← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 1 की सूची
अध्याय सात: द्रोण के पुत्र को दंडित किया गया
1.7सातद्रोण-पुत्र को दण्डशौनक उवाचनिर्गते नारदे सूत भगवान् बादरायण:।
श्रुतवांस्तदभिप्रेतं ततः किमकरोद्विभु: ॥
१॥
शौनकः उबाच-- श्री शौनक ने कहा; निर्गते--चले जाने पर; नारदे--नारद मुनि के; सूत--हे सूत; भगवान्--दिव्य रूपसे सर्वशक्तिमान; बादरायण: --वेदव्यास ने; श्रुतवान्--सुना; तत्--उसका; अभिप्रेतम्--मन की इच्छा, मनोवांछा;ततः--तत्पश्चात्; किम्--क्या; अकरोत्--किया; विभुः--महान् ने
ऋषि शौनक ने पूछा : हे सूत, जब महान् तथा दिव्य रूप से शक्तिमान व्यासदेव ने श्रीनारद मुनि से सब कुछ सुन लिया, तो फिर नारद के चले जाने पर व्यासदेव ने क्या किया ?"
सूत उवाचब्रह्मनद्यां सरस्वत्यामाश्रम: पश्चिमे तटे ।
शम्याप्रास इति प्रोक्त ऋषीणां सत्रवर्धन: ॥
२॥
सूतः उवाच-- श्री सूत ने कहा; ब्रह्म-नद्याम्-वेदों, ब्राह्मणों, सन््तों तथा भगवान् से घनिष्ठ रूप से: सम्बन्धित नदी के तटपर; सरस्वत्यामू--सरस्वती के; आश्रम: --ध्यान के लिए कुटी; पश्चिमे--पश्चिमी; तटे--तट पर; शम्याप्रास: --शम्याप्रास नामक स्थान; इति--इस प्रकार; प्रोक्त:--कहलाने वाला; ऋषीणाम्--ऋषियों का; सत्र-वर्धन:--कार्यो कोप्रोत्साहित करने वाला।
श्री सूत ने कहा : वेदों से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध सरस्वती नदी के पश्चिमी तट परशम्याप्रास नामक स्थान पर एक आश्रम है, जो ऋषियों के दिव्य कार्यकलापों को संवर्धितकरने वाला है।
"
तस्मिन् स्व आश्रमे व्यासो बदरीषण्डमण्डिते ।
आसीनोप उपस्पृश्य प्रणिदध्यौ मन: स्वयम् ॥
३॥
तस्मिनू--उस; स्वे--अपनी; आश्रमे--कुटिया में; व्यास:--व्यासदेव; बदरी--बेर; षण्ड--वृक्ष; मण्डिते--से घिरा;आसीनः--बैठे हुए; अप: उपस्पृश्य--जल का स्पर्श करके ; प्रणिद्ध्यौ--एकाग्र किया; मन: --मन को; स्वयम्-- अपनेआप में।
उस स्थान पर बेरी के वृक्षों से घिरे हुए अपने आश्रम में, श्रील वेदव्यास शुद्धि के लिएजल का स्पर्श करने के बाद ध्यान लगाने के लिए बैठ गये।
"
भक्तियोगेन मनसि सम्यक् प्रणिहितेमले ।
अपश्यत्पुरुषं पूर्ण मायां च तदपाश्रयम् ॥
४॥
भक्ति--भक्तिमय सेवा; योगेन--संयुक्त होने की विधि द्वारा; मनसि--मन में; सम्यक्--पूर्ण रूप से; प्रणिहिते--संलग्नतथा स्थिर; अमले--निर्मल; अपश्यत्--देखा; पुरुषम्-- भगवान् को; पूर्णम्--परम; मायाम्--शक्ति को; च--भी;तत्--उसके; अपाश्रयम्-पूर्ण वश मेंइस प्रकार उन्होंने भौतिकता में किसी लिप्तता के बिना, भक्तिमय सेवा ( भक्तियोग )से बँधकर अपने मन को पूरी तरह एकाग्र किया।
इस तरह उन्होंने परमेश्वर के पूर्णतः अधीनउनकी बहिरंगा शक्ति के समेत उनका दर्शन किया।
"
यया सम्मोहितो जीव आत्मानं त्रिगुणात्मकम् ।
परोपि मनुतेनर्थ तत्कृतं चाभिपद्यते ॥
५॥
यया--जिससे; सम्मोहित:--मोहग्रस्त; जीव:--जीवात्माएँ; आत्मानम्--स्व; त्रि-गुण-आत्मकम्--प्रकृति के तीनों गुणोंसे बद्ध अथवा पदार्थ का फल; परः--दिव्य; अपि--के होते हुए भी; मनुते--मान लेता है; अनर्थम्--अनचाही वस्तुएँ;तत्--उससे; कृतम् च-- प्रतिक्रिया; अभिपद्यते-- भोगता है।
जीवात्मा तीनों गुणों से अतीत होते हुए भी इस बहिरंगा शक्ति के कारण अपने आपको भौतिक पदार्थ की उपज मानता है और इस प्रकार भौतिक कष्टों के फलों को भोगताहै।
"
अनर्थोपशमं साक्षाद्धक्तियोगमधोक्षजे ।
लोकस्याजानतो विद्वांश्रक्रे सात्वतसंहिताम् ॥
६॥
अनर्थ--फालतू चीजें; उपशमम्--बहिष्कार, निवारण; साक्षात्- प्रत्यक्ष; भक्ति-योगम्-- भक्ति को जोड़ने की विधि;अधोक्षजे--दिव्य को; लोकस्य--सामान्य लोगों का; अजानत:--न जानने वाले; विद्वानू--प्रकाण्ड पंडित; चक्रे --संकलन किया; सात्वत--परम सत्य के प्रसंग में; संहितामू--वैदिक साहित्य |
.\fजीव के भौतिक कष्ट, जिन्हें वह अनर्थ समझता है, भक्तियोग द्वारा प्रत्यक्ष रूप से कम किये जा सकते हैं।
किन्तु अधिकांश जन इसे नहीं जानते; इसलिए विद्वान व्यासदेव ने इस वैदिक साहित्य का संकलन किया है, जिसका सम्बन्ध परम सत्य से है।
जीव के भौतिक कष्ट, जिन्हें वह अनर्थ समझता है, भक्तियोग द्वारा प्रत्यक्ष रूप से कमकिये जा सकते हैं।
किन्तु अधिकांश जन इसे नहीं जानते; इसलिए विद्वान व्यासदेव ने इसवैदिक साहित्य का संकलन किया है, जिसका सम्बन्ध परम सत्य से है।
"
यस्यां वै श्रूयमाणायां कृष्णे परमपूरुषे ।
भक्तिरुत्यद्यते पुंसः शोकमोहभयापहा ॥
७॥
यस्याम्--यह वैदिक साहित्य; बै--निश्चय ही; श्रूयमाणायाम्--मात्र श्रवण करने से; कृष्णे--भगवान् कृष्ण में; परम--परम; पूरुषे-- भगवान् में; भक्तिः:-- भक्ति की भावनाएँ; उत्पद्यते--अंकुरित होते हैं; पुंसः--जीव का; शोक--संताप;मोह--मोह; भय--डर; अपहा-- भगाने वाला, नष्ट करने वाला।
इस वैदिक साहित्य के श्रवण मात्र से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण की प्रेमा भक्तिकी भावना तुरन्त अंकुरित होती है, जो शोक, मोह तथा भय की अग्नि को तुरन्त बुझा देतीहै।
"
स संहितां भागवतीं कृत्वानुक्रम्य चात्मजम् ।
शुकमध्यापयामास निवृत्तिनिरतं मुनि: ॥
८॥
सः--वह; संहिताम्--वैदिक साहित्य; भागवतीम्-- भगवान् से सम्बन्धित; कृत्वा--करके; अनुक्रम्य--शुद्द्धि तथाआवृत्ति द्वारा; च--तथा; आत्म-जम्--अपने पुत्र; शुकम्--शुकेदव गोस्वामी को; अध्यापयाम् आस--पढ़ाया;निवृत्ति--आत्म-साक्षात्कार का मार्ग; निरतमू--संलग्न; मुनि:--मुनि ने।
श्रीमद्धभागवत का संकलन कर लेने तथा उसे संशोधित करने के बाद महर्षि व्यासदेव नेइसे अपने पुत्र श्री शुकदेव गोस्वामी को पढ़ाया, जो पहले से ही आत्म-साक्षात्कार में निरतथे।
"
शौनक उवाचस वै निवृत्तिनिरत: सर्वत्रोपेक्षको मुनि: ।
कस्य वा बृहतीमेतामात्माराम: समभ्यसत् ॥
९॥
शौनकः उवाच-- श्री शौनक ने पूछा; सः--वह; बै--निश्चय ही; निवृत्ति--आत्म-साक्षात्कार के पथ पर; निरत:--सदैवलगा हुआ; सर्वत्र--सभी प्रकार से; उपेक्षक: --उदासीन; मुनि:--मुनि; कस्य--किस कारण से; वा--अथवा;बृहतीम्--विशाल; एताम्--इस; आत्म-आराम:--अपने आप में प्रसन्न रहने वाला; समभ्यसत्--अध्ययन किया।
श्री शौनक ने सूत गोस्वामी से पूछा : शुकदेव गोस्वामी तो पहले से ही निवृत्ति मार्ग परचले रहे थे और इस तरह बे अपने आप में प्रसन्न थे।
तो फिर उन्होंने ऐसे बृहत् साहित्य काअध्ययन करने का कष्ट क्यों उठाया ?"
सूत उवाचआत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे ।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरि: ॥
१०॥
सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; आत्मारामा:--जिन्हें आत्मा में सुख मिलता है वे; च--भी; मुनय:--मुनिगण;निर्ग्रन्था: --समस्त बन्धनों से मुक्त; अपि--होने पर भी; उरुक्रमे--महान् साहसिक में; कुर्वन्ति--करते हैं; अहैतुकीम्--अनन्य, अमिश्मित; भक्तिमू-- भक्ति; इत्थम्-भूत--ऐसे आश्चर्यमय; गुण:--गुण; हरिः--हरि के
जो आत्मा में आनन्द लेते हैं, ऐसे विभिन्न प्रकार के आत्माराम और विशेष रूप से जोआत्म-साक्षात्कार के पथ पर स्थापित हो चुके हैं, ऐसे आत्माराम यद्यपि समस्त प्रकार केभौतिक बन््धनों से मुक्त हो चुके हैं, फिर भी भगवान् की अनन्य भक्तिमय सेवा में संलग्नहोने के इच्छुक रहते हैं।
इसका अर्थ यह हुआ कि भगवान् में दिव्य गुण हैं, अतएवं वेमुक्तात्माओं सहित प्रत्येक व्यक्ति को आकृष्ट कर सकते हैं।
"
हरेर्गुणाक्षिप्तमतिर्भगवान् बादरायणि: ।
अध्यगान्महदाख्यानं नित्यं विष्णुजनप्रियः ॥
११॥
हरेः--भगवान् हरि के; गुण--दिव्य गुण में; आक्षिप्त--लीन होकर; मति:--मन; भगवानू--शक्तिमान; बादरायणि: --व्यासदेव के पुत्र ने; अध्यगात्--अध्ययन किया; महत्--महान्; आख्यानम्--कथा का; नित्यम्--नियमित रूप से;विष्णु-जन-- भगवद्भक्त; प्रिय: --प्रिय ।
श्रील व्यासदेव के पुत्र, श्रील शुकदेव गोस्वामी न केवल दिव्य शक्ति से युक्त थे,अपितु वे भगवान् के भक्तों के भी अत्यन्त प्रिय थे।
इस प्रकार उन्होंने इस महान् कथा( श्रीमद्धागवत ) का अध्ययन किया।
"
परीक्षितोथ राजर्षेर्जन्मकर्मविलापनम् ।
संस्थां च पाण्डुपुत्राणां वक्ष्ये कृष्णफथोदयम् ॥
१२॥
परीक्षित:--राजा परीक्षित का; अथ--इस प्रकार; राजर्षे:--राजा का, जो राजाओं में ऋषि था; जन्म--जन्म; कर्म--कर्म; विलापनम्--उद्धार, मोक्ष; संस्थाम्--संसार का परित्याग; च--तथा; पाण्डु-पुत्राणाम्--पाण्डु के पुत्रों का;वक्ष्ये--में कहूँगा; कृष्ण-कथा-उदयम्--
जो भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य कथा को जन्म देने वाला हैसूत गोस्वामी ने शौनक आदि ऋषियों को सम्बोधित किया : अब मैं भगवान् श्रीकृष्णकी दिव्य कथा तथा राजर्षि परीक्षित महाराज के जन्म, कार्यकलाप तथा मोक्ष विषयकवार्ताएँ एवं पाण्डुपुत्रों द्वारा गृहस्था श्रम के त्याग की कथाएँ कहने जा रहा हूँ।
"
यदा मृधे कौरवसञ्जयानांवीरेष्वथो वीरगति गतेषु ।
वृकोदराविद्धगदाभिमर्श-भग्नोरुदण्डे धृतराष्ट्रपुत्रे ॥
१३॥
भर्तु: प्रियं द्रोणिरिति सम पश्यन्कृष्णासुतानां स्वपतां शिरांसि ।
उपाहरद्विप्रियमेव तस्यजुगुप्सितं कर्म विगर्हयन्ति ॥
१४॥
यदा--जब; मृधे--युद्धभूमि में; कौरव--धूृतराष्ट्र के पक्ष वाले; सृज्ञयानाम्--पाण्डवों के पक्ष के; वीरेषु--योद्धाओं में;अथो--इस तरह; वीर-गतिम्--योद्धाओं के योग्य स्थान; गतेषु--प्राप्त करने पर; वृकोदर-- भीम; आविद्ध-प्रताड़ित;गदा-गदा से; अभिमर्श--विलाप करते; भग्न--टूटा; उरू-दण्डे--मेरु दण्ड; धृतराष्ट्र-पुत्रे--राजा धृतराष्ट्र का पुत्र;भर्तु:--स्वामी का; प्रियम्-प्यारा; द्रौि:--द्रोणाचार्य का पुत्र; इति--इस प्रकार; स्म--होगा; पश्यन्--देखते हुए;कृष्णा--द्रौपदी के; सुतानाम्--पुत्रों का; स्वपताम्--सोते हुए; शिरांसि--शिर; उपाहरत्--पुरस्कार के रूप में प्रदानकिया; विप्रियम्--सुखद; एब--सहृश; तस्य--उसका; जुगुप्सितम्--अत्यन्त नृशंस; कर्म--कार्य; विगरहईयन्ति-- भर्त्सनाकरते हैं।
जब दोनों दलों अर्थात् कौरवों तथा पाण्डवों के अपने-अपने योद्धागण कुरुक्षेत्र केयुद्धस्थल में मारे जा चुके और मृत योद्धाओं को उनकी इच्छित गति प्राप्त हो गई और जबभीमसेन की गदा के प्रहार से मेरुदण्ड टूट जाने से धृतराष्ट्र का पुत्र विलाप करता गिर पड़ा,तो द्रोणाचार्य के पुत्र ( अश्वत्थामा ) ने द्रौपदी के सोते हुए पाँचों पुत्रों के सिरों को काटकरमूर्खतावश उन्हें उपहारस्वरूप यह सोचते हुए उसे अर्पित किया कि इससे उसका स्वामी प्रसन्न होगा।
लेकिन दुर्योधन ने इस जघन्य कृत्य की निन्दा की और वह तनिक भी प्रसन्न नहुआ।
"
माता शिशूनां निधन सुतानांनिशम्य घोरं परितप्यमाना ।
तदारुदद्वाष्पकलाकुलाक्षीतां सान्त्वयन्नाह किरीटमाली ॥
१५॥
माता--माता; शिशूनाम्--अबोध; निधनम्--ह त्या; सुतानाम्--पुत्रों की; निशम्य--सुनकर; घोरम्--नृंशसतापूर्वक;परितप्यमाना--शोक करती; तदा--उस समय; अरुदतू--रोने लगी; वाष्प-कल-आकुल-अक्षी--आँखों में आँसू केसाथ; ताम्--उसको; सान्त्वयन्-- धीरज बँधाते हुए; आह--कहा; किरीटमाली--अर्जुन ने ।
पाण्डवों के पाँचों पुत्रों की माता, द्रौपदी, अपने पुत्रों का वध सुनकर, आँसुओं से भरीआँखों के साथ, शोक से विलाप करने लगी।
इस घोर क्षति में उसे ढाढस बँधाते हुए अर्जुनउससे इस प्रकार बोले।
"
तदा शुचस्ते प्रमृजामि भद्रेयद्गह्मयबन्धो: शिर आततायिन: ।
गाण्डीवमुक्तैर्विशिखैरुपाहरेत्वाक्रम्य यत्स्नास्यसि दग्धपुत्रा ॥
१६॥
तदा--उस समय; शुचः --शोक के आँसू; ते--तुम्हारे; प्रमूजामि--पोंछ दूँगा; भद्वे--हे भद्ग स्त्री; यत्--जब; ब्रह्म-बन्धो:--पतित ब्राह्मण का; शिर:--सिर; आततायिन:--आततायी का; गाण्डीव-मुक्तै:--गांडीव नामक धनुष से छोड़ेगये; विशिखैः--बाणों से; उपाहरे--तुम्हें भेंट करूँगा; त्वा--तुम स्वयं; आक्रम्य--उस पर चढ़ कर; यत्--जो;स्नास्यसि--स्नान करोगी; दग्ध-पुत्रा--पुत्रों को दाह देने के बाद
हे देवी, जब मैं अपने गाण्डीव धनुष से छोड़े गये तीरों से उस ब्राह्मण का सिर काट केतुम्हें भेंट करूंगा, तभी मैं तुम्हारी आँखों से आँसू पोछूँगा और तुम्हें सान्त्वना प्रदान करूँगा।
तब तुम अपने पुत्रों के शरीरों का दाह करने के बाद उसके सिर पर खड़ी होकर स्नानकरना।
"
इति प्रियां वल्गुविचित्रजल्पै:स सान्त्वयित्वाच्युतमित्रसूत: ।
अन्वाद्रवद्वंशित उग्रधन्वाकपिध्वजो गुरुपुत्र रथेन ॥
१७॥
इति--इस तरह; प्रियाम्-प्रियतमा को; वल्गु--मीठे; विचित्र--तरह-तरह के; जल्पै:--कथनों द्वारा; सः--वह;सान्त्वयित्वा--सान्त्वना देकर, प्रसन्न करके; अच्युत-मित्र-सूतः--अर्जुन ने, जिसका मार्गदर्शन अच्युत भगवान् मित्र तथासारथी के रूप में करते हैं; अन्वाद्रवत्--पीछा किया; दंशित:--कवच द्वारा सुरक्षित; उग्र-धन्वा-- भयानक अस्त्रों सेसज्जित; कपि-ध्वज:--अर्जुन; गुरु-पुत्रमू--अपने गुरु के पुत्र को; रथेन--रथ पर आरूढ़ होकर।
इस प्रकार, मित्र तथा सारथी के रूप में अच्युत भगवान् द्वारा मार्गदर्शित किए जानेवाले अर्जुन ने अपनी प्रियतमा को ऐसे कथमनों से तुष्ट किया।
तब उसने अपना कवच धारणकिया और भयानक अस्त्र-शस्त्रों से लैस होकर, वह अपने रथ पर चढ़ कर अपने गुरुपुत्रअश्वत्थामा का पीछा करने के लिए निकल पड़ा।
"
तमापतन्तं स विलक्ष्य दूरात्कुमारहो द्विग्ममना रथेन ।
पराद्रवत्प्राणपरीप्सुरु्व्यायावद्गमं रुद्रभयाद्यथा क: ॥
१८॥
तम्--उसको; आपतन्तम्-क्रोध से आते हुए; सः--उसने; विलक्ष्य--देखकर; दूरात्-दूर से ही; कुमार-हा --राजकुमारों का हत्यारा; उद्विग्न-मना:--मन में विचलित; रथेन--रथ पर; पराद्रवत्-- भाग चला; प्राण--प्राण की;परीप्सु:--रक्षा करने के लिए; उर्व्यामू--तेज गति से; यावत्-गमम्--ज्योंही वह भागा; रुद्र-भयात्--शिव के भय से;यथा--जिस प्रकार; कः--ब्रह्मा या अर्कः।
राजकुमारों का हत्यारा, अश्वत्थामा, अर्जुन को दूर से ही अपनी ओर तेजी से आते हुएदेखकर अपने रथ पर सवार होकर डर के मारे अपनी जान बचाने के लिए उसी तरह भागनिकला, जिस प्रकार शिवजी के भय से ब्रह्माजी भागे थे।
"
यदाशरणमात्मानमैक्षत श्रान्तवाजिनम् ।
अख्ं ब्रह्मशिरो मेने आत्मत्राणं द्विजात्मज: ॥
१९॥
यदा--जब; अशरणम्--जिसके कोई आश्रय न हो; आत्मानमू--अपने को; ऐक्षत--देखा; श्रान्त-वाजिनम्--थके हुएघोड़े; अस्त्रमू--हथियार; ब्रह्म-शिर:--सर्वोच्च या परम ( आणविक ) ; मेने--प्रयुक्त किया; आत्म-त्राणम्-- अपनीरक्षा के लिए; द्विज-आत्म-ज:--ब्राह्ाण के पुत्र ने ।
जब ब्राह्मण के पुत्र ( अश्वत्थामा ) ने देखा कि उसके घोड़े थक गये हैं तो उसने सोचाकि अब उसके पास अनन्तिम अम्त्र ब्रह्मासत्र ८ आणविक हथियार ) का प्रयोग करने केअतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं रह गया।
"
अथोपस्पृश्य सलिलं सन्दधे तत्समाहित: ।
अजानन्नपि संहारं प्राणकृच्छु उपस्थिते ॥
२०॥
अथ--इस प्रकार; उपस्पृश्य--पवित्रता के लिए स्पर्श: सलिलम्--जल; सन्दधे--मंत्र पढ़ा; तत्--वह; समाहित:--ध्यान में मगन; अजानन्--बिना जाने; अपि--यद्यपि; संहारम्--वापसी; प्राण-कृच्छे--प्राण संकट; उपस्थिते--होनेपर
चूँकि उसके प्राण संकट में थे, अतएवं उसने अपने को पवित्र करने के लिए जल कास्पर्श किया और ब्रह्मासत्र चलाने के लिए मन्त्रोच्चार में अपना ध्यान एकाग्र किया, यद्यपिउसे इस अस्त्र को वापस लाने की विधि ज्ञात न थी।
ततः प्रादुष्कृतं तेज: प्रचण्डं सर्वतोदिशम् ।
प्राणापदमभिप्रेक्ष्य विष्णुं जिष्णुछुवाच ह ॥
२१॥
ततः--तत्पश्चात्; प्रादुष्कृतम्-प्रसारित किया गया; तेज:--चमक; प्रचण्डम्-- भयानक; सर्वतः--चारों ओर; दिशम्--दिशाएँ; प्राण-आपदम्--जीवन को प्रभावित करते हुए; अभिप्रेक्ष्य--देखकर; विष्णुम्--भगवान् से; जिष्णु:--अर्जुनने; उबाच ह--कहा
तत्पश्चात् समस्त दिशाओं में प्रचण्ड प्रकाश फैल गया।
यह इतना उग्र था कि अर्जुनको अपने प्राण संकट में जान पड़े, अतएवं उसने भगवान् श्रीकृष्ण को सम्बोधित करनाप्रारम्भ किया।
"
अर्जुन उवाचकृष्ण कृष्ण महाबाहों भक्तानामभयड्डूर ।
त्वमेको दह्यमानानामपवर्गोडसि संसृते: ॥
२२॥
अर्जुन: उबाच--अर्जुन ने कहा; कृष्ण--हे भगवान् कृष्ण; कृष्ण--हे भगवान् कृष्ण; महा-बाहो--सर्वशक्तिमान;भक्तानाम्-भक्तों के; अभयड्भूर-- भय को भगाने वाले; त्वमू--आप; एक:--एकमात्र; दह्ममानानाम्--कष्ट उठानेबालों के; अपवर्ग:--मोक्ष पथ; असि--हो; संसृतेः--भौतिक कष्टों के बीच में |
अर्जुन ने कहा : हे भगवान् श्रीकृष्ण, आप सर्वशक्तिमान परमेश्वर हैं।
आपकी विविधशक्तियों की कोई सीमा नहीं है।
अतएव एकमात्र आप ही अपने भक्तों के हृदयों में अभय उत्पन्न करने में समर्थ हैं।
भौतिक कष्टों की ज्वालाओं में फँसे सारे लोग केवल आपमें हीमोक्ष का मार्ग पा सकते हैं।
"
त्वमाद्य: पुरुष: साक्षादी श्वर: प्रकृते: पर: ।
मायां व्युदस्य चिच्छक्त्या कैवल्ये स्थित आत्मनि ॥
२३॥
त्वम् आद्यः--आप आदि; पुरुष:--भोक्ता पुरुष हैं; साक्षात्- प्रत्यक्ष; ई श्वर:--नियन्ता; प्रकृतेः-- भौतिक प्रकृति के;परः--दिव्य; मायाम्-- भौतिक शक्ति को; व्युदस्य--दूर भगा कर; चित्-शकक््त्या--अन्तरंगा शक्ति के बल से;कैवल्ये--शुद्ध शाश्वत ज्ञान तथा आनन्द में; स्थित:--स्थित; आत्मनि--अपने।
आप आदि भगवान् हैं जिनका समस्त सृष्टियों में विस्तार है और आप भौतिक शक्ति सेपरे हैं।
आपने अपनी आध्यात्मिक शक्ति से भौतिक शक्ति के सारे प्रभावों को दूर भगादिया है।
आप निरन्तर शाश्रत आनन्द तथा दिव्य ज्ञान में स्थित रहते हैं।
और, यद्यपि आप भौतिक शक्ति (माया) के कार्यक्षेत्र से परे हैं, फिर भी आपबद्धजीवों के परम कल्याण के लिए धर्म इत्यादि से के चारों सिद्धान्तों का पालन करते हैं।
"
स एवं जीवलोकस्य मायामोहितचेतस: ।
विधत्से स्वेन वीर्येण श्रेयो धर्मादिलक्षणम् ॥
२४॥
सः--वह दिव्यता; एब--निश्चय ही; जीव-लोकस्य--बद्धजीवों का; माया-मोहित--माया द्वारा मोहित; चेतस:--हृदय से; विधत्से --सम्पन्न करते हैं; स्वेन-- अपने; वीर्येण-- प्रभाव से; श्रेय:--परम कल्याण; धर्म-आदि--मोक्ष के चार सिद्धान्त; लक्षणम्--लक्षण |
और, यद्यपि आप भौतिक शक्ति (माया ) के कार्यक्षेत्र से परे हैं, फिर भी आप बद्धजीवों के परम कल्याण के लिए धर्म इत्यादि से के चारों सिद्धान्तों का पालन करते हैं।
"
तथायं चावतारस्ते भुवो भारजिहीर्षया ।
स्वानां चानन्यभावानामनुध्यानाय चासकृत् ॥
२५॥
तथा--इस प्रकार; अयम्--यह; च--तथा; अवतार: --अवतार; ते--आपका; भुवः--भौतिक जगत का; भार--बोझ;जिहीर्षया--दूर करने के लिए; स्वानाम्-मित्रों का; च अनन्य-भावानाम्--तथा अनन्य भक्तों का; अनुध्यानाय--बारम्बार स्मरण करने के लिए; च--तथा; असकृत्-पूर्ण रूप से प्रसन्न ।
इस प्रकार आप संसार का भार हटाने तथा अपने मित्रों तथा विशेषकर आपके ध्यान मेंलीन रहने वाले आपके अनन्य भक्तों को लाभ पहुँचाने के लिए अवतरित होते हैं।
"
किमिदं स्वित्कुतो वेति देवदेव न वेद्म्यहम् ।
सर्वतोमुखमायाति तेज: परमदारुणम् ॥
२६॥
किमू--क्या है; इदम्--यह; स्वित्--आता है; कुत:--कहाँ से; वा इति--चाहे जो हो; देव-देव--हे देवों के देव; न--नहीं; वेद्ि--जानता हूँ; अहम्--मैं; सर्वतः--चारों ओर; मुखम्--दिशाएँ; आयाति--आता है; तेज:--तेज; परम--अत्यधिक; दारुणम्--घातक ।
हे देवाधिदेव, चारों ओर फैलने वाला यह घातक तेज कैसा है? यह कहाँ से आ रहाहै? मैं इसे समझ नहीं पा रहा हूँ।
"
श्रीभगवानुवाचवेत्थेदं द्रोणपुत्रस्य ब्राह्ममसत्र प्रदर्शितम् ।
नैवासौ वेद संहारं प्राणबाध उपस्थिते ॥
२७॥
श्री-भगवान्--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने; उबाच--कहा; वेत्थ--मुझसे जानो; इृदम्--यह; द्रोण-पुत्रस्थ--द्रोण पुत्रका; ब्राह्मम् अस्त्रमू-ब्राह्म ( आणवबिक ) अस्त्र का मंत्र; प्रदर्शितम्-प्रदर्शित; न--नहीं; एब--भी; असौ--वह; वेद --यह जानो; संहारम्--लौटाना; प्राण-बाधे--जीवन का विलोप; उपस्थिते--उपस्थित होने पर।
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा : तुम मुझ से यह जान लो कि यह द्रोण के पुत्र काकार्य है।
उसने आणविक शक्ति के मंत्र ( ब्रह्मास्त्र ) का प्रहार किया है और वह यह नहींजानता कि उसकी चौंधको कैसे लौटाया जाय।
उसने निरुपाय होकर आसन्न मृत्यु के भयसे ऐसा किया है।
"
न हास्यान्यतमं किद्चिदसत्र॑ प्रत्यवकर्शनम् ।
जह्मसत्रतेज उन्नद्धमसत्रज्ञो दस्नतेजसा ॥
२८॥
न--नहीं; हि--निश्चय ही; अस्य--इसका; अन्यतमम्--अन्य; किश्ञित्--कुछ भी; अस्त्रमू--हथियार; प्रति--विपरीत;अवकर्शनमू्-- प्रतिक्रिया करने वाला; जहि--शमन करो; अस्त्र-तेज:--इस हथियार का तेज; उन्नद्धम्--अत्यन्तशक्तिशाली; अस्त्र-ज्ः--सैन्य विज्ञान में पठु; हि--निश्चय रूप से; अस्त्र-तेजसा--तुम्हारे हथियार के प्रभाव से
हे अर्जुन, केवल दूसरा ब्रह्मास्त्र ही इस अस्त्र को निरस्त कर सकता है।
चूँकि तुम सैन्यविज्ञान में अत्यन्त पटु हो, अतएवं अपने अस्त्र की शक्ति से इस अस्त्र के तेज का शमनकरो।
"
सूत उवाचश्रुत्वा भगवता प्रोक्ते फाल्गुन: परवीरहा ।
स्पष्टापस्तं परिक्रम्य ब्राह्मं ब्राह्मार्नं सन््दधे ॥
२९॥
सूतः--सूत गोस्वामी ने; उबाच--कहा; श्रुत्वा--सुनकर; भगवता-- भगवान् द्वारा; प्रोक्तम्--जो कहा गया; फाल्गुन:--अर्जुन का अन्य नाम; पर-वीर-हा--विपक्षी योद्धा का वध करने वाला; स्पृष्ठा--स्पर्श करके; आप: --जल; तम्--उसको; परिक्रम्य--परिक्रमा लगा कर; ब्राह्मम्--परम ब्रह्म को; ब्राह्म-अस्त्रमू--परम अस्त्र को; सन्दधे--छोड़ा
श्री सूत गोस्वामी ने कहा : भगवान् से यह सुनकर अर्जुन ने शुद्धि के लिए जल कास्पर्श किया और भगवान् श्रीकृष्ण की परिक्रमा करके, उस अस्त्र को प्रशमित करने केलिए उसने अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ा।
"
संहत्यान्योन्यमुभयोस्तेजसी शरसंवृते ।
आवृत्य रोदसी खं च ववृधातेडर्कवहिवत् ॥
३०॥
संहत्य--संयोग से; अन्योन्यम्--परस्पर; उभयो:--दोनों के; तेजसी--तेज; शर--हथियार; संवृते--घेरते हुए;आवृत्य--आच्छादित करके; रोदसी--पूरा आकाश; खम् च--बाह्म अन्तरिक्ष भी; बवृधाते--बढ़ते हुए; अर्क--सूर्य कागोला; वह्ि-वत्--अग्नि के समान
जब दोनों ब्रह्मासत्रों की किरणें मिल गईं, तो सूर्य के गोले के समान अग्नि के एकबृहत तक ने समस्त बाह्य अन्तरिक्ष तथा लोकों के सम्पूर्ण गगनमण्डल को आवृत्त करलिया।
"
इष्टासत्रतेजस्तु तयोस्त्रील्लोकान् प्रदहन्महत् ।
दह्ममाना: प्रजा: सर्वा: सांवर्तकममंसत ॥
३१॥
इष्ठा--इस प्रकार देख कर; अस्त्र--हथियार; तेज: --उष्मा; तु--लेकिन; तयो:--दोनों की; त्रीन्--तीनों; लोकान्--लोकों को; प्रदहत्--ज्वलंत; महत्--बुरी तरह; दह्ममाना:--जलाते हुए; प्रजा:--जनता; सर्वा: --सर्वत्र; सांवर्तकम्--वह अग्नि जो ब्रह्माण्ड के प्रलय के समय विध्वंस करती है; अमंसत--सोचने लगा।
उन अस्त्रों की सम्मिलित अग्नि से तीनों लोकों के सारे लोग जल-भुन गये।
सभी लोगोंको उस सांवर्तक अग्नि का स्मरण हो आया, जो प्रलय के समय लगती है।
"
प्रजोपद्रवमालक्ष्य लोकव्यतिकरं च तम् ।
मतं च वासुदेवस्य सञ्हारार्जुनो द्वयम् ॥
३२॥
प्रजा--सामान्य जन; उपद्रवम्--अव्यवस्था; आलक्ष्य--देखकर; लोक-- ग्रहों का; व्यतिकरम्--विनाश; च-- भी;तम्--उसको; मतम् च--तथा मत को; वासुदेवस्थ--वासुदेव या श्रीकृष्ण का; सझ्लहार--शमन किया, निवारण किया;अर्जुन:--अर्जुन ने; द्यम्--दोनों अस्त्रों का।
इस प्रकार जन सामान्य में फैली हड़बड़ी एवं ग्रहों के आसन्न विनाश को देखकर,अर्जुन ने भगवान् श्रीकृष्ण की इच्छानुसार तुरन्त ही दोनों अस्त्रों का निवारण कर दिया।
"
तत आसाद्य तरसा दारुणं गौतमीसुतम् ।
बबन्धामर्षताम्राक्ष: पशुं रशनया यथा ॥
३३॥
ततः--तत्पश्चात्; आसाद्य--बन्दी बनाकर; तरसा--कौशल से; दारुणम्--खतरनाक; गौतमी-सुतम्--गौतमी पुत्र को;बबन्ध--बाँध लिया; अमर्ष--क्रुद्ध; ताम्र-अक्ष:--लाल-लाल आँखें; पशुम्--पशु को; रशनया--रस्सियों से; यथा--जिस प्रकार
ताँबे के दो लाल तप्त गोलों के समान क्रोध से प्रज्वलित आँखें किये, अर्जुन ने अत्यन्तदक्षतापूर्वक से गौतमी के पुत्र को बन्दी बना लिया और उसे रस्सियों से पशु की तरह बाँधलिया।
"
शिबिराय निनीषणन्तं रज्या बद्ध्वा रिपुं बलातू ।
प्राहार्जुन॑ प्रकृपितो भगवानम्बुजेक्षण: ॥
३४॥
शिबिराय--सेना के पड़ाव में; निनीषन्तम्--लाते हुए; रज्वा--रस्सियों से; बद्ध्वा--बँधा हुआ; रिपुम्-शत्रु को;बलातू--बलपूर्वक; प्राह--कहा; अर्जुनम्--अर्जुन से; प्रकुपित:--क्रुद्ध; भगवान्-- भगवान् ने; अम्बुज-ईक्षण: --अपने कमल सहश नेत्रों से देखने वाले ।
अश्वत्थामा को बाँध लेने के बाद, अर्जुन उसे सेना के पड़ाव की ओर ले जाना चाह रहाथा कि अपने कमलनेत्रों से देखते हुए भगवान् श्रीकृष्ण ने क्रुद्ध अर्जुन से इस प्रकार कहा।
"
मैन पार्थर्हिसि त्रातुं ब्रह्मबन्धुमिमं जहि ।
योसावनागस: सुप्तानवधीज्रिशि बालकान् ॥
३५॥
मा एनम्--उसके प्रति कभी नहीं; पार्थ--हे अर्जुन; अरहसि--तुम्हें चाहिए; त्रातुमू--मुक्त करना; ब्रह्म-बन्धुम्--ब्राह्मणके सम्बन्धी को; इमम्--इस; जहि--मार डालो; यः--जो; असौ--उन; अनागस:--दोषरहित; सुप्तान्--सोये हुए;अवधीतू--हत्या की; निशि--रात्रि में; बालकान्--बालकों की ।
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा: हे अर्जुन, इस ब्रह्म-बन्धु को छोड़कर तुम दया मतदिखलाओ, क्योंकि इसने सोते हुए निर्दोष बालकों का वध किया है।
"
मत्तं प्रमत्तमुन्मत्तं सुप्तं बाल॑ स्त्रियं जडम् ।
प्रपन्न॑ विरथं भीतं न रिपुं हन्ति धर्मवित् ॥
३६॥
मत्तम्--लापरवाह को; प्रमत्तमू-नशे में रहने वाले को; उन्मत्तमू--पागल को; सुप्तम्--सोए हुए को; बालमू--बालकको; स्त्रियमू--स्त्री को; जडम्--मूर्ख को; प्रपन्नम्--शरणागत को; विरथम्--रथविहीन को; भीतम्--भयभीत को;न--नहीं; रिपुम्--शत्रु को; हन्ति--मारते हैं; धर्म-वित्-- धार्मिक नियमों का ज्ञाता
जो मनुष्य धर्म के सिद्धन्तों को जानता है, वह ऐसे शत्रु का वध नहीं करता जोअसावधान, नहे में उन्मत्त, पागल, सोया हुआ, डरा हुआ या रथविहीन हो।
न ही वह किसीबालक, स्त्री, मूर्ख प्राणी अथवा शरणागत जीव का वध करता है।
"
स्वप्राणान् यः परप्राणै: प्रपुष्णात्यघूण: खल: ।
तद्ठधस्तस्य हि श्रेयो यद्दोषाद्यात्यध: पुमान् ॥
३७॥
स्व-प्राणान्--अपना जीवन; य:--जो; पर-प्राणैः --दूसरों के जीवन के मूल्य पर; प्रपुष्णाति--ठीक से पलता है;अघृण:--निर्लज; खलः--दुष्ट; तत्-वध:--उसको मारना; तस्य--उसका; हि--निश्चय ही; श्रेय: -- श्रेयस्कर; यत्--जिस; दोषात्--दोष से; याति--जाता है; अध:--नीच की ओर; पुमान्--मनुष्य |
ऐसा क्रूर तथा दुष्ट व्यक्ति जो दूसरों के प्राणों की बलि पर पलता है, उसका वध कियाजाना उसके लिए ही हितकर है, अन्यथा अपने ही कर्मों से उसकी अधोगति होती है।
"
प्रतिश्रुते च भवता पाञ्ञाल्यै श्रुण्वतो मम ।
आहरिष्ये शिरस्तस्य यस्ते मानिनि पुत्रहा ॥
३८॥
प्रतिश्रुतम्--वचन दिया गया; च--तथा; भवता--तुम्हारे द्वारा; पाज्जाल्यै--राजा पांचाल की पुत्री ( द्रौपदी ) को;श्रुण्वत:--सुना गया; मम--मेरे द्वारा; आहरिष्ये--मैं अवश्य लाऊँगा; शिर:--सिर; तस्थ--उसका; यः--जिसने; ते--तुम्हारे; मानिनि--मानते हो; पुत्र-हा--पुत्रों का वधकर्ता ।
इसके अतिरिक्त, मैंने स्वयं तुम्हें द्रौपदी से यह प्रतिज्ञा करते सुना है कि तुम उसके पुत्रोंके वधकर्ता का सिर लाकर उपस्थित करोगे।
"
तदसौ वध्यतां पाप आतताय्यात्मबन्धुहा ।
भर्तुश्च विप्रियं वीर कृतवान् कुलपांसन: ॥
३९॥
तत्--अत:; असौ--यह आदमी; वध्यताम्--मारा जाएगा; पाप: --पापी; आततायी--हमला करने वाला; आत्म--अपने; बन्धु-हा--पुत्रों को मारने वाला; भर्तु:--स्वामी का; च--भी; विप्रियम्--संतुष्ट न करके; वीर--हे योद्धा;कृतवान्--करने वाला; कुल-पांसन:--कुल की राख |
यह आदमी तुम्हारे ही कुल के सदस्यों का हत्यारा तथा वधकर्ता ( आततायी ) है।
यहीनहीं, उसने अपने स्वामी को भी असंतुष्ट किया है।
वह अपने कुल की राख ( कुलांगार ) है।
तुम तत्काल इसका वध कर दो।
"
सूत उवाचएवं परीक्षता धर्म पार्थ: कृष्णेन चोदित: ।
नैच्छद्धन्तुं गुरुसुतं यद्यप्यात्महनं महान् ॥
४०॥
सूतः--सूत गोस्वामी ने; उवाच--कहा; एवम्--यह; परीक्षता--परीक्षा लेते हुए; धर्मम्--कर्तव्य के मामले में; पार्थ: --श्री अर्जुन; कृष्णेन-- भगवान् कृष्ण द्वारा; चोदित:--प्रोत्साहित किये जाने पर; न ऐच्छत्--नहीं चाहा; हन्तुम्--मारना;गुरु-सुतम्--अपने गुरु के पुत्र को; यद्यपि--यद्यपि; आत्म-हनम्--पुत्रों का वधकर्ता; महान्--बहुत बड़ा।
सूत गोस्वामी ने कहा : यद्यपि धर्म में अर्जुन की परीक्षा लेते हुए कृष्ण ने उसेद्रोणाचार्य के पुत्र का वध करने के लिए प्रोत्साहित किया, लेकिन महात्मा अर्जुन को यहविचार नहीं भाया, यद्यपि अश्वत्थामा अर्जुन के ही कुटुम्बियों का नृशंस हत्यारा था।
"
अथोपेत्य स्वशिबिरं गोविन्दप्रियसारथि: ।
न्यवेदयत्तं प्रियायै शोचन्त्या आत्मजान् हतान् ॥
४१॥
अथ--त्पश्चात्; उपेत्य--पहुँचकर; स्व-- अपने; शिबिरम्--शिविर में; गोविन्द--इन्द्रियों को गतिशील करने वाले( भगवान् श्रीकृष्ण ); प्रिय--प्यारा; सारथि:--रथ चालक; न्यवेदयत्-- प्रदान किया; तम्--उसको ;; प्रियायै--प्रियतमाको; शोचन्त्यै--विलाप करती; आत्म-जानू--अपने पुत्रों के लिए; हतान्--वध किये गये।
अपने प्रिय मित्र तथा सारथी ( श्रीकृष्ण ) सहित अपने शिविर में पहुँचकर अर्जुन ने उसहत्यारे को अपनी प्रिय पत्ती को सौंप दिया, जो मारे गये अपने पुत्रों के लिए विलाप कररही थी।
"
तथाहतं पशुवत् पाशबद्ध-मवाड्मुखं कर्मजुगुप्सितेन ।
निरीक्ष्य कृष्णापकृत॑ गुरो: सुतंवामस्वभावा कृपया ननाम च ॥
४२॥
तथा--इस प्रकार; आहतम्--लाया गया; पशु-वत्--पशु के समान; पाश-बद्धम्--रस्सियों से बँधा; अवाक्-मुखम्--मुँह से एक भी शब्द निकले बिना; कर्म--कार्य; जुगुप्सितेन--घृणित होने के कारण; निरीक्ष्य--देखकर; कृष्णा--द्रौपदी; अपकृतम्--अधर्म कार्य करने वाला; गुरोः--गुरु के; सुतम्-पुत्र को; वाम--सुन्दर; स्वभावा--स्वभाव वाली;कृपया--दयावश; ननाम--प्रणाम किया; च--तथा
श्री सूत गोस्वामी ने कहा : तब द्रौपदी ने अश्वत्थामा को देखा, जो पशु की भाँतिरस्सियों से बँधा था और अत्यन्त घृणित हत्या का कृत्य करने के कारण चुप था।
अपने स्त्री स्वभाववश तथा स्वभाव से उत्तम एवं भद्र होने के कारण, उसने ब्राह्मण रूप में उसके प्रतिसम्मान व्यक्त किया।
"
उवाच चासहतन्त्यस्य बन्धनानयनं सती ।
मुच्यतां मुच्यतामेष ब्राह्मणो नितरां गुरु: ॥
४३॥
उवाच--कहा; च--तथा; असहन्ती--उसके लिए असह्य होने के कारण; अस्य--उसका; बन्धन--बाँधा जाना;आनयनमू्--उसका लाया जाना; सती--परायणा, भक्त; मुच्यताम् मुच्यताम्--इसे छोड़ दो; एष:--यह; ब्राह्मण: --ब्राह्मण; नितराम्--हमारा; गुरु:--गुरु
वह अश्वत्थामा का इस प्रकार रस्सियों से बाँधा जाना सह न सकी और भगवद्परायणस्त्री होने के कारण उसने कहा 'इसे छोड़ दो, क्योंकि यह ब्राह्मण है, हमारा गुरु है।
'" सरहस्यो धनुर्वेद: सविसर्गोपसंयम: ।
अख्रामश्च भवता शिक्षितो यदनुग्रहात् ॥
४४॥
स-रहस्यः--गोपनीय; धनु:-वेद:--धनुष-बाण चलाने की विद्या; स-विसर्ग--छोड़ते हुए; उपसंयम: --वश में करतेहुए; अस्त्र--हथियार; ग्राम:--सभी प्रकार के; च--तथा; भवता--अपने से; शिक्षित:--विद्वान; यत्--जिसकी;अनुग्रहात्-कृपा से।
यह द्रोणाचार्य की कृपा थी कि आपने धनुष बाण चलाने की विद्या तथा अस्त्रों कोवश में करने की गुप्त कला सीखी।
"
स एष भगवान्द्रोण: प्रजारूपेण वर्तते ।
तस्यात्मनो<र्ध पत्न्यास्ते नान्वगाद्वीरसू: कृपी ॥
४५॥
सः--वह; एष:--निश्चय ही; भगवानू--स्वामी; द्रोण:--द्रोणाचार्य ; प्रजा-रूपेण-- अपने पुत्र अश्वत्थामा के रूप में;वर्तते--उपस्थित हैं; तस्थ--उनके ; आत्मन: --शरीर का; अर्धम्--आधा; पत्ती--पत्नी; आस्ते--जीवित है; न--नहीं;अन्वगात्--अनुगमन किया; वीरसू:--पुत्र वाली, पुत्रवती; कृपी--कृपाचार्य की बहन।
अपने पुत्र द्वारा प्रतिनिधित्व किये जाने के कारण वे ( द्रोणाचार्य ) अब भी निश्चित रूपसे विद्यमान हैं।
उनकी पत्नी कृपी सती नहीं हुईं, क्योंकि बे पुत्रवती थीं।
"
तद् धर्मज्ञ महाभाग भवद्धिगौंरवं कुलम् ।
वृजिन नाहति प्राप्तु पूज्यं वन्द्यमभीक्ष्णश: ॥
४६॥
तत्--अतएव; धर्म-ज्ञ--धर्म का ज्ञाता; महा-भाग--अत्यन्त भाग्यशाली; भवद्ध्धिः--आपके द्वारा; गौरवम्--गौरवान्वित; कुलम्--कुल; वृजिनमू--पीड़ादायक; न--नहीं; अ्हति--योग्य है; प्राप्तुमु--पाने के लिए; पूज्यम्--पूज्य;वन्द्यम्--वन्दनीय; अभीक्ष्णश: --निरन्तर ।
हे धर्म के ज्ञाता परम भाग्यशाली, यह आपको शोभा नहीं देता कि आप सदा से पूज्यतथा वन्दनीय, गौरवशाली परिवार के सदस्यों के शोक का कारण बनें।
"
मा रोदीदस्य जननी गौतमी पतिदेवता ।
यथाहं मृतवत्सार्ता रोदिम्यश्रुमुखी मुहु: ॥
४७॥
मा--नहीं; रोदीत्--रोए; अस्य--इसकी; जननी --माता; गौतमी--द्रोण-पत्नी; पति-देवता--पतिकव्रता; यथा--जैसाकि; अहम्--ैं; मृत-वत्सा--जिसका पुत्र मर चुका है; आर्ता--दुखी; रोदिमि--रोती हुई; अश्रु-मुखी--आँखों में अश्रुभरे; मुहुः--निरन्तर ।
हे स्वामी, द्रोणाचार्य की पत्नी को मेरे समान मत रुलाओ।
मैं अपने पुत्रों की मृत्यु केलिए संतप्त हूँ।
कहीं उसे भी मेरे समान निरन्तर रोना न पड़े।
"
ये: कोपितं ब्रह्मकुलं राजन्यैरजितात्मभि: ।
तत् कुल प्रदहत्याशु सानुबन्धं शुचार्पितम् ॥
४८ ॥
यैः--जिनके द्वारा; कोपितम्-क्रुद्ध; ब्रह्म-कुलम्--ब्राह्मणों का कुल; राजन्यै:--राजा कुल से; अजित--निरंकुश;आत्मभि:--अपने से; तत्--उस; कुलम्--कुल को; प्रदहति--जला देती है; आशु--तुरन्त; स-अनुबन्धम्--कुटुम्बियोंसमेत; शुचा-अर्पितम्-कष्ट पाने पर ।
यदि इन्द्रियतृष्ति में निरकुंश बनकर राजकुल ब्राह्मण कुल को अपमानित और कुपितकरता है, तो वह क्रोध की अग्नि समस्त राजकुल को जला देती है और सबों को दुख देतीहै।
"
सूत उवाचधर्म्य न्याय्यं सकरुणं निर्व्यलीक॑ सम॑ महत् ।
राजा धर्मसुतो राश्या: प्रत्यनन्दद्गचो द्विजा: ॥
४९॥
सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; धर्म्यम्-धर्म के नियमों के अनुसार; न्याय्यम्-न्याय; स-करुणम्-करुणा सेपूर्ण; निर्व्यलीकम्-- धर्म में द्वैत के बिना; समम्--समता; महत्--गौरवशाली; राजा--राजा; धर्म-सुत:--पुत्र; राज््या:--महारानी द्वारा; प्रत्यनन्दत्--अनुमोदित; वच:--कथन; द्विजा:--हे ब्राह्मणो ।
सूत गोस्वामी ने कहा : हे ब्राह्मणो, राजा युथ्चिष्ठिर ने रानी के बचनों का पूर्ण अनुमोदनकिया, क्योंकि वे धर्म के नियमों के अनुसार न््यायोचित, गौरवशाली, दया तथा समता सेपूर्ण एवं निष्कपट थे।
"
नकुल: सहदेवश्व युयुधानो धनञ्जय: ।
भगवान् देवकीपुत्रो ये चानये याश्र योषित: ॥
५० ॥
नकुलः--नकुल; सहदेव: --सहदेव; च--तथा; युयुधान:--सात्यकि; धनझ्जय: -- अर्जुन; भगवान्-- भगवान्; देवकी-पुत्रः--देवकी पुत्र, भगवान् श्रीकृष्ण; ये--जो; च--तथा; अन्ये-- अन्य; या:--वे; च--तथा; योषित: -स्त्रियाँ ।
नकुल तथा सहदेव ( राजा के छोटे भाई ) तथा सात्यकि, अर्जुन, देवकीपुत्र भगवान्श्रीकृष्ण तथा स्त्रियों एवं अन्यों ने एक स्वर से राजा से सहमति व्यक्त की।
"
तत्राहामर्षितो भीमस्तस्य श्रेयान् वध: स्मृतः ।
न भर्तुर्नत्मनश्चार्थ योहन् सुप्तान् शिशून् वृथा ॥
५१॥
तत्र--तत्पश्चात्; आह--कहा; अमर्षित: --क्रुद्ध स्वर में; भीम:-- भीम ने; तस्य--उसका; श्रेयान्--परम कल्याण;वध:--वध; स्मृत:-- अंकित; न--नहीं; भर्तु:--स्वामी का; न--न तो; आत्मन:--अपने आपका; च--तथा; अर्थे--केलिए; यः--जो; अहनू--मारा; सुप्तान्--सोते हुए; शिशून्--बालकों को; वृथा--व्यर्थ ही ।
लेकिन भीम जो क्रुद्ध मनोदशा में था, उनसे सहमत नहीं हुआ और उसने उस दोषी केवध किये जाने की संस्तुति की, जिसने व्यर्थ ही सोते हुए बालकों की हत्या कर दी थीजिसमें न तो उसका अपना, न ही उसके स्वामी का हित था।
"
निशम्य भीमगदित॑ द्रौपद्याश्व चतुर्भुजः ।
आलोक्य वदनं सख्युरिदमाह हसन्निव ॥
५२॥
निशम्य--सुनते ही; भीम--भीम द्वारा; गदितम्--कहा गया; द्रौपद्या:--द्रौपदी का; च--तथा; चतु:-भुजः --चारभुजाओं वाले ( भगवान् ) ने; आलोक्य--देखकर; वदनम्--मुख; सख्यु:--अपने मित्र का; इदम्--यह; आह--कहा;हसनू--हँसते हुए; इब--मानो |
भीम, द्रौपदी तथा अन्यों के वचन सुनकर, चतुर्भुज भगवान् ने अपने प्रिय सखा अर्जुनके मुँह की ओर देखा और मानो मुस्कुरा रहे हों, बोलना प्रारम्भ किया।
"
श्रीभगवानुवाचब्रह्मबन्धुर्न हन्तव्य आततायी वधाहण: ।
मयैवोभयमाम्नातं परिपाह्ननुशासनम् ॥
५३॥
कुरु प्रतिश्रुतं सत्यं यत्तत्सान्त्वयता प्रियाम् ।
प्रियं च भीमसेनस्य पाञ्जाल्या मह्ममेव च ॥
५४॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; ब्रह्म-बन्धु;--ब्राह्मण का सम्बन्धी; न--नहीं; हन्तव्य:--वध करने योग्य;आततायी--आततायी, आक्रामक; वध-अरईण:--वध करने योग्य है; मया--मेरे द्वारा; एब--निश्चय ही; उभयम्--दोनों; आम्नातमू--शास्त्र के आदेशानुसार; परिपाहि--पालन करो; अनुशासनम्-- आदेश; कुरु--पालन करो;प्रतिश्रुतम्--जैसाकि प्रतिज्ञा की गई है; सत्यम्--सत्य; यत् तत्--वह जो; सान्त्ववता--सान्त्वना देते हुए; प्रियाम्--प्रिय पत्नी को; प्रियम्--तुष्टि; च--तथा; भीमसेनस्थ-- श्रीभीमसेन की; पाञ्ञाल्या:--द्रौपदी की; महाम्--मेरी भी; एव--निश्चय ही; च--तथा।
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा : किसी ब्रह्मअन्धु का वध नहीं करना चाहिए, किन्तु यदि वहआततायी हो, तो उसे अवश्य मारना चाहिए।
ये सारे आदेश शाम्त्रों में हैं और तुम्हें इन्हीं केअनुसार कार्य करना चाहिए।
तुम्हें अपनी पत्नी को दिये गये वचन भी पूरे करने हैं और तुम्हेंभीमसेन तथा मेरी तुष्टि के लिए भी कार्य करना है।
"
सूत उवाचअर्जुन: सहसाज्ञाय हरेहर्दमथासिना ।
मर्णि जहार मूर्धन्यं ट्विजस्य सहमूर्धजम् ॥
५५ ॥
सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; अर्जुन:--अर्जुन ने; सहसा--ठीक उसी समय; आज्ञाय--जानते हुए; हरेः -- भगवान्के; हार्दमू--अभीष्ट; अथ--इस प्रकार; असिना--तलवार से; मणिम्--मणि को; जहार--विलग कर दिया; मूर्धन्यम्--सिर पर; द्विजस्य--द्विज के; सह--सहित; मूर्धजम्--बालों के ।
उसी समय अर्जुन भगवान् की अनेकाधिक आज्ञा का प्रयोजन समझ गया और इसतरह उसने अपनी तलवार से अश्वत्थामा के सिर से केश तथा मणि दोनों पृथक् कर दिये।
"
विमुच्य रशनाबद्धं बालहत्याहतप्रभम् ।
तेजसा मणिना हीन॑ शिबिरात्निरयापयत् ॥
५६॥
विमुच्य--उसे छोड़ देने पर; रशना-बद्धम्--रस्सियों के बन्धन से; बाल-हत्या--बालकों के वध से; हत-प्रभम्--शारीरिक कान्ति का क्षय; तेजसा--शक्ति से; मणिना--मणि से; हीनम्--रहित; शिवबिरात्--शिविर से; निरयापयत् --निकाल भगाया।
बालहत्या के कारण वह ( अश्वत्थामा ) पहले ही अपनी शारीरिक कान्ति खो चुका थाऔर अब, अपनी शीर्ष मणि खोकर, वह शक्ति से भी हीन हो गया।
इस प्रकार उसकीरस्सियाँ खोल कर उसे शिविर से बाहर भगा दिया गया।
"
वपन॑ द्रविणादान स्थानान्निर्यापणं तथा ।
एष हि ब्रह्मबन्धूनां वधो नान्योस्ति दैहिक: ॥
५७॥
वपनम्--सिर से बालों को मुँड़ा कर; द्रविण--धन; अदानम्--छीना गया; स्थानात्--घर से; निर्यापणम्-- भगाया गया;तथा-- भी; एष:--ये सब; हि--निश्चय ही; ब्रह्म-बन्धूनामू--ब्राह्मण के सम्बन्धियों का; वध:--वध, हत्या; न--नहीं;अन्य:--अन्य कोई विधि; अस्ति--है; दैहिक:--शरीर के विषय में ।
उसके सिर के बाल मूँड़ना, उसे संपदाहीन करना तथा उसे घर से भगा देना--ये हैं ब्रह्मबन्धु के लिए निश्चित दंड।
शारीरिक वध करने का कोई विधान नहीं है।
"
पुत्रशोकातुरा: सर्वे पाण्डवा: सह कृष्णया ।
स्वानां मृतानां यत्कृत्यं चक्कु्निर्हरणादिकम् ॥
५८॥
पुत्र-पुत्रों के; शोक--शोक से; आतुरा:--अभिभूत; सर्वे--वे सभी; पाण्डवा:--पाणएडु के पुत्र; सह--सहित;कृष्णया--द्रौपदी; स्वानामू--परिजनों के; मृतानामू--मृत; यत्--जो; कृत्यम्--करणीय; चक्कु:--सम्पन्न किया;निहरण-आदिकम्--जो कुछ किया जा सकता था।
तत्पश्चात् शोकाभिभूत पाण्डु-पुत्रों तथा द्रौपदी ने अपने स्वजनों के मृत शरीरों ( शवों )का समुचित दाह-संस्कार किया।
"
