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अध्याय अठारह: महाराज परीक्षित को एक ब्राह्मण बालक द्वारा श्राप
1.18सूत उवाचयो वै द्रौण्यख्नरविप्लुष्टो न मातुरुदरे मृत: ।
अनुग्रहाद् भगवतः कृष्णस्याद्धुतकर्मण: ॥
१॥
सूतः उवाच-- श्री सूत गोस्वामी ने कहा; यः--जो; बै--निश्चय ही; द्रौष्ि-अस्त्र--द्रोणपुत्र के अस्त्र द्वारा; विप्लुष्ट:--जलायागया; न--कभी नहीं; मातु:--माता के; उदरे--गर्भ में; मृत:--मरा हुआ; अनुग्रहात्--कृपा से; भगवत:-- भगवान्;कृष्णस्य--कृष्ण की; अद्भुत-कर्मण:--जो अद्भुत कार्य करते हैं |
श्री सूत गोस्वामी ने कहा : भगवान् श्रीकृष्ण अद्भुत कार्य करनेवाले हैं।
उनकी कृपा सेमहाराज परीक्षित द्रोणपुत्र के अस्त्र द्वारा अपनी माता के गर्भ में ही प्रहार किये जाने पर भीजलाये नहीं जा सके।
"
ब्रह्मकोपोत्थिताद् यस्तु तक्षकात्प्राणविप्लवातू ।
न सम्मुमोहोरुभयाद् भगवत्यर्पिताशय: ॥
२॥
ब्रह्य-कोप--ब्राह्मण के क्रोध से; उत्थितात्--उत्पन्न; य:--जो था; तु--लेकिन; तक्षकात्--तक्षक सर्प द्वारा; प्राण-विप्लवात्--जीवन-क्षय से; न--कभी नहीं; सम्मुमोह--अभिभूत थे; उरू-भयात्--घोर भय; भगवति-- भगवान् में; अर्पित--शरणागत; आशय: --चेतना।
इसके अतिरिक्त, महाराज परीक्षित स्वेच्छा से संदेव भगवान् के शरणागत रहते थे, अतएववे उड़ने वाले सर्प के भय से, जो उन्हें ब्राह्मण बालक के कोपभाजन बनने के कारणकाटनेवाला था, न तो भयभीत थे, न अभिभूत थे।
"
उत्सृज्य सर्वत: सड़ विज्ञाताजितसंस्थिति: ।
वैयासकेर्जहौ शिष्यो गड्भायां स््वं कलेवरम् ॥
३॥
उत्सृज्य--छोड़कर; सर्वतः--चारों ओर; सड्रम्--साथ, संग; विज्ञात--समझते हुए; अजित--जो कभी जीते न जा सके( भगवान् ); संस्थिति:--वास्तविक स्थिति; वैयासके: --व्यास के पुत्र को; जहौ--त्याग दिया; शिष्य:--शिष्य के रूप में;गड्ायाम्--गंगा नदी के तट पर; स्वम्--अपने; कलेवरम्-- भौतिक शरीर को |
तत्पश्चात्, अपने समस्त संगियों को छोड़कर, राजा ने शिष्य-रूप में व्यास के पुत्र ( शुकेदवगोस्वामी ) की शरण ग्रहण की और इस प्रकार वे भगवान् की वास्तविक स्थिति को समझसके।
"
नोत्तमश्लोकवार्तानां जुषतां तत्कथामृतम् ।
स्यात्सम्भ्रमोन्तकालेपि स्मरतां तत्पदाम्बुजम् ॥
४॥
न--कभी नहीं; उत्तम-श्लोक-- भगवान्, जिनका गायन वैदिक स्तोत्रों से किया जाता है; वार्तानामू--उन पर जीवित रहनेवालोंका; जुषताम्--लगे रहनेवालों का; तत्--उसकी; कथा-अमृतम्--उनकी दिव्य कथाएँ; स्थात्--ऐसा होगा; सम्भ्रम: -- भ्रान्ति;अन्त--अन्त; काले--समय में; अपि-- भी; स्मरताम्--स्मरण करते हुए; तत्--उसका; पद-अम्बुजमू--चरणकमलों को ।
ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि जिन्होंने वैदिक स्तोत्रों से स्तुति किये जानेवाले भगवान् कीदिव्य कथाओं के लिए ही अपना जीवन अर्पित कर रखा है और जो निरन्तर भगवान् केचरणकमलों का स्मरण करने में लगे हुए हैं, उन्हें अपने जीवन के अन्तिम क्षणों में भी किसीप्रकार की भ्रान्ति होने का डर नहीं रहता।
"
तावत्कलिलनन प्रभवेत् प्रविष्टोउपीह सर्वतः ।
यावदीशो महानुर्व्यामाभिमन्यव एकराट् ॥
५॥
तावत्--तब तक; कलि:--कलि-रूप; न--नहीं; प्रभवेत्--बढ़ सकता है; प्रविष्ट:--प्रवेश करके; अपि-- भी; इह--यहाँ;सर्वत:--सर्वत्र; यावत्--जब तक; ईशः -- प्रभु; महान्--महान्; उर्व्यामू--शक्तिशाली; आभिमन्यव: --अभिमन्यु का पुत्र;एक-रादट्--अकेला सम्राट ।
जब तक अभिमन्यु का महान्-शक्तिशाली पुत्र संसार का सम्राट बना हुआ है, तब तककलि के पनपने की कोई गुंजाइश नहीं है।
"
यस्मिन्नहनि यह्मेव भगवानुत्ससर्ज गाम् ।
तदैवेहानुवृत्तोसावधर्मप्रभव: कलि: ॥
६॥
यस्मिन्--जिसमें; अहनि--दिन में; यहिं एव--जिस क्षण में; भगवान्-- भगवान् ने; उत्ससर्ज--त्याग दिया; गामू--पृथ्वी को;तदा--उस समय; एव--निश्चय ही; इह--इस संसार में; अनुवृत्त:--पीछे आ गया; असौ--वह; अधर्म--अधर्म; प्रभव:--तीब्रकरते हुए; कलि:--कलि-रूप
जिस दिन तथा जिस क्षण भगवान् श्रीकृष्ण ने इस पृथ्वी को छोड़ा, उसी समय, समस्तअधार्मिक कृत्यों को बढ़ावा देनेवाला कलि इस संसार में आ गया।
"
नानुद्रेष्टि कलि सम्राट् सारड़् इव सारभुक् ।
कुशलान्याशु सिद्धयन्ति नेतराणि कृतानि यतू ॥
७॥
न--कभी नहीं; अनुद्देष्टि--ईर्ष्यालु; कलिम्--कलि को; सम्राट्--सप्राट; सारम्-ग--मधुमक्खियों की भाँति यथार्थवादी;इब--सहश; सार-भुक्--सार को ग्रहण करनेवाला; कुशलानि--शुभ वस्तुएँ; आशु--शीघ्र; सिद्धयन्ति--सफल होते हैं; न--कभी नहीं; इतराणि--अशुभ; कृतानि--किये जाने पर; यत्--जितना ।
महाराज परीक्षित मधुमक्खियों की तरह यथार्थवादी थे, जो केवल (पुष्प के ) सार कोग्रहण करती हैं।
वे यह भलीभाँति जानते थे कि इस कलियुग में कल्याणकारी वस्तुएँ तुरन्त हीअपना शुभ प्रभाव डालती हैं, जबकि अशुभ कर्मों को वास्तविक रूप में सम्पन्न करना पड़ता है( जिससे प्रभाव जमा सकें )।
अतएव उन्होंने कभी भी कलि से ईर्ष्या नहीं की।
"
कि नु बालेषु श्रेण कलिना धीरभीरुणा ।
अप्रमत्त: प्रमत्तेषु यो वृको नृषु वर्तते ॥
८॥
किम्--क्या; नु--हो सकता है; बालेषु--अल्पज्ञों में से; शूरेणग--शक्तिमान; कलिना--कलि द्वारा; धीर--आत्म-संयमी;भीरुणा--डरपोक के द्वारा; अप्रमत्त: --सतर्क ; प्रमत्तेषु--लापरवाहों में; यः--जो; वृकः--बाघ; नृषु--मनुष्यों में; वर्तते--विद्यमान है
महाराज परीक्षित ने विचार किया कि अल्पज्ञ मनुष्य कलि को अत्यन्त शक्तिशाली मानसकते हैं, किन्तु जो आत्मसंयमी हैं, उन्हें किसी प्रकार का भय नहीं है।
राजा बाघ के समानशक्तिमान थे और मूर्ख, लापरवाह मनुष्यों की रखवाली करते थे।
"
उपवर्णितमेतद्ठ: पुण्य॑ पारीक्षितं मया ।
वासुदेवकथोपेतमाख्यानं यदपृच्छत ॥
९॥
उपवर्णितम्--प्राय: हर बात का वर्णन हो चुका है; एतत्--ये सब; वः--तुमको; पुण्यम्--पवित्र; पारीक्षितम्--महाराजपरीक्षित के विषय में; मया--मेरे द्वारा; वासुदेव-- भगवान् कृष्ण की; कथा--कथाएँ; उपेतम्--के प्रसंग में; आख्यानम्--कथन; यत्--जो; अपृच्छत--तुमने मुझसे पूछा ।
हे मुनियों, जैसा आपने मुझ से पूछा था, अब मैंने पवित्र राजा परीक्षित के इतिहास सेसम्बन्धित भगवान् कृष्ण की कथाओं की लगभग सब बाते सुना हैं।
"
या या: कथा भगवत: कथनीयोरुकर्मण: ।
गुणकर्माश्रिया: पुम्भि: संसेव्यास्ता बुभूषुभि; ॥
१०॥
या: या:--जो जो; कथा:--कथाएँ; भगवतः-- भगवान् के विषय में; कथनीय--मुझे कहनी थीं; उरु-कर्मण:--अद्भुत कर्मकरनेवाले की; गुण--दिव्य गुण; कर्म--असामान्य कृत्य; आश्रया:--निहित; पुम्भि: --मनुष्यों द्वारा; संसेव्या: --सुनी जानीचाहिए; ताः--वे सब; बुभूषुभिः:--अपना कल्याण चाहनेवालों द्वारा ।
जो लोग जीवन में पूर्ण सिद्धि प्राप्त करने के इच्छुक हैं, उन्हें अद्भुत कर्म करनेवालेभगवान् के दिव्य कार्यकलापों तथा गुणों से सम्बन्धित सारी कथाएँ अत्यन्त विनीत भाव सेश्रवण करनी चाहिए।
"
ऋषय ऊचु:सूत जीव समा: सौम्य शाश्वतीर्विशदं यश: ।
यस्त्वं शंससि कृष्णस्य मर्त्यानाममृतं हि न: ॥
११॥
ऋषय: ऊचु:--ऋषियों ने कहा; सूत--हे सूत गोस्वामी; जीव--जीवित रहो; समा:--अनेक वर्षों तक; सौम्य--गम्भीर;शाश्वती:--शाश्वत; विशदम्--विशेष रूप से; यश: --यश में; यः त्वम्--क्योंकि आप; शंससि--सुन्दर ढंग से कहते हो;कृष्णस्य--भगवान् कृष्ण की; मर्त्यानामू--मर्त्य प्राणियों की; अमृतम्--जीवन की शाश्वतता, अक्षरता; हि--निश्चय ही; न:--हमारा
श्रेष्ठ मुनियों ने कहा : हे सौम्य सूत गोस्वामी! आप अनेक वर्षों तक जिएँ तथा शाश्वत यशप्राप्त करें, क्योंकि आप भगवान् श्रीकृष्ण के कार्यकलापों के विषय में उत्तम ढंग से बता रहे हैं।
हम जैसे मर्त्य प्राणियों के लिए यह अमृत के समान है।
"
कर्मण्यस्मिन्ननाश्वासे धूमधूम्रात्मनां भवान् ।
आपाययति गोविन्दपादपद्मासवं मधु ॥
१२॥
कर्मणि--सम्पन्न करने में; अस्मिनू--इस; अनाश्वासे--निश्चित रूप से नहीं; धूम--धुआँ; धूप्र-आत्मनाम्--कलुषित शरीर तथामन; भवान्--आप; आपाययति--अ त्वन्त प्रसन्न बना रहे हैं; गोविन्द-- भगवान् के; पाद--पाँव; पद्य-आसवम्--कमल पुष्पोंका अर्क; मधु--शहद।
हमने अभी-अभी इस सकाम कृत्य, यज्ञ की अग्नि को सम्पन्न करना प्रारम्भ किया है औरहमारे कार्य में अनेक अपूर्णताएँ होने के कारण इसके फल की कोई निश्चितता नहीं है।
हमारे शरीर धुएँ से काले हो चुके हैं, लेकिन हम भगवान् गोविन्द के चरणकमलों के अमृत रूपी उसमधु से सचमुच तृप्त हैं, जिसे आप हम सबको वितरित कर रहे हैं।
"
तुलयाम लवेनापि न स्वर्ग नापुनर्भवम् ।
भगवत्सज्विसड्भस्य मर्त्यानां किमुताशिष: ॥
१३॥
तुलयाम--के साथ तुलना करना; लवेन--क्षण मात्र से; अपि-- भी; न--कभी नहीं; स्वर्गम्--स्वर्गलोक; न--न तो; अपुनः-भवम्--पदार्थ से मोक्ष; भगवत्-सड्भि-- भगवद्भक्त; सड्गस्य--संगति का; मर्त्यानामू--मरनेवालों का; किम्--क्या रखा है;उत--कहने में; आशिष:--सांसारिक आशीर्वाद, वर।
भगवद्भक्त के साथ क्षण भर की संगति के महत्त्व की तुलना न तो स्वर्गलोक की प्राप्तिसे, न भौतिक-मुक्ति की प्राप्ति से की जा सकती है।
तो फिर उन सांसारिक वरदानों के विषय मेंक्या कहा जाय, जो भौतिक सम्पन्नता के रूप में होते हैं और मर्त्यों के लिए हैं?"
को नाम तृप्येद् रसवित्कथायांमहत्तमैकान्तपरायणस्य ।
नान््तं गुणानामगुणस्य जग्मु-येगिश्वरा ये भवपाझमुख्या: ॥
१४॥
'कः--कौन है, वह; नाम--विशेष रूप से; तृप्येत्--पूरा सन्तोष प्राप्त कर ले; रस-वित्--अमृत-रस का आस्वाद करने में पटु;कथायाम्--कथाओं में; महत्-तम--जीवों में सबसे महान्; एकान्त--एकमात्र; परायणस्य--आश्रय का; न--कभी नहीं;अन्तम्--अन्त; गुणानाम्--गुणों का; अगुणस्य--दिव्य का; जम्मु:--निश्चित कर सके; योग-ईश्वराः--योग-शक्ति के स्वामी;ये--जो; भव--शिवजी; पादा--ब्रह्माजी; मुख्या: -- प्रमुख ।
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण ( गोविन्द ) समस्त महान् जीवों के एकमात्र आश्रय हैं औरउनके दिव्य गुणों का मापन शिव तथा ब्रह्मा जैसे यौगिक शक्तियों के स्वामीयों द्वारा भी नहींकिया जा सकता।
तो भला जो रसास्वादन में पटु है, वह क्या कभी उनकी कथाओं के श्रवणद्वारा पूरी तरह तृप्त हो सकता है ?"
हरेरुदारं चरितं विशुद्धंशुश्रूषतां नो वितनोतु विद्नू ॥
१५॥
तत्--अतएव; न:--हम सबका; भवान्--आप; बै--निश्चय ही; भगवत्-- भगवान् से सम्बन्धित; प्रधान:--मुख्यत:; महत्-तम--सबसे बड़े; एकान्त--एकमात्र; परायणस्य--आश्रय का; हरे: -- भगवान् का; उदारम्--निष्पक्ष; चरितमू--कार्यकलाप;विशुद्धम्-दिव्य; शुश्रूषताम्--सुनने के इच्छुक हैं; नः--हम; वितनोतु--कृपा करके वर्णन करें; विद्वनू--हे विद्वान
हे सूत गोस्वामी, आप विद्वान हैं तथा भगवान् के शुद्ध भक्त हैं, क्योंकि आपकी सेवा काप्रमुख उद्देश्य भगवान् हैं।
अतएवं आप कृपया हमें भगवान् की लीलाएँ कह सुनायें, जो समस्तभौतिक विचारधारा से ऊपर हैं, क्योंकि हम ऐसा संदेश प्राप्त करने के लिए आतुर हैं।
"
स वै महाभागवत: परीक्षिद्येनापवर्गाख्यमदभ्रबुद्धि: ।
ज्ञानेन वैयासकिशब्दितेनभेजे खगेन्द्रध्वजपादमूलम् ॥
१६॥
सः--वह; बै--निश्चय ही; महा-भागवत:--उच्चकोटि का भक्त; परीक्षितू--राजा; येन--जिससे; अपवर्ग-आख्यम्--मोक्षनाम से; अदभ्भ--स्थिर; बुद्द्धि:--बुद्धि; ज्ञानेन--ज्ञान से; वैयासकि--व्यास पुत्र; शब्दितेन--द्वारा उच्चारित; भेजे--ले जायागया; खग-इन्द्र--पक्षियों का राजा, गरुड़; ध्वज--पताका, झंडा; पाद-मूलम्--पैरों के तलवे।
है सूत गोस्वामी, कृपा करके भगवान् की उन्हीं कथाओं का वर्णन करें, जिनसे महाराजपरीक्षित, जिनकी बुद्धि मोक्ष पर केन्द्रित थी, उन भगवान् के चरणकमलों को प्राप्त कर सके,जो पक्षिराज गरुड़ के आश्रय हैं।
"
तन्नः परं पुण्यमसंवृतार्थ-माख्यानमत्यद्धुतयोगनिष्ठम् ।
आख्याह्मनन्ताचरितोपपन्नंपारीक्षितं भागवताभिरामम् ॥
१७॥
तत्--अतएव; न:--हमें; परम्--परम; पुण्यम्-पवित्र करनेवाला; असंवृत-अर्थम्--यथारूप; आख्यानम्-वार्ता; अति--अत्यन्त; अद्भुत--आश्चचर्यजनक; योग-निष्ठम्-- भक्तियोग में हढ़; आख्याहि--कहिये; अनन्त-- अनन्त; आचरित--कार्यकलाप; उपपन्नम्--पूर्ण; पारीक्षितम्--महाराज परीक्षित से कहे गये; भागवत--शुद्ध भक्तों के; अभिरामम्--विशेषतयाअत्यन्त प्रिय
अतः कृपा करके हमें अनन्त की कथाएँ सुनाएँ, क्योंकि वे पवित्र करनेवाली तथा सर्वश्रेष्ठहैं।
इन्हें ही महाराज परीक्षित को सुनाया गया था और वे भक्तियोग से परिपूर्ण होने के कारणशुद्ध भक्तों को अत्यन्त प्रिय हैं।
"
सूत उवाचअहो वयं जन्मभृतोउ्द्य हास्मवृद्धानुवृत्यापि विलोमजाता: ।
दौष्कुल्यमाधि विधुनोति शीघ्रमहत्तमानामभिधानयोग: ॥
१८॥
सूतः उबाच-- श्रील सूत गोस्वामी ने कहा; अहो--कैसे; वयम्--हम; जन्म-भूतः--जन्म को प्राप्त; अद्य--आज; ह--स्पष्टतया; आस्म--हो चुके हैं; वृद्ध-अनुवृत्त्या--ज्ञान में बढ़े-चढ़े मनुष्यों की सेवा करने से; अपि--यद्यपि; विलोम-जाता: --मिश्र जाति में जन्मे; दौष्कुल्यम्--जन्मजात अयोग्यता; आधिम्--कष्ट; विधुनोति--शुद्ध करती है; शीघ्रम्--तुरन्त; महत्-तमानाम्--महानों का; अभिधान--वार्ता; योग:--सम्बन्ध ।
श्री सूत गोस्वामी ने कहा : हे ईश्वर, यद्यपि हम मिश्र ( संकर ) जाति में उत्पन्न हैं, फिर भीहमें ज्ञान में उन्नत उन महापुरुषों की सेवा करने तथा उनका अनुगमन करने से ही जन्म अधिकारप्राप्त हो गया।
ऐसे महापुरुषों से बातचीत करने से ही मनुष्य निम्नकुल में जन्म होने के कारणउत्पन्न अवगुणों से तुरन्त ही निर्मल हो जाता है।
"
कुतः पुनर्गुणतो नाम तस्यमहत्तमैकान्तपरायणस्य ।
योनन्तशक्तिर्भगवाननन्तोमहद्गुणत्वाद् यमनन्तमाहु: ॥
१९॥
कुतः--क्या कहें; पुन:--फिर; गृणत:--कीर्तन करनेवाला; नाम--पवित्र नाम; तस्य--उनका; महत्-तम--महान् भक्त;एकान्त--एकमात्र; परायणस्थ--जिसका आश्रय लिया जाय; यः--वह जो; अनन्त--अनन्त है; शक्ति:--शक्ति; भगवान् --भगवान्; अनन्तः--असंख्य; महत्--महान्; गुणत्वात्--ऐसे गुणों के कारण; यम्--जिनको; अनन्तम्-- अनन्त नाम से;आहुः--पुकारा जाता है।
और उनके विषय में क्या कहा जाय, जो महान भक्तों के निर्देशन में अनन्त के पवित्र नामका कीर्तन करते हैं, जिनकी असीम शक्ति है ? भगवान्, जो शक्ति में असीम तथा गुणों में दिव्यहैं, वे अनन्त कहलाते हैं।
"
एतावतालं ननु सूचितेनगुणैरसाम्यानतिशायनस्य ।
हित्वेतरान् प्रार्थयतो विभूति-यस्याड्प्रिरेणुं जुषतेउनभीप्सो: ॥
२०॥
एतावता--इतनी दूर तक; अलम्--अनावश्यक; ननु--यदि तनिक भी हो तो; सूचितेन--वर्णन से; गुणैः--गुणों से;असाम्य--अमाप्य; अनति-शायनस्थ--जिसकी बराबरी न हो सके उसका; हित्वा--छोड़कर; इतरान्---अन्य; प्रार्थयत:--याचना करनेवालों का; विभूति:--लक्ष्मी की कृपा; यस्य--जिसके; अड्प्रि--पैर; रेणुम्-- धूल; जुषते--सेवा करता है;अनभीप्सो:--अनिच्छित का |
अब यह निश्चित हो गया कि वे ( भगवान् ) अनन्त हैं और उनके तुल्य कोई भी नहीं है।
फलस्वरूप उनके विषय में कोई भी पर्याप्त रूप से कह नहीं सकता।
बड़े-बड़े देवता भीस्तुतियों के द्वारा जिस लक्ष्मी देवी की कृपा प्राप्त नहीं कर पाते, वही देवी भगवान् की सेवाकरती हैं, यद्यपि भगवान् ऐसी सेवा के लिए अनिच्छुक रहते हैं।
"
अथापि यत्पादनखावसूष्टंजगद्विरिश्वोपहताह् णाम्भ: ।
सेशं पुनात्यन्यतमो मुकुन्दात्को नाम लोके भगवत्पदार्थ: ॥
२१॥
अथ--अतः; अपि--निश्चय ही; यत्--जिनके ; पाद-नख--पाँव के नाखून; अवसृष्टम्--निकलते हुए; जगत्--सम्पूर्णब्रह्माण्ड; विरिज्ञ--ब्रह्मा जी; उपहत--एकत्र किया; अर्हण--पूजा; अम्भ:--जल; स--सहित; ईशम्--शिवजी; पुनाति--शुद्धकरता है; अन्यतम:--और कौन; मुकुन्दात्-- भगवान् श्रीकृष्ण के अतिरिक्त; कः--कौन; नाम--नाम; लोके --संसार में;भगवत्--परमे श्वर; पद--पद, स्थित; अर्थ:--योग्य ।
भगवान् श्रीकृष्ण के अतिरिक्त भला ऐसा कौन है, जो परमेश्वर कहलाने के योग्य हो?ब्रह्मजी ने उनके पाँव के नाखूनों से निकलनेवाले जल को भगवान् शिवजी को मस्तक परग्रहण करने के निमित्त एकत्र किया।
यही जल ( गंगानदी ) शिवजी समेत सारे ब्रह्माण्ड को शुद्धबना रहा है।
"
यत्रानुरक्ता: सहसैव धीराव्यपोह्य देहादिषु सड्रमूढम् ।
ब्रजन्ति तत्पारमहंस्यमन्त्यंयस्मिन्नहिंसोपशम: स्वधर्म: ॥
२२॥
यत्र--जिनके प्रति; अनुरक्ता:--हढ़ता से आसक्त; सहसा--एकाएक; एब--निश्चय ही; धीरा:--आत्मसंयमी; व्यपोह्मा--एकओर छोड़कर; देह--स्थूल शरीर तथा सूक्ष्म मन; आदिषु--से सम्बन्धित; सड्रमू--आसक्ति; ऊढम्--लगे हुए; ब्रजन्ति--जातेहैं; तत्--वह; पारम-हंस्यम्--सिद्धि की सर्वोच्च अवस्था; अन्त्यम्--तथा उसके परे; यस्मिन्--जिसमें; अहिंसा--अहिंसा;उपशमः--तथा वैराग्य; स्व-धर्म:--परिणामी वृत्ति ।
परम भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति अनुरक्त आत्म-संयमी पुरुष, स्थूल शरीर तथा सूक्ष्म मनसहित, एकाएक भौतिक आसक्ति से ओतप्रोत संसार को त्याग सकते हैं और जीवन के संन्यासआश्रम की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करने के लिए बाहर चले जाते हैं, जिसके फलस्वरूप अहिंसातथा वैराग्य उत्पन्न होते हैं।
"
अहं हि पृष्टोर्यमणो भवद्धि-राचक्ष आत्मावगमोजत्र यावान् ।
नभ: पतन्त्यात्मसमं पतत्त्रिण-स्तथा सम॑ विष्णुगति विपश्चित: ॥
२३॥
अहम्-मैं; हि--निश्चय ही; पृष्ट:--आपके द्वारा पूछा गया; अर्यभण:--सूर्य के समान शक्तिशाली; भवद्धिः--आपके द्वारा;आचक्षे--वर्णन करे; आत्म-अवगम: --जहाँ तक मेरी जानकारी है; अत्र--यहाँ पर; यावानू--जहाँ तक; नभः--आकाश;'पतन्ति--उड़ते हैं; आत्म-समम्--जहाँ तक हो सकता है; पतत्तिण:--पक्षी; तथा--उसी प्रकार; समम्--वैसे ही; विष्णु-गतिम्--विष्णु का ज्ञान; विपश्चित:--विद्धानों के माध्यम से भी।
हे सूर्य के समान शक्तिशाली ऋषियों, मैं आपको अपने ज्ञान के अनुसार विष्णु की दिव्यलीलाओं के वर्णन करने का प्रयत्न करूँगा।
जिस प्रकार पक्षी आकाश में उतनी ही दूर तकउड़ते हैं, जितनी उनमें क्षमता होती है, उसी प्रकार विद्वान भक्त-गण भगवान् की लीलाओं कावर्णन अपनी-अपनी अनुभूति के अनुसार करते हैं।
"
एकदा धनुरुद्यम्य विचरन् मृगयां वने ।
मृगाननुगतः श्रान्त: क्षुधितस्तृषितो भूशम् ॥
२४॥
जलाशयमचक्षाण: प्रविवेश तमाश्रमम् ।
ददर्श मुनिमासीनं शान्तं मीलितलोचनम् ॥
२५॥
एकदा--एक बार; धनु:--धनुष तथा बाण; उद्यम्य--हढ़तापूर्वक धारण करके; विचरन्--घूमते हुए; मृगयाम्--शिकार केलिए; बने--जंगल में; मृगानू--हिरनों को; अनुगतः -- पीछा करते; श्रान्त:--थका हुआ; क्षुधित:-- भूखे; तृषित: --प्यासेहोकर; भूशम्--अत्यधिक; जल-आशयम्--जल के आगार को, तालाब को; अचक्षाण: --खोज करते हुए; प्रविवेश--प्रवेशकिया; तम्--उस प्रसिद्ध; आश्रमम्--शमीक ऋषि की कुटिया में; ददर्श--देखा; मुनिम्--मुनि को; आसीनमू--आसनलगाये; शान्तम्--चुप, शान्त; मीलित--बन्द किये; लोचनम्--आँखें ।
एक बार महाराज परीक्षित बन में धनुष-बाण से शिकार करते हुए, हिरणों का पीछा करते-करते अत्यन्त थक गये और उन्हें अत्यधिक भूख तथा प्यास लग आई।
जलाशय की खोज करतेहुए वे सुविख्यात शमीक ऋषि के आश्रम में प्रविष्ट हुए, जहाँ उन्होंने आँखें बन्द किये, शान्तभाव से बैठे मुनि को देखा।
"
प्रतिरुद्धेन्द्रिपप्राणमनोबुद्धिमुपारतम् ।
स्थानत्रयात्परं प्राप्तं ब्रह्मभूतमविक्रियम् ॥
२६॥
प्रतिरुद्ध--रूका हुआ; इन्द्रिय--इन्द्रिय; प्राण--प्राणवायु; मन: --मन; बुद्धिम्--बुद्धि; उपारतम्--निश्रेष्ट; स्थान--जगह;त्रयातू-तीनों से; परम्--दिव्य; प्राप्तम्--प्राप्त किया गया; ब्रह्म-भूतम्-परब्रह्म के समान; अविक्रियम्--अप्रभावित |
मुनि की इन्द्रियाँ, श्वास, मन तथा बुद्धि सभी ने भौतिक कार्यकलाप बन्द कर दिये थे औरवे तीनों ( जाग्रत, सुप्त तथा सुषुप्ति ) स्थितियों से अलग होकर, परम पूर्ण के समान गुणात्मकदृष्टि से दिव्य पद प्राप्त करके, समाधि में स्थित थे।
"
विप्रकीर्णजटाच्छन्न॑ रौरबेणाजिनेन च ।
विशुष्यत्तालुरुदक॑ तथाभूतमयाचत ॥
२७॥
विप्रकीर्ण--बिखरे हुए; जट-आच्छन्नम्--लम्बी-लम्बी जटाओं से ढँका; रौरवेण--मृगछाला से; अजिनेन--चर्म से; च--भी;विशुष्यत्--सूखा हुआ; तालु:--तालू; उदकम्--जल; तथा-भूतम्--उस अवस्था में; अयाचत--माँगा ।
ध्यान-मग्न मुनि मृग-चर्म लपेटे थे और इनकी लम्बी जटाएँ उनके सारे शरीर पर बिखरी हुईथीं।
प्यास के मारे सूखे तालू वाले राजा ने उनसे जल माँगा।
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अलब्धतृणभूम्यादिरसम्प्राप्तार्ष्यसूनृत: ।
अवज्ञातमिवात्मानं मन्यमानश्लुकोप ह ॥
२८॥
अलब्ध--न प्राप्त कर सकने से; तृण--दर्भासन; भूमि--स्थान; आदि: --इत्यादि; असम्प्राप्त--ठीक से स्वागत न होकर;अर्घ्य--जल दान; सूनृत:--मधुर वचन; अवज्ञातम्--इस प्रकार उपेक्षित; इब--सह्ृश; आत्मानम्--स्वयं को; मनन््यमान:--इसप्रकार सोचते हुए; चुकोप--क्रुद्ध हए; ह--इस तरह
आसन, बैठने का स्थान, जल तथा मधुर वचनों के द्वारा किसी प्रकार से स्वागत न कियेजाने पर, राजा ने अपने आपको उपेक्षित समझा और इस तरह सोचते हुए वे क्रुद्ध हो गये।
"
अभूतपूर्व: सहसा शध्ुत्तृड्भ्यामर्दितात्मन: ।
ब्राह्मणं प्रत्यभूद् ब्रह्मन् मत्सरो मन्युरेवच ॥
२९॥
अभूत-पूर्व:--जो पहले कभी न हुआ हो, ( पहला ); सहसा--एकाएक; क्षुत्-- भूख; तृड्भ्यामू--तथा प्यास से; अर्दित--पीड़ित होकर; आत्मन:--अपने आप; ब्राह्मणम्--ब्राह्मण; प्रति--के प्रति; अभूत्--हो गये; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मणों; मत्सर: --ईर्ष्यालु; मन्यु:--क्रुद्ध; एब--इस प्रकार; च--तथा ।
हे ब्राह्मणों, ब्राह्मण मुनि के प्रति राजा का क्रोध तथा द्वेष अभूतपूर्व था, क्योंकिपरिस्थितियों ने उन्हें भूखे तथा प्यासे बना दिये थे।
"
स तु ब्रह्मऋषेरंसे गतासुमुरगं रुषा ।
विनिर्गच्छन्धनुष्कोट्या निधाय पुरमागत: ॥
३०॥
सः--राजा; तु--किसी; ब्रह्मय-ऋषे:--ब्राह्मण ऋषि के ; अंसे--कं धे पर; गत-असुम्--निर्जीव; उरगम्--सर्प; रुषा--क्रोध में;विनिर्गच्छन्--जाते हुए; धनु:-कोट्या--धनुष के अग्रभाग से; निधाय--रखकर; पुरम्--महल को; आगत:--वापस आये।
इस प्रकार अपमानित होकर, राजा ने लौटते समय अपने धनुष से एक मृत सर्प उठाया औरउसे क्रोधवश मुनि के कंधे पर रख दिया; तब वे अपने राजमहल को लौट आये।
"
एष कि निभृताशेषकरणो मीलितेक्षण: ।
मृषासमाधिराहोस्वित्तकि नु स्यात्क्षत्रबन्धुभि: ॥
३१॥
एषः--यह; किम्--क्या; निभृत-अशेष-- ध्यानमग्न मुद्रा; करण:--इन्द्रियाँ; मीलित-- बन्द, मुँदी; ईक्षण:-- आँखें; मृषा--झूठी; समाधि: --समाधि; आहो--रहता है; स्वित्--यदि ऐसा है; किमू--या तो; नु--लेकिन; स्थात्--हो सकता है; क्षत्र-बन्धुभि:--निमन क्षत्रिय के द्वारा
लौटने पर वे सोचने लगे तथा मन ही मन तर्क करने लगे कि क्या मुनि इन्द्रियों को एकाग्रकरके तथा आँखें बन्द किये सचमुच समाधि में थे, अथवा वे निम्न क्षत्रिय का सत्कार करने सेबचने के लिए समाधि का स्वाँग रचा रहे थे ?"
तस्य पुत्रोतितेजस्वी विहरन् बालको& भकै: ।
राज्ञाघं प्रापितं तात॑ श्रुत्वा तत्रेदमब्रवीत् ॥
३२॥
तस्य--उसका ( मुनि का ); पुत्र:--पुत्र; अति--अत्यधिक; तेजस्वी--शक्तिमान; विहरन्--खेलते हुए; बालक:--बालकों केसाथ; अर्भक:--जो अभी बचकाना थे; राज्ञा--राजा द्वारा; अधम्--विपत्ति; प्रापितम्--दिया गया; तातम्--पिता को;श्रुत्वा--सुनकर; तत्र--वहीं पर; इदम्--यह; अब्नवीत्--बोला |
उस मुनि का एक पुत्र था, जो ब्राह्मण-पुत्र होने के कारण अत्यन्त शक्तिमान था।
जब वहअनुभवहीन बालकों के साथ खेल रहा था, तभी उसने अपने पिता की विपत्ति सुनी, जो राजाद्वारा लाई गई थी।
वह बालक वहीं पर इस प्रकार बोला।
"
अहो अधर्म: पालानां पीव्नां बलिभुजामिव ।
स्वामिन्यघं यद् दासानां द्वारपानां शुनामिव ॥
३३॥
अहो--जरा देखो तो; अधर्म:--अधर्म; पालानाम्--शासकों का; पीव्नामू--पाले गये का; बलि-भुजाम्--कौवों की तरह;इब--सहश; स्वामिनि--स्वामी को; अधम्--पाप; यत्--जो है; दासानामू--नौकरों का; द्वार-पानामू--दरवाजे की रखवालीकरनेवाले; शुनाम्-कुत्ते के; इब--सह॒श ।
[ ब्राह्मण बालक श्रृंगी ने कहाः अरे! शासकों के पापों को तो देखो, जो अधिशासी-दास-सिद्धान्तों के विरुद्ध, कौवों तथा द्वार के रखवाले कुत्तों की तरह अपने स्वामियों पर पाप ढातेहैं।
"
ब्राह्मणै: क्षत्रबन्धुह्िं गृहपालो निरूपित: ।
स कथं तदगूहे द्वा:स्थ: सभाण्डं भोक्तुमहति ॥
३४॥
ब्राह्मणैः --ब्राह्मणों द्वारा; क्षत्र-बन्धु:--क्षत्रियों के पुत्र; हि--निश्चय ही; गृह-पाल:--रक्षक कुत्ते; निरूपित:--नामधारी;सः--वह; कथम्--किस बल पर; ततू-गृहे-- अपने ( स्वामी ) के घर में; द्वा:-स्थ:--द्वार पर बैठा; स-भाण्डम्--उसी भांडे में;भोक्तुमू--खाने के लिए; अरहति--योग्य है।
राजाओं की सन्तानें निश्चित रूप से द्वाररक्षक कुत्ते नियुक्त हुई हैं और उन्हें द्वार पर ही रहनाचाहिए।
तो किस आधार पर ये कुत्ते घर में घुसकर अपने स्वामी की ही थाली में खाने का दावाकरते हैं?"
कृष्णे गते भगवति शास्तर्युत्पथगामिनाम् ।
तद्धिन्नसेतूनद्याहं शास्मि पश्यत मे बलम् ॥
३५॥
कृष्णे--भगवान् कृष्ण के; गते--इस संसार से प्रयाण करके जाने पर; भगवति-- भगवान्; शास्तरि--परम शासक; उत्पथ-गामिनाम्--उत्पातियों को; तत् भिन्न--विलग होने से; सेतूनू--रक्षक; अद्य--आज; अहम्--मैं; शास्मि--दण्ड दूँगा;'पश्यत--जरा देखना; मे--मेरा; बलम्--पराक्रम |
सबों के परम शासक भगवान् श्रीकृष्ण के प्रस्थान के पश्चात्, हमारे रक्षक तो चले गये,लेकिन ये उपद्रवी फल-फूल रहे हैं।
अतएवं इस मामले को मैं अपने हाथ में लेकर उन्हें दण्डदूँगा।
अब मेरे पराक्रम को देखो।
"
इत्युक्त्वा रोषताम्राक्षो वयस्यानृषिबालक: ।
कौशिक्याप उपस्पृश्य वाग्वज्ं विससर्ज ह ॥
३६॥
इति--इस प्रकार; उक्त्वा--कहकर; रोष-ताप्र-अक्ष: --क्रुद्ध होने के कारण लाल-लाल आँखें किये; वयस्यान्--संगियों को;ऋषि-बालक:--ऋषि का पुत्र; कौशिकी--कौशिक नदी का; आप:--जल; उपस्पृश्य--स्पर्श करके; वाक्--शब्द; वज़म्--बज़; विससर्ज--फेंका; ह-- भूतकाल का सूचक शब्द।
क्रोध से लाल-लाल आँखें किये, अपने संगियों से कहकर, उस ऋषिपुत्र ने कौशिक नदीके जल का स्पर्श किया और निम्नलिखित शब्दरूपी वज्ज छोड़ा।
"
इति ल्डितमर्यादं तक्षक: सप्तमेहनि ।
दड्ख्ष्यति सम कुलाज्रं चोदितो मे ततद्गुहम् ॥
३७॥
इति--इस प्रकार; लड्जित--पार करते हुए; मर्यादम्-शिष्टाचार; तक्षक:--तक्षक सर्प; सप्तमे--सातवें; अहनि--दिन;दड्क्ष्यति--काटेगा; स्म--निश्चय ही; कुल-अज्भरम्--वंश के दुष्ट को; चोदित:--करके; मे--मेरे; तत-द्रहम्--पिता के प्रतिशत्रुता
उस ब्राह्मण-पुत्र ने राजा को इस प्रकार शाप दिया : आज से सातवें दिन अपने वंश के इससर्वाधिक नीच ( महाराज परीक्षित ) को तक्षक सर्प डस लेगा, क्योंकि इसने मेरे पिता कोअपमानित करके शिष्टाचार के नियमों को तोड़ा है।
"
ततो&भ्येत्याश्रमं बालो गले सर्पकलेवरम् ।
पितरं वीक्ष्य दुःखार्तो मुक्तकण्ठो रुरोद ह ॥
३८॥
ततः--तत्पश्चात्; अभ्येत्य--प्रवेश करके; आश्रमम्--आश्रम में; बाल:--बालक; गले सर्प--गले में साँप; कलेवरमू--शरीर;पितरम्--पिता को; वीक्ष्य--देखकर; दुःख-आर्त:--दुखित अवस्था में; मुक्त-कण्ठ:--जोर से; रुरोद--चिल्लाया; ह--भूतकाल का सूचक शब्द
तत्पश्चात् जब वह बालक आश्रम को लौट आया, तो उसने अपने पिता के गले में सर्प देखाऔर उद्दिग्नता के कारण वह जोर से चिल्ला पड़ा।
"
सवा आइड्रिरसो ब्रह्मन् श्रुत्वा सुतविलापनम् ।
उन्मील्य शनकैनेंत्रे दृष्ठा चांसे मृतोरगम् ॥
३९॥
सः--वह; बै-- भी; आड्विरस:--अंगिरा वंश में उत्पन्न ऋषि; ब्रह्मनू--हे शौनक; श्रुत्वा--सुनकर; सुत--अपने पुत्र का;विलापनम्--दुख में रोदन; उनन््मील्य--खोलकर; शनकै :--धीरे-धीरे; नेत्रे-- आँखों से; दृध्टा--देखकर; च-- भी; अंसे--कं थेपर; मृत--मरा हुआ; उरगम्--साँप को।
हे ब्राह्मणो, अंगिरा मुनि के वंश में उत्पन्न उस ऋषि ने अपने पुत्र का चिल्लाना सुनकर धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं और अपनी गर्दन के चारों ओर मरा हुआ सर्प देखा।
"
विसृज्य तं च पप्रच्छ वत्स कस्माद्धि रोदिषि ।
केन वा तेपकृतमित्युक्त: स न््यवेदयत् ॥
४०॥
विसृज्य--एक ओर फेंककर; तम्--उसको; च--भी; पप्रच्छ--पूछा; बत्स--प्रिय पुत्र; कस्मातू--किसलिए; हि--निश्चय ही;रोदिषि--रो रहे हो; केन--किसके द्वारा; वा--अथवा; ते--वे; अपकृतम्--दुर्व्यवहार किया; इति--इस प्रकार; उक्त:--कहागया; सः--उस लड़के ने; न्यवेदयत्--सब कुछ बता दिया
उन्होंने मरा हुआ सर्प एक ओर फेंक दिया और अपने पुत्र से पूछा कि वह क्यों रो रहा है?क्या किसी ने उसे चोट पहुँचाई है? यह सुनकर बालक ने जो कुछ घटना घटी थी, उसे कहसुनाया।
"
निशम्य शप्तमतदर्ह नरेन्द्र स ब्राह्मणो नात्मजमभ्यनन्दत् ।
अहो बतांहो महदद्य ते कृतमल्पीयसि द्रोह उरुर्दमो धृत: ॥
४१॥
निशम्य--सुनकर; शप्तम्--शापित; अतत्-अर्हम्--कभी भी तिरस्कृत नहीं; नर-इन्द्रम्--मनुष्यों में श्रेष्ठ राजा को; सः--वह;ब्राह्मण: --ब्राह्मण ऋषि; न--नहीं; आत्म-जम्--अपने पुत्र को; अभ्यनन्दत्--बधाई दी; अहो--हाय; बत--दुखद; अंह: --पाप; महत्--बड़ा; अद्य--आज; ते--तुम्हारा; कृतमू--किया गया; अल्पीयसि--नगण्य, क्षुद्र; द्रोहे-- अपराध; उरु:--बहुतबड़ा; दमः--दण्ड; धृतः--दिया गया।
पिता ने अपने पुत्र से सुना कि राजा को शाप दिया गया है, यद्यपि उसे इस तरह दण्डित नहींकिया जाना था, क्योंकि वह समस्त मनुष्यों में श्रेष्ठ था।
अपितु उलटे वे यह कहकर पछताने लगे, हाय! मेरे पुत्र ने कितना बड़ा पाप-कर्म कर लिया।
उसने एक तुच्छ अपराध के लिए इतना भारी दण्ड दे दिया है।
"
न वै नृभिर्नरदेवं पराख्यंसम्मातुमर्हस्यविपक्षबुद्धे ।
यत्तेजसा दुर्विषहेण गुप्ता विन्दन्ति भद्राण्यकुतोभया: प्रजा: ॥
४२॥
न--कभी नहीं; वै--सचमुच; नृभि:--किसी मनुष्य द्वारा; नर-देवम्--मनुष्यरूपी देवता को; पर-आख्यम्--दिव्य;सम्मातुमू--समान बताना; अर्हसि--तेज से; अविपक्क--अनुभवहीन, अप्रौढ़; बुद्धे--बुद्धि; यत्--जिसका; तेजसा--तेज से;दुर्विषषिण--अलंघ्य; गुप्ता:--सुरक्षित; विन्दन्ति-- भोग करता है; भद्राणि--सारी समृद्धि; अकुतः-भया:--पूर्ण रूप सेसुरक्षित, निर्भय; प्रजा:--जनता |
हे बालक, तुम्हारी बुद्धि अपरिपक्व है, अतएव तुम्हें ज्ञान नहीं है कि राजा मनुष्यों मेंसर्वोत्तम और भगवान् के तुल्य होता है।
उसकी तुलना कभी भी सामान्य लोगों के साथ नहीं कीजा सकती।
उसके राज्य के नागरिक उसके दुर्दम तेज से सुरक्षित रहकर समृद्धविमय जीवन व्यतीत करते हैं।
"
अलक्ष्यमाणे नरदेवनाम्निरथाज्गरपाणावयमज्भ लोक: ।
तदा हि चौरप्रचुरो विनड्छ्ष्य-त्यरक्ष्ममाणोविवरूथवत् क्षणात् ॥
४३॥
अलक्ष्यमाणे--समाप्त किये जाने से; नर-देव--राजा का सा; नाम्नि--नामधारी; रथ-अड्र-पाणौ-- भगवान् का प्रतिनिधि;अयम्--यह; अड़--हे बालक; लोक:--यह संसार; तदा हि--तुरन््त; चौर--चोर; प्रचुर: --अत्यधिक; विनड्छ्यति--परास्तकिया; अरक्ष्यमाण:--सुरक्षित न रहकर; अविवरूथ-वत्--मेमने की भाँति; क्षणात्--तुरन्त
हे बालक एकछत्र राजसत्ता द्वारा रथचक्र धारण करनेवाले भगवान् का प्रतिनिधित्व कियाजाता है और जब राजसत्ता ही मिट जाती है, तो सारा संसार चोरों से भर जाता है, जो तितर-बितर मेमनों की भाँति असुरक्षित प्रजा को तुरन्त परास्त कर देते हैं।
"
तदद्य नः पापमुपैत्यनन्वयंयन्नष्टनाथस्य वसोर्विलुम्पकातू ।
परस्परं घ्नन्ति शपन्ति वृञ्ञतेपशून् स्त्रियोरर्थान् पुरुदस्यवों जना: ॥
४४॥
तत्--इस कारण से; अद्य--आज से; नः--हम पर; पापम्--पाप का फल; उपैति--चढ़ेगा; अनन्वयम्--विघ्न; यत्--क्योंकि; नष्ट--नष्ट होने पर; नाथस्य--राजा का; बसो:--सम्पत्ति का; विलुम्पकात्--लूटा जाकर; परस्परम्--एक दूसरे से;घ्तन्ति--मारेगा; शपन्ति--हानि पहुँचायेगा; वृज्भधते--चुरायेगा; पशून्--पशुओं को; स्त्रिय:--स्त्रिया; अर्थानू-- धन को; पुरु--अत्यधिक; दस्यव:--चोर; जना:--लोगों का समूह |
राजा की शासन-प्रणाली के समाप्त होने तथा धूर्तों एवं चोरों द्वारा लोगों की सम्पत्ति लुटनेके कारण बड़े-बड़े सामाजिक विघ्न आयेंगे; लोग हताहत किये जायेंगे; पशु तथा स्त्रियाँ चुराईजायेंगी और इन सारे पापों के उत्तरदायी होंगे हम सब।
"
तदार्यधर्म: प्रविलीयते नृणांवर्णाश्रमाचारयुतसत्रयीमय: ।
ततो<र्थकामाभिनिवेशितात्मनांशुनां कपीनामिव वर्णसड्डूर: ॥
४५॥
तदा--उस समय; आर्य--प्रगतिशील सभ्यता; धर्म:--कार्य; प्रविलीयते--समाप्त हो जाती है; नृणाम्--मनुष्यों की; वर्ण--जाति; आश्रम--समाज की व्यवस्था; आचार-युतः--शिष्टाचार से युक्त; त्रयी-मयः--वैदिक आदेश के रूप में; ततः--तत्पश्चात्; अर्थ--आर्थिक विकास; काम-अभिनिवेशित-इन्द्रिय-तृप्ति में पूरी तरह लिप्त; आत्मनाम्--मनुष्यों का; शुनाम्--कुत्तों की तरह; कपीनामू--बन्दरों की तरह; इब--सहश; वर्ण-सद्भूरः--अवांछित प्रजा ।
उस समय सामान्य लोग जाति (वर्ण ) तथा समाज-व्यवस्था ( आश्रम ) के गुणात्मक कार्योके रूप में प्रगतिशील सभ्यता के मार्ग से तथा वैदिक आदेशों से धीरे-धीरे गिर जायेंगे।
इसप्रकार वे इन्द्रियतृप्ति के निमित्त आर्थिक विकास के प्रति अधिक आकृष्ट होंगे जिसके फलस्वरूप कुत्तों तथा बन्दरों के स्तर की अवांछित जनसंख्या को बढ़ावा मिलेगा।
"
धर्मपालो नरपति: स तु सम्राड् बृहच्छुवा: ।
साक्षान्महाभागवतो राजर्षिहयमेधयाट् ।
क्षुतृटश्रमयुतो दीनो नैवास्मच्छापमर्हति ॥
४६॥
धर्म-पाल:--धर्म का रक्षक; नर-पति:--राजा; सः--वह; तु--लेकिन; सम्राट्--सम्राट; बृहत्-- अत्यधिक; श्रवा:--प्रसिद्ध;साक्षात्- प्रत्यक्ष रूप से; महा-भागवतः --उच्च-कोटि का भगवद्भक्त; राज-ऋषि: --राजाओं में साधु; हय-मेधयाट्--अश्वमेध यज्ञ करनेवाला; क्षुतू-- भूख; तृटू--प्यास; श्रम-युत:-- थका-हारा; दीन:--विपत्ति का मारा; न--क भी नहीं; एब--इस प्रकार; अस्मत्--हमारे द्वारा; शापम्-- श्राप; अरहति--के योग्य है।
सप्राट परीक्षित एक पवित्र राजा हैं।
वे अत्यन्त प्रसिद्ध हैं और उच्चकोटि के भगवदभक्त हैं।
वे राजाओं में सन्त ( राजर्षि ) हैं और उन्होंने अनेक अश्वमेध यज्ञ किये हैं।
जब ऐसा राजा, भूखतथा प्यास का मारा, थका-हारा होता है, तो वह किसी भी तरह से शाप दिये जाने के योग्य नहीं होता।
"
अपापेषु स्वभृत्येषु बालेनापक्कबुद्धिना ।
पापं कृतं तद्धगवान् सर्वात्मा क्षन्तुमहति ॥
४७॥
अपापेषु--समस्त पापों से रहित व्यक्ति को; स्व-भृत्येषु--अधीन व्यक्ति को, जिसकी रक्षा की जानी चाहिए; बालेन--बालकद्वारा; अपक्र--अप्रौढ़; बुद्धिना--बुद्धि से; पापम्--पाप-पूर्ण कर्म; कृतम्--किया गया; तत् भगवान्--अतएव भगवान्; सर्व-आत्मा--सर्वव्यापी; क्षन्तुम्-- क्षमा के लिए; अर्हति--योग्य हैं |
तब ऋषि ने सर्वव्यापी भगवान् से अपने अप्रौढ़ तथा बुद्धिहीन पुत्र को क्षमा करने के लिएप्रार्थना की, जिसने ऐसे व्यक्ति को शाप देने का महान् पाप किया था, जो समस्त पापों से मुक्तथा और पराथञ्नित एवं सभी प्रकार से रक्षा किये जाने के योग्य था।
"
तिरस्कृता विप्रलब्धा: शप्ता: क्षिप्ता हता अपि ।
नास्य तत् प्रतिकुर्वन्ति तद्धक्ता: प्रभवोडुपि हि ॥
४८॥
तिरः-कृता:--अपमानित होकर; विप्रलब्धा:--ठगा जाकर; शप्ता:--शापित होकर; क्षिप्ता:--उपेक्षा के कारण विचलित;हता:--अथवा मारे जाने पर; अपि--भी; न--कभी नहीं; अस्य--इन कृत्यों के लिए; तत्--उनको; प्रतिकुर्वन्ति-- प्रतीकारहोते हैं; तत्-- भगवान् को; भक्ता:--भक्तगण; प्रभव: --शक्तिमान; अपि--यद्यपि; हि--निश्चय ही |
भगवान् के भक्त इतने सहिष्णु होते हैं कि अपमानित होने, ठगे जाने, शापित होने, विचलितकिये जाने, उपेक्षित होने अथवा जान से मारे जाने पर भी कभी बदला लेने का विचार नहींकरते।
"
इति पुत्रकृताघेन सोनुतप्तो महामुनि: ।
स्वयं विप्रकृतो राज्ञा नैवाघं तदचिन्तयत् ॥
४९॥
इति--इस प्रकार; पुत्र--पुत्र; कृत--किया गया; अघेन--पाप से; सः--वे ( मुनि ); अनुतप्त:--पश्चात्ताप करते हुए; महा-मुनि:--ऋषि; स्वयम्--स्वयं; विप्रकृत:--इस तरह अपमानित होते हुए; राज्ञा--राजा द्वारा; न--नहीं; एव--निश्चय ही;अधम्--पाप; तत्--वह; अचिन्तयत्--सोचा ।
इस प्रकार मुनि ने अपने पुत्र द्वारा किये गये पाप के लिए पश्चात्ताप किया।
उसने राजा द्वाराकिये गये अपमान को गम्भीरता से ग्रहण नहीं किया।
"
प्रायश: साधवो लोके परैर्न्द्रेषु योजिता: ।
न व्यथन्ति न हृष्यन्ति यत आत्माउगुणाश्रय: ॥
५०॥
प्रायश:--सामान्यतया; साधव:--सन््त गण; लोके--इस संसार में; पैरैः--अन्यों द्वारा; इन्द्देषु--द्वैत में; योजिता:--लगायेजाकर; न--कभी नहीं; व्यथन्ति--पीड़ित होते हैं; न--न तो; हृष्यन्ति--हर्ष मानते हैं; यत:--क्योंकि; आत्मा--स्वयं; अगुण-आश्रय:--दिव्य ।
सामान्यतया अध्यात्मवादी अच्यों द्वारा संसार के द्वन्द्दों में लगाये जाने पर भी व्यथित नहींहोते।
न ही वे ( सांसारिक वस्तुओं में ) आनन्द लेते हैं, क्योंकि वे अध्यात्म में लगे रहते हैं।
"
