← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 1 की सूची
अध्याय छह: नारद और व्यासदेव के बीच बातचीत
1.6सूत उवाचएवं निशम्य भगवान्देवर्षेजन्म कर्म च ।
भूय: पप्रच्छ त॑ब्रह्मन् व्यास: सत्यवतीसुत: ॥
१॥
सूतः उबाच--सूत ने कहा; एवम्--इस प्रकार; निशम्य--सुनकर; भगवान्--ई श्वर का शक्त्यावेश अवतार; देवर्षे : --देवर्षि का; जन्म--जन्म; कर्म--कर्म; च--तथा; भूय:--पुनः ; पप्रच्छ--पूछा; तम्--उनसे; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मणो;व्यास:--व्यासदेव ने; सत्यवती-सुतः --सत्यवती का पुत्र ।
सूत ने कहा : हे ब्राह्मणो, इस तरह श्री नारद के जन्म तथा कार्यकलापों के विषय मेंसब कुछ सुन लेने के बाद ईश्वर के अवतार तथा सत्यवती के पुत्र, श्री व्यासदेव ने इसप्रकार पूछा।
"
व्यास उवाचभिक्षुभिर्विप्रवसिते विज्ञानादेष्टभिस्तव ।
वर्तमानो वयस्याद्ये तत: किमकरोद्धवान् ॥
२॥
व्यास: उवाच-- श्री व्यासदेव ने कहा; भिश्षुभि:--महान साधुओं द्वारा; विप्रवसिते-- अन्य स्थानों को चले जाने पर;विज्ञान--अध्यात्म का वैज्ञानिक ज्ञान; आदेष्टभि:--जिन्होंने उपदेश दिया था; तब--आपका; वर्तमान: --वर्तमान;वयसि--आयु के; आद्ये-प्रारम्भ में; ततः--तत्पश्चात्; किम्-क्या; अकरोत्--किया; भवान्--आपने |
श्री व्यासदेव ने ( नारद जी से ) कहा : आपने उन महामुनियों के चले जाने पर क्याकिया जिन्होंने आपके इस जन्म के प्रारम्भ होने से पूर्व आपको दिव्य वैज्ञानिक ज्ञान प्रदानकिया था?"
स्वायम्भुव कया वृत्त्या वर्तितं ते परं वयः ।
कथं चेदमुदस््राक्षी: काले प्राप्त कलेवरम् ॥
३॥
स्वायम्भुव--हे ब्रह्मा के पुत्र; कया--किस परिस्थिति में; वृत्त्या--वृत्ति; वर्तितम्--बिताया; ते--आपने; परम्--दीक्षाके बाद; वयः--आयु; कथम्--कैसे; च--तथा; इदम्--यह; उदस्त्राक्षी:--छोड़ा; काले--समय आने पर, यथासमय;प्राप्ते--प्राप्त होने पर; कलेवरम्--शरीर को |
हे ब्रह्मा के पुत्र, आपने दीक्षा लेने के बाद किस प्रकार जीवन बिताया ? और यथा समय अपने पुराने शरीर को त्याग कर आपने यह शरीर कैसे प्राप्त किया ?प्राक्लल्पविषयामेतां स्मृति ते मुनिसत्तम ।
"
प्राक्नल्पविषयामेतां स्मृति ते मुनिसत्तम ।
न होष व्यवधात्काल एष सर्वनिराकृति: ॥
४॥
प्राकु-पूर्ववर्ती; कल्प--ब्रह्मा के एक दिन का समय; विषयाम्--विषय वस्तु; एताम्--ये सब; स्मृतिमू--सुधि, याद;ते--तुम्हारी; मुनि-सत्तम--हे महामुनि; न--नहीं; हि--निश्चय ही; एष:--ये सब; व्यवधात्-- अन्तर किया; काल:--समय आने पर; एष:--ये; सर्व--सभी; निराकृति: --संहार ।
हे महामुनि, समय आने पर काल हर वस्तु का संहार कर देता है, अतएव यह कैसेसम्भव हुआ है कि यह विषय, जो ब्रह्मा के इस दिन के पूर्व घटित हो चुका है, अब भीआपकी स्मृति में काल द्वारा अप्रभावित जैसे का तैसा बना हुआ है ?"
नारद उवाचभिक्षुभिर्विप्रवसिते विज्ञानादेष्टभिर्मम ।
वर्तमानो वयस्याद्ये तत एतदकारषम् ॥
५॥
नारद: उवाच-- श्री नारद ने कहा; भिक्षुभि: --मुनियों के द्वारा; विप्रवसिते--अन्य स्थान को चले जाने पर; विज्ञान--व्यावहारिक आध्यात्मिक ज्ञान; आदेष्टभि:--जिन्होंने मुझे प्रदान किया था; मम--मेरा; वर्तमान: --वर्तमान; वयसिआद्ये--इस जीवन के पूर्व; तत:--तत्पश्चात्; एतत्--इतना; अकारषम्--सम्पन्न किया।
श्री नारद ने कहा : जिन महर्षियों ने मुझे अध्यात्म का व्यावहारिक ज्ञान प्रदान कियाथा, वे अन्य स्थानों को चले गये और मुझे इस प्रकार से अपना जीवन बिताना पड़ा।
"
एकात्मजा मे जननी योषिन्मूढा च किड्छूरी ।
मय्यात्मजेडनन्यगतौ चक्रे स्नेहानुबन्धनम् ॥
६॥
एक-आत्मजा--केवल एक सनन््तान वाली; मे--मेरी; जननी--माता ने; योषित्--स्त्री जाति; मूढा--मूर्ख ; च--तथा;किड्जरी --दासी; मयि--मुझ; आत्मजे--सन्तान में; अनन्य-गतौ--जिसकी रक्षा का कोई अन्य साधन न हो; चक्रे --किया; स्नेह-अनुबन्धनम्-प्रेम के बन्धन में बँधा ।
मैं अपनी माता का इकलौता पुत्र था।
वह न केवल भोलीभाली स्त्री थी, अपितु दासीभी थी।
चूँकि मैं उसकी एकमात्र सनन््तान था, अतः उसकी रक्षा का कोई अन्य साधन न था,अतएव उसने मुझे अपने स्नेह-पाश में बाँध रखा था।
"
सास्वतन्त्रा न कल्पासीद्योगक्षेमं ममेच्छती ।
ईशस्य हि वशे लोको योषा दारुमयी यथा ॥
७॥
सा--वह; अस्वतन्त्रा--आश्रित थी; न--नहीं; कल्पा--समर्थ; आसीत्-- थी; योग-क्षेमम्--लालन-पालन; मम--मेरा;इच्छती--यद्यपि उत्सुक; ईशस्य--ई श्वर का; हि-- क्योंकि; वशे--वश में; लोक: --प्रत्येक व्यक्ति; योषा--गुड़िया;दारु-मयी--काठ की बनी; यथा--जिस तरह।
वह मेरा लालन-पालन अच्छी तरह करना चाहती थी, लेकिन पराश्रित होने के कारणवह मेरे लिए कुछ भी नहीं कर पाती थी।
यह संसार परमेश्वर के पूर्ण नियन्त्रण में है, अतएवप्रत्येक व्यक्ति कठपुतली नचाने वाले के हाथ में किसी काठ की गुड़िया के समान है।
"
अहं च तद्ढह्मकुले ऊषिवांस्तदुपेक्षया ।
दिग्देशकालाव्युत्पन्नो बालक: पञ्चहायन: ॥
८॥
अहम्-मैं; च-- भी; तत्--उस; ब्रह्म-कुले--ब्राह्मणों की पाठशाला में; ऊषिवान्--रहता था; तत्--उसका;उपेक्षया--आश्रित; दिकू-देश--दिशा तथा देश; काल--समय; अत्युत्पन्न: --अनुभवविहीन; बालक:--मात्र बालक;पञ्चञ--पाँच; हायन:--वर्ष का।
जब मैं केवल पाँच वर्ष का बालक था, तो एक ब्राह्मण की पाठशाला में रहता था।
मैं अपनी माता के स्नेह पर आश्नित था और मुझे विभिन्न क्षेत्रों का कोई अनुभव न था।
"
एकदा निर्गतां गेहाहुहन्तीं निशि गां पथि ।
सर्पोदशत्पदा स्पृष्ट: कृपणां कालचोदित: ॥
९॥
एकदा--एक बार; निर्गतामू--चले जाने पर; गेहात्--घर से; दुहन्तीम्-दुहने के लिए; निशि--रात्रि में; गामू--गायको; पथि--रास्ते में; सर्प: --सर्प ने; अदशत्--डस लिया; पदा--पाँव में; स्पृष्ट:--इस प्रकार काटी गईं; कृपणाम्--बेचारी स्त्री; काल-चोदित:--परम काल के वशीभूत हो कर।
एक बार जब मेरी माँ बेचारी रात्रि के समय गाय दुहने जा रही थी, तो परम काल सेप्रेरित एक सर्प ने मेरी माता के पाँव में डस लिया।
"
तदा तदहमीशस्य भक्तानां शमभीष्सत: ।
अनुग्रह॑ मन्यमान: प्रातिष्ठं दिशमुत्तराम् ॥
१०॥
तदा--उस समय; तत्--उस; अहम्--मैंने; ईशस्य--ई श्रर के; भक्तानामू--भक्तों की; शम्--दया; अभीप्सत:--चाहतेहुए; अनुग्रहमू--विशेष आशीष; मन्यमान:--इस प्रकार सोचता हुआ; प्रातिष्ठम्-प्रस्थान किया; दिशम् उत्तराम्--उत्तरदिशा में
मैंने इसे भगवान् की विशेष कृपा माना, क्योंकि वे अपने भक्तों का भला चाहने वालेहैं और इस प्रकार सोचता हुआ मैं उत्तर की ओर चल पड़ा।
"
स्फीताझनपदांस्तत्र पुरग्रामत्रजाकरान् ।
खेटखर्वटवार्टीश्व वनान्युपवनानि च ॥
११॥
स्फीतान्--अत्यन्त समृद्ध; जन-पदान्--जनपद; तत्र--वहाँ; पुर--नगर; ग्राम--गाँव; ब्रज--बड़े-बड़े खेत;आकरानू-खानें; खेट--कृषि योग्य खेत; खर्बट--घाटियाँ; वाटी:--पुष्प वाटिकाएँ; च--तथा; वनानि--जंगल;उपवनानि--पौधघर; च--तथा |
प्रस्थान करने के बाद मैं अनेक समृद्ध जनपदों, नगरों, गाँवों, पशु-क्षेत्रों, खानों, खेतों,घाटियों, पुष्पवाटिकाओं, पौधशालाओं तथा प्राकृतिक जंगलों से होकर गुजरा।
"
चित्रधातुविचित्राद्रीनिभभग्नभुजद्रुमान् ।
जलाशयाज्छिवजलान्नलिनी: सुरसेविता: ।
चित्रस्वनै: पत्ररथैर्विभ्रमद्भ्रमरश्रिय: ॥
१२॥
चित्र-धातु--मूल्यवान खनिज यथा सोना चाँदी तथा ताँबा; विचित्र--विविधतापूर्ण; अद्रीन्--पहाड़ियाँ; इभ-भग्न--विशालकाय हाथियों द्वारा तोड़ी गई; भुज--शाखाएँ; द्रमान्--वृक्ष; जलाशयान् शिव--स्वास्थ्यवर्धक ; जलानू--जलाशय; नलिनी:--कमल के फूल; सुर-सेविता:--स्वर्ग के निवासियों द्वारा जिसकी कामना की जाय; चित्र-स्वनै:--हृदयग्राही; पत्र-रथै:--पक्षियों द्वारा; विभ्रमत्--मदान्ध; भ्रमर-अरियः--भौंरों से अलंकृत |
मैं सोने, चाँदी तथा ताँबे जैसे विविध खनिजों के आगारों से परिपूर्ण पर्वतों तथा सुन्दरकमलों से पूर्ण जलाशयों से युक्त भूभागों को पार करता रहा जो स्वर्ग के वासियों केउपयुक्त थे और मदान्ध भौरों तथा चहचहाते पक्षियों से सुशोभित थे।
"
नलवेणुशरस्तन्बकुशकीचकगहरम् ।
एक एवातियातोहमद्राक्षं विपिन॑ महत् ।
घोर प्रतिभयाकारं व्यालोलूकशिवाजिरम् ॥
१३॥
नल--नरकट; वेणु--बाँस; शर:--सरपत; तन्ब--से परिपूर्ण; कुश--नुकीली घास, कुश; कीचक--अपतृण;गहरम्-गुफाएँ; एक:--अकेले; एबव--केवल; अतियात:--दुर्गम; अहम्--मैंने; अद्राक्षम्--देखा; विपिनम्--गहनजंगल; महत्--विशाल; घोरम्-- भयावना; प्रतिभय-आकारम्-- भयानक; व्याल--सर्प; उलूक -- उल्लू; शिव--सियार;अजिरम्-मैदान
तब मैं अनेक जंगलों में से होकर अकेला गया जो नरकटों, बाँसों, सरपतों, कुशों,अपतृणों तथा गहरों से परिपूर्ण थे और जिनसे अकेले निकल पाना कठिन था।
मैंने अत्यन्तसघन, अंधकारपूर्ण तथा अत्यधिक भयावने जंगल देखे जो सर्पों, उललुओं तथा सियारों कीक्रीड़ास्थली बने हुए थे।
"
परिश्रान्तेन्द्रियात्माहं तृट्परीतो बुभुक्षित: ।
स्नात्वा पीत्वा हृदे नद्या उपस्पृष्टो गतश्रम: ॥
१४॥
परिश्रान्त-- थका हुआ; इन्द्रिय--शरीर से; आत्मा--मन से; अहम्--मैं; तृटू-परीत:--प्यासा होकर; बुभुक्षित:--तथाभूखा; स्नात्वा--नहा कर; पीत्वा--तथा जल पीकर; हृदे--सरोवर में; नद्या:--नदी के; उपस्पृष्ट:--सम्पर्क में रह कर;गत--छुटकारा प्राप्त किया; श्रम:--थकान से
इस प्रकार विचरण करते हुए, मैं तन तथा मन से थक गया और प्यासा तथा भूखा भी था।
अतएव मैंने एक सरोवर में स्नान किया और जल भी पिया।
जल-स्पर्श से मेरी थकानजाती रही।
"
तस्मिन्निर्मनुजेरण्ये पिप्पलोपस्थ आश्रित: ।
आत्मनात्मानमात्मस्थ॑ यथाश्रुतमचिन्तयम् ॥
१५॥
तस्मिनू--उस; निर्मनुजे--वीरान; अरण्ये--वन में; पिप्पल--पीपल के वृक्ष के; उपस्थे--नीचे बैठ कर; आश्रित:--सहारा लेकर; आत्मना--बुद्धि से; आत्मानम्--परमात्मा को; आत्म-स्थम्--अपने में ही लीन; यथा-श्रुतम्--जैसा मैंनेमुक्त पुरुषों से सुन रखा था; अचिन्तयम्--विचार करने लगा
उसके पश्चात् उस वीरान जंगल में एक पीपल वृक्ष की छाया में बैठकर मैं अपनी बुद्धिसे अपने अन्तःकरण में स्थित परमात्मा का वैसे ही ध्यान करने लगा, जिस प्रकार कि मैंनेमुक्तात्माओं से सीखा था।
"
ध्यायतश्चरणाम्भोजं भावनिर्जितचेतसा ।
औत्कण्ट्याश्रुकलाक्षस्य हद्यासीन्मे शनैरहरि: ॥
१६॥
ध्यायतः--इस तरह ध्यान करते हुए; चरण-अम्भोजम्--अन्तर्यामी भगवान् के चरणकमलों का; भाव-निर्जित-- भगवान्के दिव्य प्रेम में परिणत मन; चेतसा--सारी मानसिक गतिविधियाँ ( सोचना, अनुभव करना तथा इच्छा करना );औत्कण्ठ्य--उत्सुकता; अश्रु-कल-- आँसू निकल आये; अक्षस्य--आँखो के; हृदि--हृदय में; आसीत्--प्रकट हुए;मे--मेरे; शनैः--तुरन्त; हरिः-- भगवान्
ज्योंही मैं अपने मन को दिव्य प्रेम में लगाकर भगवान् के चरणकमलों का ध्यान करनेलगा कि मेरे नेत्रों से आँसू बहने लगे और भगवान् श्रीकृष्ण बिना विलम्ब किए मेरे हृदय-कमल में प्रकट हो गये।
"
प्रेमातिभरनिर्भिन्नपुलकाज्ली तिनिर्वृत: ।
आनन्दसम्प्लवे लीनो नापश्यमुभयं मुने ॥
१७॥
प्रेमा--प्रेम; अतिभर--अत्यधिक; निर्भिन्न--विशेष रूप से विभेदित; पुलक--प्रसन्नता की अनुभूति; अड्भः:--शरीर केविभिन्न अंग; अति-निर्वृतः--पूर्ण रूप से अभिभूत होकर; आनन्द--आह्वाद के; सम्प्लवे--समुद्र में; लीन: --मग्न; न--नहीं; अपश्यम्--देख सका; उभयम्--दोनों को; मुने--हे व्यासदेव
हे व्यासदेव, उस समय प्रसन्नता की अनुभूति होने के कारण, मेरे शरीर का अंग-प्रत्यंगपुलकित हो उठा।
आनन्द के सागर में निमग्न होने के कारण मैं अपने आपको और भगवान्को भी न देख सका।
"
रूपं भगवतो यत्तन्मन:कान्तं शुचापहम् ।
अपश्यन् सहसोत्तस्थे वैक्लव्याहुर्मना इब ॥
१८॥
रूपम्--रूप; भगवतः-- भगवान् का; यत्-- जैसा है; तत्--वह; मन:--मन की; कान्तम्--इच्छानुसार; शुच्-अपहम्--समस्त विषमता को दूर करते हुए; अपश्यन्--बिना देखे; सहसा--अचानक; उत्तस्थे--खड़ा हो गया;वैक्लव्यात्--विकल होकर; दुर्मना:--इष्ट को खोकर; इब--मानो ।
भगवान् का दिव्य रूप, जैसा कि वह है, मन की इच्छा को पूरा करता है और समस्तमानसिक सन्तापों को तुरन्त दूर करने वाला है।
अत: उस रूप के खो जाने पर मैं व्याकुलहोकर उठ खड़ा हुआ, जैसा कि प्रायः अपने अभीष्ठ के खो जाने पर होता है।
"
दिदृक्षुस्तदहं भूय: प्रणिधाय मनो हृदि ।
वीक्षमाणोपि नापश्यमवितृप्त इवातुर: ॥
१९॥
दिदक्षु:--देखने को इच्छुक; तत्--वह; अहम्--मैं; भूय:--फिर; प्रणिधाय--मन को एकाग्र करके; मन:--मन;हृदि--हृदय में; वीक्षमाण: --देखने के लिए प्रतीक्षारत; अपि--होते हुए; न--कभी नहीं; अपश्यम्---उन्हें देखा;अवितृप्त:--बिना संतुष्ट हुए; इब--सहृश; आतुरः--संतप्त ।
मैंने भगवान् के उस दिव्य रूप को पुनः देखना चाहा, लेकिन अपने हृदय में एकाग्रहोकर उस रूप का दर्शन करने के सारे प्रयासों के बावजूद, मैं उन्हें फिर से न देख सका।
इस प्रकार असंतुष्ट होने पर मैं अत्यधिक संतप्त हो उठा।
"
एवं यतन्तं विजने मामाहागोचरो गिराम् ।
गम्भीरश्लक्ष्णया वाचा शुचः प्रशमयज्निव ॥
२०॥
एवम्--इस प्रकार; यतन्तम्--यत्न करते हुए; विजने--वह एकान्त स्थान में; मामू--मुझसे; आह--कहा; अगोचर: --भौतिक शब्द ( ध्वनि ) की सीमा से बाहर; गिराम्--वाणी; गम्भीर--गम्भीर; एलक्ष्णया--सुनने में सुखद; वाचा--शब्द; शुचः--शोक; प्रशमयन्--दूर करते हुए; इब--सहृश ।
वह एकान्त स्थान में मेरे प्रयासों को देखकर समस्त लौकिक वर्णन से परे भगवान् नेमेरे शोक को दूर करने के लिए अत्यन्त गम्भीर तथा सुखद वाणी में मुझसे कहा।
"
हन्तास्मिञ्न्मनि भवान्मा मां द्रष्टमिहाहति ।
अविपक्रकषायाणां दुर्दशोहं कुयोगिनाम् ॥
२१॥
हन्त--हे नारद; अस्मिन्--इस; जन्मनि--जन्म में; भवान्--तुम; मा--नहीं; माम्--मुझको ; द्रष्टभू--देखने के लिए;इह--यहाँ; अर्हति--योग्य हो; अविपक्व--अप्रौढ़; कषायाणाम्-- भौतिक, कल्मष; दुर्दर्श:--देख पाना कठिन;अहमू--ैं; कुयोगिनाम्--सेवा में अपूर्ण ।
( भगवान् ने कहा ) हे नारद, मुझे खेद है कि तुम इस जीवन काल में अब मुझे नहींदेख सकोगे।
जिनकी सेवा अपूर्ण है और जो समस्त भौतिक कल्मष से पूर्ण रूप से मुक्तनहीं हैं, वे मुश्किल से ही मुझे देख पाते हैं।
"
सकूद् यद्द्शितं रूपमेतत्कामाय तेनघ ।
मत्काम: शनकै: साधु सर्वान्मुञ्ञति हच्छयान् ॥
२२॥
सकृत्--केवल एक बार; यत्--जो; दर्शितम्--दिखाया हुआ; रूपमू--रूप; एतत्--यह है; कामाय--लालसा केलिए; ते--तुम्हारा; अनघ--हे निष्पाप; मत्--मेरी; काम:--इच्छा; शनकै: --बढ़ाने से; साधु;--भक्त; सर्वानू--समस्त;मुझ्नति--त्यागता है; हत्-शयान्-- भौतिक इच्छाओंको ।
हे निष्पाप पुरुष, तुमने मुझे केवल एक बार देखा है और यह मेरे प्रति तुम्हारी इच्छा कोउत्कट बनाने के लिए है, क्योंकि तुम जितना ही अधिक मेंरे लिए लालायित होगे, उतना हीतुम समस्त भौतिक इच्छाओं से मुक्त हो सकोगे।
"
सत्सेवयादीर्घयापि जाता मयि हृढा मतिः ।
हित्वावद्यमिमं लोक॑ गनन््ता मजजनतामसि ॥
२३॥
सतू-सेवया--परम सत्य की सेवा द्वारा; अदीर्घया--कुछ दिनों तक; अपि-- भी; जाता--प्राप्त हुआ; मयि--मुझको;हढा--हढ़; मतिः --बुद्द्धि; हित्वा--त्याग कर; अवद्यमू--शोचनीय; इमम्--इस; लोकम्-- भौतिक जगत को; गन्ता--जाते हुए; मत्-जनताम्--मेरे पार्षद; असि--हो ते हैं।
कुछ काल तक ही सही, परम सत्य की सेवा करने से भक्त मुझमें हृढ़ एवं अटल बुद्धिप्राप्त करता है।
फलस्वरूप, वह इस शोचनीय भौतिक जगत को त्यागने के बाद दिव्यजगत में मेरा पार्षद बनता है।
"
मतिर्मयि निबद्धेयं न विपद्येत कहिचित् ।
प्रजासर्गनिरोधेपि स्मृतिश्व मदनुग्रहात् ॥
२४॥
मतिः--बुद्धि; मयि--मुझमें अनुरक्त; निबद्धा--लगा हुआ; इयम्--यह; न--कभी नहीं; विपद्येत--विलग;कह्िचित्--किसी समय; प्रजा--जीव; सर्ग--सृष्टि के समय; निरोधे--संहार के समय; अपि-- भी; स्मृति: --स्मृति,स्मरण-शक्ति; च--तथा; मत्--मेरी; अनुग्रहात्-कृपा से मेरी भक्ति में लगी हुई बुद्धि कभी भी विच्छिन्न नहीं होती।
यहाँ तक कि सृष्टि काल केसाथ ही साथ संहार के समय भी मेरे अनुग्रह से तुम्हारी स्मृति बनी रहेगी।
"
एतावदुक्त्वोपरराम तन्महद्भूतं नभोलिड्रमलिज्भमी ध्वरम् ।
अहं च तस्मै महतां महीयसेशीर्ष्णवनामं विदधेनुकम्पित: ॥
२५॥
एतावत्--इस प्रकार; उक्त्वा--कह कर; उपरराम--रूक गया; तत्--वह; महत्--महान्; भूतम्-- आश्चर्यजनक; नभः-लिड्रमू-शब्द द्वारा व्यक्त; अलिड्डमू--नेत्रों से न दिखने वाला, अदृश्य; ईश्वरम्--परम पुरुष को; अहम्--मैं; च-- भी;तस्मै--उनको; महताम्--महान्; महीयसे--महिमा मंडित; शीर्ष्णा--शिर से; अवनामम्--नमस्कार; विदधे--किया;अनुकम्पित:--उनके द्वारा कृपा दिखाये जाने पर
तब शब्द से व्यक्त तथा नेत्रों से अहश्य उन नितान्त आश्चर्यमय परम पुरुष ने बोलनाबन्द कर दिया।
मैंने कृतज्ञता का अनुभव करते हुए शीश झुकाकर उन्हें प्रणाम किया।
"
नामान्यनन्तस्य हतत्रप: पठन्गुह्यानि भद्राणि कृतानि च स्मरन् ।
गां पर्यटंस्तुष्टमना गतस्पृह:कालं प्रतीक्षन् विमदो विमत्सर: ॥
२६॥
नामानि--पवित्र नाम, यश आदि; अनन्तस्य--असीम के; हत-त्रप:--भौतिक जगत की सारी औपचारिकताओं से मुक्तहोकर; पठन्--जप से, पाठ से; गुह्मानि--रहस्यमय; भद्राणि--कल्याणकर; कृतानि--कार्य; च--तथा; स्मरन्--निरन्तर स्मरण करते हुए; गाम्--पृथ्वी पर; पर्यटन्--सर्वत्र विचरण करते हुए; तुष्ट-मना: --पूर्ण रूप से सन्तुष्ट; गत-स्पृहः--समस्त भौतिक कामनाओं से पूर्ण रूप से मुक्त; कालम्--काल, समय की; प्रतीक्षन्--प्रती क्षा करते हुए;विमदः--र्व किये बिना; विमत्सर:--ईर्ष्यारहित ।
इस प्रकार भौतिक जगत की समस्त औपचारिकताओं की उपेक्षा करते हुए, मैंबारम्बार भगवान् के पवित्र नाम तथा यश का कीर्तन करने लगा।
भगवान् की दिव्यलीलाओं का ऐसा कीर्तन एवं स्मरण कल्याणकारी होता है।
इस तरह मैं पूर्ण रूप सेसन्तुष्ट, विनम्र तथा ईर्ष्या-द्वेषरहित होकर सारी पृथ्वी पर विचरण करने लगा।
"
एवं कृष्णमतेर्त्रह्मन्नासक्तस्यामलात्मन: ।
काल: प्रादुरभूत्काले तडित्सौदामनी यथा ॥
२७॥
एवम्--इस प्रकार; कृष्ण-मतेः --जो कृष्ण के चिन्तन में लीन हो; ब्रह्मनू--हे व्यासदेव; न--नहीं; आसक्तस्थ--आसक्तहोने वाले का; अमल-आत्मन:--समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त का; काल: --मृत्यु; प्रादुरभूतू--दृष्टिगोचर हुआ;काले--समय आने पर; तडित्--बिजली; सौदामनी -- प्रकाश करती हुई; यथा--जिस प्रकार है।
और हे ब्राह्मण व्यासदेव, इस तरह मैंने कृष्ण के चिन्तन में पूर्णतया निमग्न रहते हुएतथा किसी प्रकार की आसक्ति न रहने से समस्त भौतिक कलुष से पूर्ण रूप से मुक्त होजाने पर यथा समय मृत्यु पाई, जिस प्रकार बिजली गिरना तथा प्रकाश कौंधना एकसाथहोते हैं।
"
प्रयुज्यमाने मयि तां शुद्धां भागवर्ती तनुम् ।
आरब्धकर्मनिर्वाणो न््यपतत् पाञ्चभौतिक: ॥
२८॥
प्रयुज्यमाने--पुरस्कृत होकर; मयि--मुझ पर; तामू--उस; शुद्धाम्--दिव्य; भागवतीम्-- भगवान् की संगति करने योग्य;तनुम्--शरीर; आरब्ध--प्राप्त किया; कर्म--सकाम कर्म; निर्वाण:--समाप्त होना; न््यपतत्--त्याग दिया; पाञ्ञ-भौतिक: --पाँच तत्त्वों से बना शरीर
भगवान् के पार्षद के लिए उपयुक्त दिव्य शरीर पाकर मैंने पाँच भौतिक तत्त्वों से बनेशरीर को त्याग दिया और इस तरह कर्म के सारे अर्जित फल समाप्त हो गये।
"
कल्पान्त इदमादाय शयानेम्भस्युदन्वत: ।
शिशयिषोरनुप्राणं विविशेषन्तरहं विभो: ॥
२९॥
कल्प-अन्ते--ब्रह्म के दिन के अन्त में; इदम्--यह; आदाय--लेकर, समेट कर; शयाने--शयन करते हुए; अम्भसि--'कारण-जल में; उदन्वत:--विनाश, संहार; शिशयिषो:-- भगवान् ( नारायण ) का लेटना; अनुप्राणम्-- श्वास लेना;विविशे-- प्रवेश किया; अन्तः-- भीतर; अहम्--मैंने; विभोः--ब्रह्माजी के ।
कल्प के अन्त में जब भगवान् नारायण प्रलय के जल में लेट गये, तब ब्रह्माजी समस्तसृष्टिकारी तत्त्वों सहित उनके भीतर प्रवेश करने लगे और उनके श्वास से मैं भी भीतर चलागया।
"
सहस्रयुगपर्यन्ते उत्थायेदं सिसृक्षतः ।
मरीचिमिश्रा ऋषय: प्राणेभ्योहं च जज्ञिरि ॥
३०॥
सहस्त्र--एक हजार; युग--४३,००,००० वर्ष; पर्यन्ते--अवधि के अन्त में; उत्थाय--बीतने पर; इृदम्--इस;सिसृक्षतः--पुनः सृजन करने की इच्छा प्रकट की; मरीचि-मिश्रा:--मरीचि जैसे ऋषि; ऋषय:--सारे ऋषिगण;प्राणेभ्य:--उनकी इन्द्रियों से; अहम्--मैं; च-- भी; जज्ञिरि--प्रकट हुआ।
४,३२,००,००,००० सौर वर्षों के बाद, जब भगवान् की इच्छा से ब्रह्मा पुनः सृष्टिकरने के लिए जागे, तो मरीचि, अंगिरा, अत्रि इत्यादि सारे ऋषि भगवान् के दिव्य शरीर सेउत्पन्न हुए और उन्हीं के साथ-साथ मैं भी प्रकट हुआ।
"
अन्तर्बहिश्व लोकांस्त्रीन् पर्येम्यस्कन्दितब्रत: ।
अनुग्रहान्महाविष्णोरविघातगति: क्नचित् ॥
३१॥
अन्त:--दिव्य जगत में; बहि:-- भौतिक जगत में; च--तथा; लोकानू--लोक; त्रीन्--तीन ( विभाग ); पर्येमि--विचरण करता हूँ; अस्कन्दित--अविच्छिन्न; ब्रत:--ब्रत, प्रण; अनुग्रहात्--अहैतुकी कृपा से; महा-विष्णो:--महाविष्णु( कारणोदकशायी विष्णु ) की; अविघात--बिना रोक टोक के; गति:--प्रवेश; क्रचित्--किसी समय ।
तब से सर्वशक्तिमान विष्णु की कृपा से मैं दिव्य जगत में तथा भौतिक जगत के तीनोंप्रखण्डों में बिना रोक-टोक के सर्वत्र विचरण करता हूँ।
ऐसा इसलिए है क्योंकि मैंभगवान् की अविच्छिन्न भक्तिमय सेवा में स्थिर हूँ।
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देवदत्तामिमां वीणां स्वरब्रह्मविभूषिताम् ।
मूर्च्छयित्वा हरिकथां गायमानश्चराम्यहम् ॥
३२॥
देव--पूर्ण पुरूषोत्तम भगवान् ( श्रीकृष्ण ) द्वारा; दत्ताम्-प्रदत्त; इमामू--इस; वीणाम्--वीणा को; स्वर--स्वर, बोल;ब्रह्म-दिव्य; विभूषिताम्--अलंकृत; मूर्चछ्छयित्वा--स्पन्दन करती; हरि-कथाम्--दिव्य सन्देश को; गायमान:--निरन्तरगाते हुए; चरामि--विचरण करता हूँ; अहम्--मैं।
और इस तरह मैं भगवान् की महिमा के दिव्य सन्देश का निरन्तर गायन करते हुए औरइस वीणा को झंकृत करते हुए विचरण करता रहता हूँ, जो दिव्य ध्वनि से पूरित है औरजिसे भगवान् कृष्ण ने मुझे दिया था।
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प्रगायत: स्ववीर्याणि तीर्थपाद: प्रियश्रवा: ।
आहूत इव मे शीघ्र दर्शनं याति चेतसि ॥
३३॥
प्रगायत:--इस प्रकार गाते हुए; स्व-वीर्याणि--अपनी लीलाएँ; तीर्थ-पाद:-- भगवान्, जिनके चरणकमल समस्त पुण्योंया पवित्रता के स्त्रोत हैं; प्रिय-श्रवा:--सुनने में सुखद; आहूत:--बुलाया गया; इब--मानो; मे--मुझको; शीघ्रम्--जल्दी ही; दर्शनम्--दर्शन; याति--प्रकट होता है; चेतसि--हृदय स्थल में ।
ज्योंही मैं भगवान् श्रीकृष्ण की सुमधुर महिमा की पवित्र लीलाओं का कीर्तन करनाप्रारम्भ करता हूँ, त्योंही वे मेरे हदयस्थल में प्रकट हो जाते हैं मानो उनको बुलाया गया हो।
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एतद्धद्यातुरचित्तानां मात्रास्पर्शेच्छया मुहु: ।
भवसिन्धुप्लवो दृष्टो हरिचर्यानुवर्णमम् ॥
३४॥
एतत्--यह; हि--निश्चय ही; आतुर-चित्तानामू--उन लोगों का जिनके चित्त सदैव चिन्ताओं से भरे रहते हैं; मात्रा--विषय व्स्तुएँ; स्पर्श--इन्द्रियाँ; इच्छबया--इच्छाओं के द्वारा; मुहः:--सदैव; भव-सिन्धु--अज्ञान रूपी सागर; प्लव:--नाव; दृष्ट:--अनुभव की गई; हरि-चर्य--भगवान् हरि के कार्यकलापों का; अनुवर्णनम्--निरन्तर गायन ।
यह मेरा निजी अनुभव है कि जो लोग विषय-वस्तुओं से सम्पर्क की इच्छा रखने केकारण सदैव चिन्ताग्रस्त रहते हैं, वे भगवान् की दिव्य लीलाओं के निरन्तर कीर्तन रूपीसर्वाधिक उपयुक्त नौका पर चढ़कर अज्ञान रूपी सागर को पार कर सकते हैं।
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यमादिभियोंगपथै: कामलोभहतो मुहुः ।
मुकुन्दसेवया यद्वत्तथात्माद्धा न शाम्यति ॥
३५॥
यम-आदिभि:--आत्मसंयम का अभ्यास करने की विधि के द्वारा; योग-पथैः --योग ( दैवी अवस्था प्राप्त करने के लिएयौगिक शारीरिक शक्ति ) पद्धति के द्वारा; काम--इन्द्रियतुष्टि की इच्छा; लोभ--इन्द्रियों की तुष्टि के लिए लालच;हतः--समाप्त; मुहुः--सदैव; मुकुन्द-- भगवान्; सेवया--की सेवा द्वारा; यद्वत्--जिस रूप में; तथा--उसी प्रकार;आत्मा--आत्मा; अद्धघा--समस्त व्यावहारिक कार्यों के लिए; न--नहीं; शाम्यति--तुष्ट हो ।
यह सत्य है कि योगपद्धति के द्वारा इन्द्रियों को वश में करने के अभ्यास से मनुष्य कोकाम तथा लोभ की चिन्ताओं से राहत मिल जाएगी, किन्तु इससे आत्मा को सनन््तोष प्राप्तनहीं होगा, क्योंकि यह सनन््तोष भगवान् की भक्तिमय सेवा से ही प्राप्त किया जा सकता है।
हे व्यासदेव, तुम समस्त पापों से मुक्त हो।
इस तरह, जैसा तुमने पूछा, उसी के अनुसारमैंने अपने जन्म तथा आत्म-साक्षात्कार के लिए किये गये कर्मो की व्याख्या की है।
यहतुम्हारे आत्म-संतोष के लिए भी लाभप्रद होगा।
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सर्व तदिदमाख्यातं यत्पृष्टो हं त्वयानघ ।
जन्मकर्मरहस्यं मे भवतश्वात्मतोषणम् ॥
३६॥
सर्वम्--समस्त; तत्--वह; इृदम्--यह; आख्यातम्--वर्णित; यत्--जो भी; पृष्ट:--पूछा गया; अहम्--मैंने; त्वया-- तुम्हारे द्वारा; अनघ--निष्पाप; जन्म--जन्म; कर्म--कार्य; रहस्यम्--रहस्य; मे--मेरे; भवत:--तुम्हारा; च--तथा; आत्म--निजी, स्वयं; तोषणम्--तुष्टि |
शा हे व्यासदेव, तुम समस्त पापों से मुक्त हो।
इस तरह, जैसा तुमने पूछा, उसी के अनुसार मैंने अपने जन्म तथा आत्म-साक्षात्कार के लिए किये गये कर्मों की व्याख्या की है।
यह तुम्हारे आत्म-संतोष के लिए भी लाभप्रद होगा।
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सूत उवाचएवं सम्भाष्य भगवान्नारदो वासवीसुतम् ।
आमन्त्रय वीणां रणयन् ययौ याहच्छिको मुनि: ॥
३७॥
सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस प्रकार; सम्भाष्य--सम्बोधित करके; भगवान्--सर्वशक्तिमान;नारदः--नारद मुनि; वासवी--वासवी ( सत्यवती ) के; सुतम्-पुत्र को; आमन्य--बुलाकर; वीणाम्--वीणा,वाद्ययन्त्र; रणयन्--झंकृत करते हुए; ययौ--चला गया; याहच्छिक:--जहाँ इच्छा हो वहाँ; मुनि:--मुनि |
सूत गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार व्यासदेव को सम्बोधित करके नारद मुनि ने उनसेविदा ली और अपनी वीणा को झंकृत करते हुए वे अपनी उन्मुक्त इच्छा के अनुसारविचरण करने के लिए चले गये।
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अहो देवर्षिर्धन्योयं यत्कीर्ति शार्ड्रधन्वन: ।
गायन्माद्न्निदं तन्त्रया रमयत्यातुरं जगत् ॥
३८॥
अहो--धन्य हो; देवर्षि:--देवताओं के ऋषि; धन्य:--सफल हो; अयम् यत्--जो कोई; कीर्तिमू--यश; शाई-धन्वन:--भगवान् का; गायन्--गान करते हुए; माद्यन्-- आनन्द लूटते हुए; इृदम्--इस; तन्त्रया--वाद्ययंत्र के सहारे;रमयति--जीवन दान देता है; आतुरम्-विपन्न; जगत्--संसार
देवर्षि नारद धन्य हैं, क्योंकि वे भगवान् की लीलाओं का यशोगान करते हैं और ऐसाकरके वे स्वयं तो आनन्द लूटते ही हैं और ब्रह्माण्ड के समस्त संतप्त जीवों को भीअभिप्रेरणा प्रदान करते हैं।
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