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अध्याय ग्यारह: भगवान कृष्ण का द्वारका में प्रवेश
1..11सूत उवाचआनर्तान् स उप्रज्य स्वृद्धाज्नपदान्स्वकान् ।
दध्मौ दरवरं तेषां विषादं शमयतन्निव ॥
१॥
सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; आनर्तान्--आनर्तान ( द्वारका ) नामक देश में; सः--वे ; उपब्रज्य--निकट पहुँचकर;स्वृद्धानू--अत्यन्त समृद्ध; जन-पदानू--नगर; स्वकानू--अपना; दध्मौ--बजाया; दरवरम्-शुभ शंख ( पाज्जञजन्य ) को;तेषाम्--उनकी; विषादम्--निराशा को; शमयन्--शान्त करते हुए; इब--मानो |
सूत गोस्वामी ने कहा : आनर्तो के देश के नाम से विख्यात अपनी अत्यन्त समृद्ध राजनगरी( द्वारका ) के निकट पहुँच कर, भगवान् ने अपना आगमन उद्घोषित करने तथा निवासियों कीनिराशा को शांत करने के लिए अपना शुभ शंख बजाया।
"
स उच्चकाशे धवलोदरो दरो-प्युरुक्रमस्याधशशोणशोणिमा ।
दाध्मायमान: करकञझ्जसम्पुटेयथाब्जखण्डे कलहंस उत्स्वन: ॥
२॥
सः--वह; उच्चकाशे-- स्वच्छ हो गया; धवल-उदर:--सफेद तथा बड़े पेटवाला; दरः--शंख; अपि--यद्यपि वह ऐसा है;उरुक्रमस्य--महान् साहसी का; अधरशोण--उनके होठों के दिव्य गुण से; शोणिमा--लाल हुआ; दाध्मायमान: --बजायाजाकर; कर-कजञ्ज-सम्पुटे--कर-कमलों की हथेली द्वारा पकड़ा जाकर; यथा--जिस तरह; अब्ज-खण्डे--कमल-दण्डों से;कल-हंसः--सुन्दर हंस; उत्स्बन:--जोर से शब्द करता
श्वेत तथा मोटे पेंदेवाला शंख, भगवान् के हाथों द्वारा पकड़ा जाकर तथा उनके द्वारा बजायाजाकर, ऐसा लग रहा था मानो उनके दिव्य होठों का स्पर्श करके लाल हो गया हो।
ऐसा प्रतीतहो रहा था मानो कोई श्रेत हंस लाल रंग के कमलदण्डों के बीच खेल रहा हो।
"
तमुपश्रुत्य निनदं जगद्धयभयावहम् ।
प्रत्युद्ययु: प्रजा: सर्वा भर्तृदर्शलालसा: ॥
३॥
तम्--उस; उपश्रुत्य--सुनकर; निनदम्--शब्द को; जगत्-भय--भौतिक संसार का भय; भय-आवहम्-- भयभीत बनानेवालातत्त्व; प्रति--की ओर; उद्ययु:--तेजी से आगे बढ़े; प्रजा:--नागरिक; सर्वा:--सभी; भर्तु--रक्षक; दर्शन--दर्शन की;लालसाः--इच्छा वाले |
भौतिक जगत में साक्षात् भय को भी भयभीत बनानेवाले, उस शब्द को सुनकर द्वारका केनागरिक उनकी ओर तेजी से दौड़ने लगे, जिससे वे भक्तों के रक्षक भगवान् का चिर अभिलषितदर्शन कर सकें।
"
तत्रोपनीतबलयो रवेर्दीपमिवाहता: ।
आत्माराम॑ पूर्णकाम॑ं निजलाभेन नित्यदा ॥
४॥
प्रीत्युत्फूल्लमुखा: प्रोचुह्र्षगद्गदया गिरा ।
पितरं सर्वसुहृदमवितारमिवार्भका: ॥
५॥
तत्र--तत्पश्चात्; उपनीत--अर्पित करके; बलय: --भेंटें; रवे:--सूर्य तक; दीपम्--दीपक; इब--सहश; आहता: --आदरपूर्वक; आत्म-आरामम्--आत्म-निर्भर को; पूर्ण-कामम्--पूर्णतया संतुष्ट; निज-लाभेन--अपनी निजी शक्ति से; नित्य-दा--निरन्तर पूर्ति करनेवाले; प्रीति--स्नेह; उत्फुल्ल-मुखा:--प्रसन्नमुख; प्रोचु:--कहा; हर्ष--प्रसन्न हुए; गदगदया--आह्ादयुक्त; गिरा--वाणी; पितरम्--पिता को; सर्व--सारे; सुहृदम्--मित्रों को; अवितारम्--संरक्षक को; इब--सहश;अर्भकाः--बालक |
सारे नागरिक अपनी-अपनी भेंटें लिये हुए भगवान् के सम्मुख आये और उन्हें उन परम संतुष्टतथा आत्म-निर्भर भगवान् को अर्पित किया, जो अपनी निजी शक्ति से अन्यों कीआवश्यकताओं की निरन्तर पूर्ति करते रहते हैं।
ये भेंटें सूर्य को दिये गये दीप-दान जैसी थीं।
फिर भी सारे नागरिक भगवान् के स्वागत में ऐसी आह्वादमयी भाषा में बोलने लगे, मानो बच्चेअपने अभिभावक तथा पिता का स्वागत कर रहे हों।
"
नता: सम ते नाथ सदाड्घ्रिपड्डुजंविरिद्ववैरिज्च्यसुरेन्द्रवन्दितम् ।
परायणं क्षेममिहेच्छतां परंन यत्र काल: प्रभवेत् पर: प्रभु: ॥
६॥
नता: स्म--हम नतमस्तक हुए थे; ते--आपके समक्ष; नाथ--हे भगवान्; सदा--सदैव; अद्प्नि-पड्डजम्--चरणकमल;विरिज्ञ--ब्रह्मा, प्रथम जीव; वैरिज्च्य--ब्रह्मा के पुत्र, यथा सनक तथा सनातन; सुर-इन्द्र--स्वर्ग का राजा; वन्दितम्--पूजित;'परायणम्--सर्वोपरि; क्षेमम्--कुशल, कल्याण; इह--इस जीवन में; इच्छताम्--इच्छा करनेवाला; परम्--सर्वोच्च; न--कभीनहीं; यत्र--जहाँ; काल:-- प्रबल काल; प्रभवेत्--अपना प्रभाव डाल सकता है; परः--दिव्य; प्रभु:--परमे श्वर
नागरिकों ने कहा : हे भगवन्, आप ब्रह्मा, चारों कुमार तथा स्वर्ग के राजा जैसे समस्तदेवताओं द्वारा भी पूजित हैं।
आप उन लोगों के परम आश्रय हैं, जो जीवन का सर्वोच्च लाभउठाने के लिए इच्छुक हैं।
आप परम दिव्य भगवान् हैं और प्रबल काल भी आप पर अपनाप्रभाव नहीं दिखा सकता।
"
भवाय नस्त्वं भव विश्वभावनत्वमेव माताथ सुहत्पति: पिता ।
त्वं सदगुरुर्न: परमं च दैवतंयस्यानुवृत्त्या कृतिनो बभूविम ॥
७॥
भवाय--कल्याण के लिए; न:--हम सबों के; त्वमू--आप; भव--बलनें; विश्व-भावन--ब्रह्माण्ड के स्त्रष्टा; त्वमू--आप;एव--निश्चय ही; माता--माता; अथ--तथा; सुहृत्--शुभचिन्तक; पति: --पति; पिता--पिता; त्वमू--आप; सत्-गुरु: --गुरु;नः--हमारे; परमम्--परम; च--तथा; दैवतम्--पूज्य देव; यस्य--जिसके ; अनुवृत्त्या--चरणचिद्नों पर चलकर; कृतिन:--सफल; बभूविम--हम हुए हैं।
हे ब्रह्माण्ड के स्त्रष्टा, आप हमारे माता, शुभचिन्तक, प्रभु, पिता, आध्यात्मिक गुरु तथाआरशाध्य देव हैं।
हम आपके चरण-चिह्नों पर चलते हुए सभी प्रकार से सफल हुए हैं।
अतएवहमारी प्रार्थना है कि आप हमें अपनी कृपा का आशीर्वाद देते रहें।
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अहो सनाथा भवता सम यद्ठयंत्रैविष्टपानामपि दूरदर्शनम् ।
प्रेमस्मितस्निग्धनिरी क्षणाननंपश्येम रूपं तव सर्वसौभगम् ॥
८॥
अहो--ओह, यह तो हमारा सौभाग्य है; स-नाथाः--स्वामी के संरक्षण में होना; भवता--आपके द्वारा; स्म--जैसे हम बन चुकेहैं; यत् वयम्--जैसे कि हम हैं; त्रैविष्टटपानामू--देवताओं को; अपि-- भी; दूर-दर्शनम्--बहुत कम दिखाई पड़ते हैं; प्रेम-स्मित--प्रेम से हँसता हुआ; स्निग्ध--स्नेहपूर्ण; निरीक्षण-आननम्--उस प्रकार से दिखनेवाला मुख; पश्येम--देखें; रूपम्--सौन्दर्य; तब--आपका; सर्व--सम्पूर्ण; सौभगम्--सौभाग्य ।
अहो! यह तो हमारा सौभाग्य है कि आज पुनः आपकी उपस्थिति से हम आपके संरक्षण मेंआ गये, क्योंकि आप स्वर्ग के निवासियों के यहाँ भी कभी-कभी जाते हैं।
आपके स्मितमुखको देख पाना हमारे लिए अब सम्भव हो सका है, जो स्निग्ध चितवन से पूर्ण है।
अब हमआपके सर्व-सौभाग्यशाली दिव्य रूप का दर्शन कर सकते हैं।
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यहम्बुजाक्षापससार भो भवान्कुरून् मधून् वाथ सुहृद्दिहक्षया ।
तत्राब्दकोटिप्रतिम: क्षणो भवेद्रवि विनाक्ष्णोरिव नस्तवाच्युत ॥
९॥
यहि--जब भी; अम्बुज-अक्ष--हे कमलनेत्र; अपससार--आप चले जाते हैं; भो--अरे; भवान्--आप; कुरून्--राजा कुरु केवंशजों को; मधून्--मथुरा ( ब्रजभूमि ) के निवासियों को; वा--अथवा; अथ--अतएव; सुहत्-दिदृक्षया--भेंट करने के लिए;तत्र--उस समय; अब्द-कोटि--करोड़ों वर्ष; प्रतिम:--सहृश; क्षण:--क्षण; भवेत्--हो जाता है; रविम्--सूर्य; विना--रहित;अक्ष्णो:--आँखों के; इब--समान; न:--हमारी; तब-- आपकी; अच्युत--हे अमोघ
हे कमलनयन भगवान्, आप जब भी अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों से भेंट करने मथुरा,वृन्दावन या हस्तिनापुर चले जाते हैं, तो आपकी अनुपस्थिति में प्रत्येक क्षण हमें करोड़ों वर्षो केसमान प्रतीत होता है।
हे अच्युत, उस समय हमारी आँखें इस तरह व्यर्थ हो जाती हैं मानो सूर्य सेबिछुड़ गई हों।
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कथं वयं नाथ चिरोषिते त्वयिप्रसन्नदष्याखिलतापशोषणम् ।
जीवेम ते सुन्दरहासशोभित-मपश्यमाना वदनं मनोहरम्।
इति चोदीरिता वाच: प्रजानां भक्तवत्सल: ।
श्रृण्वानोअ्नुग्रहं दृष्टया वितन्वन् प्राविशत् पुरम् ॥
१०॥
कथम्-कैसे; वयम्--हम; नाथ--हे प्रभु; चिरोषिते--सदैव बाहर रहने के कारण; त्वयि--आपके द्वारा; प्रसन्न--प्रसन्नता;इृष्य्या--झलक से; अखिल--संसार भर का; ताप--दुख; शोषणम्--नष्ट करने के लिए; जीवेम--जीवित रह सकें; ते--आपका; सुन्दर--सुन्दर; हास--हँसता हुआ; शोभितम्--अलंकृत; अपश्यमाना:--बिना देखे; वदनम्--मुख; मनोहरम्--आकर्षक; इति--इस प्रकार; च--तथा; उदीरिता:--बोलते हुए; वाच:--शब्द; प्रजानामू--नागरिकों का; भक्त-वत्सल:--भक्तों के प्रति दयालु; श्रेण्वान:--ऐसा जानकर; अनुग्रहम्--दया; दृष्टया--चितवन से; वितन्वन्--वितरित करते हुए;प्राविशत्--प्रवेश किया; पुरम्--द्वारका में ।
हे स्वामी, यदि आप सारे समय बाहर रहते हैं, तो हम आपके उस मनोहर मुखमण्डल कोनहीं देख पाते, जिसकी मुसकान हमारे सारे कष्टों को दूर कर देती है।
भला हम आपके बिनाकैसे रह सकते हैं ?उनकी वाणी सुनकर, प्रजा तथा भक्तों पर अत्यन्त दयालु भगवान् ने द्वारकापुरी में प्रवेशकिया और उन सबों पर अपनी दिव्य दृष्टि डालते हुए उनका अभिनन्दन स्वीकार किया।
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मधुभोजदशाहर्हिकुकुरान्धकवृष्णिभि: ।
आत्मतुल्यबलैर्गुप्तां नागै्भोगवतीमिव ॥
११॥
मधु--मधु; भोज-- भोज; दशाई--दशाई; अर्ह--अर्हई; कुकुर--कुकुर; अन्धक -- अन्धक; वृष्णिभि: --वृष्णि-कुलवालों केद्वारा; आत्म-तुल्य--अपने सहृश; बलैः--शक्ति से; गुप्तामू--रक्षित; नागैः--नागों द्वारा; भोगवतीम्--नागलोक की राजधानी;इब--सहशजिस प्रकार नागलोक की राजधानी भोगवती नागों के द्वारा रक्षित है, उसी तरह द्वारका कीरक्षा कृष्ण के समान बलवान वृष्णि के वंशजों--भोज, मधु, दशाई, अर, कुकुर, अन्धकइत्यादि--द्वारा की जाती थी।
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सर्वतुसर्वविभवपुण्यवृक्षलताश्रमै; ।
उद्यानोपवनारामैर्वृतपद्माकरश्रियमू ॥
१२॥
सर्व--सभी; ऋतु--ऋतुएँ; सर्व--समस्त; विभव--ऐश्वर्य; पुण्य--पवित्र; वृक्ष--पेड़; लता--बेलें; आ श्रमैः--आ श्रमों केसाथ; उद्यान--बगीचे; उपवन--पुष्पोद्यान; आरामै:--क्रीडावन ( आरामदायक बगीचे ) तथा सुन्दर पार्क से; वृत--घिरे हुए;पद्य-आकर--कमलों के जन्म-स्थल या जल के सुन्दर आगार; श्रियम्--सुन्दरता को बढ़ानेवाले।
द्वारकापुरी समस्त ऋतुओं के ऐश्वर्य से पूर्ण थी।
उसमें सर्वत्र आश्रम, उद्यान, पुष्पोद्यान, पार्कतथा कमलों से परिपूर्ण जलाशय थे।
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गोपुरद्वारमार्गेषु कृतकौतुकतोरणाम् ।
चित्रध्वजपताकाग्रैरन्त: प्रतिहतातपाम् ॥
१३॥
गोपुर--नगरी का सिंहद्वार; द्वार--दरवाजा; मार्गेषु--विभिन्न सड़कों पर; कृत--किये गये; कौतुक--उत्सव के कारण;तोरणाम्--सज्जित बन्दन-वार; चित्र--चित्रित; ध्वज--झंडियाँ; पताका-अग्रै:--अग्रणी चिद्नों द्वारा; अन्त:--भीतर;प्रतिहत--अवरुद्ध; आतपाम्-- धूप को ।
भगवान् के स्वागतार्थ नगर का द्वार, घरों के दरवाजे तथा सड़कों के किनारे झंडियों से सजेबन्दनवार बहुत ही सुन्दर ढंग से केले के वृक्षों तथा आम की पत्तियों जैसे मांगलिक प्रतीकों सेसजाये गये थे।
झंडियाँ, फूल-मालाएँ तथा चित्रित संकेत एवं लिखे गये सुवाक्य धूप कोअवरुद्ध कर रहे थे।
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सम्मार्जितमहामार्गरथ्यापणकचत्वराम् ।
सिक्तां गन्धजलैरुप्तां फलपुष्पाक्षताडुरै: ॥
१४॥
सम्मार्जित-- पूर्णतया स्वच्छ किया; महा-मार्ग--राजपथ; रथ्य--मार्ग तथा गलियाँ; आपणक--बाजार; चत्वराम्--चौक;सिक्तामू--सिक्त; गन्ध-जलै:--सुगन्धित जल से; उप्ताम्--बिखेरे हुए; फल--फल; पुष्प--फूल; अक्षत--बिना टूटे, पूरे-पूरे;अद्जुरै: --बीजों से |
पथ, मार्गों, बाजारों तथा चौकों को भलीभाँति झाड़-बुहारकर उन पर सुगन्धित जलछिड़का गया था और भगवान् का स्वागत करने के लिए सर्वत्र फल-फूल तथा अक्षत-अंकुरबिखेरे गये थे।
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द्वारि द्वारि गृहाणां च दध्यक्षतफलेक्षुभि: ।
अलड़कृतां पूर्णकुम्भैर्बलिभिर्धूपदीपकै: ॥
१५॥
द्वारि द्वारि--प्रत्येक घर के द्वार पर; गृहाणाम्--सभी घरों के; च--तथा; दधि--दही; अक्षत--सम्पूर्ण; फल--फल;इक्षुभि:--गन्ने से; अलड्कृताम्--सजाया गया; पूर्ण-कुम्भैः--जल से पूर्ण घटों से; बलिभि:--पूजन सामग्री सहित; धूप--सुगन्ध बत्ती; दीपकै:--दीपों तथा बत्तियों से |
प्रत्येक घर के द्वार पर दही, अक्षत फल, गन्ना तथा पूरे भरे हुए जलपात्रों के साथ ही पूजनकी सामग्री, धूप तथा बत्तियाँ सजा दी गयी थीं।
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निशम्य प्रेष्ठमायान्तं वसुदेवो महामना: ।
अक्रूरश्वोग्रसेनश्व रामश्वाद्धुतविक्रम: ॥
१६॥
प्रद्युम्नश्वारुदेष्णश्व साम्बो जाम्बवतीसुत: ।
प्रहर्षषेगोच्छशितशयनासनभोजना: ॥
१७॥
निशम्य--सुनकर; प्रेष्ठम्--प्रियतम को; आयान्तम्-घर आते हुए; वसुदेव:--वसुदेव ( कृष्ण के पिता ); महा-मना:--महामना, उदारचेता; अक्रूरः --अक्रूर; च--तथा; उग्रसेन:--उग्रसेन; च--तथा; राम:--बलराम ( कृष्ण के बड़े भाई ); च--तथा; अद्भुत--अलौकिक; विक्रम:--शौर्य, पराक्रम; प्रद्युम्न: --प्रद्युम्न; चारुदेष्ण: --चारुदेष्ण; च--तथा; साम्ब:--साम्ब;जाम्बवती-सुतः--जाम्बवती का पुत्र; प्रहर्ष--अत्यन्त प्रसन्नता; वेग--त्वरा; उच्छशित--से प्रभावित; शयन--लेटना; आसन--बैठना; भोजना:--भोजन करना |
यह सुनकर कि परम प्रिय कृष्ण द्वारकाधाम पहुँच रहे हैं, महामना वसुदेव, अक्रूर, उग्रसेन,बलराम ( अलौकिक शक्तिसम्पन्न ), प्रद्युम्न, चारुदेष्ण तथा जाम्बवती-पुत्र साम्ब सभी इतनेप्रसन्न हुए कि उन्होंने लेटना, बैठना तथा भोजन करना छोड़ दिया।
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वारणेद्धं पुरस्कृत्य ब्राह्मण: ससुमड्नलै: ।
श्लुतूर्यनिनादेन ब्रह्मघोषेण चाहता: ।
प्रत्युज्जग्मू रथेईप्टा: प्रणयागतसाध्वसा: ॥
१८॥
वारण-इन्द्रमू--मांगलिक कार्यवाले हाथी को; पुरस्कृत्य--सामने करके; ब्राह्मणै:--ब्राह्मणों द्वारा; स-सुमड्लैः --समस्त शुभलक्षणों सहित; शट्डु--शंख; तूर्य--तुरही की; निनादेन--ध्वनि से; ब्रह्मटघोषेण--वेदों के स्तोत्रों के उच्चारण से; च--तथा;आहता:--महिमा-मण्डित; प्रति--की ओर; उज्म्मुः--तेजी में बढ़े; रथे:--रथ पर; हष्टा:--आनन्द में; प्रणयागत--स्नेह सेसिक्त; साध्वसा:--सादर।
वे फूल थामे हुए ब्राह्मणों समेत रथों पर भगवान् की ओर तेजी से बढ़े।
उनके आगे-आगेसौभाग्य-के प्रतीक हाथी थे।
शंख तथा तुरही बज रहे थे और बैदिक स्तोत्र उच्चरित हो रहे थे।
इस प्रकार उन्होंने स्नेहसिक्त अभिवादन किया।
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वारमुख्याश्व शतशो यानैस्तदर्शनोत्सुका: ।
लसत्कुण्डलनिर्भातकपोलवदनश्रिय: ॥
१९॥
वारमुख्या:--विख्यात वेश्याएँ; च--तथा; शतशः--सैकड़ों; यानैः:--सवारियों द्वारा; तत्-दर्शन--उनसे ( भगवान् श्रीकृष्णसे ) भेंट करने के लिए; उत्सुकाः--अत्यन्त उत्सुक; लसत्--लटकते हुए; कुण्डल--कान के आभूषण; निर्भात--चमकते हुए;कपोल--ललाट; वदन-- मुख; थ्रिय:--सौन्दर्य ।
उसी समय सैकड़ों विख्यात वेश्याएँ विविध सवारियों पर आरूढ़ होकर आगे बढ़ चलीं।
वे सभी भगवान् से मिलने के लिए अत्यन्त उत्सुक थीं और उनके सुन्दर मुख-मण्डल चमचमातेकुण्डलों से सुशोभित थे, जिनके कारण उनके ललाट की शोभा बढ़ रही थी।
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नटनर्तकगन्धर्वा: सूतमागधवन्दिन: ।
गायन्ति चोत्तमश्लोकचरितान्यद्धुतानि च ॥
२०॥
नट--नाटककार; नर्तक--नाचनेवाले; गन्धर्वा:--स्वर्ग के गवैये; सूत--पेशेवर पौराणिक; मागध--पेशेवर वंशावली-विशारद, भाट; वन्दिन: --पेशेवर विद्वान वक्ता; गायन्ति--कीर्तन करते हैं; च--क्रमशः; उत्तमश्लोक--परमे श्वर के;चरितानि--कार्यकलापों को; अद्भुतानि-- अलौकिक; च--तथा |
कुशल नाटककार, कलाकार, नर्तक, गायक, पौराणिक, वंशावली-विशारद ( भाट ) तथाविद्वान वक्ता ( वाचक ) सबों ने भगवान् के अलौकिक कार्यकलापों से प्रेरित होकर अपना-अपना योगदान दिया।
इस प्रकार वे आगे बढ़ते गये।
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भगवांस्तत्र बन्धूनां पौराणामनुवर्तिनाम् ।
यथाविध्युपसड्भम्य सर्वेषां मानमादधे ॥
२१॥
भगवान्--भगवान् श्रीकृष्ण; तत्र--उस स्थान पर; बन्धूनाम्-मित्रों के; पौराणाम्--नागरिकों के; अनुवर्तिनाम्--स्वागतार्थआये लोगों का; यथा-विधि--यथायोग्य; उपसड्रम्य--पास जाकर; सर्वेषाम्--हर एक के लिए; मानम्--सम्मान तथा आदर;आदथधे--प्रदान किया।
भगवान् श्रीकृष्ण उनके निकट गये और उन्होंने अपने समस्त मित्रों, सम्बन्धियों, नागरिकोंतथा उन समस्त लोगों को, जो उन्हें लेने तथा स्वागत करने के लिए आये थे, यथायोग्य सम्मानतथा आदर प्रदान किया।
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प्रह्मभिवादनाश्लेषकरस्पर्शस्मितेक्षणै: ।
आश्वास्य चाश्वपाकेभ्यो वरैश्वाभिमतैर्विभु: ॥
२२॥
प्रह्-अपना सिर झुकाकर; अभिवादन--शब्दों से अभिवादन; आश्लेष--आलिंगन; कर-स्पर्श--हाथ मिलाना; स्मित-ईक्षणैः--बाँकी हँसी से; आश्वास्य--प्रोत्साहन द्वारा; च--तथा; आश्चवपाकेभ्य: --कुत्ता खानेवाली अधम जाति तक; वरै:--आशीर्वादों से; च--तथा; अभिमतैः--जिसकी जैसी इच्छा हो; विभुः--सर्वशक्तिमान ने।
सर्वशक्तिमान भगवान् ने वहाँ पर समुपस्थित लोगों को, यहाँ तक कि नीच से नीच जातिवाले को, अपना मस्तक झुकाकर, बधाई देकर, आलिंगन करके, हाथ मिलाकर, देखकर तथाहँसकर, आश्वासन देकर तथा वरदान देकर उनका अभिवादन किया।
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स्वयं च गुरुभिर्विप्रै: सदारै: स्थविरैरपि ।
आशीर्भियुज्यमानोच्यैर्वन्दिभिश्वाविशत्पुरम् ॥
२३॥
स्वयम्--अपने आप; च--भी; गुरुभि: --वयस्क स्वजनों द्वारा; विप्रै:--ब्राह्मणों के द्वारा; सदारैः--अपनी-अपनी पत्नियोंसहित; स्थविरिः--अशक्तों ( वृद्धों ) के द्वारा; अपि--भी; आशीर्भि:-- आशीर्वाद से; युज्यमान: --प्रशंसित होकर; अन्यै:--अन्यों द्वारा; वन्दिभि:--प्रशंसकों द्वारा; च--तथा; अविशत्--प्रवेश किया; पुरम्--नगर में |
तब भगवान् ने ज्येष्ठ-वरेष्ठ सम्बन्धियों तथा अपनी-अपनी पतियों के साथ आए अशक्तब्राह्मणों के साथ नगर में प्रवेश किया।
वे सब आशीर्वाद दे रहे थे और भगवान् के यशों का गानकर रहे थे।
दूसरे लोगों ने भी भगवान् की महिमा की प्रशंसा की।
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राजमार्ग गते कृष्णे द्वारकाया: कुलख्रिय: ।
हर्म्याण्यारुरुहुविप्र तदीक्षणमहोत्सवा: ॥
२४॥
राज-मार्गभमू--आम सड़कों से; गते--जाते हुए; कृष्णे-- भगवान् कृष्ण द्वारा; द्वारकाया:--द्वारका नगरी की; कुल-स्त्रिय:--प्रतिष्ठित कुलों की स्त्रियाँ; हर्म्याणि--राजमहलों में; आरुरुहुः--चढ़ गईं ; विप्र--हे ब्राह्मणों; तत्-ईक्षण--उनका ( कृष्ण का )दर्शन करने के लिए; महा-उत्सवा:--महान् उत्सव मानकर।
जब भगवान् राजमार्ग से होकर जा रहे थे, तो द्वारका के प्रतिष्ठित परिवारों की सभी स्त्रियाँभगवान् का दर्शन करने के लिए अपने-अपने महलों की अटारियों पर चढ़ गईं।
इसे वे एकमहान् उत्सव समझ रही थीं।
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नित्य॑ निरीक्षमाणानां यदपि द्वारकौकसाम् ।
न वितृप्यन्ति हि दृश: श्रियो धामाड्रमच्युतम् ॥
२५॥
नित्यमू--नियमित रूप से, सदैव; निरीक्षमाणानाम्--उनको देखनेवालों का; यत्--यद्यपि; अपि--के होते हुए; द्वारका-ओकसामू--द्वारका के निवासी; न--कभी नहीं; वितृप्यन्ति--तुष्ट होते हैं; हि--ठीक से; हृश:--हृश्य; थ्रिय: --सौन्दर्य; धाम-अड्भम्--शरीर रूपी आगार; अच्युतम्--अमोघद्वारकावासी समस्त सौन्दर्य के आगार अच्युत भगवान् को नित्य निहारने के अभ्यस्त थे,फिर भी वे कभी तृप्त नहीं होते थे।
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श्रियो निवासो यस्योर: पानपात्र मुखं दशाम् ।
बाहवो लोकपालानां सारज्ञाणां पदाम्बुजम् ॥
२६॥
भ्रिय:--लक्ष्मी का; निवास:--निवासस्थान; यस्थ--जिसका; उरः--वक्षस्थल; पान-पात्रमू--जल का घड़ा; मुखम्--मुँह;हशाम्--आँखों का; बाहव:--बांहें; लोक-पालानाम्-- प्रशासक देवताओं की; सारड्राणाम्-भक्तों का, जो किसी वस्तु केविषय में कुछ कहते या गाते हैं; पद-अम्बुजम्--चरणकमल।
भगवान् का वक्षस्थल लक्ष्मी देवी का निवासस्थल है।
उनका चाँद जैसा मुखड़ा उन नेत्रों केलिए जलपात्र के समान है, जो सुन्दर वस्तुओं के लिए सदैव लालायित रहते हैं।
उनकी भुजाएँप्रशासक देवताओं के लिए आश्रयस्थल हैं और उनके चरणकमल उन शुद्ध भक्तों कीशरणस्थली हैं, जो भगवान् के अतिरिक्त न तो कुछ कहते हैं, न गाते हैं।
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सितातपत्रव्यजनैरुपस्कृत:प्रसूनवर्षैरभिवर्षित: पथि ।
पिशज्भवासा वनमालया बभौघनो यथार्कोडुपचापवैद्युतै: ॥
२७॥
सित-आततपत्र-- श्रेत छाता; व्यजनैः--चामर से; उपस्कृत:--झला जाकर; प्रसून--फूलों की; वर्षै:--वर्षा से; अभिवर्षित:--आच्छादित होकर; पथ्चि--मार्ग पर; पिशड्र-वासा:--पीताम्बर से; बन-मालया--फूलों के हारों से; बभौ--हो गया; घन: --बादल; यथा--जिस प्रकार; अर्क--सूर्य; उडुप--चन्द्रमा; चाप--इन्द्रधनुष; वैद्युतै:--बिजली से ।
जब भगवान् द्वारका के राजमार्ग से होकर गुजर रहे थे, तब एक श्वेत छत्र तानकर उनके सिरको धूप से बचाया जा रहा था।
श्वेत पंखों वाले पंख ( चंवर ) अर्धवृत्ताकार में झल रहे थे औरमार्ग पर फूलों की वर्षा हो रही थी।
पीताम्बर तथा फूलों के हार से वे इस प्रकार प्रतीत हो रहे थे,मानो श्याम बादल एक ही साथ सूर्य, चन्द्रमा, बिजली तथा इन्द्रधनुष से घिर गया हो।
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प्रविष्टस्तु गृहं पित्रो: परिष्वक्त: स्वमातृभि: ।
ववन्दे शिरसा सप्त देवकीप्रमुखा मुदा ॥
२८॥
प्रविष्ट:--प्रवेश करने पर; तु--लेकिन; गृहम्--घर में; पित्रो:--पिता के; परिष्वक्त:--आलिंगित होकर; स्व-मातृभि: -- अपनीमाताओं द्वारा; ववन्दे--नमस्कार किया; शिरसा--सिर से; सप्त--सात; देवकी--देवकी; प्रमुखा--इत्यादि; मुदा--प्रसन्नतापूर्वक
अपने पिता के घर में प्रवेश करने पर उन्हें उनकी माताओं ने गले लगाया और भगवान् नेउनके चरणों पर अपना शिर रखकर उन्हें नमस्कार किया।
माताओं में देवकी ( उनकी असलीमाता ) प्रमुख थीं।
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ता: पुत्रमड्ढमारोप्य स्नेहस्नुतपयोधरा: ।
हर्षविह्नललितात्मान: सिषिचुर्नेत्रजैर्जलै: ॥
२९॥
ताः--वे सभी; पुत्रम्-पुत्र को; अड्भूम्--गोद में; आरोप्य--बिठाकर; स्नेह-स्नुत--स्नेह से सिक्त; पयोधरा: --वक्षस्थल;हर्ष--प्रसन्नता; विहलित-आत्मान:--से विभोर; सिषिचु:--नम; नेत्रजैः--आँखों के; जलैः--जल सेमाताओं ने अपने पुत्र को गले लगाने के बाद, उसे अपनी-अपनी गोद में बिठाया।
विशुद्धस्नेह के कारण उनके स्तनों से दूध निकल आया।
वे हर्ष से विभोर हो गई और उनके नेत्रों केअश्रुओं से भगवान् भीग गये।
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अथाविशतू स्वभवनं सर्वकाममनुत्तमम् ।
प्रासादा यत्र पत्नीनां सहस्नाणि च घोडश ॥
३०॥
अथ--त्पश्चात्; अविशत्--प्रविष्ट हुए; स्व-भवनम्--अपने महलों में; सर्व--समस्त; कामम्--इच्छाएँ; अनुत्तमम्--सब तरहसे पूर्ण; प्रासादाः:--महल; यत्र--जहाँ; पत्नीनामू-- पत्नियों को; सहस्त्राणि--हजारों; च--इसके ऊपर; षोडश--सोलह।
तत्पश्चात् भगवान् अपने महलों में प्रविष्ट हुए, जो सभी तरह से परिपूर्ण थे।
उनमें उनकीपत्नियाँ रहती थीं और वे सोलह हजार से अधिक थीं।
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पत्न्य: पति प्रोष्य गृहानुपागतंविलोक्य सझ्जञातमनोमहोत्सवा: ।
उत्तस्थुरारात् सहसासनाशयात्साक॑ ब्रतैत्रीडितलोचनानना: ॥
३१॥
पल्य:--पत्नियाँ ( भगवान् कृष्ण की ); पतिमू--पति को; प्रोष्य--घर से दूर गया हुआ; गृह-अनुपागतम्--अब घर लौटा हुआ;विलोक्य--देखकर; सञ्भात--उत्पन्न करके; मन:-महा-उत्सवा:--मन के भीतर प्रसन्नतापूर्ण उत्सव का भाव; उत्तस्थु:--उठीं;आरातू--दूर से; सहसा--एकाएक; आसना--आसनों से; आशयात्--ध्यान अवस्था से; साकम्--के साथ; ब्रतै:--ब्रत के;ब्रीडित--लज्जा से देखते; लोचन--नेत्र; आनना:--मुख ।
दीर्घकाल तक बाहर रहने के बाद अपने पति को घर आया देखकर श्रीकृष्ण की रानियाँमन ही मन अत्यन्त हर्षित हुईं।
वे अपने-अपने आसनों तथा ध्यानों से तुरन्त उठकर खड़ी हो गई।
सामाजिक प्रथा के अनुकूल, उन्होंने लज्जा से अपने मुख ढक लिये और दृष्टि नीची किये देखनेलगीं।
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तमात्मजैर्दष्टिभिरन्तरात्मना दुरन्तभावा: परिरेभिरे पतिम् ।
निरुद्धमप्यास्रवदम्बु नेत्रयो-विलज्जतीनां भृगुवर्य वैक््लवात् ॥
३२॥
तम्--उस ( भगवान् ) को; आत्म-जै: --पुत्रों द्वारा; दृष्टिभ:--दृष्टि द्वारा; अन्तर-आत्मना-- अन्तरात्मा से; दुरन््त-भावा:--दुर्लध्यउत्कंठा; परिरिभिरि--आलिंगन किया; पतिम्--पति को; निरुद्धमू--अवरुद्ध; अपि--होते हुए; आस्रवत्-आँसू; अम्बु--जल की बूँदों के समान; नेत्रयो:--आँखों से; विलजतीनाम्--लज्जा अनुभव करनेवाली; भृगु-वर्य--हे भृगुओं में श्रेष्ठ; बैक््लवात्--अनजाने।
रानियों की दुर्लघ्य उत्कण्ठा इतनी तीत्र थी कि लजाई होने के कारण उन्होंने सर्वप्रथम अपनेअन्तरतम से भगवान् का आलिंगन किया, फिर उन्होंने दृष्टि से उनका आलिंगन किया और तबअपने पुत्रों को उनका आलिंगन करने के लिए भेजा ( जो खुद ही आलिंगन करने जैसा है )।
लेकिन हे भृगुश्रेष्ठ, यद्यपि वे भावनाओं को रोकने का प्रयास कर रही थीं, किन्तु अनजाने उनकेनेत्रों से अश्रुछलक आये।
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यद्यप्यसौ पार्थगतो रहोगत-स्तथापि तस्याडुप्रियुगं नव॑ नवम् ।
पदे पदे का विरमेत तत्पदा-च्वलापि यच्छीर्न जहाति कहिंचित् ॥
३३॥
यदि--यद्यपि; अपि--निश्चय ही; असौ--वे ( भगवान् श्रीकृष्ण ); पार्श्च-गतः--बगल में; रह:-गत:--अकेले; तथापि--फिरभी; तस्य--उसका; अड्प्रि-युगम्-- भगवान् के चरण; नवम् नवम्--नये-नये; पदे--पग; पदे--पग पर; का--कौन;विरमेत--विलग किया जा सकता है; तत्-पदात्--उनके चरणों से; चलापि--गतिशील; यत्--जिसको; श्री:--लक्ष्मी जी;न--कभी नहीं; जहाति--छोड़ती है; कर्हिचितू--कभी भी
यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण निरन्तर उनके पास थे और बिल्कुल अकेले भी थे, तो भी उनकेचरण उन्हें नवीनतर लग रहे थे।
यद्यपि लक्ष्मी जी स्वभाव से चंचल हैं, लेकिन वे भी भगवान् के चरणों को नहीं छोड़ती थीं।
तो भला जो स्त्री एक बार उन चरणों की शरण में जा चुकी हो, वहउनसे किस प्रकार विलग की जा सकती है ?"
एवं नृपाणां क्षितिभारजन्मना-मक्षौहिणीभि: परिवृत्ततेजसाम् ।
विधाय वैरं श्वसनो यथानलंमिथो वधेनोपरतो निरायुध: ॥
३४॥
एवम्--इस प्रकार; नृपाणाम्--राजाओं या प्रशासकों के; क्षिति-भार--पृथ्वी का बोझ; जन्मनाम्--इस प्रकार से उत्पन्न;अक्षौहिणीभिः--घोड़ों, हाथियों, रथों तथा पैदल सेना शक्ति के द्वारा शक्ति-सम्पन्न; परिवृत्त--ऐसे परिवेश से गर्वित;तेजसाम्--पराक्रम; विधाय--उत्पन्न करके ; वैरम्--श॒त्रुता; श्रसन:--बाँसों के पौधों तथा वायु के घर्षण से; यथा--जिसप्रकार; अनलम्--अग्नि; मिथ: --एक दूसरे के साथ; वधेन--मारने से; उपरत:--छूटकर; निरायुध: --युद्ध में किसी का पक्ष नकरने से।
पृथ्वी पर भार-स्वरूप राजाओं को मारने के बाद, भगवान् को राहत हुई।
वे अपनी सैन्य-शक्ति, अपने घोड़ों, हाथियों, रथों, पैदल सेना के बल पर गर्वित थे।
युद्ध में भगवान् किसी दलमें सम्मिलित नहीं हुए।
उन्होंने बलशाली प्रशासकों में शत्रुता उत्पन्न की और वे आपस में लड़गये।
वे उस वायु के समान थे, जो बाँसों में घर्षण उत्पन्न करके आग लगा देती है।
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स एष नरलोकेस्मिन्नवतीर्ण: स्वमायया ।
रेमे सत्रीरत्नकूटस्थो भगवान् प्राकृतो यथा ॥
३५॥
सः--वे ( पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ); एष:--ये सब; नर-लोके--इस मनुष्य-लोक में; अस्मिन्--इस; अवतीर्ण:--अवतारलेकर; स्व--निजी, अन्तः; मायया--अहैतुकी कृपा से; रेमे-- भोग किया; स्त्री-रत्त--वह स्त्री, जो भगवान् की पत्नी बनने केलिए उपुयक्त है; कूटस्थ:--मध्य में; भगवान्-- भगवान्; प्राकृतः--संसारी; यथा--जिस प्रकार।
पूर्ण पुरूषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण अपनी अहैतुकी कृपा से अपनी अन्तरंगा शक्ति द्वारा इसलोक में प्रकट हुए और सुयोग्य स्त्रियों के साथ इस तरह भोग किया, मानो वे संसारी कार्यों मेंलगे हुए हों।
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उद्दामभावपिशुनामलवल्गुहास-त्रीडावलोकनिहतो मदनोपि यासाम् ।
सम्मुह्य चापमजहात्प्रमदोत्तमास्तायस्येन्द्रियं विमथितुं कुहकैर्न शेकु: ॥
३६॥
उद्दाम--अत्यन्त गम्भीर; भाव-- भाव; पिशुन--उत्तेजक; अमल--निष्कलंक; वल्गु-हास--सुन्दर मुसकान; ब्रीड-- आँख कीकोर; अवलोक--देखना, चितवन; निहत:--जीता गया; मदन:--कामदेव ( या अमदन; अपि--; यासाम्--; सम्मुह्य--;चापम्--; अजहातू--; प्रमद--; उत्तमा:--; ता--; यस्य--; इन्द्रियम्-- विमधितुम्-- कुहकै ४- ने-- शेकु भ्जज<उद्दाम--अत्यन्त गम्भीर; भाव-- भाव; पिशुन--उत्तेजक; अमल--निष्कलंक; वल्गु-हास--सुन्दर मुसकान; ब्रीडा--आँख कीकोर; अवलोक--देखना, चितवन; निहत:--जीता गया; मदन:--कामदेव ( या अमदन--सहिष्णु शिव ); अपि-- भी;यासाम्--जिसका; सम्मुहा--से विजित होकर; चापम्-- धनुष; अजहात्--त्याग दिया; प्रमद-- मादक बनानेवाली स्त्री;उत्तमा:--उच्च कोटि की; ता--वे सब; यस्य--जिसकी; इन्द्रियम्--इन्द्रियों को; विमधितुम्--विचलित करने के लिए;कुहकै:--हावभाव द्वारा; न--कभी नहीं; शेकु:--समर्थ ।
यद्यपि रानियों की मृदु मुस्कानें तथा बाँकी चितवनें अत्यन्त विमल तथा उत्तेजक थीं, जिससेसाक्षात् कामदेव भी मोहित होकर अपना धनुष त्यागने के लिए बाध्य हो सकते थे, यहाँ तक किअत्यन्त सहिष्णु शिवजी भी उनके शिकार हो सकते थे, तो भी, वे अपने समस्त हाव-भाव तथाआकर्षण से भगवान् की इन्द्रियों को विचलित नहीं कर सकीं।
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तमयं मन्यते लोको ह्यसद्भमपि सद्धिनम् ।
आत्मौपम्येन मनुजं व्यापृण्वानं यतोडबुध: ॥
३७॥
तम्--भगवान् कृष्ण को; अयम्--ये सब ( सामान्य लोग ); मन्यते--मन में सोचते हैं; लोक:--बद्धजीव; हि--निश्चय ही;असड्रम्--अनासक्त; अपि-के होते हुए; सड्डिनमू-- प्रभावित; आत्म--स्वयं; औपम्येन--अपने साथ तुलना करके; मनुजम्--सामान्य मनुष्य; व्यापृण्वानमू--लगे रहकर; यत:--क्योंकि; अबुध: --अज्ञान के कारण मूर्ख ।
सामान्य भौतिकतावादी बद्धजीव सोचते रहते हैं कि भगवान् उन्हीं में से एक हैं।
अपनेअज्ञान के कारण वे सोचते हैं कि पदार्थ का भगवान् पर प्रभाव पड़ता है, भले ही वे अनासक्तरहते हैं।
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एतदीशनमीशस्य प्रकृतिस्थोपि तद्गुणै: ।
न युज्यते सदात्मस्थैर्यथा बुद्धिस्तदाश्रया ॥
३८॥
एतत्--यह; ईशनम्--दिव्यता, भगवत्ता; ईशस्य--भगवान् की; प्रकृति-स्थ:--प्रकृति के सम्पर्क में रहकर; अपि-- भी; ततू-गुणैः--गुणों के द्वारा; न--कभी नहीं; युज्यते-- प्रभावित होता है; सदा आत्म-स्थै:--शाश्वतता में स्थित रहनेवालों के द्वारा;यथा--जैसा है; बुद्धधि:--बुद्धि; तत्-- भगवान्; आश्रया--शरणागत
यह तो भगवान् की अलौकिकता है कि वे भौतिक प्रकृति के गुणों के संसर्ग में रहते हुए भीउनसे प्रभावित नहीं होते।
इसी प्रकार जिन भक्तों ने भगवान् की शरण ग्रहण कर ली है, वे भीभौतिक गुणों से प्रभावित नहीं होते।
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त॑ मेनिरेडबला मूढा: स्त्रैणं चानुत्रतं रह: ।
अप्रमाणविदो भर्तुरीश्वरं मतयो यथा ॥
३९॥
तम्--श्रीकृष्ण को; मेनिरे--मान बैठते हैं; अबला:--सुकुमार; मूढा: --सरलता के कारण; स्त्रैणम्--स्त्री के अधीन; च--भी;अनुव्रतम्--पालनकर्ता; रह:--एकान्त स्थान; अप्रमाण-विदः --महिमा से अनजान; भर्तु:--अपने पति की; ईश्वरम्--परमनियन्ता को; मतयः--मत; यथा--जैसे ।
वे सरल तथा सुकोमल स्त्रियाँ सचमुच ही सोच बैठीं कि उनके प्रिय पति, भगवान् श्रीकृष्ण,उनसे आकर्षिथ हैं और उनके वशीभूत हैं।
वे अपने पति की महिमाओं से उसी तरह अनजान थीं,जिस प्रकार नास्तिक लोग परम नियन्ता के रूप में भगवान् से अनजान रहते हैं।
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