← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 1 की सूची
अध्याय तेरह: धृतराष्ट्र ने घर छोड़ दिया
1.13सूत उवाचविदुरस्तीर्थयात्रायां मैत्रेयादात्मनो गतिम् ।
ज्ञात्वागाद्धास्तिनपुरं तयावाप्तविवित्सित: ॥
१॥
सूतः उबाच-- श्री सूत गोस्वामी ने कहा; विदुरः:--विदुर; तीर्थ-यात्रायाम्-विभिन्न तीर्थ स्थानों की यात्रा करते हुए; मैत्रेयात्--महर्षि मैत्रेय से; आत्मन:--अपनी, स्व की; गतिम्--गति, गन्तव्य; ज्ञात्वा--जानकर; अगातू--लौट आया; हास्तिनपुरम्--हस्तिनापुर नगरी में; तया--उस ज्ञान से; अवाप्त--प्रचुर लाभ उठाने वाला; विवित्सित: --प्रत्येक ज्ञेय विषय में निष्णात
श्री सूत गोस्वामी ने कहा : तीर्थयात्रा करते हुए विदुर ने महर्षि मैत्रेय से आत्मा की गति काज्ञान प्राप्त किया और फिर वे हस्तिनापुर लौट आये।
वे अपेक्षानुसार इस विषय में पारंगत हो गये।
"
यावत: कृतवान् प्रश्नान् क्षत्ता कौषारवाग्रत: ।
जातैकभक्तिग विन्दे तेभ्यश्रोपररम ह ॥
२॥
यावत:--वह सब; कृतवान्-- उन्होंने किये; प्रश्नान्-- प्रश्न; क्षत्ता--विदुर का नाम; कौषारब--मैत्रेय का नाम; अग्रत:--कीउपस्थिति में; जात-- बड़े होकर; एक--एक; भक्ति:--दिव्य प्रेममयी सेव; गोविन्दे-- भगवान् कृष्ण की; तेभ्य:--अगले प्रश्नोंके सम्बन्ध में; च--तथा; उपरराम--विराम ले लिया; ह-- भूतकाल में |
विविध प्रश्न पूछने के बाद तथा भगवान् कृष्ण की दिव्य प्रेमामयी सेवा में स्थिर हो चुकनेपर, विदुर ने मैत्रेय मुनि से प्रश्न पूछना बन्द किया।
"
त॑ बन्धुमागतं दृष्टा धर्मपुत्र: सहानुज: ।
धृतराष्ट्रो युयुत्सुश्व सूत: शारद्वत: पृथा ॥
३॥
गान्धारी द्रौपदी ब्रह्मन् सुभद्रा चोत्तरा कृपी ।
अन्याश्व जामय: पाण्डोज्ञातिय: ससुता: स्त्रिय: ॥
४॥
तम्--उस; बन्धुम्--सम्बन्धी को; आगतम्--वहाँ आया हुआ; हृष्ठा--देखकर; धर्म-पुत्र:--युधिष्ठटिर ने; सह-अनुज:--अपनेछोटे भाइयों के साथ; धृतराष्ट्र: --धधृतराष्ट्र; युयुत्सु:--सात्यकि; च--तथा; सूत:--संजय; शारद्वतः--कृपाचार्य; पृथा--कुन्ती;गान्धारी --गान्धारी; द्रौपदी--द्रौपदी; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मणों; सुभद्रा--सुभद्रा; च--तथा; उत्तरा--उत्तरा; कृपी --कृपी; अन्या: --अन्य लोग; च--तथा; जामय: --अन्य परिवारवालों की पत्लियाँ; पाण्डो:--पाण्डुओं की; ज्ञातयः--पारिवारिक सदस्य; स-सुता:--अपने-अपने पुत्रों सहित; स्त्रिय:--स्त्रियाँ ।
जब उन्होंने देखा कि विदुर राजमहल लौट आये हैं, तो--महाराज युधिष्टिर, उनके छोटेभाई, धृतराष्ट्र, सात्यकि, संजय, कृपाचार्य, कुन्ती, गान्धारी, द्रौपदी, सुभद्रा, उत्तरा, कृपी,कौरवों की अन्य पत्नियाँ तथा अपने-अपने बच्चों के साथ स्त्रियों समेत सारे निवासी--सभी अत्यन्त हर्षित होकर तेजी से उनकी ओर बढ़े।
ऐसा प्रतीत हुआ मानो उन्होंने दीर्घकाल के बादअपनी चेतना फिर से प्राप्त की हो।
"
प्रत्युज्जग्मु: प्रहर्षेण प्राणं तन््व इवागतम् ।
अभिसड्रम्य विधिवत् परिष्वज्ञभिवादनै: ॥
५॥
प्रति--की ओर; उज्जग्मु;--गया; प्रहर्षण--अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक; प्राणम्--जीवन, प्राण; तन््वः--शरीर का; इब--सहृश;आगतम्--वापस आया; अभिसड्डम्य--निकट जाकर; विधि-वत्--अच्छी तरह से; परिष्वड्र--आलिंगन; अभिवादनै: --अभिवादन ( प्रणाम ) द्वारा,वे सब परम प्रसन्नतापूर्वक उनके निकट गये, मानो उनके शरीरों में फिर से प्राण का संचारहुआ हो।
उन्होंने एक दूसरे को प्रणाम किया और गले मिलते हुए एक दूसरे का स्वागत किया।
"
मुमुचु: प्रेमबाष्पौधं विरहौत्कण्ठ्यकातरा: ।
राजा तमर्हयाझ्क्रे कृतासनपरिग्रहम् ॥
६॥
मुमुचु:--छोड़ा; प्रेम--प्रेम के; बाष्प-ओघम्-- भावुकता के अश्रु; विरह--वियोग; औत्कण्ठ्य--उत्कण्ठा, उत्सुकता;कातराः--दुखी; राजा--राजा युधिष्टिर; तम्--उसको ( विदुर को ); अईयाम् चक्रे -- प्रदान किया; कृत--किया गया;आसन--बैठने का स्थान; परिग्रहम्--व्यवस्था |
चिन्ता तथा लम्बे वियोग के कारण, वे सब प्रेम-विवश होकर रूदन करने लगे।
तब राजा युधिष्ठटिर ने उनके बैठने के लिए आसन की व्यवस्था की और उनका सत्कार किया।
"
त॑ भुक्तवन्तं विश्रान्तमासीनं सुखमासने ।
प्रश्रयावनतो राजा प्राह तेषां च श्रुण्वताम् ॥
७॥
तम्--उसको ( विदुर को ); भुक्तवन्तम्--ठीक से भोजन कराकर; विश्रान्तम्-तथा विश्राम कराके; आसीनम्--बैठाकर;सुखम् आसने--सुखद आसन पर; प्रश्रय-अवनत:--स्वाभाविक रूप से अत्यन्त भद्र तथा विनीत; राजा--राजा युधिष्ठिर ने;प्राह--बोलना प्रारम्भ किया; तेषाम् च--तथा उनके द्वारा; श्रृण्वतामू--सुना जाकर।
जब विदुर ठीक से भोजन कर चुके और पर्याप्त विश्राम कर लेने पर उन्हें सुखदायक आसनपर बिठाया गया।
तब राजा ने उनसे बोलना शुरू किया और वहाँ पर उपस्थित सारे लोग सुननेलगे।
"
युधिष्टिर उवाचअपि स्मरथ नो युष्मत्पक्षच्छायासमेधितान् ।
विपद्गणाद्विषाग्न्यादेमोचिता यत्समातृका: ॥
८॥
युधिष्ठिर: उवाच--महाराज युधिष्ठिर ने कहा; अपि-- क्या; स्मरथ-- आपको स्मरण है; न:--हमको; युष्पत्-- आपसे; पक्ष--पक्षियों के पंखों सहश हमारे प्रति पक्षपात; छाया--संरक्षण; समेधितान्-- आपके द्वारा पाले गये हम सबों द्वारा; विपतू-गणात्--विभिन्न प्रकार की विपत्तियों से; विष--विष-रूप शासन द्वारा; अग्नि-आदे:--अग्नि-काण्ड आदि से; मोचिता: --छुटकारा दिलाया; यत्--आपने जो किया; स--सहित; मातृका: --हमारी माता ।
महाराज युधिष्ठटिर ने कहा : हे चाचा, क्या आपको याद है कि आपने किस तरह सदा हमारीमाता तथा हम सबकी समस्त प्रकार की विपत्तियों से रक्षा की है? आपके पक्षपात ने, पक्षियोंके पंखों के समान, हमें विष-पान तथा अग्निदाह से बचाया है।
"
कया वृत्त्या वर्तितं वश्चरद्धि: क्षितिमण्डलम् ।
तीर्थानि क्षेत्रमुख्यानि सेवितानीह भूतले ॥
९॥
कया--किन; वृत्त्या--साधनों से; वर्तितम्--जीविका चलाते रहे; वः--आप; चरद्धिः--विचरण करते हुए; क्षिति-मण्डलम्--पृथ्वी पर; तीर्थानि--तीर्थ-स्थानों; क्षेत्र-सुख्यानि-- प्रमुख पवित्र स्थानों; सेवितानि--आपके द्वारा सेवित; इह--इससंसार में; भूतले--इस ग्रह में
पृथ्वी पर विचरण करते हुए, आपने अपनी जीविका कैसे चलाई ? आपने किन-किन पवित्रस्थलों तथा तीर्थस्थानों पर सेवा की ?"
भवद्विधा भागवतास्तीर्थभूता: स्वयं विभो ।
तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तःस्थेन गदाभृता ॥
१०॥
भवत्--आप; विधा:--जैसे; भागवता: -- भक्त; तीर्थ--तीर्थयात्रा के पवित्र स्थल; भूता:--बने हुए; स्वयम्--अपने आप;विभो-हे शक्तिमान; तीर्थी-कुर्वन्ति--तीर्थस्थान बनाते हैं; तीर्थानि--तीर्थस्थल; स्व-अन्त:-स्थेन--हृदय में स्थित होकर;गदा-भूता-- भगवान् के
हे प्रभु, आप जैसे भक्त, निश्चय ही, साक्षात् पवित्र स्थान होते हैं।
चूँकि आप भगवान् कोअपने हृदय में धारण किए रहते हैं, अतएव आप समस्त स्थानों को तीर्थस्थानों में परिणत करदेते हैं।
"
अपि नः सुहृदस्तात बान्धवा: कृष्णदेवता: ।
इृष्टा: श्रुत॒ वा यदव: स्वपुर्या सुखमासते ॥
११॥
अपि--क्या; न:--हमारे; सुहृदः--शुभचिन्तक; तात--हे चाचा; बान्धवा:--मित्र; कृष्ण-देवता:--भगवान् कृष्ण की सेवा मेंसदैव तत्पर रहनेवाले; दृष्टा:--उन्हें देखकर; श्रुताः:--या उनके विषय में सुनकर; वा--अथवा; यदव: --यदुवंशी लोग; स्व-पुर्यामू--अपने-अपने निवास-स्थानों में; सुखम् आसते--सुखी तो हैं ।
हे चाचा, आप द्वारका भी गये होंगे? उस पवित्र स्थान में यदुवंशी हमारे मित्र तथाशुभचिन्तक हैं, जो नित्य ही भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा में तत्पर रहते हैं।
आप उनसे मिले होंगेअथवा उनके विषय में सुना होगा ? वे अपने-अपने घरों में सुखपूर्वक रह रहे हैं न?"
इत्युक्तो धर्मराजेन सर्व तत् समवर्णयत् ।
यथानुभूतं क्रमशो विना यदुकुलक्षयम् ॥
१२॥
इति--इस प्रकार; उक्त: --पूछे जाने पर; धर्म-राजेन--राजा युधिष्टिर द्वारा; सर्वम्--सब कुछ; तत्--यह; समवर्णयत्--ठीक सेवर्णन किया; यथा-अनुभूतम्--जैसा उसने अनुभव किया था; क्रमशः --एक के बाद एक; विना--रहित; यदु-कुल-क्षयम्--यदुवंश का विनाश ।
महाराज युध्िषटिर द्वारा इस तरह पूछे जाने पर महात्मा विदुर ने क्रमश: सब कुछ कह सुनाया,जिसका उन्होंने स्वयं अनुभव किया था।
केवल यदुवंश के विनाश की बात उन्होंने नहीं कही।
"
नन्वप्रियं दुर्विषहं नृणां स्वयमुपस्थितम् ।
नावेदयत् सकरुणो दुः:खितानू द्रष्टरमक्षम: ॥
१३॥
ननु--निश्चय ही; अप्रियम्--अप्रिय; दुर्विषहम्-- असहा; नृणाम्--मानव जाति का; स्वयम्--अपने ढंग से; उपस्थितम्--प्राकट्य; न--नहीं; आवेदयत्--व्यक्त किया; सकरुण: --दयामय; दुःखितान्--दुखी जनों को; द्रष्टम[--देखने के लिए;अक्षम:--असमर्थ
दयावान महात्मा विदुर पाण्डवों को कभी भी दुखी नहीं देख सकते थे।
अतएव उन्होंने इसअप्रिय तथा असहा घटना को प्रकट नहीं होने दिया, क्योंकि आपदाएँ तो अपने आप आती हैं।
"
कदञ्जित्कालमथावात्सीत्सत्कृतो देववत्सुखम् ।
भ्रातुर्ज्येष्ठस्य श्रेयस्कृत्सवेंषां सुखमावहन् ॥
१४॥
कझञ्लित्--कुछ दिनों तक; कालमू--समय; अथ--इस प्रकार; अवात्सीत्--रहते रहे; सत्-कृत:--सम्मानित होने पर; देव-बत्--दैवी व्यक्ति के समान; सुखम्--सुविधाएँ; भ्रातु:-- भाई का; ज्येष्टस्थ--बड़े भाई का; श्रेयः-कृत्--उनके प्रति अच्छाईकरने के कारण; सर्वेषामू--आप सबों का; सुखम्--सुख; आवहनू--सम्भव बनाया।
इस प्रकार अपने कुदटुम्बियों द्वारा देवतुल्य सम्मानित होकर, महात्मा विदुर कुछ काल तकअपने बड़े भाई की मनोदशा को ठीक करने के लिए तथा इस प्रकार अन्य सबों को सुख देने केलिए वहाँ पर रहते रहे।
"
अबिबश्रदर्यमा दण्डं यथावदघकारिषु ।
यावद्दधार शुद्र॒त्वं शापाद्वर्षशतं यम: ॥
१५॥
अबिश्रतू-दिया गया; अर्यमा--अर्यमा; दण्डम्--दण्ड; यथावत्--समुचित; अघ-कारिषु--पाप करनेवालों को; यावत्--जबतक; दधार--स्वीकार किया; शूद्र॒त्वम्--शूद्र का शरीर; शापात्--शाप के फलस्वरूप; वर्ष-शतम्--सौ वर्षों तक; यम: --यमराज ।
मण्डूक मुनि के द्वारा शापित होकर, जब तक विदुर शूद्र का शरीर धारण किये रहे, तबतक पाप कर्म करने वालों को दण्डित करने के लिए यमराज के पद पर अर्यमा कार्य करते रहे।
"
युधिष्ठिरो लब्धराज्यो दृष्ठा पौत्रं कुलन्धरम् ।
भ्रातृभिलेंकपालाभेर्मुमुदे परया श्रिया ॥
१६॥
युधिष्ठिर: --युधिष्ठिर ने; लब्ध-राज्य: --अपने पैतृक राज्य का अधिकारी होकर; दृष्टा--देखकर; पौत्रमू--नाती को; कुलम्-धरम्--वंश के अनुकूल; भ्रातृभि:--भाइयों से; लोक-पालाभे: --जो सभी पटु प्रशासक थे; मुमुदे--जीवन का भोग किया;'परया--असामान्य; थिया--ऐश्वर्य से ।
अपना राज्य वापस पाकर तथा एक ऐसे पौत्र का जन्म देखकर, जो उनके परिवार कीप्रशस्त परम्परा को आगे चलाने में सक्षम था, महाराज युधिष्ठिर ने शान्तिपूर्वक शासन चलायाऔर उन छोटे भाइयों के सहयोग से, जो सारे के सारे कुशल प्रशासक थे, असामान्य ऐश्वर्य काभोग किया।
"
एवं गृहेषु सक्तानां प्रमत्तानां तदीहया ।
अत्यक्रामदविज्ञात: काल: परमदुस्तर: ॥
१७॥
एवम्--इस तरह; गृहेषु--घरेलू मामलों में; सक्तानाम्--अत्यन्त आसक्त पुरुषों के; प्रमत्तानामू--बेवकूफी से आसक्त; ततू-ईहया--ऐसे विचारों में निमग्न; अत्यक्रामत्--पार कर गया; अविज्ञात:--अनजाने; काल:--सनातन काल; परम--परम;दुस्तर:--दुर्लघ्य ।
जो लोग घरेलू मामलों में अत्यधिक लिप्त रहते हैं और उन्हीं के विचारों में मग्न रहते जाते हैं,उन्हें दुस्तर सनातन काल अनजाने ही धर दबोचता है।
"
विदुरस्तदभिप्रेत्य धृतराष्ट्रमभाषत ।
राजन्निर्गम्यतां शीघ्र पश्येद भयमागतम् ॥
१८॥
विदुरः--महात्मा विदुर ने; तत्--वह; अभिप्रेत्य--ठीक से जानकर; धृतराष्ट्रमू-- धृतराष्ट्र से; अभाषत--कहा; राजन्--हे राजा;निर्गम्यतामू--कृपा करके बाहर निकलें; शीघ्रम्--शीघ्र ही; पश्य--देखो; इृदम्--इस; भयम्-- भय को; आगतम्--पहले सेआया हुआ।
महात्मा विदुर यह सब जानते थे, अतएव उन्होंने धृतराष्ट्र को सम्बोधित करते हुए कहा : हेराजन, कृपा करके यहाँ से शीघ्र ही बाहर निकल चलिये।
विलम्ब न कीजिये।
जरा देखें तो,भय ने किस प्रकार आपको वशीभूत कर रखा है।
"
प्रतिक्रिया न यस्येह कुतश्चित्कर्हिचित्प्रभो ।
स एष भगवान् काल: सर्वेषां न: समागत: ॥
१९॥
प्रतिक्रिया--उपचार; न--नहीं है; यस्थ--जिसका; इह--इस भौतिक संसार में; कुतश्चित्--किसी प्रकार से भी; कर्हिचित्--या किसी के द्वारा; प्रभो--हे स्वामी; सः--वह; एष:--निश्चित रूप से; भगवान्-- भगवान्; काल:--शा श्वत काल; सर्वेषाम्--सबों का; नः--हम सबका; समागत:--आया हुआ।
इस भौतिक संसार में कोई भी व्यक्ति इस भयावह स्थिति का निराकरण नहीं कर सकता।
हेस्वामी, शाश्वत काल के रूप में, पूर्ण पुरूषोत्तम भगवान् हम सबों के पास आ पहुँचे हैं।
"
येन चैवाभिपन्नोयं प्राणै: प्रियतमैरपि ।
जनः सद्यो वियुज्येत किमुतान्यैर्धनादिभि: ॥
२०॥
येन--ऐसे काल द्वारा खींचा गया; च--तथा; एव--निश्चय ही; अभिपतन्न:--पकड़ में या प्रभाव में; अयम्--यह; प्राणैः --जीवन से; प्रिय-तमैः--जो सबों को अत्यन्त प्रिय है; अपि--यद्यपि; जन: --व्यक्ति; सद्यः--शीघ्र; वियुज्येत--त्याग दे; किम्उत अन्यैः--अन्य वस्तु के विषय में क्या कहा जाय; धन-आदिभि:--यथा धन, सम्मान, सन््तान, भूमि तथा घर।
जो भी सर्वोपरि काल ( शाश्रत समय ) के प्रभाव में है, उसे अपना सबसे प्रिय जीवन कालको अर्पित करना पड़ता है, अन्य वस्तुओं यथा धन, सम्मान, सन्तान, भूमि तथा घर का तो कुछकहना ही नहीं।
"
पितृश्रातृसुहत्पुत्रा हतास्ते विगतं वयम् ।
आत्मा च जरया ग्रस्त: परगेहमुपाससे ॥
२१॥
पितृ-पिता; भ्रातृ- भाई; सुहृत्--शुभचिन्तक ; पुत्रा:--पुत्र; हता:--सारे के सारे मृत; ते--आपके ; विगतम्--निःशेष;वयम्--आयु; आत्मा--शरीर; च-- भी; जरया--वृद्धावस्था से; ग्रस्त:--अभिभूत, परास्त; पर-गेहम्--दूसरे के घर;उपाससे--जमे रहते हो ।
आपके पिता, भाई, शुभचिन्तक तथा पुत्र सभी मर चुके हैं और दूर चले गये हैं।
आपनेस्वयं भी अपने जीवन का अधिकांश समय व्यतीत कर लिया है, अब आपके शरीर को बुढ़ापे नेआ दबोचा है और आप पराए घर में पड़े हुए हैं।
"
अन्ध: पुरैव वधिरो मन्दप्रज्ञाश्व साम्प्रतम् ।
विशीर्णदन्तो मन्दाग्नि: सराग: कफमुद्दहन् ॥
२२॥
अन्ध:--अंधा; पुरा--प्रारम्भ से; एब--निश्चय ही; वधिर:--बहरा; मन्द-प्रज्ञा:--कुन्द स्मृति; च--तथा; साम्प्रतम्--हाल हीमें; विशीर्ण--हिलते हुए; दन््त:--दाँत; मन्द-अग्नि:--यकृत की क्रिया का कम होना; स-राग:-- ध्वनि सहित; कफम्--कफ;उद्ददनू--निकलता हुआ।
आप जन्म से ही अश्धे रहे हैं और हाल ही में आप कुछ बहरे हो चुके हैं।
आपकी स्मृति कमहो गई है और आपकी बुद्धि विचलित हो गई है।
आपके दाँत हिल चुके हैं, आपका यकृतखराब हो चुका है और आपके कफ निकल रहा है।
"
अहो महीयसी जन्तोजीविताशा यथा भवान् ।
भीमापवर्जितं पिण्डमादत्ते गृहपालवत् ॥
२३॥
अहो--ओह; महीयसी --शक्तिमान; जन्तो: -- जीवों की; जीवित-आशा--जीवन की उम्मीद; यथा--जिस तरह; भवान्--आपहैं; भीम--भीमसेन ( युधिष्ठटिर के भाई ) के; अपवर्जितम्--जूठा; पिण्डम्-- भोजन; आदत्ते--खाया गया; गृह-पाल-वत्--घेरलू कुत्ते के समान
ओह! प्राणी में जीवित रहने की कितनी प्रबल इच्छा होती है! निश्चय ही आप एक घेरलूकुत्ते की भाँति रह रहे हैं और भीम द्वारा दिये गये जूठन को खा रहे हैं।
"
अग्निर्निसृष्टो दत्तश्च गरो दाराश्च दूषिता: ।
हत॑ क्षेत्र धनं येषां तदत्तैरसुभि: कियत् ॥
२४॥
अग्निः--अग्नि; निसूष्ट: --लगाया हुआ; दत्त:--दिया हुआ; च--तथा; गर: --विष; दारा: --विवाहिता स्त्री; च--तथा;दूषिता:--अपमानित; हतम्--बलपूर्वक छीना गया; क्षेत्रमू--राज्य; धनम्--सम्पत्ति; येषामू--जिनका; तत्--उनका; दत्तै: --दिया गया; असुभिः--जीने में; कियत्-- अनावश्यक है।
आपने अग्नि लगाकर तथा विष देकर जिन लोगों को मारना चाहा, उन्हीं के दान परआपको जीवित रहने तथा गिरा हुआ जीवन बिताने की आवश्यकता नहीं है।
उनकी एक पतलीको भी आपने अपमानित किया है और उनका राज्य तथा धन छीन लिया है।
"
तस्यापि तव देहोयं कृपणस्य जिजीविषो: ।
परैत्यनिच्छतो जीर्णो जरया वाससी इव ॥
२५॥
तस्यथ--उसका; अपि--के बावजूद; तब--तुम्हारा; देह:--शरीर; अयम्--यह; कृपणस्य--कंजूस का; जिजीविषो:--जीवनकी इच्छा करनेवाले का; परैति-- क्षीण हो जाएगा; अनिच्छत:--न चाहते हुए भी; जीर्ण:--टूटा-फूटा; जरया--पुराने;वाससी--वस्त्रों; इब--सहश।
मरने के लिए आपकी अनिच्छा होने तथा आत्म-सम्मान की बलि देकर जीवित रहने कीआपकी इच्छा होने पर भी, आपका यह कृपण शरीर निश्चय ही क्षीण होगा तथा पुराने वस्त्र कीभाँति नष्ट हो जाएगा।
"
गतस्वार्थमिमं देहं विरक्तो मुक्तबन्धन: ।
अविज्ञातगतिर्जह्यात् स वै धीर उदाहत: ॥
२६॥
गत-स्व-अर्थम्--ठीक से उपयोग किये बिना; इमम्--इस; देहम्-- भौतिक शरीर को; विरक्त:--अन्यमनस्क; मुक्त--मुक्तहोकर; बन्धन:--सारे बन्धनों से; अविज्ञात-गति: --अज्ञात लक्ष्य; जह्यात्--इस शरीर को त्याग देना चाहिए; सः--ऐसा व्यक्ति;वै--निश्चय ही; धीर:--अविचल; उदाहत:--कहलाता है।
वह धीर कहलाता है, जो किसी अज्ञात सुदूर स्थान को चला जाए और जब यह भौतिकशरीर व्यर्थ हो जाए, तब सारे बन्धनों से मुक्त होकर अपने शरीर को त्यागता है।
"
यः स्वकात्परतो वेह जातनिर्वेद आत्मवान् ।
हृदि कृत्वा हरिं गेहात्प्रत्रजेत्स नरोत्तम: ॥
२७॥
यः--जो कोई; स्वकात्--अपने जागरण से; परतः वा--अथवा अन्यों से सुनकर; इह--इस संसार में; जात--बनता है;निर्वेद:--भौतिक आसक्ति के प्रति अन्यमनस्क; आत्मवान्--चेतना; हृदि--हृदय के भीतर; कृत्वा--ग्रहण किया जाकर;हरिम्-भगवान् को; गेहात्--घर से; प्रत्रजेत्--बाहर चला जाता है; सः--वह; नर-उत्तम:--प्रथम कोटि का मनुष्य है।
अपने आप से या दूसरे के समझाने से जो व्यक्ति जाग जाता है और इस भौतिक जगत कीअसत्यता तथा दुखों को समझ लेता है तथा अपने हृदय के भीतर निवास करनेवाले भगवान् परपूर्णतया आश्रित होकर घर त्याग देता है, वह निश्चय ही उत्तम कोटि का मनुष्य है।
"
अथोदीची दिशं यातु स्वैरज्ञातगतिर्भवान् ।
इतोअर्वाक्प्रायश: काल: पुंसां गुणविकर्षण: ॥
२८ ॥
अथ--अतएव; उदीचीम्--उत्तरी; दिशम्--दिशा को; यातु--चले जाइये; स्वैः-- अपने सम्बन्धियों द्वारा; अज्ञात--जाने बिना;गतिः--गतिविधियाँ; भवानू-- आपकी; इतः--इसके बाद; अर्वाक्--सूत्रपात होगा; प्रायशः--सामान्यतया; काल:--काल,समय; पुंसाम्-मनुष्यों के; गुण--गुण; विकर्षण:--हास
अतएव कृपया आप अपने कुट॒ुम्बियों को बताये बिना, तुरन्त उत्तर दिशा की ओर प्रस्थानकर दीजिए, क्योंकि शीघ्र ही ऐसा समय आनेवाला है, जिसमें मनुष्य के सदगुणों का हासहोगा।
"
एवं राजा विदुरेणानुजेन प्रज्ञाचक्षुबोधित आजमीढ: ।
छित्त्वा स्वेषु स्नेहपाशान्द्रढिम्नो निश्चक्राम भ्रातृसन्दर्शिताध्वा ॥
२९॥
एवम्--इस प्रकार; राजा--राजा धृतराष्ट्र; विदुरेण अनुजेन--अपने छोटे भाई विदुर द्वारा; प्रज्ञा--आत्मनिरीक्षण का ज्ञान;चक्षु;--आँखें; बोधित:--समझी जाकर; आजमीढ:--धृतराष्ट्र, जो आजमीढ़ वंश की संतान थे; छित्त्वा--तोड़कर; स्वेषु--सम्बन्धियों के विषय में; स्नेह-पाशान्--स्नेह के बन्धनों को; द्रढिम्न:--हढ़ता के कारण; निश्चक्राम--बाहर चले गये; भ्रातृ--अपने भाई द्वारा; सन्दर्शित--दिखलाये हुए; अध्वा--मुक्तिपथ
इस प्रकार आजमीढ़ के वंशज महाराज ध्ृतराष्ट्र ने आत्मनिरीक्षणयुक्त ज्ञान ( प्रज्ञा ) द्वारापूर्णतः आश्वस्त होकर तुरन्त ही अपने दृढ़ संकल्प से पारिवारिक स्नेह के सारे हढ़ पाश तोडदिये।
तत्पश्चात् वे तत्काल घर छोड़कर, अपने छोटे भाई विदुर द्वारा दिखलाये गये मुक्ति-पथ परनिकल पड़े।
"
पति प्रयान्तं सुबलस्य पुत्रीपतिब्रता चानुजगाम साध्वी ।
हिमालयं न्यस्तदण्डप्रहर्षमनस्विनामिव सत्सम्प्रहार: ॥
३०॥
पतिम्--अपने पति को; प्रयान्तम्-घर त्यागते समय; सुबलस्य--राजा सुबल की; पुत्री--योग्य पुत्री; पति-ब्रता--अपने पतिको समर्पित; च-- भी; अनुजगाम--पीछे-पीछे गई; साध्वी--सती; हिमालयम्--हिमालय पर्वत की ओर; न्यस्त-दण्ड--संन्यास आश्रम के दण्ड को स्वीकार करनेवाला; प्रहर्षम्-हर्ष का विषय; मनस्विनाम्--महान् योद्धाओं का; इब--सहश;सत्--वैध; सम्प्रहारः--अच्छी पिटाई ॥
कन्दहार ( गान्धार ) के राजा सुबल की पुत्री, परम साध्वी गान्धारी ने जब यह देखा किउसके पति हिमालय पर्वत की ओर जा रहे हैं, जो कि संन्यासियों को वैसा ही आनन्द देता हैजैसा कि युद्ध के मैदान में योद्धा को शत्रुओं के प्रहार से प्राप्त होता है, तो वह भी अपने पति केपीछे-पीछे चल पड़ीं।
"
अजातशत्रु: कृतमैत्रो हुताग्नि-विप्रान्नत्वा तिलगोभूमिरुक्मै: ।
गृहं प्रविष्टो गुरुवन्दनायन चापश्यत्पितरौ सौबलीं च ॥
३१॥
अजात--जो कभी जन्मा नहीं; शत्रुः--शत्रु; कृत--किया गया; मैत्र:--देवताओं की पूजा करना; हुत-अग्नि:--अग्नि में;विप्रानू--ब्राह्मणों को; नत्वा--नमस्कार करके; तिल-गो-भूमि-रुक्मैः --अन्न, गौवों, भूमि तथा स्वर्ण के साथ; गृहम्--महलके भीतर; प्रविष्ट:--प्रवेश करके; गुरु-वन्दनाय--गुरुजनों को नमस्कार करने के लिये; न--नहीं; च-- भी; अपश्यत् -- देखा;पितरौ--अपने चाचाओं को; सौबलीम्--गांधारी को; च--भी |
अजातशत्रु महाराज युथ्चिष्ठिर ने बन्दना करके, सूर्यदेव को अग्नि-यज्ञ अर्पित करके तथाब्राह्मणों को नमस्कार करके एवं उन्हें अन्न, गाय, भूमि तथा स्वर्ण अर्पित करके, अपने नैत्यिकप्रातःकालीन कर्म किये।
तत्पश्चात् वे गुरुजनों का अभिवादन करने के लिए राजमहल में प्रविष्टहुए।
किन्तु उन्हें न तो उनके ताऊ मिले, न ही राजा सुबल की पुत्री ( गांधारी ) अर्थात् ताई मिलीं ।
"
तत्र सझ्यमासीनं पप्रच्छोद्धिग्नमानस: ।
गावल्गणे क्व नस्तातो वृद्धों हीनश्व नेत्रयो: ॥
३२॥
तत्र--वहाँ; सञ्ञयम्--संजय को; आसीनम्--बैठा; पप्रच्छ--पूछा; उद्विग्न-मानस:--चिन्ता से पूरित; गावल्गणे--गवल्गणपुत्र, सञ्लय; क्क--कहाँ हैं; न:--हमारा; तातः--ताऊ; वृद्धः--बूढ़ा; हीन: च--तथा विहीन; नेत्रयो:--आँखों से |
चिन्ता से पूरित महाराज युधिष्ठिर संजय की ओर मुड़े, जो वहाँ बैठे थे और उनसे पूछा : हेसंजय, हमारे वृद्ध तथा अंधे ताऊ कहाँ हैं ?"
अम्बा च हतपुत्रार्ता पितृव्य: क्न गत: सुहृत् ।
अपि मय्यकृतप्रज्ञे हतबन्धु: स भार्यया ।
आशंसमान: शमलं गज्जयां दु:खितोपतत् ॥
३३॥
अम्बा--माता, ताई; च--तथा; हत-पुत्रा--जिनके सररे पुत्र मारे जा चुके थे; आर्ता--अत्यन्त दुखी; पितृव्य;--चाचा विदुर;क्क--कहाँ; गत:--गये हुए; सुहत्--शुभ-चिन्तक; अपि--क्या; मयि--मुझको; अकृत-प्रज्ञे--कृतघ्न; हत-बन्धु:--जिसकेसारे पुत्र नहीं रहे हों; सः--धृतराष्ट्र; भार्यया-- अपनी पत्नी सहित; आशंसमान: --संशय-युक्त मन में; शमलम्--अपराध;गड्ायाम्--गंगा-जल में; दु:खित:--मन में दुखी; अपतत्--गिर पड़े |
मेरे शुभचिन्तक चाचा विदुर तथा अपने सभी पुत्रों के निधन से अत्यन्त शोकाकुल मातागांधारी कहाँ हैं? मेरे ताऊ धृतराष्ट्र भी अपने समस्त पुत्रों तथा पौत्रों की मृत्यु के कारण शोकार्तथे।
निस्सन्देह, मैं अत्यन्त कृतघ्न हूँ।
अतएव, क्या वे मेरे अपराधों को अत्यन्त गम्भीर मानकरअपनी पत्नी-सहित गंगा में कूद पड़े ?"
पितर्युपरते पाण्डौ सर्वान्न: सुहृद: शिशून् ।
अरक्षतां व्यसनतः पितृव्यौ क्न गतावित: ॥
३४॥
पितरि--मेरे पिता के; उपरते--मरने पर; पाण्डौ--महाराज पाण्डु के; सर्वान्--समस्त; नः--हम सबों का; सुहृदः--शुभचिन्तक; शिशून्--छोटे छोटे बालकों को; अरक्षताम्--रक्षा की; व्यसनत:--सभी प्रकार के संकटों से; पितृव्यौ--दोनोंचाचाओं ने; क्र--कहाँ; गतौ--चले गये; इतः--इस स्थान से ।
जब मेरे पिता पाण्डु की मृत्यु हो गई और हम सभी छोटे-छोटे बालक थे, तो इन दोनोंचाचा-ताऊ ने हमें समस्त प्रकार की विपत्तियों से बचाया था।
वे सदैव हमारे शुभचिन्तक रहे।
हाय! वे यहाँ से कहाँ चले गये ?"
सूत उवाचकृपया स्नेहवैक्लव्यात्सूतो विरहकर्शित: ।
आत्मेश्वरमचकश्षाणो न प्रत्याहातिपीडित: ॥
३५॥
सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; कृपया--करुणा से; स्नेह-वैक्लव्यात्-- अत्यधिक स्नेह के कारण मानसिक असंतुलन से;सूत:--सञ्ञय; विरह-कर्शित:--वियोग से दुखी; आत्म-ई श्वरम्-- अपने स्वामी को; अचक्षाण: --न देखने से; न--नहीं;प्रत्याह--उत्तर दिया; अति-पीडित:--अत्यधिक दुखी होकर |
सूत गोस्वामी ने कहा : करुणा तथा मानसिक क्षोभ के कारण, संजय अपने स्वामी धृतराष्ट्रको न देखने से अत्यन्त दुखी थे, अतएव वे महाराज युथ्रिष्ठिर को ठीक से उत्तर नहीं दे सके ।
"
विमृज्याश्रूणि पाणिभ्यां विष्टभ्यात्मानमात्मना ।
अजातशम्रु प्रत्यूचे प्रभो: पादावनुस्मरन् ॥
३६॥
विमृज्य--पोंछ कर; अश्रूणि--- आँखों के आँसुओं को; पाणिभ्याम्--अपने हाथों से; विष्टभ्य--स्थित; आत्मानमू--मन को;आत्मना--बुद्धि से; अजात-शत्रुम्--महाराज युधिष्टिर को; प्रत्यूचे--उत्तर देने लगा; प्रभो:--अपने स्वामी के; पादौ--पाँवोंका; अनुस्मरन्--चिन्तन करते हुए |
पहले उन्होंने बुद्धि द्वारा अपने मन को शान्त किया, फिर अश्रु पोंछते हुए तथा अपने स्वामीधृतराष्ट्र के चरणों का स्मरण करते हुए, वे महाराज युधिष्ठिर को उत्तर देने लगे।
"
सञ्जञय उवाचनाहं वेद व्यवसितं पित्रोर्व: कुलनन्दन ।
गान्धार्या वा महाबाहो मुषितोस्मि महात्मभि: ॥
३७॥
सञ्जयः उवाच--संजय ने कहा; न--नहीं; अहम्--मैं; वेद--जानता हूँ; व्यवसितम्--संकल्प; पित्रो:--चाचाओं का; व:--आपके; कुल-नन्दन--हे कुरुवंश की सन्तान; गान्धार्या:--गान्धारी का; वा--अथवा; महा-बाहो--हे महान् राजा; मुषित:--धोखा दिया गया, ठगा गया; अस्मि--हूँ; महा-आत्मभि: --उन महात्माओं द्वारा ।
संजय ने कहा : हे कुरुवंशी, मुझे आपके दोनों ताउओं तथा गान्धारी के संकल्प का कुछभी पता नहीं है।
हे राजनू, उन महात्माओं द्वारा मैं तो ठगा गया।
"
अथाजगाम भगवान् नारद: सहतुम्बुरु: ।
प्रत्युत्थायाभिवाद्याह सानुजोभ्यर्चयन्मुनिम् ॥
३८ ॥
अथ--तत्पश्चात्; आजगाम--आ पहुँचे; भगवान्--दैवी पुरुष; नारद:--नारद; सह-तुम्बुरु:--अपने तंबूरे के साथ;प्रत्युत्धाय-- अपने-अपने आसनों से उठकर; अभिवाद्य--प्रणाम करके; आह--कहा; स-अनुज:--अपने छोटे भाइयों समेत;अभ्यर्चयन्--अच्छे मन से स्वागत करते हुए; मुनिम्--मुनि से।
जब संजय इस प्रकार बोल रहे थे, तो शक्तिसम्पन्न दैवी पुरुष श्रीनारद अपना तंबूरा लिए हुएवहाँ प्रकट हुए।
महाराज युधिष्ठिर ने अपने भाइयों समेत, अपने-अपने आसन से उठकर प्रणामकरते हुए उनका विधिवत् स्वागत किया।
"
युधिष्टिर उवाचनाहं वेद गति पित्रोर्भगवन् क्व गतावित: ।
अम्बा वा हतपुत्रार्ता क्क गता च तपस्विनी ॥
३९॥
युधिष्ठिरः उवाच--महाराज युधिष्ठिर ने कहा; न--नहीं; अहम्--मैं; वेद--जानता हूँ; गतिम्--प्रयाण; पित्रो:--चाचाओं का;भगवनू-हे दैवी पुरुष; क्च--कहाँ; गतौ--चले गये; इत:--इस स्थान से; अम्बा--ताई; वा--अथवा; हत-पुत्रा-- अपने पुत्रोंके मारे जाने से; आर्ता--दुखी; क्कष--कहाँ; गता--गई हुई; च--भी; तपस्विनी--साध्वी ।
महाराज युधिष्ठिर ने कहा : हे देव पुरुष, मैं नहीं जानता कि मेरे दोनों चाचा कहाँ चले गये।
न ही मैं अपनी उन तपस्विनी ताई को देख रहा हूँ, जो अपने समस्त पुत्रों की क्षति के कारणशोक से व्याकुल थीं।
"
कर्णधार इवापारे भगवान् पारदर्शक: ।
अथाबभाषे भगवान् नारदो मुनिसत्तम: ॥
४०॥
कर्ण-धार: --जहाज के कप्तान; इब--सहृश; अपारे--विस्तृत सागर में; भगवान्-- भगवान् के प्रतिनिधि; पार-दर्शक: --दूसरीओर ले जानेवाले; अथ--इस प्रकार; आबभाषे--कहने लगे; भगवानू--देव पुरुष; नारद: --ऋषि नारद; मुनि-सत्-तमः--भक्त-चिन्तकों में सर्वश्रेष्ठ |
आप इस अपार समुद्र में जहाज के कप्तान सदृश हैं और आप ही हमें अपने गन्तव्य का मार्गदिखा सकते हैं।
इस प्रकार से सम्बोधित किये जाने पर, देव-पुरुष, भक्तों में सर्वश्रेष्ठ चिन्तकदेवर्षि नारद कहने लगे।
"
नारद उवाचमा कदझ्जन शुचो राजन् यदीश्वरवशं जगत् ।
लोका: सपाला यस्येमे वहन्ति बलिमीशितु: ।
स संयुनक्ति भूतानि स एव वियुनक्ति च ॥
४१॥
नारद: उबाच--नारद ने कहा; मा--कभी नहीं; कज्लन--सभी प्रकार से; शुच:--मत शोक करो; राजन्--हे राजा; यत्--क्योंकि; ईश्वर-वशम्-- भगवान् के वश में; जगत्--संसार; लोका: --सारे जीव; स-पाला:--अपने नेताओं समेत; यस्य--जिसका; इमे--ये सब; वहन्ति--ले जाते हैं; बलिम्--पूजा का साधन; ईशितु:--रक्षित होने के लिए; सः--वह; संयुनक्ति--पास लाता है; भूतानि--सारे जीवों को; सः--वह; एव-- भी; वियुनक्ति--विलग करता है; च--तथा |
श्रीनारद ने कहा : हे धर्ममाज, आप किसी के लिए शोक मत करो, क्योंकि सारे लोगपरमेश्वर के अधीन हैं।
अतएव सारे जीव तथा उनके नेता ( लोकपाल ) अपनी रक्षा के लिए पूजाकरते हैं।
वे ही सबों को पास-पास लाते हैं तथा उन्हें विलग करते हैं।
"
यथा गावो नसि प्रोतास्तन्त्यां बद्धाश्व दामभि: ।
वाक्तन्त्यां नामभिर्बद्धा वहन्ति बलिमीशितु: ॥
४२॥
यथा--जिस तरह; गाव: --बैल; नसि--नाक से; प्रोताः:--नाथी हुई; तन्त्याम्--डोरी से; बद्धा:--बँधी हुई; च-- भी;दामभि:--रस्सियों से; वाक्-तन्त्याम्--वैदिक स्तोत्रों के जाल में; नामभि:--नाम पद्धति से; बद्धा:--बद्ध; वहन्ति--पालनकरते हैं; बलिम्--आदेशों को; ईशितुः--परमेश्वर द्वारा नियंत्रित होने के लिए |
जिस प्रकार बैल एक लम्बी रस्सी से नाक से नत्थी होकर बंधन में रहता है, उसी तरह मनुष्यजाति विभिन्न वैदिक आदेशों से बँध कर परमेश्वर के आदेशों का पालन करने के लिए बद्ध है।
"
यथा क्रीडोपस्कराणां संयोगविगमाविह ।
इच्छया क्रीडितु: स्यातां तथेवेशेच्छया नृणाम् ॥
४३॥
यथा--जिस तरह; क्रीड-उपस्कराणाम्--खेल की वस्तुएँ; संयोग--मिलना; विगमौ--बिछुड़ना; इह--इस संसार में;इच्छया--इच्छा से; क्रीडितु:--खेल करने के लिए; स्थाताम्--घटित होता है; तथा--उसी तरह; एव--निश्चय ही; ईश--परमेश्वर की; इच्छया--इच्छा से; नृणाम्-मनुष्यों कीयथा जिस प्रकार खिलाड़ी अपनी इच्छानुसार खिलौनों को सजाता तथा बिगाड़ता है, उसी तरहभगवान् की परम इच्छा मनुष्यों को पास-पास लाती है और उन्हें विलग भी करती है।
"
यन्मन्यसे ध्रुव॑ लोकमश्रुवं वा न चोभयम् ।
सर्वथा न हि शोच्यास्ते स्नेहादन्यत्र मोहजातू ॥
४४॥
यत्--भले ही; मन्यसे--सोचते हो; ध्रुवम्--परम सत्य; लोकम्--लोगों की; अश्वुवम्--अवास्तविकता; वा--अथवा; न--नहीं; च-- भी; उभयम्--अथवा दोनों; सर्वथा--सभी परिस्थितियों में; न--कभी नहीं; हि--निश्चय ही; शोच्या:--शोक काविषय; ते--वे; स्नेहातू--स्नेह के कारण; अन्यत्र--अथवा दूसरी तरह; मोह-जात्--मोह-जनित ।
हे राजन, सभी परिस्थितियों में, चाहे आप आत्मा को नित्य मानो अथवा भौतिक देह कोनश्वर, अथवा प्रत्येक वस्तु को निराकार परम सत्य में स्थित मानो या प्रत्येक वस्तु को पदार्थ तथाआत्मा का अकथनीय संयोग मानो, वियोग की भावनाएँ केवल मोहजनित स्नेह के कारण हैं,इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।
"
तस्माजह्यज् वैक्लव्यमज्ञानकृतमात्मन: ।
कथं त्वनाथा: कृपणा वर्तेरंस्ते च मां विना ॥
४५॥
तस्मात्--अतएव; जहि--छोड़ दो; अड्ड--हे राजा; वैक्लव्यम्--मानसिक विकलता; अज्ञान--अज्ञान; कृतम्--के कारण;आत्मन:--अपना; कथम्--कैसे; तु--लेकिन; अनाथा:-- असहाय; कृपणा:--निरीह प्राणी; वर्तेरनू--जीवित रहने में समर्थ;ते--वे; च-- भी; माम्--मेरे; विना--रहित |
अतएव तुम आत्मा को न जानने के कारण उत्पन्न अपनी चिन्ता छोड़ दो।
अब आप यहसोच रहे है कि वे असहाय जीव तुम्हारे बिना किस तरह रहेंगे।
"
कालकर्मगुणाधीनो देहोयं पाद्ठभौतिक: ।
कथमन्यांस्तु गोपायेत्सर्पग्रस्तो यथा परम् ॥
४६॥
काल--शाश्वत समय; कर्म--कर्म; गुण-- प्रकृति के गुण; अधीन: --के अधीन; देह:--भौतिक शरीर तथा मन; अयम्--यह;पाञ्ञ-भौतिक:--पाँच तत्त्वों से बना; कथम्--कैसे; अन्यान्--दूसरे; तु--लेकिन; गोपायेत्--सुरक्षा प्रदान करते हैं; सर्प-ग्रस्त:--साँप द्वारा दंशित; यथा--जिस तरह; परम्--दूसरे ।
पाँच तत्त्वों से निर्मित यह स्थूल भौतिक शरीर पहले से ही सनातन काल, कर्म तथा भौतिकप्रकृति के गुणों के अधीन है।
तो किस तरह से यह अन्यों की रक्षा कर सकता है, जबकि यहस्वयं सर्प के मुँह में फँसा हुआ है ?"
अहस्तानि सहस्तानामपदानि चतुष्पदाम् ।
'फल्गूनि तत्र महतां जीवो जीवस्य जीवनम् ॥
४७॥
अहस्तानि--हाथविहीनों के; स-हस्तानाम्--हाथ वालों के; अपदानि--पैर-विहीनों का; चतुः-पदाम्--चार पैर वालों का;'फल्गूनि--निर्बल; तत्र--वहाँ; महताम्-शक्तिमानों को; जीव:--जीव; जीवस्य--जीव का; जीवनम्--जीवन निर्वाह,गुजारा।
जो बिना हाथ वाले हैं, वे हाथ वालों के शिकार हैं।
जो पाँवों से विहीन हैं, वे चौपायों केशिकार हैं।
निर्बल सबल के भोज्य हैं और सामान्य नियम यह है कि एक जीव दूसरे जीव काभोजन बना हुआ है।
"
तदिदं भगवान् राजन्नेक आत्मात्मनां स्वहक् ।
अन्तरोनन्तरो भाति पश्य तंमाययोरुधा ॥
४८॥
तत्--अतः; इृदमू--यह अभिव्यक्ति; भगवान्-- भगवान्; राजनू--हे राजन्; एक:--एक अद्वितीय; आत्मा--परमात्मा;आत्मनाम्--अपनी शक्तियों से; स्व-हक्--गुणों में अपने ही जैसा; अन्तर: --बाहर; अनन्तर:--भीतर तथा अपने द्वारा;भाति--प्रकट करता है; पश्य--देखो; तम्--उन्हें ही; मायया--विभिन्न शक्तियों के प्राकट्य से; उरुधा--अनेक प्रतीत होताहै।
अतएव हे राजन, तुम्हें एकमात्र परमेश्वर को देखना चाहिए, जो अद्वितीय हैं और जो विभिन्नशक्तियों से साक्षात् प्रकट होते हैं और भीतर तथा बाहर दोनों में हैं।
"
सोयमद्य महाराज भगवान् भूतभावन: ।
कालरूपोवतीर्णोस्यामभावाय सुरद्रिषाम् ॥
४९॥
सः--वे परमेश्वर; अयम्-- भगवान् श्रीकृष्ण; अद्यू--इस समय; महाराज--हे राजा; भगवान् -- भगवान्; भूत-भावन: -- प्रत्येकसृजित वस्तु के स्त्रष्टा या पिता; काल-रूप:--सर्वभक्षी काल के वेश में; अवतीर्ण: --अवतरित; अस्याम्--विश्व पर;अभावाय--निकाल फेंकने के लिए; सुर-द्विषामू--जो लोग भगवान् की इच्छा के विरुद्ध हैं, उन्हें।
वे ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण, सर्वभक्षी काल के वेश ( कालरूप) में, अब संसारसे द्वेषी लोगों का सर्वनाश करने के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं।
"
निष्पादितं देवकृत्यमवशेषं प्रतीक्षते ।
तावदू यूयमवेक्षध्वं भवेद् यावदिहेश्वर: ॥
५०॥
निष्पादितम्--सम्पन्न; देव-कृत्यमू--देवताओं की ओर से जो कुछ होना था; अवशेषम्--शेष; प्रतीक्षते--प्रतीक्षित होकर;तावतू--उस समय तक; यूयम्--आप सारे पाण्डव; अवेक्षध्वम्-देखो तथा प्रतीक्षा करो; भवेत्--हो; यावत्--जब तक;इह--इस संसार में; ईश्वरः -- परमे श्वरभगवान् ने देवताओं की सहायता करने का अपना कर्तव्य पहले ही पूरा कर दिया है औरजो शेष है, उसके लिए वे प्रतीक्षारत हैं।
आप सभी पाण्डव तब तक प्रतीक्षा कर सकते हो, जबतक भगवान् इस धरा पर उपस्थित हैं।
"
धृतराष्ट्र: सह क्षात्रा गान्धार्या च स्वभार्यया ।
दक्षिणेन हिमवत ऋषीणामाश्रमं गत: ॥
५१॥
धृतराष्ट्र:-- धृतराष्ट्र; सह--साथ; क्रात्रा--अपने भाई विदुर के; गान्धार्या--गांधारी भी; च--तथा; स्व-भार्यया--अपनी पत्नी;दक्षिणेन--दक्षिण दिशा में; हिमवत:--हिमालय पर्वत के; ऋषीणाम्--ऋषियों का; आश्रमम्-- आश्रम में; गतः--गये हे राजनू, आपके चाचा धृतराष्ट्र, उनके भाई विदुर तथा उनकी पत्नी गांधारी, हिमालय केदक्षिण की ओर गये हैं, जिधर बड़े-बड़े ऋषियों के आश्रम हैं।
"
स्रोतोभि: सप्तभिर्या वै स्वर्धुनी सप्तधा व्यधात् ।
सप्तानां प्रीतये नाना सप्तस्रोत: प्रचक्षते ॥
५२॥
स्रोतोभि:-- धाराओं से; सप्तभि:--सात ( भाग ); या--नदी; वै--निश्चय ही; स्वर्धुनी--पवित्र गंगा; सप्तधा--सात शाखाएँ;व्यधात्--उत्पन्न किया; सप्तानाम्--सातों की; प्रीतये--तुष्टि के लिए; नाना--विविध; सप्त-स्त्रोत:--सात स्त्रोत; प्रचक्षते --नाम से ज्ञात।
यह स्थान सप्तस्त्रोत ( सात द्वारा विभाजित ) कहलाता है, क्योंकि यहाँ पर पवित्र गंगा नदीका जल सात शाखाओं में विभाजित किया गया था।
ऐसा महान् सप्तर्षियों की तुष्टि के लिएकिया गया था।
"
स्नात्वानुसवनं तस्मिन्हुत्वा चाग्नीन्यथाविधि ।
अब्भक्ष उपशान्तात्मा स आस्ते विगतैषण: ॥
५३॥
स्नात्वा--स्नान करके; अनुसवनम्--नियमित रूप से तीन बार ( प्रातः, दोपहर तथा संध्या समय ); तस्मिन्--सप्तधा गंगा में;हुत्वा--अग्निहोत्र यज्ञ करके; च--भी; अग्नीन्-- अग्नि में; यथा-विधि--शास्त्र के नियमों के अनुसार; अपू-भक्ष:--केवलजल पीकर उपवास करके; उपशान्त--पूर्ण रूप से संयमित; आत्मा--स्थूल इन्द्रियों तथा सूक्ष्म मन; सः--धृतराष्ट्र; आस्ते--स्थित होंगे; विगत--रहित; एषण:--पारिवारिक कुशलता-सम्बन्धी विचार |
इस समय सप्तस्त्रोत के तट पर धृतराष्ट्र नित्य तीन बार प्रातः, दोपहर तथा संध्या समय, स्नानकरके, अग्निहोत्र यज्ञ सम्पन्न करके तथा केवल जल पीकर अष्टांग योग का अभ्यास करने मेंलगे हैं।
इससे मनुष्य को मन तथा इन्द्रियों पर संयम रखने में सहायता मिलती है और वहपारिवारिक स्नेह-सम्बन्धी विचारों से सर्वथा मुक्त हो जाता है।
"
जितासनो जितश्वास: प्रत्याहृतषडिन्द्रिय: ।
हरिभावनया ध्वस्तरज:सत्त्वतमोमल: ॥
५४॥
जित-आसनः--जिसने आसनों पर विजय प्राप्त कर ली है; जित- श्रास:--जिसने श्वास-प्रक्रम को वश में कर लिया है;प्रत्याहत--पीछे मुड़कर; घट्--छ:; इन्द्रियः--इन्द्रियाँ; हरि-- भगवान् में; भावनया--तन्मय; ध्वस्त--विजित; रज:--रजोगुण;सत्त्व--सत्त्वगुण; तम:--तमोगुण; मलः--कल्मष ।
जिसने यौगिक आसनों तथा श्वास लेने की विधि को वश में कर लिया है, वह अपनीइन्द्रियों को पूर्ण पुरूषोत्तम भगवान् के प्रति मोड़कर भौतिक प्रकृति के गुणों अर्थात् सत्त्वगुण,रजोगुण तथा तमोगुण के कल्मष के प्रति निर्लिप्त बन जाता है।
"
विज्ञानात्मनि संयोज्य क्षेत्रज्ञे प्रविलाप्य तम् ।
ब्रह्मण्यात्मानमाधारे घटाम्बरमिवाम्बरे ॥
५५॥
विज्ञान--शुद्ध पहचान; आत्मनि--बुद्धि में; संयोज्य--ठीक से स्थिर करके; क्षेत्र-ज्ञे--जीव में; प्रविलाप्प--तादात्म्य करके;तम्--उसको; ब्रह्मणि--सर्वोपरि में; आत्मानम्--शुद्ध जीव; आधारे-- आधार में; घट-अम्बरम्--घट के भीतर आकाश;इब--सहश; अम्बरे--परम व्योम में |
धृतराष्ट्र को अपनी शुद्ध सत्ता को बुद्धि में संयोजित करके, तब परम पुरुष के साथ, जीवके रूप में, गुणों के एकात्मकता के बोध सहित, परम ब्रह्म के साथ तदाकार होना होगा।
घटाकाश से मुक्त होकर उन्हें आध्यात्मिक आकाश ऊपर तक उठना होगा।
"
ध्वस्तमायागुणोदर्को निरुद्धकरणाशय: ।
निवर्तिताखिलाहार आस्ते स्थाणुरिवाचल: ।
तस्यान्तरायो मैवाभू: सन्न्यस्ताखिलकर्मण: ॥
५६॥
ध्वस्त--विनष्ट होकर; माया-गुण--भौतिक प्रकृति के गुण; उदर्क:--परवर्ती प्रभाव; निरुद्ध--रुक कर; करण-आशयः:--इन्द्रियाँ तथा मन; निवर्तित--रुका हुआ; अखिल--समस्त; आहार:--इन्द्रियों का भोजन; आस्ते--आसीन है; स्थाणु:--अचर्; इब--सहृश; अचलः--स्थिर; तस्य--उसके ; अन्तराय:--विघ्न, बाधाएँ; मा एब--कभी इस तरह; अभू:--हो;सन्न्यस्त--विरक्त; अखिल--सभी तरह के; कर्मण:-- भौतिक कर्तव्य।
उन्हें इन्द्रियों के सारे कार्य बाहर से भी रोक देने होंगे और भौतिक प्रकृति के गुणों सेप्रभावित होनेवाली इन्द्रियों की अन्तःक्रियाओं के प्रति भी अभेद्य रहना होगा।
इन सारे भौतिककार्यों का परित्याग करने पर वे अचल हो जायेंगे और मार्ग के सारे अवरोधों को पार करजायेंगे।
"
स वा अद्यतनाद् राजन परत: पश्ञमेडहनि ।
कलेवरं हास्यति स्वं तच्च भस्मीभविष्यति ॥
५७॥
सः--वह; वा--सम्भवतया; अद्य--आज; तनातू--से; राजन्--हे राजन्; परत:--आगे; पञ्ञमे--पाँचवें; अहनि--दिन;कलेवरम्--शरीर; हास्यति--छोड़ देंगे; स्वम्-- अपनी इच्छा से; तत्--वह; च-- भी; भस्मी--राख; भविष्यति--हो जायेगा।
हे राजनू, सम्भव यह है कि वे आज से पाँचवें दिन अपना शरीर छोड़ देंगे और उनका शरीरराख हो जायेगा।
"
दह्ममानेग्निभिद्देहे पत्यु: पत्नी सहोटजे ।
बहि: स्थिता पति साध्वी तमग्निमनु वेक्ष्यति ॥
५८॥
दह्ममाने--जलते हुए; अग्निभि: -- अग्नि द्वारा; देहे--शरीर में; पत्यु:--पति के; पत्ती--पत्नी; सह-उटजे--कुटिया समेत;बहि:--बाहर; स्थिता--स्थित; पतिमू--पति को; साध्वी --सती नारी; तम्--उस; अग्निमू--अग्नि को; अनु वेक्ष्यति--ध्यानपूर्वक देखते हुए अग्नि में प्रवेश करेगी |
बाहर से अपने पति को अपनी योग शक्ति की अग्मि में अपनी कुटिया समेत जलता हुआदेखकर उसकी साध्वी पत्नी एकाग्रता पूर्वक ध्यानमग्न होकर अग्नि में प्रवेश करेगी।
"
विदुरस्तु तदाश्चर्य निशाम्य कुरुनन्दन ।
हर्षशोकयुतस्तस्माद् गन्ता तीर्थनिषेवक: ॥
५९॥
विदुर:--विदुर भी; तु--लेकिन; तत्--वह घटना; आश्चर्यम्--आश्चर्यमय; निशाम्य--देखकर; कुरु-नन्दन--हे कुरुवंश केपुत्र; हर्ष--प्रसन्नता; शोक--दुख; युत:--से प्रभावित; तस्मात्--उस स्थान से; गन्ता--चले जाएँगे; तीर्थ--तीर्थ-स्थान;निषेवक:--शक्ति प्राप्त करने के लिए
तब हर्ष तथा शोक से अभिभूत होकर, विदुर उस पवित्र तीर्थ-स्थान से चले जाएँगे।
"
इत्युक्त्वाथारुहत् स्वर्ग नारद: सहतुम्बुरु: ।
युधिष्ठटिरो वचस्तस्य हृदि कृत्वाजहाच्छुच: ॥
६०॥
इति--इस प्रकार; उक्त्वा--सम्बोधित करके; अथ--तत्पश्चात्; आरुहत्--चढ़ गये; स्वर्गम्--बाह्य आकाश में; नारद: --महर्षिनारद; सह--के साथ; तुम्बुरु:--तम्बूरा; युधिष्ठिर:--महाराज युधिष्ठिर ने; वचः--उपदेश; तस्य--उनका; हृदि कृत्वा--हृदय मेंरखकर; अजहातू्--त्याग दिया; शुचः--सारा शोक ।
ऐसा कहकर महर्षि नारद, अपनी वीणा-समेत बाह्य आकाश में चले गये।
युधिष्ठिर ने उनकेउपदेश को अपने हृदय में धारण किया, जिससे वे सारे शोकों से मुक्त हो गये।
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