← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 1 की सूची

अध्याय सत्रह: काली की सज़ा और इनाम

1.17कलि को दण्ड तथा पुरस्कारसूत उवाचतत्र गोमिथुनं राजा हन्यमानमनाथवत्‌ ।

दण्डहस्तं च वृषलं दहशे नृपलाज्छनम्‌ ॥

१॥

सूतः उबाच-- श्री सूत गोस्वामी ने कहा; तत्र--वहाँ; गो-मिथुनम्‌--गाय तथा बैल को; राजा--राजा; हन्यमानम्‌--मारे जातेहुए; अनाथ-बत्‌--अपने मालिक से विलग हुए प्रतीत होनेवाले; दण्ड-हस्तम्--हाथों में लट्ठ लिए; च-- भी; वृषलम्‌--निम्नजाति के शूद्र को; ददशे--देखा; नृप--राजा की तरह; लाउ्छनम्--वेश धारण किये

सूत गोस्वामी ने कहा : उस स्थान पर पहुँचकर महाराज परीक्षित ने देखा कि एक नीचजाति का शूद्र, राजा का वेश बनाये, एक गाय तथा एक बैल को लट्ठ से पीट रहा था, मानोउनका कोई स्वामी न हो।

"

वृष मृणालधवलं मेहन्तमिव बिभ्यतम्‌ ।

वेपमानं पदैकेन सीदन्तं शूद्रताडितम्‌ ॥

२॥

वृषम्‌--बैल को; मृणाल-धवलमू-- श्रेत कमल के समान सफेद; मेहन्तम्‌--पेशाब करता; इब--मानो; बिभ्यतम्‌--अत्यधिकडरा हुआ; वेपमानम्‌--काँपता हुआ; पदा एकेन--एक ही पैर पर खड़ा; सीदन्तम्‌--डरा हुआ; शूद्र-ताडितम्‌--शूढ्र द्वारा मारेजाने से।

बैल इतना धवल था कि जैसे श्वेत कमल पुष्प हो।

वह उस शूद्र से अत्यधिक भयभीत था,जो उसे मार रहा था।

वह इतना डरा हुआ था कि एक ही पैर पर खड़ा थरथरा रहा था और पेशाब कर रहा था।

"

गां च धर्मदुघां दीनां भृशं शूद्रपदाहताम्‌ ।

विवत्सामाश्रुवदनां क्षामां यवसमिच्छतीम्‌ ॥

३॥

गाम्‌--गाय को; च-- भी; धर्म-दुघाम्‌--उससे धर्म निकालने के कारण उपयोगी; दीनामू--अब दीन बनी हुई; भृूशम्‌--दुखी;शूद्र--निम्न जाति; पद-आहताम्‌--पाँव पर प्रहार की गई; विवत्साम्‌--बछड़े से रहित; आश्रु-वदनाम्‌--आँखों से आँसू भरे;क्षामाम्‌-अत्यन्त कृश, कमजोर; यवसम्‌--घास को; इच्छतीम्‌--मानो खाने की इच्छा करती हुई

यद्यपि गाय उपयोगी है, क्योंकि उससे धर्म प्राप्त किया जा सकता है, किन्तु अब वह दीनतथा बछड़े से रहित हो गई थी।

उसके पाँवों पर शूद्र प्रहार कर रहा था।

उसकी आँखों में आँसू थेऔर वह अत्यन्त दुखी तथा कमजोर थी।

वह खेत की थोड़ी-सी घास के लिए लालायित थी।

"

पप्रच्छ रथमारूढ: कार्तस्वरपरिच्छदम्‌ ।

मेघगम्भीरया वाचा समारोपितकार्मुक: ॥

४॥

पप्रच्छ--पूछा; रथम्‌--रथ पर; आरूढ:--आसीन; कार्तस्वर--सोने से; परिच्छदम्‌--जटित; मेघ--बादल; गम्भीरया--दोष-मुक्त कराते हुए; वाचा--वाणी; समारोपित--पूरी तरह सज्जित; कार्मुक:--धनुष-बाण

धनुष-बाण से सज्जित तथा स्वर्ण-जटित रथ पर आसीन महाराज परीक्षित उससे ( शूद्र से )मेघ के समान गर्जना करनेवाली गम्भीर वाणी से बोले।

"

कस्त्वं मच्छरणे लोके बलाड्ंंस्यब्लान्‌ बली ।

नरदेवोडसि वेषेण नटवत्कर्मणाद्विज: ॥

५॥

कः--कौन हो; त्वमू--तुम; मत्‌--मेरी; शरणे--संरक्षण में; लोके --इस संसार में; बलात्‌--बलपूर्वक; हंसि--मार रहे हो;अबलान्‌--असहायों को; बली--यद्यपि बल से युक्त; नर-देव:--मनुष्य-रूप देवता; असि--प्रतीत होते हो; वेषेण-- अपनेवेश से; नट-वत्‌--अभिनेता जैसे; कर्मणा--कामों से; अद्वि-ज:--जो द्विज न हो ।

अरे, तुम हो कौन? तुम बलवान प्रतीत हो रहे हो, फिर भी तुम उन असहायों को मारने कासाहस कर रहे हो, जो मेरे संरक्षण में हैं! वेष से तुम देवतुल्य पुरुष ( राजा ) बने हुए हो, किन्तुअपने कार्यों से तुम द्विज क्षत्रियों के सिद्धान्तों का उल्लंघन कर रहे हो।

"

यस्त्वं कृष्णे गते दूरं सहगाण्डीवधन्वना ।

शोच्योस्यशोच्यान्‌ रहसि प्रहरन्‌ वधमर्हसि ॥

६॥

यः--जिससे; त्वम्‌--तुम दुष्ट; कृष्णे--कृष्ण के; गते--चले जाने से; दूरम्--आँख से ओझल; सह--साथ; गाण्डीब--गाण्डीव नामक धनुष; धन्वना--धारण करनेवाला अर्जुन; शोच्य:--अपराधी; असि--हो; अशोच्यान्‌--निर्दोष; रहसि--एकान्त स्थान में; प्रहरन्‌--मारते हुए; वधम्‌--मारे जाने के; अर्हसि--पात्र हो |

ओरे धूर्त, क्या तुम इस निर्दोष गाय को मारने का दुस्साहस इसीलिए कर रहे हो कि भगवान्‌कृष्ण तथा गाण्डीवधारी अर्जुन दृष्टि से बाहर हैं ? चूँकि तुम इस निर्दोष को एकान्त स्थान में माररहे हो, अतएव तुम अपराधी हो और बध किये जाने के योग्य हो।

"

त्वं वा मृणालधवल: पादैर्न्यून: पदा चरन्‌ ।

वृषरूपेण कि कश्चिद्‌ देवो न: परिखेदयन्‌ ॥

७॥

त्वमू--तुम; वा--या तो; मृणाल-धवलः--कमल की तरह सफेद; पादैः--तीन पाँवों वाले; न्यून:--छीने जाने से; पदा--एकपाँव से; चरन्--चलते हुए; वृष--बैल; रूपेण -- के रूप में; किम्‌--क्या; कश्चित्‌--कोई; देव:--देवता; न:--हमको;'परिखेदयन्‌--क्लेश पहुँचा रहे हो

तब उन्होंने ( महाराज परीक्षित ने ) बैल से पूछा: अरे, तुम कौन हो? तुम श्रेत कमल जैसेधवल बैल हो या कोई देवता हो ? तुम अपने तीन पैर खो चुके हो और केवल एक पैर पर चलरहे हो।

क्‍या तुम बैल के रूप में कोई देवता हो, जो हमें इस तरह क्लेश पहुँचा रहे हो ?"

न जातु कौरदवेन्द्राणां दोर्दण्डपरिरम्भिते ।

भूतलेडनुपतन्त्यस्मिन्‌ विना ते प्राणिनां शुच: ॥

८॥

न--नहीं; जातु--किसी समय; कौरव-इन्द्राणामू--कुरुवंश के राजाओं का; दोर्दण्ड--बाहुबल से; परिरम्भिते--सुरक्षित कियागया; भू-तले--पृथ्वी पर; अनुपतन्ति--शोक करते हुए; अस्मिनू--अब तक; विना--रहित; ते--तुम्हारे; प्राणिनामू--जीवका; शुचः--आँखों से अश्रु।

कुरुवंश के राजाओं के बाहुबल से सुरक्षित राज्य में, आज मैं पहली बार तुम्हें आँखों मेंआँसू भरे शोक करते हुए देख रहा हूँ।

आज तक किसी ने पृथ्वीतल पर राजा की उपेक्षा केकारण आँस नहीं बहाए।

"

मा सौरभेयात्र शुचो व्येतु ते वृषलाद्‌ भयम्‌ ।

मा रोदीरम्ब भद्रं ते खलानां मयि शास्तरि ॥

९॥

मा--मत; सौरभेय--हे सुरभि पुत्र; अत्र--मेरे राज्य में; शुच:--शोक; व्येतु--होने दो; ते--तुम्हारा; वृषलात्‌--शूद्र द्वारा;भयम्‌-- भय का कारण; मा--मत; रोदी:--रोओ; अम्ब--गो माता; भद्रमू--कल्याण; ते--तुम्हारा; खलानाम्--ईष्यालुओंका; मयि--मेरे रहते; शास्तरि--शासक या दमनकर्ता।

हे सुरभि-पुत्र, अब तुम और शोक न करो।

तुम्हें इस अधम जाति के शूद्र से डरने कीआवश्यकता नहीं है।

तथा, हे गो-माता, जब तक मैं शासक या खलों के दमनकर्ता के रूप मेंहूँ, तब तक तुम्हें रोने की आवश्यकता नहीं है।

तुम्हारा सभी तरह से कल्याण होगा।

"

यस्य राष्ट्र प्रजा: सर्वाख्रस्यन्ते साथ्व्यसाधुभि: ।

तस्य मत्तस्य नश्यन्ति कोर्तिरायुर्भगो गति; ॥

१०॥

एघ राज्ञां परो धर्मो ह्ार्तनामार्तिनिग्रह: ।

अत एन॑ वधिष्यामि भूतद्रुहमसत्तमम्‌ ॥

११॥

यस्य--जिसके; राष्ट्रे--राज्य में; प्रजा:--जीव; सर्वा:--सारे; त्रस्यन्ते-- भयभीत रहते हैं; साध्वि--हे साध्वी; असाधुभि:--दुष्टोंके द्वारा; तस्य--उस; मत्तस्थ--मोह- ग्रस्त का; नश्यन्ति--नष्ट हो जाते हैं; कीर्ति:--यश; आयु:--आयु, उप्र; भग: --सम्पत्ति,धन; गति:--दूसरा जन्म; एष:--ये हैं; राज्ञामू--राजाओं के; पर:-- श्रेष्ठ; धर्म:--वृत्ति, धर्म; हि--निश्चय ही; आर्तानामू-कष्टभोगनेवालों के; आर्ति--कष्ट; निग्रह:--दमन; अत:--अतएव; एनम्‌--इस आदमी को; वधिष्यामि--मैं मार डालूँगा; भूत-द्रहम--जीवों की हिंसा करनेवाला; असतू-तमम्‌--अत्यन्त दुष्ट |

हे साध्वी, यदि राजा के राज्य में भी सभी प्रकार के जीव त्रस्त रहें, तो राजा की ख्याति,उसकी आयु तथा उसका उत्तम पुनर्जन्म ( परलोक ) नष्ट हो जाते हैं।

यह राजा का प्रधान कर्तव्यहै कि जो पीड़ित हों, सर्वप्रथम उनके कष्टों का शमन किया जाय।

अतएव मैं इस अत्यन्त दुष्टव्यक्ति को अवश्य मारूँगा, क्योंकि यह अन्य जीवों के प्रति हिंसक है।

"

को<वृश्चत्‌ तव पादांसत्रीन्‌ सौरभेय चतुष्पद ।

मा भूवं॑स्त्वाहशा राष्ट्रे राज्ञां कृष्णानुवर्तिनामू ॥

१२॥

कः--वह कौन है; अवृश्चवत्‌--काट लिया; तव--तुम्हारे; पादानू-- पाँवों को; त्रीन्--तीन; सौरभेय--हे सुरभि पुत्र; चतुः-'पद--चौपाये हो; मा--कभी नहीं; भूवन्‌--ऐसा हुआ है; त्वाइशा: -- जैसे कि तुम हो; राष्ट्रे--राज्य में; राज्ञामू--राजाओं के;कृष्ण-अनुवर्तिनाम्‌-पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ श्रीकृष्ण के आदेशों का पालन करने वाले।

उन्होंने ( महाराज परीक्षित ने ) बैल को बारम्बार सम्बोधित करते हुए इस तरह पूछा : हेसुरभि-पुत्र, तुम्हारे तीन पाँवों को किसने काट लिया है? उन राजाओं के राज्य में, जो पूर्णपुरुषोत्तम भगवान्‌ कृष्ण के नियमों के आज्ञाकारी हैं, तुम्हारे समान दुखी कोई नहीं है।

"

आख्याहि वृष भद्रं व: साधूनामकृतागसाम्‌ ।

आत्मवैरूप्यकर्तरं पार्थानां कीर्तिदूषणम्‌ ॥

आख्याहि--मुझसे कहो; वृष--हे बैल; भद्रमू--कल्याण; वः--तुम्हारा; साधूनाम्‌--ईमानदारों का; अकृत-आगसाम्‌--अपराधहीनों का; आत्म-वैरूप्य--अपना रूप बिगाड़ना; कर्तारमू-कर्ता; पार्थानामू--पृथा के पुत्रों का; कीर्ति-दूषणम्‌--यशको कलंकित करना।

हे बृषभ, तुम निरपराध हो और पूर्णतया ईमानदार हो, अतएव मैं तुम्हारे कल्याण कीकामना करता हूँ।

कृपया मुझे अंग-भंग करनेवाले दुष्ट के बारे में बताओ, जो पृथा के पुत्रों केयश को कलंकित कर रहा है।

"

जनेनागस्यघं युझ्जन्‌ सर्वतोस्य च मद्धयम्‌ ।

साधूनां भद्रमेव स्यादसाधुदमने कृते ॥

१४॥

जने--जीवों में; अनागसि--निरपराध; अघम्‌--कष्ट; युज्ञनू--लगाकर; सर्वतः--सर्वत्र; अस्य--ऐसे अपराधियों का; च--तथा; मत्‌-भयम्‌--मेरा भय; साधूनाम्‌--ईमानदार व्यक्तियों का; भद्रमू--कल्याण; एब--निश्चय ही; स्थात्--होगा; असाधु--दुष्ट; दमने--दमन में; कृते--ऐसा किये जाने पर।

निरपराध जीवों को जो कोई भी कष्ट पहुँचाता है, उसे चाहिए कि विश्व में जहाँ कहीं भी हो,मुझसे डरे।

दुष्टों का दमन करने से निरपराध व्यक्ति को स्वतः लाभ पहुँचता है।

"

अनाग:स्विह भूतेषु य आगस्कृत्निरक्कृश: ।

आहर्तास्मि भुजं साक्षादमर्त्यस्यापि साड्रदम्‌ ॥

१५॥

अनागःसु इह--निरपराध; भूतेषु--जीवों में; यः--जो व्यक्ति; आग:-कृत्‌--अपराध करता है; निरह्ुशः --उच्छुद्धुल, उहंड;आहर्ता अस्मि--मैं काट लूँगा; भुजम्‌--बाँहें; साक्षात्‌- प्रत्यक्ष; अमर्त्यस्थ अपि--चाहे देवता क्यों न हो; स-अड्डभदम्‌--बाजू-बन्द तथा अन्य सजावट से युक्त

जो उहंड व्यक्ति निरपराधियों को सता कर अपराध करता है, वह मेरे द्वारा उखाड़ फेंकाजायेगा, चाहे वह बाजूबंद तथा अन्य अलंकारों से युक्त स्वर्ग का निवासी ही क्‍यों न हो।

"

राज्ञो हि परमो धर्म: स्वधर्मस्थानुपालनम्‌ ।

शासतोअचन्यान्‌ यथाशास्त्रमनापद्युत्पधानिह ॥

१६॥

राज्ञ:--राजा का; हि--निश्चय ही; परम:--परम; धर्म:--वृत्तिपरक कर्तव्य; स्व-धर्म-स्थ--अपने नियत कर्म के प्रतिआज्ञाकारी; अनुपालनम्‌--सदैव शरण देनेवाला; शासत:--शासन चलाते हुए; अन्यान्‌--अन्यों को; यथा--जिस तरह;शास्त्रमू--शास्त्रों के अनुसार; अनापदि--बिना खतरे के ; उत्पथान्‌--पथ- भ्रष्ट व्यक्ति; उहह--एक प्रकार से ।

शासक का यह परम धर्म है कि कानून-पालन करने वाले व्यक्तियों को सभी प्रकार सेसंरक्षण प्रदान करे और जो सामान्य दिनों में, जब आपातकाल नहीं रहता, शास्त्रों के अध्यादेशोंसे विपथ हो जाते हैं, उन्हें दण्ड दे।

"

धर्म उवाचएतद्‌ व: पाण्डवेयानां युक्तमार्ताभयं बच: ।

येषां गुणगणै: कृष्णो दौत्यादौ भगवान्‌ कृत: ॥

१७॥

धर्म: उबाच--मूर्तिमंत धर्म ने कहा; एतत्‌--ये सारे; व:--आपके द्वारा; पाण्डवेयानाम्-पांडववंशियों का; युक्तम्‌-केउपयुक्त; आर्त--कष्ट भोगने वाला; अभयम्‌--समस्त भय से मुक्ति; वच:--शब्द; येषाम्‌--उन; गुण-गणै: --योग्यताओं से;कृष्ण:--कृष्ण ने भी; दौत्य-आदौ--दूत कर्म इत्यादि; भगवान्--भगवान्‌; कृत:--सम्पन्न किया।

धर्म ने कहा : अभी आपने जो शब्द कहे हैं, वे पाण्डववंशीय व्यक्ति के लिए सर्वथा उपयुक्तहैं।

पाण्डवों के भक्तिपूर्ण गुणों से मोहित होकर ही, भगवान्‌ कृष्ण ने दूत का कर्तव्य निभाया।

"

न वयं क्लेशबीजानि यत: स्यु: पुरुषर्षभ ।

पुरुष तं विजानीमो वाक्यभेदविमोहिता: ॥

१८॥

न--नहीं; वयम्‌--हम; क्लेश-बीजानि--कष्टों के मूल कारण को; यतः--जहाँ से; स्युः--ऐसा होता है; पुरुष-ऋषभ--हेसमस्त पुरुषों में श्रेष्ठ; पुरुषम्‌-पुरुष को; तम्‌--उस; विजानीम:--जानो; वाक्य-भेद--मतभेद; विमोहिता:--मोह ग्रस्त ।

हे पुरुषश्रेष्ठ, यह निश्चित कर पाना अत्यन्त कठिन है कि किस दुष्ट ने हमें कष्ट पहुँचाया है,क्योंकि हम सैद्धान्तिक दार्शनिकों के भिन्न-भिन्न मतों से भ्रमित हैं।

"

केचिद्‌ विकल्पवसना आहुरात्मानमात्मन: ।

दैवमन्येपरे कर्म स्वभावमपरे प्रभुम्‌ ॥

१९॥

केचित्‌--उनमें से कोई; विकल्प-वसना: --सभी प्रकार के द्वैत से इनकार करनेवाले; आहु:--घोषित करते हैं; आत्मानम्‌--अपने आपको; आत्मन:--अपना; दैवम्‌--अतिमानव, दैवी; अन्ये-- अन्य लोग; अपरे--और भी कोई; कर्म--कर्म;स्वभावम्‌--भौतिक प्रकृति; अपरे--अन्य कई; प्रभुम्‌--स्वामी ।

सभी प्रकार के द्वैत से इनकार करनेवाले कतिपय दार्शनिक यह घोषित करते हैं कि मनुष्यअपने सुख तथा दुख के लिए स्वयं ही उत्तरदायी हैं।

अन्य लोग कहते हैं कि दैवी शक्तियाँ इसकेलिए जिम्मेदार हैं, जबकि कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो कहते हैं कि इसके लिए कर्म जिम्मेदार हैऔर जो निपट भौतिकतावादी हैं, वे मानते हैं कि प्रकृति ही इसका अन्तिम कारण है।

"

अप्रतर्क्यादनिर्देश्यादिति केष्वपि निश्चय: ।

अत्रानुरूपं राजर्षे विमृश स्वमनीषया ॥

२०॥

अप्रतर्क्यातू-तर्कशक्ति से परे; अनिर्देश्यात्‌--चिन्तन-शक्ति से परे; इति--इस प्रकार; केषु--कोई; अपि--भी; निश्चय: --निश्चित रूप से; अत्र--यहाँ पर; अनुरूपम्‌--उनमें से सही, उचित; राज-ऋषे--हे राजर्षि; विमुश--अपने आप निर्णय लो;स्व--अपनी; मनीषया--बुद्धि की शक्ति द्वारा।

कुछ ऐसे भी चिन्तक हैं, जिनका विश्वास है कि न तो तर्क द्वारा कष्ट का कारण निश्चितकिया जा सकता है, न उसे कल्पना से जाना जा सकता है, न ही शब्दों द्वारा उसे व्यक्त किया जासकता है।

हे राजर्षि, आप अपनी बुद्धि से यह सब सोचकर अपने आप निर्णय करें।

"

सूत उवाचएवं धर्मे प्रवदति स सम्राड्‌ द्विजसत्तमा: ।

समाहितेन मनसा विखेद: पर्यचष्ट तमू ॥

२१॥

सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; एवम्‌--इस तरह; धर्मे--साक्षात्‌ धर्म; प्रवदति--इस तरह बोलकर; सः--वह; सम्राट्‌--राजा; द्विज-सत्तमा:-हे ब्राह्मणों में श्रेष्ठ; समाहितेन-- ध्यानपूर्वक; मनसा--मन से; विखेद:--किसी त्रुटि के बिना; पर्यचष्ट --प्रत्युत्तर दिया; तम्--उसको

सूत गोस्वामी ने कहा : हे ब्राह्मणों में श्रेष्ठ, धर्म को इस तरह बोलते सुनकर, सप्राट परीक्षितअत्यन्त सन्तुष्ट हुए और बिना किसी त्रुटि या खेद के उन्होंने इस तरह उत्तर दिया।

"

राजोवाचधर्म ब्रवीषि धर्मज्ञ धर्मोडउसि वृषरूपधृक्‌ ।

यद॒धर्मकृतः स्थानं सूचकस्यापि तद्धवेत्‌ ॥

२२॥

राजा उवाच--राजा ने कहा; धर्मम्‌-- धर्म; ब्रवीषि--जैसा तुम कहते हो; धर्म-ज्ञ--हे धर्म के नियमों को जाननेवाले; धर्म:--साक्षात्‌ धर्म; असि--तुम हो; वृष-रूप-धृक्‌ --बैल के वेश में; यत्‌--जो भी; अधर्म-कृतः--अधर्म करता है; स्थानम्‌--स्थान;सूचकस्य--पहचान करनेवाले का; अपि-- भी; तत्‌--वह; भवेत्‌--हो जाता है।

राजा ने कहा : अहो! तुम तो बैल के रूप में हो।

तुम तो धर्म के सत्य को जानते हो और तुमसिद्धान्त के अनुसार बोल रहे हो कि अधार्मिक कर्मों के अपराधी के लिए वांछित गन्तव्य( गति ) वही है, जो उस अपराधी की पहचान करनेवाले की है।

तुम साक्षात्‌ धर्म के अतिरिक्तअन्य कोई नहीं हो।

"

अथवा देवमायाया नूनं गतिरगोचरा ।

चेतसो वचसश्वापि भूतानामिति निश्चय: ॥

२३॥

अथवा--या कि; देव-- भगवान्‌; मायाया: --शक्तियाँ; नूनम्-- अत्यन्त न्यून; गति:--चाल; अगोचरा-- अचिन्त्य; चेतस:--यातो मन से; वचस:--वाणी से; च--अथवा; अपि-- भी; भूतानाम्‌--सभी जीवों का; इति--इस प्रकार; निश्चय:--निष्कर्षनिकला।

इस प्रकार निष्कर्ष यह निकलता है कि भगवान्‌ की शक्तियाँ अचिन्त्य हैं।

कोई न तोमानसिक चिन्तन द्वारा, न ही शब्द-चातुरी द्वारा उनका अनुमान लगा सकता है।

"

तप: शौचं दया सत्यमिति पादा: कृते कृता: ।

अधर्माशैख्नयों भग्ना: स्मयसड्रमदैस्तव ॥

२४॥

तपः--तपस्या; शौचम्‌--पवित्रता; दया--दया; सत्यम्‌--सत्यता; इति--इस प्रकार; पादा:--पैर; कृते--सत्ययुग में; कृता:--स्थापित; अधर्म--अधर्म; अंशै:--अंशों द्वारा; त्रय:--तीनों मिलकर; भग्ना: --टूटे हुए; स्मय--अहंकार; सड्भ--अत्यधिकस्त्री-प्रसंग; मदेः--नशे से; तब--तुम्हारा

सत्ययुग में तुम्हारे चारों पैर तपस्या, पवित्रता, दया तथा सचाई के चार नियमों द्वारा स्थापितथे।

किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि अहंकार, कामवासना तथा नशे के रूप में सर्वत्र व्याप्त अधर्मके कारण तुम्हारे तीन पाँव टूट चके हैं।

"

इदानीं धर्म पादस्ते सत्य॑ निर्वर्तयेद्यत: ।

तं जिघृक्षत्यधर्मोड्यमनृतेनैधित: कलि: ॥

२५॥

इदानीमू--इस समय; धर्म--हे धर्मरूप; पादः--पाँव; ते--तुम्हारा; सत्यम्‌--सत्य; निर्वर्तयेतू--किसी तरह जीना; यतः--जिससे; तम्‌--उसको; जिधृक्षति--नष्ट करने का प्रयत्न करता है; अधर्म:--अधर्म रूप; अयम्--यह; अनृतेन--छल से, असत्यसे; एधितः--बढ़ता हुआ; कलिः--साक्षात्‌ कलि ( कलह )

अब तुम केवल एक पाँव पर खड़े हो, जो तुम्हारा सत्य है और तुम अब किसी न किसी तरहसे जी रहे हो।

किन्तु छल से फूलने-फलने वाला यह कलह-रूप कलि उस पाँव को भी नष्टकरना चाह रहा है।

"

इयं च भूमिर्भगवता न्‍्यासितोरुभरा सती ।

श्रीमद्धिस्तत्पदन्यासै: सर्वतः कृतकौतुका ॥

२६॥

इयमू--यह; च--तथा; भूमि: --पृथ्वी की सतह; भगवता-- भगवान्‌ द्वारा; न्‍्यासित--स्वयं तथा अन्यों के द्वारा सम्पन्न; उरू--भारी; भरा--बोझ; सती--ऐसा करने पर; श्रीमद्धिः--सर्व कल्याणकारी द्वारा; तत्‌--वह; पद-न्यासैः --पदचिद्व द्वारा;सर्वत:ः--चारों ओर; कृत--किया गया; कौतुका--सौभाग्य |

निश्चय ही, पृथ्वी का बोझ भगवान्‌ द्वारा तथा अन्‍न्यों द्वारा भी कम किया गया था।

जब वेअवतार के रूप में विद्यमान थे, तो उनके शुभ पदचिदह्लों द्वारा समस्त कल्याण सम्पन्न होता था।

"

शोचत्यश्रुकला साध्वी दुर्भगेवोज्झिता सती ।

अब्रह्मण्या नृपव्याजा: शूद्रा भोक्ष्यन्ति मामिति ॥

२७॥

शोचति--शोक करती है; अश्रु-कला--आँखों में अश्रु भर; साध्वी--सती; दुर्भपगा-- अत्यन्त अभागी; इब--सहश; उज्झिता--त्यक्ता; सती--ऐसा किये जाने पर; अब्नह्मण्या:--ब्राह्मण संस्कृति से विहीन; नृप-व्याजा:--शासक के बहाने; शूद्रा:--निम्नजाति; भोक्ष्यन्ति-- भोग करेंगे; माम्‌--मुझको; इति--इस प्रकार।

अब यह सती दुर्भाग्यवश भगवान्‌ द्वारा परित्यक्त होने के कारण, अपने नेत्रों में अश्रु भरकरअपने भविष्य ( भाग्य ) के लिए शोक कर रही है, क्योंकि अब वह शासक के जैसा स्वाँग करनेवाले निम्न जाति के पुरुषों द्वारा शासित तथा भोग्य है।

"

इति धर्म महीं चैव सान्त्वयित्वा महारथ: ।

निशातमाददे खड्गं कलये धर्महेतवे ॥

२८॥

इति--इस प्रकार; धर्मम्‌--धर्म को; महीम्‌--पृथ्वी को; च-- भी; एब--जिस तरह; सान्त्वयित्वा--सान्त्वना देकर; महा-रथः--हजारों से अकेले लड़ने-वाला सेनापति, महारथी; निशातम्‌--तेज; आददे--ले लिया; खड्गम्‌--तलवार; कलये--'कलि को मारने के लिए; अधर्म--अधर्म के; हेतबे--मूल कारण ।

इस प्रकार, एक साथ हजार शत्रुओं से अकेले लड़ सकनेवाले महाराज परीक्षित ने धर्म तथापृथ्वी को सान्त्वना दी।

तब उन्होंने समस्त अधर्म के कारण साक्षात्‌ कलि को मारने के लिएअपनी तेज तलवार निकाल ली।

"

तंजिघांसुमभिप्रेत्म विहाय नृपलाउ्छनम्‌ ।

तत्पादमूलं शिरसा समगाद्‌ भयविहल: ॥

२९॥

तम्‌--उसको; जिघांसुमू-मारने के लिए इच्छुक; अभिप्रेत्य--ठीक से जानते हुए; विहाय--छोड़कर; नृप-लाज्छनम्‌-राजा केवेश को; तत्‌-पाद-मूलम्‌--उसके चरणों पर; शिरसा--सिर के बल; समगात्‌--पूर्ण रूप से शरणागत; भय-विहल:--भयभीत।

जब कलि ने समझ लिया कि राजा उसको मार डालना चाह रहा है, तो उसने तुरन्त राजा कावेश त्याग दिया और भयभीत होकर अपना सिर झुका कर पूर्णरूप से उनके समक्ष आत्म-समर्पण कर दिया।

"

पतितं पादयोर्वीर: कृपया दीनवत्सल: ।

शरण्यो नावधीच्छलोक्य आह चेदं हसन्निव ॥

३०॥

पतितम्--गिरा हुआ; पादयो: --पैरों पर; वीर:--वीर; कृपया--कृपावश; दीन-वत्सलः--दान के प्रति दयालु; शरण्य:--जोशरण स्वीकार करने में योग्य है, शरणागत का रक्षक; न--नहीं; अवधीत्‌--बध किया; शलोक्य:--जो गायन किये जाने योग्यहै; आह--कहा; च--भी; इृदम्‌--यह; हसन्‌--मुसकाते हुए; इब--सहश

शरणागत के रक्षक तथा इतिहास में प्रशंसनीय महाराज परीक्षित ने उस दीन शरणागत तथा'पतित कलि को मारा नहीं, अपितु वे दयापूर्वक हँसने लगे, क्योंकि वे दीनवत्सल जो हैं।

"

राजोवाचन ते गुडाकेशयशोधराणांबद्धाझलेवें भयमस्ति किद्ञित्‌ ।

न वर्तितव्यं भवता कथञ्जनक्षेत्रे मदीये त्वमधर्मबन्धु: ॥

३१॥

राजा उबाच--राजा ने कहा; न--नहीं; ते--तुम्हारा; गुडाकेश-- अर्जुन; यशः-धराणाम्--यश पाने वालों का; बद्ध-अज्जलेः--हाथ जोड़कर; बै--निश्चय ही; भयम्‌-- भय; अस्ति--है; किल्जित्--तनिक भी; न--न तो; वर्तितव्यम्--रहने केलिए अनुमति दी जा सकती है; भवता--तुम्हारे द्वारा; कथज्ञन--सभी तरह से; क्षेत्रे--पृथ्वी पर; मदीये--मेरे राज्य में; त्वम्--तुम; अधर्म-बन्धु:--अधर्म के मित्र |

राजा ने इस प्रकार कहा : हम अर्जुन के यश के उत्तराधिकारी हैं और चूँकि तुम हाथजोड़कर मेरी शरण में आये हो, अतएव तुम्हें अपने प्राणों का भय नहीं होना चाहिए।

लेकिन तुममेरे राज्य में रह नहीं सकते, क्योंकि तुम अधर्म के मित्र हो।

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त्वां वर्तमानं नरदेवदेहे-घ्वनुप्रवृत्तोयमधर्मपूग: ।

लोभोनृतं चौर्यमनार्यमंहोज्येष्ठा च माया कलहश्व दम्भ: ॥

३२॥

त्वामू-तुमको; वर्तमानम्‌--उपस्थित; नर-देव--हे नर-देवता या राजा; देहेषु--की देह में; अनुप्रवृत्त:--सर्वत्र घटित होकर;अयम्‌--ये सारे; अधर्म--अधर्म; पूग:--जनमसूह में; लोभ:--लोभ; अनृतम्‌--असत्य; चौर्यमू--डकैती; अनार्यम्‌--अशिष्टता; अंह:--विश्वासघात; ज्येष्टा--दुर्भाग्य; च--तथा; माया--छल; कलह:--झगड़ा; च--तथा; दम्भ:--घमंड

यदि कलि रूपी अधर्म को नर-देवता अर्थात्‌ किसी कार्यकारी प्रशासक के रूप में कर्मकरने दिया जाता है, तो निश्चय ही लोभ, असत्य, डकैती, अशिष्टता, विश्वासघात, दुर्भाग्य,कपट, कलह तथा दम्भ जैसे अधर्म का बोलबाला हो जायेगा।

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न वर्तितव्यं तदधर्मबन्धोधर्मेण सत्येन च वर्तितव्ये ।

ब्रह्मावर्ते यत्र यजन्ति यज्जै-यज्ञेश्वरं यज्ञवितानविज्ञा: ॥

३३॥

न--नहीं; वर्तितव्यम्‌--बने रहने के योग्य; तत्--अतएव; अधर्म--अधर्म; बन्धो--मित्र; धर्मेण-- धर्म से; सत्येन--सत्य से;च--भी; वर्तितव्ये--स्थित होकर; ब्रह्म-आवर्ते --वह स्थान जहाँ यज्ञ सम्पन्न हो; यत्र--जहाँ; यजन्ति--ठीक से करते हैं;यज्जैः:--यज्ञ या भक्ति से; यज्ञ-ई श्वरमू-- भगवान्‌ को; यज्ञ-यज्ञ; वितान--फैलते हुए; विज्ञा:--पटु लोग।

अतएव, हे अधर्म के मित्र, तुम ऐसे स्थान में रहने के योग्य नहीं हो जहाँ पर बड़े-बड़ेपण्डित पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ को प्रसन्न करने के लिए सत्य तथा धार्मिक नियमों के अनुसारयज्ञ करते हैं।

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यस्मिन्‌ हरिभर्भगवानिज्यमानइज्यात्ममूर्तिर्यजतां शं॑ तनोति ।

कामानमोधान्‌ स्थिरजज्गभमाना-मन्तर्बहिर्वायुरिवेष आत्मा ॥

३४॥

यस्मिन्‌--ऐसे यज्ञोत्सवों में; हरिः--परमे श्वर; भगवान्‌-- भगवान्‌; इज्यमान: -- पूजित होकर; इज्य-आत्म--समस्त पूज्य देवों केआत्मा; मूर्तिः--रूपों में; यजताम्--पूजा करनेवाले; शम्--कल्याण; तनोति--फैलाता है; कामान्--इच्छाएँ; अमोघान्‌--अचूक; स्थिर-जड्रमानाम्‌--समस्त चरों तथा अचरों का; अन्तः-- भीतर; बहिः--बाहर; वायु:--वायु; इब--सहृश; एब:--सबों का; आत्मा--आत्मा ।

समस्त यज्ञोत्सवों में यद्यपि कभी-कभी कोई देवता की पूजा की जाती है, लेकिन पूर्णपुरुषोत्तम भगवान्‌ को इसलिए पूजा जाता है, क्योंकि वे प्रत्येक के अन्तरात्मा हैं और वायु केसमान भीतर तथा बाहर विद्यमान रहते हैं।

इस तरह केवल वे ही हैं, जो पूजा करने वाले कासमग्र कल्याण करते हैं।

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सूत उवाचपरीक्षितैवमादिष्ट: स कलिर्जातवेपथु: ।

तमुद्यतासिमाहेदं दण्डपाणिमिवोद्यतम्‌ ॥

३५॥

सूतः उबाच-- श्री सूत गोस्वामी ने कहा; परीक्षिता--महाराज परीक्षित द्वारा; एवम्‌--इस प्रकार; आदिष्ट:--आदेश दिये जानेपर; सः--वह; कलि:--साक्षात्‌ कलि; जात--हुआ; वेपथु:--कम्पन; तम्‌--उसको; उद्यत--उठी हुई; असिमू--तलवार;आह--कहा; इृदम्‌--यह; दण्ड-पाणिम्--यमराज, मृत्युरूप को; इब--सहश; उद्यतम्‌--प्रायः तैयार।

श्री सूत गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार महाराज परीक्षित द्वारा आदेश दिये जाने पर कलिभय के मारे थरथराने लगा।

राजा को अपने समक्ष यमराज के समान मारने के लिए उद्यतदेखकर कलि ने राजा से इस प्रकार कहा।

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कलिरुवाचयत्र क्न वाथ वत्स्यामि सार्वभौम तवाज्ञया ।

लक्षये तत्र तत्रापि त्वामात्तेषुशरासनम्‌ ॥

३६॥

'कलिः उवाच--कलि ने कहा; यत्र--जहाँ कहीं; क्र--तथा कहीं भी; वा--अथवा; अथ--फलस्वरूप; वत्स्यामि--वासकरूँगा; सार्व-भौम--हे पृथ्वी के स्वामी ( सम्राट ); तब--तुम्हारे; आज्ञ़या--आदेश से; लक्षये--देखता हूँ; तत्र तत्र--वहाँ-वहाँ; अपि-- भी; त्वामू--आपको; आत्त--लिये; इषु--बाण; शरासनम्--धनुष ।

हे राजा, मैं आपकी आज्ञा से चाहे जहाँ कहीं भी रहूँ और जहाँ कहीं भी देखूँ, वहाँ केवलआपको ही धनुष-बाण लिए देखूँगा।

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तन्मे धर्मभृतां श्रेष्ठ स्थान निर्देश्रमर्हसि ।

यत्रैव नियतो वत्स्य आतिष्ठंस्तेडनुशासनम्‌ ॥

३७॥

तत्‌--अतः; मे--मेरा; धर्म-भूताम्‌--धर्म के समस्त रक्षकों में से; श्रेष्ठ--हे प्रमुख; स्थानम्‌--स्थान; निर्देष्टम--निश्चित करने केलिए; अहंसि--आप समर्थ हैं; यत्र--जहाँ; एब--निश्चय ही; नियत:--सदैव; वत्स्ये--रह सकूँ; आतिष्ठन्‌--स्थायी रूप सेस्थित; ते--आपका; अनुशासनम्‌--आपके शासन में |

अतएव हे धर्मरक्षकों में श्रेष्ठ, कृपा करके मेरे लिए कोई स्थान निश्चित कर दें, जहाँ मैंआपके शासन के संरक्षण में स्थायी रूप से रह सकूँ।

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सूत उवाचअभ्यर्थितस्तदा तस्मै स्थानानि कलये ददौ ।

झूतं पान॑ स्त्रिय: सूना यत्राधर्मश्चतुर्विध: ॥

३८॥

सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; अभ्यर्थित: --इस प्रकार से निवेदित; तदा--उस समय; तस्मै--उसको; स्थानानि--स्थानोंको; कलये--कलि को; ददौ--अनुमति प्रदान की; द्यूतमू--जुआ खेलना; पानम्‌--मद्यपान; स्त्रिय:--स्त्रियों से अवैध सम्बन्ध;सूना--पशु बध; यत्र--जहाँ भी; अधर्म:--पाप कर्म; चतु:-विध:--चार प्रकार के

सूत गोस्वामी ने कहा : कलियुग द्वारा इस प्रकार याचना किये जाने पर महाराज परीक्षित नेउसे ऐसे स्थानों में रहने की अनुमति दे दी, जहाँ जुआ खेलना, शराब पीना, वेश्यावृत्ति तथापशु-वध होते हों।

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पुनश्च याचमानाय जातरूपमदात्प्रभु: ।

ततोअनृतं मदं काम॑ रजो वैरं च पञ्चमम्‌ ॥

३९॥

पुन:--फिर; च-- भी; याचमानाय--भिक्षुक को; जात-रूपम्‌--सोना; अदात्--दिया; प्रभुः--राजा ने; ततः--जिससे;अनृतम्--असत्य; मदम्‌--नशा; कामम्‌--विषयवासना; रज:--रजोगुण के कारण; बैरम्‌--शत्रुता; च--तथा; पञ्ञमम्‌--पाँचवाँ।

कलि ने जब कुछ और याचना की, तो राजा ने उसे उस स्थान में रहने की अनुमति प्रदान कीजहाँ सोना उपलब्ध हो, क्योंकि जहाँ-जहाँ स्वर्ण होता है, वहीं-वहीं असत्य, मद, काम, ईर्ष्यातथा वैमनस्य रहते हैं।

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अमूनि पद्च स्थानानि ह्यधर्मप्रभव: कलि: ।

औत्तरेयेण दत्तानि न्यवसत्‌ तन्निदेशकृत्‌ ॥

४०॥

अमूनि--ये सब; पश्ञ--पाँच; स्थानानि--स्थान; हि--निश्चय ही; अधर्म--अधर्म को; प्रभव:--प्रोत्साहन देनेवाले; कलि:--कलियुग; औत्तरेयेण--उत्तरा के पुत्र द्वारा; दत्तानि--दिये गये; न्‍्यवसत्‌--रहने लगा; तत्‌--उसके द्वारा; निदेश-कृत्‌--आदेशपाकर

इस प्रकार उत्तरा के पुत्र, महाराज परीक्षित के निर्देश से कलि को उन पाँच स्थानों में रहनेकी अनुमति मिल गई।

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अथैतानि न सेवेत बुभूषु: पुरुष: क्षचित्‌ ।

विशेषतो धर्मशीलो राजा लोकपतिर्गुरु; ॥

४१॥

अथ--अतएव; एतानि--इन सबों को; न--कभी नहीं; सेवेत--सम्पर्क में आए; बुभूषु;--भलाई चाहनेवाले; पुरुष: --पुरुष;क्चित्--किसी भी दशा में; विशेषतः--विशेष रूप से; धर्म-शील:--मुक्ति पथ पर अग्रसर होनेवाले; राजा--राजा; लोक-पतिः--जननेता; गुरु:--ब्राह्मण तथा संन्यासी-गण ।

अतएव जो कोई भी, विशेष रूप से जो राजा, धर्मोपदेशक, जननेता, ब्राह्मण तथा संन्‍्यासीजो अपनी भलाई चाहते हैं, उन्हें उपर्युक्त चार अधार्मिक कार्यो के सम्पर्क में कभी नहीं आना चाहिए।

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वृषस्य नष्टांसत्रीन्‌ पादान्‌ तप: शौच दयामिति ।

प्रतिसन्दध आश्वास्य महीं च समवर्धयत्‌ ॥

४२॥

वृषस्य--( धर्मरूप ) बैल का; नष्टान्‌--विनष्ट; त्रीनू--तीन; पादान्‌--पाँवों को; तपः--तपस्या; शौचम्‌-- स्वच्छता; दयाम्‌--दया; इति--इस प्रकार; प्रतिसन्दधे--पुनः स्थापित किया; आश्वास्य--आश्वासन देकर; महीम्‌--पृथ्वी को; च--तथा;समवर्धयत्‌--सुधार किया।

तत्पश्चात्‌ राजा ने धर्म-रूप बैल के विनष्ट पैरों को पुनःस्थापित किया और आश्वासनदेनेवाले कार्यो से पृथ्वी की दशा में काफी सुधार किये।

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स एष एतर्ह्मध्यास्त आसन पार्थिवोचितम्‌ ।

पितामहेनोपन्यस्तं राज्ञारण्यं विविक्षता ॥

४३॥

आस्तेधुना स राजर्षि: कौरवेन्द्रश्रयोल्लसन्‌ ।

गजाह्ये महाभागश्चक्रवर्ती बृहच्छुवा: ॥

४४॥

सः--वह; एष:--यह; एतहि--इस समय; अध्यास्ते--शासन कर रहा है; आसनमू्‌--सिंहासन; पार्थिव-उचितम्‌--राजा केलिए योग्य; पितामहेन--पितामह द्वारा; उपन्यस्तम्‌--हस्तान्तरित होकर; राज्ञा--राजा द्वारा; अरण्यमू--वन; विविक्षता--इच्छुक; आस्ते-- है; अधुना--इस समय; सः--वह; राज-ऋषि:--राजर्षि; कौरव-इन्द्र--कुरु राजाओं में प्रमुख; भ्रिया--यश;उल्लसन्‌-फैलते हुए; गजाह्ये--हस्तिनापुर में; महा-भाग: --सर्वाधिक भाग्यशाली; चक्रवर्ती--सम्राट; बृहत्‌-श्रवा: --अत्यन्त विख्यात।

वे ही सर्वाधिक भाग्यशाली सम्राट महाराज परीक्षित, जिन्हें महाराज युधिष्ठिर ने वन जातेसमय हस्तिनापुर का राज्य सौंपा था, अब कुरुवंशी राजाओं के कार्यों से ख्याति प्राप्त करकेअत्यन्त सफलतापूर्वक संसार पर शासन कर रहे हैं।

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इत्थम्भूतानुभावोयमभिमन्युसुतो नृप: ।

यस्य पालयत: क्षौणीं यूयं सत्राय दीक्षिता: ॥

४५॥

इत्थम्‌-भूत--इस प्रकार हुआ; अनुभाव:--अनुभव; अयम्‌--इसका; अभिमन्यु-सुतः--अभिमन्यु का पुत्र; नूप: --राजा;यस्य--जिसका; पालयत:--अपने शासन के कारण; क्षौणीम्‌--पृथ्वी पर; यूयम्‌--तुम सब; सत्राय--यज्ञ सम्पन्न करने केलिए; दीक्षिता:--दीक्षित हुए।

अभिमन्यु पुत्र, महाराज परीक्षित, इतने अनुभवी हैं कि उनके पटु शासन तथा संरक्षकत्व केबल पर तुम सब इस प्रकार का यज्ञ सम्पन्न कर रहे हो।

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