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अध्याय ग्यारह: कृष्ण की बचपन की लीलाएँ
10.11श्रीशुक उवाचगोपा नन्दादय: श्रुत्वा द्रुमयो: पततो रवम् ।
तत्राजग्मुः कुरु श्रेष्ठ निर्धाभभयशड्ता: ॥
१॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; गोपा:--सारे ग्वाले; नन्द-आदय:--नन्द महाराज इत्यादि; श्रुत्वा--सुन कर;ब्रुमयो:--दोनों वृक्षों के; पततो:--गिरने की; रवम्--तेज आवाज, वज्पात जैसी; तत्र--वहाँ, उस स्थान पर; आजग्मु:--गये;कुरु-श्रेष्ठ--हे महाराज परीक्षित; निर्घात-भय-शह्लिता:--वज़पात होने से भयभीत।
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : हे महाराज परीक्षित, जब यमलार्जुन वृक्ष गिर पड़े तोआसपास के सारे ग्वाले भयानक शब्द सुन कर वज़्पात की आशंका से उस स्थान पर गये।
भूम्यां निपतितौ तत्र दहशुर्यमलार्जुनौ ।
बश्रमुस्तदविज्ञाय लक्ष्यं पतनकारणम् ॥
२॥
भूम्यामू-- भूमि पर; निपतितौ--गिरे हुए; तत्र--वहाँ; दहशु:--सबों ने देखा; यमल-अर्जुनौ--अर्जुन वृक्ष के जोड़े को;बश्रमु:ः--मोहग्रस्त हो गये; तत्ू--वह; अविज्ञाय--पता न लगा सके; लक्ष्यम्--यह देखते हुए भी कि वृक्ष गिरे हैं; पतन-'कारणम्--गिरने का कारण ( सहसा ऐसा कैसे हुआ ? )
वहाँ उन सबों ने यमलार्जुन वृक्षों को जमीन पर गिरे हुए तो देखा किन्तु वे विमोहित थेक्योंकि वे आँखों के सामने वृक्षों को गिरे हुए तो देख रहे थे किन्तु उनके गिरने के कारण कापता नहीं लगा पा रहे थे।
उलूखलं विकर्षन्तं दाम्ना बद्धं च बालकम् ।
कस्येदं कुत आश्वर्यमुत्पात इति कातरा: ॥
३॥
उलूखलम्--ओखली को; विकर्षन्तम्-खींचते हुए; दाम्ना--रस्सी से; बद्धम् च--तथा उदर से बँधी; बालकम्--कृष्ण को;'कस्य--किसका; इृदम्--यह; कुतः--कहाँ से; आश्चर्यम्-ये अद्भुत घटनाएँ; उत्पात:--उपद्रव; इति--इस प्रकार;'कातरा: --अत्यधिक क्षुब्धकृष्ण रस्सी द्वारा ओखली से बंधे थे जिसे वे खींच रहे थे।
किन्तु उन्होंने वृक्षों को किस तरहगिरा लिया ? वास्तव में किसने यह किया ? इस घटना का स्त्रोत कहाँ है ? इन आश्चर्यजनक बातोंको सोच सोच कर सारे ग्वाले सशंकित तथा मोहग्रस्त थे।
बाला ऊचुरनेनेति तिर्यग्गतमुलूखलम् ।
विकर्षता मध्यगेन पुरुषावप्यचक्ष्महि ॥
४॥
बाला:--सारे बालकों ने; ऊचु:--कहा; अनेन--उसके ( कृष्ण ) द्वारा; इति--इस प्रकार; तिर्यक् --टेढ़ी; गतम्ू-हुई;उलूखलम्--ओखली; विकर्षता--कृष्ण द्वारा खींचे जाने से; मध्य-गेन--दोनों वृक्षों के बीच जाकर; पुरुषौ--दो सुन्दर व्यक्ति;अपि--भी; अचक्ष्महि--हमने अपनी आँखों से देखा है।
तब सारे ग्वालबालों ने कहा : इसे तो कृष्ण ने ही किया है।
जब यह दो वृक्षों के बीच मेंथा, तो ओखली तिरछी हो गई।
कृष्ण ने ओखली को खींचा तो दोनों वृक्ष गिर गये।
इसके बादइन वृक्षों से दो सुन्दर व्यक्ति निकल आये।
हमने इसे अपनी आँखों से देखा है।
न ते तदुक्त जगृहुर्न घटेतेति तस्य तत् ।
बालस्योत्पाटनं तर्वो: केचित्सन्दिग्धचेतस: ॥
५॥
न--नहीं; ते--सारे गोप; तत्-उक्तम्--बालकों द्वारा कहे गये; जगृहु: --स्वीकार करेंगे; न घटेत--ऐसा नहीं हो सकता; इति--इस प्रकार; तस्य--कृष्ण का; तत्--काम; बालस्य--कृष्ण जैसे बालक का; उत्पाटनमू--जड़ समेत उखाड़ना; तर्वो:--दोनोंवृक्षों का; केचित्ू--किसी ने; सन्दिग्ध-चेतस:--क्या किया जा सकता है इसके विषय में सशंकित
क्योंकि गर्गमुनि नेभविष्यवाणी की थी कि यह बालक नारायण के समान होगा )॥
तीव्र पितृ-स्नेह के कारण नन्द इत्यादि ग्वालों को विश्वास ही नहीं हुआ कि कृष्ण ने इतनेआश्चर्यमय ढंग से वृक्षों को उखाड़ा है।
अतएव उन्हें बच्चों के कहने पर विश्वास नहीं हुआ।
किन्तुउनमें से कुछ को सन्देह था।
वे सोच रहे थे, ‘चूँकि कृष्ण के लिए भविष्यवाणी की गई थी किवह नारायण के तुल्य है अतएव हो सकता है कि उसी ने यह किया हो।
'उलूखलं विकर्षन्तं दाम्ना बद्धं स्वमात्मजम् ।
विलोक्य नन्दः प्रहसद्ददनो विमुमोचच ह ॥
६॥
उलूखलम्--ओखली को; विकर्षन्तम्--खींचते हुए; दाम्ना--रस्सी से; बद्धम्--बँधा हुआ; स्वम् आत्मजम्--अपने पुत्र कृष्णको; विलोक्य--देख कर; नन्दः--नन्द महाराज; प्रहसत्-वदन:ः--इस अद्भुत बालक को देखकर मुसकाते चेहरे से; विमुमोचह--उसे बन्धन से मुक्त कर दिया।
जब नन्द महाराज ने अपने पुत्र को रस्सी द्वारा लकड़ी की ओखली से बँधा और ओखलीको घसीटते देखा तो वे मुसकाने लगे और उन्होंने कृष्ण को बन्धन से मुक्त कर दिया।
गोपीभि: स्तोभितोनृत्यद्धगवान्बालवत्क्वचित् ।
उद्गायति क्वचिन्मुग्धस्तद्वशो दारुयन्त्रवत् ॥
७॥
गोपीभि:--गोपियों के द्वारा; स्तोभित:--प्रोत्साहित, प्रेरित; अनृत्यत्--बालक कृष्ण नाचता; भगवान्--भगवान् होकर के भी;बाल-वत्--मानवी बालक के ही समान; क्वचित्--कभी; उद्गायति--जोर से गाता है; क्वचित्--कभी; मुग्ध:--चकितहोकर; तत्-वशः --उनके वशीभूत होकर; दारु-यन्त्र-वतू--कठपुतली की तरह |
गोपियाँ कहतीं, ‘हे कृष्ण, यदि तुम नाचोगे तो तुम्हें आधी मिठाई मिलेगी।
ऐसे शब्द कहकर या तालियाँ बजा-बजा कर सारी गोपियाँ कृष्ण को तरह-तरह से प्रेरित करतीं।
ऐसे अवसरोंपर वे परम शक्तिशाली भगवान् होते हुए भी मुसका देते और उनकी इच्छानुसार नाचते मानों वेउनके हाथ की कठपुतली हों।
कभी कभी वे उनके कहने पर जोर-जोर से गाते।
इस तरह कृष्णपूरी तरह से गोपियों के वश में आ गये।
'बिभर्ति क्वचिदाज्ञप्त: पीठकोन्मानपादुकम् ।
बाहुक्षेपं च कुरुते स्वानां च प्रीतिमावहन् ॥
८ ॥
बिभर्ति--कृष्ण खड़े हो जाते और वस्तुओं को इस तरह छूते मानों उठा नहीं पाते; क्वचित्ू--कभी; आज्ञप्त:--आदेश दिये जानेपर; पीठक-उन्मान--पीढ़ा ( लकड़ी का ) तथा काठ का नपना; पादुकम्--खड़ाऊँ को; बाहु-क्षेपम् च--तथा शरीर पर हाथमारते, ताल ठोंकते; कुरुते--करता है; स्वानाम् च--तथा अपने सम्बन्धियों, गोपियों तथा अन्य मित्रों का; प्रीतिमू--आनन्द;आवहनू--बुलाते हुए।
कभी कभी माता यशोदा तथा उनकी गोपी सखियाँ कृष्ण से कहतीं, ‘जरा यह वस्तु लाना,जरा वह वस्तु लाना।
' कभी वे उनको पीढ़ा लाने, तो कभी खड़ाऊँ या काठ का नपना लाने केलिए आदेश देतीं और कृष्ण माताओं द्वारा इस तरह आदेश दिये जाने पर उन वस्तुओं को लानेका प्रयास करते।
किन्तु कभी कभी वे उन वस्तुओं को इस तरह छूते मानो उठाने में असमर्थ होंऔर वहीं खड़े रहते।
अपने सम्बन्धियों का हर्ष बढ़ाने के लिए वे दोनों हाथों से ताल ठोंक करदिखाते कि वे काफी बलवान हैं।
दर्शयंस्तद्विदां लोक आत्मनो भृत्यवश्यताम् ।
ब्रजस्योवाह वै हर्ष भगवान्बालचेष्टितै: ॥
९॥
दर्शयन्ू--दिखलाते हुए; तत्-विदाम्--कृष्ण के कार्यों को समझने वाले पुरुषों को; लोके--सारे जगत में; आत्मन:--अपनेआप को; भृत्य-वश्यताम्--अपने दासों या भक्तों के आदेशों का पालन करने के लिए तैयार रहने वाले; ब्रजस्थ--ब्रजभूमि के;उवाह--सम्पन्न किया; बै--निस्सन्देह; हर्षम्--आनन्द; भगवान्ू-- भगवान्; बाल-चेष्टितै:--बच्चों के जैसे कार्यों द्वारा |
भगवान् कृष्ण ने अपने कार्यकलापों को समझने वाले संसार-भर के शुद्ध भक्तों कोदिखला दिया कि किस तरह वे अपने भक्तों अर्थात् दासों द्वारा वश में किये जा सकते हैं।
इसतरह अपनी बाल-लीलाओं से उन्होंने ब्रजवासियों के हर्ष में वृद्धि की।
क्रीणीहि भो: फलानीति श्रुत्वा सत्वरमच्युत: ।
'फलार्थी धान्यमादाय ययौ सर्वफलप्रद: ॥
१०॥
क्रीणीहि--आकर खरीदें; भोः--हे पड़ोसियो; फलानि--पके फलों को; इति--इस प्रकार; श्रुत्वा--सुन कर; सत्वरम्ू--शीघ्र;अच्युत:--कृष्ण; फल-अर्थी --मानो उन्हें फल चाहिए; धान्यम् आदाय--कुछ धान लाकर; ययौ--फल बेचने वाली के पासगये; सर्व-फल-प्रद: --हर एक को सभी फल प्रदान करने वाले भगवान् को अब फल चाहिए थे।
एक बार एक फल बेचने वाली स्त्री पुकार रही थी, 'हे ब्रजभूमिवासियो, यदि तुम लोगोंको फल खरीदने हैं, तो मेरे पास आओ।
' यह सुन कर तुरन्त ही कृष्ण ने कुछ अन्न लिया औरसौदा करने पहुँच गये मानो उन्हें कुछ फल चाहिए थे।
'फलविक्रयिणी तस्य च्युतधान्यकरद्दयम् ।
फलैरपूरयद्गत्नी: फलभाण्डमपूरिच ॥
११॥
'फल-विक्रयिणी --फल बेचने वाली आदिवासिनी; तस्य--कृष्ण का; च्युत-धान्य--बदलने के लिए जो धान लाये थे वह गिरगया; कर-द्वयम्--अँजुली; फलै: अपूरयत्--फलवाली ने उनकी छोटी हथेलियों को फलों से भर दिया; रत्नैः--रत्नों तथा सोनेके बदले में; फल-भाण्डम्--फल की टोकरी; अपूरि च-- भर गई
जब कृष्ण तेजी से फलवाली के पास जा रहे थे तो उनकी अँजुली में भरा बहुत-सा अन्नगिर गया।
फिर भी फलवाली ने उनके दोनों हाथों को फलों से भर दिया।
उधर उसकी फल कीटोकरी तुरन्त रत्नों तथा सोने से भर गई।
सरित्तीरगतं कृष्णं भग्नार्जुनमथाहयत् ।
राम च रोहिणी देवी क्रीडन्तं बालकैर्भूशम् ॥
१२॥
सरित्-तीर--नदी के किनारे; गतम्--गये हुए; कृष्णम्--कृष्ण को; भग्न-अर्जुनमू--यमलार्जुन खंडित करने की लीला केबाद; अथ--तब; आह्ृयत्--बुलाया; रामम् च--तथा बलराम को; रोहिणी--बलराम की माता ने; देवी--लक्ष्मी; क्रीडन्तम्--खेल में व्यस्त; बालकै:ः-- अनेक बालकों के साथ; भृशम्-- अत्यन्त मनोयोग से |
यमलार्जुन वृक्षों के उखड़ जाने के बाद एक बार रोहिणीदेवी राम तथा कृष्ण को, जो नदीके किनारे गये हुए थे और अन्य बालकों के साथ बड़े ध्यान से खेल रहे थे, बुलाने गईं।
नोपेयातां यदाहूतौ क्रीडासड्लेन पुत्रकौ ।
यशोदां प्रेषयामास रोहिणी पुत्रवत्सलाम् ॥
१३॥
न उपेयाताम्ू--लौटे नहीं; यदा--जब; आहूतौ--खेल से बुला भेजे गये; क्रीडा-सड्गेन--अन्य बालकों के साथ खेलने में इतनाअनुरक्त होने के कारण; पुत्रकौ--दोनों पुत्र ( कृष्ण तथा बलराम ); यशोदाम् प्रेषयाम् आस--उन्हें बुलाने के लिए यशोदा कोभेजा; रोहिणी--माता रोहिणी ने; पुत्र-वत्सलाम्--क्योंकि माता यशोदा कृष्ण तथा बलराम के प्रति अधिक वत्सल थीं।
अन्य बालकों के साथ खेलने में अत्यधिक अनुरक्त होने के कारण वे रोहिणी के बुलाने परवापस नहीं आये।
अतः रोहिणी ने उन्हें वापस बुलाने के लिए माता यशोदा को भेजा क्योंकि वेकृष्ण तथा बलराम के प्रति अत्यधिक स्नेहिल थीं।
क्रीडन्तं सा सुतं बालैरतिवेलं सहाग्रजम् ।
यशोदाजोहवीत्कृष्णं पुत्रस्नेहस्नुतस्तनी ॥
१४॥
क्रीडन्तम्--खेल में व्यस्त; सा--उस; सुतम्--अपने पुत्र को; बालैः--अन्य बालकों के साथ; अति-वेलम्--विलम्ब से; सह-अग्रजम्--अपने बड़े भाईं बलराम के साथ खेल रहे; यशोदा--माता यशोदा ने; अजोहवीत्--बुलाया ( अरे कृष्ण तथा बलरामआओ! ); कृष्णम्-कृष्ण को; पुत्र-स्नेह-स्नुत-स्तनी--उन्हें बुलाते हुए स्नेह के कारण उनके स्तनों से दूध बहने लगा ।
यद्यपि बहुत देर हो चुकी थी किन्तु कृष्ण तथा बलराम अपने खेल में अनुरक्त होने केकारण अन्य बालकों के साथ खेलते रहे।
इसलिए अब माता यशोदा ने भोजन करने के लिएउन्हें बुलाया।
कृष्ण तथा बलराम के प्रति उत्कट प्रेम तथा स्नेह होने से उनके स्तनों से दूध बहनेलगा।
कृष्ण कृष्णारविन्दाक्ष तात एहि स्तनं पिब ।
अल विहारै: क्षुक्षान्तः क्रीडाश्रान्तोउसि पुत्रक ॥
१५॥
कृष्ण कृष्ण अरविन्द-अक्ष--हे कृष्ण, मेरे बेटे, कमल जैसे नेत्रों वाले कृष्ण; तात--हे प्रिय; एहि--यहाँ आओ; स्तनम्--मेरेस्तन के दूध को; पिब--पियो; अलम् विहारैः--इसके बाद खेलने की कोई आवश्यकता नहीं है; क्षुत्-क्षान्त:-- भूख से थका;क्रीडा-श्रान्त:--खेलने से थका हुआ; असि--तुम हो; पुत्रक-हे पुत्र |
माता यशोदा ने कहा: हे प्रिय पुत्र कृष्ण, कमलनयन कृष्ण, यहाँ आओ और मेरा दूधपियो।
हे प्यारे, तुम भूख से तथा इतनी देर तक खेलने से बहुत थक गये होगे।
अब और अधिक खेलना जरूरी नहीं।
है रामागच्छ ताताशु सानुज: कुलनन्दन ।
प्रातरेव कृताहारस्तद्धवान्भोक्तुमहति ॥
१६॥
हे राम--मेरे प्यारे बलराम; आगच्छ---आओ; तात--मेरे प्रिय; आशु--शीघ्र; स-अनुज: -- अपने छोटे भाई सहित; कुल-नन्दन--हमारे परिवार की महान् आशा; प्रातः एब--सुबह के ही; कृत-आहार:--कलेवा किये हुए; तत्--इसलिए; भवान्--तुम; भोक्तुमू--अधिक खाने के लिए; अर्हति--योग्य हो |
हमारे परिवार के सर्वश्रेष्ठ मेरे प्यारे बलदेव, तुरन्त अपने छोटे भाई कृष्ण सहित आ जाओ।
तुम दोनों ने सुबह ही खाया था और अब तुम्हें कुछ और खाना चाहिए।
प्रतीक्षते त्वां दाशाई भोक्ष्यमाणो व्रजाधिप: ।
एह्मावयो: प्रियं धेहि स्वगृहान्यात बालका: ॥
१७॥
प्रतीक्षते-- प्रतीक्षा कर रही है; त्वाम्--तुम दोनों की; दाशाह--हे बलराम; भोक्ष्यमाण:--खाने की इच्छा रखते हुए; ब्रज-अधिप:--ब्रज का राजा, नन््द महाराज; एहि--यहाँ आओ; आवयो: --हमारा; प्रियम्ू--हर्ष; धेहि--जरा विचार करो; स्व-गृहान्--अपने अपने घरों को; यात--जाने दो; बालका:--अन्य बालक
अब ब्रज के राजा नन्द महाराज खाने के लिए तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं।
हे मेरे बेटे बलराम,वे तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं अत: हमारी प्रसन्नता के लिए तुम वापस आ जाओ।
तुम्हारे साथतथा कृष्ण के साथ खेल रहे सारे बालकों को अपने अपने घर जाना चाहिए।
धूलिधूसरिताडूस्त्वं पुत्र मजजनमावह ।
जन्मक्ल तेडद्य भवति विप्रेभ्यो देहि गा: शुच्चि: ॥
१८॥
धूलि-धूसरित-अड्ड त्वमू--तुम्हारा पूरा शरीर धूल से ढक गया है; पुत्र--मेरे बेटे; मजजनम् आवह--आओ, स्नान करो तथाअपनी सफाई करो; जन्म-ऋक्षम्-- जन्म का शुभ नक्षत्र; ते--तुम्हारे; अद्य--आज; भवति-- है; विप्रेभ्य: --शुद्ध ब्राह्मणों को;देहि--दान में दो; गाः--गाएँ; शुचि:--शुद्ध होकर
माता यशोदा ने आगे भी कृष्ण से कहा : हे पुत्र, दिन-भर खेलते रहने से तुम्हारा सारा शरीरधूल तथा रेत से भर गया है।
अतः वापस आ जाओ, स्नान करो और अपनी सफाई करो।
आजतुम्हारे जन्म के शुभ नक्षत्र से चाँद मेल खा रहा है, अतः शुद्ध होकर ब्राह्मणों को गौवों का दानकरो।
पश्य पश्य वयस्यांस्ते मातृमृष्टान्स्वलड्डू तान् ।
त्वं च सनातः कृताहारो विहरस्व स्वलड्डू त: ॥
१९॥
पश्य पश्य--जरा देखो तो; वयस्यान्ू--समान उम्र के बालक; ते--तुम्हारी; मातृ-मृष्टान्ू-- अपनी माताओं द्वारा नहलाये-धुलायेगये; सु-अलड्डू तानू--सुन्दर आभूषणों से सज्जित; त्वम् च--तुम भी; स्नातः--नहाकर; कृत-आहार:ः--तथा भोजन करने केबाद; विहरस्व--उनके साथ खेलो-कूदो; सु-अलड्डू त:--अच्छी तरह सजधज कर।
जरा अपनी उम्र वाले अपने सारे साथियों को तो देखो कि वे किस तरह अपनी माताओं द्वारानहलाये-धुलाये तथा सुन्दर आभूषणों से सजाये गये हैं।
तुम यहाँ आओ और स्नान करने,भोजन खाने तथा आभूषणों से अलंकृत होने के बाद फिर अपने सखाओं के साथ खेल सकतेहो।
इत्थं यशोदा तमशेषशेखरं मत्वा सुतं स्नेहनिबद्धधीर्नूप ।
हस्ते गृहीत्वा सहराममच्युतंनीत्वा स्ववार्ट कृतवत्यथोदयम् ॥
२०॥
इत्थम्--इस तरह; यशोदा--यशोदा; तम् अशेष-शेखरम्--कृष्ण को, जो हर शुभ वस्तु की पराकाष्ठा थे, जिनमें गंदगी याअशुद्धता का प्रश्न ही नहीं था; मत्वा--मान कर; सुतम्--अपने पुत्र; स्नेह-निबद्ध-धी: --अत्यधिक प्रेम-भाव के कारण;नृप--हे राजा ( महाराज परीक्षित ); हस्ते--हाथ में; गृहीत्वा--लेकर; सह-रामम्--बलराम समेत; अच्युतम्--कृष्ण को;नीत्वा--लाकर; स्व-वाटम्--अपने घर; कृतवती--किया; अथ-- अब; उदयम्--नहलाने- धुलाने, वस्त्र पहनाने और आभूषणोंसे अलंकृत करने के बाद की चमक।
हे महाराज परीक्षित, अत्यधिक प्रेमवश माता यशोदा ने समस्त ऐश्वर्यों के शिखर पर आसीनकृष्ण को अपना पुत्र माना।
इस तरह वे बलराम के साथ कृष्ण को हाथ से पकड़ कर घर लेआईं जहाँ उन्हें नहलाने-धुलाने, वस्त्र पहनाने तथा भोजन खिलाने का उन्होंने अपना काम पूराकिया।
श्रीशुक उवाचगोपवृद्धा महोत्पाताननुभूय बृहद्वने ।
नन्दादय: समागम्य ब्रजकार्यममन्त्रयन्ू ॥
२१॥
श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; गोप-वृद्धा:--बूढ़े ग्वालों ने; महा-उत्पातान्--बड़े बड़े उपद्रव; अनुभूय--अनुभव करके; बृहद्वने--बृहद्वन नामक स्थान में; नन्द-आदय: --नन्द महाराज तथा अन्य ग्वाले; समागम्य--एकत्र हुए; ब्रज-कार्यम्ू-ब्रजभूमि का कार्य; अमन्त्रयन्ू--महावन में लगातार होने वाले उत्पातों को रोकने पर विचार-विमर्श किया।
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : तब एक बार बृहद्वन में बड़े बड़े उपद्रव देख कर नन््दमहाराज तथा वृद्ध ग्वाले एकत्र हुए और विचार करने लगे कि ब्रज में लगातार होने वाले उपद्रवोंको रोकने के लिए क्या किया जाय।
तत्रोपानन्दनामाह गोपो ज्ञानवयोडधिक: ।
देशकालार्थतत्त्वज्ञ: प्रियकृद्रामकृष्णयो: ॥
२२॥
तत्र--उस सभा में; उपनन्द-नामा--उपानन्द नामक ( नन्द महाराज का बड़ा भाई ) ने; आह--कहा; गोप: --ग्वाला; ज्ञान-वयः-अधिक: --जो ज्ञान तथा आयु में सबसे बड़ा था; देश-काल-अर्थ-तत्त्व-ज्ञ:--देश, काल तथा परिस्थितियों के अनुसार अत्यन्तअनुभवी; प्रिय-कृत्ू--लाभ के लिए; राम-कृष्णयो:-- भगवान्
बलराम तथा भगवान् कृष्ण केगोकुलवासियों की इस सभा में, उपानन्द नामक एक ग्वाले ने, जो आयु तथा ज्ञान मेंसर्वाधिक प्रौढ़ था और देश, काल तथा परिस्थिति के अनुसार अत्यधिक अनुभवी था, राम तथाकृष्ण के लाभ हेतु यह प्रस्ताव रखा।
उत्थातव्यमितोउस्माभि्गोकुलस्य हितैषिभि: ।
आयान्त्यत्र महोत्पाता बालानां नाशहेतवः ॥
२३॥
उत्थातव्यमू--इस स्थान को छोड़ देना चाहिए; इत:--यहाँ ( गोकुल ) से; अस्माभि: --हम सबों के द्वारा; गोकुलस्थ--गोकुलके; हित-एपिभि:--इस स्थान के हितैषियों द्वारा; आयान्ति--हो रहे हैं; अत्र--यहाँ पर; महा-उत्पाता:--अनेक बड़े बड़े उपद्रव;बालानाम्--राम तथा कृष्ण जैसे बालकों के; नाश-हेतव:--विनष्ट करने के उद्देश्य से |
उसने कहा : मेरे ग्वालमित्रो, इस गोकुल नामक स्थान की भलाई के लिए हमें इसे छोड़देना चाहिए क्योंकि यहाँ पर राम तथा कृष्ण को मारने के उद्देश्य से सदैव अनेकानेक उपद्रवहोते ही रहते हैं।
मुक्त: कथद्िद्राक्षस्या बालघ्न्या बालको हासौ ।
हरेरनुग्रहान्रूनमनश्चोपरि नापतत् ॥
२४॥
मुक्त:--छूटा था; कथश्ञित्--किसी तरह; राक्षस्था:--राक्षसी पूतना के हाथों से; बाल-घ्न्या:--बालकों को मारने पर तुली;बालक:ः--विशेषतया बालक कृष्ण; हि--क्योंकि; असौ--वह; हरे: अनुग्रहात्-- भगवान् की दया से; नूनम्--निस्सन्देह; अनःच--तथा छकड़ा; उपरि--बालक के ऊपर; न--नहीं; अपतत्--गिरा।
यह बालक कृष्ण, एकमात्र भगवान् की दया से किसी न किसी तरह राक्षसी पूतना के हाथोंसे बच सका क्योंकि वह उन्हें मारने पर उतारू थी।
फिर यह भगवान् की कृपा ही थी कि वहछकड़ा इस बालक पर नहीं गिरा।
चक्रवातेन नीतोयं दैत्येन विपदं वियत् ।
शिलायां पतितस्तत्र परित्रात: सुरेश्व: ॥
२५॥
चक्र-वातेन--बवंडर के रूप में असुर ( तृणावर्त ) द्वारा; नीतः अयम्--यह कृष्ण उड़ा ले जाया गया; दैत्येन--असुर द्वारा;विपदम्-- भयानक; वियत्--आकाश में; शिलायाम्ू--पत्थर पर; पतित: --गिरा हुआ; तत्र--वहाँ; परित्रात:--बचा लियागया; सुर-ई श्रैः-- भगवान् विष्णु या उनके संगियों द्वारा।
इसके बाद बवंडर के रूप में आया तृणावर्त असुर इस बालक को मार डालने के लिएसंकटमय आकाश में ले गया किन्तु वह असुर पत्थर की एक शिला पर गिर पड़ा।
तब भीभगवान् विष्णु या उनके संगियों की कृपा से यह बालक बच गया था।
यन्न प्नियेत द्रुमयोरन्तरं प्राप्प बालक: ।
असावन्यतमो वापि तदपष्यच्युतरक्षणम् ॥
२६॥
यत्--पुनः; न प्रियेत--नहीं मरा; द्रुमयो: अन्तरम्--दो वृक्षों के बीच; प्राप्प--बीच में होते हुए; बालक: असौ--वह बालक,कृष्ण; अन्यतम:--दूसरा बालक; वा अपि--अथवा; तत् अपि अच्युत-रक्षणम्--तब भी भगवान् द्वारा बचा लिया गया।
यहाँ तक कि किसी और दिन, न तो कृष्ण न ही उनके खिलाड़ी साथी उन दोनों वृक्षों केगिरने से मरे यद्यपि ये बालक वृक्षों के निकट या उनके बीच ही में थे।
इसे भी भगवान् काअनुग्रह मानना चाहिये।
यावदौत्पातिकोरिष्टो ब्रज॑ं नाभिभवेदितः ।
तादद्वालानुपादाय यास्यामोउन्यत्र सानुगा: ॥
२७॥
यावत्--जब तक; औत्पातिक: --उत्पात मचाने वाले; अरिष्ट: --असुर; ब्रजम्--यह गोकुल ब्रजभूमि; न--नहीं; अभिभवेत्इतः--इस स्थान से चले जाँय; तावत्--तब तक; बालान् उपादाय--बालकों के लाभ के लिए; यास्थाम:--हम चले जाँय;अन्यत्र--किसी दूसरी जगह; स-अनुगा:--अपने अनुयायियों समेत ।
ये सारे उत्पात कुछ अज्ञात असुर द्वारा किये जा रहे हैं।
इसके पूर्व कि वह दूसरा उत्पात करनेआये, हमारा कर्तव्य है कि हम तब तक के लिए इन बालकों समेत कहीं और चले जाये जबतक कि ये उत्पात बन्द न हो जायाँ।
वबन॑ वृन्दावनं नाम पशव्यं नवकाननम् ।
गोपगोपीगवां सेव्यं पुण्याद्रितृणवीरुधम् ॥
२८ ॥
वनम्--दूसरा वन; वृन्दावनम् नाम--वृन्दावन नामक; पशव्यम्-गौवों तथा अन्य पशुओं के पालन के लिए उपयुक्त स्थान;नव-काननम्--कई नये बगीचों जैसे स्थान हैं; गोप-गोपी-गवाम्--सारे ग्वालों, उनके परिवार वालों तथा गौवों के लिए;सेव्यम्--अत्यन्त उपयुक्त स्थान; पुण्य-अद्वि--सुन्दर पर्वत हैं; तृण--पौधे; वीरुधम्--तथा लताएँ।
नन्देश्वर तथा महावन के मध्य वृन्दावन नामक एक स्थान है।
यह स्थान अत्यन्त उपयुक्त हैक्योंकि इसमें गौवों तथा अन्य पशुओं के लिए रसीली घास, पौधे तथा लताएँ हैं।
वहाँ सुन्दरबगीचे तथा ऊँचे पर्वत हैं और वह स्थान गोपों, गोपियों तथा हमारे पशुओं के सुख के लिए सारीसुविधाओं से युक्त है।
तत्तत्राद्ेव यास्याम: शकटान्युड्डः मा चिरम् ।
गोधनान्यग्रतो यान्तु भवतां यदि रोचते ॥
२९॥
तत्--इसलिए; तत्र--वहाँ; अद्य एबव--आज ही; यास्याम:--चले चलें; शकटान्--सारी बैलगाड़ियों को; युड्डू --जोत कर;मा चिरम्--देरी लगाये बिना; गो-धनानि--सारी गौवों को; अग्रत:--आगे आगे; यान्तु--चलने दें; भवताम्--आप सबों को;यदि--यदि; रोचते-- अच्छा लगे।
अतएव हम आज ही तुरन्त चल दें।
अब और अधिक प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहींहै।
यदि आप सबों को मेरा प्रस्ताव मान्य हो तो हम अपनी सारी बैलगाड़ियाँ तैयार कर लें औरगौवों को आगे करके वहाँ चले जायें।
तच्छुत्वैकधियो गोपा: साधु साध्विति वादिन: ।
ब्रजान्स्वान्स्वान्समायुज्य ययू रूढपरिच्छदा: ॥
३०॥
तत् श्रुत्वा--उपानन्द की यह सलाह सुन कर; एक-धिय:--एकमत होकर; गोपा:--सारे ग्वालों ने; साधु साधु--अति उत्तम,अति उत्तम; इति--इस प्रकार; वादिन:--घोषित करते हुए; ब्रजानू--गौवों को; स्वान् स्वानू--अपनी अपनी; समायुज्य--एकत्रकरके; ययु:--रवाना हो गये; रूढ-परिच्छदा: --सारा साज-सामान गाड़ियों में रख कर।
उपानन्द की यह सलाह सुन कर ग्वालों ने इसे एकमत से स्वीकार कर लिया और कहा,’बहुत अच्छा, बहुत अच्छा।
' इस तरह उन्होंने अपने घरेलू मामलों की छान-बीन की और अपनेवस्त्र तथा अन्य सामान गाड़ियों पर रख लिये और तुरन्त वृन्दावन के लिए प्रस्थान कर दिया।
वृद्धान्बालान्स्त्रियो राजन्सवोपकरणानि च ।
अनःस्वारोप्य गोपाला यत्ता आत्तशरासना: ॥
३१॥
गोधनानि पुरस्कृत्य श्रृड्भाण्यापूर्य सर्वतः ।
तूर्यघोषेण महता ययुः सहपुरोहिता: ॥
३२॥
वृद्धानू--सर्वप्रथम सारे बूढ़ों को; बालान्ू--बालकों को; स्त्रियः--स्त्रियों को; राजनू--हे राजा परीक्षित; सर्व-उपकरणानिच--तथा सारी आवश्यक एवं घरेलू वस्तुएँ; अनःसु--बैलगाड़ियों पर; आरोप्य--लाद कर; गोपाला:--सारे ग्वाले; यत्ता:--सावधानीपूर्वक; आत्त-शर-असना:--तीरों तथा धनुषों से लैस होकर; गो-धनानि--सारी गौवों को; पुरस्कृत्य--आगे रख कर;श्रुद्झाणि--सींग की बनी तुरही; आपूर्य--बजाकर; सर्वतः--चारों ओर; तूर्य-घोषेण--तुरही की ध्वनि से; महता--उच्च;ययु:--रवाना हो गये; सह-पुरोहिता: --पुरोहितों सहित
सारे बूढ़ों, स्त्रियों, बालकों तथा घरेलू सामग्री को बैलगाड़ियों में लाद कर एवं सारी गौवोंको आगे करके, ग्वालों ने सावधानी से अपने अपने तीर-कमान ले लिये और सींग के बनेबिगुल बजाये।
हे राजा परीक्षित, इस तरह चारों ओर बिगुल बज रहे थे तभी ग्वालों ने अपनेपुरोहितों सहित अपनी यात्रा के लिए प्रस्थान किया।
गोप्यो रूढरथा नूलकुचकुड्डू मकान्तय: ।
कृष्णलीला जगुः प्रीत्या निष्ककण्ठ्य: सुवाससः ॥
३३॥
गोप्य:--सारी गोपियाँ; रूढ-रथा: --बैलगाड़ियों पर चढ़ी हुई; नूल-कुच-कुट्डु म-कान्तय:--उनके शरीर, विशेषतया उनकेस्तन ताजे कुंकुम से सजाये गये; कृष्ण-लीला:--कृष्ण-लीलाएँ; जगु:--उच्चारण कर रही थीं; प्रीत्या--बड़े हर्ष से; निष्क-'कण्ठ्य:--अपने गलों में लाकेट पहने; सु-वासस: --अच्छे वस्त्रों से सज्जित
बैलगाड़ियों में चढ़ी हुई गोपियाँ उत्तम से उत्तम वस्त्रों से सुसज्जित थीं और उनके शरीर,विशेषतया स्तन ताजे कुंकुम-चूर्ण से अलंकृत थे।
बैलगाड़ियों पर चढ़ते समय वे अत्यन्तहर्षपूर्वक कृष्ण की लीलाओं का कीर्तन करने लगीं।
तथा यशोदारोहिण्यावेक॑ शकटमास्थिते ।
रेजतु: कृष्णरामाभ्यां तत्कथाश्रवणोत्सुके ॥
३४॥
तथा--और; यशोदा-रोहिण्यौ--यशोदा तथा रोहिणी दोनों; एकम् शकटम्--एक बैलगाड़ी पर; आस्थिते--बैठी; रेजतु:--अत्यन्त सुन्दर; कृष्ण-रामाभ्यामू--अपनी माताओं के साथ कृष्ण तथा बलराम; तत्-कथा--कृष्ण तथा बलराम की लीलाओंका; श्रवण-उत्सुके --बड़ी ही उत्सुकता से सुनते हुए।
इस तरह माता यशोदा तथा रोहिणीदेवी कृष्ण तथा बलराम की लीलाओं को बड़े हर्ष सेसुनती हुईं, जिससे वे क्षण-भर के लिए भी उनसे वियुक्त न हों, एक बैलगाड़ी में उन दोनों केसाथ चढ़ गईं।
इस दशा में वे सभी अत्यन्त सुन्दर लग रहे थे।
वृन्दावन सम्प्रविश्य सर्वकालसुखावहम् ।
तत्र चक्रुर््ंजावासं शकटैरर्धचन्द्रवत् ॥
३५॥
वृन्दावनम्--वृन्दावन नामक पवित्र स्थान में; सम्प्रविश्य--प्रविष्ट होकर; सर्व-काल-सुख-आवहम्--जहाँ सभी ऋतुओं में रहनासुहावना लगता है; तत्र--वहाँ; चक्रु:--बनाया; ब्रज-आवासम्--त्रज का निवास; शकटैः--बैलगाड़ियों से; अर्ध-चन्द्रवत् --आधे चन्द्रमा जैसा अर्धवृत्त बनाकर।
इस तरह वे वृन्दावन में प्रविष्ट हुए जहाँ सभी ऋतुओं में रहना सुहावना लगता है।
उन्होंनेअपनी बैलगाड़ियों से अर्धचन्द्राकार अर्धवृत्त बनाकर अपने रहने के लिए अस्थायी निवास बनालिया।
वृन्दावन गोवर्धन यमुनापुलिनानि च ।
वीक्ष्यासीदुत्तमा प्रीती राममाधवयोनृप ॥
३६॥
वृन्दावनम्--वृन्दावन नामक स्थान; गोवर्धनम्-गोवर्धन पर्वत; यमुना-पुलिनानि च--तथा यमुना नदी के किनारे; वीक्ष्य--देखकर; आसीत्--हो उठे; उत्तमा प्रीती--उच्च कोटि का हर्ष; राम-माधवयो:--कृष्ण तथा बलराम का; नृप--हे राजापरीक्षित |
हे राजा परीक्षित, जब राम तथा कृष्ण ने वृन्दावन, गोवर्धन तथा यमुना नदी के तट देखे तोदोनों को बड़ा आनन्द आया।
एवं ब्रजौकसां प्रीतिं यच्छन्तौ बालचेष्टितै: ।
कलवाक्यै: स्वकालेन वत्सपालौ बभूबतु: ॥
३७॥
एवम्--इस प्रकार; ब्रज-ओकसाम्--सारे ब्रजवासियों को; प्रीतिमू--हर्ष; यच्छन्तौ--प्रदान करते हुए; बाल-चेष्टितै:--बाल-लीलाओं से; कल-वाक्यै:--मीठी तोतली बोली से; स्व-कालेन--समयानुसार; वत्स-पालौ--बछड़ों की रखवाली करने केलिए; बभूवतु:--बड़े हो गये।
इस तरह कृष्ण और बलराम छोटे बालकों की तरह क्रीड़ाएँ करते तथा तोतली बोली बोलतेहुए ब्रज के सारे निवासियों को दिव्य आनन्द देने लगे।
समय आने पर वे बछड़ों की देखभालकरने के योग्य हो गये।
अविदूरे ब्रजभुवः सह गोपालदारकै: ।
चारयामासतुर्वत्सान्नानाक्रीडापरिच्छदौ ॥
३८॥
अविदूरे--ब्रजवासियों के आवासीय घरों से अधिक दूर नहीं; ब्रज-भुव:ः--व्रजभूमि से; सह गोपाल-दारकै:--उसी व्यवसायवाले अन्य बालकों ( ग्वालों ) के साथ; चारयाम् आसतु:--चराया करते; वत्सानू--बछड़ों को; नाना--तरह तरह के; क्रीडा--खेल; परिच्छदौ--भाँति-भाँति की सुन्दर वेशभूषाओं से युक्त तथा औजारों से लैस।
कृष्ण तथा बलराम अपने मकान के पास ही सभी तरह के खिलौनों से युक्त होकर अन्यग्वालों के साथ खेलने लगे एवं छोटे-छोटे बछड़ों को चराने लगे।
क्वचिद्वादयतो वेणुं क्षेपणै: क्षिपतः क्वचित् ।
क्वचित्पादे: किल्धिणीभि: क्वचित्कृत्रिमगोवृषै: ॥
३९॥
वृषायमाणो नर्दन्तौ युयुधाते परस्परम् ।
अनुकृत्य रुतैर्जन्तूंश्वेरतु: प्राकृता यथा ॥
४०॥
क्वचित्--कभी; वादयत:--बजाते हुए; वेणुम्--बाँसुरी को; क्षेपणैः--फेंकने की रस्सी ( गुलेल ) से; क्षिपत:--फल पाने केलिए पत्थर फेंकते; क्वचित्--कभी; क्वचित् पादैः:--कभी पाँवों से; किड्लिणीभि:--पैजनियों की आवाज से; क्वचित्--कभी; कृत्रिम-गो-वृषै:--नकली गाय तथा बैल बन कर; वृषायमाणौ--पशुओं की नकल उतारते; नर्दन्तौ--नादते, जोर सेशब्द करते; युयुधाते-- लड़ने लगते; परस्परम्--एक-दूसरे से; अनुकृत्य--नकल करके; रुतैः:--आवाज निकालते हुए;जन्तूनू--सारे पशुओं की; चेरतु:--घूमा करते; प्राकृतौ--दो सामान्य बालकों; यथा--की तरह
कृष्ण और बलराम कभी अपनी बाँसुरी बजाते, कभी वृक्षों से फल गिराने के लिए गुलेलचलाते, कभी केवल पत्थर फेंकते और कभी पाँवों के घुँधरूओं के बजते रहने के साथ साथ, वेबेल तथा आमलकी जैसे फलों से फुटबाल खेलते।
कभी कभी वे अपने ऊपर कम्बल डाल करगौवों तथा बैलों की नकल उतारते और जोर-जोर से शब्द करते हुए एक-दूसरे से लड़ते।
कभीवे पशुओं की बोलियों की नकल करते।
इस तरह वे दोनों सामान्य मानवी बालकों की तरहखेल का आनन्द लेते।
कदाचिद्यमुनातीरे वत्सांश्वारयतो: स्वकैः ।
वयस्यै: कृष्णबलयोर्जिघांसुर्देत्य आगमत् ॥
४१॥
कदाचित्--कभी; यमुना-तीरे-- यमुना के तट पर; वत्सानू--बछड़ों को; चारयतो:--चराते हुए; स्वकै:--अपने; वयस्यै:--अन्य साथियों के साथ; कृष्ण-बलयो:--कृष्ण तथा बलराम दोनों को; जिधघांसु:--मारने की इच्छा से; दैत्य:--अन्य असुर;आगमत्--आ पहुँचा
एक दिन जब राम तथा कृष्ण अपने साथियों के साथ यमुना नदी के किनारे अपने बछड़ेचरा रहे थे तो उन्हें मारने की इच्छा से वहाँ एक अन्य असुर आया।
त॑ वत्सरूपिणं वीक्ष्य वत्सयूथगतं हरि: ।
दर्शयन्बलदेवाय शनैर्मुग्थ इवासदत् ॥
४२॥
तम्--असुर को; वत्स-रूपिणम्ू--बछड़े का वेश धारण किये; वीक्ष्य--देख कर; वत्स-यूथ-गतम्--जब वह असुर अन्यबछड़ों के समूह के बीच घुसा; हरिः-- भगवान् कृष्ण; दर्शयन्--सूचित करते हुए; बलदेवाय--बलदेव को; शनै:--अत्यन्तधीमे धीमे; मुग्ध: इब--मानो कुछ समझ ही न रहे हों; आसदत्--पास आये।
जब भगवान् ने देखा कि असुर बछड़े का वेश धारण करके अन्य बछड़ों के समूह के बीचघुस आया है, तो उन्होंने बलदेव को इड्लित किया, ‘‘यह रहा दूसरा असुर।
' फिर वे उस असुर केपास धीरे-धीरे पहुँच गये मानो वे असुर के मनोभावों को समझ नहीं रहे थे।
गृहीत्वापरपादाभ्यां सहलाज्ूलमच्युत: ॥
भ्रामयित्वा कपित्थाग्रे प्राहिणोद्गतजीवितम् ।
स कपित्थेरमहाकाय: पात्यमानैः पपात ह ॥
४३॥
गृहीत्वा--पकड़ कर; अपर-पादाभ्याम्--पिछले पाँव से; सह--साथ; लाडूलम्--पूँछ को; अच्युतः--भगवान् कृष्ण ने;भ्रामयित्वा--तेजी से घुमाकर; कपित्थ-अग्रे--कैथे के पेड़ की चोटी पर; प्राहिणोत्-- फेंक दिया; गत-जीवितम्--प्राणहीन शरीर; सः--वह असुर; कपित्थे:--कैथे के वृक्ष समेत; महा-काय:--विशाल शरीर धारण किये; पात्यमानैः --गिरता हुआवृक्ष; पपात ह--मृत होकर भूमि पर गिर पड़ा |
तत्पश्चात् श्रीकृष्ण ने उस असुर की पिछली टाँगें तथा पूँछ पकड़ ली और वे उसके शरीर कोतब तक तेजी से घुमाते रहे जब तक वह मर नहीं गया।
फिर उसे कैथे के पेड़ की चोटी पर फेंकदिया।
वह वृक्ष उस असुर द्वारा धारण किये गये विशाल शरीर को लेकर भूमि पर गिर पड़ा।
त॑ वीक्ष्य विस्मिता बाला: शशंसु: साधु साध्विति ।
देवाश्व परिसन्तुष्टा बभूवु: पुष्पव्षिण: ॥
४४॥
तम्--इस घटना को; वीक्ष्य--देखकर; विस्मिता:--चकित; बाला:--सारे बालक; शशंसु:--खूब प्रशंसा की; साधु साधुइति--’' बहुत अच्छा बहुत अच्छा ' चिल्लाते हुए; देवा: च--तथा स्वर्गलोक से सारे देवता; परिसन्तुष्टाः --अत्यन्त संतुष्ट;बभूवु:--हो गये; पुष्प-वर्षिण:--कृष्ण पर फूलों की वर्षा की |
असुर के मृत शरीर को देखकर सारे ग्वालबाल चिल्ला उठे, ‘बहुत खूब कृष्ण, बहुतअच्छे, बहुत अच्छे, धन्यवाद, ' स्वर्गलोक में सारे देवता प्रसन्न थे अतः उन्होंने भगवान् पर फूलबरसाये।
तौ वत्सपालकौ भूत्वा सर्वलोकैकपालकौ ।
सप्रातराशौ गोवत्सांश्चारयन्तौ विचेरतु: ॥
४५॥
तौ--कृष्ण तथा बलराम; वत्स-पालकौ--मानो बछड़ों की रखवाली करने वाले; भूत्वा--बन कर; सर्व-लोक-एक-पालकौ--यद्यपि बे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के जीवों के पालनकर्ता हैं; स-प्रात:-आशौ--सुबह का नाश्ता करके; गो-वत्सान्--सारेबछड़ों को; चारयन्तौ--चराते हुए; विचेरतु: --इधर-उधर विचरण करने लगे।
असुर को मारने के बाद कृष्ण तथा बलराम ने अपना सुबह का नाश्ता ( कलेवा ) कियाऔर बछड़ों की रखवाली करते हुए वे इधर-उधर टहलते रहे।
भगवान् कृष्ण तथा बलराम ने जोसम्पूर्ण सृष्टि के पालक हैं, ग्वालबालों की तरह बछड़ों का भार सँभाला।
स्वं स्वं वत्सकुलं सर्वे पाययिष्यन्त एकदा ।
गत्वा जलाशयाभ्याशं पाययित्वा पपुर्जलम् ॥
४६॥
स्वम् स्वमू-- अपने अपने; वत्स-कुलम्--बछड़ों के समूह को; सर्वे--सारे लड़के तथा कृष्ण एवं बलराम; पाययिष्यन्त:--पानीपिलाने की इच्छा से; एकदा--एक दिन; गत्वा--जाकर; जल-आशय-अभ्याशम्--तालाब के निकट; पाययित्वा--पशुओंको पानी पिला कर; पपु: जलमू्--स्वयं भी जल पिया
एक दिन कृष्ण तथा बलराम समेत सारे बालक, अपने अपने बछड़ों का समूह लेकर,जलाशय के पास बछड़ों को पानी पिलाने लाये।
जब पशु जल पी चुके तो बालकों ने भी वहाँपानी पिया।
ते तत्र दहशुर्बाला महासत्त्वमवस्थितम् ।
तत्रसुर्वज्निर्भिन्नं गिरे: श्रृद्रमिव च्युतम् ॥
४७॥
ते--उन; तत्र--वहाँ; दहशु:--देखा; बाला:--बालकों ने; महा-सत्त्वमू--विशाल शरीर; अवस्थितम्--स्थित; तत्रसु:--डरगये; वज़-निर्भिन्नम्--वज़ से टूटा; गिरे: श्रूड़मू--पर्वत की चोटी; इब--सहश; च्युतम्--वहाँ पर गिरी हुई |
जलाशय के पास ही बालकों ने एक विराट शरीर देखा जो उस पर्वत की चोटी के समानथा, जो वज़न के द्वारा टूट पड़ी हो।
वे ऐसे विशाल जीव को देखखर ही भयभीत थे।
स वै बको नाम महानसुरो बकरूपधृक् ।
आगत्य सहसा कृष्णं तीक्ष्णतुण्डोग्रसट्बली ॥
४८ ॥
सः--वह प्राणी; बै--निस्सन्देह; बकः नाम--बकासुर नामक; महान् असुर:ः--विशाल असुर; बक-रूप-धृक् --बगुले काशरीर धारण करके; आगत्य--वहाँ आकर; सहसा--अचानक; कृष्णम्--कृष्ण को; तीक्ष्ण-तुण्ड:--तेज चोंच वाला;अग्रसत्--निगल गया; बली--अत्यन्त बलशाली |
वह विशालकाय असुर बकासुर था।
उसने अत्यन्त तेज चोंच वाले बगुले का शरीर धारणकर लिया था।
वहाँ आकर उसने तुरन्त ही कृष्ण को निगल लिया।
कृष्णं महाबक ग्रस्तं दृष्ठा रामादयोर्भका: ।
बभूवुरिन्द्रियाणीव विना प्राणं विचेतस: ॥
४९॥
कृष्णम्-कृष्ण को; महा-बक- ग्रस्तम्--विशाल बगुले द्वारा निगला हुआ; दृष्टा--देखकर; राम-आदय: अर्भका:--बलरामइत्यादि सारे बालक; बभूवु:--हो गए; इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ; इब--सह्ृश; विना--रहित; प्राणम्--प्राण; विचेतस:--अत्यधिकमोहग्रस्त, प्रायः अचेत।
जब बलराम तथा अन्य बालकों ने देखा कि कृष्ण विशाल बगुले द्वारा निगले जा चुके हैं,तो वे बेहोश जैसे हो गये मानों प्राणरहित इन्द्रियाँ हों।
त॑ तालुमूलं प्रदहन्तमग्निवद्गोपालसूनुं पितरं जगद्गुरो: ।
अच्छर्द सद्योउतिरुषाक्षतं बक-स्तुण्डेन हन्तुं पुनरभ्यपद्यत ॥
५०॥
तम्--उसको; तालु-मूलम्-गले के नीचे; प्रदहन्तम्--जलाते हुए; अग्नि-बत्--आग की तरह; गोपाल-सूनुम्-ग्वाल-पुत्र,कृष्ण को; पितरम्--पिता को; जगत्-गुरो:--ब्रह्मा के; चच्छर्द--उसके मुँह से निकल आये; सद्यः--तुरन््त; अति-रुषा--अत्यधिक क्रोध से; अक्षतम्--बिना किसी तरह चोट खाये; बक:ः--बकासुर; तुण्डेन--तेज चोंच से; हन्तुमू--मार डालने केलिए; पुनः--फिर; अभ्यपद्यत--प्रयास किया।
कृष्ण जो ब्रह्मा के पिता हैं किन्तु ग्वाले के पुत्र की भूमिका निभा रहे थे, अग्नि के समानबन कर असुर के गले के निचले भाग को जलाने लगे जिससे बकासुर ने तुरन्त ही उन्हें उगलदिया।
जब असुर ने देखा कि निगले जाने पर भी कृष्ण को कोई क्षति नहीं पहुँची तो तुरन्त हीउसने अपनी तेज चोंच से कृष्ण पर फिर वार कर दिया।
तमापतन्तं स निगृह्य तुण्डयो-दोर्भ्या बक॑ कंससखं सतां पति: ।
पश्यत्सु बालेषु ददार लीलयामुदावहों वीरणवह्दिवौकसाम् ॥
५१॥
तम्--बकासुर को; आपतन्तम्--उन पर आक्रमण करने के लिए पुनः उद्यत; सः--भगवान् कृष्ण ने; निगृह्य--पकड़ कर;तुण्डयो:--चोंच; दोर्भ्यामू--अपनी बाहुओं से; बकम्--बकासुर को; कंस-सखम्--कंस के संगी; सताम् पति: --वैष्णवों केस्वामी कृष्ण ने; पश्यत्सु--देखते देखते; बालेषु--ग्वालबालों के; ददार--दो टुकड़े कर दिये; लीलया--आसानी से; मुदा-आवहः--मनमोहक कार्य; वीरण-वत्--वीरण घास के तुल्य; दिवौकसाम्--स्वर्ग के निवासियों केलिए
जब वैष्णवों के नायक कृष्ण ने यह देखा कि कंस का मित्र बकासुर उन पर आक्रमणकरने का प्रयास कर रहा है, तो उन्होंने अपने हाथों से उसकी चोंच के दोनों भागों ( ठोरों ) कोपकड़ लिया और सारे ग्वालबालों की उपस्थिति में उसे उसी प्रकार चीर डाला जिस तरह वीरणघास ( गाँडर ) के डंठल को बच्चे चीर डालते हैं।
कृष्ण द्वारा इस प्रकार असुर के मारे जाने सेस्वर्ग के निवासी अत्यन्त प्रसन्न हुए।
तदा बकारिं सुरलोकवासिनःसमाकिरत्नन्दममल्लिकादिभि: ।
समीडिरे चानकशड्डुसंस्तवै-स्तद्वीक्ष्य गोपालसुता विसिस्मिरे ॥
५२॥
तदा--उस समय; बक-अरिम्--बकासुर के शत्रु को; सुर-लोक-वासिन:--स्वर्गलोक के वासियों ने; समाकिरन्ू--फूलबरसाये; नन्दन-मल्लिका-आदिभि:--नन्दन कानन में उत्पन्न मल्लिका आदि फूलों से; समीडिरे--उनको बधाई भी दी; च--तथा; आनक-शह्'ु-संस्तवैः --दुन्दुभी, शंख तथा स्तुतियों द्वारा; तत् वीक्ष्य--यह देखकर; गोपाल-सुता:--ग्वालबाल;विसिस्मिरि--आश्चर्यचकित थे।
उस समय स्वर्गलोक के वासियों ने बकासुर के शत्रु कृष्ण पर नन्दन-कानन में उगीमल्लिका के फूलों की वर्षा की।
उन्होंने दुन्दुभी तथा शंख बजाकर एवं स्तुतियों द्वारा उनकोबधाई दी।
यह देखकर सारे ग्वालबाल आश्चर्यचकित थे।
मुक्त बकास्यादुपलभ्य बालकारामादय: प्राणमिवेन्द्रियो गण: ।
स्थानागतं तं परिरभ्य निर्वृता:प्रणीय वत्सान्त्रजमेत्य तज्जगु; ॥
५३॥
मुक्तम्ू--इस प्रकार छूटा हुआ; बक-आस्यात्--बकासुर के मुख से; उपलभ्य--वापस पाकर; बालका:--सारे बालक, संगी;राम-आदय: --बलराम इत्यादि; प्राणम्--प्राण; इब--के समान; इन्द्रियः--इन्द्रियाँ; गण: --समूह; स्थान-आगतम्--अपनेअपने स्थान पर जाकर; तम्--कृष्ण को; परिरभ्य--चूमते हुए; निर्वृता:--संकट से मुक्त हुए; प्रणीय--एकत्र करके;वत्सान्ू--बछड़ों को; ब्रजम् एत्य--ब्रजभूमि लौट कर; तत् जगु:--घटना का जोर-जोर से बखान किया।
जिस प्रकार चेतना तथा प्राण वापस आने पर इन्द्रियाँ शान्त हो जाती हैं उसी तरह जब कृष्णइस संकट से उबर आये तो बलराम समेत सारे बालकों ने सोचा मानो उन्हें फिर से जीवन प्राप्तहुआ हो।
उन्होंने कृष्ण का पूरी चेतना के साथ आलिंगन किया और अपने बछड़ों को समेट करवे ब्रजभूमि लौट आये जहाँ उन्होंने जोर-जोर से इस घटना का बखान किया।
श्र॒ुत्वा तद्विस्मिता गोपा गोप्यश्चातिप्रियाहता: ।
प्रेत्यागतमिवोत्सुक्यादैश्षन्त तृषितेक्षणा: ॥
५४॥
श्रुत्वा--सुन कर; तत्ू--वह घटना; विस्मिता:--आश्चर्यचकित; गोपा:--ग्वाले; गोप्य: च--तथा गोपियाँ; अति-प्रिय-आहता:--समाचार को बड़े आदर से सुना; प्रेम आगतम् इब-मानों ये बालक मृत्यु के मुख से लौट कर आये हों;उत्सुक्यात्-बड़ी उत्सुकता से; ऐश्षन्त--बालकों पर दृष्टि डालते हुए; तृषित-ईक्षणा:--पूर्ण सन््तोष से
कृष्ण तथा बालकों सेआँखें फेरने का मन नहीं हो रहा था।
जब ग्वालों तथा गोपियों ने जंगल में बकासुर के मारे जाने का समाचार सुना तो वेअत्यधिक विस्मित हो उठे।
कृष्ण को देखकर तथा उनकी कहानी सुन कर उन्होंने कृष्ण कास्वागत बड़ी उत्सुकता से यह सोचते हुए किया कि कृष्ण तथा अन्य बालक मृत्यु के मुख सेवापस आ गये हैं।
अतः वे कृष्ण तथा उन बालकों को मौन नेत्रों से देखते रहे।
अब जबकिबालक सुरक्षित थे, उनकी आँखें उनसे हटना नहीं चाह रही थीं।
अहो बतास्य बालस्य बहवो मृत्यवोभवन् ।
अप्यासीद्विप्रियं तेषां कृतं पूर्व यतो भयम् ॥
५५॥
अहो बत--यह अत्यन्त आश्चर्य की बात है; अस्य--इस; बालस्य--कृष्ण का; बहव:--अनेक; मृत्यव:--मृत्यु के कारण;अभवनू--आये; अपि--फिर भी; आसीतू--था; विप्रियम्--मृत्यु का कारण; तेषाम्--सबों का; कृतम्--किया हुआ;पूर्वमू--पहले; यत:--जिससे; भयम्--मृत्यु-भय था।
नन्द महाराज तथा अन्य ग्वाले विचार करने लगे: यह बड़े आश्चर्य की बात है कि यद्यपि इसबालक कृष्ण ने अनेक बार मृत्यु के विविध कारणों का सामना किया है किन्तु भगवान् कीकृपा से भय के इन कारणों का ही विनाश हो गया और उसका बाल बाँका भी नहीं हुआ।
अथधाप्यभिभवन्त्येनं नैव ते घोरदर्शना: ।
जिघांसयैनमासाद्य नश्यन्त्यग्नौ पतड़वत् ॥
५६॥
अथ अपि--यद्यपि उन्होंने आक्रमण करना चाहा; अभिभवन्ति--मारने में सक्षम हैं; एनमू--इस बालक को; न--नहीं; एव--निश्चय ही; ते--वे सब; घोर-दर्शना:--देखने में भयावने; जिघांसया--ईर्ष्या के कारण; एनम्--कृष्ण के; आसाद्य--पासआकर; नश्यन्ति--नष्ट हो जाते हैं ( आक्रामक की मृत्यु होती है ); अग्नौ--अग्नि में; पतड़-वत्--कीटों के समान।
यद्यपि मृत्यु के कारणरूप दैत्यगण अत्यन्त भयावने थे किन्तु वे इस बालक कृष्ण को मारनहीं पाये।
चूँकि वे निर्दोष बालकों को मारने आये थे इसलिए ज्योंही वे उनके निकट पहुँचेत्योंही वे उसी तरह मारे गये जिस तरह अग्नि पर आक्रमण करने वाले पतड़े मारे जाते हैं।
अहो ब्रह्मविदां वाचो नासत्या: सन्ति कर्हिचित् ।
गर्गो यदाह भगवानन्वभावि तथेव तत् ॥
५७॥
अहो--कितना आश्चर्यजनक है; ब्रह्म -विदाम्--ब्रह्म-ज्ञान से युक्त व्यक्तियों के; वाच:--शब्द; न--कभी नहीं; असत्या: --झूठ;सन्ति--होते हैं; कर्हिचित्ू--किसी भी समय; गर्ग:--गर्गमुनि ने; यत्ू--जो भी; आह--भविष्यवाणी की थी; भगवान्--परमशक्तिशाली; अन्वभावि--वही हो रहा है; तथा एब--जैसा; तत्--वहब्रह्म-ज्ञान से युक्त पुरुषों के शब्द कभी झूठे नहीं निकलते।
यह बड़े ही आश्चर्य की बात हैकि गर्गमुनि ने जो भी भविष्यवाणी की थी उसे ही हम विस्तार से वस्तुत: अनुभव कर रहे हैं।
इति नन्दादयो गोपा: कृष्णरामकथां मुदा ।
कुर्वन्तो रममाणाश्च नाविन्दन्भववेदनाम् ॥
५८ ॥
इति--इस प्रकार; नन्द-आदय:--नन्द महाराज इत्यादि; गोपा:--ग्वाले; कृष्ण-राम-कथाम्-- भगवान् कृष्ण तथा राम सम्बन्धीघटनाओं की कथा को; मुदा--बड़े ही आनन्द से; कुर्वन्तः--करते हुए; रममाणा: च--आनन्द लेते हुए तथा कृष्ण के प्रति प्रेमबढ़ाते हुए; न--नहीं; अविन्दन्ू--अनुभव किया; भव-वेदनाम्--इस संसार के कष्टों को |
इस तरह नन्द समेत सारे ग्वालों को कृष्ण तथा बलराम की लीलाओं सम्बन्धी कथाओं मेंबड़ा ही दिव्य आनन्द आया और उन्हें भौतिक कष्टों का पता तक नहीं चला।
एवं विहारैः कौमारैः कौमारं जहतुर्ब्रजे ।
निलायनै: सेतुबन्धर्मकटोत्प्लवनादिभि: ॥
५९॥
एवम्--इस प्रकार; विहारैः--विभिन्न लीलाओं द्वारा; कौमारैः--बाल्योचित; कौमारम्ू--बाल्यावस्था; जहतु:--बिताई; ब्रजे--ब्रजभूमि में; निलायनैः--आँख-मिचौनी खेलते हुए; सेतु-बन्धैः--समुद्र में नकली पुल बनाते हुए; मर्कट--वानरों की तरह;उत्प्लवन-आदिभि:--इधर-उधर कूदते-फाँदते |
इस तरह कृष्ण तथा बलराम ने व्रजभूमि में बच्चों के खेलों में, यथा आँख-मिचौनी खेलने,समुद्र में पुल बनाने का स्वांग करने तथा बन्दरों की तरह इधर-उधर कूदने-फाँदने में अपनीबाल्यावस्था व्यतीत की।
