← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची
अध्याय एक: भगवान कृष्ण का आगमन: परिचय
10.1श्रीराजोबाचकथितो वंशविस्तारो भवता सोमसूर्ययो: ।
राज्ञां चोभयवंश्यानांचरितं परमाद्भधुतम् ॥ १॥
श्री-राजा उवाच--राजा परीक्षित ने कहा; कथित:--पहले ही वर्णित हो चुका है, जो; वंश-विस्तार:--वंश का विस्तार सेवर्णन; भवता--आपके द्वारा; सोम-सूर्ययो:--चन्द्रदेव तथा सूर्यदेव के; राज्ञामू--राजाओं का; च--तथा; उभय--दोनों;वंश्यानाम्ू--वंश के सदस्यों का; चरितम्--चरित्र; परम-- श्रेष्ठ; अद्भुतम्--तथा अद्भुत
राजा परीक्षित ने कहा: हे प्रभु, आपने चन्द्रदेव तथा सूर्यदेव दोनों के वंशों का, उनकेराजाओं के महान् तथा अद्भुत चरित्रों सहित विशद वर्णन किया है।
यदोश्व धर्मशीलस्य नितरां मुनिसत्तम ।
तत्रांशेनावतीर्णस्य विष्णोर्वीर्याणि शंस न: ॥
२॥
यदोः--यदु या यदुवंश का; च--भी; धर्म-शीलस्य--जो धर्मनिष्ठ हैं; नितराम्--अत्यन्त योग्य; मुनि-सत्तम-हे मुनियों में श्रेष्ठअथवा मुनियों के राजा ( शुकदेव गोस्वामी ); तत्र--उस वंश में; अंशेन--अपने अंश बलदेव के साथ; अवतीर्णस्य--अवताररूप में प्रकट; विष्णो: -- भगवान् विष्णु के; वीर्याणि---महिमामय कार्यकलाप; शंस--कृपया वर्णन करें; न:--हमसे |
हे मुनिश्रेष्ठ, आप परम पवित्र तथा धर्मशील यदुवंशियों का भी वर्णन कर चुके हैं।
अब होसके तो कृपा करके उन भगवान् विष्णु या कृष्ण के अद्भुत महिमामय कार्यकलापों का वर्णनकरें जो यदुवंश में अपने अंश बलदेव के साथ प्रकट हुए हैं।
अवतीर्य यदोर्वशे भगवान्भूतभावन: ।
कृतवान्यानि विश्वात्मा तानि नो बद विस्तरात् ॥
३॥
अवतीर्य--अवतार लेकर; यदोः बंशे--यदुवंश में; भगवान्-- भगवान्; भूत-भावन: --विराट जगत के कारणस्वरूप;कृतवानू--सम्पन्न किया; यानि--जो भी ( कार्य ); विश्व-आत्मा--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के परमात्मा; तानि--उन सभी ( कार्यो )को; नः--हमसे; वद--कहें; विस्तरात्--विस्तार से
परमात्मा अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण, जो विराट जगत के कारण हैं, यदुवंश मेंप्रकट हुए।
आप कृपा करके मुझे उनके यशस्वी कार्यकलापों तथा उनके चरित्र का आदि सेलेकर अन्त तक वर्णन करें।
निवृत्ततर्षरुपगीयमानाद्भवौषधाच्छोत्रमनोभिरामात् ।
क उत्तमश्लोकगुणानुवादात्पुमान्विरज्येत विना पशुघ्नात् ॥
४॥
निवृत्त--मुक्त; तर्षै:--काम या भौतिक कार्यो से; उपगीयमानात्ू--वर्णित या गाया जाने वाला; भव-औषधात्-- भौतिक रोगकी सही औषधि से; श्रोत्र--कानों से सुनने की विधि; मन:--मन के लिए विचार का विषय; अभिरामात्--ऐसे महिमा-वर्णनकी सुहावनी ध्वनि से; कः--कौन; उत्तमशएलोक-- भगवान् का; गुण-अनुवादात्--ऐसे कार्यों का वर्णन करने से; पुमानू--मनुष्य; विरज्येत--अपने को विलग रख सकता है; विना--रहित; पशु-घ्नातू--कसाई अथवा अपने आप का ही वध करनेवाले से
भगवान् की महिमा का वर्णन परम्परा-पद्धति से किया जाता है अर्थात् यह अध्यात्मिक गुरुसे शिष्य तक पहुँचाया जाता है।
ऐसे वर्णन का आनन्द उन लोगों को मिलता है, जो इस जगतके मिथ्या, क्षणिक वर्णन में रुचि नहीं रखते।
भगवान् का गुणगान जन्म-मृत्यु के चक्कर में फँसेबद्धजीवों के लिए उपयुक्त औषधि है।
अतएव कसाई ( पशुघाती ) या अपने को ही मारने वाले( आत्मघाती ) के अतिरिक्त भगवान् की महिमा को सुनना कौन नहीं चाहेगा ?
देवब्रताद्यातिरथेस्तिमिड्रिलै: ।
दुरत्ययं कौरवसैन्यसागरंकृत्वातरन्वत्सपदं सम यत्प्लवा: ॥
५॥
द्रौण्यस्त्रविप्लुष्टमिदं मदड़ूंसन््तानबीजं कुरुपाण्डवानाम् ।
जुगोप कुक्षिं गत आत्तचक्रोमातुश्च मे यः शरणं गताया: ॥
६॥
वीर्याणि तस्याखिलदेहभाजा-मन्तर्बहिः पूरुषकालरूपै: ।
प्रयच्छतो मृत्युमुतामृतं चमायामनुष्यस्यथ वदस्व विद्वन् ॥
॥
पितामहाः --पाँचों पाण्डव, जो मेरे बाबा हैं; मे--मेरे; समरे--कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में; अमरम् जयैः--युद्धभूमि में देवताओंपर विजय प्राप्त करने वाले योद्धाओं समेत; देवब्रत-आद्य-- भीष्मदेव तथा अन्य; अतिरथै:--महा सेनापतियों के साथ;तिमिड्लिलै:--तिमिंगिल ( बड़ी मछली ) के समान; दुरत्ययम्--दुर्लघ्य; कौरव-सैन्य-सागरम्--कौरवों के एकत्र सैनिकों केसागर को; कृत्वा--मानकर; अतरन्--पार कर लिया; वत्स-पदम्--गो खुर के समान; स्म--था; यत्-प्लवा:--कृष्ण कीचरणकमल रूपी नाव का आश्रय; द्रौणि--अश्वत्थामा के; अस्त्र-ब्रह्मस्त्र से; विप्लुष्टमू-- आक्रमण करके जलाया गया;इदम्ू--यह; मत्-अड्रम्-मेरा शरीर; सन््तान-बीजम्--एकमात्र बचा हुआ बीज, वंश का अन्तिम उत्तराधिकारी; कुरु-पाण्डवानामू--कौरवों तथा पाण्डवों का ( कुरुक्षेत्र में मेरे अतिरिक्त सभी लोग मारे जा चुके हैं ); जुगोप--शरण दी; कुक्षिम्--गर्भ में; गत:--स्थापित; आत्त-चक्र:--हाथ में चक्र लिए; मातुः:--माता का; च-- भी; मे--मेरी; यः--जो भगवान्;शरणमू--शरण; गताया:--ग्रहण कर ली है; वीर्याणि--दिव्य गुणों का गान; तस्य--उस ( भगवान् ) का; अखिल-देह-भाजाम्--समस्त देहधारी जीवों का; अन्तः बहि:ः-- भीतर तथा बाहर; पूरुष--परम पुरुष का; काल-रूपैः--नित्य समय केरूपों में; प्रयच्छत:--देने वाला; मृत्युम्--मृत्यु को; उत--ऐसा कहा जाता है; अमृतम् च--तथा शाश्रत जीवन; माया-मनुष्यस्थ-- भगवान् का, जो अपनी शक्ति से मनुष्य रूप में प्रकट हुए हैं; वदस्व--कृपा करके कहें; विद्वनू--हे विद्वान( शुकदेव गोस्वामी )॥
कृष्ण के चरणकमल रूपी नाव को लेकर मेरे बाबा अर्जुन तथा अनन््यों ने उस कुरुक्षेत्रयुद्धस्थल रूपी सागर को पार कर लिया जिसमें भीष्मदेव जैसे सेनापति उन बड़ी-बड़ी मछलियोंके तुल्य थे, जो उन्हें आसानी से निगल गई होतीं।
मेरे पितामहों ने भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा सेइस दुर्लध्य सागर को इतनी सरलता से पार कर लिया मानो कोई गोखुर का चिन्ह हो।
चूँकि मेरीमाता ने सुदर्शन चक्रधारी भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों की शरण ग्रहण की थी अतःउन्होंने उनके गर्भ में प्रवेश करके मुझे बचा लिया जो कौरवों तथा पाण्डवों का अन्तिम बचाहुआ उत्तराधिकारी था और जिसे अश्वत्थामा ने अपने ब्रह्मास्त्र से नष्टप्राय कर दिया था।
भगवान्कृष्ण ने समस्त देहधारी जीवों के भीतर तथा बाहर शाश्रत काल के रूपों में--यथा परमात्मातथा विराट रूपों में--अपनी शक्ति से प्रकट होकर हर एक को क्रूर मृत्यु के रूप में या जीवनके रूप में मोक्ष प्रदान किया।
कृपया उनके दिव्य गुणों का वर्णन करके मुझे प्रबुद्ध कीजिए ।
रोहिण्यास्तनयः प्रोक्तो राम: सट्डूर्षणस्त्वया ।
देवक्या गर्भसम्बन्ध: कुतो देहान्तरं बिना ॥
८॥
रोहिण्या:--बलदेव की माता रोहिणी देवी का; तनयः--पुत्र; प्रोक्त:--विख्यात; राम:--बलराम; सद्जूर्षण:--संकर्षण औरकोई नहीं, बलराम हैं, जो चतुर्व्यूह ( संकर्षण, अनिरुद्ध, प्रद्युम्न तथा वासुदेव ) में प्रथम हैं; त्वया--आपके द्वारा ( ऐसा कहाजाता है ); देवक्या: --कृष्ण की माता, देवकी का; गर्भ-सम्बन्ध:--गर्भ सम्बन्धी; कुतः--कैसे; देह-अन्तरम्--शरीरों केस्थानान्तरण के; विना--बिना
हे शुकदेव गोस्वामी, आप पहले ही बता चुके हैं कि द्वितीय चतुर्व्यूह से सम्बन्धित संकर्षणरोहिणी के पुत्र बलराम के रूप में प्रकट हुए।
यदि बलराम को एक शरीर से दूसरे शरीर मेंस्थानान्तरित न किया गया होता तो यह कैसे सम्भव हो पाता कि वे पहले देवकी के गर्भ में रहतेऔर बाद में रोहिणी के गर्भ में ? कृपया मुझसे इसकी व्याख्या कीजिए।
कस्मान्मुकुन्दो भगवान्पितुर्गेहाद्त्रजं गतः ।
क्व वासं ज्ञातिभि: सार्थ कृतवान्सात्वतां पति: ॥
९॥
कस्मात्-क्यों; मुकुन्द:--हर एक को मोक्ष देने वाले कृष्ण; भगवान्-- भगवान्; पितु:--अपने पिता ( वसुदेव ) के; गेहात्--घर से; ब्रजम्-व्रजधाम या ब्रजभूमि; गत:--गये; क्व--कहाँ; वासम्ू--रहने के लिए रखा; ज्ञातिभिः--उनके सम्बन्धियों के;सार्धम्--साथ; कृतवान्--कर दिया; सात्वताम् पति: --समस्त वैष्णव भक्तों के स्वामी
भगवान् कृष्ण ने अपने पिता वसुदेव का घर क्यों छोड़ा और अपने को वृन्दावन में नन््द केघर क्यों स्थानान्तरित किया ? यदुवंश के स्वामी अपने सम्बन्धियों के साथ वृन्दावन में कहाँ रहे ?
ब्रजे वसन्किमकरोन्मधुपुर्या च केशव: ।
भ्रातरं चावधीत्कंसं मातुरद्धातदर्हणम् ॥
१०॥
ब्रजे--वृन्दावन में; वसन्--रहते हुए; किम् अकरोत्--उन्होंने क्या किया; मधुपुर्याम्--मथुरा में; च--तथा; केशव:--केशी केसंहार करने वाले, कृष्ण ने; भ्रातरम्-- भाई; च--तथा; अवधीत्--मारा; कंसम्--कंस को; मातुः--अपनी माता के; अद्धघा--प्रत्यक्ष; अ-तत्-अर्हणम्--शास्त्र जिसकी अनुमति नहीं देते।
भगवान् कृष्ण वृन्दावन तथा मथुरा दोनों जगह रहे तो वहाँ उन्होंने क्या किया ? उन्होंने अपनीमाता के भाई ( मामा ) कंस को क्यों मारा जबकि शास्त्र ऐसे वध की रंचमात्र भी अनुमति नहींदेते ?
देहं मानुषमाश्रित्य कति वर्षाणि वृष्णिभि: ।
यदुपुर्या सहावात्सीत्पल्य: कत्यभवन्प्रभो: ॥
११॥
देहम्--शरीर; मानुषम्--मनुष्य की ही तरह; आश्रित्य--स्वीकार करके; कति वर्षाणि--कितने वर्षो तक; वृष्णिभि:--वृष्णिवंश में उत्पन्न होने वालों के साथ में; यदु-पुर्यामू--यदुओं के आवास-स्थानों में, द्वारका में; सह--साथ; अवात्सीत्-- भगवान्रहे; पत्य:--पत्ियाँ; कति--कितनी; अभवन् -हुईं; प्रभोः-- भगवान् के
भगवान् कृष्ण का शरीर भौतिक नहीं है, फिर भी वे मानव के रूप में प्रकट होते हैं।
वेवृष्णि के वंशजों के साथ कितने वर्षों तक रहे ? उनके कितनी पत्रियाँ थीं? वे द्वारका में कितनेवर्षों तक रहे ?
एतदन्यच्च सर्व मे मुने कृष्णविचेष्टितम् ।
वक्तुमईसि सर्वज्ञ श्रद्धधानाय विस्तृतम् ॥
१२॥
एततू--ये सारी बातें; अन्यत् च--तथा अन्य बातें भी; सर्वम्--सारी बातें; मे--मुझको; मुने--हे मुनि; कृष्ण-विचेष्टितम्--भगवान् कृष्ण के कार्यकलापों को; वक्तुम्ू--बतलाने में; अहसि--समर्थ हैं; सर्व-ज्ञ--सब कुछ जानने वाले; श्रद्धानाय--श्रद्धावान होने के कारण; विस्तृतम्--विस्तार से |
हे महामुनि, आप कृष्ण के विषय में सब कुछ जानते हैं अतएव उन सारे कार्यकलापों कावर्णन विस्तार से करें जिनके बारे में मैंने पूछा है तथा उनके बारे में भी जिनके विषय में मैंने नहींपूछा क्योंकि उन पर मेरा पूर्ण विश्वास है और मैं उन सबको सुनने के लिए अत्यन्त उत्सुक हूँ।
नैषातिदुःसहा क्षुन्मां त्यक्तोदमपि बाधते ।
पिबन्तं त्वन्मुखाम्भोजच्युतं हरिकथामृतम् ॥
१३ ॥
न--नहीं; एघा--यह सब; अति-दुःसहा--सहने में अत्यन्त कठिन; क्षुत्-- भूख; माम्--मुझको; त्यक्त-उदम्--जल ग्रहणकरना छोड़ देने के बाद; अपि-- भी; बाधते--बाधा नहीं डालता; पिबन्तम्--पीते रहने पर; त्वत्-मुख-अम्भोज-च्युतम्--आपके कमलमुख से निकला हुआ; हरि-कथा-अमृतम्--कृष्ण कथा का अमृत
मृत्यु द्वार पर होते हुए अपने व्रत के कारण मैंने जल ग्रहण करना भी छोड़ दिया है फिर भीआपके कमलमुख से निकले कृष्ण-कथा रूपी अमृत का पान करने से मेरी असहाय भूख तथाप्यास मुझे किसी तरह भी बाधा नहीं पहुँचा रही।
सूत उवाचएवं निशम्य भृगुनन्दन साधुवादंवैयासकि: स भगवानथ विष्णुरातम् ।
प्रत्यर्च्य कृष्णचरितं कलिकल्मषपघ्नंव्याहर्तुमारभत भागवतप्रधान: ॥
१४॥
सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; एबम्--इस प्रकार; निशम्य--सुनकर; भूगु-नन्दन--हे भूगुवंशी, शौनक; साधु-वादम्--शुभ प्रश्न; वैयासकि:--व्यासदेव के पुत्र, शुकदेव गोस्वामी; सः--वह; भगवान्--अत्यन्त शक्तिशाली; अथ--इस प्रकार;विष्णु-रातम्--विष्णु द्वारा सुरक्षित परीक्षित महाराज को; प्रत्यर्च्य--सादर नमस्कार करके ; कृष्ण-चरितम्--कृष्णकथा को;कलि-कल्मष-घछनम्--इस कलियुग के कष्टों को कम करने वाली; व्याहर्तुमु-वर्णन करने के लिए; आरभत--शुरू किया;भागवत-प्रधान:--शुद्ध भक्तों में प्रमुख शुकदेव गोस्वामी ने।
सूत गोस्वामी ने कहा : हे भूगुपुत्र (शौनक ऋषि ), परम आदरणीय व्यासपुत्र भक्त शुकदेवगोस्वामी ने महाराज परीक्षित के शुभ प्रश्नों को सुनकर राजा को सादर धन्यवाद दिया।
फिरउन्होंने कृष्णकथा के विषय में वार्ता प्रारम्भ की जो इस कलियुग के समस्त कष्टों के लिएऔषधि है।
श्रीशुक उबाचसम्यग्व्यवसिता बुद्धिस्तव राजर्षिसत्तम ।
वासुदेवकथायां ते यज्जाता नैष्ठिकी रति: ॥
१५॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; सम्यक्--पूरी तरह; व्यवसिता--स्थिर; बुद्धि: --बुर्दधि; तब--आपकी;राज-ऋषि-सत्तम-हे राजर्षियों में श्रेष्ठ; बासुदेब-कथायाम्--वासुदेव कृष्ण विषयक कथाओं के सुनने में; ते--आपका;यत्--क्योंकि; जाता--उत्पन्न; नैष्ठिकी--अनवरत; रतिः--आकर्षण या भावमय भक्ति
शरील शुकदेव गोस्वामी के कहा : हे राजर्षियों में श्रेष्ठ, चूँकि आप वासुदेव की कथाओं केप्रति अत्यधिक आकृष्ट हैं अत: निश्चित रूप से आपकी बुद्धि आध्यात्मिक ज्ञान में स्थिर है, जोमानवता का एकमात्र असली लक्ष्य है।
चूँकि यह आकर्षण अनवरत रहता है अतएव निश्चितरूपसे उत्कृष्ट है।
वासुदेवकथाप्रएन: पुरुषांस्त्रीन्पुनाति हि ।
वक्तारं प्रच्छक॑ श्रोतृंस्तत्पादसलिलं यथा ॥
१६॥
वासुदेव-कथा-प्रश्न:--वासुदेव कृष्ण की लीलाओं तथा गुणों के विषय में प्रश्न; पुरुषान्--पुरुषों को; त्रीन्--तीनों;पुनाति--पवित्र करते हैं; हि--निश्चय ही; वक्तारम्ू--वक्ता को, यथा शुकदेव गोस्वामी; प्रच्छकम्--जिज्ञासु आता को, यथामहाराज परीक्षित; श्रोतूनू--तथा कथा को सुनने वालों को; ततू-पाद-सलिलम् यथा--जिस तरह
भगवान् विष्णु के अँगूठे सेनिकलने वाले गंगा जल से सम्पूर्ण संसार पवित्र हो जाता है।
भगवान् विष्णु के चरणों के अँगूठे से निकलने वाली गंगा तीनों लोकों--ऊपरी, मध्य तथा अध: लोकों--को पवित्र बनाने वाली है।
इसी तरह जब कोई व्यक्ति भगवान् वासुदेव कृष्ण कीलीलाओं तथा गुणों के विषय में प्रश्न करता है, तो तीन प्रकार के व्यक्ति--वक्ता या उपदेशक,प्रश्नकर्ता तथा सुनने वाले मनुष्य--शुद्ध हो जाते हैं।
भूमि प्तनृपव्याजदैत्यानीकशतायुतै: ।
आक्रान्ता भूरिभारेण ब्रह्माणं शरणं ययौ ॥
१७॥
भूमिः--पृथ्वी माता; हप्त--गर्वित; नृप-व्याज--राजाओं का स्वांग भरते हुए अथवा राज्य में साक्षात् परम शक्ति; दैत्य--असुरोंकी; अनीक--सैनिकों की सेना; शत-अयुतैः--सैकड़ों हजारों में, असंख्य; आक्रान्ता--बोझिल होकर; भूरि-भारेण--व्यर्थकी सेना के बोझ से; ब्रह्मणम्--ब्रह्म के पास; शरणम्--शरण खोजने; ययौ--गयी
एक बार माता पृथ्वी राजाओं के वेश में गर्वित लाखों असुरों की सेना से बोझिल हो उठी तोवह इससे छुटकारा पाने के लिए ब्रह्मा के पास पहुँची।
गौर्भूत्वाश्रुमुखी खिन्ना क्रन्दन्ती करूणं विभो: ।
उपस्थितान्तिके तस्मै व्यसनं समवोचत ॥
१८॥
गौ:--गाय; भूत्वा--बनकर; अश्रु-मुखी--आँखों में आँसू भरकर; खिन्ना--अत्यन्त दुखी; क्रन्दन्ती--रोती हुई; करुणम्--बेचारी; विभो:--ब्रह्मा के; उपस्थिता--प्रकट हुई; अन्तिके--समक्ष; तस्मै--उनसे ( ब्रह्मा से ); व्यसनम्--अपनी विपदा;समवोचत--निवेदन किया।
माता पृथ्वी ने गाय का रूप धारण किया।
वह अत्यन्त दुखियारी, अपनी आँखों में आँसू भर कर भगवान् ब्रह्मा के समक्ष प्रकट हुई और उसने उनसे अपनी विपदा कह सुनायी।
ब्रह्मा तदुपधार्याथ सह देवैस्तया सह ।
जगाम सत्रिनयनस्तीरं क्षीरपयोनिधे: ॥
१९॥
ब्रह्मा--ब्रह्माजी; ततू-उपधार्य--हर बात को ठीक से समझ कर; अथ--तत्पश्चात्; सह--साथ; देवै:ः--देवताओं के; तयासह--माता पृथ्वी के साथ; जगाम--निकट गए; स-बत्रि-नयन:--तीन नेत्रों वाले शिवजी के साथ; तीरम्--तट पर; क्षीर-पयः-निधे:--क्षीर सागर के |
माता पृथ्वी की विपदा सुनकर ब्रह्माजी, माता पृथ्वी तथा शिवजी एवं अन्य समस्त देवताओंके साथ क्षीरसागर के तट पर जा पहुँचे।
तत्र गत्वा जगन्नाथ देवदेवं वृषाकपिम् ।
पुरुष पुरुषसूक्तेन उपतस्थे समाहित: ॥
२०॥
तत्र--वहाँ ( क्षीरसागर के तट पर ); गत्वा--जाकर; जगन्नाथम्--समग्र ब्रह्माण्ड के स्वामी को; देव-देवम्--सारे देवताओं केभी परम ईश्वर को; वृषाकपिम्--परम पुरुष विष्णु को जो हर एक का पालन करने वाले तथा सबके कष्टों को दूर करने वाले हैं;पुरुषम्-परम पुरुष को; पुरुष-सूक्तेन--पुरुषसूक्त नामक वैदिक मंत्र से; उपतस्थे--पूजा किया; समाहितः--पूर्ण मनोयोगसे
क्षीर सागर के तट पर पहुँच कर सारे देवताओं ने समस्त ब्रह्माण्ड के स्वामी, समस्तदेवताओं के परम ईश तथा हर एक का पालन करने वाले और उनके दुखों को दूर करने वालेभगवान् विष्णु की पूजा की।
उन्होंने बड़े ही मनोयोग से पुरुषसूक्त नामक वैदिक मंत्रों के पाठद्वारा क्षीर सागर में शयन करने वाले भगवान् विष्णु की पूजा की।
गिरं समाधौ गगने समीरितांनिशम्य वेधास्त्रिदशानुवाच ह ।
गां पौरूषीं मे श्रुणुतामरा: पुन-विंधीयतामाशु तथेव मा चिरम्ू ॥
२१॥
गिरम्--शब्दों की ध्वनि; समाधौ--समाधि में; गगने--आकाश में; समीरिताम्--ध्वनित; निशम्य--सुनकर; बेधा: --ब्रह्मा ने;त्रिदशान्ू--देवताओं को; उवाच--कहा; ह--ओह; गाम्--आदेश; पौरुषीम्--परम पुरूष से प्राप्त; मे--मुझको; श्रुणुत--सुनिए; अमरा: --हे देवताओ; पुनः--फिर; विधीयताम्--सम्पन्न करो; आशु--तुरन््त; तथा एब--उसी तरह; मा--मत;चिरमू--विलम्ब।
ब्रह्माजी जब समाधि में थे, भगवान् विष्णु के शब्दों को आकाश में ध्वनित होते सुना।
तबउन्होंने देवताओं से कहा, ' अरे देवताओ! मुझसे परम पुरुष क्षीरोदकशायी विष्णु का आदेशसुनो और बिना देर लगाए उसे ध्यानपूर्वक पूरा करो।
पुरैव पुंसावधृतो धराज्वरोभवद्धिरंशैर्यदुषूपजन्यताम् ।
स यावदुर्व्या भरमी श्वरे श्र:स्वकालशक्त्या क्षपयंश्ररेद्धुवि ॥
२२॥
पुरा--इससे भी पहले; एब--निस्सन्देह; पुंसा-- भगवान् द्वारा; अवधृतः--ज्ञात था; धरा-ज्वरः--पृथ्वी पर संकट; भवद्धिः--आपके; अंशै: --अंशों द्वारा; यदुषु--राजा यदु के वंश में; उपजन्यताम्--जन्म लेकर; सः--वह ( भगवान् ); यावत्ू--जबतक; उर्व्या:--पृथ्वी का; भरम्-- भार; ई श्वर-ई श्वर:ः --ई श्वरों के ईश्वर; स्व-काल-शक्त्या--अपनी ही काल शक्ति द्वारा;क्षपयन्--घटाने के लिए; चरेत्--गति करें; भुवि--पृथ्वी की सतह पर।
भगवान् ब्रह्माजी ने देवताओं को बतलाया: हमारे द्वारा याचना करने के पूर्व ही भगवान्पृथ्वी के संकट से अवगत हो चुके थे।
फलतः जब तक भगवान् अपनी काल शक्ति के द्वारापृथ्वी का भार कम करने के लिए पृथ्वी पर गतिशील रहें तब तक तुम सभी देवताओं को यदुओंके परिवार में उनके पुत्रों तथा पौत्रों के अंश के रूप में अवतीर्ण होना होगा।
बसुदेवगहे साक्षाद्धगवान्पुरुष: पर: ।
जनिष्यते तत्प्रियार्थ सम्भवन्तु सुरस्त्रिय: ॥
२३॥
बसुदेव-गृहे--वसुदेव ( कृष्ण के पिता ) के घर में; साक्षात्--साकार रूप में; भगवान्--पूर्ण शक्तिमान भगवान्; पुरुष: --आदि पुरुष; पर:--दिव्य; जनिष्यते--उत्पन्न होगा; तत्ू-प्रिय-अर्थम्--उसकी तुष्टि के लिए; सम्भवन्तु--जन्म लेना होगा; सुर-स्त्रियः--देवताओं की स्त्रियों को |
सर्वशक्तिमान भगवान् कृष्ण वसुदेव के पुत्र रूप में स्वयं प्रकट होंगे।
अतः देवताओं कीसारी स्त्रियों को भी उन्हें प्रसन्न करने के लिए प्रकट होना चाहिए।
वासुदेवकलानन्तः सहस्त्रवदन: स्वराट् ।
अग्रतो भविता देवो हरे: प्रियचिकीर्षया ॥
२४॥
वासुदेव-कला अनन्त:--भगवान् कृष्ण का अंश जो अनन्तदेव या संकर्षण अनन्त के नाम से प्रसिद्ध हैं, भगवान् कासर्वव्यापक अवतार; सहस्त्र-वदन:--हजार फनों वाला; स्वराट्--पूर्णतया स्वतंत्र; अग्रतः--इसके पूर्व; भविता--प्रकट होगा;देवः-- भगवान्; हरेः -- कृष्ण का; प्रिय-चिकीर्षया--आनन्द के लिए कार्य करने की इच्छा से |
कृष्ण का सबसे अग्रणी स्वरूप संकर्षण है, जो अनन्त कहलाता है।
वह इस भौतिक जगतमें सारे अवतारों का उद्गम है।
भगवान् कृष्ण के प्राकटय के पूर्व यह आदि संकर्षण कृष्ण कोउनकी दिव्य लीलाओं में प्रसन्न करने के लिए बलदेव के रूप में प्रकट होगा।
विष्णोर्माया भगवती यया सम्मोहितं जगत् ।
आदिष्टा प्रभुणांशेन कार्यार्थे सम्भविष्यति ॥
२५॥
विष्णो: माया--भगवान् विष्णु की शक्ति; भगवती-- भगवान् के ही समकक्ष अतएव भगवती नाम से जानी जाने वाली; यया--जिससे; सम्मोहितम्--मोहित; जगत्--सारे जगत, भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों; आदिष्टा--आदेश पाकर; प्रभुणा--स्वामीके द्वारा; अंशेन--अपने विभिन्न शक्तिशाली कारकों के साथ; कार्य-अर्थे--पूरा काम करने के लिए; सम्भविष्यति--जन्मलेगी।
विष्णु माया कहलाने वाली भगवान् की शक्ति जो भगवान् के ही समान है, भगवान् कृष्णके साथ-साथ ही प्रकट होगी।
यह शक्ति विभिन्न पदों पर कार्य करती हुईं भौतिक तथाआध्यात्मिक सभी जगतों को मोहने वाली है।
वह अपने स्वामी के आग्रह पर भगवान् का कार्यसम्पन्न करने के लिए अपनी विविध शक्तियों सहित प्रकट होगी।
श्रीशुक उबाचइत्यादिश्यामरगणान्प्रजापतिपतिर्विभु: ।
आश्वास्य च महीं गीर्मि: स्वधाम परमं ययौ ॥
२६॥
श्री-शुक: उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; आदिश्य--सूचना देकर; अमर-गणान्--देवताओं को;प्रजापति-पति:--प्रजापतियों के स्वामी ब्रह्माजी; विभु:--सर्वशक्तिमान; आश्वास्य--आ श्वासन देकर; च--भी; महीम्--मातापृथ्वी को; गीर्भि:--मधुर शब्दों से; स्व-धाम--अपने धाम, ब्रह्मलोक; परमम्--सर्व श्रेष्ठ ( ब्रह्मण्ड के भीतर ); ययौ--लौटगये
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : इस तरह देवताओं को सलाह देकर तथा माता पृथ्वी कोआश्वस्त करते हुए अत्यन्त शक्तिशाली ब्रह्माजी, जो समस्त प्रजापतियों के स्वामी होने सेप्रजापति-पति कहलाते हैं, अपने धाम ब्रह्मलोक लौट गये।
शूरसेनो यदुपतिर्मथुरामावसन्पुरीम् ।
माथुराज्छूरसेनां श्व विषयान्बुभुजे पुरा ॥
२७॥
शूरसेन:--राजा शूरसेन; यदु-पति:--यदुवंश का मुखिया; मथुराम्--मथुरा नामक स्थान में; आवसन्--जाकर रहने लगा;पुरीम्--नगरी में; माथुरान्ू--माथुर जिले के नाम से विख्यात स्थान में; शूरसेनान्ू च--तथा शूरसेन नामक स्थान में; विषयान्--ऐसे राज्यों का; बुभुजे--भोग किया; पुरा--प्राचीन काल में ।
प्राचीन काल में यदुबंश का मुखिया शूरसेन मथुरा नामक नगरी में रहने के लिए गया।
वहाँ उसने माथुर तथा शूरसेन नामक स्थानों का भोग किया।
राजधानी ततः साभूत्सर्वयादवभूभुजाम् ।
मथुरा भगवान्यत्र नित्यं सबन्निहितो हरि: ॥
२८॥
राजधानी --राजधानी; तत:--उस समय से; सा--वह ( मथुरा नामक नगरी तथा देश ); अभूत्--बन गया; सर्व-यादव-भूभुजाम्--यदुवंश में होने वाले सारे राजाओं की; मथुरा--मथुरा नामक स्थान; भगवान्-- भगवान्; यत्र--जहाँ; नित्यम्--शाश्वत रूप से; सन्निहित:ः--घनिष्टतापूर्वक सम्बद्ध, नित्यवास करते हुए; हरिः--भगवान् |
उस समय से मथुरा नगरी सारे यदुबंशी राजाओं की राजधानी बनी रही।
मथुरा नगरी तथामथुरा जनपद कृष्ण से घनिष्टतापूर्वक जुड़े हैं क्योंकि वहाँ कृष्ण का नित्य वास है।
तस्यां तु कर्हिचिच्छौरि्व॑सुदेव: कृतोद्वहः ।
देवक्या सूर्यया सार्थ प्रयाणे रथमारुहत् ॥
२९॥
तस्यामू--उस मथुरा नामक स्थान में; तु--निस्सन्देह; कर्हिचित्ू--कुछ समय बीता; शौरि:--शूर का वंशज, देवता; बसुदेव:--बसुदेव रूप में प्रकट; कृत-उद्बगद: --विवाह करने के बाद; देवक्या--देवकी से; सूर्यया--अपनी नवविवाहिता पत्नी के;सार्धम्--साथ; प्रयाणे--घर लौटने के लिए; रथम्--रथ पर; आरुहत्--चढ़ा |
कुछ समय पूर्व देववंश ( या शूरवंश ) के वसुदेव ने देवकी से विवाह किया।
विवाह केबाद वह अपनी नवविवाहिता पत्नी के साथ घर लौटने के लिए अपने रथ पर आरूढ़ हुआ।
उपग्रसेनसुतः कंस: स्वसु: प्रियचिकीर्षया ।
रश्मीन्हयानां जग्राह रौक्मै रथशतैर्वृतः ॥
३० ॥
उग्रसेन-सुत:--उग्रसेन का बेटा; कंस:ः--कंस ने; स्वसु:--अपनी बहिन देवकी के; प्रिय-चिकीर्षया--विवाह के अवसर परउसे प्रसन्न करने के लिए; रश्मीन्ू--लगामों को; हयानाम्--घोड़ों की; जग्राह--पकड़ लिया; रौक्मैः --सोने की बनी; रथ-शतैः--सैकड़ों रथों से; वृत:--घिरा हुआ।
राजा उग्रसेन के पुत्र कंस ने अपनी बहन देवकी को उसके विवाह के अवसर पर प्रसन्न करनेकी दृष्टि से घोड़ों की लगामें अपने हाथ में थाम लीं और स्वयं रथचालक ( सारथी ) बन गया।
वह सैकड़ों सुनहरे रथों से घिरा था।
चतुःशतं पारिबई गजानां हेममालिनाम् ।
अश्वानामयुतं सार्थ रथानां च त्रिषघट्शतम् ॥
३१॥
दासीनां सुकुमारीणां द्वे शते समलड्डू ते ।
दुहित्रे देवकः प्रादाद्याने दुहितृबत्सल: ॥
३२॥
चतु:-शतम्--चार सौ; पारिबहम्--दहेज; गजानाम्--हाथियों के; हेम-मालिनाम्--सोने के हारों से सजे; अश्वानाम्--घोड़ोंके; अयुतम्--दस हजार; सार्धमू--साथ में; रथानाम्ू--रथों के; च--तथा; त्रि-षट्-शतम्--छह सौ का तिगुना, अठारह सौ;दासीनाम्--दासियों के; सु-कुमारीणाम्--अत्यन्त जवान तथा सुन्दर अविवाहित लड़कियाँ; द्वे--दो; शते--सौ; समलड्ढू ते--गहनों से सज्जित; दुहित्रे--अपनी पुत्री को; देवक:--राजा देवक; प्रादात्-भेंट स्वरूप दिया; याने--जाते समय; दुहितृ-बत्सलः--अपनी पुत्री देवकी को अत्यधिक चाहने वाला |
देवकी का पिता राजा देवक अपनी पुत्री को अत्यधिक स्नेह था।
अतएव जब देवकी तथाउसका पति घर से विदा होने लगे तो उसने दहेज में सोने के हारों से सुसज्जित चार सौ हाथी दिए।
साथ ही दस हजार घोड़े, अठारह हजार रथ तथा दो सौ अत्यन्त सुन्दर तथा गहनों से अच्छी तरहअलंकृत युवा दासियाँ दीं।
शह्डतूर्यमृदड़ाश्च नेदुर्दुन्दुभयः समम् ।
प्रयाणप्रक्रमे तात वरवध्वो: सुमड्रलम् ॥
३३॥
शब्डु--शंख,; तूर्य--तुरही; मृदड्राः--मृदंग; च-- भी; नेदु:--बजने लगे; दुन्दुभय:--नगाड़े; समम्--एकसाथ; प्रयाण-प्रक्रो--विदाई के समय; तात-हे पुत्र; बर-वध्वो:--दूल्हा तथा दुल्हन की; सु-मड्गलम्--शुभ विदाई के लिए
हे प्रिय पुत्र महाराज परीक्षित, जब दूल्हा तथा दुल्हन विदा होने लगे तो उनकी शुभ विदाईपर शंख, तुरही, मृदंग तथा नगाड़े एकसाथ बजने लगे।
पथि प्रग्रहिणं कंसमाभाष्याहाशरीरवाक् ।
अस्यास्त्वामष्टमो गर्भो हन्ता यां वहसेडबुध ॥
३४॥
पथ्ि--रास्ते में; प्रग्रहिणम्--घोड़ों की लगाम थामे हुए; कंसम्--कंस को; आभाष्य--सम्बोधित करते हुए; आह--कहा; अ-शरीर-वाक्ू--अहृश्य शरीर से आने वाली आवाज ने; अस्या:--इस ( देवकी ) का; त्वाम्ू--तुमको; अष्टम: --आठवाँ; गर्भ:--गर्भ; हन्ता--मारने वाला; याम्--जिसको; वहसे--लिए जा रहे हो; अबुध--हे मूर्ख
जब कंस घोड़ों की लगाम थामे मार्ग पर रथ हाँक रहा था, तो किसी अशरीरी आवाज नेउसको सम्बोधित किया, ‘'आरे मूर्ख दुष्ट! तुम जिस स्त्री को लिए जा रहे हो उसकी आठवींसनन््तान तुम्हारा वध करेगी।
इत्युक्त: स खलः पापो भोजानां कुलपांसन: ।
भगिनीं हन्तुमारब्धं खड्गपाणि: कचेग्रहीत् ॥
३५॥
इति उक्त:--इस तरह कहे जाने पर; सः--वह ( कंस ); खलः--दुष्ट, ईर्ष्यालु; पाप:--पापी; भोजानाम्-- भोज कुल का; कुल-पांसन:--अपने कुल की ख्याति को नीचे गिराने वाला; भगिनीम्--अपनी बहन को; हन्तुम् आरब्धम्-मारने के लिए उद्यत;खड्ग-पाणि:--हाथ में तलवार लेकर; कचे--बाल; अग्रहीत्ू--पकड़ लिया।
कंस भोजवंश का अधम व्यक्ति था क्योंकि वह ईर्ष्यालु तथा पापी था।
इसलिए उसने जबयह आकाशवाणी सुनी तो उसने बाएँ हाथ से अपनी बहन के बाल पकड़ लिए और उसके सिरको धड़ से अलग करने के लिए दाहिने हाथ से अपनी तलवार निकाली।
त॑ जुगुप्सितकर्माणं नृशंसं निरपत्रपम् ।
वसुदेवो महाभाग उबाच परिसान्त्वयन् ॥
३६॥
तम्--उस ( कंस ) को; जुगुप्सित-कर्माणम्--जो ऐसा घृणित कर्म करने के लिए तैयार था; नृशंसम्--अत्यन्त क्रूर;निरपत्रपम्--बेहया, निर्लज; वसुदेव:--वसुदेव ने; महा-भाग:--वासुदेव का अत्यन्त भाग्यशाली पिता; उबाच--कहा;परिसान्त्वयन्--सान्त्वना देते हुए।
कंस इतना क्रूर तथा ईर्ष्यालु था कि वह निर्लज्ञतापूर्वक अपनी बहन को मारने के लिएतैयार था अतः उसे शान्त करने के लिए कृष्ण के होने वाले पिता महात्मा बसुदेव ने उससेनिम्नलिखित शब्द कहे।
श्रीवसुदेव उबाचएलाघनीयगुण: शूरैर्भवान्भोजयशस्करः ।
स कथं भगिनीं हन्यात्स्त्रियमुद्दराहपर्वणि ॥
३७॥
श्री-वसुदेव: उबाच--महाभाग वसुदेव ने कहा; एलाघनीय-गुण:--प्रशंसनीय गुणों से युक्त; शूरैः--शूरवीरों के द्वारा; भवान्--आप; भोज-यशः-करः--भोजवंश का दैदीप्यमान नक्षत्र; सः--आप जैसा; कथम्--किस तरह; भगिनीम्ू-- अपनी बहन को;हन्यात्ू--मार सकता है; स्त्रियमू--विशेष रूप से स्त्री को; उद्बाह-पर्वीणि--विवाहोत्सव के समय
वसुदेव ने कहा : हे साले महाशय, तुम्हारे भोज परिवार को तुम पर गर्व है और बड़े-बड़ेशूरवीर तुम्हारे गुणों की प्रशंसा करते हैं।
भला तुम्हारे जैसा योग्य व्यक्ति एक स्त्री को, जो उसीकी बहन है, विशेष रूप से उसके विवाह के अवसर पर, मार कैसे सकता है?
मृत्युर्जन्मवरतां वीर देहेन सह जायते ।
अद्य वाब्दशतान्ते वा मृत्युर्वें प्राणिनां ध्रुव: ॥
३८ ॥
मृत्यु:--मृत्यु; जन्म-वताम्--जन्म लेने वाले जीवों के; वीर--हे वीर; देहेन सह--शरीर के साथ; जायते--उत्पन्न होती है;अद्य--आज; वा--चाहे; अब्द-शत--सौ वर्षों के; अन्ते--अन्त में; वा--अथवा; मृत्यु:--मृत्यु; बै--निस्सन्देह; प्राणिनाम्--सारे जीवों की; ध्रुव:ः--निश्चित है
हे शूरवीर, जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है, क्योंकि शरीर के ही साथ मृत्यु काउद्भव होता है।
कोई चाहे आज मरे या सौ वर्षो बाद, किन्तु प्रत्येक जीव की मृत्यु निश्चित है।
देहे पञ्ञत्वमापन्ने देही कर्मानुगोडवश: ।
देहान्तरमनुप्राप्य प्राक्तनं त्यजते वपु: ॥
३९॥
देहे--जब शरीर; पश्ञत्वम् आपन्ने--पाँच तत्त्वों में बदल जाता है; देही--देहधारी, जीव; कर्म-अनुग: -- अपने सकाम कर्मों केफलों का पालन करता हुआ; अवश:ः --स्वतः ; देह-अन्तरम्--दूसरा शरीर ( भौतिक तत्त्वों से निर्मित ); अनुप्राप्प--फल के रूपमें प्राप्त करके; प्राक्तममू--पहले वाला; त्यजते--छोड़ देता है; वपु:--शरीर जब यह शरीर मिट्टी बन जाता है और फिर से पाँच तत्त्वों में--पृथ्वी, जल, अग्नि, वायुतथा आकाश--परिणत हो जाता है
तो शरीर का स्वामी जीव स्वतः अपने सकाम कर्मों केअनुसार भौतिक तत्त्वों से बना दूसरा शरीर प्राप्त करता है।
अगला शरीर प्राप्त होने पर वहवर्तमान शरीर को त्याग देता है।
ब्रज॑स्तिष्ठन्पदैेकेन यथेवैकेन गच्छति ।
यथा तृणजलौकैवं देही कर्मगतिं गत: ॥
४०॥
ब्रजन्ू--रास्ते पर चलते हुए कोई व्यक्ति; तिष्ठनू--खड़े होकर; पदा एकेन--एक पाँव पर; यथा--जिस तरह; एव--निस्सन्देह;एकेन--दूसरे पाँव से; गच्छति--जाता है; यथा--जिस तरह; तृण-जलौका--तिनके पर बैठा कीड़ा; एवम्--इस तरह; देही--जीव; कर्म-गतिम्--सकाम कर्मों के फल; गतः--भोगता है|
जिस तरह रास्ते पर चलते हुए मनुष्य अपना एक पाँव जमीन पर टेकता है और फिर दूसरेपाँव को उठाता है या जिस तरह वनस्पति का एक कीड़ा पहले एक पत्ती पर बैठता है और फिरइसे छोड़ कर दूसरी पत्ती पर जाता है उसी तरह जब बद्धजीव दूसरे शरीर का आश्रय ग्रहणकरता है तब पिछले शरीर को त्याग देता है।
स्वप्ने यथा पश्यति देहमीहशंमनोरथेनाभिनिविष्ट चेतन: ।
दृष्टश्रुताभ्यां मनसानुचिन्तयन्प्रपद्यते तत्किमपि हापस्मृति: ॥
४१॥
स्वण्ने--सपने में; यथा--जिस तरह; पश्यति--देखता है; देहम्--शरीर का प्रकार; ईहशम्--उसी तरह; मनोरथेन--मानसिकचिन्तन द्वारा; अभिनिविष्ट--पूरी तरह लीन; चेतन: --चेतना से युक्त; दृष्ट--आँखों से देखकर जो अनुभव किया गया हो;श्रुताभ्यामू--तथा सुन करके; मनसा--मन से; अनुचिन्तयन्ू--सोचते, अनुभव करते तथा इच्छा करते हुए; प्रपद्यते--शरण मेंआता है; तत्--उस अवस्था तक; किम् अपि--क्या कहा जा सकता है; हि--निस्सन्देह; अपस्मृति:--वर्तमान शरीर काविस्मरण।
किसी परिस्थिति को देखकर या सुनकर ही मनुष्य उसके बारे में चिन्तन-मनन करता है और अपने इस शरीर का विचार न करते हुए उसके वशीभूत हो जाता है।
इसी तरह मानसिक संतुलनद्वारा वह रात में भिन्न शरीरों तथा भिन्न परिस्थितियों में रहकर सपना देखता है और अपनीवास्तविक स्थिति को भूल जाता है।
उसी प्रक्रिया के अन्तर्गत वह अपना वर्तमान शरीर त्यागकरदूसरा शरीर ग्रहण करता है ( तथा देहान्तरग्राप्ति: )।
यतो यतो धावति दैवचोदितंमनो विकारात्मकमाप पञ्ञसु ।
गुणेषु मायारचितेषु देह्मयसौप्रपद्ममान: सह तेन जायते ॥
४२॥
यतः यतः--एक स्थान से दूसरे स्थान को या एक पद से दूसरे पद को; धावति--चिन्तन करता है; दैव-चोदितम्-- भाग्य द्वाराप्रेरित; मनः--मन; विकार-आत्मकम्--एक प्रकार के भावों से दूसरे प्रकार में बदलते हुए; आप--अन्त में प्राप्त करता है( प्रवृत्ति ); पञ्लसु--मृत्यु के समय ( जब भौतिक शरीर भौतिक पदार्थों में परिणत हो जाता है ); गुणेषु--( मुक्त न होने से मनसंलग्न रहता है ) भौतिक गुणों से; माया-रचितेषु--जहाँ माया वैसा ही शरीर रचती है; देही--ऐसा शरीर धारण करने वालाआत्मा; असौ--वह; प्रपद्यमान:--शरणागत ( ऐसी स्थिति को ); सह--साथ; तेन--वैसे ही शरीर के द्वारा; जायते--जन्म लेताहै
मृत्यु के समय मनुष्य सकाम कर्मों में निहित मन के सोचने, अनुभव करने और चाहने केअनुसार ही शरीर-विशेष प्राप्त करता है।
दूसरे शब्दों में, मन के कार्यकलापों के अनुसार हीशरीर विकास करता है।
शरीर के परिवर्तन मन की चंचलता के कारण हैं अन्यथा आत्मा तो मूलआध्यात्मिक शरीर में रह सकता है।
ज्योतिर्यथेवोदकपार्थिवेष्वदःसमीरवेगानुगतं विभाव्यते ।
एवं स्वमायारचितेष्वसौ पुमान्गुणेषु रागानुगतो विमुहाति ॥
४३॥
ज्योतिः--आकाश में सूर्य, चन्द्रमा तथा तारे; यथा--जिस तरह; एब--निस्सन्देह; उदक--जल में; पार्थिवेषु--या अन्य तरलपदार्थ यथा तैल में; अदः--प्रत्यक्ष रूप से; समीर-वेग-अनुगतम्--वायु के वेग से ठेला जाकर; विभाव्यते--विभिभन्न रूपों मेंप्रकट होते हैं; एवम्--उसी तरह; स्व-माया-रचितेषु--अपने मनोरथों से उत्पन्न परिस्थिति में; असौ--जीव; पुमान्ू--मनुष्य;गुणेषु-- प्रकृति के गुणों द्वारा प्रकट, भौतिक जगत में; राग-अनुगत:--अपनी आसक्ति के अनुसार; विमुह्मति--पहचान केद्वारा मोहग्रस्त होता है|
जब आकाश में स्थित नक्षत्र जैसे सूर्य, चन्द्रमा तथा तारे तेल या जल जैसे तरल पदार्थों मेंप्रतिबिम्बित होते हैं, तो वायु के वेग के कारण वे विभिन्न आकारों के लगते हैं कभी गोल, कभीलम्बे तो कभी और कुछ।
इसी तरह जब जीवात्मा भौतिकतावादी विचारों में मग्न रहता है, तोवह अज्ञान के कारण विविध रूपों को अपनी पहचान के रूप में ग्रहण करता है।
दूसरे शब्दों में,प्रकृति के भौतिक गुणों से विचलित होने के कारण वह मनोरथों के द्वारा मोहग्रस्त हो जाता है।
तस्मान्न कस्यचिद्द्रोहमाचरेत्स तथाविध: ।
आत्मन: क्षेममन्विच्छन्द्रोग्धुव परतो भयम् ॥
४४॥
तस्मात्ू--अत:; न--नहीं; कस्यचित्--किसी की; द्रोहम्--ईर्ष्या; आचरेत्--आचरण करे; सः--पुरुष ( कंस ); तथा-विध:--( वसुदेव द्वारा ) इस प्रकार से उपदेश दिया गया; आत्मन: --अपना; क्षेमम्ू--कल्याण; अन्विच्छन्--चाहे तो; द्रोग्धु:--अन्यों से ईर्ष्या रखने वाले का; वै--निस्सन्देह; परत:--अन्यों से; भयम्-- भय का कारण होता है।
चूँकि ईष्यालु एवं अपवित्र कार्य ऐसे शरीर का कारण बनते हैं जिससे अगले जीवन में कष्टभोगना पड़ता है इसलिए मनुष्य अपवित्र कार्य करे ही क्यों? अपने कल्याण को ध्यान में रखतेहुए मनुष्य को चाहिए कि वह किसी से ईर्ष्या न करे क्योंकि ईर्ष्यालु व्यक्ति को इस जीवन में याअगले जीवन में अपने शत्रुओं से सदा हानि का भय बना रहता है।
एषा तवानुजा बाला कृपणा पुत्रिकोपमा ।
हन्तुं नाहँसि कल्याणीमिमां त्वं दीनवत्सल: ॥
४५॥
एषा--यह; तव--तुम्हारी; अनुजा--छोटी बहन; बाला--अबोध स्त्री; कृपणा--तुम पर आश्रित; पुत्रिका-उपमा--तुम्हारी हीपुत्री के समान; हन्तुमू-उसे मारना; न--नहीं; अर्हसि--तुम्हें चाहिए; कल्याणीम्--तुम्हारे स्नेहाधीन; इमाम्ू--इसको; त्वमू--तुम; दीन-वत्सल:ः--गरीब तथा अबोध पर अत्यन्त दयालु।
तुम्हारी छोटी बहन बेचारी देवकी तुम्हारी पुत्री के समान है और वह लाड़-प्यार से पालेजाने योग्य है।
तुम दयालु हो, अतः तुम्हें इसका वध नहीं करना चाहिए।
निस्संदेह यह तुम्हारेस्नेह की पात्र है।
श्रीशुक उबाचएवं स सामभिभभदेर्बो ध्यमानो पि दारुण: ।
न न्यवर्तत कौरव्य पुरुषादाननुत्रतः ॥
४६॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस तरह; सः--वह ( कंस को ); सामभि:--समझाने-बुझाने केप्रयासों से; भेदै:--नैतिक उपदेश द्वारा कि वह अन्यों के प्रति क्रूर न बने; बोध्यमानः अपि--किये जाने पर भी; दारुण: --अत्यन्त क्रूर; न न्यवर्तत--नहीं माना ( जघन्य कार्य करने से ); कौरव्य--हे महाराज परीक्षित; पुरुष-अदान्--राक्षसों का;अनुव्रत:--अनुयायी |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे कुरुवंश में श्रेष्ठ, कंस अत्यंत क्रूर था और वास्तव में राक्षसोंका अनुयायी था।
अतएव वसुदेव के सदुपदेशों से उसे न तो समझाया-बुझाया जा सकता था, नही भयभीत किया जा सकता था।
उसे इस जीवन में या अगले जीवन में पापकर्मों के फलों कीकोई चिन्ता नहीं थी।
निर्बन्धं तस्य त॑ ज्ञात्वा विचिन्त्यानकदुन्दुभि: ।
प्राप्तं काल॑ प्रतिव्योदुमिदं तत्रान्वपद्यत ॥
४७॥
निर्बन्धम्ू-करने के संकल्प को; तस्थ--उस ( कंस ) का; तमू--उस ( संकल्प ) को; ज्ञात्वा--जानकर; विचिन्त्य--गहराई सेसोचकर; आनकदुन्दुभि: --वसुदेव; प्राप्तम्--आया हुआ; कालम्--आसतन्न मृत्यु-संकट को; प्रतिव्योढुमू--ऐसे कार्यो से रोकनेके लिए; इृदम्ू--यह; तत्र--वहाँ; अन्वपद्यत--अन्य उपायों को सोचा |
जब वसुदेव ने देखा कि कंस अपनी बहन देवकी को मार डालने पर तुला हुआ है, तो उसनेअपने मन में गम्भीरतापूर्वक सोचा।
मृत्यु को आया हुआ देखकर उसने कंस को रोकने का दूसरा उपाय सोचा।
मृत्युबुस्द्विमतापोह्यो यावह्ग॒त्द्िबलोदयम् ।
यद्यसौ न निवर्तेत नापराधोस्ति देहिन: ॥
४८ ॥
मृत्यु:--मृत्यु; बुन्धि-मता--बुद्ध्धिमान व्यक्ति द्वारा; अपोह्म:--दूर रहना चाहिए; यावत्--जब तक; बुद्धि-बल-उदयम्--बुद्धितथा शारीरिक शक्ति रहते हुए; यदि--यदि; असौ--वह ( मृत्यु ); न निरवर्तेत--रोकी नहीं जा सकती; न--नहीं; अपराध: --अपराध; अस्ति--है; देहिन:--मृत्यु संकट में फँसे व्यक्ति का।
बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि जब तक बुद्धि तथा शारीरिक पराक्रम रहे, तब तक मृत्यु सेबचने का प्रयास करता रहे।
हर देहधारी का यही कर्तव्य है।
यदि उद्यम करने पर भी मृत्यु कोटाला नहीं जा सके, तो मृत्यु को वरण करने वाला मनुष्य अपराधी नहीं है।
प्रदाय मृत्यवे पुत्रान्मोचये कृपणामिमाम् ।
सुता मे यदि जायेरन्मृत्युर्वा न प्रियेत चेत् ॥
४९॥
विपर्ययो वा किं न स्थाद्गतिर्धातुर्दुरत्यया ।
उपस्थितो निवर्तेत निवृत्त: पुनरापतेत् ॥
५०॥
प्रदाय--देने का वादा करके; मृत्यवे--देवकी के लिए कालस्वरूप कंस को; पुत्रान्--पुत्रों को; मोचये--आसन्न संकट सेछुड़ाने के लिए; कृपणाम्--निर्दोष; इमामू--देवकी को; सुता:--पुत्र; मे--मेरे; यदि--यदि; जायेरन्--उत्पन्न होंगे; मृत्यु: --कंस; वा--अथवा; न--नहीं; प्रियेत--मरना होगा; चेत्--यदि; विपर्यय: --इसके विपरीत; वा--अथवा; किम्--क्या; न--नहीं; स्थात्ू--हो सकता है; गति:ः--गति; धातुः--प्रारब्ध की; दुरत्यया--समझना मुश्किल है; उपस्थित:--अभी प्राप्त होनेवाला; निवर्तेत--रूक सकता है; निवृत्त:--देवकी की मृत्यु को रोकने पर; पुनः आपतेत्-- भविष्य में फिर हो सके ( तो मैं क्याकर सकता हूँ )
वसुदेव ने विचार किया: मैं मृत्यु रूपी कंस को अपने सारे पुत्र देकर देवकी के प्राण बचासकता हूँ।
हो सकता है कि कंस मेरे पुत्रों के जन्म के पूर्व ही मर जाए, या फिर जब उसे मेरे पुत्रके हाथों से मरना लिखा है, तो मेरा कोई पुत्र उसे मारे ही।
इस समय मुझे चाहिए कि मैं कंस कोअपने सररे पुत्रों को सौंपने की प्रतिज्ञा कर लूँ जिससे कंस अपनी यह धमकी त्याग दे और यदिआगे चलकर कंस मर जाता है, तो फिर मुझे डरने की कोई बात नहीं रह जाती।
अग्नेर्यथा दारुवियोगयोगयो-रहष्टतोउन्यन्न निमित्तमस्ति ।
एवं हि जन्तोरपि दुर्विभाव्य:शरीरसंयोगवियोगहेतु: ॥
५१॥
अग्नेः:--जंगल की आग का; यथा--जिस तरह; दारु--लकड़ी का; वियोग-योगयो:--संयोग तथा वियोग दोनों का;अदृष्टतः--अदृश्य प्रारब्ध की अपेक्षा; अन्यत्ू--कोई अन्य कारण या संयोग; न--नहीं; निमित्तम्--कारण; अस्ति--है;एवम्--इस प्रकार; हि--निश्चय ही; जन्तो: --जीव का; अपि--निस्सन्देह; दुर्विभाव्य:--पाया नहीं जा सकता; शरीर--शरीरका; संयोग--स्वीकृति; वियोग--परित्याग; हेतु:--कारण |
जब किसी अदृश्य कारण से आग लकड़ी के एक टुकड़े से लपक कर दूसरे खंड को जलादेती है, तो इसका कारण प्रारब्ध है।
इसी तरह जब जीव एक प्रकार का शरीर स्वीकार करकेदूसरे का परित्याग करता है, तो इसमें अहृश्य प्रारब्ध के अतिरिक्त कोई अन्य कारण नहीं होता।
एवं विमृश्य तं पाप॑ यावदात्मनिदर्शनम् ।
पूजयामास वै शौरिर्हुमानपुरःसरम् ॥
५२॥
एवम्--इस प्रकार से; विमृश्य--सोच विचार कर; तमू--कंस को; पापम्ू--अत्यन्त पापी; यावत्--यथासम्भव; आत्मनि-दर्शनम्ू--अपनी बुद्धि भर, भरसक; पूजयाम् आस--प्रशंसा की; बै--निस्सन्देह; शौरि:--वसुदेव ने; बहु-मान--सत्कार करतेहुए; पुरःसरम्--उसके सामने।
इस तरह इस विषय पर अपनी बुद्धिसे भरपूर विचार करने के बाद वसुदेव ने पापी कंस केसमक्ष बड़े ही आदरपूर्वक अपना प्रस्ताव रखा।
प्रसन्नवदनाम्भोजो नृशंसं निरपत्रपम् ।
मनसा दूयमानेन विहसन्निदमब्रवीत् ॥
५३॥
प्रसन्न-वदन-अम्भोज:--वसुदेव, जो बाहर से परम प्रसन्न लग रहे थे; नृशंसम्--अत्यन्त क्रूर; निरपत्रपम्--निर्लज्ज कंस को;मनसा--मन से; दूयमानेन--चिन्ता तथा दुख से पूर्ण; विहसन्--बाहर से हँसते हुए; इदम् अब्नवीत्ू--इस प्रकार बोले |
वसुदेव का मन चिन्ता से पूर्ण था क्योंकि उनकी पत्नी संकट में थीं, किन्तु क्रूर, निर्लज्जतथा पापी कंस को प्रसन्न करने के उद्देश्य से बनावटी हँसी लाते हुए वे इस प्रकार बोले।
श्रीवसुदेव उबाचन हास्यास्ते भयं सौम्य यद्वै साहाशरीरवाक् ।
पुत्रान्समर्पयिष्येउस्यथा यतस्ते भयमुत्थितम् ॥
५४॥
श्री-वसुदेव: उबाच-- श्री वसुदेव ने कहा; न--नहीं; हि--निस्सन्देह; अस्या:--इससे ( देवकी से ); ते--तुम्हारा; भयम्-- भय;सौम्य--हे शालीन; यत्--जो; बै--निस्सन्देह; सा--वह; आह--बोली; अ-शरीर-वाक् --बिना शरीर के वाणी; पुत्रानू--अपने सारे पुत्रों को; समर्पयिष्ये --तुम्हें सौंप दूँगा; अस्या:--इस देवकी के ; यत:ः--जिससे; ते--तुम्हारा; भयम्-- भय;उत्थितम्--उत्पन्न हुआ है|
वसुदेव ने कहा : हे भद्ग-श्रेष्ठ, तुमने अहश्यवाणी से जो भी सुना है उसके लिए तुम्हें अपनीबहन देवकी से तनिक भी डरने की कोई बात नहीं है।
तुम्हारी मृत्यु का कारण उसके पुत्र होंगेअतः मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि जब उसके पुत्र उत्पन्न होंगे, जिनसे तुम्हें डर है, तो उन सबकोलाकर मैं तुम्हें सौंप दिया करूँगा।
श्रीशुक उबाचस्वसुर्वधान्निववृते कंसस्तद्वाक्यसारवित् ।
वसुदेवोपि तं प्रीत: प्रशस्य प्राविशद्गृहम् ॥
५५॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; स्वसु:--अपनी बहन के ( देवकी के ); वधात्--वध से; निववृते--कुछकाल के लिए रुक गया; कंस:--कंस; तत्-वाक्य--वसुदेव के वचन; सार-वित्--सही जानकर; वसुदेव:--वसुदेव; अपि--भी; तम्ू--उसको ( कंस को ); प्रीत:--तुष्ट होकर; प्रशस्थ--अधिक सान््त्वना देकर; प्राविशत् गृहम्-- अपने घर में प्रवेशकिया।
श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : कंस वसुदेव के तर्कों से सहमत हो गया और वसुदेवके वचनों पर पूरा भरोसा करके उसने अपनी बहन को मारने का विचार छोड़ दिया।
वसुदेव नेकंस से प्रसन्न होकर उसे और भी सान्त्वना दी और अपने घर में प्रवेश किया।
अथ काल उपावृत्ते देवकी सर्वदेवता ।
पुत्रान्प्रसुषुवे चाष्टी कन्यां चैवानुवत्सरम् ॥
५६॥
अथ--तत्पश्चात्; काले--समय बीतने पर; उपावृत्ते--परिपक्व होने पर; देवकी--कृष्ण के पिता वसुदेव की पत्नी ने; सर्व-देवता--देवकी, जिसके लिए सारे देवता तथा स्वयं भगवान् प्रकट हुए; पुत्रान्--पुत्रों को; प्रसुषुवे--उत्पन्न किया; च--तथा;अष्टौ--आठ; कन्यां च--तथा एक कन्या सुभद्रा को भी; एब--निस्सन्देह; अनुवत्सरम्--वर्षानुवर्ष, प्रतिवर्ष |
तत्पश्चात् प्रति-वर्ष समय आने पर ईश्वर तथा अन्य देवताओं की माता देवकी ने एक शिशुको जन्म दिया।
इस तरह एक के बाद एक उनके आठ पुत्र तथा सुभद्रा नामक एक कन्या उत्पन्नहुई।
कीर्तिमन्तं प्रथमजं कंसायानकदुन्दुभि: ।
अर्पयामास कृच्छेण सोउनृतादतिविहल: ॥
५७॥
कीर्तिमन्तम्-कीर्तिमान नाम से; प्रथम-जम्--पहले पहल जन्मा शिशु; कंसाय--कंस को; आनकदुन्दुभि: --वसुदेव द्वारा;अर्पयाम् आस--दे दिया गया; कृच्छेण --बड़ी मुश्किल से; सः--वह ( वसुदेव ); अनृतात्--झूठा बनने के भय से, वचन भंगकरने से; अति-विहलः--अत्यन्त भयभीत
वसुदेव अत्यधिक विह्ल थे कि कहीं उनका वचन भंग हुआ तो वे झूठे साबित होंगे।
इसतरह उन्होंने बड़ी ही वेदना के साथ अपने प्रथम पुत्र कीर्तिमान को कंस के हाथों में सौंप दिया।
कि दुःसहं नु साधूनां विदुषां किमपेक्षितम् ।
किमकार्य कदर्याणां दुस्त्यजं कि धृतात्मनामू ॥
५८ ॥
किमू--क्या; दुःसहम्--पीड़ाप्रद है; नु--निस्सन्देह; साधूनाम्ू--साधु पुरुषों के लिए; विदुषाम्--विद्वान पुरुषों के लिए; किम्अपेक्षितम्--क्या निर्भरता है; किम् अकार्यम्-क्या मना है; कदर्याणाम्ू--अधम पुरुषों के लिए; दुस्त्यजमू--छोड़ पानाअत्यन्त कठिन; किमू--क्या; धृत-आत्मनाम्ू--स्वरूपसिद्ध व्यक्तियों के लिए
वे साधु पुरुष जो सत्य पर अटल रहते हैं, उनके लिए कया पीड़ादायक है? उन शुद्ध भक्तोंके लिए जो भगवान् को तत्त्व के रूप में जानते हैं, भला स्वतंत्रता क्यों नहीं होती ? निम्नचरित्रवाले पुरुषों के लिए कौन से कार्य वर्जित हैं ? जिन्होंने भगवान् कृष्ण के चरणकमलों पर अपनेको पूरी तरह समर्पित कर दिया है वे कृष्ण के लिए भला कौन सी वस्तु नहीं त्याग सकते ?
इृष्टा समत्वं तच्छौरे: सत्ये चेव व्यवस्थितिम् ।
कंसस्तुष्टमना राजन्प्रहसबन्निदमब्रवीत् ॥
५९॥
इष्ठा--देखकर; समत्वम्--सुख या दुख से अविचलित, समभाव से; तत्--उस; शौरे: --वसुदेव के; सत्ये--सत्य में; च--निस्सन्देह; एबव--निश्चय ही; व्यवस्थितिम्ू--हृढ़ परिस्थिति; कंस:ः--कंस ने; तुष्ट-मना:-- अत्यन्त संतुष्ट होकर ( अपना वचननिभाने के लिए पहली संतान लाकर सौंपने के वसुदेव के आचरण से ); राजन्--हे महाराज परीक्षित; प्रहसन्--हँसते हुए;इदम्--यह; अब्नवीत्--कहा |
हे राजा परीक्षित, जब कंस ने देखा कि वसुदेव सत्य में स्थिर रहते हुए अपनी सन्तान उसेसौंपने में समभाव बने रहे, तो वह अत्यधिक प्रसन्न हुआ और उसने हँसते हुए यह कहा।
प्रतियातु कुमारोयं न ह्ास्मादस्ति मे भयम् ।
अष्टमाद्युवयोर्गभन्मृत्युमें विहित: किल ॥
६०॥
प्रतियातु--हे वसुदेव, अपने बच्चे को घर ले जाओ; कुमार:--नवजात शिशु; अयम्--यह; न--नहीं; हि--निस्सन्देह;अस्मात्--उससे; अस्ति-- है; मे--मेरा; भयम्-- भय; अष्टमात्--आठवें से; युवयो: --तुम पति-पत्नी दोनों के; गर्भात-गर्भसे; मृत्यु:--मृत्यु; मे--मेरा; विहित:--जो होना है; किल--निस्सन्देह |
हे बसुदेव, तुम अपने बच्चे को वापस ले सकते हो और घर जा सकते हो।
मुझे तो तुम्हारीऔर देवकी की आठवीं सन्तान से चिन्तित हूँ, जिसके हाथों मेरी मृत्यु लिखी है।
तथेति सुतमादाय ययावानकदुन्दुभि: ।
नाभ्यनन्दत तद्वाक्यमसतोविजितात्मन: ॥
६१॥
तथा--बहुत अच्छा; इति--इस प्रकार; सुतम् आदाय--अपने पुत्र को वापस लाकर; ययौ--उस स्थान से चला गया;आनकदुन्दुभि:--वसुदेव; न अभ्यनन्दत--बहुत महत्त्व नहीं दिया; तत्-वाक्यम्--उसके ( कंस के ) बचनों पर; असतः--चरित्रविहीन; अविजित-आत्मन:--तथा आत्मसंयमविहीन |
वसुदेव मान गये और वे अपना पुत्र घर वापस ले आए, किन्तु कंस चरित्रहीन तथाआत्मसंयमविहीन व्यक्ति था अतएव वसुदेव जानते थे कि कंस के शब्दों का कोई भरोसा नहीं।
नन्दाद्या ये ब्रजे गोपा याश्वामीषां च योषित: ।
वृष्णयो वसुदेवाद्या देवक्याद्या यदुस्त्रियः ॥
६२॥
सर्वे वै देवताप्राया उभयोरपि भारत ।
ज्ञातयो बन्धुसुहदो ये च कंसमनुत्रता: ॥
६३॥
नन्द-आद्या:--नन्द महाराज तथा अन्य लोग; ये--ये सभी; ब्रजे--वृन्दावन में; गोपा:--ग्वाले; या:-- जो; च--तथा;अमीषाम्--उन सबका ( वृन्दावनवासियों का ); च-- भी; योषित: --स्त्रियाँ; वृष्णय:--वृष्णिवंश के सदस्य; वसुदेव-आद्या:--वसुदेव इत्यादि; देवकी-आद्या:--देवकी इत्यादि; यदु-स्त्रियः--यदुवंश की स्त्रियाँ; सर्वे--सभी; वै--निस्सन्देह; देवता-प्राया:--स्वर्ग के निवासी थे; उभयो:--नन्द महाराज तथा वसुदेव दोनों के; अपि--निस्सन्देह; भारत--हे महाराज परीक्षित;ज्ञातय:--सम्बन्धीगण; बन्धु--सारे मित्र; सुहृदः--शुभेच्छु जन; ये--जो; च--तथा; कंसम् अनुब्रता:--कंस के अनुयायी होतेहुए भी
है भरतवंशियों में श्रेष्ठ, महाराज परीक्षित, नन््द महाराज तथा उनके संगी ग्वाले तथा उनकीस्त्रियाँ स्वर्गलोक की ही वासी थीं।
इसी तरह वसुदेव आदि वृष्णिवंशी तथा देवकी एवं यदुवंशकी अन्य स्त्रियाँ भी स्वर्गलोक की वासी थीं।
नन्द महाराज तथा वसुदेव के मित्र, सम्बन्धी,शुभचिन्तक तथा ऊपर से कंस के अनुयायी लगने वाले व्यक्ति सभी देवता ही थे।
एतत्कंसाय भगवाज्छशंसाभ्येत्य नारद: ।
भूमेर्भारायमाणानां दैत्यानां च वधोद्यमम् ॥
६४॥
एतत्--यदु तथा वृष्णि वबंशों के विषय में ये शब्द; कंसाय--कंस के लिए; भगवान्--परमे श्वर का अत्यन्त शक्तिशालीप्रतिनिधि; शशंस--सूचना दी ( कंस को, जो संशय में था ); अभ्येत्य--निकट जाकर; नारद: --नारद मुनि ने; भूमेः-- भूमिपर;भारायमाणानाम्ू--जो भारस्वरूप हैं उनके; दैत्यानाम् च--तथा असुरों के; वध-उद्यमम्--वध करने का प्रयास
एक बार नारद मुनि कंस के पास गए और उसे यह बतलाया कि पृथ्वी के अत्यंतभारस्वरूप असुर व्यक्तियों का किस प्रकार वध किया जाने वाला है।
इस तरह कंस अत्यधिकभय तथा संशय में पड़ गया।
ऋषेरविनिर्गमे कंसो यदून्मत्वा सुरानिति ।
देवक्या गर्भसम्भूतं विष्णुं च स्वव्ध॑ प्रति ॥
६५॥
देवकीं वसुदेवं च निगृहय निगडैर्गृहि ।
जात॑ जातमहन्पुत्रं तयोरजनशड्डया ॥
६६॥
ऋषे:--नारद ऋषि के; विनिर्गमे--चले जाने पर; कंस:ः--कंस ने; यदून्ू--समस्त यदुवंशियों को; मत्वा--सोचकर; सुरान्--देवता के रूप में; इति--इस तरह; देवक्या:--देवकी के; गर्भ-सम्भूतम्--गर्भ से उत्पन्न संतानें; विष्णुम्--विष्णु के रूप मेंस्वीकार करते हुए; च--तथा; स्व-वधम् प्रति--विष्णु से अपनी मृत्यु के भय से; देवकीम्--देवकी को; वसुदेवम् च--तथाउसके पति वसुदेव को; निगृहा--बन्दी बनाकर; निगडै:--लोहे की जंजीरों से; गृहे--घर पर ही; जातम् जातमू--एक के बादएक उत्पन्न होने वाले; अहन्--मार डाला; पुत्रमू-पुत्रों को; तयो:--वसुदेव तथा देवकी के; अजन-शड्डूया--इस भय से कि वेविष्णु न हों।
नारद ऋषि के चले जाने पर कंस ने सोचा कि यदुवंश के सारे लोग देवता हैं और देवकी केगर्भ से जन्म लेने वाली कोई भी सन्तान विष्णु हो सकती है।
अतः अपनी मृत्यु के भय से कंस नेवसुदेव तथा देवकी को बन्दी बना लिया और उनके लोहे की जंजीरें डाल दीं।
कंस ने इसभविष्यवाणी से सशंकित होकर कि विष्णु उसका वध करेंगे, हर सन््तान को इस आशंका से किवह कहीं विष्णु न हो, एक एक करके मार डाला।
मातरं पितरं भ्रातृन्सर्वाश्व॒ सुहृदस्तथा ।
घ्नन्ति हासुतृपो लुब्धा राजान: प्रायशों भुवि ॥
६७॥
मातरम्ू--माता को; पितरम्--पिता को; भ्रातृनू-- भाइयों को; सर्वान् च--सबको; सुहृद: --मित्रगण; तथा-- भी; घ्नन्ति--मारते हैं; हि--निस्सन्देह; असु-तृप:--जो अपनी इन्द्रियों के लिए अन्यों से ईर्ष्या करते हैं; लुब्धा:--लालची; राजान:--ऐसेराजा; प्रायशः--प्राय:; भुवि--पृथ्वी पर
इस पृथ्वी पर इन्द्रियतृप्ति के लालची राजा प्राय: सदा अपने शत्रुओं का अंधाधुंध वध करतेहैं।
वे अपनी सनक की पूर्ति के लिए किसी का भी, यहाँ तक कि अपनी माता, पिता, भाइयोंया मित्रों का भी वध कर सकते हैं।
आत्मानमिह सज्ञातं जानन्प्राग्विष्णुना हतम् ।
महासुरं कालनेमिं यदुभिः स व्यरुध्यत ॥
६८॥
आत्मानम्--स्वयं; इह--इस संसार में; सझ्ञातम्--पुनः जन्म लेकर; जानन्-- भलीभाँति जानते हुए; प्राकु--इस जन्म के पूर्व;विष्णुना-- भगवान् विष्णु द्वारा; हतम्--मारा गया था; महा-असुरम्--बड़े असुर; कालनेमिम्--कालनेमि को; यदुभि:--यदुवंश के सदस्यों के साथ; सः--उस ( कंस ) ने; व्यरुध्यत--शत्रुवत् व्यवहार किया।
पूर्व जन्म में कंस कालनेमि नाम का महान् असुर था और विष्णु द्वारा मारा गया था।
नारद से यह जानकर कंस यदुवंश से सम्बन्धित हर किसी से द्वेष करने लगा।
उपग्रसेनं च पितरं यदुभोजान्धकाधिपम् ।
स्वयं निगृह्ाय बुभुजे शूरसेनान््महाबल: ॥
६९॥
उग्रसेनम्--उग्रसेन को; च--तथा; पितरम्--अपने पिता को; यदु--यदुवंशी; भोज-- भोजवंशी; अन्धक --अन्धकवंशी;अधिपम्--राजा को; स्वयम्--स्वयं; निगृह्य--दमन करके; बुभुजे-- भोग किया; शूरसेनान्ू--शूरसेन कहलाने वाले समस्तराज्य; महा-बलः--अत्यन्त बलशाली कंस ने
उग्रसेन के अत्यन्त बलशाली पुत्र कंस ने अपने पिता तक को, जो यदु, भोज तथा अंधकवबंशों का राजा था, बन्दी बना लिया और शूरसेन नामक राज्यों का शासन स्वयं चलाने लगा।
अध कंस उपागम्य नारदो ब्रह्मनन्दन: ।
एकान्तमुपसंगम्य वाक्यमेतदुवाच ह॥
७०॥
अथ--इस प्रकार; कंसम्--कंस के पास; उपागम्य--जाकर; नारदः--महामुनि नारद; ब्रह्मनन्दनः--ब्रह्माजी के पुत्र;एकान्तमुपसंगम्य--एकान्त स्थान में जाकर; वाक्यम्--सूचना; एतत्--यह; उवाच--कहा; ह--निश्चित रूप से।
‘तत्पश्चात् ब्रह्म के मानस पुत्र नारद कंस के पास गये और एकान्त स्थान में उन्होंने उसेनिम्नलिखित जानकारी दी।
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