← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 1 की सूची

अध्याय उन्नीस: शुकदेव गोस्वामी का प्रादुर्भाव

1.19महीपतिस्त्वथ तत्कर्म गईविचिन्तयन्नात्मकृतं सुदुर्मना: ।

अहो मया नीचमनार्यवत्कृत॑ंनिरागसि ब्रह्मणि गूढतेजसि ॥

१॥

सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; मही-पति:--राजा; तु--लेकिन; अथ--इस प्रकार ( घर वापस आते समय ); तत्‌--उस;कर्म--कार्य ; गर्ा॑म्‌-घृणित; विचिन्तयन्‌--इस प्रकार सोचते हुए; आत्म-कृतम्‌--अपने द्वारा किया हुआ; सु-दुर्मना: --अत्यन्त अनमना, उदास; अहो--अहो; मया--मेरे द्वारा; नीचम्--जघन्य; अनार्य--असंस्कृत, असभ्य; वत्‌--सहृश; कृतम्‌--किया गया; निरागसि--निर्दोष; ब्रह्मणि--ब्राह्मण के प्रति; गूढ--गम्भीर; तेजसि--शक्तिमान |

श्री सूत गोस्वामी ने कहा : घर लौटाते हुए राजा ( महाराज परीक्षित ) ने अनुभव किया किउन्होंने निर्दोष तथा शक्तिमान ब्राह्मण के प्रति अत्यन्त जघन्य तथा अशिष्ट व्यवहार किया है।

फलस्वरूप वे अत्यन्त उद्दिग्न थे।

"

ध्रुव॑ ततो मे कृतदेवहेलनाद्‌दुरत्ययं व्यसन नातिदीर्घात्‌ ।

तदस्तु काम॑ हाघनिष्कृताय मेयथा न कुर्या पुनरेवमद्धा ॥

२॥

ध्रुवम्--निश्चित; ततः--अतएव; मे--मेरा; कृत-देव-हेलनात्-- भगवान्‌ की आज्ञाओं का उल्लंघन करने से; दुरत्ययम्‌--अत्यन्त कठिन; व्यसनम्‌--विपत्ति; न--नहीं; अति--अत्यधिक; दीर्घातू-दूर; तत्--वह; अस्तु--ऐसा हो; कामम्‌--बिनाहिचक की इच्छा; हि--निश्चय ही; अघध--पाप; निष्कृताय--मुक्त होने के लिए; मे--मेरा; यथा--जिससे; न--कभी नहीं;कुर्यामू--करूँगा; पुन:--फिर; एवम्‌--जैसे मैंने किया है; अद्धा--प्रत्यक्ष रीति से ।

[ राजा परीक्षित ने सोचा : भगवान्‌ के आदेशों की अवहेलना करने से मुझे आशंका है किनिश्चित रूप से निकट भविष्य में मेरे ऊपर कोई संकट आनेवाला है।

अब मैं बिना हिचक के कामना करता हूँ कि वह संकट अभी आ जाय, क्योंकि इस तरह मैं पापपूर्ण कर्म से मुक्त होजाऊँगा और फिर ऐसा अपराध नहीं करूँगा।

"

अद्यैव राज्यं बलमृद्धकोशंप्रकोपितब्रह्मकुलानलो मे ।

दहत्वभद्रस्य पुनर्न मेड भूत्‌पापीयसी धीद्विजदेवगोभ्य: ॥

३॥

अद्य--आज; एव-ही; राज्यमू--राज्य; बलम्‌ ऋद्ध--बल तथा धन; कोशम्‌--खजाना; प्रकोपषित--प्रज्चलित; ब्रह्म-कुल--ब्राह्मण कुल द्वारा; अनलः--अग्नि; मे दहतु--मुझे जला दे; अभद्गस्य--अशुभ; पुन: --फिर; न--नहीं; मे--मुझको; अभूत्‌--होए; पापीयसी--पापपूर्ण; धी:--बुद्धि; द्विज--ब्राह्मण; देव-- भगवान्‌; गोभ्य:--तथा गायों के प्रति।

मैं ब्राह्मण सभ्यता, ईश्वर चेतना तथा गोरक्षा के प्रति उपेक्षा करने के फलस्वरूप अशिष्टतथा पापी हूँ।

अतएव मैं चाहता हूँ कि मेरा राज्य, मेरा पराक्रम तथा मेरा धन ब्राह्मण की क्रोधाग्नि से तुरन्त भस्म हो जाय, जिससे भविष्य में ऐसे अशुभ विचारों से मेरा मार्गदर्शन न होनेपाए।

"

स चिन्तयत्रित्थमथाश्रुणोद्‌ यथामुने: सुतोक्तो निर्क्रतिस्तक्षकाख्य: ।

स साधु मेने न चिरेण तक्षका-नल॑ प्रसक्तस्य विरक्तिकारणम्‌ ॥

४॥

सः--उन्‍्होंने ( राजा ने ); चिन्तयन्‌--सोचते हुए; इत्थम्‌--इस प्रकार; अथ--अब; अश्रुणोत्‌--सुना; यथा--जिस तरह;मुनेः--मुनि के; सुत-उक्त: --पुत्र द्वारा कहा गया; निर्क्रतिः--मृत्यु; तक्षक-आख्य:--सर्प-पक्षी के विषय में; सः --उन्‍्होंने( राजा ने ); साधु--अच्छा तथा शुभ; मेने--स्वीकार किया; न--नहीं; चिरेण--दीर्घकाल तक; तक्षक--तक्षक सर्प;अनलमू--अग्नि; प्रसक्तस्य--लिप्त रहनेवालों के; विरक्ति--उदासी का; कारणम्‌--कारण ।

जब राजा इस तरह पश्चात्ताप कर रहे थं, तो उन्हें अपनी आसतन्न मृत्यु का समाचार प्राप्तहुआ, जो मुनि पुत्र द्वारा दिये गये शाप के अनुसार सर्प-पक्षी के काटने से होनी थी।

राजा ने इसेशुभ समाचार के रूप में ग्रहण किया, क्योंकि इससे उन्हें सांसारिकता के प्रति विराग उत्पन्नहोगा।

"

अथो विहायेमममुं च लोक॑विमशितौ हेयतया पुरस्तातू ।

कृष्णाड्प्रिसेवामधिमन्यमानउपाविशतू प्रायममर्त्यनद्याम् ॥

५॥

अथो--इस तरह; विहाय--छोड़कर; इमम्‌--यह; अमुमू--तथा अगला; च--भी; लोकम्‌--लोक; विमर्शितौ--निर्णय होनेपर भी वे सब; हेयतया--निम्नता के कारण; पुरस्तात्--इसके पूर्व; कृष्ण-अद्धघ्रि-- भगवान्‌ कृष्ण के चरणकमल की;सेवाम्‌--दिव्य प्रेमाभक्ति; अधिमन्यमान:--सर्व श्रेष्ठ उपलब्धि के विषय में सोचनेवाला; उपाविशत्‌--हढ़ता से बैठ गया;प्रायमू--उपवास के लिए; अमर्त्य-नद्यामू--दिव्य नदी ( गंगा या यमुना ) के तट पर।

महाराज परीक्षित आत्म-साक्षात्कार की अन्य समस्त विधियों को छोड़कर अपने मन कोकृष्णभावनामृत में एकाग्र करने के लिए गंगा नदी के तट पर हृढ़तापूर्वक बैठ गये, क्योंकिकृष्ण की दिव्य प्रेममणयी सेवा सर्वोच्च उपलब्धि है और अन्य समस्त विधियों को मात करनेवालीहै।

"

या वै लसच्छीतुलसीविमिश्र-कृष्णाड्प्रिरेण्वभ्यधिकाम्बुनेत्री ।

पुनाति लोकानुभयत्र सेशान्‌कस्तां न सेवेत मरिष्यमाण: ॥

६॥

या--जो नदी; बै--सदा; लसत्‌--प्रवाहित; श्री-तुलसी--तुलसी-दलों से; विमिश्र--मिश्रित; कृष्ण-अड्धघ्रि-- भगवान्‌श्रीकृष्ण के चरणकमल की; रेणु-- धूल; अभ्यधिक--शुभ; अम्बु--जल; नेत्री--ले जानेवाली; पुनाति--पवित्र करता है;लोकान्‌--लोकों को; उभयत्र--ऊपर-नीचे अथवा भीतर-बाहर दोनों; स-ईशान्‌--शिवजी समेत; कः--अन्य कौन; तामू--उस नदी को; न--नहीं; सेवेत--पूजा करते हैं; मरिष्यमाण:--आसत्न मृत्युवाला

यह नदी ( गंगा, जिसके किनारे राजा उपवास करने बैठे थे ) अत्यन्त शुभ जल धारण करतीहै, जिसमें भगवान्‌ के चरण-कमलों की धूल तथा तुलसीदल मिश्रित रहते हैं।

अतएव यह जलतीनों लोकों को भीतर-बाहर से पवित्र बनाता है और शिवजी तथा अन्य देवताओं को भी पवित्रकरता है।

अतएव जिसकी मृत्यु निश्चित हो, उसे इस नदी की शरण ग्रहण करनी चाहिए।

"

इति व्यवच्छिद्य स पाण्डवेय:प्रायोपवेशं प्रति विष्णुपद्याम्‌ ।

दधौ मुकुन्दाड्ध्रिमनन्‍्यभावोमुनित्रतो मुक्तसमस्तसद्भ: ॥

७॥

इति--इस प्रकार; व्यवच्छिद्य--निश्चय करके; सः--राजा; पाण्डवेय:--पाण्डवों की योग्य सन्तान; प्राय-उपवेशम्‌--आमरणउपवास के लिए; प्रति--की ओर; विष्णु-पद्याम्‌--गंगा नदी के तट पर ( भगवान्‌ विष्णु के चरणों से निकल कर ); दधौ--त्याग दिया; मुकुन्द-अद्धप्रिमू--भगवान्‌ कृष्ण के चरणकमलों पर; अनन्य--अविचलित; भाव:--आत्मा, भाव; मुनि-ब्रत:--मुनि का ब्रत लेकर; मुक्त--मुक्त; समस्त--सभी प्रकार की; सड्भ:--संगति से ।

इस प्रकार, पाण्डवों की सुयोग्य सन्‍्तान, राजा ने हढ़ संकल्प किया और आमरण उपवासकरने तथा भगवान्‌ कृष्ण के चरणकमलों में अपने आप को समर्पित करने के लिए, वे गंगानदी के तट पर बैठ गये, क्योंकि एकमात्र कृष्ण ही मुक्ति दिलाने में समर्थ हैं।

इस प्रकार उन्होंनेअपने आपको समस्त संगतियों तथा आसक्तियों से मुक्त करके मुनि का ब्रत स्वीकार किया।

"

तत्रोपजम्मुर्भुवनं पुनानामहानुभावा मुनयः सशिष्या: ।

प्रायेण तीर्थाभिगमापदेशै:स्वयं हि तीर्थानि पुनन्ति सन्त: ॥

८॥

तत्र--वहाँ; उपजग्मु:--पहुँचा; भुवनम्‌--ब्रह्माण्ड को; पुनाना:--पवित्र करनेवाले; महा-अनुभावा: --बड़े -बड़े मेधावी;मुनयः--विचारक ; स-शिष्या: -- अपने शिष्यों समेत; प्रायेण--प्राय: ; तीर्थ--तीर्थस्थान; अभिगम--यात्रा; अपदेशै:--केबहाने से; स्वयम्--स्वयं; हि--निश्चय ही; तीर्थानि--तीर्थयात्रा से सारे स्थान; पुनन्ति--पवित्र बनाते हैं; सन्‍्त:--मुनिगण

उस अवसर पर बड़े-बड़े मेधावी विचारक, अपने शिष्यों के संग एवं अपनी उपस्थिति केद्वारा तीर्थ-स्थानों को निश्चय ही पवित्र करनेवाले मुनिगण तीर्थयात्रा के बहाने वहाँ आ पहुँचे।

"

अत्रिर्वसिष्ठश्च्यवन: शरद्वा-नरिष्टनेमिर्भगुरड़िराश्व ।

पराशरो गाधिसुतोथ रामउतथ्य इन्द्रप्रमदेध्मवाहौ ॥

९॥

मेधातिथिर्देवल आर्द्रिषेणोभारद्वाजो गौतम: पिप्पलाद: ।

मैत्रेय और्व: कवष: कुम्भयोनि-ट्वैपायनों भगवान्नारदश्च ॥

१०॥

अत्रि से नारद--ये सभी विभिन्न साधु पुरुषों के नाम हैं, जो ब्रह्माण्ड के विभिन्न भागों से यहाँ आये थे।

ब्रह्माण्ड के विभिन्न भागों से बड़े-बड़े मुनि वहाँ आये--यथा अत्रि, च्यवन, शरद्वानू,अरिष्टनेमि, भूगु, वसिष्ठ, पराशर, विश्वामित्र, अड्भिरा, परशुराम, उतथ्य, इन्द्रप्रमद, इध्मवाहु,मेधातिथि, देवल, आर््रषिण, भारद्वाज, गौतम, पिप्पलाद, मैत्रेय, और्व, कवष, कुम्भयोनि,द्वैपायन तथा महापुरुष नारद।

"

अन्ये च देवर्षिब्रह्मर्षिवर्याराजर्षिवर्या अरुणादयश्व ।

नानार्षेयप्रवरान्‌ समेता-नभ्यर्च्य राजा शिरसा ववन्दे ॥

११॥

अन्ये--अन्य अनेक; च--भी; देवर्षि--देवताओं में ऋषि; ब्रह्मर्षि--ऋषितुल्य ब्राह्मण; वर्या:--सर्व श्रेष्ठ; राजर्षि-वर्या: --राजर्षियों में श्रेष्ठ अरूण-आदय:--राजर्षियों में विशिष्ट पद; च--तथा; नाना--अन्य अनेक; आर्षेय-प्रवरान्--ऋषिवंशों मेंश्रेष्ठ; समेतान्--एकसाथ, समूहित; अभ्यर्च्य--पूजा करके; राजा--सप्राट ने; शिरसा-- भूमि पर सिर झुकाकर; वबन्दे--प्रणाम किया |

इनके अतिरिक्त वहाँ अन्य अनेक देवर्षि, राजा तथा विभिन्न मुनियों के वंशज विशिष्ट राजाआये थे, जिन्हें अरूुणादय कहा जाता है।

जब वे सब सम्राट ( परीक्षित ) से मिलने के लिएएकत्र हुए, तो राजा ने सबको शीश नमाकर प्रणाम करते हुए समुचित ढंग से उनका स्वागतकिया।

"

सुखोपविष्टेष्वथ तेषु भूय:कृतप्रणाम: स्वचिकीर्पितं यत्‌ ।

विज्ञापयामास विविक्तचेताउपस्थितोग्रेडभिगृहीतपाणि: ॥

१२॥

सुख--सुखपूर्वक; उपविष्टेषु--सभी बैठे हुए; अथ--तत्पश्चात्‌; तेषु--उनको ( आगन्तुकों को ); भूयः--फिर; कृत-प्रणाम:--प्रणाम करके; स्व--अपना; चिकीर्पितम्‌--उपवास का निर्णय; यत्‌--जो; विज्ञापयाम्‌ आस-- प्रस्तुत किया; विविक्त-चेता:--सांसारिक मामलों से जिसका मन विरक्त है; उपस्थित:--उपस्थित होकर; अग्रे--उनके सामने; अभिगृहीत-पाणि:--विनीतभावसे हाथ जोड़े।

जब सारे ऋषियों तथा अन्य लोगों ने सुखपूर्वक आसन ग्रहण कर लिया, तो उनके समक्षहाथ जोड़कर खड़े हुए राजा ने आमरण ब्रत करने का अपना संकल्प बतलाया।

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राजोवाचअहो वयं धन्यतमा नृपाणांमहत्तमानुग्रहणीयशीला: ।

राज्ञां कुलं ब्राह्मणपादशौचाद्‌दूराद्‌ विसृष्टं बत गर्ई॑कर्म ॥

१३॥

राजा उवाच--सौभाग्यशाली राजा ने कहा; अहो--ओह; वयम्‌--हम सब; धन्य-तमा:--अत्यन्त धन्य या कृतज्ञ; नृपाणामू--समस्त राजाओं का; महत्‌-तम--महापुरुषों का; अनुग्रहणीय-शीला:--कृपा प्राप्त करने के लिए प्रशिक्षित; राज्ञाम्‌ कुलम्‌--राजाओं के समूह; ब्राह्मण-पाद--ब्राह्मणों के चरण; शौचात्‌--प्रक्षालन से बचा; दूरात्-दूर से; विसृष्टम्‌--सदा बचा हुआ;बत--के कारण; गह्ई--घृणित; कर्म--कार्य ।

भाग्यशाली राजा ने कहा : निस्संदेह, मैं समस्त राजाओं में अत्यन्त धन्य हूँ, जो आप जैसेमहापुरुषों का अनुग्रह प्राप्त करने के अभ्यस्त हैं।

सामान्यतया, आप ( ऋषि ) लोग राजाओं कोकिसी हर स्थान में फेंका जाने योग्य कड़ा समयझते हें ।

"

तस्यैव मेघस्य परावरेशोव्यासक्तचित्तस्य गृहेष्वभीक्ष्णम्‌ ।

निर्वेदमूलो द्विजशापरूपोयत्र प्रसक्तो भयमाशु धत्ते ॥

१४॥

तस्य--उसका; एव--निश्चय ही; मे--मेरा; अघस्थ--पापी का; परा--दिव्य; अवर--संसारी; ईशः--नियन्ता, भगवान्‌;व्यासक्त--अत्यधिक आसक्त; चित्तस्य--मन का; गृहेषु--घेरलू मामलों में; अभीक्षणम्‌--सदैव; निर्वेद-मूल:--वैराग्य काकारण; द्विज-शाप--ब्राह्मण द्वारा दिया गया शाप; रूप:--के रूप में; यत्र--जहाँ; प्रसक्त:--प्रभावित; भयम्‌--भय; आशु--शीघ्र; धत्ते--घटित होते हैं।

आध्यात्मिक तथा प्राकृत जगतों के नियन्ता भगवान्‌ ने ब्राह्मण-शाप के रूप में मुझ परअत्यन्त कृपा की है।

गृहस्थ जीवन में अत्यधिक आसक्त रहने के कारण, मुझे बचाने के लिएभगवान्‌ मेरे समक्ष इस तरह प्रकट हुए हैं कि मैं भयवश अपने आपको संसार से विरक्त कर लूँ।

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त॑ मोपयातं प्रतियन्तु विप्रागड्जा च देवी धृतचित्तमीशे ।

द्विजोपसृष्ट: कुहकस्तक्षको वादशत्वलं गायत विष्णुगाथा: ॥

१५॥

तम्‌--इस कारण; मा--मुझको ; उपयातम्‌--शरणागत को; प्रतियन्तु--स्वीकार करें; विप्रा:--हे ब्राह्मणों; गड्भा--गंगा माता;च--भी; देवी-- भगवान्‌ की प्रत्यक्ष प्रतिनिधि; धृत-- धारण किया; चित्तमू--हृदय; ईशे-- भगवान्‌ में; द्विज-उपसूष्ट:--ब्राह्मणद्वारा उत्पन्न; कुहक:--चमत्कार; तक्षक: --तक्षक नाग; वा--या; दशतु--काटे; अलम्‌--अविलम्ब; गायत--कृपया गाते रहें;विष्णु-गाथा: --विष्णु के कार्यो की कथा।

हे ब्राह्मणों, आप मुझे पूर्ण रूप से शरणागत के रूप में स्वीकार करें और भगवान्‌ कीप्रतिनिधि-स्वरूपा माँ गंगा भी मुझे इसी रूप में स्वीकार करें, क्योंकि मैं पहले से अपने हृदय मेंभगवान्‌ के चरणकमलों को धारण किये हूँ।

अब चाहे तक्षक नाग, या ब्राह्मण द्वारा उत्पन्न कोईभी चमत्कारी वस्तु, मुझे तुरन्त डस ले।

मेरी एकमात्र इच्छा यह है कि आप सब भगवान्‌ विष्णुकी लीलाओं का गायन करते रहें।

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पुनश् भूयाद्धगवत्यनन्तेरति: प्रसड्रश्च तदाश्रयेषु ।

महत्सु यां यामुपयामि सृष्टिमैत्र्यस्तु सर्वत्र नमो द्विजेभ्य: ॥

१६॥

पुनः--फिर; च--तथा; भूयात्‌--ऐसा हो; भगवति-- भगवान्‌ श्रीकृष्ण में; अनन्ते-- अनन्त शक्तिमान; रति:--आकर्षण;प्रसड़:--संगति; च-- भी; तत्‌--उसका; आश्रयेषु-- उनके भक्तों से; महत्सु-- भौतिक सृष्टि में; याम्‌ यामू--जो जो;उपयामि--मैं ले सकता हूँ; सृष्टिम्-- जन्म; मैत्री--मित्रता; अस्तु--हो; सर्वत्र--सभी जगह; नमः--मेरा नमस्कार है;द्विजेभ्य:--ब्राह्मणों को |

मैं आप समस्त ब्राह्मणों को पुनः नमस्कार करके यही प्रार्थना करता हूँ कि यदि मैं इसभौतिक जगत में फिर से जन्म लूँ, तो अनन्त भगवान्‌ कृष्ण के प्रति मेरी पूर्ण आसक्ति हो, उनकेभक्तों की संगति प्राप्त हो और समस्त जीवों के साथ मैत्री-भाव रहे।

"

इति सम राजाध्यवसाययुक्त: प्राचीनमूलेषु कुशेषु धीर: ।

उदड्मुखो दक्षिणकूल आस्तेसमुद्रपत्न्या: स्वसुतन्यस्तभार: ॥

१७॥

इति--इस प्रकार; स्म-- भूतकाल के लिए प्रयुक्त; राजा--राजा; अध्यवसाय-- धीरज; युक्त:--लगे हुए; प्राचीन--पूर्वी;मूलेषु--जड़ के समेत; कुशेषु--कुश घास से बने आसन पर; धीर:--आत्म-संयमी; उदड्-मुख:--उत्तराभिमुख; दक्षिण--दक्षिणी; कूले--किनारे पर; आस्ते--स्थित; समुद्र--समुद्र की; पत्या:--पत्ली ( गंगा ); स्व--अपना; सुत--पुत्र; न्यस्त--त्यागा हुआ; भार: -- प्रशासन का भार।

पूर्ण आत्म-संयम से, महाराज परीक्षित पूर्वाभिमुख जड़ोंवाले कुशों के बने हुए, गंगा केदक्षिणी तट पर रखे, आसन पर बैठ गये और उन्होंने अपना मुख उत्तर की ओर कर लिया।

इसकेपूर्व उन्होंने अपने साम्राज्य का सारा भार अपने पुत्र को सौंप दिया था।

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एवं च तस्मिन्नरदेवदेवेप्रायोपविष्टे दिवि देवसड्जा: ।

प्रशस्य भूमौ व्यकिरन्‌ प्रसूनै-मुदा मुहुर्दुन्दुभयश्व नेदु: ॥

१८॥

एवम्‌--इस प्रकार; च--तथा; तस्मिन्--उसमें; नर-देव-देवे--राजा में; प्राय-उपविष्टे--आमरण उपवास में लगा; दिवि--आकाश में; देव--देवता; सट्भा:--सबके सब; प्रशस्य--कार्य की प्रशंसा करके; भूमौ--पृथ्वी पर; व्यकिरन्‌--बरसाया;प्रसूने:--फूलों से; मुदा--प्रसन्न होकर; मुहुः--निरन्तर; दुन्दुभय:--दैवी ढोल; च-- भी; नेदु:--बजाये गये।

इस प्रकार महाराज परीक्षित आमरण उपवास करने के लिए बैठ गये।

स्वर्गलोक के सारेदेवता राजा के इस कार्य की प्रशंसा करने लगे और हर्ष-विभोर होकर पृथ्वी पर निरन्तर पुष्प-वर्षा करने लगे तथा देवी नगाड़े बजाने लगे।

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महर्षयो वै समुपागता येप्रशस्य साध्वित्यनुमोदमाना: ।

ऊचुः प्रजानुग्रहशीलसारायदुत्तमश्लोकगुणाभिरूपम्‌ ॥

१९॥

महर्षय:--महर्षिगण; बै--सचमुच; समुपागता:--वहाँ एकत्रित; ये--जो; प्रशस्य--प्रशंसा करके; साधु--बहुत अच्छा;इति--इस प्रकार; अनुमोदमाना: -- अनुमोदित करते हुए; ऊचु:--कहा; प्रजा-अनुग्रह-- जीवों का कल्याण करने; शील-सारा:--गुणात्मक रूप से शक्तिमान; यत्‌--क्योंकि; उत्तम-शलोक--चुने हुए श्लोकों से प्रशंसित; गुण-अभिरूपम्‌--दैवीगुणों के समान सुन्दर |

वहाँ पर एकत्र हुए सारे ऋषियों ने भी महाराज परीक्षित के निर्णय को सराहा और 'बहुतअच्छा ( साधु-साधु )' कहकर उन्होंने अपना अनुमोदन व्यक्त किया।

स्वभावत: मुनिगणसामान्य लोगों का कल्याण करने के लिए उन्मुख रहते हैं, क्योंकि उनमें परमेश्वर के सारे गुणपाये जाते हैं।

अतएवं वे भगवान्‌ के भक्त महाराज परीक्षित को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए औरइस प्रकार बोले।

"

न वा इदं राजर्षिवर्य चित्रभवत्सु कृष्णं समनुव्रतेषु ।

ये ध्यासनं राजकिरीटजुष्टंसद्यो जहुर्भगवत्पार्थकामा: ॥

२०॥

न--न तो; वा--इस प्रकार; इदम्‌--यह; राजर्षि--राजाओं के ऋषि; वर्य--प्रधान; चित्रमू--आश्चर्यजनक; भवत्सु--आप सबोंको; कृष्णम्‌-- भगवान्‌ कृष्ण; समनुब्रतेषु--उस पथ पर हढ़ रहनेवालों को; ये--जो; अध्यासनम्‌--सिंहासनारूढ़; राज-किरीट--राजमुकुट; जुष्टम्‌--अलंकृत; सद्यः--शीघ्र; जहु: --त्याग दिया; भगवत्‌-- भगवान्‌; पार्श्च-कामा: --संगति प्राप्तकरने का इच्छुक।

( मुनियों ने कहा :) हे भगवान्‌ श्रीकृष्ण की परम्परा का पालन करनेवाले पाण्डुवंशीराजर्षियों के प्रमुख! यह तनिक भी आश्चर्यप्रद नहीं कि आप अपना वह सिंहासन, जो अनेकराजाओं के म॒क्‌टों से स्सज्जित है, भगवान्‌ का नित्य सात्निध्य प्राप्त करने के लिए त्याग रहे हैं।

"

सर्वे बयं तावदिहास्महे थकलेवरं यावदसौ विहाय ।

लोकं परं विरजस्क॑ विशोक॑यास्यत्ययं भागवतप्रधान: ॥

२१॥

" सर्वे--सभी; वयम्‌--हमारा; तावत्--तब तक; इह--इस स्थान पर; आस्महे--रुकेंगे; अथ--तत्पश्चात्‌; कलेवरम्--शरीर;यावत्‌--जब तक; असौ--राजा; विहाय--त्यागकर; लोकम्‌--लोक को; परम्‌--परम; विरजस्कम्‌--संसारी कल्मष से सर्वथामुक्त; विशोकम्‌--सभी प्रकार के शोक से पूर्ण रूप से मुक्त; यास्यति--लौटता है; अयम्‌--यह; भागवत--भक्त; प्रधान: --प्रमुख |

हम सभी यहाँ पर तब तक प्रतीक्षा करेंगे, जब तक भगवान्‌ के प्रमुख भक्त महाराजपरीक्षित परम लोक को लौट नहीं जाते, जो समस्त संसारी कल्मष तथा समस्त प्रकार के शोकसे पूर्ण रूप से मुक्त है।

"

आश्रुत्य तदहषिगणवच: परीक्षित्‌सम॑ मधुच्युद्‌ गुरु चाव्यलीकम्‌ ।

आभाषतैनानभिनन्द्य युक्तान्‌शुश्रूषमाणश्ररितानि विष्णो: ॥

२२॥

आश्रुत्य--सुनकर; तत्‌--वह; ऋषि-गण--एकत्रित मुनि; वच:--बोलते हुए; परीक्षित्‌--महाराज परीक्षित; समम्‌--निष्पक्ष;मधु-च्युत्--सुनने में मधुर; गुरु--गम्भीर; च-- भी; अव्यलीकम्‌--सर्वथा सत्य; आभाषत--कहा; एनान्‌--वे सब;अभिनन्द्य--स्वागत किया; युक्तान्-ढंग से प्रस्तुत; शुश्रूषमाण: --सुनने के लिए उत्सुक; चरितानि--कार्यकलापों को;विष्णो: -- भगवान्‌ के |

महान्‌ ऋषियों ने जो कुछ कहा, वह सुनने में अति सुमधुर, सार्थक तथा यथार्थ रूप सेप्रस्तुत किया गया पूर्ण सत्य था।

अतएव उन्हें सुनने के बाद महाराज परीक्षित ने भगवान्‌श्रीकृष्ण के कार्यकलापों के विषय में सुनने की इच्छा से महर्षियों को अभिनन्दन दिया।

समागता: सर्वत एव सर्वेवेदा यथा मूर्तिधरास्तरपृष्ठे ।

नेहाथ नामुत्र च कश्चनार्थऋते परानुग्रहमात्मशीलम्‌ ॥

२३॥

समागता:--एकत्रित; सर्वतः--सभी दिशाओं से; एव--निश्चय ही; सर्वे-- आप सब; वेदा:--परम ज्ञान; यथा-- जैसे; मूर्ति-धरा:--मूर्तिमंत; त्रि-पृष्ठे--त्रह्मा के लोक में ( जो उर्ध्व, मध्य तथा अधो तीनों लोकों के ऊपर स्थित है ); न--नहीं; इह--इससंसार में; अथ--तत्पश्चात्‌; न--न तो; अमुत्र-- अन्य जगत में; च--भी; कश्चन--अन्य कोई; अर्थ:--हित, स्वार्थ; ऋते--केअतिरिक्त; पर--अन्य; अनुग्रहम्‌--कृपा; आत्म-शीलम्‌-- अपना स्वभाव।

राजा ने कहा: हे महर्षियों, आप ब्रह्माण्ड के कोने-कोने से आकर यहाँ पर कृपापूर्वकएकत्र हुए हैं।

आप सभी परम ज्ञान के मूर्तिमंत स्वरूप हैं, जो तीनों लोकों के ऊपर के लोक( सत्यलोक ) का वासी है।

फलस्वरूप आपकी स्वाभाविक प्रवृत्ति अन्यों का कल्याण करने कीहै और इसके अतिरिक्त इस जीवन में या अगले जीवन में आपकी अन्य कोई रूचि नहीं है।

"

ततश्व व: पृच्छयमिमं विपृच्छेविश्रभ्य विप्रा इति कृत्यतायाम्‌ ।

सर्वात्मना ग्रियमाणैश्व कृत्यंशुद्ध च तत्रामृशताभियुक्ता: ॥

२४॥

ततः--इस तरह; च--तथा; व: --आपको; पृच्छूयम्‌--पूछा जाने योग्य; इमम्‌--यह; विपृच्छे--पूछता हूँ; विश्रभ्य--विश्वसनीय; विप्रा: --ब्राह्मणों; इति--इस प्रकार; कृत्यतायाम्‌--विभिन्न कर्तव्यों में से; सर्ब-आत्मना- प्रत्येक के द्वारा;प्रियमाणैः--विशेषरूप से मरणासत्रों के द्वारा; च--तथा; कृत्यम्--आज्ञाकारी; शुद्धम्--एकदम सही; च--तथा; तत्र--वहाँपर; आमृशत--पूर्ण विचार-विमर्श से; अभियुक्ता:--सर्वथा उपयुक्त ।

हे विश्वासपात्र ब्राह्मणों, अब मैं अपने वर्तमान कर्तव्य के विषय में पूछ रहा हूँ।

कृपया पूर्णविचार-विमर्श के पश्चात्‌, मुझे सभी परिस्थितियों में हर एक के कर्तव्य के विषय में और विशेषरूप से जो तुरन्त मरनेवाला हो ( मरणासन्न ), उसके कर्तव्य के विषय में बतलाइये।

"

तत्राभवद्धगवान्‌ व्यासपुत्रोयहच्छया गामटमानोअनपेक्ष: ।

अलक्ष्यलिज्ो निजलाभतुष्टोवृतश्च॒ बालैरवधूतवेष: ॥

२५॥

तत्र--वहाँ; अभवत्‌--प्रकट हुए; भगवान्‌--शक्तिशाली; व्यास-पुत्र:--व्यासदेव के पुत्र; यहच्छया--अपनी इच्छानुसार;गाम्‌--पृथ्वी में; अटमान:--निरन्तर विचरण करते; अनपेक्ष:--उदासीन; अलक्ष्य--अव्यक्त; लिड्;--लक्षण; निज-लाभ--स्वरूपसिद्ध; तुष्ट:--संतुष्ट; वृतः--घिरे हुए; च--तथा; बालैः--बालकों से; अवधूत--अन्यों द्वारा उपेक्षित; बेष: --वेशभूषामें।

उसी समय व्यासदेव के शक्तिसम्पन्न पुत्र वहाँ प्रकट हुए, जो सम्पूर्ण पृथ्वी पर उदासीन तथाआत्म-तुष्ट होकर विचरण करते रहते थे।

उनमें किसी सामाजिक व्यवस्था या जीवन-स्तर" (वर्णाश्रम-धर्म ) का कोई लक्षण प्रकट नहीं होता था।

वे स्त्रियों तथा बच्चों से घिरि थे और इसप्रकार का वेश धारण किये थे, मानों सभी लोगों ने उन्हें उपेक्षित ( अवधूत ) समझ रखा हो।

त॑ द्व्यष्टवर्ष सुकुमारपाद-करोरुबाह्ंसकपोलगात्रम्‌ ।

चार्वायताक्षोत्नसतुल्यकर्ण-सुभ्रवाननं कम्बुसुजातकण्ठम्‌ ॥

२६॥

तम्‌--उसको; द्वि-अष्ट--सोलह; वर्षम्‌--वर्ष; सु-कुमार--कोमल; पाद--पाँव; कर--हाथ; ऊरु -- जाँघें; बाहु -- भुजाएँ;अंस--कंधे; कपोल--मस्तक; गात्रमू--शरीर; चारु--सुन्द; आयत--चौड़ा; अक्ष--आँखें; उन्नस--ऊँची नाक; तुल्य--एक-से; कर्ण--कान; सुभ्रु--अच्छी भौंहे; आननम्‌--चेहरा, मुखमंडल; कम्बु--शंख; सुजात-- अच्छी तरह बना; कण्ठम्‌--'कण्ठ गर्दनश्री व्यासदेव के इस पुत्र की आयु केवल सोलह वर्ष थी।

उनके पाँव, हाथ, जाँघें, भुजाएँ,कंधे, ललाट तथा शरीर के अन्य भाग अत्यन्त सुकोमल तथा सुगठित बने थे।

उनकी आँखेंसुन्दर, बड़ी-बड़ी तथा नाक और कान उठे हुए थे।

उनका मुखमण्डल अत्यन्त आकर्षक था औरउनकी गर्दन सुगठित एवं शंख जैसी सुन्दर थी।

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निगूढजत्रुं पृथुतुज्गवक्षस-मावर्तनाभि वलिवल्गूदर च ।

दिगम्बरं वक्त्रविकीर्णकेशंप्रलम्बबाहुं स्वमरोत्तमाभम्‌ ॥

२७॥

निगूढ--आवृत; जत्रुमू--हँसली, कंधे की हड्डी; पृथु--चौड़ी; तुड्ढ---उठी हुई; वक्षसम्‌--छाती, सीना; आवर्त--भँवरदार,लहरदार; नाभिमू--नाभि; वलि-वल्गु-- धारीदार; उदरम्‌--उदर, पेट; च-- भी; दिक्‌-अम्बरम्‌--दिशाएँ ही जिसके वस्त्र हों( नग्न ); वक्‍त--कुंचित, घुँघराले; विकीर्ण--छितरे, बिखरे; केशम्‌--बाल; प्रलम्ब--काफी लम्बे; बाहुमू--हाथ; सु-अमर-उत्तम--देवताओं में सर्वश्रेष्ठ ( कृष्ण )) आभम्‌--कान्ति।

उनकी हँसली मांसल थी, छाती चौड़ी तथा मोटी, नाभि गहरी तथा उदर सुन्दर धारियों सेयुक्त था।

उनकी भुजाएँ लम्बी थीं तथा उनके घुँघराले बाल उनके सुन्दर मुखमंडल पर बिखरे हुएथे।

वे नग्न थे और उनके शरीर की कान्ति भगवान्‌ कृष्ण जैसी प्रतिबिम्बित हो रही थी।

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श्यामं सदापीव्यवयोज्गलक्ष्म्यास्त्रीणां मनोज्ञ रुचिरस्मितेन ।

प्रत्युत्थितास्ते मुनयः स्वासने भ्य-स्तललक्षणज्ञा अपि गूढवर्चसम्‌ ॥

२८ ॥

श्यामम्‌-श्यामल; सदा--सदैव; अपीव्य--अत्यधिक; वयः--आयु; अड्भ--लक्षण; लक्ष्म्या--ऐश्वर्य से; स्रीणाम्‌--स्त्रियोंका; मनः-ज्ञमू-- आकर्षक; रुचिर---सुन्दर; स्मितेन--हँसी से; प्रत्युत्थिता:--खड़े हो गये; ते--वे सब; मुनयः--मुनिगण;स्व--अपने; आसनेभ्य:--आसनों से; तत्--वे; लक्षण-ज्ञा:--शरीरलक्षणों के जानने में पटु; अपि-- भी; गूढ-वर्चसम्‌--छिपीहुई महिमा।

वे श्यामल वर्ण के तथा अपनी युवावस्था के कारण अत्यन्त सुन्दर थे।

अपने शरीर कीकान्ति तथा आकर्षक मुसकान के कारण, वे स्त्रियों के लिए मोहक थे।

यद्यपि वे अपनीप्राकृतिक महिमा को छिपाने का प्रयत्न कर रहे थे, तो भी वहाँ पर उपस्थित सारे महर्षि रूपाकृतिशास्त्र में पटु थे, अतएवं सबों ने अपने-अपने आसन से उठकर उनका सम्मान किया।

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स विष्णुरातोइतिथय आगतायतस्मै सपर्या शिरसाजहार ।

ततो निवृत्ता ह्यव॒ुधा: स्त्रियोरर्भकामहासने सोपविवेश पूजित: ॥

२९॥

सः--वे ; विष्णु-रातः--महाराज परीक्षित ( जिनकी रक्षा सदा भगवान्‌ विष्णु करते हैं )) अतिथये--अतिथि बनने के लिए;आगताय--वहाँ आये हुए; तस्मै--उन्हें; सपर्याम्‌--सम्पूर्ण शरीर से; शिरसा--झुके सिर से; आजहार-- प्रणाम किया; तत:--तत्पश्चात्‌; निवृत्ताः:--रुक गये; हि--निश्चय ही; अबुधा:--अल्पज्ञ; स्त्रियः--स्त्रियाँ; अर्भका:--लड़के; महा-आसने-- श्रेष्ठआसन पर; स--वे ; उपविवेश--बैठ गये; पूजित:--पूजा किये गये

महाराज परीक्षित जिन्हें विष्णुरात ( अर्थात्‌ सदैव विष्णु द्वारा रक्षित ) के नाम से भी जानाजाता है, उन्होंने मुख्य अतिथि शुकदेव गोस्वामी का स्वागत करने के लिए अपना मस्तकझुकाया।

उस समय सारी अल्पज्ञ स्त्रियाँ तथा बालकों ने श्री शुकदेव गोस्वामी का पीछा करनाछोड़ दिया।

सबों से सम्मान प्राप्त करके, शुकदेव गोस्वामी अपने श्रेष्ठ आसन पर विराजमानहुए।

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स संवृतस्तत्र महान्‌ महीयसांब्रह्मर्षिराज्िदेवर्पिसड्डै: ।

व्यरोचतालं भगवान्‌ यथेन्दु-ग्रहर्क्षतरानिकरै: परीत: ॥

३०॥

सः-- श्री शुकदेव गोस्वामी; संवृत:--घिरे हुए; तत्र--वहाँ; महान्--महान्‌; महीयसाम्‌--सबसे महान्‌ से; ब्रह्मर्षि --ब्राह्मणों मेंऋषि; राजर्षि--राजाओं में साधु; देवर्षि--देवताओं में साधु; सद्ढैः--के समूह द्वारा; व्ययोचत-- भली भाँति योग्य; अलम्‌--समर्थ; भगवान्‌--शक्तिमान; यथा--जिस तरह; इन्दु:--चन्द्रमा; ग्रह--लोक; ऋशक्ष--स्वर्ग-लोक; तारा--तारे; निकरैः --समूहद्वारा; परीत:--घिरे हुए

तब शुकदेव गोस्वामी साधु, मुनियों तथा देवताओं से इस तरह घिरे हुए थे जिस तरह चन्द्रमातारों, नक्षत्रों तथा अन्य आकाशीय पिण्डों से घिरा रहता है।

उनकी उपस्थिति अत्यन्त भव्य थीऔर वे सबों द्वारा सम्मानित हुए।

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प्रशान्तमासीनमकुण्ठमे धरमुनि नृपो भागवतोड भ्युपेत्य ।

प्रणम्य मूर्ध्नवहित: कृताञझललि-न॑त्वा गिरा सूनृतयान्वपृच्छत्‌ ॥

३१॥

प्रशान्तम्‌--पूर्ण रूप से शान्त; आसीनम्‌--बैठे हुए; अकुण्ठ--निःसंकोच भाव से; मेधसम्‌--पर्याप्त बुद्धि-सम्पन्न; मुनिम्‌--महर्षि को; नृप:--राजा ( महाराज परीक्षित ) ने; भागवत:--महान्‌ भक्त; अभ्युपेत्य--निकट जाकर; प्रणम्य--प्रणाम करके;मूर्धष्न--शिर से; अवहितः--ठीक से; कृत-अद्जलि:--हाथ जोड़कर; नत्वा--विनप्रतापूर्वक; गिरा--शब्दों से; सून्‌तया--मीठीवाणी से; अन्वपृच्छत्‌--पूछा ।

तब प्रखर मुनि श्री शुकदेव गोस्वामी पूर्ण शान्त भाव से बैठ गये।

वे किसी भी प्रश्न कानिःसंकोच होकर, बुद्धिमत्ता से उत्तर देने के लिए तैयार थे।

तब महान्‌ भक्त महाराज परीक्षितउनके पास पहुँचे और उन्होंने उनके समक्ष सिर झुकाकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर मधुरवाणी से विनीत होकर पूछा।

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परीक्षिदुवाचअहो अद्य वयं ब्रह्मन्‌ सत्सेव्या: क्षत्रबन्धव: ।

कृपयातिथिरूपेण भवद्धिस्तीर्थका: कृता: ॥

३२॥

परीक्षित्‌ उवाच-- भाग्यशाली महाराज परीक्षित ने कहा; अहो--अहो; अद्य--आज; वयम्‌--हम; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; सत्-सेव्या:--भक्तों की सेवा करने योग्य; क्षत्र--शासक-वर्ग; बन्धव:--मित्र; कृपया--आपकी कृपा से; अतिथि-रूपेण --अतिथि के रूप में; भवद्धि: --आपके द्वारा; तीर्थका:--तीर्थ-स्थल होने के योग्य; कृता:--किया गया।

भाग्यशाली राजा परीक्षित ने कहा : हे ब्राह्मण, आपने कृपा करके यहाँ पर मेरे अतिथि केरूप में उपस्थित होकर, हम सबों के लिए तीर्थस्थल बनाकर हमें पवित्र बना दिया है।

आपकीकृपा से हम अयोग्य राजा भक्त की सेवा करने के सुपात्र बनते हैं।

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येषां संस्मरणात्पुंसां सद्चः शुद्धयन्ति वै गृहा: ।

कि पुनर्दर्शनस्पर्शपादशौचासनादिभि: ॥

३३॥

येषाम्‌--जिसके; संस्मरणात्‌--स्मृति से; पुंसामू--पुरुष का; सद्य: --तुरन्त; शुद्धबन्ति--स्वच्छ हो जाते हैं; वै--निश्चय ही;गृहाः--सारे घर; किमू--क्या; पुनः--तब; दर्शन--भेंट; स्पर्श--छूना; पाद--पाँव; शौच--धोना; आसन-आदिभि: -- आसनप्रदान करने आदि

आसनप्रदान करने आदि सेआपके स्मरण मात्र से हमारे घर तुरन्त पवित्र हो जाते हैं।

तो आपको देखने, स्पर्श करने,आपके पवित्र चरणों को धोने तथा अपने घर में आपको आसन प्रदान करने के विषय में तोकहना ही क्‍या ?"

सान्निध्यात्ते महायोगिन्पातकानि महान्त्यपि ।

सद्यो नश्यन्ति वै पुंसां विष्णोरिव सुरेतरा: ॥

३४॥

सान्निध्यात्‌--उपस्थिति के कारण; ते--आपकी; महा-योगिन्‌--हे महान्‌ योगी; पातकानि--सारे पाप; महान्ति--अभेद्य;अपि--के बावजूद; सद्यः--तुरन्त; नश्यन्ति--नष्ट हो जाते हैं; बै--निश्चय ही; पुंसामू--व्यक्ति; विष्णो:-- भगवान्‌ कीउपस्थिति; इब--सहश; सुर-इतरा:--देवताओं के अतिरिक्त।

जिस प्रकार भगवान्‌ की उपस्थिति में नास्तिक नहीं टिक सकता, उसी तरह हे सन्त, हे महान्‌योगी, मनुष्य के अभेद्य पाप भी आपकी उपस्थिति में तुरन्त नष्ट हो जाते हैं।

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अपि मे भगवान्‌ प्रीतः कृष्ण: पाण्डुसुतप्रिय: ।

पैतृष्वसेयप्रीत्यर्थ तद्गोत्रस्यात्तबान्धव: ॥

३५॥

अपि--निश्चित रूप से; मे--मुझको; भगवान्‌--भगवान; प्रीत:--प्रसन्न; कृष्ण:-- भगवान्‌; पाण्डु-सुत--राजा पाण्डु के पुत्र;प्रियः--प्रिय; पैतृ--पिता से सम्बन्धित; स्वसेय--बहन के बेटे; प्रीति--सन्तोष; अर्थम्‌--के सम्बन्ध में; तत्--उनका;गोत्रस्थ--वंशज; आत्त--स्वीकृत; बान्धव: --मित्र के रूप में |

भगवान्‌ कृष्ण जो राजा पाण्डु के पुत्रों को अत्यन्त प्रिय हैं, उन्होंने अपने महान्‌ भाँजों तथाभाइयों को प्रसन्न करने के लिए मुझे भी सम्बन्धी की तरह स्वीकार किया है।

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अन्यथा तेव्यक्तगतेर्दर्शन॑ न: कथ॑ं नृणाम्‌ ।

नितरां प्रियमाणानां संसिद्धस्य वनीयस: ॥

३६॥

अन्यथा--अन्यथा; ते--आपका; अव्यक्त-गते:--अहृश्य गतिविधियों वाले का; दर्शनम्‌--मिलाप, भेंट; न:--हमारे लिए;कथम्‌-कैसे; नृणाम्--लोगों का; नितराम्--विशेष रूप से; प्रियमाणानाम्‌--मरणासन्नों का; संसिद्धस्य--परम पूर्ण का;वनीयस: --स्वेच्छा से प्राकट्य

अन्यथा ( भगवान्‌ कृष्ण की प्रेरणा के बिना ) यह कैसे सम्भव है कि आप स्वेच्छा से यहाँप्रकट हुए, जबकि आप सामान्य लोगों से ओझल रहकर विचरण करते हैं और हम मरणासत्नोंको दृष्टिगोचर नहीं होते।

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अतः पृच्छामि संसिद्धि योगिनां परम गुरुम्‌ ।

पुरुषस्येह यत्कार्य प्रियमाणस्य सर्वथा ॥

३७॥

अतः--अतएव; पृच्छामि--पूछता हूँ; संसिद्द्धिमू--पूर्णता का मार्ग; योगिनामू--सन्‍्तों का; परमम्‌--परम; गुरुम्‌--गुरु;पुरुषस्य--पुरुष का; इह--इस जीवन में; यत्‌--जो भी; कार्यम्‌--कर्तव्य; प्रियमाणस्य--मरणासन्न का; सर्वधा--सब प्रकारसे।

आप महान्‌ सन्‍्तों तथा भक्तों के गुरु हैं।

अतएव मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप सारेव्यक्तियों के लिए और विशेष रूप से जो मरणासतन्न हैं, उनके लिए पूर्णता का मार्ग दिखलाइये।

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यच्छोतव्यमथो जप्य॑ यत्कर्तव्यं नृभि: प्रभो ।

स्मर्तव्यं भजनीयं वा ब्रूहि यद्वा विपर्ययम्‌ ॥

३८॥

यत्‌--जो भी; श्रोतव्यम्--सुनने योग्य; अथो--इससे; जप्यम्‌--उच्चरित; यत्‌--जो भी; कर्तव्यमू--किया गया; नृभि:--सामान्यजनों द्वारा; प्रभो--हे स्वामी; स्मर्तव्यम्--स्मरण करने योग्य; भजनीयम्‌--पूजा के योग्य; वा--अथवा; ब्रूहि--कृपयाबताएँ; यद्‌ वा--जो कुछ भी हो; विपर्ययम्‌--सिद्धान्त के विरुद्ध |

कृपया मुझे बतायें कि मनुष्य को कया सुनना, जपना, स्मरण करना तथा पूजना चाहिए औरयह भी बतायें कि उसे क्या-क्या नहीं करना चाहिए।

कृपा करके मुझे यह सब बतलाइए।

नूनं भगवतो ब्रह्मन्‌ गृहेषु गृहमेधिनाम्‌ ।

न लक्ष्यते ह्मवस्थानमपि गोदोहनं क्नचित्‌ ॥

३९॥

नूनम्‌--क्योंकि; भगवत:-- आपका, जो शक्तिमान हैं; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; गृहेषु--घरों में; गृह-मेधिनाम्‌--गृहस्थों का; न--नहीं; लक्ष्यते--देखे जाते हैं; हि--निश्चित ही; अवस्थानम्‌--ठहराव; अपि-- भी; गो-दोहनम्‌--गाय की दुहाई; क्षचित्‌--विरले ही |

हे शक्तिसम्पन्न ब्राह्मण, कहा जाता है कि आप लोगों के घर में मुश्किल से उतनी देर भीनहीं रुकते हैं, जितनी देर में गाय दुही जाती है।

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नूनं भगवतो ब्रह्मन्‌ गृहेषु गृहमेधिनाम्‌ ।

न लक्ष्यते ह्ववस्थानमपि गोदोहनं क्लचित्‌ ॥

३९॥

नूनम्‌--क्योंकि; भगवतः-- आपका, जो शक्तिमान हैं; ब्रह्मन्‌-हे ब्राह्मण; गृहेषु--घरों में; गृह-मेधिनाम्‌--गृहस्थों का; न-- नहीं; लक्ष्यते-देखे जाते हैं; हि--निश्चित ही; अवस्थानम्‌--ठहराव; अपि-- भी; गो-दोहनम्‌--गाय की दुहाई; क्चचित्‌-- य शक्तिसम्पन्न ब्राह्मण

कहा जाता है कि आप लोगों के घर में मुश्किल से उतनी देर भी नहीं रुकते हैं, जितनी देर में गाय दुही जाती है।

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सूत उवाचएवमाभाषित: पृष्ट: स राज्ञा श्लक्ष्णया गिरा ।

प्रत्यभाषत धर्मज्ञो भगवान्‌ बादरायणि: ॥

४०॥

सूतः उबाच-- श्री सूत गोस्वामी ने कहा; एबम्‌--इस प्रकार; आभाषित:--बोले जाने पर; पृष्ट:--तथा पूछे जाने पर; सः--वे;राज्ञा-राजा द्वारा; एलक्ष्णया--मीठी; गिरा-- भाषा से; प्रत्यभाषत--उत्तर देना प्रारम्भ किया; धर्म-ज्ञ:--धर्म के सिद्धान्तों कोजाननेवाले; भगवान्‌--शक्तिमान पुरुष; बादरायणि:--व्यासदेव के पुत्र ने।

श्री सूत गोस्वामी ने कहा : इस तरह मीठी भाषा का प्रयोग करते हुए राजा ने बातें कीं तथाप्रश्न किये।

तब व्यासदेव के पुत्र जो महान्‌ तथा शक्तिसम्पन्न पुरुष एवं धर्मवेत्ता थे, उन्होंने उत्तरदेना प्रारम्भ किया।

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