुड्डश्वुड्भालयोप्येतास्तदंष्टाभिश्व पश्यत ॥
२१॥
प्रतिस्पर्धते--के सदृश; सृक्कभ्याम्--मुँह की बगलें, गलफड़; सव्य-असब्ये--बाएँ-दाएँ; नग-उदरे--पर्वत की गुफाएँ; तुड्-श्रुड़ु-आलय:--उच्च पर्वत-चोटियाँ; अपि--यद्यपि ऐसा है; एता: तत्-दंष्टाभि:--पशु के दाँतों के ही सदहश; च--तथा;पश्यत--देखो न।
बाएँ तथा दाएँ दो खड्ड जैसी पर्वत-गुफाएँ दिखती हैं, वे इसकी गलफड़ें हैं और पर्वत कीऊँची चोटियाँ इसके दाँत हैं।
आस्तृतायाममार्गोयं रसनां प्रतिगर्जति ।
एपां अन्तर्गतं ध्वान्तमेतदप्यन्तराननम् ॥
२२॥
आस्तृत-आयाम--लम्बाई तथा चौड़ाई; मार्ग: अयम्ू--चौड़ा रास्ता; रसनाम्--जीभ; प्रतिगर्जति--के सहश है; एषाम् अन्तः-गतम्--पर्वतों के भीतर; ध्वान्तमू--अँधेरा; एतत्--यह; अपि--निस्सन्देह; अन्तः-आननमू--मुँह के भीतर
इस पशु की जीभ की लम्बाई-चौड़ाई चौ मार्ग जैसी है और इसके मुख का भीतरी भागअत्यन्त अंधकारमय है मानो पर्वत के भीतर की गुफा हो।
दावोष्णखरवातोअयं श्रासवद्धाति पश्यत ।
तदग्धसत्त्वदुर्गन््धोप्यन्तरामिषगन्धवत् ॥
२३॥
दाव-उष्ण-खर-वातः अयम्--अग्नि के समान गर्म श्वास बाहर निकल रही है; श्वास-वत् भाति पश्यत--देखो न उसकी श्वास केसहश है; तत्-दग्ध-सत्त्वत--जलते अस्थिपंजरों की; दुर्गन््ध:--बुरी महक; अपि--निस्सन्देह; अन्त:-आमिष-गन्ध-वत्--मानोंभीतर से आ रही मांस की दुर्गध हो |
यह अग्नि जैसी गर्म हवा उसके मुँह से निकली हुई श्वास है, जिससे जलते हुए मांस कीदुर्गध आ रही है क्योंकि उसने बहुत शव खा रखे हैं।
अस्मान्किमत्र ग्रसिता निविष्टा-नयं तथा चेद्गकवद्विनडक्ष्यति ।
क्षणादनेनेति बकार्युशन्मुखंवीक्ष्योद्धसन्त: करताडनैर्ययु: ॥
२४॥
अस्मान्ू--हम सबों को; किम्--क्या; अत्र--यहाँ; ग्रसिता--निगल जायेगा; निविष्टानू--प्रवेश करने का प्रयत्न करने वाले;अयमू--यह पशु; तथा--अत: ; चेत्--यदि; बक-वत्--बकासुर के समान; विनड्छि्यति--विनष्ट कर दिया जायेगा; क्षणात्--तुरन्त; अनेन--इस कृष्ण के द्वारा; इति--इस प्रकार; बक-अरि-उशत्-मुखम्--बकासुर के शत्रु कृष्ण के सुन्दर मुखमंडल को;वीक्ष्य--देखकर; उद्धसन्त:ः--जोर से हँसते हुए; कर-ताडनैः--ताली बजा-बजा कर; ययु:--मुँह के भीतर चले गये |
तब बालकों ने कहा, ‘क्या यह प्राणी हम लोगों को निगलने आया है? यदि वह निगलेगातो तुरन्त ही बकासुर की भाँति मार डाला जायेगा।
इस तरह उन्होंने बकासुर के शत्रु कृष्ण केसुन्दर मुख की ओर निहारा और ताली बजा कर जोर-जोर से हँसते हुए वे अजगर के मुँह मेंप्रविष्ट हो गये।
इत्थं मिथोउतथ्यमतज्ज्ञभाषितंश्रुत्वा विचिन्त्येत्यमृषा मृषायते ।
रक्षो विदित्वाखिलभूतहत्स्थितःस्वानां निरोद्धुं भगवान्मनो दधे ॥
२५॥
इत्थम्ू--इस प्रकार; मिथ:--अथवा दूसरा; अतथ्यम्--जो तथ्य नहीं है, ऐसा विषय; अ-तत्ू-ज्ञ--बिना जाने; भाषितमू--जबवे बातें कर रहे थे; श्रुत्वा--कृष्ण ने सुन कर; विचिन्त्य--सोच कर; इति--इस प्रकार; अमृषा--सचमुच; मृषायते--जो झूठालग रहा था ( वस्तुतः वह पशु अघासुर था किन्तु अल्प-ज्ञान के कारण वे उसे मृत अजगर समझ रहे थे ); रक्ष:--( किन्तु कृष्णसमझ गये थे कि ) वह असुर है; विदित्वा--जान कर; अखिल-भूत-हत्-स्थित: --अन्तर्यामी अर्थात् हर एक के हृदय में स्थितहोने के कारण; स्वानाम्ू--अपने संगियों का; निरोद्धुम्--उन्हें मना करने के लिए; भगवान्-- भगवान् ने; मनः दधे--संकल्पकिया।
हर व्यक्ति के हृदय में स्थित अन्तर्यामी परमात्मा भगवान् श्रीकृष्ण ने बालकों को परस्परनकली अजगर के विषय में बातें करते सुना।
वे नहीं जानते थे कि यह वास्तव में अघासुर था,जो अजगर के रूप में प्रकट हुआ था।
यह जानते हुए कृष्ण अपने मित्रों को असुर के मुख मेंप्रवेश करने से रोकना चाहते थे।
तावत्प्रविष्टास्त्वसुरोदरान्तरंपर न गीर्णा: शिशव: सवत्सा: ।
प्रतीक्षमाणेन बकारिवेशनंहतस्वकान्तस्मरणेन रक्षसा ॥
२६॥
तावत्--तब तक; प्रविष्टा:--सभी बालक घुस गये; तु--निस्सन्देह; असुर-उदर-अन्तरम्--उस असुर के पेट के भीतर; परम्--लेकिन; न गीर्णा:--निगले नहीं जा सके; शिशवः--सारे बालक; स-वत्सा:--अपने अपने बछड़ों समेत; प्रतीक्षमाणेन--प्रतीक्षारत; बक-अरि--बकासुर के शत्रु का; वेशनम्--प्रवेश; हत-स्व-कान्त-स्मरणेन--वह असुर अपने मृत सम्बन्धियों केबारे में सोच रहा था और तब तक संतुष्ट नहीं होगा जब तक कृष्ण मर न जाय; रक्षसा--असुर द्वारा
जब तक कि कृष्ण सारे बालकों को रोकने के बारे में सोचें, तब तक वे सभी असुर केमुख में घुस गये।
किन्तु उस असुर ने उन्हें निगला नहीं क्योंकि वह कृष्ण द्वारा मारे गये अपने सम्बन्धियों के विषय में सोच रहा था और अपने मुख में कृष्ण के घुसने की प्रतीक्षा कर रहा था।
तान्वीक्ष्य कृष्ण: सकलाभयप्रदोहानन्यनाथान्स्वकरादवच्युतान् ।
दीनांश्व मृत्योर्जठराग्निघासान्घृणार्दितो दिष्टकृतेन विस्मित: ॥
२७॥
तान्ू--उन बालकों को; वीक्ष्य--देखकर; कृष्ण:-- भगवान् कृष्ण; सकल-अभय-प्रदः--जो सबों को अभय प्रदान करने वालेहैं; हि--निस्सन्देह; अनन्य-नाथान्ू--विशेषतया उन ग्वालबालों के लिए जो कृष्ण के अतिरिक्त और किसी को नहीं जानते थे;स्व-करात्--अपने हाथ से; अवच्युतान्-गये हुए; दीनान् च--तथा असहाय; मृत्यो: जठर-अग्नि-घासानू--जो अघासुर के पेटकी अग्नि में तिनकों की तरह प्रविष्ट हो चुके थे और जो असुर बहुत दिलेर और साक्षात् मृत्यु की तरह भूखा था ( विशाल शरीरधारण करने से असुर काफी भूखा रहा होगा ); घृणा-अर्दित:--अहैतुकी कृपा के कारण दयालु; दिष्ट-कृतेन-- भगवान् कीअन्तरंगा शक्ति से नियोजित वस्तुओं द्वारा; विस्मित:--वे भी क्षण-भर के लिए आश्चर्यचकित थे।
कृष्ण ने देखा कि सारे ग्वालबाल, जो उन्हें ही अपना सर्वस्व मानते थे, उनके हाथ सेनिकल कर साक्षात् मृत्यु रूपी अघासुर के उदर की अग्नि में तिनकों जैसे प्रविष्ट हो जाने सेअसहाय हैं।
कृष्ण के लिए अपने इन ग्वालबाल मित्रों से विलग होना असहा था।
अतएव यहदेखते हुए कि यह सब उनकी अन्तरंगा शक्ति द्वारा नियोजित किया प्रतीत होता है, कृष्णआश्चर्यचकित हो उठे और निश्चय न कर पाये कि क्या किया जाय।
कृत्यं किमत्रास्य खलस्य जीवनन वा अमीषां च सतां विहिंसनम् ।
द्वयं कथं स्थादिति संविचिन्त्यज्ञात्वाविशत्तुण्डमशेषहग्घरि: ॥
२८॥
कृत्यम् किम्--क्या किया जाय; अत्र--इस दशा में; अस्य खलस्य--इस ईर्ष्यालु असुर का; जीवनम्--जीवन; न--नहीं;वा--अथवा; अमीषाम् च--तथा निर्दोषों का; सताम्-भक्तों का; विहिंसनम्--मृत्यु; दयम्-दोनों कार्य ( असुर वध तथाबालकों की रक्षा ); कथम्--कैसे; स्थात्ू--सम्भव हो सकता है; इति संविचिन्त्य--इस विषय के बारे में भलीभाँति सोच कर;ज्ञात्वा--और यह निश्चय करके कि क्या करना है; अविशतू--घुस गये; तुण्डम्--असुर के मुख में; अशेष-हक् हरिः--कृष्ण,जो अपनी असीम शक्ति से भूत, वर्तमान तथा भविष्य को जान सकते हैं|
अब क्या करना होगा ? इस असुर का वध और भक्तों का बचाव--एकसाथ दोनों को किसतरह सम्पन्न किया जाय ? असीम शक्तिशाली होने से कृष्ण ने ऐसी बुद्धिगम्य युक्ति निकल आनेतक प्रतीक्षा करने का निश्चय किया जिसके द्वारा वे बालकों को बचाने के साथ साथ उस असुरका वध भी कर सकें।
तत्पश्चात् वे अघासुर के मुख में घुस गये।
तदा घनच्छदा देवा भयाद्धाहेति चुक्रुशु: ।
जहृषुर्यें च कंसाद्या: कौणपास्त्वघबान्धवा: ॥
२९॥
तदा--उस समय; घन-छदा:--बादलों के पीछे; देवा:--सारे देवता; भयात्--असुर के मुँह में कृष्ण के घुस जाने से डर कर;हा-हा--हाय, हाय; इति--इस प्रकार; चुक्रुशु:--पुकारने लगे; जहषु:--प्रसन्न हुए; ये--जो; च-- भी; कंस-आद्या: --कंसतथा अन्य लोग; कौणपा:--असुरगण; तु--निस्सन्देह; अघ-बान्धवा:--अघासुर के मित्र |
जब कृष्ण अघासुर के मुख में घुस गये तो बादलों के पीछे छिपे देवतागण हाय हाय करनेलगे।
किन्तु अघासुर के मित्र, यथा कंस तथा अन्य असुरगण अत्यन्त हर्षित थे।
तच्छुत्वा भगवान्कृष्णस्त्वव्ययः सार्भवत्सकम् ।
चूर्णीचिकीर्षोरात्मानं तरसा ववृधे गले ॥
३०॥
तत्--वह हाय हाय की पुकार; श्रुत्वा--सुन कर; भगवानू्-- भगवान्; कृष्ण:--कृष्ण; तु--निस्सन्देह; अव्यय:--कभी विनष्टन होने वाले; स-अर्भ-वत्सकम्-ग्वालबालों तथा बछड़ों समेत; चूर्णी-चिकीर्षो:--उस राक्षस का जो उन्हें अपने पेट के भीतरचूर्ण कर देना चाहता था; आत्मानम्--स्वयं; तरसा--जल्दी से; बवृधे--; गले--तत्--वह हाय हाय की पुकार; श्रुत्वा--सुन कर; भगवान्-- भगवान्; कृष्ण:--कृष्ण; तु--निस्सन्देह; अव्ययः--कभी विनष्टन होने वाले; स-अर्भ-वत्सकम्-ग्वालबालों तथा बछड़ों समेत; चूर्णी-चिकीर्षो:--उस राक्षस का जो उन्हें अपने पेट के भीतरचूर्ण कर देना चाहता था; आत्मानम्--स्वयं; तरसा--जल्दी से; विवृधे--बढ़ा लिया; गले--गले के भीतर।
जब अजेय भगवान् कृष्ण ने देवताओं को बादलों के पीछे से हाय हाय पुकारते सुना तोतुरन्त ही उन्होंने स्वयं तथा अपने संगी ग्वालबालों को असुर से बचाने के लिए, जिन्हें वह चूर्ण-चूर्ण कर देना चाहता था, उसके गले के भीतर अपना विस्तार कर लिया।
ततोतिकायस्य निरुद्धमार्गिणोझुदगीर्णइष्टे्रमतस्त्वितस्ततः ।
पूर्णोउन्तरड़े पवनो निरुद्धोमूर्धन्विनिर्भिद्य विनिर्गतो बहि: ॥
३१॥
ततः--तत्पश्चात्, असुर के गले में शरीर बढ़ा कर मारने के बाद; अति-कायस्य--विशाल शरीर वाले असुर का; निरुद्ध-मार्गिण:--दम घुट जाने से, सारे निकास मार्ग रुकने से; हि उद्गीर्ण-दृष्टे:--आँखें बाहर निकल आई हुईं; भ्रमतः तु इतः ततः--पुतलियाँ या प्राणवायु इधर-उधर चलती हुईं; पूर्ण:--पूरी तरह मरा; अन्त:-अड्जे--शरीर के भीतर; पवन:--प्राणवायु;निरुद्ध:--रुका हुआ; मूर्थन्ू--सिर के ऊपर का छेद; विनिर्भिद्य--तोड़ कर; विनिर्गतः--निकल गया; बहि:--बाहर
चूँकि कृष्ण ने अपने शरीर का आकार बढ़ा दिया था इसलिए असुर ने अपने शरीर कोकाफी बड़ा कर लिया।
फिर भी उसकी श्वास रुक गईं उसका दम घुट गया और उसकी आँखेंइधर-उधर भटकने लगीं तथा बाहर निकल आईं।
किन्तु असुर के प्राण किसी भी छेद से निकलनहीं पा रहे थे अतः अन्त में उसके सिर के ऊपरी छेद से बाहर फूट पड़े।
तेनैव सर्वेषु बहिर्गतेषुप्राणेषु वत्सान्सुहरद: परेतान् ।
इृष्टया स्वयोत्थाप्य तदन्वितः पुन-वक्त्रान्मुकुन्दों भगवान्विनिर्ययां ॥
३२॥
तेन एव--उसी ब्रह्मरन्श्व अर्थात् सिर के ऊपरी छेद से; सर्वेषु--शरीर के भीतर की सारी वायु; बहिः गतेषु--बाहर जाने से;प्राणेषु--प्राणों के; वत्सानू--बछड़े; सुहृद:--ग्वालबाल मित्र; परेतानू--जो भीतर मर चुके थे; दृष्टया स्वया--कृष्ण कीचितवन से; उत्थाप्य--पुनः जीवित करके; तत्-अन्बित:--उनके साथ; पुनः--फिर; वक्त्रात्ू--मुख से; मुकुन्दः--भगवान्;भगवानू--कृष्ण; विनिर्ययौ--बाहर आ गये।
जब उस असुर के सिर के ऊपरी छेद से सारी प्राणवायु निकल गई तो कृष्ण ने मृत बछड़ोंतथा ग्वालबालों पर अपनी दृष्टि फेर कर उन्हें फिर से जीवित कर दिया।
तब मुकुन्द जो किसीको भी मुक्ति दे सकते हैं अपने मित्रों तथा बछड़ों समेत उस असुर के मुख से बाहर आ गये।
पीनाहिभोगोत्थितमद्भुतं मह-ज्योतिः स्वधाम्ना ज्वलयदिशो दश ।
प्रतीक्ष्य खेउवस्थितमीशनिर्गमंविवेश तस्मिन्मिषतां दिवौकसाम् ॥
३३॥
पीन--अत्यन्त विशाल; अहि-भोग-उत्थितम्-- भौतिक भोग के लिए बने सर्प के शरीर के निकलने वाली; अद्भुतम्--विचित्र;महत्--महान्; ज्योति:--तेज; स्व-धाम्ना--अपने प्रकाश से; ज्वलयत्--चमकाता हुआ; दिशः दश--दशों दिशाएँ; प्रतीक्ष्य--प्रतीक्षा करके; खे--आकाश में; अवस्थितम्--स्थित; ईश-निर्गमम्--भगवान् के बाहर आने तक; विवेश--प्रवेश किया;तस्मिन्ू--कृष्ण के शरीर में; मिषताम्--देखते देखते; दिवौकसाम्-देवताओं के |
उस विराट अजगर के शरीर से सारी दिशाओं को प्रकाशित करता हुआ एक प्रकाशमानतेज निकला और आकाश में अकेले तब तक रुका रहा जब तक कृष्ण उस शव के मुख सेबाहर नहीं आ गये।
तत्पश्चात् सारे देवताओं ने इस तेज को कृष्ण के शरीर में प्रवेश करते देखा।
ततोतिहष्ठा: स्वकृतोकृताईणंपुष्पै: सुगा अप्सरसश्र नर्तनेः ।
गीतैः सुरा वाद्यधराश्च वाद्यकै:स्तवैश्व विप्रा जयनिःस्वनैर्गणा: ॥
३४॥
ततः--तत्पश्चात्; अति-हष्टा:--अत्यन्त प्रसन्न; स्व-कृत:--अपना अपना कार्य; अकृत--पूरा किया; अर्हणम्-- भगवान् कीपूजा रूप में; पुष्पै:--नन्दन कानन में उगे फूलों की वर्षा से; सु-गाः--दैवी गायक; अप्सरस: च--देवलोक की नर्तकियाँ;नर्तनीः--नाच से; गीतैः--देवलोक के गीत गाने से; सुरा:--सारे देवता; वाद्य-धरा: च--तथा ढोल बजाने वाले; वाद्यकैः --बाजा बजा करके; स्तवैः च--तथा स्तुतियों द्वारा; विप्रा:--ब्राह्मणणण; जय-निःस्वनै:-- भगवान् की महिमा गायन से;गणाः--हर कोई
तत्पश्चात् हर एक के प्रसन्न होने पर देवता लोग नन्दन कानन से फूल बरसाने लगे, अप्सराएँनाचने लगीं और गायन के लिए प्रसिद्ध गन्धर्वगण स्तुति गाने लगे।
ढोलकिये दुन्दुभी बजाने लगेतथा ब्राह्मण वैदिक स्तुतियाँ करने लगे।
इस प्रकार स्वर्ग तथा पृथ्वी दोनों पर हर व्यक्ति भगवान्की महिमा का गायन करते हुए अपना अपना कार्य करने लगा।
तदद्भुतस्तोत्रसुवाद्यगीतिका-जयादिनैकोत्सवमड्रलस्वनान् ।
श्रुत्वा स्वधाम्नोउन्त्यज आगतोचिराद्इृष्ठा महीशस्य जगाम विस्मयम् ॥
३५॥
तत्--उस ( स्वर्गलोक में देवताओं द्वारा मनाया गया उत्सव ); अद्भुत--विचित्र; स्तोत्र--स्तुति; सु-वाद्य--अच्छे अच्छे बाजे;गीतिका--दैवी गीत; जय-आदि--जयजयकार इत्यादि; न-एक-उत्सव-- भगवान् के गुणगान के लिए ही उत्सव; मड्गल-स्वनान्ू--हर एक के लिए शुभ दिव्य ध्वनियाँ; श्रुत्वा--ऐसी ध्वनि सुन कर; स्व-धाम्न:--अपने धाम से; अन्ति--पास ही;अजः--ब्रह्म; आगत:ः--वहाँ आ गये; अचिरातू--तुरन्त; हृघ्ला--देखकर; महि--गुणगान; ईशस्य--कृष्ण का; जगामविस्मयम्ू--विस्मित हो गये |
जब भगवान् ब्रह्म ने अपने लोक के निकट ही ऐसा अद्भुत उत्सव होते सुना, जिसके साथसाथ संगीत, गीत तथा जयजयकार हो रहा था, तो वे तुरन्त उस उत्सव को देखने चले आये।
कृष्ण का ऐसा गुणगान देखकर वे अत्यन्त विस्मित थे।
राजन्नाजगरं चर्म शुष्क वृन्दावनेद्धुतम् ।
ब्रजौकसां बहुतिथं बभूवाक्रीडगहरम् ॥
३६॥
राजन्--हे महाराज परीक्षित; आजगरम् चर्म--अघासुर का शुष्क शरीर जो बड़े चमड़े के रूप में बचा था; शुष्कम्--सूखा;बृन्दावने अद्भुतम्--वृन्दावन में विचित्र अजायबघर की तरह; ब्रज-ओकसाम्--व्रजभूमि के निवासियों के लिए; बहु-तिथम्--काफी दिनों तक; बभूव--बन गया; आक्रीड--क्रीड़ा स्थल; गहरम्-गुफा हे
राजा परीक्षित, जब अघासुर का अजगर के आकार का शरीर सूख कर विशाल चमड़ाबन गया तो यह वृन्दावनवासियों के देखने जाने के लिए अद्भुत स्थान बन गया और ऐसा बहुतसमय तक बना रहा।
एतत्कौमारजं कर्म हरेरात्माहिमोक्षणम् ।
मृत्यो: पौगण्डके बाला दृष्टोचुर्विस्मिता ब्रजे ॥
३७॥
एतत्--अघासुर तथा कृष्ण के संगियों के उद्धार की यह घटना; कौमार-जम् कर्म--कौमार ( ५ वर्ष की ) अवस्था में सम्पन्न;हरेः-- भगवान् की; आत्म--भक्तजन भगवान् की आत्मा हैं; अहि-मोक्षणम्-- उनका मोक्ष तथा अजगर का मोक्ष; मृत्यो: --जन्म-मरण के मार्ग से; पौगण्डके--पौगण्ड अवस्था में ( जो ५ वर्ष के एक वर्ष बाद शुरू होती है ); बाला:--सारे बालक;इृष्ठा ऊचु:--एक वर्ष बाद यह बात प्रकट की; विस्मिता:--मानो उसी दिन की घटना हो; ब्रजे-- वृन्दावन में
स्वयं तथा अपने साथियों को मृत्यु से बचाने तथा अजगर रूप अघासुर को मोक्ष देने कीघटना तब घटी जब कृष्ण पाँच वर्ष के थे।
इसका उद्घाटन ब्रजभूमि में एक वर्ष बाद हुआ मानोयह उसी दिन की घटना हो।
नैतद्विचित्र॑ं मनुजार्भभायिन:परावराणां परमस्य वेधस: ।
अघोडपि यत्स्पर्शनधौतपातकःप्रापात्मसाम्यं त्वसतां सुदुर्लभम् ॥
३८॥
न--नहीं; एतत्--यह; विचित्रम्-- अद्भुत है; मनुज-अर्भ-मायिन:--कृष्ण के लिए जो नन््द तथा यशोदा पर दयालु होने केकारण उनके पुत्र रूप में प्रकट हुए; पर-अवराणाम्--समस्त कार्यो तथा कारणों का; परमस्य वेधस:--परम स्त्रष्टा का; अघःअपि--अघासुर भी; यत््-स्पर्शन--जिनके स्पर्श मात्र से; धौत-पातक:--संसार के सारे कल्मषों से मुक्त हो गया; प्राप--प्राप्तकिया; आत्म-साम्यम्--नारायण जैसा शरीर; तु--लेकिन; असताम् सुदुर्लभम्--जो कलुषित आत्माओं के लिए संभव नहीं है
किन्तु भगवान् की दया से सबकुछ संभव हो सकता है।
कृष्ण समस्त कारणों के कारण हैं।
भौतिक जगत--उच्च तथा निम्न जगत--के कार्य-कारण आदि नियन्ता भगवान् द्वारा ही सृजित होते हैं।
जब कृष्ण नन््द महाराज तथा यशोदा केपुत्र रूप में प्रकट हुए तो उन्होंने अपनी अहैतुकी कृपा से ऐसा किया।
अतः उनके लिए अपनेअसीम ऐश्वर्य का प्रदर्शन कोई विचित्र बात न थी।
हाँ, उन्होंने ऐसी महती कृपा प्रदर्शित की किसर्वाधिक पापी दुष्ट अघासुर भी ऊपर उठ गया और उनके संगियों में से एक बन गया और उसनेसारूप्य मुक्ति प्राप्त की जो वस्तुतः भौतिक कलाुषों से युक्त पुरुषों के लिए प्राप्त कर पानाअसम्भव है।
सकृद्यदड़प्रतिमान्तराहितामनोमयी भागवतीं ददौ गतिम् ।
स एव नित्यात्मसुखानु भूत्यभि-व्युदस्तमायोउन्तर्गतो हि कि पुनः: ॥
३९॥
सकृत्ू--केवल एक बार; यत्--जिसका; अड्गभ-प्रतिमा-- भगवान् का स्वरूप ( वैसे रूप अनेक हैं किन्तु कृष्ण आदि रूप है );अन्तः-आहिता--अपने अन्तर में रखते हुए; मनः-मयी--बलपूर्वक उनका चिन्तन करते हुए; भागवतीम्--जो भगवान् की भक्तिप्रदान करने में सक्षम है; ददौ--कृष्ण ने प्रदान किया; गतिम्--सर्वोत्तम स्थान; सः--वे ( भगवान् ); एब--निस्सन्देह; नित्य--सदैव; आत्म--सारे जीवों का; सुख-अनुभूति--उनके चिन्तन मात्र से दिव्य आनन्द प्राप्त होता है; अभिव्युदस्त-माय:--क्योंकिवे सारे मोह को दूर कर देते हैं; अन्त:-गतः--हृदय के भीतर सदैव स्थित रहने वाले; हि--निस्सन्देह; किम् पुन:--क्या कहाजाय।
यदि कोई केवल एक बार या बलपूर्वक भी अपने मन में भगवान् के स्वरूप को लाता है,तो उसे कृष्ण की दया से परम मोक्ष प्राप्त हो सकता है, जिस प्रकार अघासुर को प्राप्त हुआ।
तोफिर उन लोगों के विषय में क्या कहा जाय जिनके हृदयों में भगवान् अवतार लेकर प्रविष्ट होतेहैं अथवा उनका जो सदैव भगवान् के चरणकमलों का ही चिन्तन करते रहते हैं, जो सारे जीवोंके लिए दिव्य आनन्द के स्रोत हैं और जो सारे मोह को पूरी तरह हटा देते हैं ?
श्रीसूत उबाचइत्थं द्विजा यादवदेवदत्त:श्र॒त्वा स्वरातुश्चरितं विचित्रम् ।
पप्रच्छ भूयोपि तदेव पुण्यंवैयासकिं यन्निगृहीतचेता: ॥
४०॥
श्री-सूतः उवाच-- श्री सूत गोस्वामी ने नैमिषारण्य में एकत्र सन््तों से कहा; इत्थम्--इस प्रकार; द्विजा:--हे विद्वान ब्राह्मणो;यादव-देव-दत्त:--महाराज परीक्षित ( या युधिष्टिर ) जिसकी रक्षा यादवदेव कृष्ण ने की थी; श्रुत्वा--सुन कर; स्व-रातु:--माता के गर्भ में अपने रक्षक कृष्ण का; चरितमू--कार्यकलाप; बिचित्रमू--अत्यन्त अद्भुत; पप्रच्छ--पूछा; भूयः अपि--पुनःपुनः; तत् एब--ऐसे कार्यकलाप; पुण्यम्--पुण्यकर्मो से पूर्ण ( श्रण्वतां स्वकथा: कृष्ण: पुण्यश्रवणकीर्तन:, कृष्ण का श्रवणकरना सदैव पुण्य है ); वैधयासकिम्--शुकदेव गोस्वामी को; यत्--क्योंकि; निगृहीत-चेता:--परीक्षित महाराज पहले ही कृष्णका स्थिर मन से श्रवण कर रहे थे
श्री सूत गोस्वामी ने कहा : हे विद्वान सन््तो, श्रीकृष्ण की बाल्यकाल की लीलाएँ अत्यन्तअदभुत हैं।
महाराज परीक्षित अपनी माता के गर्भ में उन्हें बचाने वाले कृष्ण की उन लीलाओं के विषय में सुन कर स्थिरचित्त हो गये और उन्होंने शुकदेव गोस्वामी से फिर कहा कि वे उन पुण्यलीलाओं को सुनायें।
श्रीराजोबाचब्रह्मन्कालान्तरकृतं तत्कालीन कथ्थ॑ं भवेत् ।
यत्कौमारे हरिकृतं जगु: पौगण्डकेर्भका: ॥
४१॥
श्री-राजा उबाच--महाराज परीक्षित ने पूछा; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण ( शुकदेव गोस्वामी ); काल-अन्तर-कृतम्-- भूतकाल में भिन्नअवस्था में ( कौमार अवस्था ) किये गये कर्म; तत्ू-कालीनम्--उसे अब घटित होते वर्णन किया ( पौगण्ड अवस्था में ); कथम्भवेत्--यह कैसे हो सकता है; यत्--जो लीला; कौमारे--कौमार अवस्था में; हरि-कृतम्--कृष्ण द्वारा की गई; जगुः--वर्णनकिया; पौगण्डके--पौगण्ड अवस्था में ( एक वर्ष बाद ); अर्भकाः--सारे बालकों ने
महाराज परीक्षित ने पूछा: हे मुनि, भूतकाल में घटित इन घटनाओं को वर्तमान में घटितहोते क्यों वर्णन किया गया है? भगवान् कृष्ण ने अघासुर को मारने का कार्य तो अपनीकौमारावस्था में सम्पन्न किया था।
तो फिर बालकों ने, उनकी पौगण्ड अवस्था में, इस घटना कोअभी घटित क्यों बतलाया ?
तटूहि मे महायोगिन्परं कौतूहलं गुरो ।
नूनमेतद्धरेरेव माया भवति नान्यथा ॥
४२॥
तत् ब्रृहि--अतः आप बतलायें; मे--मुझको; महा-योगिन्--हे महान् योगी; परम्--अत्यन्त; कौतूहलम्--उत्सुकता; गुरो--हेगुरु; नूनमू-- अन्यथा; एतत्--यह घटना; हरेः--भगवान् की; एव--निस्सन्देह; माया--माया; भवति--है; न अन्यथा-- औरकुछ नहीं
हे महायोगी, मेरे आध्यात्मिक गुरु, कृपा करके बतलायें कि यह कैसे हुआ ? मैं यह जाननेके लिए परम उत्सुक हूँ।
मैं सोचता हूँ कि यह कृष्ण की अन्य माया के अतिरिक्त और कुछ नथा।
बयं धन्यतमा लोके गुरोउपि क्षत्रबन्धव: ।
वयं पिबामो मुहुस्त्वत्त: पुण्यं कृष्णकथामृतम् ॥
४३॥
वयम्--हम हैं; धन्य-तमाः--सर्वाधिक धन्य; लोके--इस जगत में; गुरो--हे प्रभु, हे मेरे आध्यात्मिक गुरु; अपि--यद्यपि;क्षत्र-बन्धवः--क्षत्रियों में निम्नतम ( क्योंकि हमने क्षत्रियों जैसा कार्य नहीं किया ); वयम्--हम है; पिबाम:--पी रहे हैं; मुहुः--सदैव; त्वत्त:--तुमसे; पुण्यम्--पवित्र; कृष्ण-कथा-अमृतम्--कृष्ण-कथा का अमृत
हे प्रभु, हे मेरे आध्यात्मिक गुरु, यद्यपि हम क्षत्रियों में निम्नतम हैं, फिर भी हमारा अहोभाग्यहै कि हम लाभान्वित हुए हैं क्योंकि हमें आपसे भगवान् के अमृतमय पवित्र कार्यकलापों कानिरन्तर श्रवण करते रहने का अवसर प्राप्त हुआ है।
श्रीसूत उबाचइत्थं सम पृष्ठ: स तु बादरायणि-स्तत्स्मारितानन्तहताखिलेन्द्रिय: ।
कृच्छात्पुनर्लब्धबहिर्दशिः शनेःप्रत्याह तं भागवतोत्तमोत्तम ॥
४४॥
श्री-सूतः उबाच-- श्री सूत गोस्वामी ने कहा; इत्थम्--इस प्रकार; स्म-- भूतकाल में; पृष्ट:--पूछे जाने पर; सः--उसने; तु--निस्सन्देह; बादरायणि: --शुकदेव गोस्वामी; तत्--उनसे ( शुकदेव गोस्वामी से ); स्मारित-अनन्त--कृष्ण का स्मरण किये जाते ही; हत-- भाव में लीन; अखिल-इन्द्रियः--बाह्यम इन्द्रियों के सारे कार्य; कृच्छात्--बड़ी मुश्किल से; पुन:--फिर; लब्ध-बहिः-इहशिः--बाह्य अनुभूति के जागृत होने पर; शनै:--धीरे धीरे; प्रत्याह--उत्तर दिया; तम्--महाराज परीक्षित को; भागवत-उत्तम-उत्तम--हे महान् सन््त-पुरुष, समस्त भक्तों में श्रेष्ठ ( शौनक )॥
सूत गोस्वामी ने कहा, ‘'हे सन््तों तथा भक्तों में सर्वश्रेष्ठ शौनक, जब महाराज परीक्षित नेशुकदेव गोस्वामी से इस तरह पूछा तो तुरन्त अपने अन्तःकरण में कृष्ण-लीलाओं का स्मरणकरते हुए अपनी इन्द्रियों के कार्यों से उनका बाह्य सम्पर्क टूट गया।
तत्पश्चात् बड़ी मुश्किल सेउनकी बाह्य चेतना वापस आयी और वे कृष्ण-कथा के विषय में महाराज परीक्षित से बातें करनेलगे।
