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अध्याय दस: भगवान कृष्ण का द्वारका के लिए प्रस्थान
1.10शौनक उवाचहत्वा स्वरिक्थस्पृध आततायिनो युधिष्टिरो धर्मभृतां वरिष्ठ: ।
सहानुजै: प्रत्यवरुद्धभोजन: कथ प्रवृत्त: किमकारषीत्ततः ॥
१॥
शौनकः उवाच--शौनक ने पूछा; हत्वा--वध करने के बाद; स्वरिक्थ--वैध पैतृक सम्पत्ति; स्पृध:--छीनने की इच्छासे; आततायिन:--आततायी; युधिष्टिर: --राजा युधिष्टिर; धर्म-भूताम्--धर्म का पालन करने वालों का; वरिष्ठ:--सबसेबड़ा; सह-अनुजैः-- अपने छोटे भाइयों सहित; प्रत्यवरुद्ध--रोक दिया; भोजन:--आवश्यकताओं को स्वीकार करना;कथम्-कैसे; प्रवृत्त:--लगा हुआ; किम्--क्या; अकारषीतू--सम्पन्न किया; तत:--तत्पश्चात्
शौनक मुनि ने पूछा : जो महाराज युथ्रिष्ठिर की वैध पैतृक सम्पत्ति को छीनना चाहतेथे,उन शत्रुओं का वध करने के बाद महानतम धर्मात्मा युथिष्ठिर ने अपने भाइयों कीसहायता से अपनी प्रजा पर किस प्रकार शासन चलाया ? निश्चित ही वे अपने साम्राज्य काउपभोग मुक्त होकर अनियन्त्रित चेतना से नहीं कर सके ।
"
सूत उवाचवंशं कुरोवशदवाग्निनिईतं संरोहयित्वा भवभावनो हरि: ।
निवेशयित्वा निजराज्य ईश्वरो युधिष्ठिरं प्रीतमना बभूव ह ॥
२॥
सूतः उवाच--सूत गोस्वामी ने उत्तर दिया; वंशम्--वंश; कुरोः--राजा कुरु का; वंश-दब-अग्नि--बाँसों से लगनेवालीजंगल की आग; निईतम्--निःशेष, दग्ध; संरोहयित्वा--वंश की पौध; भव-भावन:--सृष्टि के पालक; हरिः--भगवान्श्रीकृष्ण; निवेशयित्वा--पुनः स्थापित करके; निज-राज्ये--अपने ( उनके ) राज्य में; ई श्वरः--पर मे श्वर; युधिष्टिरम् --महाराज युथ्चिष्टिर को; प्रीत-मना:--अपने मन में प्रसन्न; बभूव ह--हुए।
सूत गोस्वामी ने कहा : विश्व के पालनकर्ता भगवान् श्रीकृष्ण महाराज युथ्ििष्ठिर कोउनके साम्राज्य में पुनः प्रस्थापित करके एवं क्रोध की दावाग्नि से विनष्ट हुए कुरुवंश कोपुनरुज्जीवित करके अत्यन्त प्रसन्न हुए।
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निशम्य भीष्मोक्तमथाच्युतोक्तंप्रवृत्तविज्ञानविधूतविभ्रम: ।
शशास गामिन्द्र इवाजिताश्रय:परिध्युपान्तामनुजानुवर्तित: ॥
३॥
निशम्य--सुनकर; भीष्म-उक्तम्-- भीष्म द्वारा कहा हुआ; अथ--तथा; अच्युत-उक्तम्--अच्युत भगवान् कृष्ण ने जोकुछ कहा था; प्रवृत्त--लगे रह कर; विज्ञान--पूर्ण ज्ञान; विधूत--पूर्ण रूप से धुल गये; विभ्रम:--सारे सन्देह;शशास--शासन किया; गाम्--पृथ्वी पर; इन्द्र--स्वर्ग का राजा; इब--सहृश; अजित-आश्रय:--दुर्जय भगवान् द्वारारक्षित; परिधि-उपान्ताम्--समुद्रों सहित; अनुज--छोटे भाई; अनुवर्तितः--उनके द्वारा पालन किया जाक
भीष्मदेव तथा अच्युत भगवान् श्रीकृष्ण ने जो कुछ कहा था, उससे प्रबुद्ध होकरमहाराज युधिष्टिर परिपूर्ण ज्ञान विषयक मामलों में व्यस्त हो गये, क्योंकि उनके सारे सन्देहदूर हो चुके थे।
इस प्रकार उन्होंने पृथ्वी तथा सागरों पर राज्य किया और उनके छोटे भाईउनका साथ देते रहे।
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काम ववर्ष पर्जन्य: सर्वकामदुघा मही ।
सिषिचु: सम ब्रजान् गाव: पयसोधस्वतीर्मुदा ॥
४॥
कामम्--सारी आवश्यक वस्तु; ववर्ष--उपलब्ध हुई; पर्जन्य:--वर्षा; सर्व--प्रत्येक वस्तु; काम--आवश्यकताएँ;दुघा--उत्पन्न करनेवाली; मही--पृथ्वी; सिषिचु: स्म--सिक्त करती थीं; ब्रजानू--चरागाहों को; गाव:--गाएँ; पयसाउधस्वती: -- भरे हुए थनों के कारण; मुदा--प्रसन्नता के कारण।
महाराज युधिष्ठिर के राज्य में मनुष्यों को जितना भी पानी चाहिए था, बादल उतनापानी बरसाते थे और पृथ्वी मनुष्यों की सारी आवश्यकताओं की पूर्ति पर्याप्त मात्रा में करतीथी।
दूध से भरे थनों वाली तथा प्रसन्न-चित्त गौवें अपने दूध से चरागाही को सिक्त करतीरहती थीं।
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नद्यः समुद्रा गिरय: सवनस्पतिवीरुध: ।
'फलन्त्योषधय: सर्वा: काममन्वृतु तस्य वै ॥
५॥
नद्यः--नदियाँ; समुद्रा:--समुद्र; गिरय:--पहाड़; सवनस्पति--वनस्पतियाँ; वीरु ध: --लताएँ; फलन्ति--सक्रिय,कारगर; ओषधय:--दवाएँ; सर्वा:--समस्त; कामम्--आवश्यकताएँ; अन्वृतु--मौसमी; तस्य--राजा के लिए; बै--निश्चय ही।
प्रत्येक ऋतु में नदियाँ, समुद्र, पर्वत, जंगल, लताएँ तथा कारगर औषधियाँ प्रचुर मात्रामें राजा को अपना-अपना कर चुकता करती थीं।
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नाधयो व्याधय: क्लेशा दैवभूतात्महेतव: ।
अजातशत्रावभवन् जन्तूनां राज्षि कर्हिचित् ॥
६॥
न--कभी नहीं; आधय: --चिन्ताएँ; व्याधय: --रोग; क्लेशा:--अधिक गर्मी तथा सर्दी से होनेवाला कष्ट; दैव-भूत-आत्म--शरीर, अलौकिक शक्ति तथा अन्य जीवों के कारण होनेवाले; हेतवः--के कारण से; अजात-शत्रौ--जिसकेकोई शत्रु न हो, उनमें; अभवन्--घटित हुआ; जन्तूनाम्--समस्त जीवों का; राज्ञि--राजा में; कहिंचित्--किसी भीसमय।
चूँकि राजा का कोई शत्रु न था, अतएवं सारे जीव, किसी भी समय मानसिक क्लेशों,रोगों या अत्यधिक ताप या शीत से विचलित नहीं थे।
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उपषित्वा हास्तिनपुरे मासान् कतिपयान् हरि: ।
सुहृदां च विशोकाय स्वसुश्च प्रियकाम्यया ॥
७॥
उषित्वा--ठहर कर; हास्तिनपुरे--हस्तिनापुर नगर में; मासानू--महीने; कतिपयान्-- कुछ; हरि: -- भगवान् श्रीकृष्ण;सुहृदाम्--सम्बन्धियों को; च-- भी; विशोकाय--सान्त्वना देने के लिए; स्वसु:--बहन को; च--तथा; प्रिय-'काम्यया--प्रसन्न करने के लिए।
श्री हरि अपने सम्बन्धियों को सान्त्वना देने तथा अपनी बहन ( सुभद्रा ) को प्रसन्न करने के लिए कुछ महीने हस्तिनापुर में रहे।
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आमन्त्रय चाभ्यनुज्ञात: परिष्वज्याभिवाद्य तम् ।
आरुरोह रथं कैश्वित्परिष्वक्तोईभिवादित: ॥
८॥
आमन्त्रय--अनुमति लेकर; च--तथा; अभ्यनुज्ञात:--आज्ञा पाकर; परिष्वज्य--आलिंगन करके; अभिवाद्य--चरणों परझुककर; तम्--महाराज युधिष्ठिर को; आरुरोह--आरूढ़ हुए; रथम्--रथ में; कैश्वित्--किन्हीं के द्वारा; परिष्वक्त:--आलिंगित होकर; अभिवादित:--अभिवादन किया जाकर।
तत्पश्चात् जब भगवान् ने प्रस्थान करने की अनुमति माँगी और राजा ने अनुमति दे दीतो भगवान् ने महाराज युधिष्ठटिर के चरणों में नतमस्तक होकर प्रणाम किया और राजा नेउनको गले लगा लिया।
इसके बाद अन्यों द्वारा गले मिलने एवं नमस्कृत होकर, वे अपनेरथ में आरूढ़ हुए।
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सुभद्रा द्रौपदी कुन्ती विराटतनया तथा ।
गान्धारी धृतराष्ट्रश्न युयुत्सुगौतमो यमौ ॥
९॥
वृकोदरश्व धौम्यश्व स्त्रियो मत्स्यसुतादय: ।
न सेहिरे विमुहान्तो विरहं शार्ड्रधन्वनः ॥
१०॥
सुभद्रा--कृष्ण की बहन; द्रौपदी--पाण्डवों की पत्नी; कुन्ती--पाण्डवों की माता; विराट-तनया--विराट की पुत्री( उत्तरा )) तथा-- भी; गान्धारी--दुर्योधन की माता; धृतराष्ट्र:--दुर्योधन का पिता; च--तथा; युयुत्सु:--धृतराष्ट्र कीवैश्य-पत्ली का पुत्र; गौतम:--कृपाचार्य ; यमौ--जुड़वाँ भाई नकुल तथा सहदेव; वृकोदर:-- भीम; च--तथा; धौम्य:--धौम्य; च--तथा; स्त्रियः--राजमहल की अन्य स्त्रीयाँ भी; मत्स्य-सुता-आदय: --मछुवारे की पुत्री ( सत्यवती, भीष्म कीसौतेली माता ); न--नहीं; सेहिरि--सह सकी ; विमुह्ान्त:--मूर्छित सी; विरहम्--वियोग; शार्क-धन्वन: -- श्रीकृष्ण काजो अपने हाथ में शंख धारण किये रहते हैं।
उस समय सुभद्रा, द्रौपदी, कुन्ती, उत्तरा, गान्धारी, धृतराष्ट्र, युयुत्सु, कृपाचार्य, नकुल,सहदेव, भीमसेन, धौम्य तथा सत्यवती, सभी मूरछित से हो गये, क्योंकि भगवान् कृष्ण कावियोग सह पाना उन सबों के लिए असम्भव था।
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सत्सज्ञान्मुक्तदुःसड़ो हातुं नोत्सहते बुध: ।
कीर्त्यमानं यशो यस्य सकृदाकर्ण्य रोचनम् ॥
११॥
तस्मिन्न्यस्तधिय: पार्था: सहेरन् विरहं कथम् ।
दर्शनस्पर्शसंलापशयनासनभोजनै: ॥
१२॥
सतू-सझ़झत्-शुद्ध भक्तों की संगति से; मुक्त-दुःसड्र:--बुरी भौतिक संगति से मुक्त; हातुम्-परित्याग करने के लिए; नउत्सहते--कभी प्रयास नहीं करता है; बुध: -- भगवान् को समझनेवाला; कीर्त्यमानम्--यशोगान करता; यशः--ख्याति;यस्य--जिसका; सकृत्--मात्र एक बार; आकर्णर्य --केवल सुनकर; रोचनम्-- प्रसन्न करके; तस्मिन्--उसमें; न््यस्त-धिय:--जिसने अपना मन उनको अर्पित कर रखा है; पार्था:--पृथा के पुत्र; सहेरनू--सह सकते हैं; विरहम्--वियोग;कथम्-कैसे; दर्शन--आमने-सामने देखते हुए; स्पर्श--स्पर्श करते हुए; संलाप--परस्पर बातें करते; शयन--सोते;आसन--बैठते; भोजनै:--एक साथ भोजन करते।
वह बुद्धिमान जिस ने शुद्ध भक्तों की संगति से परमेश्वर को समझ लिया है औरभौतिक कुसंगति से अपने को छुड़ा लिया है, वह भगवान् के यश को सुनने से चूकेगानहीं; उसने चाहे उनके विषय में एक ही बार क्यों न सुना हो।
तो भला, पाण्डव उनकेवियोग को कैसे सह पाते? क्योंकि वे उनसे घनिष्ठतापूर्वक सम्बन्धित थे, वे उन्हें साक्षात्अपने समक्ष देखते थे, उनका स्पर्श करते थे, उनसे बातें करते थे और उन्हीं के पास सोते,उठते-बैठते तथा भोजन करते थे।
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सर्वे तेडनिमिषैरक्षैस्तमनुद्रुतचेतस: ।
वीक्षन्त: स्नेहसम्बद्धा विचेलुस्तत्र तत्र ह ॥
१३॥
सर्वे--सभी; ते--वे; अनिमिषै: --बिना पलक झपके; अक्षैः:--आँखों से; तम् अनु--उनके पीछे-पीछे; द्रुत-चेतस: --ड्रवित हृदय; वीक्षन्तः:--उनको देखते हुए; स्नेह-सम्बद्धा:--शुद्ध प्रेम से बँधे; विचेलु:--हिलने-डुलने लगे; तत्र तत्र--इधर-उधर; ह--उन्होंने ऐसा किया |
उन सबके हृदय उनके आकर्षण-रूपी पात्र में द्रवित हो रहे थे।
वे उन्हें अपलक नेत्रों सेदेख रहे थे और ( स्नेह-बन्धन में बँधकर ) व्यग्रता से इधर-उधर मचल रहे थे।
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न्यरन्धन्द्गलद्ाष्पमौत्कण्ठ्याद्ेवकीसुते ।
निर्यात्यगारान्नो भद्गमिति स्याद्वान्धवस्त्रिय: ॥
१४॥
न्यरुन्धन्--बड़ी मुश्किल से रोकते हुए; उद्गलत्--उमड़ते हुए; बाष्पम्-- आँसुओं को; औत्कण्ठ्यात्-- अत्यधिकउत्सुकता से; देवकी-सुते--देवकी के पुत्र में; निर्याति--बाहर निकल कर; अगारातू--महल से; नः:--नहीं; अभद्रम्--अशुभ; इति--इस प्रकार; स्थात्--होए; बान्धव--सम्बन्धियों की; स्त्रियः-स्त्रियाँ ।
सगी-सम्बन्धी ( नातेदार ) स्त्रियाँ, जिनके नेत्रों से कृष्ण के लिए व्याकुलतावशअश्रुधारा निकल रही थी, महल से बाहर आ गईं।
वे बड़ी मुश्किल से अपने आँसू रोकपाईं।
उन्हें भय था कि प्रस्थान के अवसर पर आँसुओं से अपशकुन हो सकता है।
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मृदद्भशट्डुभेर्यश्व वीणापणवगोमुखा: ।
धुन्धुर्यानकघण्टाद्या नेदुर्दुन्दुभयस्तथा ॥
१५॥
मृदड्ग--मीठी ध्वनि उत्पन्न करनेवाला ढोल; शद्भडु--शंख; भेर्य:--भेरी; च--तथा; वीणा--तंतुयुक्त वाद्ययन्त्र, वीणा;'पणव--एक प्रकार की वंशी; गोमुखा:--अन्य प्रकार की बाँसुरी; धुन्धुरी--एक प्रकार का ढोल; आनक--नगाड़ा;घण्टा--बजाया जानेवाला घंटा; आद्या:--इत्यादि; नेदु:--बजे; दुन्दुभय:--विभिन्न प्रकार के ढोल; तथा--उस समय
हस्तिनापुर के राजमहल से भगवान् के प्रस्थान समउनके सम्मान में विभिन्न प्रकारके ढोल--यथा मृदंग, ढोल, नगाड़े, धुंधुरी तथा दुन्दुभी--एवं तरह-तरह की वंशियाँ,वीणा, गोमुख और भेरियाँ एकसाथ बज उठे।
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प्रासादशिखरारूढा: कुरुनार्यों दिहक्षया ।
ववृषु: कुसुमै: कृष्णं प्रेमत्रीडास्मितेक्षणा: ॥
१६॥
प्रासाद--राजमहल की; शिखर--छत पर; आरूढा:--चढ़ी हुईं; कुरू-नार्य:--कुरुराजवंश की नारियाँ; दिहृक्षया--देखने की इच्छा से; बवृषु:--वर्षा की; कुसुमैः--फूलों से; कृष्णम्-- भगवान् कृष्ण पर; प्रेम--प्रेम तथा स्नेहवश;ब्रीडा-स्मित-ईक्षणा:--लजीली हँसी से देखते हुए
भगवान् को देखने की प्रेममयी इच्छा से कुरूओं की राजवंशी स्त्रियाँ राजमहल की छतपर चढ़ गईं और स्नेह तथा लज्जा से युक्त हँसती हुई भगवान् पर पुष्पों की वर्षा करने लगीं।
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सितातपत्र॑ जग्राह मुक्तादामविभूषितम् ।
रलदण्डं गुडाकेश: प्रिय: प्रियतमस्य ह ॥
१७॥
सित-आततपत्रम्--सुखद छाता; जग्राह--ले लिया; मुक्ता-दाम--मोतियों तथा झालर से सजा; विभूषितम्--किनारीलगा; रत्न-दण्डम्--रत्नों के हत्थे वाला; गुडाकेश:--अर्जुन, पटु योद्धा के रूप में अथवा जिसने नींद जीत ली है;प्रियः--अत्यन्त प्यारा; प्रियतमस्य--अत्यन्त प्रिय का; ह--ऐसा ही किया
उस समय महान् योद्धा तथा निद्रा को जीतनेवाले अर्जुन ने, जो परम प्रिय भगवान् काघनिष्ठ मित्र था, एक छाता ले लिया जिसका हत्था रत्नों का था और जिसमें मोतियों कीझालर लगी थी।
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उद्धव: सात्यकिश्चैव व्यजने परमाद्धुते ।
विकीर्यमाण: कुसुम रेजे मधुपति: पथि ॥
१८॥
उद्धवः--कृष्ण का चचेरा भाई; सात्यकि: --उनका सारथी; च--तथा; एबव--निश्चय ही; व्यजने--पंखा झलने में व्यस्त;'परम-अद्भुते--सजावटी; विकीर्यमाण:--बिखरे हुए ( फूलों ) पर आसीन; कुसुमैः--फूलों से; रेजे--आदेश दिया; मधु-पति:--मथु के स्वामी ( कृष्ण ) ने; पथि--मार्ग पर
उद्धव तथा सात्यकि अलंकृत पंखों से भगवान् पर पंखा झलने लगे और मधु के स्वामीकृष्ण ने बिखरे हुए पुष्पों पर आसीन होकर उन्हें मार्ग पर चलने के लिए आदेश दिया।
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अश्रूयन्ताशिष: सत्यास्तत्र तत्र ट्विजेरिता: ।
नानुरूपानुरूपाश्च निर्गुणस्य गुणात्मन: ॥
१९॥
अश्रूयन्त--सुना जाकर; आशिष:--आशीर्वाद; सत्या:--सभी सच हैं; तत्र--यहाँ; तत्र--वहाँ; द्विज-ईरिता: --विद्वानब्राह्मणों द्वारा उच्चरित; न--नहीं; अनुरूप--अनुरूप; अनुरूपा: --योग्य; च-- भी; निर्गुणस्य--परम का; गुण-आत्मन:--मनुष्य की भूमिका निभाते हुए।
जहाँ-तहाँ यह सुनाई पड़ रहा था कि कृष्ण को दिये गये आशीर्वाद, न तो उनकेउपयुक्त हैं, न अनुपयुक्त, क्योंकि वे सब उन परम पुरुष के लिए थे जो इस समय मनुष्य कीभूमिका निभा रहे थे।
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अन्योन्यमासीत्सझल्प उत्तमश्लोकचेतसाम् ।
कौरवेन्द्रपुरख्रीणां सर्वश्रुतिमनोहर: ॥
२०॥
अन्योन्यम्--एक दूसरे में; आसीत्-- था; सझ्जल्प: --बात; उत्तम-शलोक-पर मे श्वर, जिनकी प्रशंसा चुने हुए श्लोकों सेकी जाती है; चेतसामू--जिनके हृदय इस प्रकार लीन हैं उनका; कौरव-इन्द्र--कुरुओं का राजा; पुर--राजधानी;स्त्रीणाम्--स्त्रियों का; सर्व--समस्त; श्रुति--वेद; मन:-हरः--मन को मोहित करनेवाला |
चुने हुए छन्दों से जिनकी स्तुति की जाती है, ऐसे भगवान् के दिव्य गुणों के विचार मेंडूबीं, हस्तिनापुर के सभी घरों की छतों पर चढ़ी हुई स्त्रियाँ, उनके विषय में बातें करनेलगीं।
ये बातें बैदिक स्तोत्रों से कहीं अधिक आकर्षक थीं।
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स वै किलायं पुरुष: पुरातनोय एक आसीदविशेष आत्मनि ।
अग्रे गुणेभ्यो जगदात्मनी श्वरेनिमीलितात्मन्निशि सुप्तशक्तिषु ॥
२१॥
सः--वे ( कृष्ण ); बै--जैसा मुझे स्मरण है; किल--निश्चित रूप से; अयमू--यह; पुरुष:-- भगवान्; पुरातन:-- आदि;यः--जो; एक:--एकमात्र; आसीत्--विद्यमान थे; अविशेष:--भौतिक रूप से अव्यक्त; आत्मनि--स्वयं; अग्रे--सूृष्टिके पूर्व; गुणेभ्य:--प्रकृति के गुणों का; जगत्-आत्मनि--परमात्मा में; ईश्वेरे-- भगवान् में; निमीलित--लीन; आत्मन्--जीव; निशि सुप्त--रात्रि में सोया हुआ; शक्तिषु--शक्तियों का।
वे कहने लगीं : जैसा हमें निश्चित रूप से स्मरण है, यही हैं वे, जो आदि परमेश्वर हैं।
प्रकृति के गुणों की व्यक्त सृष्टि के पूर्व, वे ही अकेले विद्यमान थे।
चूँकि वे परमेश्वर हैं,अतएबव सारे जीव उन्हीं में लीन होते हैं, मानो रात्रि में सोये हुए हों और उनकी शक्ति रुकगई हो।
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स एव भूयो निजवीर्यचोदितांस्वजीवमायां प्रकृति सिसृक्षतीम् ।
अनामरूपात्मनि रूपनामनीविधित्समानोनुससार शासत्रकृत् ॥
२२॥
सः--वे; एव--इस प्रकार; भूय:--फिर से; निज--अपना; वीर्य--पराक्रम; चोदिताम्--सम्पन्नता का; स्व--अपना;जीव--जीव; मायाम्--बाह्यम शक्ति; प्रकृतिमू-- भौतिक प्रकृति को; सिसृक्षतीम्--पुनः सृष्टि करते समय; अनाम--बिनाउपाधि के; रूप-आत्मनि--आत्मा के स्वरूप; रूप-नामनी--रूप तथा नाम; विधित्समान:--प्रदान करने की इच्छाकरते; अनुससार--हस्तान्तरित कर दिया; शास्त्र-कृत्-शाम्त्रों के संग्राहक ।
तब भगवान् ने अपने अंशस्वरूप जीवों को, नाम तथा रूप प्रदान करने की इच्छा से,उन्हें भौतिक प्रकृति के मार्गदर्शन के अन्तर्गत कर दिया।
उनकी ही अपनी शक्ति से भौतिकप्रकृति को पुनः सृष्टि करने के लिए अधिकृत कर दिया गया है।
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स वा अयं यत्पदमत्र सूरयोजितेन्द्रिया निर्जितमातरिश्वन: ।
पश्यन्ति भक्त्युत्कलितामलात्मनानन्वेष सत्त्वं परिमा्टमर्हति ॥
२३॥
सः--वह; बै-- भगवत्कृपा द्वारा; अयम्--यह; यत्--जो; पदम् अत्र--यहाँ वही भगवान् श्रीकृष्ण हैं; सूरय:--बड़े-बड़ेभक्त-गण; जित-इन्द्रिया:--जिन्होंने इन्द्रियों के प्रभाव को जीत लिया है; निर्णित--पूर्ण रूप से संयमित; मातरिश्वन: --जीवन; पश्यन्ति--देख सकते हैं; भक्ति-- भक्तिमय सेवा से; उत्तलित--विकसित; अमल-आत्मना--जिनके मन पूरीतरह विमल हैं उनका; ननु एष:--निश्चित रूप से इसी के द्वारा; सत्त्वमू--जगत, अस्तित्व; परिमा्टम-मन को पूरी तरहस्वच्छ करने के लिए; अर्हति--के योग्य है।
ये वे ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, जिनके दिव्य रूप का अनुभव बड़े-बड़े भक्तों द्वाराकिया जाता है, जिन्होंने सुहृढ़ भक्ति द्वारा तथा जीवन एवं इन्द्रियों पर पूर्ण संयम द्वारा,भौतिक चेतना से पूर्ण रूप से विशुद्ध हो चुके हैं।
तथा अस्तित्व को विमल बनाने का यहीएकमात्र मार्ग है।
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स वा अयं सख्यनुगीतसत्कथोवेदेषु गुहोषु च गुह्यवादिभि: ।
य एक ईशो जगदात्मलीलयासृजत्यवत्यत्ति न तत्र सज्जते ॥
२४॥
सः--वे; वै-- भी; अयम्--यह; सखि--हे सखी; अनुगीत--वर्णित; सत्-कथः-- श्रेष्ठ लीलाएँ; वेदेषु--वेदों में;गुहोषु--गोपनीय रीति से; च--भी; गुहा-वादिभि:--गुहा भक्तों द्वारा; य:--जो; एक:--केवल एक; ईशः--परमनियन्ता; जगत्--सारी सृष्टि के; आत्म--परमात्मा; लीलया--लीलाओं के प्राकट्य द्वारा; सृजति--सृजन करते हैं; अवतिअत्ति--पालन करते हैं तथा संहार करते हैं; न--कभी नहीं; तत्र--वहाँ; सज्जते--उसमें आसक्त होते हैं।
हे सखियो, यहाँ पर वही भगवान् हैं, जिनकी आकर्षक तथा गोपनीय लीलाओं कावर्णन बड़े-बड़े भक्तों द्वारा वैदिक साहित्य के गुह्मतम अंशों में हुआ है।
वे ही भौतिक जगतकी सृष्टि करने वाले, पालने वाले तथा संहार करनेवाले हैं, फिर भी वे उससे अप्रभावितरहते हैं।
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यदा ह्यधर्मेण तमोधियो नृपाजीवन्ति तत्रैष हि सत्त्वतः किल ।
धत्ते भगं सत्यमृतं दयां यशोभवाय रूपाणि दधघद्युगे युगे ॥
२५॥
यदा--जब-जब; हि--निश्चय ही; अधर्मेण --ई श्वर की इच्छा के विरुद्ध; तमः-धिय:--तमोगुणी पुरुष; नृपा:--राजातथा प्रशासक; जीवन्ति--पशुओं के समान रहते हैं; तत्र--तत्पश्चात्; एप: --वह; हि--केवल; सत्त्वतः--दिव्य;किल--निश्चय ही; धत्ते--प्रकट होता है; भगम्--परम शक्ति; सत्यमू--सत्य; ऋतम्--सरलता; दयाम्--दया; यशः--अद्भुत कार्यकलाप; भवाय--पालन हेतु; रूपाणि--विभिन्न रूपों में ; दधत्--प्रकट; युगे--विभिन्न कालों में; युगे--तथा युगों में |
जब भी राजा तथा प्रशासक, तमोगुण में स्थित पशुओं की तरह रहते हैं, तो भगवान्अपने दिव्य रूप में अपनी परम शक्ति, सत्य ऋत, को प्रकट करते हैं, श्रद्धालुओं पर विशेषदया दिखाते हैं, अद्भुत कार्य करते हैं तथा विभिन्न कालों तथा युगों में आवश्यकतानुसारविभिन्न दिव्य रूप प्रकट करते हैं।
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अहो अलं श्लाघ्यतमं यदो: कुल-महो अलं पुण्यतमं मधोर्वनम् ।
यदेष पुंसामृषभ: श्रिय: पति:स्वजन्मना चड्क्रमणेन चाञ्ञति ॥
२६॥
अहो--ओह; अलम्--सचमुच; श्लाध्य-तमम्--सर्वाधिक यशस्वी; यदो:--यदु राजा के; कुलम्--वंश; अहो--ओह;अलम्--सचमुच; पुण्य-तमम्--अत्यन्त पुण्यात्मा; मधो: वनम्--मथुरा की भूमि; यत्--क्योंकि; एष:--यह; पुंसाम्--समस्त जीवों का; ऋषभ:--परम नायक; थ्रिय:--लक्ष्मी के; पति:--पति; स्व-जन्मना-- अपने आविर्भाव से;चड्क्रमणेन--विचरण द्वारा; च अज्ञति--महिमा।
ओह, यदुवंश कितना यशस्वी है और मथुरा की भूमि कितनी पुण्यमयी है, जहाँ समस्त जीवों के परम नायक, लक्ष्मीपति ने जन्म लिया और अपने बचपन में विचरण किया है।
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अहो बत स्वर्यशसस्तिरस्करीकुशस्थली पुण्ययशस्करी भुवः ।
पश्यन्ति नित्य॑ यदनुग्रहेषितंस्मितावलोकं स्वपति सम यत्प्रजा: ॥
२७॥
अहो बत--यह कितना आश्चर्यजनक है; स्व:-यशसः--स्वर्ग की महिमा; तिरस्करी--पराजित करनेवाली; कुशस्थली--द्वारका; पुण्य--शुभकर्म; यशस्करी-- प्रसिद्ध; भुव:--पृथ्वीलोक ; पश्यन्ति--देखते हैं; नित्यमू--निरन्तर; यत्--जो;अनुग्रह-इषितम्--वर देने के लिए; स्मित-अवलोकम्--मृदु मुसकान भरी चितवन; स्व-पतिम्--जीवों के आत्मा( कृष्ण ) को; स्म--करते थे; यत्-प्रजा:--उस स्थान के निवासी
निस्सन्देह, यह कितना आश्चर्यजनक है कि द्वारका ने स्वर्ग के यश को पिछाड़ करपृथ्वी की प्रसिद्धि को बढ़ाया है।
द्वारका के निवासी उनके प्रिय स्वरूप में समस्त जीवों केआत्मा ( कृष्ण ) का सदैव दर्शन करते हैं।
भगवान् उन पर दृष्टिपात करते हैं और अपनीमुसकान भरी चितवन से उन्हें कृतार्थ करते हैं।
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नूनं ब्रतस्नानहुतादिने श्वर:समर्चितो हास्य गृहीतपाणिभि: ।
पिबन्ति या: सख्यधरामृत॑ मुहु-ब्रजस्त्रिय: सम्मुमुहुर्यदाशया: ॥
२८॥
नूनम्--निश्चय ही पूर्व जन्म में; ब्रत-- अनुष्ठान, ब्रत; स्नान--स्नान; हुत--अग्नि में आहुति; आदिना--आदि द्वारा;ईश्वरः-- भगवान्; समर्चितः--पूरी तरह से पूजित; हि--निश्चय ही; अस्य--उनका; गृहीत-पाणिभि: --विवाहिता स्त्रियोंद्वारा; पिबन्ति--स्वाद लेते हैं; या:--जो; सखि--हे सखी; अधर-अमृतम्--उनके होंठों का अमृत; मुहुः--पुनः पुनः;ब्रज-स्त्रियः--व्रजभूमि की बालाएँ; सम्मुमुहु:--बहुधा मूर्छित हो जाती थीं; यत्-आशया:--इस प्रकार से अनुग्रह कीआशा करते हुए।
है सखियो, तनिक उनकी पत्नियों के विषय में सोचो, जिनके साथ उनका पाणिग्रहणहुआ था।
उन्होंने कैसा व्रत, स्नान, यज्ञ तथा ब्रह्माण्ड के स्वामी की सम्यक् पूजा की होगी,जिससे वे सब उनके अधरामृत का निरन्तर आस्वादन ( चुम्बन द्वारा ) कर रही हैं ? ब्रजभूमिकी बालाएँ ऐसी कृपा की कल्पना से ही प्राय: मूछित हो जाती होंगी।
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या वीर्यशुल्केन हृता: स्वयंवरेप्रमथ्य चैद्प्रमुखान् हि शुष्मिण: ।
प्रद्युम्नसाम्बाम्बसुतादयो परायाश्वाहता भौमवधे सहस्रश: ॥
२९॥
या--स्त्री; वीर्य--पराक्रम; शुल्केन--मूल्य चुकता करने से; हता:--बलपूर्वक ले जाई गई; स्वयंबरे--स्वयंवर में;प्रमथ्य--मान-मर्दन करके; चैद्य--राजा शिशुपाल; प्रमुखान्--इत्यादि; हि--निश्चय ही; शुष्पिण:--सभी अत्यन्तशक्तिशाली; प्रद्युम्न--प्रद्युम्न ( कृष्ण का पुत्र ); साम्ब--साम्ब; अम्ब--अम्ब; सुत-आदय: --सन््तानें; अपरा:-- अन्यस्त्रियाँ; या:--जो; च-- भी; आहता: --इसी प्रकार ले जाईं गई; भौम-वधे--राजाओं का वध करने के बाद;सहस्त्रश:--हजारों |
इन पत्नियों से सन््तानें हैं--प्रद्युम्न, साम्ब, अम्ब इत्यादि।
उन्होंने शिशुपाल के नायकत्वमें आए हुए अनेक शक्तिशाली राजाओं को हरा कर रुक्मिणी, सत्यभामा तथा जाम्बवतीजैसी स्त्रियों का उनके स्वयंवर-समारोहों से बलपूर्वक अपहरण किया था।
उन्होंने भौमासुरतथा उसके हजारों सहायकों का वध करके अन्य स्त्रियों का भी अपहरण किया था।
ये सारी स्त्रियाँ धन्य हैं।
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एता: परं सत्रीत्वमपास्तपेशलंनिरस्तशौचं बत साधु कुर्वते ।
यासां गृहात्पुष्करलोचन: पति-न जात्वपैत्याहतिभिहदि स्पृशन् ॥
३०॥
एताः--ये सब स्त्रियाँ; परमू--सर्वोच्च; स्त्रीत्वम्--स्त्रीत्व; अपास्तपेशलम्--बिना व्यक्तित्व के; निरस्त--विहीन;शौचम्--शुद्धि; बत साधु-- धन्य हैं; कुर्वते--करते हैं; यासाम्--जिनके ; गृहात्--घर से; पुष्कर-लोचन:--कमलनेत्रोंवाले; पतिः--पति; न जातु--कभी भी नहीं; अपैति--जाता है; आहतिभि:--भेंट द्वारा; हदि--हृदय में; स्पृशन्--प्रिय ।
इन सारी स्त्रियों ने व्यक्तित्व तथा शुद्धि से विहीन होते हुए भी, अपने जीवन को धन्यकिया।
उनके पति कमलनयन भगवान् ने उन्हें घर में कभी अकेले नहीं छोड़ा।
वे उन्हेंबहुमूल्य भेंट प्रदान करके उनके हृदयों को प्रसन्न बनाते रहे।
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एवंविधा गदन्तीनां स गिर: पुरयोषिताम् ।
निरीक्षणेनाभिनन्दन् सस्मितेन ययौ हरि: ॥
३१॥
एवंविधा: --इस प्रकार; गदन्तीनामू--उनके विषय में बातें करती तथा प्रार्थना करती; सः--वे ( भगवान ); गिर:--वाणीका; पुर-योषिताम्--राजधानी की स्त्रियों के; निरीक्षणेन--उन्हें देखने से; अभिनन्दन्--तथा उनका स्वागत करने; स-स्मितेन--हँसमुख चेहरे से; ययौ--प्रस्थान किया; हरिः-- भगवान् ने।
राजधानी हस्तिनापुर की स्त्रियाँ अभी उनका अभिनन्दन कर ही रही थीं और इस प्रकारसे बातें चला रही थीं कि भगवान् ने मुस्कराते हुए उनकी बधाइयाँ स्वीकार कीं और उन परअपनी कृपादृष्टि डालते हुए नगर से प्रस्थान किया।
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अजातशत्रु: पृतनां गोपीथाय मधुद्रिष: ।
परेभ्य: शद्धितः स्नेहात्प्रायुड्र चतुरद्धिणीम् ॥
३२॥
अजात-शत्रु:--जिसका कोई शत्रु न था, महाराज युधिष्ठिर; पृतनाम्--सुरक्षा सेनाएँ; गोपीथाय--रक्षा प्रदान करने केलिए; मधु-द्विष: --मधु के शत्रु ( श्रीकृष्ण ) का; परेभ्य:--अन्यों ( शत्रुओं ) से; श्धितः-- भयभीत; स्नेहात्-स्नेह-वश; प्रायुड्र --संलग्न; चतु:-अड्जिणीम्--चतुरंगिनी सेना।
यद्यपि महाराज युधिष्ठिर का कोई शत्रु न था, तो भी उन्होंने असुरों के शत्रु, भगवान्श्रीकृष्ण के साथ जाने के लिए चतुरंगिणी सेना ( घोड़ा, हाथी, रथ तथा पैदल सेना ) लगादी।
शत्रु से बचाव और भगवान् से स्नेह के कारण महाराज ने ऐसा किया।
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अथ दूरागतान् शौरि: कौरवानू विरहातुरान् ।
सन्निवर्त्य दढं स्निग्धान् प्रायात्स्वनगरीं प्रिय: ॥
३३॥
अथ--इस तरह; दूरागतान्--दूर तक उनके साथ-साथ जाकर; शौरि:-- भगवान् कृष्ण; कौरवानू--पाण्डवों को;विरहातुरान्--विछोह भाव से अभिभूत; सतन्निवर्त्य--विनम्रतापूर्वक आग्रह किया; हृढम्--कृतसंकल्प; स्निग्धान्--स्नेहसे पूरित; प्रायात्-- आगे बढ़े; स्व-नगरीम्--अपने नगर ( द्वारका ) की ओर; प्रियैः--प्रिय संगियों के साथ।
भगवान् कृष्ण के प्रति प्रगाढ़ स्नेहवश कुरुवंशी पाण्डव उन्हें विदा करने के लिए उनकेसाथ काफी दूर तक गये।
वे भावी विछोह के विचार से अभिभुत थे।
किन्तु भगवान् नेउनसे घर लौट जाने का आग्रह किया और स्वयं अपने प्रिय संगियों के साथ द्वारका कीओर रवाना हुए।
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कुरुजाड्नलपाञ्नालान् शूरसेनान् सयामुनान् ।
ब्रह्मावर्त कुरुक्षेत्र मत्स्यान् सारस्वतानथ ॥
३४॥
मरुधन्वमततिक्रम्य सौवीराभीरयो: परान् ।
आनर्तान् भार्गवोपागाच्छान्तवाहो मनाग्विभु: ॥
३५॥
कुरुू-जाड्ुल--दिल्ली प्रान्त; पाञ्ञालानू--पंजाब प्रान्त का भाग; शूरसेनान्--उत्तर प्रदेश का भाग; स--सहित;यामुनान्--यमुना के तटवर्ती जिलों को; ब्रह्मावर्तम्--उत्तरी उत्तर प्रदेश का भाग; कुरुक्षेत्रमू-वह स्थान जहाँ युद्ध लड़ागया; मत्स्यान्--मत्स्या प्रान्त; सारस्वतान्--पंजाब का एक हिस्सा; अथ--इत्यादि; मरू--मरुस्थल, राजस्थान;धन्वम्--मध्य प्रदेश, जहाँ जल का अभाव है; अति-क्रम्य--निकल कर; सौवीर--सौराष्ट्; आभीरयो:--गुजरात काहिस्सा; परान्--पश्चिमी दिशा; आनर्तान्-द्वारका प्रान्त; भार्गव--हे शौनक; उपागात्--थक गये; श्रान्त-- थकान;वाहः--घोड़े; मनाक् विभु:--लम्बी यात्रा के कारण थोड़ा-सा।
हे शौनक, तब भगवान् कुरुजांगल, पाञ्जाल, शूरसेन, यमुना के तटवर्ती प्रदेश,ब्रह्मावर्त, कुरुक्षेत्र, मत्स्या, सारस्वता, मरुप्रान्त तथा जल के अभाव वाले भाग से होते हुएआगे बढ़े।
इन प्रान्तों को पार करने के बाद वे सौवीर तथा आभीर प्रान्त पहुँचे और अन्त मेंइन सबके पश्चिम की ओर स्थित द्वारका पहुँचे।
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तत्र तत्र ह तत्रत्यैर्हरि: प्रत्युद्यतार्हण: ।
सायं भेजे दिशं पश्चाद्गविष्ठो गां गतस्तदा ॥
३६॥
तत्र तत्र--विभिन्न स्थानों में; ह--ऐसी घटना घटी; तत्रत्यै:--स्थानीय निवासियों द्वारा; हरिः-- भगवान; प्रत्युद्यत-अर्हण:-ैभेंटें तथा पूजा-सम्मान अर्पित किया जाकर; सायम्--शाम; भेजे--आने पर; दिशम्--दिशा; पश्चात्--पश्चिमी; गविष्ठ:--आकाश में सूर्य; गामू--समुद्र को; गतः--चला गया; तदा--उस समय ।
इन प्रान्तों से होकर यात्रा करते समय उनका स्वागत किया गया, पूजा की गई और उन्हेंविविध भेंटें प्रदान की गईं।
संध्या समय सारे स्थानों में संध्या-कालीन अनुष्ठान ( कृत्य )करने के लिए भगवान् अपनी यात्रा स्थगित करते।
सूर्यास्त के बाद नियमित रूप से ऐसाकिया जाता।
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